सोमवार, 26 नवंबर 2012

ममता के हस्तक्षेप के इंतजार में 35 बंगाली मजदूर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कल तक उनको किसी भी बंगाली पर हमला होने,उसकी अवैध गिरफ्तारी पर गुस्सा आता था लेकिन इनदिनों वे बदली हुई सी लग रही हैं। ममता का बंगाली जाति के प्रति प्रेम निर्विवाद है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बंगाली जाति के प्रति बेरुखी बढ़ी है। उनकी बेरुखी की जड़ें हमारी राजनीतिक संस्कृति में हैं। भारत में इनदिनों जिस तरह की वोटबैंक संस्कृति पैदा हुई है उसमें आम जनता के प्रति बेगानापन और जातीय घृणा का बढ़ना स्वाभाविक बात है। 

वोटबैंक संस्कृति दलीय मोह पैदा करती है।भाषायी,धार्मिक और जातिवादी घृणा के जरिए अपना विस्तार करती है। यह राजनीति में नकारात्मक फिनोमिना है। इसके कारण सामाजिक विभाजन तेज होता है। मन में दरारें पैदा होती हैं। प्रशासनिक संरचनाएं इसकी गिरफ्त में जल्दी आती हैं। साथ ही वंचितों और हाशिए के लोगों से प्रशासन की दूरी बढ़ती है। अनुयायियों के प्रति प्रेम में इजाफा होता है। इसके अलावा अविश्वास और संशय में तेजी से वृद्धि होती है। उत्तर- पूर्व के राज्यों में यह बीमारी पहले आई बाद में इसने अन्य राज्यों में पैर पसारने आरंभ कर दिए । हाल ही में महाराष्ट्र में यह फिनोमिना जोरों पर है। वहां पर गैर-मराठियों के प्रति विद्वेष की राजनीति को जिस तरह स्थानीय दलों ने हवा दी है उससे महाराष्ट्र का पुलिस प्रशासन पूरी तरह प्रभावित है । भारत में बोले जानेवाली भाषाओं और बोलियों के बाशिंदों के प्रति संदेह और घृणा का भाव अंततः भारत की एकता और अखण्डता को नष्ट करता है साथ ही इससे भारत के संविधान का अपमान होता है।

भारत का संविधान सभी भारतवासियों को चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों,देश में कहीं पर भी आने-जाने, व्यवसाय करने और काम करने की आजादी देता है। हमारे संविधान में भाषा,धर्म और जाति के आधार पर किए गए भेदभाव को दण्डनीय अपराध माना गया है। इसके बावजूद भारत में आए दिन भेदभाव और उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। ये खबरें किसी भी देशभक्त को परेशान कर सकती हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के मौजूदा शासकों को ये चीजें कम परेशान कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो ममता सरकार का बंगालियों के प्रति जो बेगानापन बढ़ रहा है वह समझ में आएगा। ममता सरकार का राज्य की आम जनता और उसकी समस्याओं के प्रति सजग भावबोध तेजी से क्षीण हुआ है। राज्य की आम जनता पर पुलिस के हमले बढ़े हैं,साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है।

सत्तारूढ़ होने के पहले तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और बंगाली जाति से जुड़े हर सवाल पर सक्रिय थीं लेकिन इन दिनों वे और उनके अनुयायी एकसिरे से बंगालियों पर बढ़ रहे हमलों पर चुप रहते हैं।

हाल ही में माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने एक महत्वपूर्ण मसले की ओर ध्यान खींचा है। महाराष्ट्र में 35बंगालियों को बंगला बोलने के कारण पुलिस ने बंगलादेशी का आरोप लगाकर गिरफ्तार करके कैद किया हुआ है। जबकि ये सभी मजदूर हैं और पुरूलिया के रहने वाले हैं। आश्चर्य की बात है कि माकपा सांसद के द्वारा इन बंगालियों की अवैध गिरफ्तारी का सवाल पहले उठाया गया और राज्य सरकार ने अभी तक इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा। ये लोग दो महिने से जेल में बंद हैं। ये सभी पुरूलिया जिले के बाशिंदे हैं। ये लोग काम की तलाश में महाराष्ट्र आए थे । 22 सितम्बर को इन सभी को मुंबई पुलिस के बांकुला थाना इलाके में बंगलादेशी कहकर गिरफ्तार कर लिया और तब से ये सभी जेलों में बंद हैं। माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने इस मसले पर 9 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र लिखकर जानकारी दी और उनसे फोन पर विस्तार से बातें करके हस्तक्षेप करने की अपील की । माकपा सांसद ने इस बीच महाराष्ट्र के गृहमंत्री से भी बात की है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप की अपील करते हुए उनको 31 अक्टूबर को एक पत्र लिखा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्तक्षेप का आश्वासन देते हुए वासुदेव आचार्य को 6 नवम्बर को पत्र लिखा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का कोई अभीप्सित परिणाम नहीं निकला है।

सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मसले में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? असल में ममता की विचारधारात्मक संरचना में पापुलिज्म पहले आता है। इस पापुलिज्म का दलतंत्र की मनोदशा से गहरा संबंध है। इसके अलावा ममता उनसभी विषयों को संदेह की नजर से देखती हैं जो समाधान की मांग करते हैं। ममता की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो समाधान की मांग नहीं करते। मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 35 बंगाली मजदूर अपनी रिहाई की मांग कर रहे हैं और उनकी रिहाई को दलीय स्वार्थ त्यागकर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में बंगाली मजदूरों की अवैध गिरफ्तारी के मसले को उठाने का फैसला किया है और हम उम्मीद करते हैं कि उनके प्रयासों से ये मजदूर तत्काल रिहा होंगे।

ममता का नया आनंदराग जमीन लो और कारखाना खोलो


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी राजनीति मूलतःआनंद, महोत्सव, मेले, ठेले आदि के तानेबाने में बुनी है। ममता की धारणा है आनंद है तो विकास है। आनंद का जितना व्यापक राजनीतिक उपभोग ममता सरकार ने पैदा किया है वैसा अन्य किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया। वे राजनीतिक तनावों को आनंद से धोना चाहती हैं।  9 नवम्बर को उद्योगपतियों के साथ बैठक-डिनर का आयोजन था और 10 को कोलकाता फिल्म महोत्सव का आरंभ होने जा रहा है। जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर हीरो शाहरूख खान आदि के उपस्थित रहने की संभावना है। 

ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग और संस्कृति उद्योग को चंगा करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे अपने नए बदले मिजाज में नजर आ रही हैं। वे तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। राज्य की राजनीति के स्वस्थ विकास के लिए यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री विकास के सवालों पर केन्द्रित करे। विकास के सवालों पर मुख्यमंत्री की सक्रियता आनंदमय वातावरण के जरिए दिखाई दे रही है। कुछ लोगों को इसमें असुविधा हो सकती है। लेकिन राज्य के राजनीतिक वामस्वर को मद्धिम करने के लिहाज से ममता का आनंदराग मददगार साबित हो सकता है। इससे स्थानीयस्तर पर अ-राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही राज्य सरकार विरोधी मीडिया उन्माद के सामाजिक प्रभाव को कम करने में भी मदद मिलेगी। 9 नवम्बर को उद्योगपतियों की बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आनंदराग की पूरी छाप देखने को मिली। वे स्वयं आनंद के मूड में थीं और नए बदले मिजाज में थीं। पहलीबार ऐसा हुआ कि ममता को विगतदिनों में घटित तनावपूर्ण घटनाओं से मुक्तभाव में देखा गया। ममता के बदले मिजाज से अनेक उद्योगपति अचम्भे में थे,वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार नए तेवर की ममता को कैसे समझें।

इस बैठक में मौजूद उद्योगपतियों के मन में ममता विरोधी मीडिया उन्माद का दबाव था इसके कारण वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे सवाल करने से कन्नी काट रहे थे। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य सरकार ने ठीक से मीडिया प्रबंधन नहीं किया है। राज्य में मीडिया का राज्य सरकार के प्रति आक्रामक रूख इस संदर्भ में एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हुआ है। मीडिया का राज्य की प्रत्येक घटना को उन्माद की हद तक ले जाकर प्रचारित-प्रसारित करना स्वयं में राज्य के विकास के लिए बड़ी समस्या है।उल्लेखनीय है विगत वाममोर्चा सरकार को भी इस मीडिया उन्माद का सामना करना पड़ा था और उसका राजनीतिक लाभ ममता को मिला था।

पश्चिम बंगाल के बारे में विचार करते समय यह बात सब समय ध्यान में रखी जानी चाहिए कि राज्य के खिलाफ मीडिया हमेशा से आक्रामक मूड में सक्रिय रहा है। मीडिया का आक्रामक रूख मीडिया को तो लाभ पहुँचाता है लेकिन राज्य के विकास में बाधाएं खड़ी करता है। विकासविरोधी और उद्योग विरोधी माहौल बनाने में स्थानीय मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। स्थानीय मीडिया की इस तरह की नकारात्मक भूमिका अन्य राज्यों में नजर नहीं आती। खासकर आनंदबाजार समूह की भूमिका इस संदर्भ में नकारात्मक रही है। राज्य के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी है कि मीडिया की राज्यविरोधी भूमिका के परे जाकर देखा जाय। इस प्रसंग में वामदलों ,कांग्रेस और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलकर काम करने की जरूरत है। राज्यविरोधी भूमिका निभाते हुए आनंदबाजार समूह की संपत्ति में इजाफा हुआ है। इसके अलावा राज्य का औद्योगिक और राजनीतिक वातावरण तनावपूर्ण बना है। अराजक राजनीतिक शक्तियों को इससे मदद मिली है। यही वो नया परिप्रेक्ष्य है जिसमें 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उद्योगपतियों तो सम्बोधित किया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा जो भी उद्योगपति राज्य में उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें राज्य सरकार के भूमि बैंक से सीधे जमीन मिल सकती है। जो अन्यत्र उद्योग लगाना चाहते हैं तो उनके प्रस्ताव पर विशेष तौर पर राज्य सरकार ध्यान देगी। प्रस्ताव के आधार पर भूमिबैंक के बाहर की जमीन के बारे में भी राज्य सरकार खरीद-फरोख्त में मदद कर सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं-दलालों को घूस देने से परहेज करें। मुख्यमंत्री का यह बयान राज्य के औद्योगिक विकास के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है और इससे उद्योगपतियों का मिजाज बदलेगा। अभी राज्य के पास भूमिबैंक में बड़े पैमाने पर जमीन पड़ी हुई है उस पर कोई बड़ा प्रकल्प नहीं बन पाया है। इसके अलावा जिनलोगों ने उद्योग के नाम पर वामशासन के जमाने में जमीन ली थी और अभी तक काम आरंभ नहीं किया उन सभी उद्योगपतियों को कल-कारखाने खोलने के लिए दबाव पैदा किया जाना चाहिए। पुरानी आवंटित जमीन में एक अच्छी-खासी मात्रा में ऐसी भी जमीन है जिस पर वर्षों से कोई काम आरंभ नहीं हुआ है,ऐसे लोगों से जमीन वापस लेने की प्रक्रिया आरंभ की जानी चाहिए।

