बुधवार, 15 जून 2011

सिविल सोसायटी का संकीर्णतावाद


अण्णा हजारे के नेतृत्व वाले सिविल सोसायटी आंदोलन ने पुनः लोकपाल बिल पर वार्ताओं में शामिल होने का फैसला किया है उनकी शर्त है कि बंद कमरों में जो भी बातें हों उनको लाइव टेलीकास्ट किया जाए। यह मांग अपने आपमें बेतुकी है। वे जानते हैं जन लोकपाल बिल बनाने की प्रक्रिया आरंभ हो गई है और उसमें अब सरकार पीछे नहीं जा सकती। इस बिल के दायरे में प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को रखा जाए या नहीं यह निर्णय राष्ट्रीय विमर्श के बाद ही हो पाएगा। संसद में फैसला लिए जाने तक उन्हें इंतजार करना होगा। कारपोरेट मीडिया ने अण्णा हजारे और सिविल सोसायटी का जिस तरह महिमामंडन किया है उससे अण्णा का जमीनी यथार्थ समझ में नहीं आ सकता। सिविल सोसायटी के लोग कभी भी दैनंन्दिन जीवन के यथार्थ सवालों को नहीं उठाते,वे हमेशा उन्हीं सवालों को उठाते हैं जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों की संगति में आते हैं। मसलन वे महंगाई रोकने और भूमि सुधार लागू करने के लिए आंदोलन नहीं करते। उल्लेखनीय है अण्णा हजारे ने अपनी स्वयंसेवी राजनीति की धुरी धर्म को बनाया है। महाराष्ट्र के रेलीगांव सिद्धि में उन्होंने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अण्णा का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है। इस इलाके में अन्ना का सैन्य अनुशासन है। इस इलाके में हिन्दी फिल्मी गाने सुनना मना है। फिल्में देखना मना है। सिर्फ भजन सुन सकते हैं और धार्मिक फिल्में देख सकते हैं। अण्णा के सारे फैसले मंदिर में भगवान के नाम पर होते हैं। वहां पंचायत के चुनाव नहीं होते। दलित दोयमदर्जे का व्यवहार झेलते हैं। मासकल्चर के विभिन्न रूपों पर एकदम पाबंदी है। 
          अण्णा ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" असल में अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंड बदला है। अण्णा का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम मैं दूं। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अण्णा हजारे के आंदोलन के पीछे मनीपावर काम कर रही है मात्र 4 दिन में 83 लाख रूपये चंदा इकट्ठा कर लिया गया। जिसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए गए। यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।
असल में स्वयंसेवी संगठनों की एनजीओ संस्कृति नियोजित कारपोरेट पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है। भारत में हजारों एनजीओ हैं जिनको विदेशों से सालाना पांच हजार करोड़ रूपये से ज्यादा चंदा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संगठनों द्वारा प्रदान किया जाता है।एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है। विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते हैं। अण्णा हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अण्णा हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारात्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और फासिस्ट हैं कि वे अण्णा हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अण्णा की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले व्यक्तिगत पर कीचड उछाल रहे हैं। औकात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अण्णा के पीछे सक्रिय फासिज्म है। अण्णा की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे फिनोमिना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है। इसका लक्ष्य है राजनीतिक दलों को बेमानी करार देना। संसद-विधानसभा आदि के द्वारा तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया और परंपराओं का उल्लंघन करना। आयरनी यह है कि अण्णा हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। असल में एनजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है।इनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है। ये सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हैं। तुरंत समाधान की मांग करते हैं। यह 'पेंडुलम इफेक्ट' पद्धति है। इसमें चट मगनी पट ब्याह। यह संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। वे छद्म संदेश दे रहे हैं सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है। जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। असल में सिविल सोसायटी आंदोलन की धुरी है लोकतांत्रिक संस्थाओं ,नियमों और परंपराओं की अवहेलना करना।इसे मनमोहन सरकार बढ़ावा दे रही है।
          


