शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

ज़िंदादिल इंसान अजय नाथ झा



 आज सुबह फेसबुक खोलते ही शेषनारायन सिंह की वॉल से ख़बर मिली कि अजय झा नहीं रहे, बहुत दुख हुआ, वह जेएनयू के साथियों का अज़ीज़ मित्र था। हम दोनों सतलज छात्रावास में कई साल एक साथ रहे, एक साथ खाना और घंटों बतियाना, लंबी बहसें करना रोज़ की आदत थी, अजय की रुचियाँ विलक्षण थी वह जेएनयू में सांगठनिक राजनीति में शामिल नहीं था लेकिन एसएफआई के साथ उसका स्वाभाविक लगाव हुआ करता था वह हम सबका कटु आलोचक भी था, मैं उन दिनों एसएफआई का अध्यक्ष हुआ करता था ,अजय आए दिन अपनी कटु से कटु आलोचनाएँ शेयर करता और गहरे मित्रतापूर्ण भाव को बनाए रखता था।
       अजय ने जेएनयू के चुनावआयोग अध्यक्ष के रुप में काम करके ख़ूब शोहरत हासिल की, यह उसका सबसे पसंदीदा काम था ,इसके अलावा तबला बजाना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन में उसे ख़ूब मज़ा आता था. विगत ढाई दशक से भी ज़्यादा समय से वह मीडिया में सक्रिय था और अंतराष्ट्रीय विषयों पर उसे महारत हासिल थी, जेएनयू के बहुत कम स्कालर हैं जो अंतरराष्ट्रीय विषयों पर मीडिया में निरंतर लिखते रहे हैं। 
     लंबे अंतराल के बाद अजय से फेसबुक के जरिए मुलाक़ात हुई और वह संपर्क में निरंतर बना रहा। अजय में सबसे अच्छी बात थी कि बहुत सुंदर स्टाइल से बातें करता था , उसकी आवाज़ बड़ी प्यारी थी, इस पर उसे भी गर्व था । अजय के जाने से हम सब जेएनयू के मित्रगण बेहद दुखी और आहत महसूस करते हैं। हम सबकी उसे विनम्र श्रद्धांजलि । 

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

''हैदर'' यानी कश्मीरियत की त्रासदी

     ''हैदर'' फिल्म पर बातें करते समय दो चीजें मन में उठ रही हैं। पहली बात यह कि कश्मीर के बारे में मीडिया में नियोजित हिन्दुत्ववादी प्रचार अभियान ने आम जनता में एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप या अंधविचार बना दिया है। कश्मीर के बारे में सही जानकारी के अभाव में मीडिया का समूचा परिवेश हिन्दुत्ववादी कु-सूचनाओं और कु-धारणाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में कश्मीर की थीम पर रची गयी किसी भी रचना का आस्वाद सामान्य फिल्म की तरह नहीं हो सकता। किसी भी फिल्म को सामान्य दर्शक मिलें तब ही उसके असर का सही फैसला किया जा सकता है। दूसरी बात यह कि हिन्दी में फिल्म समीक्षकों का एक समूह है जो फिल्म के नियमों और ज्ञानशास्त्र से रहित होकर आधिकारिकतौर पर फिल्म समीक्षा लिखता रहता है। ये दोनों ही स्थितियां इस फिल्म को विश्लेषित करने में बड़ी बाधा हैं। फिल्म समीक्षा कहानी या अंतर्वस्तु समीक्षा नहीं है।

''हैदर'' फिल्म का समूचा फॉरमेट त्रासदीकेन्द्रित है। यह कश्मीरियों की अनखुली और अनसुलझी कहानी है। कश्मीर की समस्या के अनेक पक्ष हैं।फिल्ममेकर ने इसमें त्रासदी को चुना है।यहां राजनीतिक पहलु तकरीबन गायब हैं।इस फिल्म में राजनीति आटे में नमक की तरह मिली हुई है। यहां तक कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी इसके फॉरमेट में हाशिए पर है। मूल समस्या है कश्मीर जनता की आतंकी त्रासदी की । काफी अर्सा पहले कश्मीर के आतंकी पहलु पर गोविन्द निहलानी की फिल्म 'द्रोहकाल' आई थी,वहां आतंकी हिंसाचार को कलात्मक ढ़ंग से चित्रित किया गया था ,जबकि ''हैदर'' में आतंकी हिंसाजनित त्रासदी का चित्रण है,इस अर्थ में इस फिल्म को ''द्रोहकाल'' की अगली कड़ी के रुप में भी रखा जा सकता है।