राज्य के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी समस्या है स्थानीय राजनीतिक दादाओं का आतंक। इससे निबटने के लिए राज्य सरकार को खास प्रयास करने होंगे। साथ ही पुराने राजनीतिक सोच से बाहर निकलना होगा। पुराना राजनीतिक सोच पूंजीपति को वर्गशत्रु मानकर चलता है। ममता के वाम मित्रों ,खासकर माओवादियों और सांस्कृतिक मित्रों का भी यह मानना है कि पूंजीपति वर्गशत्रु हैं और उनसे ममता सरकार को दूर रहना चाहिए।

शुक्रवार के उद्योगपतियों के जमावड़े में टाटा स्टील प्रोसेसिंग एंड डिस्ट्रीब्यूसन कंपनी लिमिटेड के संदीपन चक्रवर्ती,आईटीसी के कुरूश ग्रांट ,पीयरलेस के एस.के.राय इसके अलावा उद्योगगपति हेमंत कनोरिया,एम.के.जालान ,दीपक जालान,अलका बांगुर, उज्जवल उपाध्याय,आदित्य अग्रवाल, संजीव गोयनका,संजीव गोयनका ,हर्ष नेवटिया आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा एस्सोचैम,फिक्की,बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स,सीआईआई,कलकत्ता चैम्बर ऑफ कॉमर्स आदि संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में भाग लिया। कई उद्योगपतियों से जब इस बैठक के बारे में बातें हुईं तो उनका मानना था कि ममता ने यदि स्थानीय दादाओं के आतंक और धन वसूली को नियंत्रित कर लिया तो इससे औद्योगिक वातावरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इस बैठक की खास बात यह थी कि इसमें उद्योगपतियों के पास मुख्यमंत्री से पूछने के लिए सवाल नहीं थे। उद्योगपतियों ने मुख्यमंत्री से सवाल न करके यह संदेश दिया है कि वे ममता सरकार के काम से मौटे तौर पर संतुष्ट हैं। लेकिन मीडिया में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सवाल पूछने से ममता नाराज हो सकती थीं इसलिए सवाल नहीं किए गए।








रविवार, 25 नवंबर 2012

मुस्लिम वोटबैंक की घेराबंदी में जुटी माकपा और ममता


    
      पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए माकपा और ममता दोनों ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। धार्मिकनेताओं को बहला-फुसलाकर मतदाताओं को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यहां 30 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। दूसरी ओर ममता ने राज्य सरकार की ओर से मौलवियों को सरकारी भत्ते की घोषणा करके मुस्लिम मतदाताओं को महत्वपूर्ण बना दिया है और साथ ही यह भी संदेश दिया है आगामी चुनावों में मौलवियों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। माकपा इस सबसे बेहद परेशान है। असल में ममता ने चंद वर्षों में ही मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पुख्ता पकड़ बनाकर माकपा के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है।

उल्लेखनीय है ममता को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में वामदलों को मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफलता नहीं मिली।जबकि वहां पर तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा था। पिछले दिनों माकपा महासचिव प्रकाश कारात ने यह चिन्ता व्यक्त की कि पश्चिम बंगाल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म सिर उठा रहा है और राज्य की भावी राजनीति के लिए यह अशुभ संकेत है।

तृणमूल कांग्रेस की समूची रणनीति की धुरी ये मुस्लिम वोट हैं। इन वोटों को बचाए रखने के लिए तृणमूल काग्रेस ने अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जो हमारे धर्मनिरपेक्ष शासन की राजनीति के साँचे में फिट नहीं बैठते। मसलन् मस्जिद के मौलवियों को सरकारी भत्ते की स्कीन को लागू करके तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों के दिल जीतना चाहती है और इस काम में उसे एक हद तक सफलता भी मिली है।