मंगलवार, 14 जून 2011

अन्ना हजारे और सिविल सोसायटी का नाटक


           सिविल सोसायटी का मीडिया में बोरिंग नाटक चल रहा है । सिविल सोसायटी के बारे में एक जमाने में समाजशास्त्रियों ने उच्चवर्ग को रखा था और आज भी सिविल सोसायटी में वे ही आते हैं। यह जड़ वर्ग का समाज है।मीडिया में अन्ना और कांग्रेस  में नोंक-झोंक चल रही है।सोनिया गांधी मजे ले रही हैं।मनमोहन सिंह आराम फरमा रहे है हैं,मीडिया बतखोरी कर रहा है। मूलतः अन्नाटीम और कांग्रेस के बीच की पूरी बहस अर्थहीन है। मूल बात है जन लोकपाल बिल और उस पर कोई बात नहीं हो रही।
अन्ना हजारे नाराज हैं कि उन्हें संघ का एजेंट कहा है कांग्रेस नेताओं ने। वैसे अन्ना का यह भी मानना हो सकता है कि वे कभी संघ की शाखाओं में नहीं गए ,संघ के ऑफिस भी नहीं गए फिर उन्हें एजेंट क्यों कहा गया ? असल में कांग्रेस नेता अन्ना के विचारधारात्मक चरित्र के आधार पर बोल रहे हैं।
     संघ ने अन्ना की जिस तरह मदद की ,वह संघ के लिए नई बात नहीं है,वह इस तरह के मुखौटों का इस्तेमाल करता रहा है।यह भी सच है अन्ना किसी दल के सदस्य नहीं हैं। लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि संघ उनका समर्थन नहीं कर रहा। संघ कह रहा है कि वह समर्थन कर रहा है। ऐसे में अन्ना के खंडन का कोई अर्थ नहीं है। संघ यदि अन्ना का समर्थन कर रहा है तो इसमें गलत क्या है ? अन्ना रक्षात्मक क्यों हैं ? संघ का समर्थन मिलना कोई गाली नहीं है। संघ के लोगों को भी समझना चाहिए कि वे इस तरह के बयानों पर भड़कें नहीं। कौन किसके साथ है यह आम लोग जानते हैं ,जो नहीं जानते थे, वे जान गए हैं ,या जान जाएंगे। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह कायम है कि अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन तब क्यों शुरू किया जब सोनिया गांधी के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने लोकपाल बिल पर मसौदा बना लिया था।प्रधानमंत्री वायदा कर चुके थे संसद में जल्द ही लोकपाल बिल पेश करने का। अन्नाटीम के अधिकांश लोग उस समिति में थे जो सोनिया गांधी ने बनायी थी। सवाल यह है कि उस समय प्रणव मुखर्जी को अन्ना आंदोलन में शामिल लोगों का संघ से लिंक दिखायी क्यों नहीं दिया ? अन्ना टीम के लोग आज भी सोनिया गांधी की सलहकार टीम में क्यों हैं ? असल में अन्ना बनाम कांग्रेस की यह नूरा फाइट है यह रामलीला मैदान लाठीचार्ज का विरेचन है।
प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस के नेता जबाब दें कि सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में,जो केन्द्र सरकार को नीतियां बनाने का सुझाव देती है,वहां पर सिविल सोसायटी के लोगों को बड़ी तादाद में क्यों रखा है ? क्या भारत में सिविल सोसायटी वालों के अलावा नीतियों पर सोचने वाले विचारक नहीं हैं ? सिविल सोसायटी वालों को सरकार के सिर पर सोनिया ने बिठाया है,क्या वे उन्हें सरकार के सिर से उतारने को तैयार हैं ?असल में सिविल सोसायटी के लोगों को नीति-निर्धारक बनाकर कांग्रेस ने स्वयं ही संसद को बौना बनाया है।सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश के सामने गंभीर लोकतांत्रिक संकट पैदा कर दिया है। जो सलाहकार है वे चुनेहुए प्रतिनिधियों की राय की उपेक्षा कर रहे हैं,संसद,मंत्री आदि को ठेंगा दिखा रहे हैं। इस समूची प्रक्रिया में लोकतंत्र खोखला हो रहा है। ये वे लोग हैं जो आए दिन राजनीतिक दलों और नेताओं को गरियाते हैं और सबसे भ्रष्ट राजनीतिक दल की सलाहकार समिति में बैठे हैं।
अन्ना हजारे का आंदोलन जनलोकपाल बिल से ज्यादा टीवी लाइव कवरेज पर केन्द्रित है। अन्ना टाइप नेतागण और सिविल सोसायटी वाले टीवी क्रांति के टॉकशो के बातूनी बच्चे हैं । यही वजह है कि वे वीडियो कवरेज और लाइव टेलीकास्ट की मांग कर रहे हैं। प्रणव मुखर्जी का कहना है  लोकपाल बिल मसौदा कमेटी की बैठकों का ऑडियो कवरेज मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल की वेबसाइट पर  उपलब्ध है।सवाल यह है क्या इस तरह की सुविधा अन्य किसी कमेटी की मीटिंग को दी गई ? संयुक्त संसदीय समिति या विभिन्न मंत्रालयों की अन्य समितियों की ऑडियो रिकॉर्डिंग क्यों नहीं करायी गयी ? सिविल सोसायटी के लोगों के साथ यह खास व्यवहार क्यों ?
उल्लेखनीय है कांग्रेस पार्टी ने आरएसएस के खिलाफ सीधे हमला बोला है।सवाल उठता है कांग्रेस को संघ परिवार के खिलाफ खुलकर सामने आने में इतनी देर क्यों लगी ? कांग्रेस कोरकमेटी के अंदर इतने पंगे हैं कि अन्ना हजारे पर राय बनाने में 2 माह लग गए ? यह वही कांग्रेस है जो अपने नेताओं के खुले विचारों के लिए जानी जाती थी। काश ,कोर कमेटी के कभी तो मिनट्स लीक हों ? कोई खोजी पत्रकार निकालकर लाए आखिर प्रणव मुखर्जी बाबा के साथ हैं या दिग्विजय सिंह के ?
अन्ना हजारे लाख कहें कि संघ के एजेंट नहीं हैं,प्रणव मुखर्जी तो 'ज़ौक़' के लफ़्जों में कह रहे हैं-"हम उनकी चालसे पहचान लेंगे उनको बुर्के़ में। हजार अपनेको वह हमसे छिपायें सरसे पाँवों तक।।"
        दिग्विजय सिंह का मानना है कि पीएम को भी लोकपालबिल के दायरे में लाया जाए, इसके पीछे कांग्रेस के अंदर का विचारधारात्मक संघर्ष झलक रहा है, अन्ना हजारे तो मात्र पीएम , सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और क्लर्को को उसके दायरे में लाने की बात कर रहे थे लेकिन दिग्विजय सिंह ने कारपोरेट घरानों और एनजीओ संगठनों को भी इसके दायरे में लाकर नई पहल की है ,देखना है अन्ना हजारे क्या कहते हैं ?लगता है यह राहुल गांधी का आइडिया है। असल में अन्ना वेसब्र हैं और बाबा रामदेव उग्रस्वभाव के हैं इस पर मीर का ही एक शेर याद आ रहा है,लिखा है, "ख़ुदा जाने क्या होगा अंजाम इसका। मैं वेसब्र इतना हूँ,वोह तुन्दखू है।।" ( तुन्दखू यानी उग्रस्वभावी)
अन्ना हजारे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने जो आरोप लगाएं हैं उस पर 'मीर' का एक शेर याद आ रहा हैं,शेर है- "तुहमतें चन्द अपने जिम्मे धर चले।किसलिए आए थे और क्या कर चले ?"
सवाल यह है कि जन लोकपाल बिल के दायरे में पीएम,सीएम,न्यायाधीश,मुख्यन्याधीश और सभी कोटि के कर्मचारी रख दिए जाएं तो क्या भ्रष्टाचार कम हो जाएगा ?भ्रष्ट लोगों को फांसी पर लटकाने या आजन्म कैद में रखने की व्यवस्था कर दी जाए तो क्या सतयुग आ जाएगा ? लगता है अमेरिका नहीं गए सिविल सोसायटी वाले ,वहां सब कुछ कड़ा है लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ा है ?
यह सवाल भी उठा है कि अन्ना हजारे और उनके साथ के स्वयंसेवी संगठनों को किससे पैसा मिलता है ? उनको सरकार से कभी पैसा मिला है ? किसी कारपोरेट घराने से पैसा लिया है ? विदेश से पैसा मिला है ? आम जनता से कितना पैसा एकत्रित किया है ? हमारा मानना है स्वयंसेवी संगठनों को विदेश से मिलने वाले धन पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए । 
हाल ही में अन्ना ने दुखी होकर सोनिया गांधी को पत्र लिखा है। सच यह है कीचड़ उछालने का काम अन्ना के मित्रों ने पहले किया,उन्होंने राजनीतिकदलों और राजनेताओं पर पहले हमला बोला।साथ ही सांसदों-विधायकों को भला-बुरा कहा। अब वे यह कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी राजनीतिक मरम्मत न की जाए। यह तो राजधर्म है।अन्ना हजारे टीम को याद रखना होगा भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं राजनीतिकदल ,न कि सिविल सोसायटी और साम्प्रदायिक-धार्मिक संगठन।
अन्ना हजारे का गुस्सा जायज है,यह सच है वे संघ के सदस्य नहीं हैं क्योंकि संघ में सदस्यता की रसीद नहीं काटी जाती ,और न एजेंट का ही कोई पद है। अन्ना तो समाजसेवा करते हैं और संघ परिवार सामाजिक संगठन के नाते उनकी मदद करता है। संघ की सेवाएं वे पहले भी कई मर्तबा ले चुके हैं। कई मर्तबा संघ को सेवाएं दे चुके हैं। इसमें अन्ना को गुस्सा क्यों आ रहा है ? क्या अन्ना कहेंगे कि संघ फासिस्ट संगठन है ? अन्ना और उनका समूह देश की ठोस समस्याओं से बेखबर है। इसका दो-एक उदाहरण ही काफी हैं।
देश में विश्वविद्यालयों -कॉलेजों में 58 प्रतिशत पद अभी तक खाली पड़े हैं। खाली पदों को भरने में सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है। कच्चे-पक्के बंदों से शिक्षण में मदद ले रहे हैं ,और माटी के माधो तैयार कर रहे हैं। राजनीतिक दलों , शिक्षक संगठनों , अन्ना,बाबा रामदेव और सिविल सोसायटी वाले को भी ख्याल नहीं आता,सवाल उठता है क्या शिक्षा का सिविल सोसायटी से कोई संबंध है ?
अन्ना हजारे में जो जीवन की सुंदरता देख रहे हैं संभवतःइसे ही ध्यान में रखकर अकबर इलाहाबादी ने लिखा- "बर्क़के लैम्पसे आँखोंको बचाये अल्लाह। रौशनी आती है,और नूर चला जाता है।।"हमारे कुछ मित्र हैं अन्ना हजारे- बाबा रामदेव की आलोचना कर रहे बुद्धिजीवियों पर नाराज हैं उनके लिए अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- "हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-जब्ती समझते हैं।कि जिनको पढ़के,लड़के बापको खब्ती समझते हैं।।"