''हैदर'' फिल्म में मूलपाठ त्रासदी है,लेकिन अनेक उप-पाठ भी हैं,जो अधूरे हैं,इस फिल्म की खूबी है कि इसमें राष्ट्रवाद कहीं पर नहीं है। साथ ही राजनीतिक संवाद बहुत कम है। इस अर्थ में यह ''द्रोहकाल'' से विकसित नजरिए को व्यक्त करने वाली फिल्म है। हिन्दी में कश्मीर पर राजनीतिक फिल्म बने और उसमें राष्ट्रवाद न हो यह हो नहीं सकता,हिन्दी में कश्मीर और आतंकी थीम पर बनी फिल्मों में राष्ट्रवाद और उसके भड़काऊ संवाद खूब आते रहे हैं। लेकिन ''हैदर'' इस मामले में अपवाद है। साथ ही मुसलमानों और कश्मीर को लेकर सचेत रुप से मीडिया में प्रचलित स्टीरियोटाइप को भी कलात्मक चुनौती दी गयी है। मसलन, इस फिल्म में मुसलमान कहीं नजर नहीं आते, कश्मीरी नजर आते। मस्जिद-नवाज-मौलवी आदि उनसे जुड़ा समूचा मीडिया स्टीरियोटाइप एकसिरे से गायब है। फिल्ममेकर सचेत रुप में कश्मीरियत को चित्रित करने में सफल रहा है। इस अर्थ में यह फिल्म कश्मीर की समस्या में पिस रहे कश्मीरियों की त्रासदी को सामने लाती है और इस समस्या के हिन्दू-मुसलमान के नाम पर चल रहे हिन्दुत्ववादी मीडिया प्रचार का कलात्मक निषेध करती है।

इसके अलावा इस फिल्म में बड़े ही संतुलन के साथ सेना और आतंकियों के मानवाधिकारहनन के रुपों के खिलाफ प्रतिवादी भावों और संवेदनाओं को उभारा गया है और उनको मानवाधिकार के फ्रेमवर्क में रखकर पेश किया गया है। त्रासदी यहां इवेंट की बजाय प्रक्रिया के रुप में चित्रित हुई है।त्रासदी जब प्रक्रिया के रुप में आती है तो वह मानवीय भावों-सरोकारों से जोड़ती है,स्मृति में स्पेस पैदा करती है।देश से जोड़ती है। इवेंट में ये संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। त्रासदी केन्द्रित होने के कारण समूची फिल्म में दर्शकों की सहानुभूति पीड़ितों के साथ है। वे इस प्रक्रिया में राजनीतिक पूर्वाग्रहों में बहते नहीं हैं,बल्कि फिल्म के अनेक अंश ऐसे हैं जो दर्शक को कश्मीर संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचने में मदद करते हैं। यह सच है कि कश्मीर में आतंकी हमलों और सेना की ज्यादती के कारण हजारों औरतें विधवा हुई हैं,हजारों बच्चे अनाथ हुए हैं,उनके कष्टों-पीडाओं को हमलोग बहुत कम जानते हैं। कश्मीर भारत का अंग है और कश्मीर में घट रही हिंसा से इस देश को सकारात्मक तौर पर परिचित कराने में ''हैदर'' जैसी अनेक फिल्मों की जरुरत है।

''हैदर'' फिल्म की खूबी है कि इसमें आतंकी त्रासदी को महज भावुक नहीं रहने दिया। त्रासदी में विवेक पर बल देकर फिल्ममेकर ने त्रासदी को भावुकता से अलग कर दिया। त्रासदी की इमेजों का हम जब भी आस्वाद लेते हैं अभिनेता बार-बार अपने एक्शन से विवेकपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पात्र लोकतांत्रिक ढ़ंग से खुला है,वह कोई काम पर्दे के पीछे से नहीं करता,फिल्ममेकर दर्शक को कयास लगाने का मौका ही नहीं देता। सब कुछ दर्शक के सामने होता है। प्यार,चुम्बन,शैतानियां,मुखबरी,पक्षधरता आदि सबको सीधे दर्शकों के सामने खोलकर रखा गया है इसके चलते इस फिल्म में अंतराल में या प्रच्छन्न ढ़ंग से भावों को मेनीपुलेट करने की कोई संभावना नहीं है।

