बुधवार, 28 नवंबर 2012

मैत्रेयी पुष्पा के बहाने स्त्री आत्मकथा के पद्धतिशास्त्र की तलाश


आत्मकथा में सब कुछ सत्य नहीं होता बल्कि इसमें कल्पना की भी भूमिका होती है। आत्मकथा या साहित्य में लेखक का 'मैं' बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह 'बहुआयामी होता है। उसी तरह लेखिका की आत्मकथा में 'मैं' का एक ही रूप नहीं होता। बल्कि बहुआयामी 'मैं' होता है। 

मैत्रेयी पुष्पा के पास एक लेखिका का 'मैं' है। साथ ही एकयुवा छात्रा,बिंदास युवती, परंपरागत पत्नी और माँ का भी 'मैं' है। आमतौर पर हिन्दी में लेखक के 'मै' पर जब भी बातें हुई हैं तो उसके एकल रूप की चर्चा हुई हैं। खासकर छायावादी लेखकों के संदर्भ में जो बहस चली है वह लेखक के एकल 'मैं' पर केन्द्रित है। रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सबके नजरिए में छायावाद के लेखक का एकल 'मैं' है।यह 'मैं' के प्रति असंपूर्ण नजरिया है। इसके कारण एकल 'मैं' की स्टीरियोटाइप समझ बनी है। 'मैं' महज भावों की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उसकी अस्मिता की भी अभिव्यक्ति है। इसमें व्यक्ति और समाज, समुदाय और व्यक्ति, लिंग और साहित्य घुले-मिले होते हैं। इसी तरह एक ही पाठ में लेखिका की जेण्डर पहचान के अंदर अनेक अस्मिताएं होती हैं जिनसे अस्मिता का उप-पाठ बनता है।

'मैं' के बहुआयामी रूपों को खोलने से उसके विभिन्न स्थितियों में विभिन्न भाव नजर आएंगे। मसलन् मैत्रेयी पुष्पा के छात्रा के रूप में जो 'मैं ' है उसमें मातहत भाव नहीं है। लेकिन पत्नी रूप में मातहत भाव है। छात्रा के अंतर्विरोध और पत्नी के सामाजिक अंतर्विरोध अलग किस्म के हैं। यानी आत्मकथा या साहित्य पढ़ते समय हमें व्यक्ति के अंदर व्यक्ति की खोज करनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति में एक नहीं अनेक व्यक्ति होते हैं।

मैत्रेयी पुष्पा ने पत्नी भाव के बारे में लिखा है " मगर पत्नी की भूमिका। एक पतिव्रता!पति को क्या चाहिए,यह भी जानती थी। मन से ज्यादा तन का समर्पण और उसकी मौन आवृत्ति,कम नहीं,ज्यादा से ज्यादा करनी होती है। इसमें छल छद्म के लिए जगह नहीं। जैसे विवाहित जीवन की यही कसौटी हो । मैं संयत सन्तुलित सी स्त्री, जिसके लिए यह समय सन्तोष और आनन्दभरा था, क्योंकि देह-उत्तेजना अभी आदत में शुमार नहीं हुई थी। डॉक्टर साहब के लिए प्रेम का ,आकर्षण का, दाम्पत्य का और स्त्री –पुरूष के मानसिक और शारीरिक सम्बन्ध का अर्थ एक ही है। नहीं तो उनके गुस्से का उबाल ऐसा क्यों होता कि देह का द्वव विष हो जाए।'[1] यह एक मातहत 'मैं' है।जिसकी कल्पना स्वयं लेखिका कर रही है।पत्नी की अवस्था से भिन्न अवस्था में एक स्त्री के नाते जब सोचती हैं तो उसका 'मैं' कुछ और सोचता है। लिखा है, " बस ये लोग नहीं समझना चाहते कि बन्धन मुझे रास नहीं आते। बन्धनों में मैं छटपटाने लगती हूँ।"

आरंभ में लेखिका जी रही है पत्नी के रूप में और जीना चाहती है एक स्त्री के रूप में, और यहीं पर उसके अंदर छिपे कई 'मैं' सामने आते हैं। कहने का आशय यह है कि लेखिका की आत्मकथा पढ़ते हुए उसके अंदर छिपे विभिन्न किस्म के 'मैं' की तलाश की जानी चाहिए। प्रत्येक 'मैं' का संबंध भिन्न किस्म के विचारधारात्मक विमर्श के साथ है। प्रत्येक 'मैं' का समाज और नैतिकता के साथ भिन्न किस्म का संबंध है।

लेखिका का पार्टी में नाचना या डाक्टर सिद्धार्थ के साथ हंसकर बातें करना,पति के साथ बातें करना ये दो भिन्न किस्म की नैतिकता को सामने लाते हैं। व्यक्ति एक है, लेकिन उसके 'मैं' का समाज और नैतिकता से अलग किस्म का रिश्ता है।यहां नैतिकता के आधार पर भिन्न किस्म की अस्मिता भी बन रही है।खास किस्म की व्यक्तिगत अस्मिता भी बन रही है। इस क्रम में विभिन्न किस्म की अस्मिता, उनके साथ जुड़ी नैतिक मान्यताओं और सामाजिक संस्थानों की भूमिका की ओर भी लेखिका ने ध्यान खींचा है। यानी मैं,अस्मिता और नैतिकता का एक मूल्य त्रिकोण बनता है जो लगातार यह संदेश देता है कि अस्मिता के निर्माण में नैतिकता एक तरह से एजेण्ट की भूमिका अदा करती है। लेकिन इस नैतिक एजेण्ट को उसके ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ के बिना समझना संभव नहीं है।

नैतिक एजेण्ट के ऊपर मैत्रेयी के यहां उनकी निजी इच्छाएं प्रबल हैं। वह नैतिकता के सवालों से इच्छा के आधार पर खड़े होकर चुनौती देती है। इस प्रसंग में वे अंश बेहद सुंदर हैं जहां पर लेखिका मन ही मन अपनी बात कहती है। लेखिका का इस प्रसंग में आत्मालाप बहुत ही महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। इस तरह के चित्रण के बहाने लेखिका ने पुंसवादी मूल्यों और नैतिक मान्यताओं को सीधे चुनौती दी है। स्त्री की चुनौतियों को दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला ,उसके आत्मकथन और आत्मालाप, दूसरा , इच्छा व्यक्त करने या उसके आधार पर एक्शन में। स्त्री के एक्शन उसके प्रतिवादी रूप को व्यक्त करते हैं। मसलन् मैत्रेयी का अचानक डा. सिद्धार्थ के साथ नाचना स्वयं में पुंसवाद के खिलाफ प्रतिवाद है। इस प्रतिवाद या नाचने के दौरान लेखिका के मन में क्या घटा वह पढ़ें ,लिखा है ,

' डॉक्टर सिद्धार्थ!

मेरा हाथ पकड़कर उठाते हुए।पता नहीं कितना अपनत्व था,कितनी चुनौती थी ?

या परीक्षाकाल दोनों का ?

हाथ पकड़कर खींचनेवाला मीत... मैंने अनुमति के लिए पति की ओर देखा नहीं। अपना निर्णय अपने हाथ में ले लिया, खतरों के बारे में सोचा नहीं।

मैं नाच रही थी किसी के साथ-साथ, अनगढ़ और आदिम सा नाच...जैसे मेरे जीवन मूल्यों का हिस्सा यह भी हो। जब-जब मेरा पाँव डा.सिद्धार्थ के पाँव पर पड़ जाता, वे मुस्कराकर मुझे सँभाल लेते। यह परिचय का अगला चरण,उस जानकारी का मुझे कोई इल्म न था।"

मैत्रेयी पुष्पा ने जब डा.सिद्धार्थ के साथ नाचने के लिए कदम उठा दिए तो वे अपनी ज्ञानात्मक संवेदना,जिसमें पति रहता है,का अतिक्रमण करती हुई समाजशास्त्र में प्रवेश कर रही थीं और एक नए किस्म के सामाजिक विवाद को जन्म दे रही थीं, साथ ही अपने को भी नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रही थीं। यहां पर उनकी निजी अस्मिता दांव पर लगी थी। इस क्रम में वह जहां अपनी पत्नी की अस्मिता के बने-बनाए साँचे को तोड़ रही थीं और अपने पति के मन में संशय पैदा कर रही थीं. टकरावों को जन्म दे रही थीं दूसरी ओर वे नैतिकता के प्रचलित मानकों को भी तोड़ रही थीं। ये दोनों क्रियाएं लेखिका के जीवन में नैतिकता की प्रगतिशील निरंतरता को बनाने में मदद कर रही थीं। इस क्रम में लेखिका के लिए मूल्यवान था उनका मन संतोष और इच्छा की संतुष्टि। उन्हें यह चिन्ता ही नहीं थी कि 'अन्य' क्या सोच रहे हैं ? उनके पति क्या सोच रहे हैं?