अन्ना हजारे के संदर्भ यह सवाल उठता है कि क्या भारत में लोकतंत्र के साथ command-obedience relationship का मेल बैठता है? यह लोकतंत्र की मूल स्प्रिट के ही खिलाफ है अपने कर्मक्षेत्र रेलीगांवसिद्धि में अन्ना ने इसी संबंध को लागू किया है। सवाल यह है क्या मंदिरों में जनता के भविष्य के फैसले होंगे ?  
जिस तरह भक्ति साहित्य को प्रेम के बिना नहीं पढ़ सकते वैसे ही लोकतंत्र को धर्म को त्यागे बिना नहीं समझ सकते। धर्म तो लोकतंत्र की महाबाधा है। लोकतंत्र का कुर्बानी के बिना विकास नहीं होता । बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के पीछे की जनता पर बहुत जोर दिया है मीडिया ने। बाबा के यहां जनता नहीं योग शिविर वाले लोग आए थे। और अन्ना के साथ में वे लोग ज्यादा थे जो विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों में काम करते थे।इनका नेटवर्क है । इनमें सैंकड़ों स्वयंसेवी होलटाइमर हैं। जनता कम थी दोनों के यहां। सरकार में बैठे अन्ना के अंधभक्तों पर हसरत मोहानी का शेर याद आ रहा है,शेर है," हम हाल उन्हें यूँ सुनाने लगे हैं। कुछ कहते नहीं ,पाँव दबानेमें लगे हैं।।"









शनिवार, 11 जून 2011

धर्मनिरपेक्ष भारत का महान चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन

एमएफ हुसैन का इंतकाल कलाजगत की अपूरणीय क्षति है। 10जून 2011 को उन्हें दक्षिण लंदन के ब्रुकबुड कब्रिस्तान में दफना दिया गया। उनकी यह अंतिम इच्छा थी कि वे जहां मरें वहीं दफनाए जाएं। भारत सरकार ने उन्हें भारत लाकर दफनाने का अनुरोध किया था जिस पर उनके बेटा-बेटी विचार भी कर रहे थे ,लेकिन अंत में हुसैन की इच्छा के अनुरूप ही उनका अंतिम संस्कार लंदन में ही किया गया।
हुसैन जबतक जिंदा रहे कलाकारों और कलाभोक्ताओं को बार-बार नए सवालों की ओर आकर्षित करते रहे। वे हमेशा एक नए विषय को उठाते और उस पर कलाजगत से लेकर आम आदमी तक चर्चा होती। वे जहां जाते वहां आलोचनात्मक वातावरण की सृष्ठि करते। उनकी इसी सर्जक शक्ति ने उन्हें महान कलाकार बना दिया। वे पेंटर थे साथ ही बहुत बड़े विचारक भी थे। उन्हें बंदिशें और सीमाएं परेशान करती थीं। अपनी पेंटिंग के बहाने उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक बंदिशों और संकीर्णताओं के खिलाफ राय बनायी। रंगों को उन्होंने तहजीब में तब्दील किया। कला के सामाजिक सरोकारों के दायरों में रद्दोबदल किया और कलाओं को सम-सामयिक आंदोलनों से जोड़ा।
एमएफ हुसैन की चंद पेंटिंग पर हिन्दू फंडामेंटलिस्टों की आपत्तियों के अलावा हुसैन की अधिकांश पेंटिंग ऐसी हैं जिनके बारे में फंडामेंटलिस्टों ने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की। इससे एकबात पता चली कि फंडामेंटलिस्टों को सीमित कलाज्ञान है। वे कलाओं की नीति-उपदेशकों की तरह आलोचना करते हैं।कलाओं को नीति और उपदेशों से नहीं समझा जा सकता।कला जीवन की हूबहू छबि नहीं है।
एमएफ हुसैन ने अपनी कला से भारत की सोई हुई आत्मा को जगाया है। उनकी कला भारत को जानने,जुड़ने और उसके लिए कुछ करने का ज़ज्बा पैदा करती है। यही वजह है कि वे मरकर भी सबसे ज्यादा चर्चा के केन्द्र में हैं। हुसैन ने जीवन के अछूते और गुमनाम विषयों को अभिव्यक्ति देकर कला और जीवन के नए संबंधों को जन्म दिया है। उनकी कला में भारत बोलता है। एमएफ हुसैन की कलाकृतियों में उनके मन का हिन्दुस्तान बसता है। वे मर गए हैं लेकिन अपने सपनों का भारत धरोहर में दे गए हैं। मुझे बेलिस्की के शब्द याद आ रहे हैं। बेलिंस्की ने लिखा था-"हमारे युग की कला क्या है ? न्याय की घोषणा,समाज का विश्लेषण,परिणामतः आलोचना।विचारतत्व अब कलातत्व तक में समा गया है।" हुसैन की कला पर ये शब्द खरे उतरते हैं।

     एमएफ हुसैन का अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुरूप हुआ।यह उनके जीवन की आखिरी बड़ी उपलब्धि थी। इस पर किसी शायर का शेर है -"ख़बर उनको हुई होगी, अजब क्या वे चले आएँ।जनाजा ले चलो सूएमज़ार आहिस्ता-आहिस्ता।।"
एमएफ हुसैन की विदेश में मौत का एक ही सबक है कि जो संगठन या व्यक्ति कलाओं और कलाकारों के प्रति विद्वेष पैदा करें,हमले करें,आतंक पैदा करें,उन्हें आजीवन जेल में बंद किया जाना चाहिए। कलाओं और कलाकारों का समाज में सम्मान करने की जरूरत है। समाज उनके लिए है, कलाविरोधी गुण्डों के लिए नहीं। क्या सरकार इस दिशा में कानून बनाएगी ?
धर्मनिरपेक्ष कला और कलाकारों को हिन्दुत्ववादी संगठन समय -समय पर कलंकित करते रहे है।इससे सारी दुनिया में भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की धज्जियां उड़ी हैं। एमएफ हुसैन का भागकर विदेश जाना और वहां शरण लेना धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की असमर्थता का संकेत है। सवाल यह है हिन्दुत्ववादी संगठन धर्मनिरपेक्ष कलाओं से घृणा क्यों करते हैं ? क्या यह देशभक्ति है ?
उनकी मौत पर फंडामेंटलिस्टों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े करना गढ़े मुर्दे उखाड़ना नहीं है।समस्या इससे भी ज्यादा गहरी है और हुसैन का हमारे देश में वापस न लौटना ,शर्म की बात है, जो लोग काले धन को विदेश से वापस लाना चाहते हैं वे अपने सोने की खान जैसे कलाकार को वापस नहीं लाना चाहते थे। वे धन से प्यार करते हैं कलाओं-कलाकारों से नहीं। सवाल यह है कलामें नग्नता पर बात करो, किसी को मारोगे क्यों,अपमानित क्यों करोगे,पेंटिंग क्यों तोडोगे, सवाल उठता है क्या खजुराहो को तोड़ देंगे हम ? क्या लिंग और योनि पूजा पर पाबंदी लगा देंगे ? फंडामेंटलिस्ट जानते नहीं हैं कलाओं और भारतीय परंपरा को।
एमएफ हुसैन की विदेश में मृत्यु भारत की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रशक्ति की सबसे बड़ी असफलता है। विचारणीय सवाल है कि हुसैन को अपने देश वापस लाने में सरकार असमर्थ क्यों रही ? हुसैन के मन में सुरक्षा का भरोसा पैदा क्यों नहीं कर पाई ?
हुसैन की जिन विवादास्पद पेंटिंग पर हंगामा हुआ उस उन्होंने कहा था कि मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था और किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो मैं माफी मांगता हूं। इसके बाबजूद हिन्दू फंडामेंटलिस्ट संगठनों ने अपनी फासिस्ट हरकतें बंद नहीं की,जगह-जगह उनकी पेंटिंगों पर हमले किए ,उन पर सैंकड़ों मुकदमे देश के विभिन्न शहरों में दायर कर दिए। उनकी जिंदगी को पूरी तरह असुरक्षित बना दिया और परिणामतः उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा। हुसैन चले गए लेकिन जिन कलाओं ने उन्हें महान बनाया,हमारे कलाजगत को महान बनाया ।ऐसी सैंकड़ों-हजारों कलाकृतियां धरोहर में दे गए हैं। ये कलाएं हुसेन को हमेशा लोगों के दिलो-दिमाग में उन्हें जिंदा रखेंगी । वे नहीं हैं, लेकिन हैं। वे अपनी कलाओं में भारत की सभ्यता और संस्कृति का एक नया नजरिया देकर गए हैं। नए धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना सौंपकर गए हैं। 