कश्मीर की त्रासदी ऐतिहासिक पीड़ा है। इसे नकली तर्कों के आधार पर न तो समझा जा सकता है और न पेश किया जा सकता है। यह सामान्य त्रासदी नहीं है। फिल्ममेकर ने इस ऐतिहासिक त्रासदी को फिल्म सौंदर्य के जरिए उदघाटित किया है। यहां कलात्मक-सौंदर्यात्मक भाषा का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस भाषा के जरिए दर्शक के आस्वाद को फिल्ममेकर कॉमनसेंस या स्टीरियोटाइप के धरातल से ऊपर उठाकर ले जाता है। कश्मीर की समस्या को कश्मीरियत की त्रासदी के रुप में चित्रित करना स्वयं में मुश्किल काम है। कश्मीरियत को तो हमारा मीडिया और जनमानस एकसिरे से भूल चुका है,ऐसे में फिल्ममेकर एक काम यह करता है कि वह कश्मीरियत को अस्मिता का आधार बनाता है,वह कश्मीर की समस्या को हिन्दू-मुसलिम समस्या या धर्म के आधार बने भारत-पाक विभाजन का निषेध भी करता है। कश्मीर की त्रासदी को चित्रित करने का मकसद भविष्य में होने वाली त्रासदी को रोकना है। फिल्ममेकर संदेश देता है कि मानवाधिकार सबसे मूल्यवान हैं और उनके हनन का अर्थ है अनिवार्यतःत्रासदी।

यह फिल्म कश्मीर के नकली-विशेषज्ञों की भी प्रकारान्तर से पोल खोलती है। कश्मीर के मसले पर ज्योंही बातें होती हैं हमारे बीच में अचानक नकली कश्मीर विशेषज्ञ आ जा जाते हैं और कश्मीर पर वे नकली तर्कजाल से सारा माहौल घेर लेते हैं। इस तर्कजाल को वे तथ्य के नाम पर घेरना आरंभ करते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति में सत्य-तथ्य दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और इन दोनों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सर्जनात्मक संवेदनाएं। सर्जनात्मक संवेदनाओं के जरिए ''हैदर'' में कश्मीरियों की देशभक्ति पुख्ता रुप में सामने आई है। साथ ही कश्मीरी नागरिक की अनुभूतियां ,आकांक्षाएं और त्रासदी भी सामने आई है। यह फिल्म संदेश देती है कि यह अस्मिता की त्रासदी का दौर भी है। कलात्मक त्रासदी को महसूस करने की चीज है और यह काम फिल्म ने बड़ी सफलता के साथ किया है।



''हैदर'' फिल्म में कश्मीरियत को धर्मनिरपेक्ष शांतिमय संस्कृति के रुप में पेश किया गया है। साथ त्रासदी के प्रति आलोचनात्मक नजरिए को सम्प्रेषित करने में फिल्ममेकर सफल रहा है। कश्मीर की त्रासदी अन्य के बहाने से पेश नहीं की गयी है बल्कि सीधे पेश की गयी है। फिल्म में अतीत में लौटनेवाले क्षण बहुत कम हैं। सारी फिल्म सीधे वर्तमानकाल में चलती है और भविष्य की ओर सोचने के लिए मजबूर करती है । अस्मिता के कई आयाम हैं मसलन्, प्रतिस्पर्धा,हिंसा,बदला,बदलाव,राष्ट्रीयता,आतंकवाद आदि इनमें से ''हैदर' का जोर राष्ट्रीयता ,बदलाव और शांति पर है।

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

धर्म आनंद और आराम की जुगलबंदी

         धर्ममंदिरों और संतों के आश्रमों का धार्मिकता से बुनियादी सम्बन्ध खत्म हो गया है। खासकर आजादी के बाद के वर्षों में धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र अब आनंद –आराम केन्द्र बन गए हैं। धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र आजादी के पहले धार्मिकता के प्रचार के केन्द्र हुआ करते थे लेकिन इन दिनों यह फिनोमिना बदल गया है। देशी पूंजीवाद के विकास और पूंजीसुख के बढ़ते संसार ने जीवनशैली को रुपान्तरित किया है,इसका धर्म पर भी असर पड़ा है। धर्म-संत केन्द्रों का सारे देश में नियोजित उद्योग की तरह विकास हुआ है। अब इन केन्द्रों पर आनंद-आराम –जीवनशैली और स्वास्थ्य का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है।
     स्वातंत्र्योत्तर दौर में पैदा हुए धर्म-संत समाज ने मासकल्चर के साथ अपना सम्बन्ध विकसित किया है।इनके यहां धर्म के मासकल्चर रुपों पर खासतौर पर जोर है। पहले धर्म को साधना के रुप में देखा जाता था,लेकिन मासकल्चर के साथ सम्बन्ध बनाने के कारण अब यही धर्म-संतकेन्द्र 'उपभोग' पर जोर देते हैं। इस तरह वे पूंजीवादी बाजार का विस्तार और विकास भी करते हैं। पूजा-पाठ-उपासना आदि इनमें गौण है और आनंद-आराम प्रमुख चीज है। स्वामीनारायण मंदिर से लेकर श्रीश्रीरविशंकर तक,रजनीश से लेकर महर्षि महेश योगी तक हजारों संत हैं, और उनके हजारों नेटवर्क हैं, जो आनंद-आराम के नेटवर्क के तौर पर काम कर रहे हैं। इस समूचे जगत को आनंद-आराम उद्योग कहना समीचीन होगा। इन संत-धर्मस्थलों का प्रमुख लक्ष्य है आगंतुकों के खालीसमय को आनंद से भरना और आराम की अनुभूति देना। इनके केन्द्रों में जीवनशैली प्रबन्धन कला भी सिखायी जाती है।

