सोमवार, 27 अगस्त 2012

अवसरवादी राजनीति के जाल में फंसा बोडो का जातीय संकट

जातीय संघर्ष हो या साम्प्रदायिक दंगे  भारत के अधिकतर नेता जातीय समस्या को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं। भारत में जातीय और साम्प्रदायिक दंगे जब भी होते हैं तो अवसरवादी राजनीति और प्रशासनिक निकम्मापन खुलकर सामने आ जाता है।बोडो इलाके में भी इनदिनों यही हो रहा है।राज्य प्रशासन इसे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में ही देख रहा है ,जो गलत है।

विगत दो माह से बोडोलैंड के इलाके में तनाव है। बोडो समुदाय के अतिवादियों ने गैर बोडो समुदाय के लोगों पर सामूहिक हमले किए हैं। इन हमलों में 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सैंकड़ों लोग घायल हुए हैं और पांच लाख स्थानीय बाशिंदे विस्थापित हुए हैं। हाल ही में बोडो हिंसाचार और विस्थापन के आरोप में बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक प्रदीप कुमार ब्रह्मा को असम पुलिस ने गिरफ्तार किया है। ब्रह्मा की गिरफ्तारी के बाद इस इलाके में तनाव बढ़ गया है। गिरफ्तारी के तत्काल बाद ही उनके समर्थकों ने रेल यातायात ठप्प करके असम को बाकी देश से काट दिया और अंत में मजबूर होकर सेना को स्थिति संभालने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा।

बोडो नेता प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ पुलिस थाने में अनेक केस दर्ज हैं और उनका दल कांग्रेस के साठ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है। विलक्षण बात यह है कि प्रदीप ब्रह्मा का बोडो पीपुल्स फ्रंट एक तरफ कांग्रेस सरकार के सत्तारूढ़ मोर्चे में शामिल है वहीं दूसरी ओर उसे भाजपा का भी समर्थन हासिल है। जिस समय दिसपुर के अधिकारियों ने प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया तो उनसे यही कहा गया कि वे बोडो पीपुल्स फ्रंट के लोगों के प्रति नरमी बरतें क्योंकि कांग्रेस को डर है कि उनकी राज्य सरकार बोडो विधायकों के समर्थन वापस ले लेने से गिर सकती है और यही वह बुनियादी वजह है कि बोडो अतिवादियों ने जब हमले आरंभ किए तो राज्य प्रशासन मूक दर्शक बना रहा और बोडो हिंसाचार की जांच का काम सीबीआई के हवाले कर दिया है। अब प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ जो केस दर्ज हैं उनको भी सीबीआई को सौंपने की तैयारियां चल रही हैं। सीबीआई के हवाले जातीय दंगों की जांच सौंपकर राज्य प्रशासन नेसाफ कर दिया है कि वह इन दंगों की जांच करने की स्थिति में नहीं है। उल्लेखनीय है प्रदीप ब्रह्मा के खिलाफ सात आपराधिक मामले कोकराझार के विभिन्न थानों में दर्ज कराए गए हैं जिनमें चश्मदीद गवाहों ने बयान तक दिए हैं। बोडो अतिवादियों के हिंसाचार और लाखों लोगों के पलायन को लेकर ज्योंही बोडो विधायक प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया गया भाजपा ने तत्काल उसकी गिरफ्तारी की निंदा की। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय ने ब्रह्मा की गिरफ्तारी को लोकतंत्रविरोधी और बदले की कार्रवाई कहा। बोडो इलाके में 80 से ज्यादा निर्दोष लोगों की हत्या करने और पांचलाख से ज्यादा लोगों को शरणार्थी बनाने वाले राजनीतिक संगठन के नेता को भाजपा प्रवक्ता तरुण विजय ने राष्ट्रभक्त भारतीय नागरिक कहा है। भाजपा का मानना है कि प्रदीप ब्रह्मा राष्ट्रभक्त भारतीय है जो एक तरफ बंगलादेशी घुसपैठियों और दूसरी ओर पुलिस के दमनतंत्र का शिकार बना है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार प्रदीप कुमार ब्रह्मा को 22 अगस्त को कोकराझार जिले के फकीरग्राम और दोतमा पुलिस थाने में दरिज केस नं.27/2012U/S ,120(बी)/147/ 148/ 149/ 436/426/379/506 की धाराओं में दर्ज मामलों के संदर्भ में आधी रात को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। कोकराझार के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट सी.चतुर्वेदी के सामने 23अगस्त को जब ब्रह्मा की जमानत याचिका पेश की गई तो चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज करके ब्रह्मा को 14दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

दूसरी ओर ब्रह्मा के समर्थकों ने 4-5 घंटे तक असम के विभिन्न इलाकों का समूचा रेल यातायत ठप्प कर दिया , खासकर कोकराझार में जगह जगह प्रतिवाद किया और सड़कों और रेलमार्ग को ठप्प कर दिया। इससे असम का पूरे देश से संपर्क कटा रहा। विभिन्न स्थानों पर सभी ट्रेन 5-6 घंटे तक फंसी रहीं,बाद में ब्रह्मा के समर्थकों ने कोकराझार इलाके में अनिश्चितकालीन बंद की घोषणा कर दी।इस समय कोकराझार में एक तरफ कर्फ्यू है दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट का अनिश्चितकालीन बंद चल रहा है।

एक अन्य घटनाक्रम में विगत शुक्रवार को गोहाटी में प्रेस को सम्बोधित करते हुए दि नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ने नार्थ ईस्ट के छात्रों और पेशेवर लोगों के देश के बाकी हिस्सों से हाल ही में हुए पलायन के खिलाफ आगामी 6सितम्बर को असम को छोड़कर समूचे नार्थ ईस्ट में एकदिन के बंद का आह्वान किया है। उल्लेखनीय है कि यह संगठन उत्तर-पूर्व के राज्यों में छात्रों का संयुक्त मंच है। इसमें विभिन्न राज्यों में सक्रिय छात्र संगठन शामिल हैं।इनमें अधिकांश अतिवादी राजनीति करने वाले संगठन हैं। इस संगठन ने मांग की है कोकराझार में हाल की हिंसा के शिकार विस्थापितों में सिर्फ उन्हीं विस्थापितों को शरणार्थी शिविरों में मदद दी जाए जो माइग्रेट करके भारत नहीं आए हैं। माइग्रेंट पीडितों को कोई मदद न की जाय। दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट के नेता और बोडो आदिवासी परिषद के अध्यक्ष हग्रामा मोहीलरी ने एक बयान जारी करके सारी स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। उन्होंने मांग की है कि हाल के बोडो हिंसाचार के कारण विस्थापित लोगों में उन्हीं लोगों का पुनर्वास किया जाय जिनके नाम 1971 की मतदाता सूची में हैं और जो इसका प्रमाण दे सकें। जिनके पास प्रमाण नहीं है उनका पुनर्वास न किया जाय। यदि इसके बिना विस्थापितों का पुर्नवास किया जायगा तो बोडो आदिवासी परिषद इसका विरोध करेगी। मोहीलरी ने यह भी कहा कि असम में कांग्रेस-बोडो पीपुल्स फ्रंट का गठबंधन बना रहेगा।मोहीलरी ने मांग की है कि भारत-बंगलादेश सीमा को पूरी तरह सील किया जाय और जो वैध नागरिक हैं सिर्फ उनकी ही पुनर्वास व्यवस्था की जाय।

आगामी 26अगस्त को बोडो पीपुल्स फ्रंट का एक प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मिलने दिल्ली जा रहा है और उनको ज्ञापन देकर बोडो इलाके की ताजा स्थिति से अवगत कराएगा। अब सबकी निगाहें शिंदे और बोडो नेताओं की आगामी सप्ताह होने वाली मीटिंग पर लगी हैं। कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि बोडो इलाके में स्थिति सामान्य बनाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकल आए और विस्थापितों को पुनःउनके घरों में ले जाकर बसा दिया जाय और बोडो नेताओं के आक्रोश को भी ठंड़ा कर दिया जाय।यही वजह है कि राज्य और केन्द्र के किसी भी बड़े कांग्रेसी नेता ने हाल की बोडो पीपुल्स फ्रंट की हिंसात्मक कार्रवाईयों की निंदा में एक शब्द तक नहीं कहा और भाजपा ने तो सीधे इस संगठन को समर्थन दिया है। ऐसी स्थिति में जल्द ही कोई समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा।