बुधवार, 8 जून 2011

बाबा रामदेव, कांग्रेस और मीडिया

बाबा रामदेव के अनशन पर 4 जून की रात को अचानक 12.30 बजे पुलिस के हजारों सिपाहियों ने घेरा डाल दिया। सोते हुए नागरिकों पर लाठीचार्ज,जबर्दस्ती खदेड़ने ,मारने,आंसू गैस के गोले छोड़ने आदि के कारण अनेक लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना है  उनकी सरकार के पास इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं था । असल में कांग्रेस को बाबा पर अपनी रणनीति तय करने में वक्त लगा और जब बाबा से मुठभेड़ का फैसला किया तब तक 1 लाख लोग अनशन स्थल के आसपास पहुँच गए थे। इससे यही पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक तौर पर फैसले लेने में किस कठिनाई से गुजरना पड़ा होगा। पहले कांग्रेस ने तदर्थभाव से बाबा के अनशन को लिया और टुकड़ो में उसे सिलटाने की सोची थी ,लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां तदर्थ में सोचने की कांग्रेस की आदत के अनुकूल नहीं थीं ,अतः कांग्रेस ने बाबा का राजनीतिक मुकाबला करने का फैसला किया और उसी फैसले के तहत अनशन स्थल पर पुलिस एक्शन हुआ। आज 8 जून 2011को अन्ना हजारे इसके प्रतिवाद में अनशन कर रहे हैं, अपनी तदर्थ राजनीतिक समझ के कारण अन्ना हजारे के पहले वाले अनशन को कांग्रेस ठीक से देख ही नहीं पायी लेकिन अब इन दोनों से ही उसने टकराव का रास्ता अपना लिया है।
    बाबा के अनशन का अहर्निश लाइव कवरेज करने वाले चैनलों की पुलिस एक्शन के समय की छवियों के प्रसारण को लेकर जो भूमिका रही है वह चिंता की बात है और उसने कई नए सवालों को जन्म दिया है।
मसलन्, कारपोरेट मीडिया पर मनमोहन सरकार की अघोषित सेंसरशिप है या सेल्फ सेंसरशिप है ?बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर टीवी चैनलों ने ढाई घंटे की पुलिस कार्रवाई के बर्बर दृश्यों को सेंसर कर दिया है। कारपोरेट मीडिया की इस तरह सत्य को छिपाने की कोशिश की तीखी आलोचना की जानी चाहिए।इससे कारपोरेट मीडिया की पोल खुलती है ।कि वो किससे के साथ है ? आजतक ने किस दबाब में पुलिस बर्बरता को छिपाया है ? अपने वेब पेज पर पीटीआई की मासूम तस्वीरें दी हैं इनको देखकर नहीं लगता कि बाबा के अनशन स्थल पर कोई पुलिस वाला मार रहा था ? टीवी चैनलों का पूरी नंगई के साथ अनशन पर पुलिस की बर्बरता को छिपाना अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है ?जिस समय बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर पुलिस ने घेरा डाला,लाठीचार्ज किया उस समय एकमात्र स्टार न्यूज के संवाददाता दीपक चौरसिया कमेन्ट्री कर रहे थे। बाकी चैनल वाले सोए हुए थे।वे सब बाद में धीरे धीरे पहुँचे।पीटीआई संवाद एजेंसी किस तरह सरकारी एजेंसी की तरह काम करती है और सेंसरशिप का प्रयोग करते हैं,आजतक चैनल की वेबसाइट पर दी तस्वीरें इसका आदर्श प्रमाण हैं। ऐसी अवस्था में लोग किस पर विश्वास करें ? स्टार न्यूज पर दीपक चौरसिया बता रहे थे कि कैसे पुलिस लाठियां बरसा रही है,औरतों को पीट रही है,नृशंसतापूर्ण व्यवहार कर रही है लेकिन तस्वीरों में यह सब गायब था। स्टूडियो में फोटो सेंसर करके सीधे कमेंट्री सुनाई जा रही थी।
एनडीटीवी पर विष्णुसोम आते हैं और वे उन्हीं तस्वीरों को दिखाते हैं जो स्टार न्यूज की थीं लेकिन कमेंट्री अपनी बनाते हैं। बाद में उनकी संवाददाता पहुँचती है लेकिव तस्वीरें नहीं आतीं। आखिर बर्बर लाठीचार्ज की तस्वीरें किसके कहने से सेंसर की गईं ?
टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी हरकत में आते हैं। संवाददाताओं को भेजते - खोजते हैं। स्टार न्यूज की इमेजों का प्रक्षेपण जारी रखते हैं। उनके 2 संवाददाता पहलीबार यह बताते हैं कि पुलिस ने दोपहर ही बाबा को नोटिस दिया था कि आपको दी गई परमीशन क्यों न कैंसिल कर दी जाए।बाबा जबाब नहीं देते। मीडिया ने उस समय यह खबर क्यों नहीं दी ?टाइम्सनाउ ने भी नहीं दी।क्यों ?
टीवी चैनलों ने बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर लाठीचार्ज की जो तस्वीरें दी हैं उनमें यह सामान्य पुलिस कार्रवाई लगती है। जबकि उनके बयानों में यह असामान्य कार्रवाई थी। क्या यह रूटिन पुलिस एक्शन था ?बाबा रामदेव से लेकर भारतीय जनता पार्टी के आडवाणी जी तक कह रहे हैं यह जलियांवालाबाग जैसी घटना है। यह तुलना सरासर गलत है।जलियाँबाग की नृशंस घटना के बाद सारे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गयी थी। बाबा रामदेव के अनशन पर लाठीजार्ज को जनता ने सामान्य भाव से लिया है। भाजपाके बड़े नेता अपने धरने पर 5हजार की भीड़ भी नहीं जुटा पाए।