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

गऊमांस का सवाल और चरक संहिता


फेसबुक पर सक्रिय ''हिन्दू परंपरा ज्ञानी''मित्रों के लिए हम सुश्रुत रचित चरक संहिता से एक कहानी दे रहे हैं और यह कहानी बहुत कुछ कहती है।कहानी इस प्रकार है-
     
चरक संहिता में अतिसार यानी दस्त की बीमारी के प्रसंग में यह कहानी आई है- (अतिसार विषयक अग्निवेश की जिज्ञासा का उत्तर देते हुए भगवान पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि हे अग्निवेश! सुनोः) आदिकाल में यज्ञों में पशु समालभनीय(यज्ञ में पशु आमंत्रित और पूजित करके छोड़ दिए जाते थे) होते थे किंतु यज्ञ में पशुओं का वध नहीं किया जाता था।इसके बाद दक्ष प्रजापति के बाद के समय में मनु के पुत्रों ने यज्ञों में पशुओं की हत्या करने की प्रथा शुरु की तथा पशुओं को आमंत्रित कर वधकिया जाने लगा ।पशुओं के वध की यह क्रिया वेदाज्ञा के अनुसार ही होती थी।इसके बाद के समय में राजा पृषध्र ने एक बहुत दिन चलने वाले यज्ञ का समारंभ किया। यज्ञ में निरंतर अन्य पशुओं का वध होता रहा।जब यज्ञ में बहुत अधिक पशुओं की हत्या हो जाने के कारण पशु नहीं मिलने लगे तो गौओं का वध आरंभ किया। यह देखकर जगत के प्राणी मात्र अत्यंत दुखी हुए।जब इन वध की गई गौओं का मांस खाया गया तो लोगों को अतिसार यानी दस्त की बीमारी हो गयी ।

सुश्रुत की चरक -संहिता में आहार के रुप में खाए जाने वाले पशु-पक्षियों की एक वर्गीकृत सूची दी गयी है और इसमें शामिल पशु-पक्षियों के आहार को स्वास्थ्यप्रद बताया गया है उस सूची में गौ मांस भी शामिल है। संदर्भ से यह भी पता चलता है कि हमारे आज के शिक्षित मध्ययवर्ग के फेसबुक भगवा बटुकों से सुश्रुत ज्यादा समझदार विद्वान थे। चरक संहिता में वर्णित गौ मांस सेवन के दो रुप हैं एक है आहार के रुप में और दूसरा है औषधि के रुप में।

चरक-संहिता के 'सूत्र स्थान' के सत्ताइसवें अध्याय में प्रसह पशु-पक्षी गण की सूची दी गयी है इस सूची में गाय भी शामिल है।जो प्राणी अपने भोजन को दूसरों से जबर्दस्ती छीनकर या फाड़कर खाते हैं उन्हें प्रसह-गण पशु-पक्षी की संज्ञा दी गयी है। ये हैं- गाय,गधा,ऊंट,घोड़ा,चीता,सिंह,भालू,बंदर,भेड़िया,बाघ,लकड़बग्घा,बिल्ली,कुत्ता,कौवा,बाज,गिद्ध आदि। इसके अलावा अन्यवर्ग के पशु-पक्षियों का भी उल्लेख है।ये हैं बिल में रहने वाले-तेरह जीव,दलदल में रहने वाले9जीव,जल में निवास करने वाले 10जीव,जल में चलने वाले 29जीव, इसके अलावा 17 जांगल पशु ,चोंच या पैर से कुरेदकर खाने वाले 19जीव ,इसके अलावा जो जीव चोंच या पैर से आघात करके आहार खाते हैं उनकी संख्या 30 बतायी गयी है। कुल मिलाकर आठ वर्गों में 156 पशु-पक्षियों की सूची सुश्रुत ने पेश की है जिनका मांस आहार के लिए उपयुक्त पाया गया है और इनमें से प्रत्येक के मास के बीमारी सम्बन्धी लाभों का भी जिक्र किया गया है। पोषक मांस आहार में गाय शामिल है।