दूसरी ओर माकपा ने अपने कद्दावरनेता अब्दुल रज्जाक मुल्ला को इस काम में लगाया है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला को कुछ दिन पहले यह इल्हाम हुआ कि वे मुसलमान हैं और उनको हज जाना चाहिए। वे हज गए और लौट भी आए हैं और उनकी हज यात्रा के बाद सामान्यतौर पर धार्मिक हलकों में उनका सम्मान-सत्कार भी हो रहा है। एक नागरिक के नाते वे हज जा सकते हैं। लेकिन वे इसका प्रचार क्यों कर रहे हैं ? वे नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन वे इसका मीडिया में प्रचार क्यों कर रहे हैं ? एक राजनेता का धार्मिक प्रचार राजनीति में अनुदार ताकतों की मदद करता है।

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म को मानने और न मानने के लिए स्वतंत्र है। धर्म एक निजी मसला है। लेकिन जब व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्थाओं को सार्वजनिक करता है और उनका प्रचार करता है तो वह धर्म के नाम पर राजनीति करता है। धर्म के नाम पर राजनीति करने से धर्म में अनुदार तत्वों की ताकत बढ़ती है। राजनीति में धार्मिक अनुदारवाद को बल मिलता है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला के द्वारा अभी तक अपनी हज यात्रा और उसके बाद के धार्मिक कदमों को मीडिया में प्रचारित करने से वाम राजनीति को कम धार्मिक अनुदार राजनीति को ज्यादा बल मिला है।

सवाल यह है कि अब्दुल रज्जाक मुल्ला तपे-तपाए कम्युनिस्टनेता हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के इस दौर में अचानक धार्मिक पहचान का इल्हाम क्यों हुआ ? वे बार बार अपने को मुस्लिम के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं ? एक कम्युनिस्ट के लिए धर्म निजी कार्य-व्यापार है। लेकिन मुल्ला ने अपनी धार्मिक पहचान और धार्मिक कार्यकलापों का मीडिया में प्रचार करके धर्म को राजनीति से जोड़ा है जो गलत है और वाम राजनीति के उसूलों के खिलाफ है। इसके बावजूद माकपा ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया है।

धार्मिक अनुदार राजनीति कैंसर है। यह अस्मिता की राजनीति का हिस्सा है। अस्मिता की राजनीति यदि अस्मिता में बांधे रखे और अस्मिता से आगे लेजाकर सामाजिक मुक्ति में रूपान्तरित न करे तो पलटकर सामाजिक विभाजन का काम करती है। यह सभी रंगत के धर्मनिरपेक्ष और उदार विचारों का निषेध है। यह धार्मिक फंडामेंटलिज्म है।

पश्चिम बंगाल में धार्मिक अनुदार राजनीति को अभी तक पर्दे के पीछे काम करते देखा गया था। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी से बदलाव आया है और इस तरह की राजनीति को चुनाव के मैदान में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए देखा गया है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में धार्मिक अनुदार राजनीति को तकरीबन 10 फीसदी वोट मिले हैं और इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही रंगत के संगठन शामिल हैं। इतने वोट धार्मिक फंडामेंटलिस्ट संगठनों को हाल-फिलहाल के वर्षों में कभी नहीं मिले।

असल में राज्य में बढ़ रहे धार्मिक फंडामेंटलिज्म को नष्ट करने की जिम्मेदारी सभीदलों की है। इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों को साझामंच बनाकर काम करना चाहिए। खासकर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिम्मेदारी ज्यादा है कि वे धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया पर नजर रखें और इस तरह के नीतिगत कदम उठाएं जिनसे धार्मिक फंडामेंटलिज्म कमजोर हो।

धार्मिक अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के लिए धर्म और धार्मिकतंत्र की मदद नहीं ली जाय। इसके विपरीत विकासमूलक योजनाओं के बहाने अल्पसंख्यकों को मैनस्ट्रीम राजनीति के अंदर सक्रिय किया जाय।


बुधवार, 21 नवंबर 2012

फेसबुक और लंपटगिरी

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कुंठा और छद्म में जीनेवाला व्यक्ति बेहद कमजोर और आत्मपीड़क होता है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फेसबुक लंपट किसी भी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करके या उससे गंदी बातें कहकर स्त्री का तो अपमान करते हैं साथ ही आत्मपीड़ा से भी गुजरते हैं। ऐसे आत्मपीडकों के लिए इंटरनेट विष की तरह है।



-2-

फेसबुक लंपट की विशेषता है कि वह छद्म में जीता है, छद्मभाषा लिखता है,पहचान छिपाता है।

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फेसबुक पर लड़कियों के साथ बदसलूकी और लंपटगिरी करने वाले लोग वस्तुतः बीमार मन के कुण्ठित लोग हैं। स्त्री के साथ अपमान या हेय या उसे कम करके देखने वाली भाषा वस्तुतःकुण्ठा की उपज है। इन लोगों को किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए और फेसबुक -चैटिंग से दूर रहना चाहिए।

