कश्मीर में आप मुहल्लों में जाएं और आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि वहां जितने आतंकी आऱंभिक दिनों में आतंकी टोलियों में शामिल हुए उनमें से अधिकांश जानते तक नहीं थे कि वे आतंकी टोली में क्यों शामिल हो रहे हैं।अनेक मर्तबा ऐसे युवा भी आतंकी टोली में शामिल हुए जो किसी न किसी रूप में सैन्यबलों के उत्पीड़न के शिकार रहे हैं।अनेक इस तरह के युवा भी थे जो बंदूक या पिस्तौल चलाना जानते तक नहीं थे और आतंकियों की बंदूक-पिस्तौल लेकर घूमते रहते थे,हथियार चमकाकर इलाके में दादागिरी करते थे। किस तरह मूर्खताएं करते थे और पाकप्रेरित आतंकी संगठनों के जाने-अनजाने एजेंट बन गए।एक सच्चा किस्सा पढ़ें-एक कश्मीरी युवा देखने में सुंदर और छरछरे किस्म का था, नाम था उस्मान।एक दिन उसको आतंकियों ने एक ग्रेनेड दे दिया और उसको कहा कि जाकर नशाने पर फेंक दो।वह जानता नहीं था उसका किस तरह इस्तेमाल करें।ग्रेनेड में एक पिन होता है,उस पिन को निकालते ही उसे सात सैकिण्ड में निशाने पर फेंक देना होता है लेकिन वह युवा पिन निकालकर देख रहा था कि कहां फेंकूँ,वह जानता ही नहीं था कि उसे कितनी देर में फेंकना है,वह युवक सोचता रह गया सात सैकिण्ड के बाद ग्रेनेड उसी युवक के हाथ में फट गया।फलतःवह उसी क्षण मर गया।लेकिन आतंकियों ने प्रचारित कर दिया कि सैन्यबलों ने मार दिया।यह श्रीनगर के डाउन टाउन की सच्ची कहानी है।
जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। पता- jcramram@gmail.com
सोमवार, 11 जुलाई 2016
कश्मीर के फायरब्राँण्ड आतंकी
कश्मीर में आप मुहल्लों में जाएं और आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि वहां जितने आतंकी आऱंभिक दिनों में आतंकी टोलियों में शामिल हुए उनमें से अधिकांश जानते तक नहीं थे कि वे आतंकी टोली में क्यों शामिल हो रहे हैं।अनेक मर्तबा ऐसे युवा भी आतंकी टोली में शामिल हुए जो किसी न किसी रूप में सैन्यबलों के उत्पीड़न के शिकार रहे हैं।अनेक इस तरह के युवा भी थे जो बंदूक या पिस्तौल चलाना जानते तक नहीं थे और आतंकियों की बंदूक-पिस्तौल लेकर घूमते रहते थे,हथियार चमकाकर इलाके में दादागिरी करते थे। किस तरह मूर्खताएं करते थे और पाकप्रेरित आतंकी संगठनों के जाने-अनजाने एजेंट बन गए।एक सच्चा किस्सा पढ़ें-एक कश्मीरी युवा देखने में सुंदर और छरछरे किस्म का था, नाम था उस्मान।एक दिन उसको आतंकियों ने एक ग्रेनेड दे दिया और उसको कहा कि जाकर नशाने पर फेंक दो।वह जानता नहीं था उसका किस तरह इस्तेमाल करें।ग्रेनेड में एक पिन होता है,उस पिन को निकालते ही उसे सात सैकिण्ड में निशाने पर फेंक देना होता है लेकिन वह युवा पिन निकालकर देख रहा था कि कहां फेंकूँ,वह जानता ही नहीं था कि उसे कितनी देर में फेंकना है,वह युवक सोचता रह गया सात सैकिण्ड के बाद ग्रेनेड उसी युवक के हाथ में फट गया।फलतःवह उसी क्षण मर गया।लेकिन आतंकियों ने प्रचारित कर दिया कि सैन्यबलों ने मार दिया।यह श्रीनगर के डाउन टाउन की सच्ची कहानी है।
रविवार, 10 जुलाई 2016
कश्मीर में मूल समस्या आतंकवाद नहीं आर्थिक गरीबी है
कश्मीर इन दिनों फिर से चर्चा के केन्द्र में है।जिन लोगों ने 1989-90 से शुरू हुई तहरीक को देखा है वे जानते हैं आखिरकार कश्मीर में अशांति कैसे आई।वे यह भी जानते हैं कश्मीर की अशांति की जड़ें कहां हैं।कश्मीर पर बातें होती हैं तो सारी बहस आतंकवाद-पृथकतावाद और पाकिस्तान के रेगिस्तान में भटक जाती है।कोई कश्मीर की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर बातें नहीं करता। कश्मीर की समस्या की मूल जड़ है बहस के केन्द्र से अर्थव्यवस्था का गायब हो जाना।जितने लोग फेसबुक पर कश्मीर के सुनहरे अतीत और आतंकी वर्तमान पर लिख रहे हैं वे यदि गंभीरता से एक-एक लेख जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर भी लिख दिए होते तो बहुत बड़ा उपकार कर दिए होते।
कश्मीर की त्रासदी है कि उसके वास्तव मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। आज भी कश्मीर पर बात होती है तो आतंकवादी ही प्रमुख रूप से चर्चा के केन्द्र में रहता है,कायदे से हमें कश्मीर विमर्श का मूलाधार वहां की अर्थव्यवस्था की समस्याओं को बनाना चाहिए।वहां पर प्राकृतिक संतुलन के जो संभावित खतरे हैं उनको बनाना चाहिए।मैंने कश्मीर को बहुत करीब से देखने-जानने और समझने की कोशिश की है। मुझे यही लगा कश्मीर वह नहीं है जो मीडिया में नजर आता है।कश्मीर का आतंकी चेहरा मीडिया ने बनाया है.इसमें हिन्दुत्ववादी ताकतों की बहुत बड़ी भूमिका है।आश्चर्य की बात है मैं वर्षों से नियमित टीवी टॉक शो देखता रहा हूँ लेकिन एक भी चैनल याद नहीं पड़ता जिसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर कभी बातें की हों।