चरक संहिता के अनुसार गौ मांस के विशिष्ट गुण क्या हैं ? आत्रेय के शब्दों में '' गौ मांस केवल वातजन्य रोगों में ,विषम ज्वर में,पीनस रोग में, सूखी खाँसी में,परिश्रमजन्य थकावट में,भस्मक रोग में और मांसक्षयजन्य रोगों में हितकारी होता है।'' इसके अलावा भी गौ मांस खाने अनेक फायदे चरक संहिता में गिनाए गए हैं। ये बातें लिखने का मकसद है हिन्दुत्ववादियों द्वारा किए जा रहे अनर्गल प्रचार का खण्डन करना। इस बात को रखने का मकसद गौमांस भक्षण को बढ़ावा देना नहीं है। हम यही चाहते हैं खान-पान के मामलों में न तो राजसत्ता और न राजनीतिक दल और न अन्य कोई हस्तक्षेप करे।खान-पान का मामला निजी मामला है और इस प्रसंग में स्वास्थ्यप्रद खान-पान को बढ़ावा देना चाहिए।



रविवार, 5 अक्तूबर 2014

आधुनिक गुलाम की हरकतें

      कलात्मक मीडिया पर्सुएशन कला आधुनिक दास समाज की कुंजी है। पहले गुलाम बनाए जाते थे अब गुलाम बने-बनाए मिलते हैं। पहले गुलामों पर मालिक का शारीरिक नियंत्रण होता था,इन दिनों गुलामों पर मालिक शारीरिक और मानसिक नियंत्रण रखते हैं। गुलाम भाव सबसे प्रियभाव है। यह ऐसा भाव है जिसका सामाजिक स्तर पर व्यापक उत्पादन और पुनर्रुत्पादन हो रहा है। नव्य- पूंजीवाद के मौजूदा दौर में मालिक का नौकर के शरीर और मन पर पूरा नियंत्रण रहता है। काम के घंटे अब आठ नहीं होते बल्कि 10,12,या 16 घंटे तक कर्मचारी से काम लिया जाता है। इस कर्मचारीवर्ग में एक बड़ा समूह ऐसे कर्मचारियों का है जिसकी नौकरी अस्थायी है ,जो ठेके पर काम करता है।जो चंचल मजदूर है। लेकिन गुलाम भाव में जीने वाले कर्मचारियों में एक बड़ा समूह उन लोगों का भी है जो पक्की नौकरी करते हैं , मोटी पगार पाते हैं। येन-केन प्रकारेण सत्ताधारी वर्ग से चिपके रहना इनके स्वभाव का अंग है। इस समूचे समुदाय में तानाशाही के प्रति स्वाभाविक रुझान है। यही वह वर्ग है जो जीवन में पोंगापंथ,अंधविश्वास और उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। इस वर्ग में परजीविता कूट-कूटकर भरी हुई है। खोखली बातें,खोखले जीवन मूल्य,खोखली राजनीति,खोखला कम्युनिकेशन इस वर्ग के मुख्य आदतें हैं।

इस वर्ग में गुलाम भाव के प्रति जबर्दस्त अपील है।यह बिना किसी दबाव के हमेशा सत्ताधारी वर्गों के दबाव और अनुकरण में रहता है। यह वर्ग विवेक से कम और मीडिया पर्सुएशन से ज्यादा प्रभावित होता है। मीडिया इस वर्ग का उस्ताद है और पर्सुएशनकला इसकी कमजोरी है। पर्सुएशन कला की महत्ता तब और नजर आती है जब किसी नए माल की बाजार में बिक्री सुनिश्चित करनी हो या किसी राजनीतिक प्रचार अभियान को सफल बनाना हो। इस पद्धति का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रभावशाली ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। 'स्वच्छ भारत अभियान' इसका आदर्श नमूना है। मसलन् एक शिक्षक-कर्मचारी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह नियत काम को नियत समय पर पूरा करे, लेकिन एक बड़ा अंश है जो परजीवी है और नियत समय पर काम न करने की मानसिकता में रहता है।यही निकम्मावर्ग है जिसको हांकने में नरेन्द्र मोदी को द्रविड़-प्राणायाम करना पड़ रहा है।यही वह वर्ग है जो समय पर दफ्तर नहीं जाता,समय पर कक्षाएं नहीं लेता,समय पर बाकी अकादमिक और गैर अकादमिक काम नहीं करता। यही वह वर्ग भी है जो मोदीभक्त भी है।इसमें ही बड़ी संख्या में मोदी के कर्मचारी मतदाता भी हैं,ये ही वे लोग हैं जिनको मोदी अपने मीडिया रुतबे से प्रभावित और सक्रिय कर रहे हैं।