बाबा रामदेव ने उस समय दिल्ली की जनता का आह्वान किया था कि वो घरों से आकर प्रतिवाद करें।संभवतः ज्यादातर लोगों ने उसे देखा ही नहीं था। बाबा रामदेव बताएंगे कि कितने लोग घायल हुए ?टीवी चैनल वाले अभी तक संख्या क्यों बता रहे ? उस रात विभिन्न अस्पतालों में कितने अनशनकारी लोगों का इलाज हुआ।किस तरह की चोटें आईं उन्हें ?बाबा रामदेव के कहा है कि उनके पास सभी अनशनकारियों के मोबाइल नम्बर हैं। फिर उन्होंने अभी तक घायल अनशनकारियों के नाम-पते जारी क्यों नहीं किए ? फिर उन लोगों की मीडिया जांच करे ?आस्था चैनल बाबा रामदेव चलाते हैं और उस चैनल के लोग भी कैमरा लेकर 4जून को अनशन स्थल पर थे पुलिस एक्शन के समय के उनके कैमरे में बंद फुटेज आज तक क्यों नहीं दिखाए गए ? बाबा किसका इंतजार कर रहे हैं ? किस मंशा से नहीं दिखाए अभी तक फुटेज ?         
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले पर संज्ञान लिया है और संबंधित संस्थानों से जबाव मांगे हैं।मानवाधिकार आयोग ने भी नोटिस जारी किए हैं। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को सभी प्रमुख चैनलों कवरेज से असंपादित फुटेज जमा करने के लिए कहना चाहिए ।अनशन स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे , अदालत को दिल्ली पुलिस को आदेश देना चाहिए कि वह सीसीटीवी कैमरों के जरिए लिए गए सभी चित्रों को अदालत में पेश करे ,इससे पुलिस बर्बरता को समझने में मदद मिलेगी।  




बाबा रामदेव और तमाशबीनों का संसार


हाल ही में बाबा रामदेव का तमाशा खत्म हुआ है उसके पहले अन्ना हजारे का तमाशा देखा था। ये सारे इवेंट टीवी कवरेज को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। इनमें मसले से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रचार अभियान और मीडिया कवरेज। टीवी चैनलों की बाढ़ ने हमें नागरिक की बजाय तमाशबीन बना दिया है।
बाबा रामदेव को कल पुलिस ने रामलीला मैदान के अनशन स्थल पर जाकर गिरफ्तार कर लिया। बाबा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को जमकर लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े। बाबा की कानूनभंजक राजनीति का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था।बाबा रामदेव के आंदोलन का पहला निष्कर्ष है कि यह नियोजित आंदोलन था। दूसरा, किसी आंदोलन के संदर्भ में संचार क्रांति के टांय-टांय फिस्स के
आदर्श के रूप में इस घटना को जाना जाएगा। तीसरा. पापुलिज्म और फेकनेस बहुत ज्यादा समय तक बने नहीं रहते। चौथा,फेक और नेक में हमें अंतर करने की समझ पैदा करनी चाहिए।पांचवां, संघ परिवार अपनी राष्ट्रतोड़क-अराजक राजनीति में प्रच्छन्न ढ़ंग से सक्रिय है। छठा, सत्ता यदि साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति सख्ती से पेश आए तो वे भाग खड़े होते हैं। सातवां,बाबा के 50 हजार के जमावड़े को पुलिस
ने जिस कौशल से मात्र डेढ़ घंटे में रामलीला मैदान से भगा दिया उससे यह भी पता चलता है कि बाबा आंदोलन के नाम पर सरल-सीधे लोगों को ,बहला-फुसलाकर ले आए थे। इन लोगों ने कोई खास प्रतिवाद नहीं किया।आठवां, दिल्ली पुलिस ने इतने बड़े जमाबड़े को न्यूनतम लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले छोड़कर घटनास्थल से हटाकर भीड़ नियंत्रण की नयी मिसाल कायम की है।नौ,पुलिस एक्शन के कवरेज को कारपोरेट मीडिया में जमकर सेंसर किया गया है,पुलिस बर्बरता के दृश्य गायब हैं। ये सारा कारोबार तमाशबीनों के नजारे की तरह है।तमाशबीन की तरह देखना आधुनिक पूंजीवादी समाज का लक्षण है। यह ऐसा समाज है जहां प्रतीक (साइन) की जगह हम व्यंजित को देखते हैं। मौलिक की नकल करते हैं। यथार्थ के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं। असल में हम जो कुछ देख रहे हैं वह सब कल्पना है,विभ्रम है। कल्पना एक जमाने में आनंद देती थी इन दिनों भय पैदा करती है। सत्य दुर्लभ होता जा रहा है और कल्पना का विस्तार हो रहा है। पूंजीवादी समाज में जितना कल्पना का विस्तार होता है उसी मात्र में भय का विस्तार भी होता है। भय और कल्पना की इस अन्तर्क्रिया ने समूची सामाजिक चेतना को आच्छादित कर लिया है। फलतः सत्य छोटा हो गया है और कल्पना बड़ी हो गयी हैं।
आज भारत में उत्पादन के आधुनिक साधनों का वर्चस्व है। उत्पादन के आधुनिक उपकरणों का वर्चस्व ही है जो हम सबको तमाशबीन बना रहा है। इसके कारण बड़े पैमाने पर नजारे देखने को मिलते हैं। अब हम जो कुछ देखते हैं वह सब इमेजों में देखते हैं,इमेजों के जरिए ही समाज समझते हैं। अब व्यक्ति का नहीं इमेजों को देखते हैं। जिन इमेजों को देखते हैं उनका सामान्य जीवन से कोई संबंध नहीं
होता।फलतःजीवन की एकीकृत धारणा भी नहीं बना पाते। जीवन में चीजों के बीच अन्तस्संबंध नहीं बना पाते। यथार्थ हमेशा अधखुला नजर आता है। यथार्थ अपनी आंतरिक एकता से कटा नजर आता है। जिस दुनिया को देखते हैं वह छद्म होती है। जिन वस्तुओं को देखते हैं वे उलझन पैदा करती हैं। जब इमेजों के संसार में विशिष्टिकृत इमेजों को रच लेते हैं तो इमेजों का स्वायत्त संसार पूर्णता प्राप्त कर लेताहै। जिंदगीरहित चीजें स्वायत्त विचरण करने लगती हैं।
मौजूदा समाज में इमेजों को देखना और उनमें ही जीना सामान्य बात हो गयी हो गयी है। ऐसे में नज़ारे ही प्रमुखता अर्जित कर लेते हैं। इमेज और उनके नजारे ही एकता के सूत्र बन जाते हैं। अब हम नज़ारों को देखते हैं,नज़ारे हमें देखते हैं। एक-दूसरे को देखना ही एकीकरण का मंत्र बन जाता है। नज़ारे ही समाज को जोड़ने का उपकरण बन जाते हैं। समाज में जहां जाओ सब एक-दूसरे को घूर रहे हैं। अब घूरना ही चेतना का निर्धारक तत्व बन गया है। घूरना छद्मचेतना का प्रभावशाली आधार है। वंचित और समर्थ सभी एक-दूसरे को घूर रहे हैं। नज़ारों और घूरने के आधार पर ही हमारी चेतना बन रही है।
हम जब इमेज देखते हैं तो सिर्फ इमेजों को ही नहीं देखते बल्कि इमेजों के जरिए जनता के बीच के सामाजिक संबंधों को देखते हैं। जनता के सामाजिक संबंधों के बीच में सेतु का काम इमेज करती हैं। इमेजों को विज़न के दुरूपयोग के जरिए नहीं समझा जा सकता। बल्कि इमेजों का उत्पादन जनोत्पादन की तकनीक के गर्भ से होता है। हम जिन इमेजों को मीडिया के विभिन्न रूपों के माध्यम से देखते हैं वे सभी सामाजिक वर्चस्व वाले मॉडल का प्रतिनिधित्व करती हैं। अब हमारे सामने तयशुदा चीजें पैदा करके रख दी गयी हैं और हमें अब इनमें से ही चुनना होता है। यह तय है कि किसमें से चुनना है, कितना चुनना है और क्यों चुनना है। यह सब पहले ही निर्धारित है।
नागरिकों को उपलब्ध उत्पादन संबंधों में से ही चुनना होता है। हम जो चुनते हैं वह अवास्तविक होता है,काल्पनिक होता है। जो चुनते हैं वह वास्तव सामाजिक यथार्थ में कुछ भी नया नहीं जोड़ता। इसमें हम सिर्फ जो उपलब्ध कराया जा रहा है उसमें से ही चुनते हैं। उपभोग करते हैं। विचार,प्रचार,विज्ञापन,मनोरंजनआदि का उभोग करते हुए सामाजिक वर्चस्व का ही उपभोग करते हैं। फलतः सामाजिक वर्चस्व का हिस्सा मात्र बनकर रह जाते हैं। हम जिन नज़ारों को देखते हैं वे रूप और अन्तर्वस्तु में मौजूदा व्यवस्था की वैधता को ही हमारे ज़ेहन में उतारते हैं। मौजूदा व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों की वैधता को पुष्ट करते हैं। नज़ारे हमारे मन में व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों के प्रति स्थायी वैधता पैदा करते हैं।