कश्मीर में आतंकियों की समस्या से ज्यादा बड़ी बेकारी की समस्या है,लाखों युवाओं के पास कोई काम नहीं है।मीडिया कवरेज की आज परिणति यह हुई है कि हर कश्मीरी को कश्मीर के बाहर संदेह की नजर से देखा जाता है,यदि कश्मीर के बाहर कोई कश्मीरी नौकरी कर रहा है तो लोग हरह आतंकी घटना का कारण उस कश्मीरी से पूछते हैं,जबकि सच्चाई यह है उसे वास्तविकता में मालूम ही नहीं है कोई आतंकी घटना क्यों और कैसे हुई।मसलन्,जिस व्यक्ति को अभी पुलिसबलों ने मारा वह आतंकवादी था,लेकिन पुलिसबलों की पकड़ से कई सालों से बाहर था।उसका कोई कवरेज नहीं मिलेगा,अचानक पता चला वो बहुत बड़ा आतंकवादी था।
मीडिया की सूचनाओं को हम इस कदर पवित्र मानकर चल रहे हैं कि संदेह तक नहीं करते।सारी खबरें वही हैं जो पुलिसबल या सेना बता रही है। मैनस्ट्रीम मीडिया के जरिए कोई भी रिपोर्टर जमीनी हकीकत बताने की कोशिश नहीं कर रहा ।
आतंकवाद पर मैनस्ट्रीम मीडिया अमूमन झूठ बोलता है कम से कम यह विकीलीक के दस्तावेजों को देखकर तो हमलोगों को समझ लेना चाहिए।दूर क्यों जाएं हाल ही में चिलकोट साहब ने इराक पर जो जांच रिपोर्ट पेश की है उससे सीख लें।
कहने का अर्थ है कश्मीर के बारे में बातें करें तो वहां के बुनियादी आर्थिक सवालों पर बातें करें।आम कश्मीरी अपने को आतंकियों से बहुत पहले दूर कर चुका है।मीडिया के कवरेज से राय न बनाएं। कश्मीर पर मीडिया बहुत घटिया काम कर रहा है वह प्रत्येक कश्मीरी को आतंकवाद समर्थक बता रहा है।कल एक आतंकी की शवयात्रा का कवरेज और उस पर आए बयान इस बात को पुष्ट करते हैं कि आम कश्मीरी और आतंकी के बीच में अंतर करना मीडिया,नेता और भोंपुओं ने बंद कर दिया है। आज कश्मीर की मूल समस्या आतंकवाद या पृथकतावाद नहीं है बल्कि उसके विकास की आर्थिक समस्याएं जिन पर बातें करने से वहा के राजनीतिकदल और मीडिया दोनों परहेज कर रहे हैं।कायदे से मीडिया-नेता रचित यह कश्मीर एजेण्डा बदलना चाहिए।
कश्मीर की त्रासदी है कि उसके वास्तव मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। आज भी कश्मीर पर बात होती है तो आतंकवादी ही प्रमुख रूप से चर्चा के केन्द्र में रहता है,कायदे से हमें कश्मीर विमर्श का मूलाधार वहां की अर्थव्यवस्था की समस्याओं को बनाना चाहिए।वहां पर प्राकृतिक संतुलन के जो संभावित खतरे हैं उनको बनाना चाहिए।मैंने कश्मीर को बहुत करीब से देखने-जानने और समझने की कोशिश की है। मुझे यही लगा कश्मीर वह नहीं है जो मीडिया में नजर आता है।कश्मीर का आतंकी चेहरा मीडिया ने बनाया है.इसमें हिन्दुत्ववादी ताकतों की बहुत बड़ी भूमिका है।आश्चर्य की बात है मैं वर्षों से नियमित टीवी टॉक शो देखता रहा हूँ लेकिन एक भी चैनल याद नहीं पड़ता जिसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर कभी बातें की हों।
कश्मीर में आतंकियों की समस्या से ज्यादा बड़ी बेकारी की समस्या है,लाखों युवाओं के पास कोई काम नहीं है।मीडिया कवरेज की आज परिणति यह हुई है कि हर कश्मीरी को कश्मीर के बाहर संदेह की नजर से देखा जाता है,यदि कश्मीर के बाहर कोई कश्मीरी नौकरी कर रहा है तो लोग हरह आतंकी घटना का कारण उस कश्मीरी से पूछते हैं,जबकि सच्चाई यह है उसे वास्तविकता में मालूम ही नहीं है कोई आतंकी घटना क्यों और कैसे हुई।मसलन्,जिस व्यक्ति को अभी पुलिसबलों ने मारा वह आतंकवादी था,लेकिन पुलिसबलों की पकड़ से कई सालों से बाहर था।उसका कोई कवरेज नहीं मिलेगा,अचानक पता चला वो बहुत बड़ा आतंकवादी था।
मीडिया की सूचनाओं को हम इस कदर पवित्र मानकर चल रहे हैं कि संदेह तक नहीं करते।सारी खबरें वही हैं जो पुलिसबल या सेना बता रही है। मैनस्ट्रीम मीडिया के जरिए कोई भी रिपोर्टर जमीनी हकीकत बताने की कोशिश नहीं कर रहा ।
आतंकवाद पर मैनस्ट्रीम मीडिया अमूमन झूठ बोलता है कम से कम यह विकीलीक के दस्तावेजों को देखकर तो हमलोगों को समझ लेना चाहिए।दूर क्यों जाएं हाल ही में चिलकोट साहब ने इराक पर जो जांच रिपोर्ट पेश की है उससे सीख लें।
कहने का अर्थ है कश्मीर के बारे में बातें करें तो वहां के बुनियादी आर्थिक सवालों पर बातें करें।आम कश्मीरी अपने को आतंकियों से बहुत पहले दूर कर चुका है।मीडिया के कवरेज से राय न बनाएं। कश्मीर पर मीडिया बहुत घटिया काम कर रहा है वह प्रत्येक कश्मीरी को आतंकवाद समर्थक बता रहा है।कल एक आतंकी की शवयात्रा का कवरेज और उस पर आए बयान इस बात को पुष्ट करते हैं कि आम कश्मीरी और आतंकी के बीच में अंतर करना मीडिया,नेता और भोंपुओं ने बंद कर दिया है। आज कश्मीर की मूल समस्या आतंकवाद या पृथकतावाद नहीं है बल्कि उसके विकास की आर्थिक समस्याएं जिन पर बातें करने से वहा के राजनीतिकदल और मीडिया दोनों परहेज कर रहे हैं।कायदे से मीडिया-नेता रचित यह कश्मीर एजेण्डा बदलना चाहिए।