आधुनिक गुलामभावबोध का दिलचस्प आलम यह है कि जो कर्मचारी कभी समय पर नहीं आता,अथवा जो विश्वविद्यालय शिक्षक कभी विभाग की मीटिंग में बार-बार बुलाने पर भी नहीं आता, समय पर कक्षाएं लेने नहीं आता, वह 'स्वच्छ भारत' अभियान के दिन नियत समय से काफी पहले विश्वविद्यालय प्रांगण में पहुँच गया और सफाई के फोटोशूट में शामिल होने के लिए बेताब नजर आ रहा था। इस पूरी समस्या के अनेक आयाम हैं लेकिन इसमें प्रमुख है परजीविता और गुलाम भावबोध। ये ही आधुनिक गुलाम की जीवनशैली की धुरी हैं। हम सोचें कि क्या शक्तिशाली देश का निर्माण गुलाम भावबोध से संभव है ? कोई भी देश अपने विवेक की शक्ति से महान बना है।गुलामी मानसिकता से महान नहीं बना है।

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

संघ प्रमुख के डीडी प्रसारण और मोदी के ट्वीट से उठे सवाल

         आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी सम्बोधन के दूरदर्शन से प्रसारण को लेकर काफी आलोचनाएं सामने आई हैं ,आलोचकों ने जो सवाल उठाए हैं वे सही हैं।लेकिन वे सभी प्रसारण को राजनीतिक पहलू से देख रहे हैं। समस्या प्रसारण की नहीं है समस्या दूरदर्शन की समाचार नीति या संहिता के उल्लंघन की है। समाचार संपादक ने समाचार संहिता का उल्लंघन करके अपराध किया है और उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।सवाल उठता है दूरदर्शन अब तक जो समाचार नीति अमल में लाता रहा है क्या वह बदल गयी ?यदि बदली है तो कब और उसमें क्या संशोधन लाए गए हैं ? दूरदर्शन के द्वारा जो समाचार नीति अमल में लायी जाती है उसमें साम्प्रदायिक-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के लाइव प्रसारण के लिए कोई स्थान नहीं है। यह निर्विवाद तथ्य है कि संघ का चरित्र साम्प्रदायिक है और इस पर संसद से लेकर सड़कों तक अधिकांश राजनीतिकदल एकमत हैं। संघ के विजयादशमी जलसे का इससेपहले मेरी जानकारी में दूरदर्शन से लाइव प्रसारण कभी नहीं हुआ है। जबकि यह संगठन 90 साल पुराना है। यदि दूरदर्शन ने साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के नेताओं के भाषणों के लाइव प्रसारण का फैसला ले ही लिया है तो इसके स्वाभाविक दुष्परिणामों के लिए देश को तैयार रहना होगा। संचार माध्यमो से इस तरह के प्रसारण सद्भाव और लोकतांत्रिक राजनीति का प्रसार नहीं करते अपितु समाजतोड़क संगठनों को वैधता प्रदान करते हैं।

टीवी चैनलों की खुली प्रतिस्पर्धा में इस तरह के नेताओं के प्रसारणों को रोकना संभव नहीं है। लेकिन सार्वजनिक प्रसारण सेवा होने के कारण दूरदर्शन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिकनेताओं के लाइव प्रसारण से बचे। ये संगठन चाहे कितना ही देशभक्ति का दावा करें या इनके नेता अच्छी बातें कहें,इनके प्रसारण से विभाजक मानसिकता को वैधता मिलती है और इस काम में दूरदर्शन ने शिरकत करके अपनी ही बनायी समाचार नीति का उल्लंघन किया है। इस मामले में सभी दलों के सांसदों को दूरदर्शन के महानिदेशक को सीधे आपत्ति पत्र भेजना चाहिए।
    दूरदर्शन कोई निजी उपक्रम नहीं है जिसका मनमाने ढ़ंग से इस्तेमाल किया जाय। दूरदर्शन की देश की जनता ,संसद और संविधान के प्रति जबावदेही है। दूसरी बात यह कि दूरदर्शन के प्रसारण को सत्ता बदल के साथ देखना सही नहीं है। महानिदेशक और समाचार संपादक की यह जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि समाचार नीति का वस्तुगत ढ़ंग से पालन हो। जो लोग सोनिया-राहुल आदि के प्रसारण के बारे में सवाल कर रहे हैं,वह एकदम गलत है। लोकतांत्रिक नेता के प्रसारण(चाहे वह किसी भी दल का हो) को दिखाने या न दिखाने का फैसला समाचार संपादक अपने विवेक से कर ही सकता है। लेकिन साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिक नेता के लाइव प्रसारण की उसे पेशेवर आजादी न तो नीति देती है और न परंपरा ही देती है। दूरदर्शन के समाचार संपादक ने सीधे समाचार नीति का उल्लंघन किया है और इसके लिए उसके फैसले की पहले जांच की जाय और तय किया जाय कि संघ प्रमुख के लाइव प्रसारण का फैसला किसने और क्यों लिया ? संघ को यदि सामाजिक संगठन मानकर फैसला लिया गया है तो अभी तक किसी सामाजिक संगठन के प्रसारण के बारे में पहल क्यों नहीं की गयी ? संघ को अदालतों से लेकर दर्जनों कमीशनों ने साम्प्रदायिक संगठन के रुप में चिह्नित किया है।यह भी खुलासा होना चाहिए कि क्या समाचार संपादक पर प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई दबाव रहा है ?प्रधानमंत्री मोदी ने समस्त परंपराएं तोड़कर संघ के इस कार्यक्रम के मौके पर अपना ट्वीट करके साफ कर दिया है कि वे भारत सरकार की संचारनीति को नहीं मानते और यह संविधान का अपमान भी है। मोदी को यह याद रखना होगा कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं और भारत संचारनीति के अनुपालन की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है यदि वे ही संचारनीति का उल्लंघन करेंगे तो फिर किसी अफसर या नागरिक से संचारनीति के उल्लंघन करने पर वे और उनके लगुए-भगुए आपत्ति नहीं कर सकते।मोदी ने ट्वीट करके साफ संदेश दिया है कि वे साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम रुख रखते हैं और इस तरह के संगठन अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं।मजेदार बात है कि टीवी चैनलों पर मोहन भागवत के प्रसारण की आलोचना हो रही है लेकिन मोदी के अलोकतांत्रिक ट्वीट पर बातें बंद हैं।यानी पीएम सही और दूरदर्शन गलत के फार्मूले के तहत प्रसारण जारी है ,जो कि गलत है।असल में मोदी और समाचार संपादक दोनों ही समाचार नीति के उल्लंघन के लिए सीधे जिम्मेदार हैं।