लेखिका के मन में नाचने के बाद किस तरह मानसिक तूफान उठा था इसका सुंदर चित्रण किया है। लिखा है ' जो लोग इलजाम लगा रहे हैं , उन्हें जाकर बता दो कि शादी के बाद मुझे मेरे हिसाब से कारावास मिला है,जिसके लौह-कपाट मैं तभी से तोड़ने में लगी हूं और देखना चाहती हूँ कि इस दुनिया के अलावा भी कोई दुनिया है ? पति के अलावा कितने लोग हैं बाहर ? वैसे पति से बैर भाव नहीं पाला ,मगर उनके किसी खूँटे से बँधना ? ... मैं भी अपने अन्दर भावनाएँ रखती हूँ,जैसे कोई गुप्त प्यार को बचा ले। नाचने की स्मृति मेरे साथ रहेगी।'

यहां पर मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी वैयक्तिकता को केन्द्र में रखकर नैतिकता को चुनौती दी है साथ ही आत्म-नजरिए से वे चीजों को नई व्याख्या दे रही हैं। वे जब नैतिकता को चुनौती दे रही हैं तो वे यह भी रेखांकित कर रही हैं कि नैतिकता के जो रूप प्रचलन में हैं खासकर स्त्री के संदर्भ में, वे स्त्री के मन या इच्छा को नहीं देखते। नैतिकता की सारी कसौटियां स्त्री के मन या इच्छा को बाहर रखकर तय की गयी हैं। यह असल में स्त्री का गतिशील 'मैं' है। इस गतिशील 'मैं' के आधार पर जब कोई व्यक्ति सोचता है तो वह जहां एक ओर आत्म और उससे जुड़ी नैतिकता को पुनर्परिभाषित करता है वहीं दूसरी ओर व्यक्ति को एक नैतिक मनुष्य के रूप में देखने की स्थितियों को भी चुनौती देता है और स्त्री के लिए वैकल्पिक नैतिकता की तलाश आरंभ कर देता है।

मैत्रेयी पुष्पा यह भी रेखांकित करती है कि मेरी पहचान को उन चीजों के आधार पर परिभाषित किया जाए जो मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। यानी स्त्री की अस्मिता को स्त्री के लिए जो मूल्यवान है उसके आधार पर परिभाषित किया जाए। इस क्रम में स्त्री की भाषा रचती है और उसके जरिए स्त्री की पहचान को निर्मित करती हैं। मैत्रेयी जब अपने आत्म को परिभाषित करती हैं तो वे अपने आसपास के वातावरण और संबंधियों-मित्रों आदि के संदर्भ में परिभाषित करने की कोशिश करती हैं।

आत्म को उसके आसपास के वातावरण के संदर्भ में ही परिभाषित किया जा सकता है। इस क्रम में वे बताती हैं कि वे क्या हैं ? किस धरातल पर खड़ी होकर बोल रही हैं ? परिवार में कौन-कौन हैं ?किस तरह के सामाजिक वातावरण में जी रही हैं ? वह सामाजिक भूगोल कैसा है जिसमें जी रही हैं।

जब भी कोई स्त्री अपनी आत्मकथा लिखती है तो वह निजी कथा के साथ स्त्री की सामाजिक कथा भी लिख रही होती है।फलतःआत्मकथा स्त्रियों की सामुदायिक व्यथा-कथा का रूप ग्रहण कर लेती है।

आत्मकथा में आए नैतिकता के एजेण्टों की सही ढ़ंग से पड़ताल करने की जरूरत है। स्त्रीचेतना के स्तर को जानने और उस पर नैतिकता के दबाबों को जानने में यह तथ्य खोजना चाहिए कि आखिरकार नैतिकता पर किससे संवाद हो रहा है अथवा किससे विचारधारात्मक संघर्ष चल रहा है। क्योंकि नैतिकता को उसके संवादियों को जाने बिना खोला नहीं जा सकता है। अनेक मर्तबा नैतिकता का स्वरूप आत्मालाप और आतामानुभूति में व्यक्त होता है। लेकिन अनेकबार नैतिकता की स्थितियां अन्य से संवाद करते हुए सामने आती हैं। खासकर ऐसे लोगों से बातें करते हुए सामने आती हैं जिनके सामाजिक-ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों को पाठक जानता है।

नैतिकता के प्रसंग में हमेशा यह तथ्य ध्यान रहे कि अंतर्मन में बैठे नैतिक मूल्य कभी तटस्थ नहीं होते। न वे तटस्थ भाव से मन में प्रवेश करते हैं और न तटस्थ रहने देते हैं। नैतिकता के दायरे और सरोकारों को सिर्फ सवालों के दायरे तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।बल्कि यह देखें कि नैतिकता के सामान्य लक्षण किस तरह व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इस प्रसंग में व्यक्ति को समग्रता में देखना चाहिए और उसके संदर्भ में ही उसके आत्म की परीक्षा की जानी चाहिए। यानी लेखिका को 'मैं' को समग्र के अंश के रूप में देखना चाहिए। समग्र से काटकर लेखिका के 'मैं' को देखने से चीजें साफ ढ़ंग से समझ में नहीं आतीं।यह समग्र जेण्डर और समुदाय दोनों से बना है।इसका अर्थ यह है कि साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय जब दलित या स्त्री आत्मकथा पर बात की जाय तो समुदाय,लिंग और जाति के आधार पर बातें की जाएं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो मौजूदा दौर समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंध के आधार पर पढ़ने या विश्लेषित करने की मांग करता है। हमारे आलोचकों ने अभी तक साहित्य और समुदाय के अंतस्संबंध पर सोचा ही नहीं है। वे तो साहित्य और वर्ग, साहित्य और समाज के आधार की ही चर्चा करते रहे हैं। यानी साहित्य और समुदाय का अन्तस्संबंध एक नए पैराडाइम को जन्म दे रहा है। इस पैराडाइम के लक्षणों की विस्तार में जाकर पड़ताल करने की जरूरत है।

स्त्री- आत्मकथाओं में नैतिकता के सवाल महत्वपूर्ण हैं। इनके बारे में हमें पद्धति और शास्त्र दोनों ही स्तरों पर स्पष्ट समझ से काम लेना होगा। नैतिकता के मानकों को दिखाकर आमतौर पर स्त्री को अधिकारहीन बनाने की कोशिश की जाती है और उसे सार्वजनिक जीवन में अपनी स्वायत्त जगह बनाने से रोका जाता है।

इस परिप्रेक्ष्य में मैत्रेयी पुष्पा की सामाजिक स्थितियों और उनके इर्दगिर्द बुने हुए नैतिक मानकों को देखा जाना चाहिए। नैतिकता के तानेबाने को समग्रता में देखते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है , ' बन्धन मुझे रास नहीं आते।बन्धनों में मैं छटपटाने लगती हूँ।' यह कमोवेश प्रत्येक भारतीय स्त्री की स्थिति है।

हिन्दीभाषी औरत कैसे जीती है और उसके चारों ओर किस तरह की घेराबंदी है , उसके अनेक चित्रों का विस्तृत विवरण मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा में दिया है। फलतः आत्मकथा में जेण्डर यानी लिंग और समुदाय की अवधारणा केन्द्र में चली आई है। अब आत्मकथा पढ़ते हुए आप एक लेखक की आत्मकथा नहीं पढ़ रहे बल्कि एक स्त्री और एक समुदाय का आख्यान पढ़ रहे हैं। आत्मकथा में एक स्त्री या एक दलित का प्रतिवाद या छटपटाहट या बेचैनी निजी होने के साथ साथ सामुदायिक भी है।

यानी रचना में एकाधिक प्रतिवादी इमेजों को हम पढ़ते हैं। ये दोनों चरित्र ( निजी चरित्र और सामुदायिक चरित्र) एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं। इसके कारण आत्मकथा में एक साथ अनेक आख्यान चलते रहते हैं। अतः इस तरह के प्रतिवादी चरित्रों को एक महाख्यान में बांधना संभव नहीं है। कहने के लिए यह एक औरत की कहानी है लेकिन इसमें अनेक चरित्र हैं जो इस कहानी के साथ समानांतर कहानियों को जन्म दे रहे हैं। इसके अलावा संस्कृति के भी एकाधिक रूप सामने आते हैं। एक संस्कृति वह है जिसे लेखिका स्वयं जीना चाहती है और दूसरी संस्कृति वह है जिसे समाज जीना चाहता है या जी रहा है। समाज जिस संस्कृति को जी रहा है वह लेखिका के लिए समस्याएं खड़ी कर रही है। स्त्री के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है। यही वजह है कि मैत्रेयी पुष्पा ने जगह-जगह बेहद चुटीली मुहावरेभरी भाषा का इस्तेमाल किया है। जैसे- 'स्त्रियों की छाती में थालियाँ छनछनाती हैं।' ,' कहते हैं कि पत्नी से बड़ा ' शॉक एब्जॉर्बर ' कोई नहीं होता।' ,' जो खुलकर हँसता है,उसे खुदा की जरूरत नहीं।', 'सूरत के साथ योग्यता न हो तो सुन्दरता अधूरी रहती है' आदि।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में चुटीले वाक्य आमतौर पर वहां पर आए हैं जहां पर लेखिका पुनर्व्याख्या की मांग करती है। नए सिरे से कोई बात कहना चाहती है या नई बात की ओर ध्यान खींचना चाहती है ,यह उसकी ध्यान खींचने की कला हैं। इस तरह वह यह भी बताने की कोशिश करती है कि हमारे पास एकाधिक 'स्व' या 'मैं' हैं। या यों भी कह सकते हैं कि एक से अधिक आत्माएं हैं। एकाधिक 'मैं' के अभाव में असल में आख्यान नहीं बनता। नाटकीय इमेजों की सृष्टि नहीं होती। या छद्म की सृष्टि नहीं होती। साहित्य की कलात्मक रणनीति का यह अन्तर्ग्रथित हिस्सा है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा की विशेषता यह है कि इसमें हिन्दी संस्कृति के तानेबाने को अतिवादी ढ़ंग से लेखिका खारिज नहीं करती बल्कि धीरे धीरे उसकी परत- दर-परत खोलती है। इससे संस्कृति की समझ बनती है और वे क्षेत्र उजागर होते हैं जहां कायदे से परिवर्तन की जंग को लड़ा जाना है। इसमें बड़ा क्षेत्र है पुंसवादी नजरिए का, और दूसरा है पुंसवादी व्यवस्था,संस्कार और आदतों का। इन दोनों क्षेत्रों की बारीकियों को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से लेखिका ने पेश किया है।