सोमवार, 20 अगस्त 2012

फेसबुक और उत्तर-पूर्व के लोगों का पलायन


               
इंटरनेट पर अफवाह लिखने से सामाजिक तनाव पैदा नहीं होता ,सामाजिक तनाव और सामजिक विद्वेष तो पहले से मन में और समाज में मौजूद है इसको इंटरनेट, एसएमएस,वीडियो,एमएमएस की अफवाहों और बोडो जातीय हिंसाचार ने हवा दी है।
भारतीय जीवन में बैठी जातीय दुर्भावनाएं और जातीय घृणा उत्तर-पूर्व के लोगों के पलायन की जड है । मुसलमानों और उत्तर-पूर्व के लोगों के प्रति हमारे समाज में परायाभाव पहले से ही है।यह परायापन विभिन्न माध्यमों के जरिए पोषित होता रहा है। उसकी विस्फोटक अभिव्यक्ति है हाल का पलायन । अफवाहें पलायन का गौण कारण है मूल कारण है सामाजिक विभाजन, सामाजिक घृणा की विचारधाराओं का विभिन्न माध्यमों के जरिए हमारे बीच में किया जा रहा प्रचार। इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए।
हाल में अफवाह फैलाने में नेट पर सक्रिय 80बेवसाइट के कंटेंट को अपराधजनक पाया गया है और उनको ब्लॉक करने के आदेश दिए गए हैं। इस समूचे घटनाक्रम से भारत सरकार सबक ले और प्रत्येक बेवसाइट की छानबीन और निगरानी करे,यदि ऐसा नहीं करते तो दोबारा इंटरनेट का शरारती तत्व इस्तेमाल करने से बाज नहीं आएंगे। पीटीआई के अनुसार -
Government is learnt to have ordered blocking of 80 more Internet pages and user-accounts on Sunday on social networking sites including Facebook, Google and Twitter to avoid panic among people of northeastern region living across India.
All these sites were found hosting inflammatory and hateful content, spreading rumours and inciting violence targeting the people from north-east, government sources said.
Yesterday, the government had issued instructions to block 76 Internet sites, which included web-pages and some websites, and had said that bulk of the rumours that triggered panic among people of North-eastern states in Karnataka, Tamil Nadu and Maharashtra were sourced from Pakistan.
“We have found inflammatory and objectionable contents on some pages of Facebook and Google. Some user-accounts at Twitter were also found spreading similar contents. All together, around 80 such pages and accounts have been ordered to be blocked on Sunday,” the sources said.
The rumours about a possible attacks have led to mass exodus of people from northeast from many places including Bangalore, Chennai, Mumbai and Pune.
Home Minister Sushil Kumar Shinde on Sunday asked his Pakistani counterpart Rehman Malik to crackdown on elements based in that country that were using social media networking sites to whip up communal sentiments and spreading hate in India.
According to a report prepared by the Home Ministry, a Pakistan-based hardline group is suspected to have been involved in doctoring images and spreading them across social networking sites to create panic among people of northeastern region living across India.
   पाक के षड़यंत्रकारियों के द्वारा भेजे गए विभाजनकारी एसएमएस ,एमएमएस और नेट वीडियो के द्वारा पैदा हुए बबाल से डरकर संसद में और उसके बाहर अनेक लोग समूचे सोशल साइटस पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे हैं। यह मांग सही नहीं है। असल में ,इंटरनेट के 4 बड़े फायदे हैं,पहला, इसने सूचना का लोकतांत्रिकीकरण किया है। यह सस्ता और मुफ्त मीडियम है। दूसरा, इंटरनेट पर बार बार निजी और सार्वजनिक का भेद नष्ट होता है। तीसरा,यह सार्वजनिक स्तर पर व्यक्ति की इमेज को नए आयाम में ले जाकर खोलता है। चौथा ,यहां पर बिना चुने प्रतिनिधि हर समय मौजूद रहते हैं। इस तरह के लोगों की संप्रेषण क्षमता बहुत ज्यादा होती है। वे नेट पर कभी कभी प्रतीकपुरूष बन जाते हैं। जैसे अन्ना हजारे ।
 भारत में फे,बुक.यू-ट्यूब आदि नए माध्यम हैं और नेट पर षडयंत्रकारियों और अज्ञानिययों का तांता लगा है,ये लोग इस माध्यम के उपयोग-दुरूपयोग को लेकर विभ्रम और धूर्तता के शिकार है। षडयंत्रकारी  धूर्तता से काम ले रहे हैं।जबकि अज्ञानी लोग भोलेपन के मारे हैं। सच यह है कि  मुसलमानों के बर्मा में उत्पीड़न के फेक वीडियो  पाक से नेट पर भेजे गए और उसका हमारे मुसलमानों के मन पर बुरा असर पड़ा।मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि इस तरह के भडकाऊ वीडियो पाक स्थित आतंकी गिरोहों और आईएसआई की भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश का हिस्सा हैं। ये वीडियो नेट पर विगत एक माह  से चल रहे थे।सरकार ने कोई पहल नहीं कीष नेट सर्वर कंपनियों ने कोई पहल नहीं की,की। नेट सर्वर मालिकों ने भी भारत सरकार के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया।  आतंकियों ने अपने निर्मित वीडियो में  मुसलमानों के साथ भारत में हो रहे अत्याचारों के निजी वीडियो क्लिपिंग को भी शामिल कर लिया। यह वीडियो तकनीक का विभाजनकारी दुरूपयोग है ।
नई कम्युनिकेशन तकनीक कितनी विश्वसनीय और खतरनाक है कि लोग अपरिचितों के मैसेज पर भरोसा कर रहे हैं। भयाक्रांत हैं।अफवाहों से डरे हुए हैं।हर कम्युनिकेशन विश्वसनीय नहीं होता। कम्युनिकेशन पर सब समय विश्वास न करें। खासकर अपरिचित स्रोत से भेजा कम्युनिकेशन खतरनाक भी हो सकता है। वह आपकी खुशियां छीन सकता है।
    असम और म्यांमार की घटनाओं की फेक इमेजों के जरिए मुसलमानों के खिलाफ घृणा पैदा की गयी। कायदे से इस तरह की फेक इमेजों पर विश्वास न करें। फेसबुक आदि वर्चुअल कम्युनिकेशन में सक्रिय यूजरों से अपील है कि वे जिस व्यक्ति को नहीं जानते उसके संदेश पर विश्वास न करें। जिसे नहीं जानते उसके एसएमएस पर भरोसा न करें और न डरें। सामाजिक घृणा पैदा करने वाले मैसेज,फोटो आदि की तुरंत पुलिस को खबर करें या संबंधित नेटवर्क में शिकायत करें। अपरिचितों के संदेश जोड़ते कम हैं तोड़ते ज्यादा हैं। सावधान रहें,कम्युनिकेट करें और समाज को जोड़ें।
       भारत की अविकसित मानसिकता का संघ परिवार , नई संचार तकनीक ,कम्प्यूटर,इंटरनेट,सोशल साइटस आदि का भी संघ परिवार ,      फेसबुक पर संघ परिवार ने नियोजित ढ़ंग से विचारधारात्मक जहर फैला आरंभ कर दिया है। इस जहर के कुछ रूप हैं। मसलन् आप ज्योंही कोई धर्मनिरपेक्ष , बहुलतावादी ,साम्प्रदायिक सदभाव वाला विचार रखेंगे ये लोग आएंगे और समूची शक्ति के साथ इस्लाम विरोध और मुस्लिमविरोधी घृणा का प्रचार करने लगते हैं । तथ्यहीन और भडकाऊ बातें लिखते हैं। भाजपा-संघपरिवार के अलावा इनलोगों ने तमाम नेताओं के कैरीकेचर और चरित्रहनन वाले फोटो भी पेस्ट किए हैं। साम्यवाद विरोध और धर्मनिरपेक्ष विचारों का विरोध करना इनकी नियमित दिनचर्या है। इस तरह की चीजें भारत के राजनीतिक-सांस्कृतिक वातावरण में जहर घोल रही हैं।
असल में फेसबुक को उदारमंच बनाने के लिए मित्रों को सचेत प्रयास करना होगा। फेसबुक पर उदार विचारों और परिवर्तनकामी विचारों का स्वागत है और जो लोग संकीर्णतावाद,फंडामेंटलिज्म (सभी रंगत का),आतंकवाद और सामाजिक घृणा फैलाने वाले विचारों को लिख रहे हैं उन्हें ब्लॉक करें। हिन्दी में यह बीमारी नासूर की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। उत्तर-पूर्वी जनजातियों के लोगों को असम के हिंसाचार को लेकर अफवाह और आतंक की खबरों से घबड़ाने , पूना और बंगलौर शहर छोड़ने की जरूरत नहीं है। इस संदर्भ में इन लोगों को अपने घरवालों को भी भरोसा देना चाहिए ,क्योंकि अफवाहों का बाजार असम और उसके बाहर खासकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ शहरों में गर्म है। अफवाह फैलाने वाले समाजभंजक लोग हैं और वे जल्द ही सामने आ जाएंगे कि वे कौन लोग हैं। कर्नाटक -महाराष्ट्र राज्य प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि वह पूना और बंगलौर में रहने वाले नार्थःईस्ट के लोगों में भरोसा पैदा करे। साथ ही संघ परिवार की भी यह जिम्मेदारी है कि वह असम की दुखद घटनाओं के आधार पर अफवाह और पूर्वाग्रहों का प्रचार करने से बाज आए और शांति बनाए रखने में मदद करे।