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

टीवी इवेंट के परे स्वच्छ भारत का सपना !


      प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान से किसी को मतभेद नहीं हो सकता। समस्या नीति और नज़रिए की है। इस अभियान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सारी सदइच्छाएं टीवी फ़ोटो कवरेज से आगे नहीं जा रही हैं । उनके इस मसले पर सभी भाषण और राजनीतिक आचरण में भी प्रदर्शनप्रियता ही प्रमुख है।
    स्वच्छता की समस्या सफ़ाई का नया सिस्टम बनाने, सफ़ाई के सिस्टम में लगे लोगों के हितों और माँगों पर ग़ौर करने से जुड़ी है। भारत में इससे मिलता जुलता अभियान कांग्रेस ने 'निर्मल भारत' के नाम से यूपीए सरकार के शासन में आरंभ किया था लेकिन वह फ़ाइलों में दबा रह गया। मोदी ने उसे इवेंट और स्टंट बना दिया है!
   सफ़ाई अभियान को टीवी फोटोशूट तक ले जाने में मोदी सफल रहे लेकिन 'स्वच्छता नीति 'की घोषणा नहीं कर पाए । इससे यह भी पता चलता है कि मोदी इस देश को किस तरह चलाना चाहते हैं ?  मोदी इवेंट और जलसे -मेले-ठेले की राजनीति के जरिए देश को चलाना चाहते हैं ,इनके लिए समय दे रहे हैं लेकिन कोई बनाने के लिए उनके पास कोई समय नहीं है। यदि सरकार के मंत्रियों के काम करने की गति देखें तो वहाँ पर भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती। यानी मंत्रालयों में भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती! वरना  स्वच्छता अभियान को लेकर नीति तो होनी चाहिए बिना नीति के देश कैसे चलेगा ? राज्यों और नगरपालिकाओं को कैसे भागीदार बनाया जाएगा ? स्वच्छता अभियान में केन्द्र और राज्य कितना पैसा निवेश करेंगे ? सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं और रिक्त पदों का समाधान किस तरह किया जाएगा ?नई जरुरतों के मुताबिक़ कितने लाख नए पद सृजित किए जाएँगे ? 
     सफ़ाई की समस्या एकदिन की समस्या नहीं है । यह दैनंदिन समस्या है और इसके लिए मुस्तैद सिस्टम चाहिए। ऐसा सिस्टम चाहिए जो वैज्ञानिक तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल करे। सफ़ाई का मोदी का नज़रिया हिन्दू -कारपोरेट नजरिया है। हिन्दू के लिए सफ़ाई  दीपावली की सफ़ाई योजना है जो घर, मंदिर, दुकान से बाहर नहीं निकलती।मोदी इसे कचडा परिशोधन परियोजना तक लेजाएँगे। 
      जबकि भारत में सफ़ाई कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग है जो आज भी अस्पृश्यता का शिकार है और दशकों से वे अपनी समस्याओं के लिए विभिन्न राज्य सरकारों और ज़िला प्रशासन के सामने अपनी माँगे रखते आए हैं ,आश्चर्य की बात है मोदी ने इन सफ़ाई कर्मचारियों और अछूत समस्या पर एक भी वाक्य नहीं बोला। सफ़ाई कर्मचारियों की बदहाल ज़िंदगी और भयावह गंदगी से भरे उनके रिहायशी इलाक़ों को दरकिनार करके मोदी सरकार प्रच्छन्न ढंग से बहुसंख्यकवाद के राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में आगे बढ रही है। वरना मोदी को दलितों की