सोमवार, 6 जून 2011

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कुछ कविताएं




 मैं नहीं चाहता- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सड़े हुए फलों की पेटियों की तरह
बाजार में एक भीड़ के बीच मरने की अपेक्षा
एकान्त में किसी सूने वृक्ष के नीच
गिरकर सूख जाना बेहतर है।

मैं नहीं चाहता कि मुझे
झाड़-पोंछकर दूकान पर सजाया जाय,
दिन -भर मोल-तोल के बाद
फिर पेटियों में रख दिया जाय,
और फिर एक खरीदार से
दूसरे खरीदार की प्रतीक्षा में
यह जीवन अर्थहीन हो जाये।


जूता-1- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मेरा जूता
जगह-जगह से फट गया है
धरती चुभ रही है
मैं रूक गया हूँ
जूते से पूछता हूँ-
' आगे क्यों नहीं चलते ?'
जूता पलटकर जबाब देता है-
' मैं अब भी तैयार हूँ
यदि तुम चलो !'
मैं चुप रह जाता हूँ
कैसे कहूँ कि मैं भी
जगह-जगह से फट गया हूँ।

जूता-2- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
जब से मैंने
नया जूता खरीदा है
मेरी चाल बदल गयी है
पर जमाने की चाल वही है।
दोस्त कहते हैं
मैं बायें पैर पर ज्यादा वजन डालने लगा हूँ
बात यह है
कि दाहिने पैर की तकलीफ टालने लगा हूँ;

जूता-3- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
उसने कहा-
मेरे जूते की पालिश में
तुम अपना चेहरा देख सकते हो।
मैंने तिलमिलाकर सोचा
वे लोग खुशनसीब हैं
जिनके चेहरे नहीं हैं।
फिर ख्याल आया
नहीं वे लोग भले आदमी हैं
जो जूते नहीं पहनते।

रसोई -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
मैं नहीं जानता
भगौने में क्या पक रहा है ?
और उसके दिल में क्या ?
और क्या उनके विचारों में
जो बाहर सिर झुकाए बैठे हैं ?

केवल इतना जानता हूँ
भगौना गर्म है.
और वह आज उदास नहीं है,
और बाहर बैठे लोग कहीं जाने की
                       तैयारी कर रहे हैं।
वह बार -बार
कुछ गुनगुनाती है,
फिर भगौने का ढक्कन उठा
                     झाँकती है
और आग तेज करती है,
बाहर लोगों के जोर-जोर से
बोलने की आवाज आती हैः
'बहुत हो चुका,अब ऐसे नहीं चलेगा ?'

मैं नहीं जानता
इसके बाद क्या होगा ?