सवाल यह है कि आत्मकथा के विश्लेषण की पद्धति क्या हो ? क्या एक पद्धति से आत्मकथा समझ में आएगी ? आत्मकथा को एक पद्धति या शास्त्र या सिद्धांत से समझना संभव नहीं है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि स्त्री का लिंग तय है और हमारा समाज स्त्री को सामाजिक निर्मिति न मानकर ईश्वरप्रदत्त या प्राकृतिक देन मानकर चलता है। पहली आवश्यकता है कि स्त्री को ईश्वरप्रदत्त न मानें। स्त्री के बारे में बनाए सभी कानूनों, मान्यताओं और संस्कारों को अपरिवर्तनीय, स्वाभाविक ,अनिवार्य और अपरिहार्य न मानें। स्त्री की निर्मिति की सामाजिक प्रक्रियाओं पर नजर रखें, इन प्रक्रियाओं की जितनी गहरी समझ होगी। स्त्री के बारे में उतने ही बेहतर मूल्यांकन की संभावनाएं भी होगी। जिस तरह समाज बदलता रहता है उसी तरह स्त्री भी बदलती रहती है। स्त्री कैसे बदल रही है उस प्रक्रिया को सहृदयभाव से समझने और स्वीकार करने की जरूरत है। स्त्री को जड़ और अपरिवर्तनीय रूप में देखने के कारण ही हमारे आलोचक एक खास किस्म के स्टीरियोटाइप से आगे जाकर स्त्रियों की समस्याओं को समझने में असमर्थ रहे हैं।

स्त्री सामाजिक निर्मिति है और परिवर्तनशील अवस्था में रहती है। उसके रूपान्तरित रूप का एक छोर पाठ में होता है और दूसरा छोर पाठक के मन में या सामयिक समाज में होता है जो पाठक पढ़ते समय बनाता है। इस नजरिए से यदि स्त्री को देखें तो स्त्री का पाठ भी गतिशील और परिवर्तनीय होता है।

मसलन् स्त्री की नैतिक मान्यताओं के सवाल को ही लें। स्त्री की नैतिकता को सामयिक सरोकारों की रोशनी में बार- बार परिभाषित करने की आवश्यकता है।हमें यह भी देखना चाहिए कि सामाजिक सरोकारों या स्त्री के सरोकारों का सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र कितना व्यापक है या कितने बड़े क्षितिज को स्त्री घेरती है। स्त्री के नैतिक मूल्यों और मान्यताओं को परिभाषित करने वाले संस्थानों का चरित्र किस तरह का है ? इन संस्थानों का चरित्र ही अंततःस्त्री के निजी और सामाजिक चरित्र का गठन करता है। यदि संस्थानों का चरित्र पुंसवादी है तो तय है स्त्री की मान्यताओं-संस्कारों और सामाजिक अवस्था की स्थितियों का पुंसवादी विचारधारा और संस्थानों के साथ टकराव होगा। यही वजह है ज्योंही कोई स्त्री तयशुदा फ्रेमवर्क के बाहर आकर सोचने-समझने या व्यक्त करने की कोशिश करती है उस पर लांछन लगने शुरू हो जाते हैं। स्त्री के प्रति लांछनों की अभिव्यक्ति इस बात का संकेत है सामाजिक संस्थानों का चरित्र पुंसवादी है और असहिष्णु है। इस नजरिए से देखें तो स्त्री के सामने दोहरी चुनौती है, उसे पुंसवादी संस्थानों के दबाब से अपने लिंग की रक्षा करनी है वहीं दूसरी ओर अपने लिए छोटे छोटे कामों, इच्छाओं, धारणाओं और मान्यताओं की अभिव्यक्ति के लिए जगह भी निकालनी है।

इस क्रम में स्त्री का 'समग्र' और 'अंश' दोनों ही नए सिरे से निर्मित करने की जरूरत है। स्त्री अपनी आत्मकथाओं में पुंसवादी विचारधारा से निर्मित अपने चरित्र,स्वभाव,स्थितियों आदि का व्यापक चित्रण करते हुए उन पहलुओं को सामने लाती है जहां पर वह बदल रही है या प्रतिवाद करके वैकल्पिक परिस्थितियों की खोज कर रही है। विचार विमर्श के लिए यह बेहतर प्रस्थान बिंदु हो सकता है। यहीं से वह अपने चरित्र में बदलाव की प्रक्रियाओं को सामने लाती है।

मसलन् एक स्त्री अपनी आत्मकथा को कहते समय जब उन पहलुओं को सामने लाती है जो लकीर से हटकर हैं तो वह रूपान्तरण की ओर ध्यान खींचती है। स्त्री समीक्षा को कायदे से स्त्री के रूपान्तरण पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसी बिंदु से उसका भविष्य का संसार सामने आता है। यही वह बिंदु है जहां पर उसकी मौजूदा अस्मिता और संभावित अस्मिता में तनाव और अन्तर्विरोध के दर्शन होते हैं। साथ ही उस आख्यान को भी खोल सकते हैं जो उसके 'समग्र' और 'अंश' के बीच में विभिन्न स्तरों पर बिखरा पड़ा है।

स्त्री के संदर्भ में एक और तथ्य महत्वपूर्ण है,वह है 'समग्र' और 'अंश' के बीच के अन्तर्विरोध। स्त्री अपनी आत्मकथा में अपने 'समग्र' को पेश करते समय जिन अंशों को पेश करती है वे अंश उसके समग्र के अनुकूल कभी नहीं होते। इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि स्त्री अपने समग्र को रचते समय 'अंश' के जरिए समग्र पर सवालिया निशान लगाती है। 'अंश' के जरिए 'समग्र' को अपदस्थ करने की कोशिश करती है। स्त्री आत्मकथा में 'अंश' वस्तुतः 'समग्र' के विकल्प की तलाश में ही रचे जाते हैं और यही वजह है कि स्त्री आत्मकथा में 'समग्र' और उसके 'अंश' का अन्तर्विरोध हमेशा बना रहता है।

जबकि अब तक का रिवाज है कि 'समग्र' और 'अंश' में एकता की बात कही गयी है। 'समग्र' की संगति और परिप्रेक्ष्य में 'अंश' को पढ़ने की वकालत की गयी है। यह आलोचना का पुंसवादी नजरिया है जिसमें 'समग्र' और 'अंश' में एकता को अनिवार्य माना गया है।स्त्री के यहां 'समग्र' और 'अंश' में अन्तर्विरोध होते हैं। वह 'समग्र' का हमेशा प्रतिवाद करती है। अपनी बनी-बनायी इमेज को अस्वीकार करती है।अतः स्त्री के 'अंश' के परिप्रेक्ष्य में 'समग्र' पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। स्त्री की आत्मकथा में नरेटिव और स्त्री के जीवन की परिवर्तन प्रक्रिया का यह सच है कि उसके जीवन के छोटे-छोटे अंश पूरे चरित्र की इमेज को क्रमशः बदलते रहते हैं। यहां 'अंश' से 'समग्र' में आए परिवर्तनों को देखा जाना चाहिए। मसलन् मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का कोई एक 'अंश' देखें और समझने की कोशिश करें कि स्त्री की समग्र प्रचलित धारणा को नए अंश किस तरह बदलते हैं। अंश –दर- अंश बदलती औरत ही कालांतर में एकदम नई इमेज के साथ सामने आती है।

मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है, ' आज मैंने जापानी जॉरजट की सी-ग्रीन साड़ी निकाली,दिल्ली में यही फबेगी दो चोटियों के बदले एक चोटी गूँथी।पति को ऐसे मिली जैसे मैं पहले दिन से ही फैशन के रास्ते पर हूँ। मैं झाँसी की लड़की का झोला उतारकर ,जीवन के प्रबल प्रवाह को बाँधकर अपने व्यक्तित्व को सजावट के साधनों से आकर्षक बनाने पर तुलीगई,क्योंकि मान बैठी कि असली प्रेम विवाह के बाद होता है। प्रेमी,पति के सिवा कोई नहीं हो सकता। पत्नी यदि इसके अलावा किसी संवेग के दबाब में आती है तो पति को खोने में देर नहीं लगती। डॉ.शर्मा तो वैसे भी शर्महया वाली स्त्री को पसन्द करते हैं। वे सामाजिक प्रतिष्ठा, शिष्टाचार और सभ्यता के स्तंभ हैं। मैं आधुनिक होने के नशे में धुत, चाँदनी रात में उतर गई।हॉस्टल पर शुक्लपक्ष उतर रहा था और सफेदा के वृक्षों के लम्बे-लम्बे परदों के बीच जाड़े की रात पति की युवा बाँहों में मोहाविष्ट सी...' सचमुच सपनों का संसार मेरी राह देख रहा है'मैं सोच रही थी।पति को तन-मन से पाना है,जितना ही छोटा समय मिले। खुद को नादान दिखाते हुए या मूर्खता दिखाते हुए या कि उन्हें संभालते हुए, दुलराते और अपने भीतर उतारते हुए,किसी साहस दुस्साहस से गुजरकर भी। आज का दिन ,दिल्ली का दिन। हमारे प्रेम की आधुनिक शुरूआत का दिन न इसके पहले था न इसके बाद... मैं लहरों में उतरने के लिए तैयार,सम्मिलन की उत्ताल तरंगों की कल्पना कर रही हूँ। रात के दस बजे हैं। मैं पति की ओर बढ़ रही हूँ। मेरी खुशी का पारावार नहीं कि यहाँ छतों-छतों,छज्जे-छज्जों आने और खिड़कियोंसे झाँकनेवाला कोई नहीं। झाँककर बात उड़ानेवाला कोई नहीं,'प्रायवेसी' इसी का नाम है।

तभी दस्तक!'