बस्ती में जाकर सफ़ाई अभियान को केन्द्रित होकर चलाना चाहिए मोदी दलित मलिन बस्ती में न जाकर बाल्मीकिरामायण मंदिर गए जो हमेशा साफ़ रहता है। महात्मा गांधी ने स्वच्छता अभियान को सामाजिक सुधार कार्यक्रम के रुप में चलायाथा और सफ़ाई, दलितमुक्ति और अस्पृश्यता निवारण को लक्ष्य बनाया। गांधी के लिए स्वच्छता का मतलब इवेंट नहीं था वे स्वच्छता को समाजसुधार के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते थे। सफ़ाई उनके लिए नैतिक या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं थी। जबकि मोदी के लिए स्वच्छता के सामाजिक आधार का कोई मूल्य नहीं है। 
अस्वच्छता हमारे समाज के जातिप्रथा के कलंकित अध्याय से जुडी है। यही वजह है कि तमाम वैभव और संसाधनों के बावजूद धार्मिक शहर सबसे गंदे रहे हैं। हमारे समाज में आज़ादी के बाद जातिप्रथा बढी हैं ख़ासकर दलित जातियों पर ज़ुल्म बढे हैं ।हमने कभी ईमानदारी और सतत निगरानी के साथ दलितों और सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं पर संसद में समग्रता में चर्चा नहीं की है।
    केन्द्र -राज्य सरकारोंके लिए दलित ,वोटबैंक से ज़्यादा महत्व नहीं रखते और हमेशा किश्तों या टुकड़ों में दलितों की समस्याओं पर संसद में तदर्थभाव से चर्चा हुई है।  हम चाहते हैं दलितों के प्रति तदर्थभाव ख़त्म हो और समग्रता में राष्ट्रीय एकता परिषद में खुलकर केन्द्र -राज्य मिलकर बातें करके स्वच्छता नीति बनाएँ और इसके लिए दलितों के सभी रंगत के संगठनों को भीबुलाकर सुझाव लिए जाएँ और उनकी राय को राष्ट्रीय एकता परिषद गंभीरता से सुने ।
            नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तुलना में अरविंद केजरीवाल का नजरिया ज़्यादा सही लगता है।मसलन् मोदी गए बाल्मीकि मंदिर जबकि केजरीवाल ने नाले की सफ़ाई में भाग लिया और दलित परिवार के घर जाकर खाना खाया।
   सफाई की समस्या हमारे हिन्दू संस्कारों और आदतों से मुक्ति से जुडी है। हम जब तक हिन्दू आदतों के शिकार रहेंगे समाज में अस्वच्छता रहेगी।सामाजिक अस्वच्छता का सम्बन्ध मन और मूल्यों की स्वच्छता से है। हमें देखना होगा मोदी जी स्वयं और उनके मंत्री-सांसद-विधायक कितनी जल्दी हिन्दूमन की आंतरिक सफाई करते हैं!
      समाज हमारे मन का आईना है यह कचडा साफ़ करने की समस्या मात्र नहीं है ,यह गंदगी फैलाने पर जुर्माने ठोक देने से सुलझनेवाली समस्या नहीं है।
   हमारे देश ने यूरोप से कपड़े लिए, शिक्षा ली,रहन-सहन लिया, बाथरुम लिया लेकिन हिन्दूमन नहीं बदला !जीवनशैली नहीं ली। यही वह प्रस्थान बिन्दु है जिस पर प्रहार करने की ज़रुरत है। हिन्दूमन की गंदगियों और जीवनशैली को निशाना बनाए बग़ैर स्वच्छता अभियान सफल नहीं होगा ।  सफ़ाई का सम्बन्ध आदतों से हैं और आदतें हिन्दूजीवनशैली से जुड़ी हैं और इनका समाज के ऊपर व्यापक असर है।हिन्दूजीवनशैली को मोदी सरकार को निशाना बनाना होगा। यह काम जब तक नहीं होता स्वच्छ भारत टीवी इवेंट से आगे नहीं जा पाएगा।