शनिवार, 9 जुलाई 2016
युवाओं में वैचारिक विभाजन
भारत का मध्यवर्ग आज विचारधारा के आधार पर जितना विभाजित है उतना पहले कभी नहीं था।पहले कुछ मसलों पर मध्यवर्ग में एकता थी,लेकिन इस समय हर विषय पर मोदी समर्थक,संघ समर्थक,कांग्रेस समर्थक,वाम समर्थक आदि के विचारधारात्मक विभाजन को सीधे देखा जा सकता है।मध्यवर्ग में राष्ट्र की अवधारणा और उसकी एकता की धुरी गायब है और उसकी जगह विचारधारा की धुरी आ गयी है।इससे देश के विकास में बाधा पहुँच रही है।विचारधारा के आधार पर समाज का विभाजन काफी पहले शुरू हो गया था,संभवतःआपातकाल के बाद इस तरह की प्रक्रिया के बीज पड़े जिनको 1990-91 के बाद जमकर फलने-फूलने का मौका मिला,इस समय तो विचारधारा के आधार पर सामाजिक विभाजन पूरे चरम पर है।यह सामाजिक कमजोरी का लक्षण है।
मजेदार बात यह है कि भारत के युवा जिनकी उम्र17 से 22 साल के बीच है वे सबसे ज्यादा विचारधारात्मक विभाजन के शिकार हैं,इनमें उदार मूल्यों के प्रति एकता कम और अनुदार और प्रतिगामी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ा है।इसकी तुलना में अशिक्षित समुदाय आज भी विचारधारात्मक विभाजन से मुक्त है।
मैंने अपने जीवन में वैचारिक विभाजन छात्रजीवन में नहीं देखा,जबकि जेएनयू में पढ़ता था,व्यापक स्तर पर सघन वैचारिक जंग होती थी लेकिन छात्रों में विचारधारात्मक विभाजन नहीं था,लेकिन मौजूदा दौर बेहद खतरनाक है,इसने युवाओं को बांट दिया है।इस समय पुराने जेएनयू वाले मित्र भी बंटे हैं। युवा आपस में बंटे हैं,युवाओं का अपने से बड़ों यानी अभिभावकों से विचारधारात्मक टकराव है।इस स्थिति में लगातार कंजरवेटिव और आक्रामक विचारों की ओर रूझान बढ़ रहा है।स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि गृहिणी किस्म की महिलाएं बड़ी संख्या में जो पहले उदारमना होती थीं उनमें राष्ट्रवाद,मोदीवाद टाइप संकीर्ण विचारधाराएं आ गयी हैं।वे राजनीति नहीं जानतीं,लेकिन राष्ट्रवाद के पक्ष में हैं।कहने का अर्थ है राजनीतिविहीन लोगों को विचारधारात्मक विभाजन तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है।फलतः पृथकतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें खुलकर घरेलू औरतों का दुरूपयोग कर रही हैं।
विश्वविद्यालयों में उदार मूल्यों को मूलाधार बनाकर जो व्यापक सामाजिक एकता या छात्र एकता विकसित हुई थी आज वह पूरी तरह से गायब है।विश्वविद्यालयों में विचारधारात्मक विभाजन सबसे ज्यादा है और उसमें कंजरवेटिव मूल्यों पर एकता बढी है।मूल्यहीन चीजों पर एकता बढ़ी है,इसने विश्वविद्यालय स्नातकों के सामाजिक स्तर का अवमूल्यन किया है।हमने इन छात्रों के अंदर मूल्यों के विघटन के सवालों पर बातें करना बंद कर दिया है।इन दिनों कैंपस का समूचा परिवेश स्थानीय राजनीति का अखाड़ा मात्र बनकर रह गया है।
जाकिर नाईक के बहाने उठे सवाल-
आतंकियों की भाषा,विचार और फोटो के प्रचार से बचें,अपनी भाषा,अपने विचार को लोकतंत्र के आईने में पेश करें।आतंकियों -साम्प्रदायिक ताकतों की इन दिनों मिलीभगत चल रही है,वे एक-दूसरे के पूरक का काम कर रहे हैं।आरएसएस के अस्तित्व और विकास के लिए आतंकियों को हवा देना जरूरी है,यह बात संघ जानता है।मैं लगातार देख रहा हूँ हमारे अनेक मित्र आतंकी हाफिज सईद या अन्य किसी तथाकथित आतंकी का फेसबुक पर फोटो शेयर कर रहे हैं,मेरी वॉल पर भी आकर लगा रहे हैं,इससे बचें।आतंकविरोधी मुहिम को पुख्ता बनाने के लिए आतंकियों के चित्र न लगाएं।उनके चित्र और विचार संक्रामक रोग की तरह फैलते हैं।
आतंकियों के खिलाफ ,उनके मददगारों के खिलाफ आरएसएस और मोदी सरकार कुछ नहीं कर सकती,लेकिन चूहों को पकड़ने में सभी टीवी चैनलों और सीबीआई को लगा दिया है।आतंकी लोग चूहे नहीं हैं कम से कम इतना तो समझो।
अब फ़ैन हैं तो अंडरटेकिंग ले लो फ़ैन से! फ़ैन हैं तो शरीफ़ रहें! वरना गए बेटा जेल में! मैं बेहद ख़ुश हूँ मेरे फ़ैन नहीं हैं और जो फ़ैन हैं वे आतंकी नहीं हैं। कल्पना करो राम के विचारों से जो प्रेरित हैं वे बम चला रहे हैं। माओ के विचारों से प्रभावित बम चला रहे हैं। यानी राजनाथ सिंह का नया फ़ंडा है कि यदि कोई अपराधी पकड़ा जाए तो पता करो किसका फ़ैन है ! फिर पकड़ो उसे !!मारे गए गुलफाम !!
माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहीम हिन्दी फ़िल्मी अभिनेताओं से बहुत प्रभावित हैं! क्या राजनाथ सिंह उन अभिनेताओं को पकड़ेंगे? यह कौन सा लॉजिक है कि दिग्विजय सिंह तो पापी लेकिन श्रीश्रीरविशंकर रविशंकर पुण्यात्मा!! राजनाथ सिंह जी जब की सीडी दिखा रहे हो टीवी पर ,उस समय आपका दल कहाँ सोया था? यह नई रणनीति बंद करो जिसमें नियोजित ढंग से मुसलमानों के खिलाफ ज़हरीला प्रचार किया जा रहा है।लगातार ऐसे मसले उठाए जा रहे हैं जिनके ज़रिए मुसलमानों के खिलाफ मीडिया में निरन्तर ज़हरीला प्रचार किया जा रहा है।यह ख़तरनाक दौर है जिसमें बिना कारण और तर्क के मीडिया फ़ायरिंग चल रही है।यह भारत को दिमागी तौर पर बाँटने की प्रक्रिया है और विद्वेष फैलाने वाली मुहिम है जिसको मोदी सरकार का संरक्षण हासिल है।
जाकिर नाईक इसी देश में रहता है राजनाथ सिंहजी कभी उसके भाषणों का आपने या आपके दल के नेताओं ने पहले कभी प्रतिवाद नहीं किया,अचानक आपको नाईक के बारे में यह कैसे लगा कि वह गलत बोल रहा था,इससे यह जाहिर होता है नाईक को लेकर आपको पहले कोई परेशानी नहीं थी,इस समय क्यों परेशानी है यह भी ठीक से नहीं मालूम,लेकिन एक सवाल तो उठता है कि जब भारत सरकार ने 2010 में शांति टीवी पर प्रतिबंध लगा दिया था तो उसका प्रसारण अवैध रूप से कैसे होता रहा,राजनाथ सिंहजी इसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है सीधे तथ्य बताओ कि बैन के बाद भी यह चैनल कैसे चलता रहा और इसके पीछे कौन लोग थे।
भाजपा और आरएसएस गजब संगठन हैं ,इनको बंगलादेश के बम धमाके के बाद पता चला कि जाकिर नाईक कौन है ,कहां रहता है,क्या करता है,क्या बोलता है,संघियो ,कम से इतने अज्ञानी तो न बनो।सारी दुनिया जानती है कि यह शख्स क्या करता है,इतना ही खतरनाक है तो अब तक पकड़ा क्यों नहीं,दो साल से तो मोदीजी की सरकार है,ये भक्तचैनल भी गजब हैं,जानते हैं लेकिन कभी उसके बारे में खबर नहीं दिखाई,कभी दिग्विजयसिंह की खबर नहीं दिखाई,कम से कम मोदीजी को पहले ही यह सीडी भेज देते कि पकडवाओ इस नेता को,लेकिन सीडी क्यों पहले सामने नहीं आई ॽ बंगलादेश के आतंकी हमले के बाद ही सामने क्यों लायी गयी ॽ
अचानक देश में टीवी चैनलों पर नाईक -दिग्विजय सिंह की पुरानी सीडी इस तरह खबर दे रहे हैं गोया अभी पता चला हो ! नाईक मृतखबर है। धार्मिक विचार,आतंकी विचार मृतखबर हैं ! उनको खबर की तरह क्यों चला रहे हो ॽ वैसे ही खुलकर कहो कि मुसलमानों से नफरत करते हो,कौन रोक रहा है !
उल्लेखनीय है धार्मिक चैनलों में आए दिन विज्ञान विरोधी और क़ानून विरोधी बातें प्रवचनों और तकरीरों के ज़रिए प्रसारित होती रहती हैं लेकिन न्यूज चैनलों के लिए यह कोई न्यूज नहीं है।लगातार घटिया विज्ञापन , क़ानून भंजक विज्ञापन चलते रहते हैं यह भी कोई खबर नहीं है।
सवाल यह है न्यूज चैनल इस तरह की चीज़ों पर चुप क्यों रहते हैं? ज़ाकिर नाईक और दूसरे अनेक लोग घटिया , अलोकतांत्रिक और भड़काऊ बातें टीवी पर कहते रहते हैं लेकिन न्यूज चैनल इन पर कभी कुछ नहीं बोलते। ज़ाकिर नाईक की तकरीरें टीवी पर हुई हैं लेकिन कभी किसी चैनल ने उसे खबर नहीं बनाया ,आलोचना नहीं की। आज जब आरएसएस कह रहा है तो सारा मीडिया ज़ाकिर -ज़ाकिर कर रहा है। यहाँ तक कि आरएसएस के समाचारपत्रों में कभी उसको मुद्दा नहीं बनाया गया।क्या बात है यह चिताज्ञान इसी समय क्यों हुआ? दूसरी बात प्रमाण है तो ज़ाकिर को पकड़ो अदालत के हवाले करो , मीडिया ट्रायल चलाकर ज़हर क्यों फैला रहे हो, पकड़ने से किसने रोका है!
आतंकवाद कभी धर्म का सम्मान नहीं करता, बल्कि यह देखा गया है वह हर चीज़ का आतंक विस्तार के लिए इस्तेमाल करता है।इस क्रम में वह धार्मिक स्थानों को एक अवधि तक इस्तेमाल करता है बाद में उनको नष्ट करता है। अफ़ग़ानिस्तान,इराक़, सीरिया में हज़ारों मस्जिदें नष्ट करने में आतंकी संगठनों की भूमिका रही है। भारत में खालिस्तानियों ने पहले गुरुद्वारों का दुरूपयोग किया बाद में स्वर्णमंदिर को ही भ्रष्ट कर दिया और उसे अपना अड्डा बना लिया अंत में जो हुआ उसे सब जानते हैं।
यही हालत साम्प्रदायिक ताक़तों की है उनकी भगवान में कोई आस्था नहीं है, वे मंदिरों और भगवान के नाम का दुरूपयोग करते हैं लेकिन अंतत: वे वही काम करेंगे जो आतंकियों ने किया है, गए थे राममंदिर बनाने लेकिन किया एकदम उलटा बाबरी मस्जिद ही तोड़ दी।
आतंकियों के खिलाफ ,उनके मददगारों के खिलाफ आरएसएस और मोदी सरकार कुछ नहीं कर सकती,लेकिन चूहों को पकड़ने में सभी टीवी चैनलों और सीबीआई को लगा दिया है।आतंकी लोग चूहे नहीं हैं कम से कम इतना तो समझो।
अब फ़ैन हैं तो अंडरटेकिंग ले लो फ़ैन से! फ़ैन हैं तो शरीफ़ रहें! वरना गए बेटा जेल में! मैं बेहद ख़ुश हूँ मेरे फ़ैन नहीं हैं और जो फ़ैन हैं वे आतंकी नहीं हैं। कल्पना करो राम के विचारों से जो प्रेरित हैं वे बम चला रहे हैं। माओ के विचारों से प्रभावित बम चला रहे हैं। यानी राजनाथ सिंह का नया फ़ंडा है कि यदि कोई अपराधी पकड़ा जाए तो पता करो किसका फ़ैन है ! फिर पकड़ो उसे !!मारे गए गुलफाम !!
माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहीम हिन्दी फ़िल्मी अभिनेताओं से बहुत प्रभावित हैं! क्या राजनाथ सिंह उन अभिनेताओं को पकड़ेंगे? यह कौन सा लॉजिक है कि दिग्विजय सिंह तो पापी लेकिन श्रीश्रीरविशंकर रविशंकर पुण्यात्मा!! राजनाथ सिंह जी जब की सीडी दिखा रहे हो टीवी पर ,उस समय आपका दल कहाँ सोया था? यह नई रणनीति बंद करो जिसमें नियोजित ढंग से मुसलमानों के खिलाफ ज़हरीला प्रचार किया जा रहा है।लगातार ऐसे मसले उठाए जा रहे हैं जिनके ज़रिए मुसलमानों के खिलाफ मीडिया में निरन्तर ज़हरीला प्रचार किया जा रहा है।यह ख़तरनाक दौर है जिसमें बिना कारण और तर्क के मीडिया फ़ायरिंग चल रही है।यह भारत को दिमागी तौर पर बाँटने की प्रक्रिया है और विद्वेष फैलाने वाली मुहिम है जिसको मोदी सरकार का संरक्षण हासिल है।
जाकिर नाईक इसी देश में रहता है राजनाथ सिंहजी कभी उसके भाषणों का आपने या आपके दल के नेताओं ने पहले कभी प्रतिवाद नहीं किया,अचानक आपको नाईक के बारे में यह कैसे लगा कि वह गलत बोल रहा था,इससे यह जाहिर होता है नाईक को लेकर आपको पहले कोई परेशानी नहीं थी,इस समय क्यों परेशानी है यह भी ठीक से नहीं मालूम,लेकिन एक सवाल तो उठता है कि जब भारत सरकार ने 2010 में शांति टीवी पर प्रतिबंध लगा दिया था तो उसका प्रसारण अवैध रूप से कैसे होता रहा,राजनाथ सिंहजी इसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है सीधे तथ्य बताओ कि बैन के बाद भी यह चैनल कैसे चलता रहा और इसके पीछे कौन लोग थे।
भाजपा और आरएसएस गजब संगठन हैं ,इनको बंगलादेश के बम धमाके के बाद पता चला कि जाकिर नाईक कौन है ,कहां रहता है,क्या करता है,क्या बोलता है,संघियो ,कम से इतने अज्ञानी तो न बनो।सारी दुनिया जानती है कि यह शख्स क्या करता है,इतना ही खतरनाक है तो अब तक पकड़ा क्यों नहीं,दो साल से तो मोदीजी की सरकार है,ये भक्तचैनल भी गजब हैं,जानते हैं लेकिन कभी उसके बारे में खबर नहीं दिखाई,कभी दिग्विजयसिंह की खबर नहीं दिखाई,कम से कम मोदीजी को पहले ही यह सीडी भेज देते कि पकडवाओ इस नेता को,लेकिन सीडी क्यों पहले सामने नहीं आई ॽ बंगलादेश के आतंकी हमले के बाद ही सामने क्यों लायी गयी ॽ
अचानक देश में टीवी चैनलों पर नाईक -दिग्विजय सिंह की पुरानी सीडी इस तरह खबर दे रहे हैं गोया अभी पता चला हो ! नाईक मृतखबर है। धार्मिक विचार,आतंकी विचार मृतखबर हैं ! उनको खबर की तरह क्यों चला रहे हो ॽ वैसे ही खुलकर कहो कि मुसलमानों से नफरत करते हो,कौन रोक रहा है !
उल्लेखनीय है धार्मिक चैनलों में आए दिन विज्ञान विरोधी और क़ानून विरोधी बातें प्रवचनों और तकरीरों के ज़रिए प्रसारित होती रहती हैं लेकिन न्यूज चैनलों के लिए यह कोई न्यूज नहीं है।लगातार घटिया विज्ञापन , क़ानून भंजक विज्ञापन चलते रहते हैं यह भी कोई खबर नहीं है।
सवाल यह है न्यूज चैनल इस तरह की चीज़ों पर चुप क्यों रहते हैं? ज़ाकिर नाईक और दूसरे अनेक लोग घटिया , अलोकतांत्रिक और भड़काऊ बातें टीवी पर कहते रहते हैं लेकिन न्यूज चैनल इन पर कभी कुछ नहीं बोलते। ज़ाकिर नाईक की तकरीरें टीवी पर हुई हैं लेकिन कभी किसी चैनल ने उसे खबर नहीं बनाया ,आलोचना नहीं की। आज जब आरएसएस कह रहा है तो सारा मीडिया ज़ाकिर -ज़ाकिर कर रहा है। यहाँ तक कि आरएसएस के समाचारपत्रों में कभी उसको मुद्दा नहीं बनाया गया।क्या बात है यह चिताज्ञान इसी समय क्यों हुआ? दूसरी बात प्रमाण है तो ज़ाकिर को पकड़ो अदालत के हवाले करो , मीडिया ट्रायल चलाकर ज़हर क्यों फैला रहे हो, पकड़ने से किसने रोका है!