इस पैराग्राफ में कई नई बातें हैं जिनके आधार पर स्त्री की पुरानी अस्मिता में से नई आधुनिक अस्मिता के अंश जन्म ले रहे हैं। परंपरागत औरत अपने पुराने कलेवर को छोड़ रही है और उसमें एक नए किस्म की, नई रूपसज्जा और नई मनोदशा की आधुनिक अनुभूतियों की तलाश करती औरत सामने आ रही है और यह प्रक्रिया आरंभ होती है औरत के सजने-संवरने से और वह तलाश कर रही है अपने लिए 'प्रायवेसी' ,यह एकदम नया बोध है। प्रायवेसी की धारणा के आने के साथ कहानी में यहां से एक नए पुरूष के प्रति आकर्षण का आरंभ भी दिखाई देता है और इस तरह एक औरत के मन में अन्य के प्रति अपील का जन्म भी होता है। दस्तक के बाद क्या होता है उसका बहुत सुंदर वर्णन किया है लेखिका ने। इस क्रम में लेखिका ने अपनी जिन अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया उनके विपरीत विलक्षण लेकिन सत्याभास व्यक्त करने में लेखिका को सफलता मिली है। इस तरह के असंख्य चित्र मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में बिखरे पड़े हैं। कहने का अर्थ यह है आत्मकथा में 'अंश' नए को सामने लाते हैं और इनसे एक नया व्यक्तित्व और मूल्यबोध भी सामने आता है। औरत इसी अर्थ में समग्रता के पैमाने से चीजें देखने का निषेध करती है। वह 'अंश' के आधार पर बनती-संवरती और बदलती है,समग्रता तो उसके विकास की बाधा है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में एक साथ दो अस्मिताएं प्रतिस्पर्धा करती नजर आती हैं। पहली अस्मिता है परंपरागत औरत की, दूसरी अस्मिता है आधुनिक औरत की। ये दोनों अपने ढ़ंग से एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं और संसार को बदलती हैं। इसे चाहें तो अस्मिताओं का संघर्ष भी कह सकते हैं। एक तरफ पुराने रूप ,स्वरूप,मूल्य और आदतें बनाए रखने का दबाव और दूसरी ओर पुराने से मुक्त होने की छटपटाहट। इस प्रतिस्पर्धा को समग्रता में देखेंगे तो लेखिका का पूरा व्यक्तित्व नजर आएगा। इस क्रम में मजेदार बात यह है कि प्रत्येक नई कहानी या नया उभरता रूप या जीवनक्षण स्वयं में संपूर्ण था। इस प्रक्रिया में लेखिका बार बार अपने हर कदम की व्याख्या भी करती जाती। इससे यह भी पता चलता है कि उसे अन्य की व्याख्या पर भरोसा नहीं है, वह अपने प्रत्येक कार्य-व्यापार को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना चाहती है।इस व्याख्या के बहाने अपने अंदर छिपे एकाधिक अस्मिता के रूपों को वह वैधता प्रदान करती है और पाठकों से भी यह मांग करती है कि वे भी एकाधिक अस्मिताओं को वैधता प्रदान करें। रोचक बात यह है कि मैत्रेयी अपनी एक इमेज को वैध ठहराते हुए दूसरी इमेज को भी वैध ठहराती है और इससे एकाधिक मैं की उनकी रचना में अभिव्यक्ति होती है।

आमतौर पर मर्द लेखकों में एक 'मैं 'होता है। वे उसके इर्दगिर्द ही तानाबाना बुनते हैं। लेकिन मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में एकाधिक मैं हैं और सभी मैं प्रतिस्पर्धा है, यहां 'आत्म' के उदघाटन के काम को लेखिका बड़ी शिद्दत के साथ संपन्न करती है। यह ऐसा 'स्व' है जो सतह पर देखने में सिलसिलेबार विकसित होता है लेकिन वास्तव अर्थ में ऐसा नहीं है। यहां स्त्री का सुनिश्चित 'स्व' सामने नहीं आता बल्कि रूपान्तरित होता 'स्व' सामने आता है। यहां परंपरागत 'स्व' और उदीयमान 'स्व' के बीच में तनाव साफ देखा जा सकता है। इस क्रम में लेखिका अपने परंपरागत 'स्व' को बचाने की चेष्टा नहीं करती बल्कि छोटे छोटे एक्शन के जरिए उसे तोड़ती है। यहां वह गुलामी और 'स्व' के बीच का अन्तर्विरोध भी विकसित करती है।

परंपरगत स्त्री वस्तुतः गुलाम औरत की इमेज है जिसके साथ उदीयमान स्त्री के 'स्व' का अन्तर्विरोध है। परंपरा औरत के साथ इतिहास जुड़ा है जबकि उदीयमान स्त्री की अस्मिता के साथ नया सामाजिक यथार्थ जुड़ा है। फलतः आत्मकथा में परंपरा और सामयिक यथार्थ का अन्तर्विरोध जन्म लेता है। परंपरागत औरत और नयी औरत के बीच के अन्तर्विरोध को अभिव्यक्ति तब मिलती है जब किसी खास समय लेखिका कोई एक्शन करती है। इस तरह आत्मकथा में परंपरा और समय के बीच अन्तर्विरोध(टाइम) विकसित होता है। लेखिका समय के साथ रहना पसंद करती है और परंपराओं से मुक्त करती चली जाती है। ये अन्तर्विरोध गुलामी और 'स्व' के बीच का भी है। इस क्रम में 'स्व' का विकास होता है और गुलामी का तानाबाना कमजोर होता चला जाता है।

मैत्रेयी पुष्पा ने ज्योंही परंपरागत स्त्री और नई स्त्री की अस्मिताओं के बीच की जंग या अन्तर्विरोधों को चित्रित किया त्योंही वह एक नई सामाजिक अस्मिता के उदय की ओर भी संकेत छोड़ती हैं। जब वे परंपरागत औरत को चित्रित करती हैं और उसके बरक्स रखकर आधुनिक 'स्व' को सामने लाती हैं तो 'स्व' में विभाजन नजर आता है। ऐसी स्थिति में परंपरागत औरत और 'स्व' में किसी भी किस्म का सामंजस्य बिठाना संभव नहीं दिखता।बल्कि विखंडित 'स्व' नजर आता है। इससे 'स्व' के दोहरे चरित्र के दर्शन भी होते हैं। वे अपने जीवन का लेखाजोखा पेश करते हुए बताती हैं कि सामाजिक संबंध, पति-पत्नी के संबंध, मित्रों और रिश्तेदारों के साथ संबंध किस तरह के होते हैं और वे किस तरह अपनी भूमिका अदा करते हैं। इस क्रम में वे गुलाम औरत के व्यापक अनुभव संसार को सामने लाती हैं।इस नजरिए से देखें तो वे आधुनिक स्त्री की गुलामी के विभिन्न चित्रों को उकेरने में सफल रही हैं। साथ ही अन्य किस्म के शोषण और दमन के रूपों को उदघाटित करने में भी उन्हें सफलता मिली है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में दोहरा जीवन,दोहरी अस्मिता, दुरंगे मूल्य,दुरंगे विचार,दोहरा सामाजिक जीवन आदि को बेपर्दा करती हैं। इस तरह वे दो मैं,दो अस्मिता,दो तरह का जीवन,दोहरी जिम्मेदारियां,दो तरह की चेतना, दो तरह के सामंजस्यहीन विचार और भावबोध को व्यक्त करने में सफल रही हैं। वे अपने जीवन में व्याप्त इस 'दो' को व्याख्या के जरिए बताती जाती हैं और उसके अनुभवों को ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ में पेश करती हैं।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा पढ़ते समय हमें आत्मकथा मॉडल के प्रारूप पर भी विचार करना चाहिए। स्त्री आत्मकथा में लेखिका को एकल चरित्र को रूप में देखते समय स्त्री के निर्माण के ऐतिहासिक-सामाजिक कारणों पर नजर जाती है। वहां पर उसके आख्यान के ऐतिहासिक कारणों को देख सकते हैं। जबकि स्व या आत्म या मैं को देखते समय उसके परंपरागरूप के साथ स्व के अंतर्विरोधों का उदघाटन होता है। परंपरागत स्त्री में एक सुनिश्चित औरत नजर आती है जो परंपरागत कामों में पंक्चुअल है।लेकिन जहां यह स्त्री पंक्चुअल नहीं है वहां पर वह नई दिशाओं में अभिव्यक्त करती नजर आती है। यहां पर यह औरत एक समुदाय की सदस्या के रूप में सामने आती है ,एक जेण्डर के रूप में सामने आती है। ऐसी औरत है जिसका कोई इतिहास नहीं है,वह पहचान के उन रूपों को एकसिरे से खारिज करती है जो नैतिकता के तानेबाने में जकड़े हुए हैं।यहीं पर स्त्री के एकाधिक 'मैं' या 'स्व' की अभिव्यंजना भी होती है। यह बहुरूपी स्व वस्तुतःमुक्ति की प्रक्रिया के प्रयासों, नए को अर्जित करने के संघर्ष में ही सामने आता है।इस प्रक्रिया का अन्य कोई विकल्प नहीं है।इस क्रम में यह तथ्य भी उजागर होता है कि स्व का एक ही किस्म का स्वभाव या ओरिएण्टेशन नहीं होता।

'स्व" का बहुरूपी चरित्र स्त्री आत्मकथा विधा की विशेषता है। इसका प्रधान कारण है स्त्री का परंपरगत रूप और जीवन एक सामान्य आख्यान देता है जिसमें स्त्री दासता के अनेक रूप अभिव्यक्त होते हैं। यह रूप सम्प्रति,नैतिक तौर पर अप्रासंगिक है। इस परंपरागत रूप के आधार पर स्त्री की परिवर्तित स्थितियों का अंदाजा लगाना संभव नहीं है। इस रूप की जटिलताओं और असफलताओं या अप्रासंगिकता को परंपरागत सिद्धान्तों के जरिए नहीं समझा जा सकता। स्त्री के गुलाम रूप और स्वतंत्र,स्वायत्त आधुनिक रूपों को समझने के लिए स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी के एकाधिक सिद्धान्तों की मदद लेने पर ही आत्मकथा खुलती है।




