बोडो इलाके में उग्रवाद और अफवाह से लोकतंत्र घायल


                                
            भारत में अधिकांश राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे बयान देना जानते हैं लेकिन उसके सामाजिक प्रभाव को नहीं जानते। जबकि आतंकियों,उग्रवादियों और साम्प्रदायिक संगठनों के नेताओं को मालूम है कि बयान का क्या असर होता है और उसका किस तरह दुरूपयोग किया जाय। वे अपने बयान के अनुरूप सामाजिक स्थितियों को मोड़ना और सामाजिक अंतर्विरोधों का दुरूपयोग करना अच्छी तरह जानते हैं।इस मामले में मीडिया का भी वे प्रभावशाली ढ़ंग से दुरूपयोग करते हैं जिससे उनकी बातें सही,सटीक और स्वाभाविक लगें। हिंसा और आतंक वैध लगे। यही वजह है कि अशांति के समय राजनेता कमजोर और विभाजनकारी नेता ज्यादा असरदार दिखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो बोडोलैंड इलाके में बोडो और गैर बोडो समुदायों के बीच हुए हिंसाचार के प्रसंग में उदार की तुलना में उग्रवादी और साम्प्रदायिक राजनीति आक्रामक है।
    असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई जब 6 जुलाई की हिंसा के बाद बोल रहे थे तो वे नहीं जानते थे कि उनके बयान का किस तरह बुरा असर होगा। 6 जुलाई2012 को कोकराझार में दो मुस्लिम नेताओं की बोड़ो उग्रवादियों ने हत्या कर दी। इस हत्याकांड को राज्य सरकार को गंभीरता से लेना था लेकिन मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से इस हत्याकांड के बाद जब पूछा गया कि राज्य सरकार इस तरह की हिंसा से निबटने के लिए क्या उपाय उठाने जा रही है तो गोगोई ने कहा कि  “हिंसा को रोकने की मैं कोई गारंटी नहीं दे सकता”, उनके बयान ने जातीय घृणा में डूबे हिंसकों के मनोबल बढ़ा दिया।  बाद में 19जुलाई को दो और लोगों की हत्या हुई इसकी प्रतिक्रिया में बोडो उग्रवादियों के 4लोगों की हत्या कर दी गयी।
      आश्चर्य की बात है कि इस हत्याकांड के बाद भी सरकार चौकन्नी नहीं हुई और सोई रही। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि बोडो उग्रवादियों ने निर्दोष लोगों की बस्तियों और गांवों पर हमले बोल दिए और देखते ही देखते इन हमलों की जद में 400 गांव आ गए । हिंसा और आतंक के कारण इन गांवों से दो लाख से ज्यादा लोग पलायन करने के लिए मजबूर हुए । इनलोगों को  120 राहत शिविरों में रखा गया है। इन शिविरों के खर्चे के लिए केन्द्र सरकार ने 300 करोड़ रूपये की सहायता राशि भी घोषित की है। इससे शिविर चलाए जाएंगे, मारे गए लोगों और घायलों को क्षतिपूर्ति के रूप में मुआवजा दिया जाएगा। बोडो उग्रवादियों के हमलों से 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सैंकड़ों लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री,गृहमंत्री से लेकर सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री ने इन कैम्पों का दौरा किया है।  कायदे से प्रभावित इलाकों में राज्य सरकार ,स्वयंसेवी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों को हिंसाचार के तुरंत बाद सक्रियता दिखानी चाहिए थी लेकिन वे इन इलाकों में नहीं गए।  यह गंभीर चिन्ता का विषय है।
    इससे भी दुखद बात यह है कि संसद में भाजपा और देश में संघ परिवार ने इस हिंसाकांड को बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की समस्या से बेवजह जोड़ दिया । ये संगठन तथ्य और सत्य दोनों पर परादा डाल रहे हैं। इससे हिंसक ताकतों को बल मिला है। ये ताकतें बोड़ो इलाके में जातीय विद्वेष और हिंसा का माहौल बनाए रखना चाहती हैं। तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब राहत शिविरों का मुआयना करके 31जुलाई को प्रेस कॉफ्रेंस में दावा किया कि असम में तुलनात्मक तौर शांति लौट आई है तो वे महज आशा जगाने की कोशिश कर रहे थे। सच यह था कि राहतशिविरों में दो लाख से ज्यादा शरणार्थी पलायन करके आ चुके थे और पहले के जातीय दंगों में पलायन करके आए लोग अभी भी राहतशिविरों में पड़े हुए हैं और उनको वापस घर भेजने में सरकार सफल नहीं हुई है। हाल में जो लोग राहतशिविरों में आए हैं वे कब अपने घर लौटेंगे कोई नहीं जानता। उल्लेखनीय है कि बोडोलैंड इलाके में बोडो जनजाति के लोगों का वर्चस्व है। लेकिन यह इलाका लंबे समय से संथाली,मुसलमान और बंगालियों की रिहायश भी रहा है। ब्रिटिश शासनकाल में बड़े पैमाने पर बिहार और पश्चिम के संथालियों को खेती आदि के कामों के लिए यहां लाकर अंग्रेजों ने बसाया था।
     उल्लेखनीय है कि बोडो इलाके को लेकर 10 फरवरी 2003 में बोडो आंदोलनकारियों के साथ राज्य और केन्द्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ था । उस समझौते के तहत बोडोलैंड टेरीटोरियल कौंसिल का गठन किया गया। बोडो उग्रवादियों ने उसके पहले हथियारों का समर्पण किया था और वायदा किया था कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे। लेकिन वे इस वायदे को बार बार तोड़ते रहे हैं और गैर बोडो लोगों पर हमले करते रहे हैं।
     बोडोलैंड क्षेत्र परिषद में 4जिले हैं कोकराझार,बासका,उदलगोरी और चिराग। इसके अलावा इस इलाके के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने 100 करोड़ रूपये भी जारी किए थे। उल्लेखनीय है जिस समय यह समझौता हुआ था उस समय केन्द्र में लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे और असम में तरूण गोगोई मुख्यमंत्री थे।  लेकिन बोडोलैंड परिषद के नेताओं ने इस इलाके में विकास पर ध्यान देने की बजाय पंगे वाले मसले पहले उठाए और उन्होंने गैर बोडो लोगों के स्वामित्व वाली जमीन-जायदाद के स्वामित्व को विवादों में डाल दिया। इस विवाद का वे अभी तक कोई मान्य हल नहीं निकाल पाए हैं। फलतःइस इलाके में सब समय तनाव रहता है। इसके कारण बोडो एक ओर हैं संथाली और मुस्लिम बंगाली दूसरी ओर हैं।
    यह जातीय ध्रुवीकरण इसलिए भी है कि इस इलाके में लंबे समय से गैर-बोडो बाशिंदों की संख्या इस इलाके में बोडो बाशिंदों से ज्यादा है। इसमें बंगलादेश से माइग्रेट करके आकर बसे लोगों की संख्या नगण्य है। बोडो इलाके में वे लोग संख्या में ज्यादा हैं जो ब्रिटिशशासन काल से यहां रह रहे हैं। संघ परिवार ने आक्रामक प्रचार अभियान के जरिए सभी माइग्रेट लोगों को बंगलादेशी माइग्रेट मुस्लिम की केटेगरी में डाल दिया है।   
     संघ परिवार मांग कर रहा है बोडो इलाके में रहने वाले सभी माइग्रेट लोगों को बाहर निकाला जाए और दुर्भाग्य से यही मांग बोडो उग्रवादी भी कर रहे हैं। इस तरह बोडो उग्रवादी और संघ परिवार दो भिन्न संगठन होते हुए भी एक ही जैसी मांग उठा रहे हैं,एक जैसी भाषा बोल रहे हैं,एक जैसी अफवाहें फैला रहे हैं, इससे बोडो क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। सेना को इस इलाके में उतारने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं बन पायी है और हिंसा जारी है। दूसरी ओर असम के बाहर अफवाहों का बाजार गर्म है। पूना और बंगलौर में उत्तर-पूर्व के निवासियों पर अनेक स्थानों पर हमले हुए हैं। मुंबई और दूसरी जगहों पर मुस्लिम आतंकियों ने सभा के बहाने आम जनता और पुलिस पर हमले किए हैं जिनमें बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ है और दो लोग मारे गए ।
    असम के जातीय तनाव को कम करने के लिए पहली शर्त है कि आतंकियों,अफवाह उड़ाने वालों और उत्तर-पूर्व बनाम भारत का विभाजन करके प्रचार करने वालों, बोडो बनाम गैर बोडो समुदाय के नाम पर वर्गीकरण करके प्रचार करने वालों से सरकार सख्ती से निबटे।
   कौन किस इलाके का पुराना बाशिंदा है कौन नया है, कौन मूल बाशिंदा है और कौन माईग्रेट करके आकर बसा है, इसके बारे में पहले से तयशुदा नियम कानून हैं और उन कानूनों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। हाल ही में कोकराझार और अन्य जिलों से हिंसा के कारण जिन लोगों ने घर छोड़ा है उन्हें पुनः उन इलाकों में बसाया जाय और प्रभावित इकाकों में सेना सख्ती से प्रशासन संभाले। जिन लोगों ने उत्तर-पूर्व के लोगों और अन्य लोगों में एसएमएस,फेसबुक ट्विटर आदि के जरिए अफवाहें फैलायी हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।    



रविवार, 8 जुलाई 2012

चिदम्बरम् के बयान से राज्य प्रशासन गुस्साया

     मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस समय केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को पत्र लिख रही थीं और उनसे हिंसा के आंकडों पर कैफियत मांग रही थीं ठीक उसी समय शासकदल के रणबाँकुरे सईदुल्ला कॉलेज (बशीरहाट ) में हिंसा कर रहे थे और कॉलेज शिक्षकों की नकल रोकने के कारण जमकर पिटाई कर रहे थे। इस हिंसा में 6लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। ममता का प्रशासन हिंसा रोकने की बजाय वहां हिसा की संगठित अभिव्यक्ति में मदद कर रहा था। राज्य के हिंसक वातावरण की यह एक चस्वीर मात्र है। इस तरह के चित्र गांवों और कच्ची बस्तियों में बिखरे पड़े हैं।लेकिन वे मुख्यमंत्री को नजर नहीं आ रहे। वे चिदम्बरम् पर नाराज हैं कि उन्होंने राज्य में हिंसा के बारे गलत आंकड़े क्यों दिए ?