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फेसबुक लंपटों में एक लक्षण यह भी देखा गया है कि जो लड़की मित्रता के प्रस्ताव का जबाव नहीं देती तो उसके मैसेज बॉक्स को अश्लील तस्वीरों, गालियों और सेक्सुअल भाषा से भर देते हैं । ऐसे लंपटों के नामों को लड़कियों को फेसबुक पर वॉल पर दे देना चाहिए।

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फेसबुक लंपटों से कहना है कि कामुकता को स्त्री में न खोजें ,कामुकता का श्रेष्ठ कलारूपों में आनंद लें।

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फेसबुक लंपटों की इश्कमिजाजी का आलम यह है कि यदि कोई लड़की उनसे चैटिंग में बात नहीं करती तो वे फिर उसकी पोस्ट को लाइक तक नहीं करते,इसके पहले वे खूब लाइक करते थे।

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फेसबुक लंपटों का आलम यह है कि वे किसी लड़की की वॉल पर प्रेम की अभिव्यक्ति या उन्मुक्त अभिव्यक्ति की पंक्तियां देखते ही बिछ जाते हैं और उस लड़की को तत्काल मैसेज देने शुरू कर देते हैं ,गोया भारतीय लड़कियों को अपने को उन्मुक्त होकर व्यक्त करने का हक ही न हो। इन लंपटों की नजर में इसके बाद वो लड़की अच्छी लड़की नहीं रह जाती,वह उपभोग की लड़की हो जाती है। बाबा नागार्जुन के शब्दों में मुझे घिन आती है ऐसी मानसिकता पर।

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फेसबुक लंपट की फेसबुक या चैटिंग में लंपटगिरी असल में आत्मालाप है।

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फेसबुक लंपट बेहद डरपोक होता है। वह गलती करता है और फिर दुम दबाकर भागता है।

सोमवार, 19 नवंबर 2012

बाल ठाकरे और फेसबुक पर उठे सवाल

-1- 

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे!

अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !

सबने हां की, कौन ना करे !

छिप जान, मत तू उधर ताक रे!

शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे!

मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे!

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातंत्र के काल ठाकरे!

धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे!

चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

-----नागार्जुन (जनयुग, 7 जून 1970)



-2-

उद्धव ठाकरे को टीवी वालों ने जिस तरह हिन्दूरीति से अपने पिता का अंतिम संस्कार करते हुए लाइव प्रसारित किया है उससे टीवी प्रसारण की आचार संहिता के प्रचलित मानकों का सीधे उल्लंघन हुआ है।

उल्लेखनीय है रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी द्वारा हिन्दूरीति से किए गए अंतिम संस्कार के अविकल प्रसारण पर आपत्ति व्यक्त की थी।

उस प्रसारण को दूरदर्शन ने आधा घंटे तक सीधे दिखाया था और उसका सीधा असर सिखों के खिलाफ घृणा के रूप में सामने आया था। इस तथ्य की ओर रंगनाथ मिश्रा कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

हम मांग करते हैं कि अंतिम संस्कार के लाइव प्रसारण के खिलाफ निजी चैनल अपनी आत्मालोचना करें और भविष्य में इस तरह के प्रसारण से बचें। सब जानते हैं कि बाल ठाकरे सारी जिंदगी घृणा की राजनीति करते रहे हैं, कभी किसी के खिलाफ कभी किसी के खिलाफ। घृणा के नायक का महिमामंडन बेहद खतरनाक है और यह टीवी चैनलों की स्तरहीनता और नीतिहीनता की अभिव्यक्ति है।

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कल शिवाजी मैदान में जिस तरह बाल ठाकरे का अंतिम संस्कार किया गया उसने कई सवाल खड़े किए हैं। मैं नहीं जानता कि शिवाजी पार्क के अहाते में क्या कोई श्मशान है ? और यदि है तो कोई फेसबुक मित्र बताए,हमें शिवाजी मैदान के भूगोल का कोई ज्ञान नहीं है।

सवाल यह है कि शिवाजी मैदान को अंतिम संस्कार करने के लिए चिता बनाने की अनुमति देना क्या ठीक है ? हमारी सामान्य बुद्धि कहती है कि मैदान का श्मशान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह कि बालठाकरे कभी किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे, ऐसी स्थिति में भी क्या राजकीय सम्मान के साथ पुलिस की सलामी दी जा सकती है ?