[

सोमवार, 26 नवंबर 2012

ममता के हस्तक्षेप के इंतजार में 35 बंगाली मजदूर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कल तक उनको किसी भी बंगाली पर हमला होने,उसकी अवैध गिरफ्तारी पर गुस्सा आता था लेकिन इनदिनों वे बदली हुई सी लग रही हैं। ममता का बंगाली जाति के प्रति प्रेम निर्विवाद है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बंगाली जाति के प्रति बेरुखी बढ़ी है। उनकी बेरुखी की जड़ें हमारी राजनीतिक संस्कृति में हैं। भारत में इनदिनों जिस तरह की वोटबैंक संस्कृति पैदा हुई है उसमें आम जनता के प्रति बेगानापन और जातीय घृणा का बढ़ना स्वाभाविक बात है। 

वोटबैंक संस्कृति दलीय मोह पैदा करती है।भाषायी,धार्मिक और जातिवादी घृणा के जरिए अपना विस्तार करती है। यह राजनीति में नकारात्मक फिनोमिना है। इसके कारण सामाजिक विभाजन तेज होता है। मन में दरारें पैदा होती हैं। प्रशासनिक संरचनाएं इसकी गिरफ्त में जल्दी आती हैं। साथ ही वंचितों और हाशिए के लोगों से प्रशासन की दूरी बढ़ती है। अनुयायियों के प्रति प्रेम में इजाफा होता है। इसके अलावा अविश्वास और संशय में तेजी से वृद्धि होती है। उत्तर- पूर्व के राज्यों में यह बीमारी पहले आई बाद में इसने अन्य राज्यों में पैर पसारने आरंभ कर दिए । हाल ही में महाराष्ट्र में यह फिनोमिना जोरों पर है। वहां पर गैर-मराठियों के प्रति विद्वेष की राजनीति को जिस तरह स्थानीय दलों ने हवा दी है उससे महाराष्ट्र का पुलिस प्रशासन पूरी तरह प्रभावित है । भारत में बोले जानेवाली भाषाओं और बोलियों के बाशिंदों के प्रति संदेह और घृणा का भाव अंततः भारत की एकता और अखण्डता को नष्ट करता है साथ ही इससे भारत के संविधान का अपमान होता है।

भारत का संविधान सभी भारतवासियों को चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों,देश में कहीं पर भी आने-जाने, व्यवसाय करने और काम करने की आजादी देता है। हमारे संविधान में भाषा,धर्म और जाति के आधार पर किए गए भेदभाव को दण्डनीय अपराध माना गया है। इसके बावजूद भारत में आए दिन भेदभाव और उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। ये खबरें किसी भी देशभक्त को परेशान कर सकती हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के मौजूदा शासकों को ये चीजें कम परेशान कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो ममता सरकार का बंगालियों के प्रति जो बेगानापन बढ़ रहा है वह समझ में आएगा। ममता सरकार का राज्य की आम जनता और उसकी समस्याओं के प्रति सजग भावबोध तेजी से क्षीण हुआ है। राज्य की आम जनता पर पुलिस के हमले बढ़े हैं,साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है।

सत्तारूढ़ होने के पहले तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और बंगाली जाति से जुड़े हर सवाल पर सक्रिय थीं लेकिन इन दिनों वे और उनके अनुयायी एकसिरे से बंगालियों पर बढ़ रहे हमलों पर चुप रहते हैं।

हाल ही में माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने एक महत्वपूर्ण मसले की ओर ध्यान खींचा है। महाराष्ट्र में 35बंगालियों को बंगला बोलने के कारण पुलिस ने बंगलादेशी का आरोप लगाकर गिरफ्तार करके कैद किया हुआ है। जबकि ये सभी मजदूर हैं और पुरूलिया के रहने वाले हैं। आश्चर्य की बात है कि माकपा सांसद के द्वारा इन बंगालियों की अवैध गिरफ्तारी का सवाल पहले उठाया गया और राज्य सरकार ने अभी तक इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा। ये लोग दो महिने से जेल में बंद हैं। ये सभी पुरूलिया जिले के बाशिंदे हैं। ये लोग काम की तलाश में महाराष्ट्र आए थे । 22 सितम्बर को इन सभी को मुंबई पुलिस के बांकुला थाना इलाके में बंगलादेशी कहकर गिरफ्तार कर लिया और तब से ये सभी जेलों में बंद हैं। माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने इस मसले पर 9 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र लिखकर जानकारी दी और उनसे फोन पर विस्तार से बातें करके हस्तक्षेप करने की अपील की । माकपा सांसद ने इस बीच महाराष्ट्र के गृहमंत्री से भी बात की है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप की अपील करते हुए उनको 31 अक्टूबर को एक पत्र लिखा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्तक्षेप का आश्वासन देते हुए वासुदेव आचार्य को 6 नवम्बर को पत्र लिखा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का कोई अभीप्सित परिणाम नहीं निकला है।

सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मसले में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? असल में ममता की विचारधारात्मक संरचना में पापुलिज्म पहले आता है। इस पापुलिज्म का दलतंत्र की मनोदशा से गहरा संबंध है। इसके अलावा ममता उनसभी विषयों को संदेह की नजर से देखती हैं जो समाधान की मांग करते हैं। ममता की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो समाधान की मांग नहीं करते। मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 35 बंगाली मजदूर अपनी रिहाई की मांग कर रहे हैं और उनकी रिहाई को दलीय स्वार्थ त्यागकर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में बंगाली मजदूरों की अवैध गिरफ्तारी के मसले को उठाने का फैसला किया है और हम उम्मीद करते हैं कि उनके प्रयासों से ये मजदूर तत्काल रिहा होंगे।

ममता का नया आनंदराग जमीन लो और कारखाना खोलो


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी राजनीति मूलतःआनंद, महोत्सव, मेले, ठेले आदि के तानेबाने में बुनी है। ममता की धारणा है आनंद है तो विकास है। आनंद का जितना व्यापक राजनीतिक उपभोग ममता सरकार ने पैदा किया है वैसा अन्य किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया। वे राजनीतिक तनावों को आनंद से धोना चाहती हैं।  9 नवम्बर को उद्योगपतियों के साथ बैठक-डिनर का आयोजन था और 10 को कोलकाता फिल्म महोत्सव का आरंभ होने जा रहा है। जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर हीरो शाहरूख खान आदि के उपस्थित रहने की संभावना है। 

ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग और संस्कृति उद्योग को चंगा करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे अपने नए बदले मिजाज में नजर आ रही हैं। वे तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। राज्य की राजनीति के स्वस्थ विकास के लिए यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री विकास के सवालों पर केन्द्रित करे। विकास के सवालों पर मुख्यमंत्री की सक्रियता आनंदमय वातावरण के जरिए दिखाई दे रही है। कुछ लोगों को इसमें असुविधा हो सकती है। लेकिन राज्य के राजनीतिक वामस्वर को मद्धिम करने के लिहाज से ममता का आनंदराग मददगार साबित हो सकता है। इससे स्थानीयस्तर पर अ-राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही राज्य सरकार विरोधी मीडिया उन्माद के सामाजिक प्रभाव को कम करने में भी मदद मिलेगी। 9 नवम्बर को उद्योगपतियों की बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आनंदराग की पूरी छाप देखने को मिली। वे स्वयं आनंद के मूड में थीं और नए बदले मिजाज में थीं। पहलीबार ऐसा हुआ कि ममता को विगतदिनों में घटित तनावपूर्ण घटनाओं से मुक्तभाव में देखा गया। ममता के बदले मिजाज से अनेक उद्योगपति अचम्भे में थे,वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार नए तेवर की ममता को कैसे समझें।

इस बैठक में मौजूद उद्योगपतियों के मन में ममता विरोधी मीडिया उन्माद का दबाव था इसके कारण वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे सवाल करने से कन्नी काट रहे थे। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य सरकार ने ठीक से मीडिया प्रबंधन नहीं किया है। राज्य में मीडिया का राज्य सरकार के प्रति आक्रामक रूख इस संदर्भ में एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हुआ है। मीडिया का राज्य की प्रत्येक घटना को उन्माद की हद तक ले जाकर प्रचारित-प्रसारित करना स्वयं में राज्य के विकास के लिए बड़ी समस्या है।उल्लेखनीय है विगत वाममोर्चा सरकार को भी इस मीडिया उन्माद का सामना करना पड़ा था और उसका राजनीतिक लाभ ममता को मिला था।

पश्चिम बंगाल के बारे में विचार करते समय यह बात सब समय ध्यान में रखी जानी चाहिए कि राज्य के खिलाफ मीडिया हमेशा से आक्रामक मूड में सक्रिय रहा है। मीडिया का आक्रामक रूख मीडिया को तो लाभ पहुँचाता है लेकिन राज्य के विकास में बाधाएं खड़ी करता है। विकासविरोधी और उद्योग विरोधी माहौल बनाने में स्थानीय मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। स्थानीय मीडिया की इस तरह की नकारात्मक भूमिका अन्य राज्यों में नजर नहीं आती। खासकर आनंदबाजार समूह की भूमिका इस संदर्भ में नकारात्मक रही है। राज्य के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी है कि मीडिया की राज्यविरोधी भूमिका के परे जाकर देखा जाय। इस प्रसंग में वामदलों ,कांग्रेस और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलकर काम करने की जरूरत है। राज्यविरोधी भूमिका निभाते हुए आनंदबाजार समूह की संपत्ति में इजाफा हुआ है। इसके अलावा राज्य का औद्योगिक और राजनीतिक वातावरण तनावपूर्ण बना है। अराजक राजनीतिक शक्तियों को इससे मदद मिली है। यही वो नया परिप्रेक्ष्य है जिसमें 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उद्योगपतियों तो सम्बोधित किया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा जो भी उद्योगपति राज्य में उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें राज्य सरकार के भूमि बैंक से सीधे जमीन मिल सकती है। जो अन्यत्र उद्योग लगाना चाहते हैं तो उनके प्रस्ताव पर विशेष तौर पर राज्य सरकार ध्यान देगी। प्रस्ताव के आधार पर भूमिबैंक के बाहर की जमीन के बारे में भी राज्य सरकार खरीद-फरोख्त में मदद कर सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं-दलालों को घूस देने से परहेज करें। मुख्यमंत्री का यह बयान राज्य के औद्योगिक विकास के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है और इससे उद्योगपतियों का मिजाज बदलेगा। अभी राज्य के पास भूमिबैंक में बड़े पैमाने पर जमीन पड़ी हुई है उस पर कोई बड़ा प्रकल्प नहीं बन पाया है। इसके अलावा जिनलोगों ने उद्योग के नाम पर वामशासन के जमाने में जमीन ली थी और अभी तक काम आरंभ नहीं किया उन सभी उद्योगपतियों को कल-कारखाने खोलने के लिए दबाव पैदा किया जाना चाहिए। पुरानी आवंटित जमीन में एक अच्छी-खासी मात्रा में ऐसी भी जमीन है जिस पर वर्षों से कोई काम आरंभ नहीं हुआ है,ऐसे लोगों से जमीन वापस लेने की प्रक्रिया आरंभ की जानी चाहिए।