उल्लेखनीय है हाल ही दो केन्द्रीय मंत्री कोलकाता आए। इन दोनों का मकसद एक था लेकिन आने के बहाने अलग-अलग थे। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से शिक्षा संबंधी नए सुधारों को लेकर चर्चा की ,जबकि चिदम्बरम साहब एक सेमीनार में बोलने आए थे, जिसे कलकत्ता चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने आयोजित किया था। असल में इन दोनों का मकसद था ममता बनर्जी को ठंड़ा रखना। राष्ट्रपति चुनाव के प्रसंग में प्रणव मुखर्जी की उम्मीदवारी को लेकर ममता बनर्जी जिस तरह गरम हो गयी हैं उससे निबटने की रणनीति के तहत इन दोनों मंत्रियों को कोलकाता भेजा गया था। पहलीबार ऐसा हुआ कि ममता बनर्जी ने कपिल सिब्बल से बात करने के बाद प्रेस को कुछ नहीं कहा ,बल्कि कपिल सिब्बल ने ही प्रेस को बताया कि वे क्यों कोलकाता आए हैं और उनका मकसद क्या था, उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कोई बात नहीं हुई। जबकि सच यह है कि उनकी ममता बनर्जी से राष्ट्रपति चुनाव पर ही बातें हुई । सिब्बल चाहते थे कि ममता बनर्जी की पार्टी प्रणव मुखर्जी को वोट दे अथवा कदम तटस्थ रहे। बहिष्कार का हंगामा न करे।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जानती हैं कि प्रणव मुखर्जी उनके वोट के बिना जीत रहे हैं और वे वोट देती भी हैं तो उससे स्थिति में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आने वाला। यानी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के वोट पूरी तरह हाशिए पर चले गए हैं और ममता बनर्जी की राजनीतिक महत्ता को भी एकसिरे से हाशिए पर डालने में कांग्रेस सफल रही है। दूसरी ओर कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व राज्यपाल के रवैय्ये से भी परेशान है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दल की भावनाओं से अवगत करा दिया गया है। कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल गाबे-बगाहे बेवजह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सुर में सुर मिलाने लगते हैं और इससे ममता का मनोबल बढ़ा है। प्रच्छन्न तरीकों से राज्यपाल को यह संदेश दिया गया है कि वे शांत रहें। कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व में एकवर्ग है जो चाहता है राज्यपाल को बदल दिया जाय। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अभी राज्यपाल को हटाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्रीय गृहमंत्री को 6जून 2012 को 2पन्ने का एक पत्र लिखा है जिसमें कानून-व्यवस्था की स्थिति के बारे में उनके बताए आंकडों पर सवालिया निशान लगाया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना है कि राज्य में चारों ओर शांति है और हिंसा की घटनाओं में तेजी से गिरावट आई है। लेकिन सच्चाई इसके एकदम विपरीत है। विभिन्न दलों के बीच खूनी झगड़े बढ़े हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के अनुसार राज्य में राजनीतिक हिंसाचार बढ़ा है। सन् 2011 में 136 लोग मारे गए जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अनुसार 62 लोग मारे गए,सन् 2012 में चिदम्बरम् के अनुसार राजनीतिक हिंसा में 62 लोग मारे गए जबकि ममता बनर्जी के अनुसार मात्र 5लोग मारे गए। चिदम्बरम् ने राजनीतिक हिंसा की संस्कृति पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है कि जो लोग यह कहते हैं कि राज्य में शांति है और कानून और व्यवस्था की बेहतर अवस्था है वे मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं। चिदम्बरम् ने पश्चिम बंगाल में हिंसा की संस्कृति पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुए जिस पहलू की ओर सबका ध्यान खींचा है उस पर स्थानीय राजनीतिक दलों को गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। उल्लेखनीय है चिदम्बरम् को कोलकाता चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने 180वें जन्मदिन पर बोलने के लिए बुलाया था। मजेदार बात यह है कि चिदम्बरम ने जंगलमहल में शांति के लौटने पर खुशी का इजहार किया और राज्य सरकार की इस प्रसंग में भूमिका को सही ठहराया। चिदम्बरम् ने कहा कि सन् 2011 राजनीतिक हिंसा के लिहाज से सबसे बुरा साल था। इस वर्ष 136 लोग मारे गए और 2,225 घायल हुए, सन् 2010 में 204 लोग मारे गए और 2,601 लोग घायल हुए,सन् 2012 के पहले छह माह में 82 लोग मारे गए और 1,112 लोग घायल हुए और हिंसा की 455 वारदात हुईं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 2011 और 2012 के आंकड़ों पर आपत्ति है पहले के आंकड़ों पर नहीं। वे जानना चाहती हैं चिदम्बरम् के आंकड़ों का स्रोत क्या है ? असल में वे भी जानती हैं कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के आंकड़े विभिन्न स्रोतों से सूचना संग्रह करके तैयार किए जाते हैं।इस प्रसंग में आंकड़ेबाजी का उतना महत्व नहीं है जितना इस सत्य का कि राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति संतोषजनक नहीं है। राजनीतिक हिंसा बदस्तूर जारी है और यह राज्य प्रशासन की बड़ी असफलता है।
दूसरी ओर उत्तर बंगाल में पृथकतावादी संगठनों की गतिविधियां तेज हुई हैं और वे नए सिरे हिंसा का वातावरण बनाने में लगे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्वतीय इलाकों में पृथकतावादी संगठनों की सक्रियता में आई तेजी से केन्द्रीय गृहमंत्री भी चिन्तित हैं। विभिन्न स्रोतों के जरिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह संदेश दिया गया है कि पर्वतीयक्षेत्रों पर कड़ी नजर रखी जाय।

रविवार, 1 जुलाई 2012

मानवाधिकार के ग्लोबल पैराडाइम के अंतर्विरोध


लोकतंत्र की मानवाधिकारों के बिना कल्पना असंभव है। भारत में लोकतंत्र पर बातें होती हैं लेकिन मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में बातें नहीं होतीं। हमारे यहां का अधिकांश लेखन संवैधानिक नजरिए और उसके विकल्प के वाम-दक्षिण दृष्टियों के बौद्धिक विभाजन या दलीय वर्गीकरण में बंटा है।इसके अलावा मानवाधिकारों पर शीतयुद्धीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य के परे जाकर देखने की भी आवश्यकता है।

भारत में लोकतंत्र है लेकिन लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन संबंधों का अभाव है।लोकतंत्र के लिए वोट डालने वाली जनता है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य हम अभी तक नहीं बना पाए। लोकतांत्रिक जीवन संबंधों के अभाव में मानवाधिकारचेतना का विकास संभव नहीं है। सामाजिक जीवन में पूर्व-पूंजीवादी जीवन संबंधों का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। इसमें भी अनेक किस्म के सामाजिक स्तर और जीवनशैलियां हैं।

भारतीय समाज में आदिवासी, अल्पसंख्यक,जातिवादी,धार्मिक,लिंग आदि आधारों पर विभिन्न किस्म के जीवन संबंध हैं। इन संबंधों के आधार पर वैविध्यपूर्ण नजरिया है। इनमें आपस में सह-अवस्था में जीने की भावना है ,लेकिन नए लोकतांत्रिक जीवन संबंधों और लोकतांत्रिक विचारों की ओर जाने की गति धीमी है। लोकतंत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति इस धीमी गति ने सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में भारतीय समाज को काफी पीछे धकेल दिया है।

हम आधुनिक होते हुए भी आधुनिक नहीं बन पाए हैं। समर्थ लोकतांत्रिक संरचनाओं के रहते हुए भी लोकतांत्रिक राजनीतिकदल, मनुष्य ,सामाजिक और निजी वातावरण का निर्माण नहीं कर पाए हैं। स्थिति इतनी बदतर है कि न्यायालय से लेकर संसद तक,विधानसभा से लेकर ग्राम पंचायत तक सभी में अ-लोकतांत्रिक मनुष्यों का वर्चस्व है।

भारत में विशिष्ट स्थिति है कि नए विचारों का जीवन में प्रवेश मुश्किल से होता है,नई जीवनशैली का प्रवेश हो जाता है लेकिन उस जीवनशैली से जुड़े विचार को आत्मसात नहीं करते। सचेत रूप से नए विचारों का जीवन से अलगाव बनाए रखकर नई जीवनशैली और पुराने नजरिए का खेल चलता रहता है। इसका कैनवास न्यायालय से लेकर लोकसभा तक फैला है। भारत में नई जीवनशैली के अनुरूप उपभोक्ता वस्तुओं के विनिमय के तंत्र का गठन बहुत जल्दी होता है लेकिन विचारतंत्र का गठन बहुत धीमी गति से होता है। न्यायव्यवस्था में तो यह अंतराल और भी ज्यादा दिखाई देता है। इस अंतराल का प्रधान कारण है पितृसत्ता का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वर्चस्व ।

मानवाधिकारों की गति,प्रकृति और संस्कृति को समग्र परिप्रेक्ष्य और गति के साथ जोड़कर देखना चाहिए। मसलन्, हमारे यहां कानून में मानवाधिकारों का प्रावधान है लेकिन इनको अर्जित करने में किसी नागरिक के पसीने छूट सकते हैं यदि राज्य या अन्य कोई बाधा डालने पर मादा हो जाए।

मानवाधिकारों के बारे में दो तरह के नजरिए रहे हैं,पहला नजरिया परंपरागत है जिसमें मानवाधिकारों की परंपरागत ढ़ंग से हिमायत की जाती है। इसके तहत सब शुभ होगा ,जिसे हम दुआओं का संसार कहते हैं। आशीर्वाद का संसार कहते हैं। दुआओं के नजरिए से परंपरागत ढ़ंग से दुनिया बदलने की कामना की परंपरा रही है। यह तरीका इनदिनों प्रचलन से गायब हो गया है। नया आधुनिक तरीका मानवाधिकार हनन के खिलाफ जनसंघर्ष की मांग करता है। मानवाधिकारहनन के खिलाफ जनता को एकजुट करने और इस संघर्ष के प्रमुख उपकरण के तौर पर कम्युनिकेशन माध्यमों के इस्तेमाल पर जोर देता है।इससे मानवाधिकार हनन के खिलाफ सामाजिक जागरूकता पैदा करने में मदद मिलती है।

आज मानवाधिकारकर्मी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इंटरनेट,प्रेस,फिल्म,वीडियो ,रेडियो,सोशल नेटवर्क,ब्लॉग आदि का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। एक ओर वे मानवाधिकारहनन के खिलाफ संघर्ष करते हैं। मानवाधिकार की हर जंग अभिव्यक्ति की आजादी की जंग भी है।मानवाधिकार स्वभावतःलोकल-ग्लोबल दोनों हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी में आमतौर पर "ग्लोबल" और "यूनीवर्सल" को पर्यायवाची के रूप में देखते हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक ज्याँ बौद्रिलार्द के नजरिए को ध्यान में रखना जरूरी है। बौद्रिलार्द ने लिखा है कि ये दोनों पदबंध पर्यायवाची नहीं हैं। यूनीवर्सल का सामान्यतः मानवाधिकार,लिबर्टी,संस्कृति और लोकतंत्र के लिए इस्तेमाल किया जाता है।इसके विपरीत "ग्लोबल"पदबंध का तकनीक,बाजार,पर्यटनऔर सूचना के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। यह भी माना जाता है ग्लोबलाइजेशन अपरिहार्य है उसे बदल नहीं सकते। जबकि यूनीवर्सलाजेसन (सार्वभौमत्व) तो एक मार्ग है। यह पश्चिमी समाज के संदर्भ में विकसित मूल्य व्यवस्था है जिसका पश्चिमी आधुनिकता के साथ विकास हुआ है और इसकी किसी भी संस्कृति से तुलना संभव नहीं है।

सार्वभौम के आने का अर्थ है स्थानीय संस्कृति का अंत। ग्लोबलाईजेशन के कारण सार्वभौम मूल्यों का लोप हुआ । विभिन्न देशों में सार्वभौम मूल्यों के लिए गंभीर संकट पैदा हुआ। ग्लोबलाइजेशन चूंकि सार्वभौम मूल्यों के विकल्प के रूप में पेश किया गया तो इसके कारण इकसार विचारों की आंधी चलाई गई,इससे मानवाधिकार,लोकतंत्र आदि सार्वभौम मूल्यों की व्यापक स्तर पर क्षति हुई।