आतंकवाद कभी धर्म का सम्मान नहीं करता, बल्कि यह देखा गया है वह हर चीज़ का आतंक विस्तार के लिए इस्तेमाल करता है।इस क्रम में वह धार्मिक स्थानों को एक अवधि तक इस्तेमाल करता है बाद में उनको नष्ट करता है। अफ़ग़ानिस्तान,इराक़, सीरिया में हज़ारों मस्जिदें नष्ट करने में आतंकी संगठनों की भूमिका रही है। भारत में खालिस्तानियों ने पहले गुरुद्वारों का दुरूपयोग किया बाद में स्वर्णमंदिर को ही भ्रष्ट कर दिया और उसे अपना अड्डा बना लिया अंत में जो हुआ उसे सब जानते हैं।
यही हालत साम्प्रदायिक ताक़तों की है उनकी भगवान में कोई आस्था नहीं है, वे मंदिरों और भगवान के नाम का दुरूपयोग करते हैं लेकिन अंतत: वे वही काम करेंगे जो आतंकियों ने किया है, गए थे राममंदिर बनाने लेकिन किया एकदम उलटा बाबरी मस्जिद ही तोड़ दी।
शुक्रवार, 8 जुलाई 2016
नामवर सिंह के भावी जन्मदिन पर उठे सवाल
नामवर सिंह आज जिस जगह हैं उसमें आरएसएस-भाजपा और मोदी सरकार की कोई भूमिका नहीं है।वे अच्ची तरह जानते हैं उनके व्यक्तित्व और ऊँचे कद के निर्माण में मजदूरों-किसानों की विचारधारा, मार्क्सवाद,प्रगतिशील आंदोलन और देश की उदारतावादी परंपराओं की निर्णायक भूमिका रही है।जैसा कि मीडिया में खबर है कि 28जुलाई2016को नामवरजी के लिए एक कार्यक्रम इन्दिरा गांधी कला संग्रहालय करने जा रहा है।सवाल यह है इस समय केन्द्र सरकार के नियंत्रण वाले सभी संस्थानों में आरएसएस के लोग खुलकर हमले कर रहे हैं,जेएनयू भी उनमें शामिल है।लेकिन आश्चर्य की बात है नामवरजी जैसा प्रखर आलोचक चुप है और उलटे आरएसएस की मुहिम का हिस्सा बन रहा है।हम जानना चाहते हैं प्रगतिशील आंदोलन और देश की उदारतावादी बुर्जुआ राजनीति ने नामवरजी को क्या नहीं दिया,किस चीज का अभाव उनको दिखा जिसके कारण वे मोदी के खेमे में चले गए ॽ नामवरजी को कम से कम यह तो बताना ही होगा कि उनको सी कौन सी चीज पीएम मोदी और आरएसएस में नजर आई जिसके कारण वे उनके खेमे में चले गए ॽ
नामवरजी अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी साम्प्रदायिकता और आरएसएस के खिलाफ घोषित नीतिगत समझ रही है,क्या वे अपनी पुरानी समझ को अस्वीकार कर रहे हैं ॽ यदि हां तो उनको खुलकर कहना चाहिए,लिखकर कहना चाहिए कि वे अंततःआरएसएस की शरण में क्यों जा रहे हैं ॽ यदि सत्ता संरक्षण का ही मोह है,तिरंगे झेंडे में लिपटकर मरने का ही मोह है तो वही कहें और बताएं कि उनके जैसे नास्तिक व्यक्ति को यह मोह क्यों है ॽ हम नामवरजी के 90वें जन्मदिन पर कुछ सवालों पर उनकी राय जानना चाहते हैं।सवाल इस प्रकार हैं-
1. मोदी सरकार की किस नीति को वे जनहित में सही मानते हैं ॽ
2. मोदी सरकार ने जेएनयू पर नियोजित ढ़ंग से हमला किया है,सभी अकादमिक नियमों और जेएनय़ू की परंपराओं को तिलांजलि देते हुए जिस तरह छात्रसंघ पर हमला किया,जेएनयूछात्रसंघ के नेताओं पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया,क्या उन सब पर क्या राय है।
3. विगत दो सालों में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने केन्द्र सरकार की मदद से देश के विभिन्न इलाकों में मुसलमान विरोधी मुहिम चलायी हुई है उस पर क्या कहना है ॽ
4. यूजीसी के बजट में बड़ी मात्रा में कटौती की गयी है ,क्या उसे सही मानते हैंॽ
5. मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति का मसौदा जारी किया है उससे कहां तक सहमत हैं ॽ
6. यदि इस समय कांग्रेस की सरकार होती तो क्या वैसी अवस्था में आप आरएसएस की गोदी में बैठना पसंद करते ॽआरएसएस का संरक्षण लेना पसंद करते ॽ
नामवरजी अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी साम्प्रदायिकता और आरएसएस के खिलाफ घोषित नीतिगत समझ रही है,क्या वे अपनी पुरानी समझ को अस्वीकार कर रहे हैं ॽ यदि हां तो उनको खुलकर कहना चाहिए,लिखकर कहना चाहिए कि वे अंततःआरएसएस की शरण में क्यों जा रहे हैं ॽ यदि सत्ता संरक्षण का ही मोह है,तिरंगे झेंडे में लिपटकर मरने का ही मोह है तो वही कहें और बताएं कि उनके जैसे नास्तिक व्यक्ति को यह मोह क्यों है ॽ हम नामवरजी के 90वें जन्मदिन पर कुछ सवालों पर उनकी राय जानना चाहते हैं।सवाल इस प्रकार हैं-
1. मोदी सरकार की किस नीति को वे जनहित में सही मानते हैं ॽ
2. मोदी सरकार ने जेएनयू पर नियोजित ढ़ंग से हमला किया है,सभी अकादमिक नियमों और जेएनय़ू की परंपराओं को तिलांजलि देते हुए जिस तरह छात्रसंघ पर हमला किया,जेएनयूछात्रसंघ के नेताओं पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया,क्या उन सब पर क्या राय है।
3. विगत दो सालों में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने केन्द्र सरकार की मदद से देश के विभिन्न इलाकों में मुसलमान विरोधी मुहिम चलायी हुई है उस पर क्या कहना है ॽ
4. यूजीसी के बजट में बड़ी मात्रा में कटौती की गयी है ,क्या उसे सही मानते हैंॽ
5. मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति का मसौदा जारी किया है उससे कहां तक सहमत हैं ॽ