राज्य के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी समस्या है स्थानीय राजनीतिक दादाओं का आतंक। इससे निबटने के लिए राज्य सरकार को खास प्रयास करने होंगे। साथ ही पुराने राजनीतिक सोच से बाहर निकलना होगा। पुराना राजनीतिक सोच पूंजीपति को वर्गशत्रु मानकर चलता है। ममता के वाम मित्रों ,खासकर माओवादियों और सांस्कृतिक मित्रों का भी यह मानना है कि पूंजीपति वर्गशत्रु हैं और उनसे ममता सरकार को दूर रहना चाहिए।

शुक्रवार के उद्योगपतियों के जमावड़े में टाटा स्टील प्रोसेसिंग एंड डिस्ट्रीब्यूसन कंपनी लिमिटेड के संदीपन चक्रवर्ती,आईटीसी के कुरूश ग्रांट ,पीयरलेस के एस.के.राय इसके अलावा उद्योगगपति हेमंत कनोरिया,एम.के.जालान ,दीपक जालान,अलका बांगुर, उज्जवल उपाध्याय,आदित्य अग्रवाल, संजीव गोयनका,संजीव गोयनका ,हर्ष नेवटिया आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा एस्सोचैम,फिक्की,बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स,सीआईआई,कलकत्ता चैम्बर ऑफ कॉमर्स आदि संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में भाग लिया। कई उद्योगपतियों से जब इस बैठक के बारे में बातें हुईं तो उनका मानना था कि ममता ने यदि स्थानीय दादाओं के आतंक और धन वसूली को नियंत्रित कर लिया तो इससे औद्योगिक वातावरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इस बैठक की खास बात यह थी कि इसमें उद्योगपतियों के पास मुख्यमंत्री से पूछने के लिए सवाल नहीं थे। उद्योगपतियों ने मुख्यमंत्री से सवाल न करके यह संदेश दिया है कि वे ममता सरकार के काम से मौटे तौर पर संतुष्ट हैं। लेकिन मीडिया में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सवाल पूछने से ममता नाराज हो सकती थीं इसलिए सवाल नहीं किए गए।








रविवार, 25 नवंबर 2012

मुस्लिम वोटबैंक की घेराबंदी में जुटी माकपा और ममता


    
      पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए माकपा और ममता दोनों ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। धार्मिकनेताओं को बहला-फुसलाकर मतदाताओं को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यहां 30 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। दूसरी ओर ममता ने राज्य सरकार की ओर से मौलवियों को सरकारी भत्ते की घोषणा करके मुस्लिम मतदाताओं को महत्वपूर्ण बना दिया है और साथ ही यह भी संदेश दिया है आगामी चुनावों में मौलवियों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। माकपा इस सबसे बेहद परेशान है। असल में ममता ने चंद वर्षों में ही मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पुख्ता पकड़ बनाकर माकपा के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है।

उल्लेखनीय है ममता को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में वामदलों को मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफलता नहीं मिली।जबकि वहां पर तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा था। पिछले दिनों माकपा महासचिव प्रकाश कारात ने यह चिन्ता व्यक्त की कि पश्चिम बंगाल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म सिर उठा रहा है और राज्य की भावी राजनीति के लिए यह अशुभ संकेत है।

तृणमूल कांग्रेस की समूची रणनीति की धुरी ये मुस्लिम वोट हैं। इन वोटों को बचाए रखने के लिए तृणमूल काग्रेस ने अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जो हमारे धर्मनिरपेक्ष शासन की राजनीति के साँचे में फिट नहीं बैठते। मसलन् मस्जिद के मौलवियों को सरकारी भत्ते की स्कीन को लागू करके तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों के दिल जीतना चाहती है और इस काम में उसे एक हद तक सफलता भी मिली है।

दूसरी ओर माकपा ने अपने कद्दावरनेता अब्दुल रज्जाक मुल्ला को इस काम में लगाया है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला को कुछ दिन पहले यह इल्हाम हुआ कि वे मुसलमान हैं और उनको हज जाना चाहिए। वे हज गए और लौट भी आए हैं और उनकी हज यात्रा के बाद सामान्यतौर पर धार्मिक हलकों में उनका सम्मान-सत्कार भी हो रहा है। एक नागरिक के नाते वे हज जा सकते हैं। लेकिन वे इसका प्रचार क्यों कर रहे हैं ? वे नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन वे इसका मीडिया में प्रचार क्यों कर रहे हैं ? एक राजनेता का धार्मिक प्रचार राजनीति में अनुदार ताकतों की मदद करता है।

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म को मानने और न मानने के लिए स्वतंत्र है। धर्म एक निजी मसला है। लेकिन जब व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्थाओं को सार्वजनिक करता है और उनका प्रचार करता है तो वह धर्म के नाम पर राजनीति करता है। धर्म के नाम पर राजनीति करने से धर्म में अनुदार तत्वों की ताकत बढ़ती है। राजनीति में धार्मिक अनुदारवाद को बल मिलता है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला के द्वारा अभी तक अपनी हज यात्रा और उसके बाद के धार्मिक कदमों को मीडिया में प्रचारित करने से वाम राजनीति को कम धार्मिक अनुदार राजनीति को ज्यादा बल मिला है।

सवाल यह है कि अब्दुल रज्जाक मुल्ला तपे-तपाए कम्युनिस्टनेता हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के इस दौर में अचानक धार्मिक पहचान का इल्हाम क्यों हुआ ? वे बार बार अपने को मुस्लिम के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं ? एक कम्युनिस्ट के लिए धर्म निजी कार्य-व्यापार है। लेकिन मुल्ला ने अपनी धार्मिक पहचान और धार्मिक कार्यकलापों का मीडिया में प्रचार करके धर्म को राजनीति से जोड़ा है जो गलत है और वाम राजनीति के उसूलों के खिलाफ है। इसके बावजूद माकपा ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया है।

धार्मिक अनुदार राजनीति कैंसर है। यह अस्मिता की राजनीति का हिस्सा है। अस्मिता की राजनीति यदि अस्मिता में बांधे रखे और अस्मिता से आगे लेजाकर सामाजिक मुक्ति में रूपान्तरित न करे तो पलटकर सामाजिक विभाजन का काम करती है। यह सभी रंगत के धर्मनिरपेक्ष और उदार विचारों का निषेध है। यह धार्मिक फंडामेंटलिज्म है।

पश्चिम बंगाल में धार्मिक अनुदार राजनीति को अभी तक पर्दे के पीछे काम करते देखा गया था। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी से बदलाव आया है और इस तरह की राजनीति को चुनाव के मैदान में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए देखा गया है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में धार्मिक अनुदार राजनीति को तकरीबन 10 फीसदी वोट मिले हैं और इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही रंगत के संगठन शामिल हैं। इतने वोट धार्मिक फंडामेंटलिस्ट संगठनों को हाल-फिलहाल के वर्षों में कभी नहीं मिले।

असल में राज्य में बढ़ रहे धार्मिक फंडामेंटलिज्म को नष्ट करने की जिम्मेदारी सभीदलों की है। इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों को साझामंच बनाकर काम करना चाहिए। खासकर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिम्मेदारी ज्यादा है कि वे धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया पर नजर रखें और इस तरह के नीतिगत कदम उठाएं जिनसे धार्मिक फंडामेंटलिज्म कमजोर हो।

धार्मिक अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के लिए धर्म और धार्मिकतंत्र की मदद नहीं ली जाय। इसके विपरीत विकासमूलक योजनाओं के बहाने अल्पसंख्यकों को मैनस्ट्रीम राजनीति के अंदर सक्रिय किया जाय।


बुधवार, 21 नवंबर 2012

फेसबुक और लंपटगिरी

-1- 

कुंठा और छद्म में जीनेवाला व्यक्ति बेहद कमजोर और आत्मपीड़क होता है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फेसबुक लंपट किसी भी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करके या उससे गंदी बातें कहकर स्त्री का तो अपमान करते हैं साथ ही आत्मपीड़ा से भी गुजरते हैं। ऐसे आत्मपीडकों के लिए इंटरनेट विष की तरह है।



-2-

फेसबुक लंपट की विशेषता है कि वह छद्म में जीता है, छद्मभाषा लिखता है,पहचान छिपाता है।

-3-

फेसबुक पर लड़कियों के साथ बदसलूकी और लंपटगिरी करने वाले लोग वस्तुतः बीमार मन के कुण्ठित लोग हैं। स्त्री के साथ अपमान या हेय या उसे कम करके देखने वाली भाषा वस्तुतःकुण्ठा की उपज है। इन लोगों को किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए और फेसबुक -चैटिंग से दूर रहना चाहिए।

-4-

फेसबुक लंपटों में एक लक्षण यह भी देखा गया है कि जो लड़की मित्रता के प्रस्ताव का जबाव नहीं देती तो उसके मैसेज बॉक्स को अश्लील तस्वीरों, गालियों और सेक्सुअल भाषा से भर देते हैं । ऐसे लंपटों के नामों को लड़कियों को फेसबुक पर वॉल पर दे देना चाहिए।