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जो नेता जिंदगीभर भारतीय राजसत्ता को तरह तरह से कोसते रहते हैं , नए रंग का झंडा फहराते रहते हैं ,वे अंत में राजसत्ता के तिरंगे में ही लिपटकर स्वर्ग जाना चाहते हैं । यह सीधे सत्ता के सामने समर्पण है ।

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बाल ठाकरे ने साठ के दशक में अस्मिता की राजनीति की शुरूआत की और सारी ज़िंदगी उसके लिए लड़ते रहे।
अस्मिता की जंग में उन्होंने मराठी पहचान के सवाल को आक्रामक तेवर के साथ उठाया और इस क्रम में वाम और उदार राजनीति पर हमले किए। उन्होंने मराठी अस्मिता पर पहले काम किया बाद में 1992 में हिन्दू पहचान के सवालों को प्रमुखता के साथ उठाया । 

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उल्लेखनीय है साठ का दशक सारे देश में अस्मिता की राजनीति के उभार का दौर है ।

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नए दौर में फिर से 'हिन्दू हृदय सम्राट 'की खोज आरंभ हो गई है, बाल ठाकरे की मौत से यह जगह खाली हुई है । वैसे भी बाल ठाकरे स्वनियुक्त' हिन्दू हृदय सम्राट 'थे ।

इस काम में कारपोरेट हिन्दू मीडिया अभी से सक्रिय हो गया है। ठाकरे की मौत के बाद का टीवी कवरेज असल में उसी प्रयास का हिस्सा है।

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बालठाकरे की विरासत के वारिस की जंग आरंभ हो गई है ।

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बालठाकरे को महाराष्ट्र के किसानों में वैसी जनप्रियता नहीं मिली जैसी उनको मुंबई में मिली । यह इस बात का संकेत है कि वे मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के जनप्रिय नेता थे ।

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शवयात्रा में शामिल होने का अर्थ संबंधित व्यक्ति के विचारों से सहमत ह़ोना नहीं है।

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बाल ठाकरे ने समानान्तर सत्ताकेन्द्र के रूप में मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में जिस तरह अपने को विकसित किया उसने उनके इर्दगिर्द बड़े पैमाने  पर दादा राजनीति को नई बुलंदी दी।उन्होंने निजी बातचीत में उदार और राजनीति में कट्टरतावादी व्यक्तित्व का प्रदर्शन किया। यह एक तरह से सर्वसत्तावादी भारतीय मन है जिसको श्यामाप्रसाद मुखर्जी-अटलजी आदि से प्रेरणा लेकर गढ़ा गया।

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बालठाकरे का व्यापक टीवी कवरेज कम से कम ठाकरे भक्तजनता के भावों का शमन करने में मदद कर रहा है। इसी अर्थ में टीवी भावों के नियंत्रण और नियमन में मदद करता है । राजकीय सम्मान और नेशनल कवरेज के साथ विदाई अंततः एक संस्कार है ।

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बाल ठाकरे ने लोकल राजनीति के साथ अंधक्षेत्रीयतावाद और भावुकता को जोड़कर मराठी अस्मिता को प्रधान मुद्दा बनाया ।

वे राष्ट्रवाद के नए युग के नायक थे। वे अपने पिता के गुणों से भिन्न गुणों को राजनीति में लेकर आए । महाराष्ट्र में वे निर्विवाद नायक थे।

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बाल ठाकरे ने अंधक्षेत्रीयतावाद का हिन्दू साम्प्रदायिकता में बड़े कौशल के साथ रूपान्तरण किया । बाल ठाकरे ने जो पैराडाइम शिफ्ट किया है उसका भविष्य अब इन दोनों से परे विकास की राजनीति में देख सकेंगे।

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शिवसेना के शेर बाल ठाकरे के निधन के साथ शिवसेना की साम्प्रदायिक राजनीति के प्रथम चरण का अवसान हो गया है। बाल ठाकरे की मौत के साथ आक्रामक राजनीति का मैनस्ट्रीम राजनीति से अंत हो गया ।

सोमवार, 5 नवंबर 2012

उद्योगपति सम्मेलन को लेकर ममता सरकार तनाव में


आगामी 9 नवम्बर को राज्य सरकार की ओर से उद्योगपतियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की देश के प्रसिद्ध उद्योगपतियों से सामूहिक मुलाकात होगी। उद्योगपतियों के सामने पिछले साल उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा किसी भी नए प्रकल्प पर राज्य में काम आरंभ नहीं हुआ है। राज्य प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाने की बजाय दलतंत्र के आधार पर चलाया जा रहा है इससे देश के उद्योगपति परेशान हैं। उद्योगपतियों में ममता सरकार के बंद विरोधी नजरिए को लेकर सकारात्मक भाव है लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार इससे आगे जाए और स्थानीय अशांति और राजनीतिक दादागिरी को नियंत्रित करे। कई उद्योगपतियों ने यह भी कहा कि ममता सरकार का बंद विरोधी रवैय्या असल में माकपा विरोध की राजनीति से जुड़ा है। इसके पीछे कोई पॉजिटिव सोच नहीं है। जिन उद्योगपतियों से इस बीच में हमारी बातचीत हुई उनमें से अधिकांश राजनीतिक मिलिटेंसी को लेकर बेहद चिन्तित हैं। इस बीच में कई उद्योगपतियों ने निजी तौर पर राज्यप्रशासन को अपनी भावनाओं से भी अवगत कराया है। 