6. यदि इस समय कांग्रेस की सरकार होती तो क्या वैसी अवस्था में आप आरएसएस की गोदी में बैठना पसंद करते ॽआरएसएस का संरक्षण लेना पसंद करते ॽ
गुरुवार, 7 जुलाई 2016
आज कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिन है- जनप्रिय केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह पर लिखना बहुत मुश्किल काम है।नामवरजी पर जल्दी लिख सकते हैं,मैनेजर पांडेय पर उससे भी जल्दी लिख सकते हैं,लेकिन केदारजी पर लिखना आसान नहीं है,उन पर लिखना नामवरजीसे भी मुश्किल काम है। दो दिन पहले से मन में तय कर लिया था कि केदारजी के जन्मदिन पर फेसबुक पर जरूर लिखूँगा।नामवरजी पर इतना लिख चुका हूँ कि सभी मित्र चिढ़ने लगे हैं,कहते हैं नामवरग्रंथि के शिकार हो ! लेकिन मैंने विगत दो दिन में महसूस किया कि केदारजी पर लिखना सबसे मुश्किल है।उनकी कविता पर सोचता हूँ तो लगता है जन्मदिन पर काव्यमीमांसा गले नहीं उतरेगी,इन दिनों फेसबुक मित्रों का आस्वाद बदल गया है,वे हल्का लिक्विड चाहते हैं जिसके जरिए केदारजी सीधे गले में उतर जाएं।
दिक्कत यह है कि केदारजी इतने सरल,सहज हैं कि वे पहले से ही तरल पदार्थ की तरह युवाओं से लेकर रचनाकारों के गले में उतरे हुए हैं,फेसबुक पर अनेक फोटोग्राफ नजर आए जिनमें वे युवाओं के बीच में हैं।समस्या यह है लेखक के बारे में यदि उसके जन्मदिन को याद करें तो किस तरह याद करें।जन्मदिन मनाने का ´केक काटो खुशियां मनाओ´,आइसक्रीम लेखक के गालों पर मल दो,यह चलेगा नहीं।आखिर जन्मदिन पर कौनसी चीज है जिसे याद करें ॽ मुझे लगता है हर लेखक से पूछा जाना चाहिए कि वह आदमी कैसा है ॽ
केदारजी को मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता।बहुत कम जानता हूँ।लेकिन जितना भी जानता हूँ वह उन पर लिखने के लिए पर्याप्त नहीं है।केदारजी से मुझे पढ़ने,उनके निर्देशन में एमफिल्,पीएचडी करने का सौभाग्य मिला,मैं उनको एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में बहुत प्यार करता रहा हूँ।केदारजी ऐसा नहीं है कि मेरे प्रिय शिक्षक थे वे उन तमाम छात्रों के प्रिय शिक्षक थे जो जेएनयू पढ़ने आते थे।मैंने अपने जीवन में इस तरह का इंसान नहीं देखा जो पढ़ाते समय डूबकर पढाए,रिश्ते और संबंध निभाते समय मानवता और संवेदनशीलता की डोर से बंधा रहे,छात्रों को तिकड़म का पाठ न पढ़ाए।
केदारजी बेहद सरल हैं लेकिन राजनीति में बेहद कठोर,उनके अंदर लोकतांत्रिक भावों और हकों को लेकर गहरी निष्ठा और लगाव है जो हम सब छात्रों को जेएनयू में प्रेरित करता रहा है।मैं जेएनयू में छात्रों के बीच में सबसे सक्रिय छात्रों की टोली में था,बहुत कम समय मिलता था उनसे मिलने का,लेकिन पढ़ने का समय मिल जाता था।केदारजीकी सबसे बेहतरीन बात यह कि वे जब कहो मिलने को राजी हो जाते।मुझे एक बार का वाकया याद आ रहा है मैं1981-82 में एसएफआई की ओर से उपाध्यक्ष का उम्मीदवार था और पूर्वांचल होस्टल में चुनावी जनसभा थी रात को,मैं एमफिल में था।वे मेरे गाइड थे। मैं चुनाव प्रचार में बुरी तरह मशगूल था,लेकिन केदारजी से मिलना बेहद जरूरी था।वे उन दिनों पूर्वांचल में रहते थे। मैंने उनसे कहा आपसे मिलना है बोले जब मन हो आ जाओ,मैंने कहा मैं आज रात पूर्वांचल होस्टल चुनावसभा करने जाऊँगा,देर रात को साढ़े बारह के बाद सभा खत्म होगी, मैं उसके बाद आपसे मिलने आ जाऊँगा।बोले बेहिचक चले आओ। मैं तकरीबन एक बजे रात को उनके पास पहुँचा,एक घंटा जमकर बातें कीं और दो बजे करीब मैंने कहा चलता हूँ,इतनी देर गए कोई सवारी वहां से मिलने की संभावना नहीं थी,पैदल ही तकरीबन 6किलोमीटर आना था।केदारजी ने कहा आधी दूर तक मैं तुमको छोड आता हूँ,हम दोनों पैदल ही रात को चलते हुए आए,केदारजी आधी दूरी मुझे छोड़कर चले गए और बोले अब तुम आराम से चले जाओगे।मैंने उनको मना किया कि मैं अकेले चला जाऊँगा,बोले नहीं बहुत दूर है,रात गहरी है,ठंड है, तकलीफ होगी,मैं कुछ दूर साथ चलता हूँ,बोरियत कट जाएगी।मैं उनके व्यवहार और आत्मीयता से मस्तभाव में बीच रास्ते में उनको छोड़कर चला आया,दिलचस्प बात यह है आधी दूर वे पैदल चलकर अपने घर गए,मैंने जेएनयू में इस तरह का मिलनसार व्यक्तित्व नहीं देखा।
दिक्कत यह है कि केदारजी इतने सरल,सहज हैं कि वे पहले से ही तरल पदार्थ की तरह युवाओं से लेकर रचनाकारों के गले में उतरे हुए हैं,फेसबुक पर अनेक फोटोग्राफ नजर आए जिनमें वे युवाओं के बीच में हैं।समस्या यह है लेखक के बारे में यदि उसके जन्मदिन को याद करें तो किस तरह याद करें।जन्मदिन मनाने का ´केक काटो खुशियां मनाओ´,आइसक्रीम लेखक के गालों पर मल दो,यह चलेगा नहीं।आखिर जन्मदिन पर कौनसी चीज है जिसे याद करें ॽ मुझे लगता है हर लेखक से पूछा जाना चाहिए कि वह आदमी कैसा है ॽ