-5-

फेसबुक लंपटों से कहना है कि कामुकता को स्त्री में न खोजें ,कामुकता का श्रेष्ठ कलारूपों में आनंद लें।

-6-

फेसबुक लंपटों की इश्कमिजाजी का आलम यह है कि यदि कोई लड़की उनसे चैटिंग में बात नहीं करती तो वे फिर उसकी पोस्ट को लाइक तक नहीं करते,इसके पहले वे खूब लाइक करते थे।

-7-

फेसबुक लंपटों का आलम यह है कि वे किसी लड़की की वॉल पर प्रेम की अभिव्यक्ति या उन्मुक्त अभिव्यक्ति की पंक्तियां देखते ही बिछ जाते हैं और उस लड़की को तत्काल मैसेज देने शुरू कर देते हैं ,गोया भारतीय लड़कियों को अपने को उन्मुक्त होकर व्यक्त करने का हक ही न हो। इन लंपटों की नजर में इसके बाद वो लड़की अच्छी लड़की नहीं रह जाती,वह उपभोग की लड़की हो जाती है। बाबा नागार्जुन के शब्दों में मुझे घिन आती है ऐसी मानसिकता पर।

-8-

फेसबुक लंपट की फेसबुक या चैटिंग में लंपटगिरी असल में आत्मालाप है।

-9-

फेसबुक लंपट बेहद डरपोक होता है। वह गलती करता है और फिर दुम दबाकर भागता है।

सोमवार, 19 नवंबर 2012

बाल ठाकरे और फेसबुक पर उठे सवाल

-1- 

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे!

अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !

सबने हां की, कौन ना करे !

छिप जान, मत तू उधर ताक रे!

शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे!

मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे!

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातंत्र के काल ठाकरे!

धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे!

चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

-----नागार्जुन (जनयुग, 7 जून 1970)



-2-

उद्धव ठाकरे को टीवी वालों ने जिस तरह हिन्दूरीति से अपने पिता का अंतिम संस्कार करते हुए लाइव प्रसारित किया है उससे टीवी प्रसारण की आचार संहिता के प्रचलित मानकों का सीधे उल्लंघन हुआ है।

उल्लेखनीय है रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी द्वारा हिन्दूरीति से किए गए अंतिम संस्कार के अविकल प्रसारण पर आपत्ति व्यक्त की थी।

उस प्रसारण को दूरदर्शन ने आधा घंटे तक सीधे दिखाया था और उसका सीधा असर सिखों के खिलाफ घृणा के रूप में सामने आया था। इस तथ्य की ओर रंगनाथ मिश्रा कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

हम मांग करते हैं कि अंतिम संस्कार के लाइव प्रसारण के खिलाफ निजी चैनल अपनी आत्मालोचना करें और भविष्य में इस तरह के प्रसारण से बचें। सब जानते हैं कि बाल ठाकरे सारी जिंदगी घृणा की राजनीति करते रहे हैं, कभी किसी के खिलाफ कभी किसी के खिलाफ। घृणा के नायक का महिमामंडन बेहद खतरनाक है और यह टीवी चैनलों की स्तरहीनता और नीतिहीनता की अभिव्यक्ति है।

-3-

कल शिवाजी मैदान में जिस तरह बाल ठाकरे का अंतिम संस्कार किया गया उसने कई सवाल खड़े किए हैं। मैं नहीं जानता कि शिवाजी पार्क के अहाते में क्या कोई श्मशान है ? और यदि है तो कोई फेसबुक मित्र बताए,हमें शिवाजी मैदान के भूगोल का कोई ज्ञान नहीं है।

सवाल यह है कि शिवाजी मैदान को अंतिम संस्कार करने के लिए चिता बनाने की अनुमति देना क्या ठीक है ? हमारी सामान्य बुद्धि कहती है कि मैदान का श्मशान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह कि बालठाकरे कभी किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे, ऐसी स्थिति में भी क्या राजकीय सम्मान के साथ पुलिस की सलामी दी जा सकती है ?

-4-

जो नेता जिंदगीभर भारतीय राजसत्ता को तरह तरह से कोसते रहते हैं , नए रंग का झंडा फहराते रहते हैं ,वे अंत में राजसत्ता के तिरंगे में ही लिपटकर स्वर्ग जाना चाहते हैं । यह सीधे सत्ता के सामने समर्पण है ।

-5-

बाल ठाकरे ने साठ के दशक में अस्मिता की राजनीति की शुरूआत की और सारी ज़िंदगी उसके लिए लड़ते रहे।
अस्मिता की जंग में उन्होंने मराठी पहचान के सवाल को आक्रामक तेवर के साथ उठाया और इस क्रम में वाम और उदार राजनीति पर हमले किए। उन्होंने मराठी अस्मिता पर पहले काम किया बाद में 1992 में हिन्दू पहचान के सवालों को प्रमुखता के साथ उठाया । 

-6-

उल्लेखनीय है साठ का दशक सारे देश में अस्मिता की राजनीति के उभार का दौर है ।

-7-

नए दौर में फिर से 'हिन्दू हृदय सम्राट 'की खोज आरंभ हो गई है, बाल ठाकरे की मौत से यह जगह खाली हुई है । वैसे भी बाल ठाकरे स्वनियुक्त' हिन्दू हृदय सम्राट 'थे ।

इस काम में कारपोरेट हिन्दू मीडिया अभी से सक्रिय हो गया है। ठाकरे की मौत के बाद का टीवी कवरेज असल में उसी प्रयास का हिस्सा है।

-8-

बालठाकरे की विरासत के वारिस की जंग आरंभ हो गई है ।

-9-

बालठाकरे को महाराष्ट्र के किसानों में वैसी जनप्रियता नहीं मिली जैसी उनको मुंबई में मिली । यह इस बात का संकेत है कि वे मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के जनप्रिय नेता थे ।

-10-

शवयात्रा में शामिल होने का अर्थ संबंधित व्यक्ति के विचारों से सहमत ह़ोना नहीं है।

-11-

बाल ठाकरे ने समानान्तर सत्ताकेन्द्र के रूप में मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में जिस तरह अपने को विकसित किया उसने उनके इर्दगिर्द बड़े पैमाने  पर दादा राजनीति को नई बुलंदी दी।उन्होंने निजी बातचीत में उदार और राजनीति में कट्टरतावादी व्यक्तित्व का प्रदर्शन किया। यह एक तरह से सर्वसत्तावादी भारतीय मन है जिसको श्यामाप्रसाद मुखर्जी-अटलजी आदि से प्रेरणा लेकर गढ़ा गया।

-12-

बालठाकरे का व्यापक टीवी कवरेज कम से कम ठाकरे भक्तजनता के भावों का शमन करने में मदद कर रहा है। इसी अर्थ में टीवी भावों के नियंत्रण और नियमन में मदद करता है । राजकीय सम्मान और नेशनल कवरेज के साथ विदाई अंततः एक संस्कार है ।

-13-

बाल ठाकरे ने लोकल राजनीति के साथ अंधक्षेत्रीयतावाद और भावुकता को जोड़कर मराठी अस्मिता को प्रधान मुद्दा बनाया ।

वे राष्ट्रवाद के नए युग के नायक थे। वे अपने पिता के गुणों से भिन्न गुणों को राजनीति में लेकर आए । महाराष्ट्र में वे निर्विवाद नायक थे।

-14-

बाल ठाकरे ने अंधक्षेत्रीयतावाद का हिन्दू साम्प्रदायिकता में बड़े कौशल के साथ रूपान्तरण किया । बाल ठाकरे ने जो पैराडाइम शिफ्ट किया है उसका भविष्य अब इन दोनों से परे विकास की राजनीति में देख सकेंगे।

-15-

शिवसेना के शेर बाल ठाकरे के निधन के साथ शिवसेना की साम्प्रदायिक राजनीति के प्रथम चरण का अवसान हो गया है। बाल ठाकरे की मौत के साथ आक्रामक राजनीति का मैनस्ट्रीम राजनीति से अंत हो गया ।

सोमवार, 5 नवंबर 2012

उद्योगपति सम्मेलन को लेकर ममता सरकार तनाव में


आगामी 9 नवम्बर को राज्य सरकार की ओर से उद्योगपतियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की देश के प्रसिद्ध उद्योगपतियों से सामूहिक मुलाकात होगी। उद्योगपतियों के सामने पिछले साल उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा किसी भी नए प्रकल्प पर राज्य में काम आरंभ नहीं हुआ है। राज्य प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाने की बजाय दलतंत्र के आधार पर चलाया जा रहा है इससे देश के उद्योगपति परेशान हैं। उद्योगपतियों में ममता सरकार के बंद विरोधी नजरिए को लेकर सकारात्मक भाव है लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार इससे आगे जाए और स्थानीय अशांति और राजनीतिक दादागिरी को नियंत्रित करे। कई उद्योगपतियों ने यह भी कहा कि ममता सरकार का बंद विरोधी रवैय्या असल में माकपा विरोध की राजनीति से जुड़ा है। इसके पीछे कोई पॉजिटिव सोच नहीं है। जिन उद्योगपतियों से इस बीच में हमारी बातचीत हुई उनमें से अधिकांश राजनीतिक मिलिटेंसी को लेकर बेहद चिन्तित हैं। इस बीच में कई उद्योगपतियों ने निजी तौर पर राज्यप्रशासन को अपनी भावनाओं से भी अवगत कराया है। 

उद्योग जगत को उम्मीद है 9 नवम्बर को ममता सरकार कोई लोकलुभावन पैकेज लेकर आए। उद्योगपतियों की कई मांगें हैं जिनको इस मौके पर उठाए जाने की संभावना है। उनकी पहली मांग है कि स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन राजनीतिक गुण्डई पर रोक लगाए और ममता सरकार इस समस्या के प्रति कड़े रूख का इजहार करे। उद्योग जगत की दूसरी मांग है स्थानीयनेताओं की हफ्ता वसूली को तुरंत रोका जाए। तीसरी मांग है राज्य प्रशासन प्रकल्प स्वीकृति की प्रक्रिया आसान और त्वरित बनाए और चौथी मांग है कि उद्योगधंधों के लिए जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के लिए ममता बनर्जी स्वयं दिलचस्पी लें।