उद्योग जगत को उम्मीद है 9 नवम्बर को ममता सरकार कोई लोकलुभावन पैकेज लेकर आए। उद्योगपतियों की कई मांगें हैं जिनको इस मौके पर उठाए जाने की संभावना है। उनकी पहली मांग है कि स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन राजनीतिक गुण्डई पर रोक लगाए और ममता सरकार इस समस्या के प्रति कड़े रूख का इजहार करे। उद्योग जगत की दूसरी मांग है स्थानीयनेताओं की हफ्ता वसूली को तुरंत रोका जाए। तीसरी मांग है राज्य प्रशासन प्रकल्प स्वीकृति की प्रक्रिया आसान और त्वरित बनाए और चौथी मांग है कि उद्योगधंधों के लिए जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के लिए ममता बनर्जी स्वयं दिलचस्पी लें।

उल्लेखनीय है पिछले साल ममता सरकार ने उद्योगपतियों से जब मुलाकात की थी तो राज्य में जीत का माहौल था, आम उद्योगपति उम्मीदें लगाए बैठे थे कि नई सरकार शांति स्थापित करने में मदद करेगी। लेकिन ऐसा करने में सरकार असफल रही है। कई बड़ी कंपनियां राज्य छोड़कर जाने का मन बना चुकी हैं और नई कंपनियां पूंजीनिवेश के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल ग्रहण कर ली है। उल्लेखनीय है कि मिलिटेंसी और झूठ एकसाथ चलते हैं। मिलिटेंसी हमेशा झूठ का सहारा लेती है। राज्य में विगत कई सालों से इस क्षेत्र में एक नया फिनोमिना सामने आया है वह है मिलिटेंसी के नाम पर गुण्डई।

मिलिटेंसी की खूबी है कि वह हमेशा जन समस्याओं के बहाने सिर उठाती है। जनहितैषी तर्कशास्त्र ,बाहुबल और शस्त्र इसके प्रमुख उपकरण हैं। उद्योग जगत परेशान है कि हल्दिया पोर्ट ट्रस्ट की ताजा समस्या ने गुण्डई में रूपान्तरण कर लिया है। कई उद्योगपतियों ने कहा है कि मिलिटेंसी को ’सब सामान्य है’ के मुहावरे में बांधकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी साख को दांव पर लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि पहले वाम शासन में ट्रेड यूनियन मिलिटेसी के कारण पश्चिम को व्यापक स्तर महत्वपूर्ण उद्योगों से हाथ धोना पड़ा है। आम आदमी यह उम्मीद कर रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रवृत्ति को अपने शासन के दौरान पनपने नहीं देंगी। इस प्रसंग में कुछ मुख्य बातें हैं जो साफ दिखाई दे रही हैं। राज्य प्रशासन का दलतंत्र के रूप में विस्तार हुआ है। पापुलिज्म बनाए रखने के लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बस्तियों के बाशिंदों का गुण्डावाहिनी के रूप में जमकर दुरूपयोग हो रहा है।

मिलिटेंसी जब भी सिर उठाती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी सबसे पहले पंक्चर हो जाती है है। आमतौर पर ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी संबंधित उद्योग तक सीमित रहती है लेकिन मौजूदा दौर में यूनियन मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल अख्तियार कर ली है। राज्य का मौजूदा नेतृत्व खुलकर इस अपराधीकरण को संरक्षण दे रहा है। मसलन् किसी कंपनी ने मजदूरों के खिलाफ एक्शन लिया है तो मजदूर संगठनों को उसका एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए। लेकिन इस तरह का रास्ता न अपनाकर हल्दिया में गुण्डई का मार्ग पकडा गया। हल्दिया में घटना का आरंभ हुआ तब हुआ जब एचबीटी कार्गो कंपनी ने अपने यहां काम करने वाले 270 कर्मचारियों को सीधे नौकरी से निकाल दिया। इस प्रसंग में कंपनी का तर्क है कि उसने बंदरगाह के आधुनिकीकरण पर 200 करोड़ रूपये खर्च किए हैं और उसे इन कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है,साथ यह भी कहाकि कंपनी ने मजदूरों से संबंधित कानूनों का पालन करते हुए ही इन मजदूरों को नौकरी से निकाला है। स्थानीय टीएमसी सांसद ने स्थानीय स्तर प्रतिवाद का नया तरीका अपनाया और पूरे इलाके में आतंक पैदा कर दिया। कंपनी के 3 अधिकारियों का पूरे परिवार के साथ अपहरण कर लिया, बंदरगाह पर काम पर जाने वाले मजदूरों को मारा-पीटा और आतंकित किया। उल्लेखनीय बात यह है कि सत्तारूण तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाले मजदूर संगठन इंटक ने कोई आंदोलन मजदूरों की छंटनी के खिलाफ संगठित नहीं किया बल्कि सीधे कंपनी के खिलाफ गुण्डई शुरू कर दी। उद्योग जगत चाहता है कि मजदूरों और कंपनियों के बीच के विवाद आपसी बातचीत से हल हों या कानूनीमंचों पर हल हों। बाहुबलियो के जरिए इस तरह की समस्याओं के समाधान तलाशने से बचा जाय। उद्योग जगत उम्मीद कर रहा है कि ममता बनर्जी 9 नवम्बर की बैठक में मिलिटेंसी की आलोचना करेंगी और कोशिश करेंगी कि उस बैठक के पहले हल्दिया विवाद के समाधान के लिए कोई मध्यममार्ग निकल आए।