बौद्रलार्द ने लिखा है कि ग्लोबलाइजेशन में पहला ग्लोबल तत्व है मार्केट। बाजार में विभिन्न किस्म के मालों का अहर्निश विनिमय,सांस्कृतिक तौर पर प्रतीकों और मूल्यों की छद्म बाढ़ पैदा करता है। खासकर पोर्नोग्राफी का ग्लोबल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में प्रसार होता है। । श्लील-अश्लील में भेद खत्म हो गया है। नेटवर्क संस्कृति का सबसे बड़ा असर हुआ है कि शारीरिक अश्लीलता जैसी कोई चीज नहीं होती। ग्लोबल का अर्थ है कि आपके पास खाली एक इंटरनेट कनेक्शन होना चाहिए।इसके कारण ग्लोबल और यूनीवर्सल का भेद खत्म हो गया। यूनीवर्सल हठात् ग्लोबल हो गया ।

मानवाधिकारों को इन दिनों सारी दुनिया में अब ठीक वैसे ही वितरित किया जा रहा है जैसे किसी ग्लोबल माल को विश्व बाजार में सर्कुलेट किया जाता है। यानी जैसे तेल या पूंजी आदि ग्लोबल प्रोडक्ट हैं ,वैसे ही अब मानवाधिकार भी ग्लोबल प्रोडक्ट है। बौद्रिलार्द के अनुसार यूनीवर्सल से ग्लोबल में रूपान्तरण के कारण लगातार इकसार बनाने की प्रक्रिया चल रही है, साथ ही अंतहीन फ्रेगमेंटेशन और अपदस्थीकरण के जरिए विकेन्द्रीकरण की बजाय केन्द्रीकरण बढ़ा है। अब भेदभाव और बहिष्कार सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है। पहले भूल से होता था। ग्लोबलाइजेशन ने अपनी विवेकशील जनता को तो नष्ट किया ही साथ ही यूनीवर्सलाइजेशन के कारण पैदा हुई आलोचनात्मक जनचेतना को भी खत्म किया। आधुनिकता और सार्वभौमत्व के तमाम विमर्शों को हाशिए पर डाल दिया ।

आज सार्वभौम आधुनिकता का आईना टूट चुका है। सार्वभौम मूल्य अपना अधिकार और प्रभाव खो चुके हैं। फलतः चीजें और भी ज्यादा अनुदार दिशा में जा रही हैं। जब सार्वभौम मूल्य सामने आए थे तो उसमें भेद और मतभेद के लिए स्थान था ,लेकिन ग्लोबलाइजेशन में सभी किस्म के भेदों का अंत हो गया है। ग्लोबलाइजेशन ने एकदम इनडिफरेंट संस्कृति को जन्म दिया है। सारी दुनिया में आज ग्लोबलाइजेशन का कोई विकल्प नहीं है। ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें लिबर्टी,लोकतंत्र और मानवाधिकार हमें अनाकर्षक और गंदे लग रहे हैं। यानी ग्लोबलाइजेशन ने यूनीवर्सलाइजेशन को अतीत की चीज बना दिया है।

यूनीवर्सलाइजेशन के जमाने में रूपान्तरण,आत्मगतता,अवधारणा,यथार्थ और प्रतिनिधित्व पर जोर था , अब इस सबकी जगह वर्चुअल ग्लोबल कल्चर ने स्क्रीन, नेटवर्क,नम्बर,समय-स्थान की गतिशीलता आदि का विकास किया है। सार्वभौमत्व में प्राकृतिक या नेचुरल चीजों के रूप में शब्द,शरीर और अतीत का अस्तित्व था। विश्वस्तर पर हिंसा और नकारात्मक चीजों के प्रति आलोचनात्मक नजरिए का अंत हो गया है। जबकि पहले नकारात्मक चीजों को आलोचनात्मक ढ़ंग से देखते थे।

वर्तमान युग का पहला संदेश है कि सूचना ही शक्ति है। सूचना मानवाधिकार है। सूचना पाने का अर्थ है मानवाधिकार का विस्तार। सामान्य सूचना और उसका प्रसार आमलोगों में तेजी से असर पैदा करता है।संस्थानों का दुरूपयोग रोकने में सूचनाओं का सार्वजनिक उदघाटन मानव जाति की बहुत बड़ी सफलता है। जिन लोगों ने अहर्निश सत्ता का दुरूपयोग किया है और आम जनता पर बेइंतिहा जुल्म ढाए हैं उनके खिलाफ सूचना, कम्युनिकेशन की अत्याधुनिक तकनीकी और जनता के संघर्षों ने मिलकर नए लोकतांत्रिक समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है। आज सूचना ने जितनी बड़ी शक्ति अर्जित की है वैसी शक्ति उसके पास पहले कभी नहीं थी। जिस समाज में कम्युनिकेशन की तकनीक,शिक्षा और सचेतन संगठन का त्रिकोण काम करने लगता है वहां पर वर्चस्वशाली व्यक्तियों,सत्ता और संस्थानों के दुरूपयोग को एक्सपोज करना आसान रहा है। नई अत्याधुनिक कम्युनिकेशन की तकनीक ने निरस्त्र जनता के हाथ में कम्युनिकेशन के प्रभावशाली अस्त्र दिया है। आम लोगों में लोकतांत्रिक हकों के लिए लड़ने का जज्बा पैदा किया है।

सत्ताधारी ताकतें संचार माध्यमों और मीडियातंत्र का जमकर दुरूपयोग करती हैं लेकिन नई इंटरनेट कम्युनिकेशन तकनीक ने इस तंत्र के खिलाफ आम जनता के हाथ बहुत ही शक्तिशाली कम्युनिकेशन तंत्र सौंप दिया है। वर्चुअल कम्युनिकेशन तकनीक की शक्ति इन दिनों महानता के नए आयाम बना रही है। वर्चुअल कम्युनिकेशन और एक व्यक्ति की कुर्बानी पूरे क्षेत्र में जन रोष पैदा कर सकती है ,इसका आदर्श उदाहरण है ट्यूनीशिया के एक साल पहले अंदर आरंभ हुआ जनज्वार। मोहम्मद बोउजीजी नामक एक फलों का खोमचा लगाने वाले ने सीदीबौउजीद नामक शहर में पुलिस के उत्पीड़न और गरीबी से तंग आकर आत्मदाह करके जान देदी। मोहम्मद बौउजीद की तरह ट्यूनीशिया की आम जनता बरसों से आर्थिक पामाली और अकल्पनीय कष्टों में जीवन जी रही थी. लेकिन मोहम्मद की आत्मदाह की घटना ने अचानक आम जनता के क्रोध को सड़कों पर उतार दिया। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से मोहम्मद की आत्मदाह और तकलीफों की खबर पूरे देश में तेजी से कम्युनिकेट हुई और हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। खासकर युवाओं ने बड़ी तादाद में प्रतिवाद में जमकर हिस्सा लिया और उत्पीड़क शासकों के खिलाफ आधुनिक कम्युनिकेशन तकनीक के रूपों का जमकर इस्तेमाल किया। ट्यूनीशिया की सरकार ने आम जनता के प्रतिवाद को कुचलने के लिए मीडिया से लेकर पुलिस तक सभी का जमकर दुरूपयोग किया लेकिन आम जनता का प्रतिवाद ट्यूनीशिया में फैलता गया और फिर धीरे-धीरे उसने मध्यपूर्व के बदनाम शासकों के खिलाफ आम जनता को सड़कों पर उतार दिया.ट्यूनीशिया में मोहम्मद की मौत के बाद उठे जनज्वार का यह परिणाम निकला कि ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति ने मात्र एक माह में यानी जनवरी में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और देश छोड़कर भागने को मजबूर हुए।उन्होंने सउदी अरब के शहर जद्दाह में जाकर शरण ली। इस तरह ट्यूनीशिया में 20 साल से चले आ रहे उत्पीड़क शासनतंत्र का अंत हुआ। इसके बाद वहां पर आम जनता की शिरकत वाली शासन व्यवस्था आई है जो आम जनता के अधिकारों को सम्मान दे रही है। ट्यूनीशिया के सर्वसत्तावादी तंत्र के दमन-उत्पीडन से सारे लोग परेशान थे और शासकों की गणना इस क्षेत्र के सबसे बदनाम शासकों में होती थी। लेकिन ट्यूनीशिया में ज्यों में बदलाव आया उसका सीधे असपास के देशों अल्जीरिया,बहरीन,मिस्र,जोर्डन,लीबिया .यमन आदि पर भी पड़ा और इन इलाकों की सर्वसत्तावादी अलोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ हजारों-लाखों लोग सड़कों पर उतर आए।

इंटरनेट और मोबाइल नए कम्युनिकेशन उपकरण है लेकिन जनता की समस्याएं पुरानी हैं। नए उपकरणों ने प्रतिवादी स्वर और सम्मान के साथ जीने के भावबोध को पैदा करने में बड़ी भूमिका अदा की है। मोबाइल और इंटरनेट को सत्ताधारियों और बहुराष्ट्रीय संचार कंपनियों के मुनाफे और वर्चस्व का हिस्सा मात्र समझने से इन तकनीकी रूपों के प्रति संतुलित नजरिया नहीं बनेगा। ये कम्युनिकेशन उपकरण आम जनता में सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने, निजता और लोकतंत्र की रक्षा करने का भावबोध पैदा करते हैं। इन दो यंत्रों के आने बाद से नए सिरे से मानवाधिकारों की लहर सारी दुनिया में उठी है। अमेरिका के युद्धपंथी रूझानों के खिलाफ पूंजीवादी देशों में लाखों लोगों का शांति जुलूसों में भाग लेना और मध्यपूर्व का लोकतांत्रिक जनज्वार इस बात का प्रमाण है कि मोबाइल और इंटरनेट ने मानवता को गौरव और शक्ति दी है।