उल्लेखनीय है पिछले साल ममता सरकार ने उद्योगपतियों से जब मुलाकात की थी तो राज्य में जीत का माहौल था, आम उद्योगपति उम्मीदें लगाए बैठे थे कि नई सरकार शांति स्थापित करने में मदद करेगी। लेकिन ऐसा करने में सरकार असफल रही है। कई बड़ी कंपनियां राज्य छोड़कर जाने का मन बना चुकी हैं और नई कंपनियां पूंजीनिवेश के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल ग्रहण कर ली है। उल्लेखनीय है कि मिलिटेंसी और झूठ एकसाथ चलते हैं। मिलिटेंसी हमेशा झूठ का सहारा लेती है। राज्य में विगत कई सालों से इस क्षेत्र में एक नया फिनोमिना सामने आया है वह है मिलिटेंसी के नाम पर गुण्डई।

मिलिटेंसी की खूबी है कि वह हमेशा जन समस्याओं के बहाने सिर उठाती है। जनहितैषी तर्कशास्त्र ,बाहुबल और शस्त्र इसके प्रमुख उपकरण हैं। उद्योग जगत परेशान है कि हल्दिया पोर्ट ट्रस्ट की ताजा समस्या ने गुण्डई में रूपान्तरण कर लिया है। कई उद्योगपतियों ने कहा है कि मिलिटेंसी को ’सब सामान्य है’ के मुहावरे में बांधकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी साख को दांव पर लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि पहले वाम शासन में ट्रेड यूनियन मिलिटेसी के कारण पश्चिम को व्यापक स्तर महत्वपूर्ण उद्योगों से हाथ धोना पड़ा है। आम आदमी यह उम्मीद कर रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रवृत्ति को अपने शासन के दौरान पनपने नहीं देंगी। इस प्रसंग में कुछ मुख्य बातें हैं जो साफ दिखाई दे रही हैं। राज्य प्रशासन का दलतंत्र के रूप में विस्तार हुआ है। पापुलिज्म बनाए रखने के लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बस्तियों के बाशिंदों का गुण्डावाहिनी के रूप में जमकर दुरूपयोग हो रहा है।

मिलिटेंसी जब भी सिर उठाती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी सबसे पहले पंक्चर हो जाती है है। आमतौर पर ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी संबंधित उद्योग तक सीमित रहती है लेकिन मौजूदा दौर में यूनियन मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल अख्तियार कर ली है। राज्य का मौजूदा नेतृत्व खुलकर इस अपराधीकरण को संरक्षण दे रहा है। मसलन् किसी कंपनी ने मजदूरों के खिलाफ एक्शन लिया है तो मजदूर संगठनों को उसका एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए। लेकिन इस तरह का रास्ता न अपनाकर हल्दिया में गुण्डई का मार्ग पकडा गया। हल्दिया में घटना का आरंभ हुआ तब हुआ जब एचबीटी कार्गो कंपनी ने अपने यहां काम करने वाले 270 कर्मचारियों को सीधे नौकरी से निकाल दिया। इस प्रसंग में कंपनी का तर्क है कि उसने बंदरगाह के आधुनिकीकरण पर 200 करोड़ रूपये खर्च किए हैं और उसे इन कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है,साथ यह भी कहाकि कंपनी ने मजदूरों से संबंधित कानूनों का पालन करते हुए ही इन मजदूरों को नौकरी से निकाला है। स्थानीय टीएमसी सांसद ने स्थानीय स्तर प्रतिवाद का नया तरीका अपनाया और पूरे इलाके में आतंक पैदा कर दिया। कंपनी के 3 अधिकारियों का पूरे परिवार के साथ अपहरण कर लिया, बंदरगाह पर काम पर जाने वाले मजदूरों को मारा-पीटा और आतंकित किया। उल्लेखनीय बात यह है कि सत्तारूण तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाले मजदूर संगठन इंटक ने कोई आंदोलन मजदूरों की छंटनी के खिलाफ संगठित नहीं किया बल्कि सीधे कंपनी के खिलाफ गुण्डई शुरू कर दी। उद्योग जगत चाहता है कि मजदूरों और कंपनियों के बीच के विवाद आपसी बातचीत से हल हों या कानूनीमंचों पर हल हों। बाहुबलियो के जरिए इस तरह की समस्याओं के समाधान तलाशने से बचा जाय। उद्योग जगत उम्मीद कर रहा है कि ममता बनर्जी 9 नवम्बर की बैठक में मिलिटेंसी की आलोचना करेंगी और कोशिश करेंगी कि उस बैठक के पहले हल्दिया विवाद के समाधान के लिए कोई मध्यममार्ग निकल आए।


गुरुवार, 1 नवंबर 2012

फेसबुक और विचार


फेसबुक लेखन को कचड़ा लेखन मानने वालों की संख्या काफी है। ऐसे भी सुधीजन हैं जो यह मानते हैं कि केजुअल लेखन के लिए फेसबुक ठीक है गंभीर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए यह माध्यम उपयुक्त नहीं है। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। फेसबुक पर आप चाहें तो विचारों का गंभीरता के साथ प्रचार-प्रसार भी कर देते हैं।


-2- 

फेसबुक पर व्यक्त विचारों का वैसे ही असर होता है जैसा असर किसी के भाषण को सुनते हुए होता है। एक ही शर्त है विचार खुले मन और बिना शर्त के साथ व्यक्त हों। पढ़ने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक। फेसबुक विचारों की कबड्डी का मैदान है। 


-3 - 

फेसबुक में विचार महान होता है बोलने वाला नहीं। यहां पर आप अपने विचारों को अनौपचारिक तौर पर वैसे ही पेश करें जैसे चाची अपने विचार पेश करती है। बातों बातों में विचारों की प्रस्तुति ही फेसबुक की विचार-कला की धुरी है। 


-4 - 

फेसबुक में विचार रखें और चलते बनें,विचारों के शास्त्रार्थ की यह जगह नहीं है। यह कम्युनिकेशन का मंच है और विचार को भी कम्युनिकेशन के ही रूप में आना चाहिए।फलतः विचार को विचारधारा के बंधनों से यहां मुक्ति मिल जाती है। विचार यहां कम्युनिकेशन है ,विचारधारा नहीं। कम्युनिकेशन सबका होता है ,जबकि विचारधारा वर्ग विशेष की होती है।
-5- 

फेसबुक पर अनेक विचारवान लोग हैं जो अपने सुंदर विचारों को व्यक्त इसलिए नहीं करते क्योंकि उनके विचारों को कोई चुरा लेगा।

विचारों की चोरी अच्छी बात है इसका ज्यादा से ज्यादा विकास होना चाहिए। यह विचारों का लोकतांत्रिकीकरण है। फेसबुक ने इस अर्थ में ज्ञान और विचार के लोकतांत्रिकीकरण को डिजिटल आयाम दिया है।यहां व्यक्त विचार कभी नहीं मरते। 


-6- 

मनुष्य का दिमाग बना है विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, वह विचारों को कैदगाह करने के लिए नहीं बना। फेसबुक ने रीयल टाइम कम्युनिकेशन की संभावनाओं को साकार करके विचारों के पंखों को साकार किया है। संसार में विचारों से सस्ती कोई चीज नहीं है।

-7-

विचार तो जीवन का मूल्यवान उपहार है। आप किसी व्यक्ति को कोई अच्छा विचार सम्प्रेषित करते हैं तो मूल्यवान गहना देते हैं। विचारों को पढ़ना और सुनना चाहिए। इससे मानवीयबोध समृद्ध होता है। फेसबुक की थुक्का-फजीहत और शैतानियों से निजात दिलाने में अच्छे विचार बड़ी मदद कर सकते हैं।


-8- 

फेसबुक की खूबी है कि इसमें आप इमेजों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इमेजों के साथ विचारों को भी बदलना चाहिए। हमारे अनेक फेसबुक मित्र हैं उनको उन्मुक्त भावों की इमेज या फोटो तो अपील करती है लेकिन उन्मुक्त उदार विचार अपील नहीं करते। मसलन् दुर्गा की इमेज तो अपील करती लेकिन दुर्गा के विचार अपील नहीं करते। इमेज बदलने के साथ विचारों में बदलाव आता है।


-9- 
फेसबुक पर सामान्य और विशिष्ट, शिक्षित और विद्वान सभी किस्म के लोग हैं जो लिख रहे हैं। बड़े दिमाग के बड़े आइडिया को सही परिप्रेक्ष्य में देखने में फेसबुक कम मदद करता है। बड़े आइडिया को कम बुद्धि के लोग जब देखते हैं तो उलझन में पड़ जाते हैं और अंटशंट लिखने लगते हैं। वे अपनी कम बुद्धि से बड़े विचारों को प्रदूषित करने की असफल चेष्टा करते हैं। 
-10- 

फेसबुक पर ऐसे भी मित्र हैं जो किसी भी विचार को पसंद नहीं करते और बकबास करने में सिद्धहस्त हैं। इस तरह के लोग अमूमन व्यक्तिगत हमले करते हैं। फेसबुक पर की गई बकबास अंततः बकबास है वह विचार नहीं है।
-11- 

फेसबुक पर ऐसे भी लोग है जिनके कोई विचार नहीं हैं लेकिन वे किसी न किसी विचार की छाया में रहते हैं। विचार की छाया में रहना ,विचारों में रहना नहीं है। ये वे लोग हैं जो विचार को ग्रहण नहीं कर पाए हैं,समझ ही नहीं पाए हैं। यानी वे विचार को मानते हैं,जानते नहीं।