गुरुवार, 1 नवंबर 2012

फेसबुक और विचार


फेसबुक लेखन को कचड़ा लेखन मानने वालों की संख्या काफी है। ऐसे भी सुधीजन हैं जो यह मानते हैं कि केजुअल लेखन के लिए फेसबुक ठीक है गंभीर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए यह माध्यम उपयुक्त नहीं है। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। फेसबुक पर आप चाहें तो विचारों का गंभीरता के साथ प्रचार-प्रसार भी कर देते हैं।


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फेसबुक पर व्यक्त विचारों का वैसे ही असर होता है जैसा असर किसी के भाषण को सुनते हुए होता है। एक ही शर्त है विचार खुले मन और बिना शर्त के साथ व्यक्त हों। पढ़ने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक। फेसबुक विचारों की कबड्डी का मैदान है। 


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फेसबुक में विचार महान होता है बोलने वाला नहीं। यहां पर आप अपने विचारों को अनौपचारिक तौर पर वैसे ही पेश करें जैसे चाची अपने विचार पेश करती है। बातों बातों में विचारों की प्रस्तुति ही फेसबुक की विचार-कला की धुरी है। 


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फेसबुक में विचार रखें और चलते बनें,विचारों के शास्त्रार्थ की यह जगह नहीं है। यह कम्युनिकेशन का मंच है और विचार को भी कम्युनिकेशन के ही रूप में आना चाहिए।फलतः विचार को विचारधारा के बंधनों से यहां मुक्ति मिल जाती है। विचार यहां कम्युनिकेशन है ,विचारधारा नहीं। कम्युनिकेशन सबका होता है ,जबकि विचारधारा वर्ग विशेष की होती है।
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फेसबुक पर अनेक विचारवान लोग हैं जो अपने सुंदर विचारों को व्यक्त इसलिए नहीं करते क्योंकि उनके विचारों को कोई चुरा लेगा।

विचारों की चोरी अच्छी बात है इसका ज्यादा से ज्यादा विकास होना चाहिए। यह विचारों का लोकतांत्रिकीकरण है। फेसबुक ने इस अर्थ में ज्ञान और विचार के लोकतांत्रिकीकरण को डिजिटल आयाम दिया है।यहां व्यक्त विचार कभी नहीं मरते। 


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मनुष्य का दिमाग बना है विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, वह विचारों को कैदगाह करने के लिए नहीं बना। फेसबुक ने रीयल टाइम कम्युनिकेशन की संभावनाओं को साकार करके विचारों के पंखों को साकार किया है। संसार में विचारों से सस्ती कोई चीज नहीं है।

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विचार तो जीवन का मूल्यवान उपहार है। आप किसी व्यक्ति को कोई अच्छा विचार सम्प्रेषित करते हैं तो मूल्यवान गहना देते हैं। विचारों को पढ़ना और सुनना चाहिए। इससे मानवीयबोध समृद्ध होता है। फेसबुक की थुक्का-फजीहत और शैतानियों से निजात दिलाने में अच्छे विचार बड़ी मदद कर सकते हैं।


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फेसबुक की खूबी है कि इसमें आप इमेजों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इमेजों के साथ विचारों को भी बदलना चाहिए। हमारे अनेक फेसबुक मित्र हैं उनको उन्मुक्त भावों की इमेज या फोटो तो अपील करती है लेकिन उन्मुक्त उदार विचार अपील नहीं करते। मसलन् दुर्गा की इमेज तो अपील करती लेकिन दुर्गा के विचार अपील नहीं करते। इमेज बदलने के साथ विचारों में बदलाव आता है।


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फेसबुक पर सामान्य और विशिष्ट, शिक्षित और विद्वान सभी किस्म के लोग हैं जो लिख रहे हैं। बड़े दिमाग के बड़े आइडिया को सही परिप्रेक्ष्य में देखने में फेसबुक कम मदद करता है। बड़े आइडिया को कम बुद्धि के लोग जब देखते हैं तो उलझन में पड़ जाते हैं और अंटशंट लिखने लगते हैं। वे अपनी कम बुद्धि से बड़े विचारों को प्रदूषित करने की असफल चेष्टा करते हैं। 
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फेसबुक पर ऐसे भी मित्र हैं जो किसी भी विचार को पसंद नहीं करते और बकबास करने में सिद्धहस्त हैं। इस तरह के लोग अमूमन व्यक्तिगत हमले करते हैं। फेसबुक पर की गई बकबास अंततः बकबास है वह विचार नहीं है।
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फेसबुक पर ऐसे भी लोग है जिनके कोई विचार नहीं हैं लेकिन वे किसी न किसी विचार की छाया में रहते हैं। विचार की छाया में रहना ,विचारों में रहना नहीं है। ये वे लोग हैं जो विचार को ग्रहण नहीं कर पाए हैं,समझ ही नहीं पाए हैं। यानी वे विचार को मानते हैं,जानते नहीं।

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