मौजूदा दौर डिजिटल संस्कृति का है, लेकिन कम्युनिकेशन तकनीक कोई जादुई छड़ी नहीं है। कम्युनिकेशन तकनीक का नेटवर्क होने पर जरूरी नहीं है कि आमलोगों में लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति अपील भी हो, यह भी देखा गया है कि जो लोग इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं वे लोकतांत्रिक गतिविधियों में कम भाग लेते हैं। कहने का अर्थ यह है कि तकनीक अपने आप में निर्धारक तत्व नहीं है। लोकतांत्रिक वातावरण और मानवाधिकारों की रक्षा में निर्धारक तत्व है आम जनता की सक्रियता। आम जनता की सक्रियता को कम या ज्यादा करने में कम्युनिकेशन तकनीक मदद कर सकती है लेकिन कम्युनिकेशन तकनीक स्वयं में समाज नहीं बदल सकती। इस संदर्भ में देखें तो कम्युनिकेशन तकनीक सतह पर तटस्थ रहती है। लेकिन तकनीक के उपयोग, जनांदोलन के स्तर और सामाजिक संतुलन के मद्देनजर देखें तो तकनीक तटस्थ नहीं होती बल्कि वर्गसंघर्ष का हिस्सा होती है। जिन समाजों में मोबाइल और इंटरनेट को जनउभार पैदा करने लिए इस्तेमाल किया गया वहां पर कालान्तर में इन्हीं कम्युनिकेशन रूपों का खबरों को दबाने,आंदोलन का दमन करने और आम जनता को परेशान करने के लिए इस्तेमाल किया गया। इस प्रसंग में आदर्श उदाहरण है इराक । कहने को अमेरिका ने घोषणा की है कि उसने अपने सैनिक इराक से हटा लिए हैं। लेकिन सच कुछ और है।

अमेरिका ने इराक में कठपुतली सरकार स्थापित की है। आधिकारिक तौर पर अमेरिकी सेना चली गयी है,लेकिन अमेरिका ने बगदाद में अपना जो दूतावास खोला है वह संकेत देता है कि अमेरिका की सेनाएं इराक में शासन कर रही हैं। अमेरिका के बगदाद स्थित इराकी दूतावास में सोलह हजार कर्मचारी हैं। संभवतः किसी देश में इतने कर्मचारी किसी भी देश के दूतावास में काम नहीं करते। जबकि इराक की आबादी मात्र 28मिलियन है।

बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास दुनिया का सबसे बड़ा दूतावास है। डेढ़ मील लंबे एरिया में फैले इस विशालकाय दूतावास को पेंटागन का छोटा संस्करण कहना सही होगा। इसके स्टाफ में निजी सेनाएं और आधिकारिक सेना की विशाल टुकड़ियाएं हैं। इस दूतावास का अगले पांच साल का बजट 25-30 बिलियन डॉलर है। इस तैयारी को देखकर यह लगता है कि इराक को अमेरिका लंबे समय तक अपने उपनिवेश के रूप में शासन में रखेगा। इराक से सेना हटाने का तो खाली नाटक किया गया है।

इराक में किसतरह की जनहानि अमेरिका को उठानी पड़ी है उसके बारे में ओबामा प्रशान झूठ बोल रहा है। सरकारी तौर पर कहा जा रहा है कि इराक में 32हजार अमेरिकी सैनिक घायल हुए,उल्लेखनीय है अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में 1.25मिलियन सैनिकों की नियुक्ति की थी। इनमें आधे से ज्यादा लोगों ने यानी तकरीबन छह लाख सैनिकों ने अपंगता क्षतिपूर्ति के दाव् दायर किए हैं। यदि 6लाख सैनिक अपंगता के दावे पेश कर रहे हैं तो सरकारी तौर पर दिया गया घायल सैनिकों का आंकड़ा एकदम निराधार है।

हजारों अमेरिकी सैनिकों को इराक और अफगानिस्तान से लौटने के बाद अनाथों की तरह रात-दिन सड़कों पर गुजारने पड़ रहे हैं।इस तरह के बेसहारा और गृहहीन सैनिकों की सड़कों पर संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जबकि इराक युद्धपर चार ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च हो चुका है। इसमें यदि अपंग सैनिकों,गृहहीन सैनिकों आदि को मिलने वाले भत्ते आदि को जोड़ लिया जाए तो यह राशि और भी अधिक बैठेगी।

इराक में जो कुछ घट रहा है वह मानव सभ्यता के इतिहास की विरल अमानवीय घटना है। इराक के तेल के कुओं पर हमलावर सेनाओं का कब्जा है और आम राजनीतिक भाषा में कहें तो इराक के नागरिकों की गुलामों से भी बदतर अवस्था है।अमेरिकी सेनाओं के इराक पर हमले के पहले मध्य-पूर्व में इराक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था, जहां औरतों को व्यापक स्वतंत्रता प्राप्त थी। इराक की आम जनता खुशहाली की जिंदगी गुजार रही थी और सामान्य जीवन में पूर्ण शांति थी।लेकिन अब हालात एकदम बदल गए हैं।

सीनियर बुश के शासनकाल में सद्दाम हुसैन को नष्ट करने और कुवैत से इराक का कब्जा हटाने के बहाने से हमलावर सेनाओं के जो हमले आरंभ हुए थे वे अभी भी जारी हैं। सद्दाम हुसैन और इराकी प्रशासन के खिलाफ अमेरिका ने झूठे आरोप लगाए और विश्वभर के मीडिया से उसका अहर्निश प्रचार किया ।

तरह-तरह के बहानों के जरिए इराक पर पहले आर्थिक पाबंदी लगायी गयी बाद में कुवैत पर इराक के अवैध कब्जे को हटाने के बहाने हमला किया गया और इस समूची प्रक्रिया ने इराक जैसे संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता को सरेआम रौंदते हुए हमलावर सेनाओं ने अपने कब्जे में ले लिया।

विगत 20 सालों में अमेरिकी पाबंदियों और अमरीका और उसके मित्र देशों की सेना के अवैध कब्जे में इराक का समूचा चेहरा ही बदल गया है। हमलावर सेनाओं की कार्रवाईयों से 50 लाख से ज्यादा इराकी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं या लाखों विस्थापित हुए हैं, हजारों को बगैर कारण बताए जेलों में बंद कर दिया गया है।

विचार करने की बात यह है कि ग्लोबल मीडिया और भारत का कारपोरेट मीडिया इराक की इतनी व्यापक तबाही देखकर भी चुप क्यों है ? यह मानवाधिकारहनन का हाल के वर्षों का सबसे क्रूर हादसा है।

एक जमाना था जब सद्दाम के द्वारा मानवाधिकारों के हनन की खबरों को देने के लिए रूप में मीडिया के लोग खास करके टीवी चैनलों के लोग बगदाद में डेरा लगाए हुए थे लेकिन सद्दाम हुसैन के मारे जाने और हमलावर सेनाओं के कब्जे में इराक के आते ही ये सभी चैनल धीरेधीरे इराक को छोड़कर चले आए और यह मान लिया गया कि हमलावर सेनाओं के शासन में इराकी जनता के मानवाधिकार पूर्ण सुरक्षित हैं। सच यह नहीं है।

ग्लोबल मीडिया और भारत के कारपोरेट मीडिया ने हमलावर सेनाओं के सहायक के रूप में अब तक काम किया है। हमलावर सेनाओं के मान-सम्मान की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। 50 लाख इराकियों के मारे जाने पर भी कारपोरेट मीडिया के तथाकथित सत्यप्रेमी समाचार संपादकों को इराक की तबाही को अभी तक प्रमुख एजेंडा बनाने की याद नहीं आयी है। सवाल उठता है अमेरिकी मीडिया और उनके भारतीय पिछलग्गू टीवी चैनलों में इराक का नियमित कवरेज क्यों गायब हो गया ? मीडिया को यह जबाब देना होगा कि सद्दाम को सबक सिखाने की इतनी बड़ी कीमत इराक की जनता क्यों दे रही है ?

मीडिया में 9/11 के पीडितों को लेकर जितना प्रचार किया गया उसकी तुलना में सहस्रांश भी इराकी जनता की पीड़ा और कष्टों के बारे में नहीं बताया गया। इराक की जनता के प्रति कारपोरेट मीडिया का यह उपेक्षा भाव सोची समझी योजना का हिस्सा है, इसका प्रधान लक्ष्य है विश्व जनमत के दिलो-दिमाग से इराकी जनता के मानवाधिकार हनन की कार्रवाई को धो-पोंछकर सफाई करना।

इराक के प्रसंग में मूल समस्या यह नहीं है कि कौन सही है बल्कि बुनियादी समस्या है कि एक संप्रभु राष्ट्र पर अमेरिका का अवैध कब्जा कैसे हटाया जाए ? आज इराक में चारों ओर सेना है, प्रतिवादी जत्थे हैं और सिर्फ खून-खराबा है। शांति और मानवाधिकारों की स्थापना के नाम पर आयी अमेरिकी सेना ने समूचे इराक को बम ,बारूद और खून के ढ़ेर में बदल दिया है।

इराक में किसी के पास कोई अधिकार नहीं हैं। लोकतंत्र के नाम पर पाखंड चल रहा है। अमेरिका में रहने वाले आप्रवासी इराकियों की कठपुतली सरकार काम कर रही है और इस सरकार के पास में भी कोई अधिकार नहीं हैं । इराकी प्रशासन की असल बागडोर सीआईए पेंटागन और युद्ध उद्योग के मालिकों के हाथों में है।

संयुक्त राष्ट्र संघ शरणार्थी कमिश्नर के द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि युद्ध के कारण इराक के 24 लाख लोग शरणार्थी बना दिए गए हैं। यह आंकड़ा 30 मई 2010 का है। 50 लाख लोग घरविहीन हैं। ये लोग बेहद खराब अमानवीय स्थितियों में टेंट में जी रहे हैं। ये लोग जहां रह रहे हैं वहां पर पीने का साफ पानी नहीं है, शौचालय नहीं हैं। बिजली नहीं है। इनमें से ज्यादातर लोग रेल लाइनों और पुलों के किनारे पड़े हुए हैं।

तकरीबन 2-3 मिलियन इराकी शरणार्थी सीरिया के शरणार्थी शिविरों में नारकीय अवस्था में जी रहे हैं। एक जमाना था इराक में शिक्षित मध्यवर्ग की मध्यपूर्व के देशों में सबसे बड़ी शिक्षित आबादी थी आज इराक का मध्यवर्ग पूरी नष्ट हो गया है। इराकी औरतों को अमेरिकियों की तरफ से जबर्दस्ती वेश्यावृत्ति के धंधे में ठेला जा रहा है। इराकी बच्चों को बाल मजदूरों के काम में ठेलकर भयानक शोषण किया जा रहा है। इराक में युद्ध से मरने वालों की संख्या चौंकाने वाली है। इतनी बड़ी मात्रा में हिटलर ने भी जर्मनी में यहूदियों को नहीं मारा था। जिन लोगों का हिटलर के हत्याकांड और जनसंहार को देखकर खून खौलता है उनका खून इराकियों की मौत पर ठंड़ा क्यों है ? वे इसका प्रतिवाद क्यों नहीं करते ?