केदारजी को मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता।बहुत कम जानता हूँ।लेकिन जितना भी जानता हूँ वह उन पर लिखने के लिए पर्याप्त नहीं है।केदारजी से मुझे पढ़ने,उनके निर्देशन में एमफिल्,पीएचडी करने का सौभाग्य मिला,मैं उनको एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में बहुत प्यार करता रहा हूँ।केदारजी ऐसा नहीं है कि मेरे प्रिय शिक्षक थे वे उन तमाम छात्रों के प्रिय शिक्षक थे जो जेएनयू पढ़ने आते थे।मैंने अपने जीवन में इस तरह का इंसान नहीं देखा जो पढ़ाते समय डूबकर पढाए,रिश्ते और संबंध निभाते समय मानवता और संवेदनशीलता की डोर से बंधा रहे,छात्रों को तिकड़म का पाठ न पढ़ाए।
केदारजी बेहद सरल हैं लेकिन राजनीति में बेहद कठोर,उनके अंदर लोकतांत्रिक भावों और हकों को लेकर गहरी निष्ठा और लगाव है जो हम सब छात्रों को जेएनयू में प्रेरित करता रहा है।मैं जेएनयू में छात्रों के बीच में सबसे सक्रिय छात्रों की टोली में था,बहुत कम समय मिलता था उनसे मिलने का,लेकिन पढ़ने का समय मिल जाता था।केदारजीकी सबसे बेहतरीन बात यह कि वे जब कहो मिलने को राजी हो जाते।मुझे एक बार का वाकया याद आ रहा है मैं1981-82 में एसएफआई की ओर से उपाध्यक्ष का उम्मीदवार था और पूर्वांचल होस्टल में चुनावी जनसभा थी रात को,मैं एमफिल में था।वे मेरे गाइड थे। मैं चुनाव प्रचार में बुरी तरह मशगूल था,लेकिन केदारजी से मिलना बेहद जरूरी था।वे उन दिनों पूर्वांचल में रहते थे। मैंने उनसे कहा आपसे मिलना है बोले जब मन हो आ जाओ,मैंने कहा मैं आज रात पूर्वांचल होस्टल चुनावसभा करने जाऊँगा,देर रात को साढ़े बारह के बाद सभा खत्म होगी, मैं उसके बाद आपसे मिलने आ जाऊँगा।बोले बेहिचक चले आओ। मैं तकरीबन एक बजे रात को उनके पास पहुँचा,एक घंटा जमकर बातें कीं और दो बजे करीब मैंने कहा चलता हूँ,इतनी देर गए कोई सवारी वहां से मिलने की संभावना नहीं थी,पैदल ही तकरीबन 6किलोमीटर आना था।केदारजी ने कहा आधी दूर तक मैं तुमको छोड आता हूँ,हम दोनों पैदल ही रात को चलते हुए आए,केदारजी आधी दूरी मुझे छोड़कर चले गए और बोले अब तुम आराम से चले जाओगे।मैंने उनको मना किया कि मैं अकेले चला जाऊँगा,बोले नहीं बहुत दूर है,रात गहरी है,ठंड है, तकलीफ होगी,मैं कुछ दूर साथ चलता हूँ,बोरियत कट जाएगी।मैं उनके व्यवहार और आत्मीयता से मस्तभाव में बीच रास्ते में उनको छोड़कर चला आया,दिलचस्प बात यह है आधी दूर वे पैदल चलकर अपने घर गए,मैंने जेएनयू में इस तरह का मिलनसार व्यक्तित्व नहीं देखा।
धर्म एक आदत है
धर्म पहले जीवनशैली का अंग था लेकिन मनुष्य के विकास के क्रम में जीवनशैली बदली धर्म की भूमिका बदली,धर्म को जीवनशैली से अलग किया गया,वह विचार बना,दर्शन बना,विचारधारा बना,लेकिन जीवनशैली से धर्म का निकल जाना सबसे बड़ी मानवीय सफलता थी।आज भी धर्म हमारी जीवनशैली के अधिकांश से बाहर धकेला जा चुका है और यह काम मनुष्य ने स्वेच्छा से किया है,अनुभवों के आधार पर किया है।पूंजीवाद के आने के साथ धर्म की समस्त मान्यताओं,पवित्रताओं के रूपों को नष्ट कर दिया है,धर्म को धंधे और मुनाफे में बदल दिया है।अब धर्म तो है लेकिन उसमें पुराने धर्म जैसी कोई चीज नहीं बची है।अब धर्म भी उद्योग है।
मनुष्य का जीवन जितना अनुभव समृद्ध होता जाता है वह धर्म को त्यागता चला जाता है।धर्म इसी क्रम में ईश्वर बना,मूर्ति बना,अंधविश्वास बना,विचारधारा बना और अंत में डिजिटल बना।
डिजिटल युग में धर्म है लेकिन आभासी रूप में।मसलन्,मैं कहने को हिन्दू हूं लेकिन हिन्दुओं के किसी धार्मिक संस्कार का नियमतःपालन नहीं करता,मैं चोटी नहीं रखता,जनेऊ नहीं पहनता ,उसे उतार चुका हूँ,मंदिर में जाता हूँ मूर्तियों को प्रणाम करता हूं,भेंट भी चढ़ाता हूं ,लेकिन ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता।मेरे अधिकांश मित्र हिन्दू हैं और भी वे भी यही करते हैं।लोग सवाल कर सकते हैं कि मैं भगवान को नहीं मानता तो मंदिरों में जाता क्यों हूँ,मैंं मंदिर में इसलिए जाता हूँ कि यह सब हमारी पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं।धर्म पहले आदत था,आज भी जिनकी आदतें नहीं बदली हैं उनके जीवन में धर्म बचा है,जिनकी आदतें बदल गयी है,धर्म उनके जीवन से निकल गया है।
पर्यटन और धर्म में अंतर करो.गंगा में डुबकीपर्यटन है,मंदिर दर्शन घूमना है, धर्म नहीं है,इसी तरह कथा सुनना टाइम पास है,धर्म नहीं।भारत की अधिकांश मेहनतकश जनता ईश्वर और उसके तंत्र पर विश्वास नहीं करती, संस्कार नहीं मानती,ईश्वर उनके लिए मनोरंजन है।
कौन बच्चा है जिसने अनेक बार भगवान की मूर्ति न तोड़ी हो! बच्चों से बड़ा ईश्वरद्रोही कोई नहीं है,बच्चे तमाम पंडितों और उनके शास्त्र से ज्यादा ताकत रखते हैं। समाज में खेल संस्कृति जितनी मजबूत होगी,ईश्वर उतना ही कमजोर होगा। ईश्वर को हमने जिस क्षण मूर्ति बनाया उसी क्षण उसे खिलौना बना दिया। ईश्वर का खिलौना बनना उसके लोप का आरंभ है।यह काम किसी और ने नहीं बच्चों ने किया,बच्चों ने खेल ही खेल में ईश्वर की जीवन से विदाई की घोषणा कर दी,इस नजरिए से देखें तो बच्चों ने ईश्वर को समाज से सर्जनात्मकता के जरिए विदा किया।आप सर्जक बनते जाइए ईश्वर स्वतः ही चला गया है आपके अंदर से।
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