अमेरिका ने 2003 में जब दोबारा हमला किया था उस समय इराक में 20 प्रतिशत जनता स्लम में रहती थी इसकी संख्या 2010 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गयी है। संयुक्तराष्ट्र संघ की "विश्व के शहर 2010-11ठ नामक रिपोर्ट में बताया है कि इराक की जनता का 53प्रतिशत हिस्सा आज स्लम में रहता है। यानी इन लोगों के पास जीने की न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं जैसे-पानी,शौचालय,सफाई आदि का अभाव है। शिक्षा और स्वास्थ्य का समूचा ढ़ांचा पूरी तरह तबाह हो गया है। सन् 2007 तक 28 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार थे। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 35फीसदी बच्चे (पचास लाख) अनाथ हो चुके हैं। एक पूरी पीढ़ी है जिसके अभिभावक मारे जा चुके या गायब हो गए हैं।

अमेरिका के साढ़े चार हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं,30हजार से ज्यादा जख्मी हुए हैं और हजारों सैनिकों को गंभीर मनो-व्याधियों ने घेर लिया है। तकरीबन 4ट्रिलियन डॉलर इराक-अफगान युद्ध पर खर्च हुआ है और 16 बिलियन डॉलर से ज्यादा की संपत्ति लूटी गई है।

यूनेस्को रिपोर्ट " एजूकेशन अंडर अटैक 2010-इराक" ( 10फरवरी 2010) में जो आंकड़े दिए गए हैं वे दिल दहला देने वाले हैं। ये आंकड़े 2005 के हैं इनके अनुसार इराक में 2003 में अमेरिकी हमले के बाद उच्चशिक्षा के 80प्रतिशत संस्थान यानी कॉलेज-विश्वविद्यालय आदि की इमारतें नष्ट कर दी गयीं। उन्हें जलाया गया या लूटा गया। 25 फीसद से ज्यादा स्कूलों को ध्वस्त कर दिया गया।अकेले मार्च 2003 में इराक के 700प्राथमिक स्कूलों पर बमबारी की गयी।200 स्कूल जलाए गए और 3000 स्कूलों को लूटा गया।बगदाद में शिक्षकों की संख्या 80 फीसद कम हो गयी। सन् 2003 से लेकर 2008 के बीच में इराक में शिक्षा संस्थाओं पर हिंसक हमले की 31,598 वारदातें दर्ज की गयीं।बडे पैमाने पर अकादमिशियनों की हत्याएं की गयीं। मसलन् सन् 2003 में 16 अकामिशियन मारे गए,2004 में 36,2005 में 65,2006 में 113,2007 में 63, 2008 में 19, और 15 अकटूबर 2010 में 16अकादमीशियनों की अमेरिकी सैनिकों के हाथों हत्या हुई है।

इसी तरह मीडियाकर्मियों की बड़े पैमाने पर हत्या की गयी है। मसलन् 2003 में 26 ( इनमें 6इराकी) मीडियाकर्मी मारे गए,2004 में 59 (इनमें 53 इराकी),2005 में 59(इनमें 58 इराकी),2006 में 90 (इनमें 88 इराकी),2007 में 82 (इनमें 81 इराकी),2008 में 19(इनमें 19 इराकी),2009 में 8(इनमें आठों इराकी) और 2010 में 15 अक्टूबर तक 12 इराकी मीडियाकर्मियों की हत्या की गयी। इसके अमेरिकी सेना ने सैंकड़ों विदेशीपत्रकारों को इराक छोड़कर जाने के लिए बाध्य किया।

इराक पर अमेरिकी हमले का एक अन्य आयाम में बड़े पैमाने पर मध्यवर्ग का सफाया। बड़ी संख्या में विभिन्न पेशवर समुदाय के लोगों को देश छोड़ने और शरणार्थी के रूप में बाहर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा इराकी जनता की सबसे मूल्यवान संपदा थी प्राचीनकालीन पुरातात्विक महत्व की चीजें, इन चीजों के जरिए इराक के सांस्कृतिक वैभव की अनुभूतियां पैदा होती थीं । अमेरिकी सेनाओं ने इस संपदा को खुलेआम लूटा।

" इराकी फ्रीडम" के नाम से चलाए अभियान के तहत बगदाद के राष्ट्रीय संग्रहालय को लूटा गया। 12000 से ज्यादा पुरातात्विक महत्व के स्थानों को लूटा गया। मेसोपोटामिया की पन्द्रह हजार अमूल्य चीजों को लूटा गया।

उल्लेखनीय है इराक पर 1991 में अमेरिका ने "डिजर्ट स्टॉर्म" नाम से हमला किया और 13 सालों तक आर्थिक प्रतिबंध लगाया वह सीधे जनता के मानवाधिकारों का हनन था। इससे पूरा देश तबाह हो गया। कालान्तर में सन् 2003 में फिर हमला किया देश पर कब्जा किया और आर्थिक पाबंदियां लगाईं। ये सारी चीजें मानवाधिकार हनन के दायरे में आती हैं।

मानवाधिकारों पर विचार करते समय यह तथ्य हमेशा ध्यान रहे कि मानवाधिकार सार्वभौम और स्थानीय दोनों एक ही साथ होते हैं। कोई भी सार्वभौम अधिकार ,स्थानीय सांस्कृतिक –राजनीतिक भौतिक आधार के बिना अपना विकास नहीं कर सकता। बुनियादी तौर पर देखें तो कोई भी अधिकार सार्वभौम नहीं होता। स्थानीय सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भ के बिना कोई भी अधिकार पैदा नहीं होता। प्रत्येक देश का अपना परिप्रेक्ष्य है और उसके संदर्भ में मानवाधिकारों के विकास की प्रक्रिया को देखा जाना चाहिए। अनेक समाज ऐसे हैं जहां पर मानवाधिकारों का संबंध व्यक्ति के अधिकारों से है तो अनेक समाजों में व्यक्ति के अधिकारों की बजाय सामुदायिकता के संदर्भ में मानवाधिकारों की व्याख्या की जाती है। भारत के आदिवासी इलाकों और अफ्रीकी देशों में सामुदायिकता के आधार पर मानवाधिकारों को देखा जाता है। इनदिनों दलित समूहों में यही चेतना नजर आ रही है। वे सामुदायिकता के आधार पर मानवाधिकारों को परिभाषित कर रहे हैं। इसी तरह अनेक लोग हैं जो लिंग के आधार पर स्त्री के मानवाधिकारों को परिभाषित कर रहे हैं। समुदाय के आधार पर जो लोग मानवाधिकारों को परिभाषित करते हैं उनके यहां व्यक्ति और समुदाय के अन्तर्विरोधों को आधुनिक न्याय के आधार पर हल नहीं किया जाता बल्कि अपने निजी कानूनों के आधार पर हल किया जाता है। इसी तरह मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणापत्र को जब पेश किया गया था तो उस समय तक अनेक विकासशील देशों में औपनिवेशिक शासन था अतः तीसरी दुनिया के देशों में मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर पश्चिमी पूंजीवादी देशों को इन देशों में हस्तक्षेप का लाइसेंस मिला हुआ था। लेकिन आज स्थिति बदल गयी है। इसके बाबजूद पश्चिमी पूंजीवादी मुल्क अपनी सत्ता और लूट के विस्तार के लिए तीसरी दुनिया के देशों में मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर आए दिन राजनीतिक-सैन्य हस्तक्षेप करते रहते हैं। जो वस्तुतः संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

पश्चिमी देशों में सार्वभौमत्व को प्रविलेज के रूप में देखा जाता है और इसी आधार पर वे इसका दुरूपयोग भी करते हैं। अनेक ऐसे भी लोग हैं जो आस्था के आधार पर मानवाधिकारों की व्याख्या करते हैं। इनका मानना है कि आस्था को मानवाधिकार में शामिल किया जाए। ईश्वर की वैधता को इसके दायरे में रखकर देखा जाए। जबकि सच यह है कि सार्वभौम मानवाधिकारों की सूची में ईश्वर की वैधता को शामिल नहीं किया गया है। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषाणा और धर्मविशेष के अधिकारों के बीच अंतर्विरोध है और इस अंतर्विरोध को जानबूझकर मूल मसौदे से निकाल दिया गया ,जबकि आरंभिक मसौदे में आस्था को शामिल किया गया था। मूल रूप से मानवाधिकार और धार्मिक परिप्रेक्ष्य के बीच सीधा अंतर्विरोध है।




























रविवार, 24 जून 2012

सीमेंट के कार्टेल कारोबारियों पर 6,300 करोड़ का जुर्माना


भारत में नव्य आर्थिक उदार नीतियों के गंभीर दुष्परिणाम आने लगे हैं। बाजार की चालक शक्तियों के कामकाज में सरकार की हस्तक्षेप न करने की नीति का यह परिणाम निकला है कि अब एक ही क्षेत्र में व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां आपस मिलकर समूह या कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं। इस तरह का कारोबार एकाधिकार विरोधी भारतीय कानूनों की नजर में अवैध है। लेकिन बड़े पूंजीपतियों का कार्टेल बनाकर कारोबार करना जारी है। इसके जरिए वे अवैध ढ़ंग से आम उपभोक्ता से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। कायदे से कार्टेल बनाकर काम करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोंकने के साथ दंड़ स्वरूप उनके कारोबार को बंद कर दिए जाने का कानूनी प्रावधान होना चाहिए।

भारत की यह ठोस वास्तविकता है कि यहां इजारेदारी एवं एकाधिकार विरोधी कानून हैं इन पर निगरानी और दंड देने वाली न्यायिक व्यवस्था भी है इसके बावजूद एकाधिकार के विस्तार को रोकने में सरकार और कानून असफल रहे हैं। हाल ही में सीमेंट कंपनियों का कार्टेल बनाकर व्यापार करने का मामला सामने आया है।जिसके तहत कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11 सीमेंट कंपनियों के ऊपर 6,300 करोड़ रूपये का जुर्माना किया है। इनमें प्रमुख हैं-एसीसी,अंबुजा सीमेंट,अल्ट्राटेक सीमेंट और श्री आदि ।

उल्लेखनीय है मई-जून में पिछले साल जितनी सीमेंट बिकी थी उससे 14 फीसदी ज्यादा सीमेंट इस साल बिकी है। इस साल 16.26 मिलियन टन सीमेंट की खपत दर्ज की गयी है। जबकि विगत वर्ष इस अवधि में 14.20 मिलियन टन सीमेंट की बिक्री हुई थी। यह भी देखा गया है कि राष्ट्रीयस्तर पर सीमेंट के उपभोग की प्रकृति में बुनियादी तौर पर परिवर्तन आया है। सीमेंट के सकल उत्पादन का मई महिने में 79फीसद उपभोग किया गया जबकि इसी अवधि में पिछले साल मात्र 76 फीसदी अंश का ही उपभोग हो पाया था। सीमेंट की सबसे ज्यादा खपत आंध्र, कर्नाटक,केरल ,तमिलनाडु ,दिल्ली,उत्तराखंड,हरियाणा,पंजाब,राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में दर्ज की गयी।

जिन 11 सीमेंट कंपनियों पर कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने जुर्माना ठोका है वे कई सालों से निर्बाध ढ़ंग से कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं। कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने इन कंपनियों को विगत 3 सालों में कमाए मुनाफे में से आठ फीसद अंश जुर्माने के तौर पर तुरंत जमा करने का आदेश दिया है। कमीशन ने अपने फैसले में कहा है ये सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर काम करती रही हैं जोकि कानूनन जुर्म है। साथ ही इन कंपनियों ने सीमेंट का उत्पादन घटाया है और मनमाने दाम बढ़ाए हैं। फैसले में कहा गया है कि इस अवधि के दौरान सीमेंट की मांग घटी है। मांग घटने की स्थिति में सीमेंट के दाम में गिरावट आनी चाहिए लेकिन हुआ है उलटा। बाजार में सीमेंट की मांग घटने बावजूद सीमेंट के दाम बढ़ाए गए।

कमीशन ने सन् 2011 में की गयी जांच के दौरान पाया कि सन् 2008-10 के दौरान एसीसी सीमेंट ने 8,150करोड़ रूपये का कारोबार किया ,इस पर आठ फीसद जुर्माना 652करोड़ रूपये बैठता है। अंबुजा सीमेंट ने 6,896 करोड़ रूपये का कारोबार किया जिसके आधार पर 552 करोड़ रूपये जुर्माना देने और इसी तरह अल्ट्राटेक सीमेंट ने 9,142करोड़ रूपये का कारोबार किया है और उसे 731करोड़ रूपये का जुर्माना देने आदेश दिया है। उल्लेखनीय है आदित्य बिड़ला ग्रुप ने सन् 2010 में अपने सीमेंट व्यापार को अल्टाटेक में समाहित कर दिया था। इसके अलावा लघु सीमेंट उत्पादक कंपनियों पर कम जुर्माना लगाया गया है। कमीशन ने अपनी जांच में पाया कि 39प्रतिशत सीमेंट निर्माताओं ने मिलकर कार्टेल बनाया है।

भारत में सीमेंट के 183 बड़े और 360 छोटे प्लांट हैं। इनमें तकरीबन 40 प्लांट की उत्पादन क्षमता 330 मिलियन टन है। यह सकल सीमेंट उत्पादन का 97 प्रतिशत है। कमीशन के अनुसार सीमेंट उद्योग का सकल राष्ट्रीय कारोबार 37,500 करोड़ रूपये का है।

उल्लेखनीय है सन् 1989 में सीमेंट को वि-नियंत्रित किया गया और सन् 1991 में इन कंपनियों ने कार्टेल बनाकर काम आरंभ किया । सन् 2007 में सबसे पहले मोनोपॉली एंड रिस्ट्रक्टिव ट्रेड प्रैक्टिस कमीशन (एमआरटीपीसी) ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि सीमेंट कंपनियां कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं और अपने एक फैसले में उस समय उसने सभी सीमेंट निर्माता कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने के लिए दोषी करार दिया था। इस फैसले के आने के आने के बाद से केन्द्र सरकार ने कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे सीमेंट कंपनियों को कार्टेल बनाकर काम करने से रोका जाए।

हाल ही में कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11सीमेंट कंपनियों के खिलाफ जो फैसला दिया है उसके खिलाफ ये कंपनियां कंपटीशन एप्लीटेड ट्रिब्यूनल में जल्द ही अपील करेंगी।

उल्लेखनीय है इन कंपनियों के खिलाफ विगत एक साल से जांच चल रही थी। एक विश्लेषक के अनुसार जिन 11कंपनियों पर तीन साल के कारोबार के आधार जुर्माना लगाया गया है वह इन कंपनियों के कुल मुनाफे का 40 प्रतिशत बैठता है। इससे सीमेंट क्षेत्र में नकारात्मक संकेत जाने का खतरा भी है और ऐसी स्थिति में सीमेंट उद्योग में मंदी के आने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं ,जबसे सीमेंट कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोका गया है तब से सीमेंट कंपनियों के शेयरों में 15 प्रतिशत तक की गिरावट आयी है।





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रविवार, 17 जून 2012

साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं

आलोचक अशोक वाजपेयी को यह इलहाम हुआ है कि हिन्दी की गोष्ठियों में घिसापिटापन होता है। सवाल यह है कि उस घिसेपिटेपन से बचने के लिए हिन्दी के प्रायोजकों और गुटबाज लेखकों ने क्या किया ?पहले अशोक वाजपेयी की महान खोज पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा है-

"हम सभी इसके दोषी हैं। हिंदी जगत में हर महीने गोष्ठियां, परिसंवाद आदि होते हैं। हम ही उन्हें आयोजित करते हैं, हम ही उनमें कष्ट उठाकर यात्रा की दिक्कतें झेलते हुए भाग लेते हैं। हम ही उनसे खीझते-ऊबते हैं। हम ही उनकी निरर्थकता या अप्रासंगिकता को हर बार खासे तीखेपन से महसूस करते हैं। इस सबके बावजूद हम ही उनकी प्रतीक्षा करते हैं; उनके लिए सलाह देते हैं; फिर उनमें हिस्सेदारी करते हैं। बहुत सारे शहरों या संस्थाओं में ऐसे सेमिनार वहां होने वाली एकमात्र सार्वजनिक गतिविधियां, साहित्य को लेकर, होती हैं। वे भी न हों तो वहां साहित्यिक माहौल में सन्नाटा छाया रहे। इसलिए उनका कुछ औचित्य, कुछ आधार बनता है।"

साहब ,आप महान हैं ,पहले घिसेपिटे कार्यक्रम में जाते हैं, उनसे ऊबते हैं।उनकी प्रतीक्षा करते हैं और फिर उसका श्राद्ध करते हैं और अंत में औचित्य भी समझा रहे हैं ! घिसेपिटेपन का साहित्य और जीवन में कोई औचित्य नहीं है और न प्रासंगिकता ही है। घिसेपिटेपन की प्रासंगिकता उनके लिए है जो साहित्य में अप्रासंगिक हो चुके हैं। वे ही इन कार्यक्रमों की शोभा भी बढ़ते हैं। वैसे जंगल में जिस तरह घास बिना किसी प्रयास के पैदा होती है। साहित्य में घिसापिटापन भी वैसे ही पैदा होता है।

अशोकजी विद्वानलेखक हैं तो जानते भी हैं कि साहित्य में चुक जाने की अवस्था में घिसापिटापन पैदा होता है। अशोकजी ने लिखा है " दरअसल, हिंदी में बहस की इतनी कम जगह है और इतनी कमी है कि ऐसे आयोजन वाद-विवाद-संवाद के मंच बनते हैं।" जी नहीं जनाब, आप जैसे सुधीजन मंचों से लेकर पत्रिकाओं तक इस कदर छाए हैं कि गंभीर बहस संभव ही नहीं है। आपकी पूरी भक्तमंडली है और वह साहित्य में "साहित्य की जय जय हो "का कीर्तन करती रहती है।

अशोकजी आप जानते हैं कि "साहित्य की जय जय हो " से साहित्य में नए का जन्म नहीं होता बल्कि जिस घिसेपिटेपन से आप क्षुब्ध-मुग्ध हैं वह तो इसकी ही देन है। साहित्य में नए विषयों की बहसों को किसने बाधित किया है?हिन्दी में अशोक वाजपेयी-नामवर सिंह ने नए विषयों पर अघोषित ढ़ंग से आत्म-सेंसरशिप लगायी हुई है।कौन है जो आप लोगों को रोक रहा है नए विषयों को उठाने से ? साहित्य की सत्ता को घिसापिटा बनाने में किसकी भूमिका है यह आप भी जानते हैं और आपके भक्त भी जानते हैं।

सत्ता के पदों से लेकर किताब की खरीद के फैसलों तक, गोष्ठियों से लेकर साहित्य की कॉकटेल पार्टियों तक कौन लोग हैं जो गुलछर्रे उड़ा रहे हैं ? अशोकजी का मानना है कि "ऐसे परिसंवादों में उपजने वाली ऊब का एक बड़ा कारण उसमें व्याप्त वाग्विस्तार और वाग्स्फीति हैं।" यह प्रधान नहीं गौण कारण है। प्रधान कारण है मंचस्थ हिन्दी के महान वक्ताओं में नए विषय की नई समझ,अंतर्वस्तु का अभाव और पेशेवर कौशल का अभाव।जब घटिया कारीगर से कोई वस्तु बनवाएंगे तो उसकी श्रेष्ठ कारीगर द्वारा निर्मित वस्तु से तुलना नहीं हो सकती। हमने हिंदी में पेशेवर लेखक-आलोचक कम पैदा किए हैं उसका ही दुष्परिणाम है कि आज गोष्ठियों के घिसेपिटेपन का जादू सिर पर चढ़कर बोल रहा है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...