सुर्ख़ हथेलियाँ - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पहली बार
मैंने देखा
भौंरे को कमल में
बदलते हुए,
फिर कमल को बदलते
नीले जल में,
फिर नीले जल को
असंख्य श्वेत पक्षियो में,
फिर श्वेत पक्षियों को बदलते
सुर्ख़ आकाश में,
फिर आकाश को बदलते
तुम्हारी हथेलियों में,
और मेरी आँखें बन्द करते।
इस तरह आँसुओं को
स्वप्न बनते...
पहली बार मैंने देखा।





पोस्टमार्टम की रिपोर्ट- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
'राम'

दूसरे मुँह से निकला-
'माओ'

लेकिन तीसरे के मुँह से निकला-
'आलू'

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।





भूख- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।

झपटता बाज,
फन उठाये साँप,
दो पैरों पर खड़ी
काँटों से नन्हीं पत्तियाँ खाती बकरी,
दबे पाँव झाडियों में चलता चीता,
डाल पर उल्टा लटक
फल कुतरता तोता,
या इन सब की जगह
आदमी होता।

जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।




इन्तज़ार-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

इंतजार
शत्रु है
उस पर यकीन मत करो।

वह जाने किन झाडि़यों
और पहाडि़यों में
घात लगाए बैठा रहता है
और हम पत्तियों की चरमराहट पर
कान लगाए रहते हैं।

इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन करो।

वह छापामार सैनिक की तरह
खुद अँधेरे में रहता है
और हमें उजाले में खड़ा देखता रहता है,
मौके की तलाश में
और हम अँधेरे में टॉर्च की रोशनी ही
                         फेंकते रहते हैं।
इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन मत करो।

वह हमें नदी बनाकर
हमारे बीच से ही
मछली की तरह अदेखा तैर जाता है
और हम लहरों के असंख्य हाथों से
उसे टटोलते रहते हैं।

इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन करो।

उस से बचो।
जो पाना है फौरन पा लो,
जो करना है फौरन कर लो।

रविवार, 5 जून 2011

फेसबुक और बाबा रामदेव का नाटक


      बाबा रामदेव को कल पुलिस ने रामलीला मैदान  के अनशन स्थल पर जाकर गिरफ्तार कर लिया। बाबा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को जमकर लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े। बाबा की कानूनभंजक राजनीति का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था।बाबा रामदेव के आंदोलन का पहला निष्कर्ष है कि यह नकली और नियोजित आंदोलन था। दूसरा, किसी आंदोलन के संदर्भ में संचार क्रांति के टांय-टांय फिस्स के आदर्श के रूप में इस घटना को जाना जाएगा। तीसरा. पापुलिज्म और फेकनेस बहुत ज्यादा समय तक बने नहीं रहते। चौथा,फेक और नेक में हमें अंतर करने की समझ पैदा करनी चाहिए।पांचवां, संघ परिवार अपनी राष्ट्रतोड़क-अराजक राजनीति में प्रच्छन्न ढ़ंग से  सक्रिय है। छठा, सत्ता यदि साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति सख्ती से पेश आए तो वे भाग खड़े होते हैं। सातवां,बाबा के 50 हजार के जमावड़े को पुलिस ने जिस कौशल से मात्र डेढ़ घंटे में रामलीला मैदान से भगा दिया उससे यह भी पता चलता है कि बाबा आंदोलन के नाम पर सरल-सीधे लोगों को ,बहला-फुसलाकर ले आए थे। इन लोगों ने कोई खास प्रतिवाद नहीं किया।आठवां, दिल्ली पुलिस ने इतने बड़े जमाबड़े को न्यूनतम लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले छोड़कर घटनास्थल से हटाकर भीड़ नियंत्रण की नयी मिसाल कायम की है।
हम अपने ब्लॉग पर पहले भी बाबा के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं। वे सभी लेख यहां उपलब्ध हैं। यहां पर हम अपने फेसबुक वॉल पर लिखी टिप्पणियों को दे रहे हैं। ये टिप्पणियां कुछ महत्वपूर्ण सवालों को उठाती हैं।   --

                       -1-

काले धन का मामला बेहद जटिल है,इस पर यही कहना है- "नाड़ी छूअत वैद्यके पड़े फफोले हाथ।।"
                               -2-

बाबा रामदेव की मांग है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश से निकाल दें। तब मोबाइल,इंटरनेट,कार, जहाज और उनके विदेश में बने आश्रमों का प्रबंध कौन करेगा ?दवाएं कहां से आएंगी ? बाबा के भक्तों से अपील है वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामान और सेवाओं का इस्तेमाल तत्काल बंद कर दें।
                        -3-


बाबा रामदेव यदि यह मानते हैं कि उनका कोई साम्प्रदायिक एजेण्डा नहीं है तो वे संत का बाना त्यागकर एक नागरिक के बाने में आकर राजनीति करें ? संघ परिवार ने धर्म और राजनीति के मेल पर जोर दिया है और बाबा एक धार्मिक संत के नाते ,संतों के साथ वैसे ही आंदोलन कर रहे हैं,जैसे राममंदिर आंदोलन के समय चलाया था संघ परिवार ने।
                        -4-

सवाल यह है कि सॉफ्ट हिन्दुत्व की लाइन के तहत बाबा को कांग्रेस पटाने में क्यों लगी है ? बाबा से मिलने क्यों भेजा मंत्रियों को ? हम मांग करते हैं कि बाबा और उनके सानिध्य में चलने वाले ट्रस्टों की संपत्तियों की जांच की जाए।



                         -5-
कहो ना प्यार है , मनमोहन दौर की नूरा कुश्तियों का दंगल जिंदाबाद।नव्य -उदारीकरण में लड़ाईयां भी वे ही तय करते हैं जो नव्य उदारपंथी नीतिकार हैं।कितना लड़ोगे,कैसे लड़ोगे,कितना बोलोगे,कहां बोलोगे,सब कुछ तय है। अमेरिकी राजनीति का यह लोकतंत्र को बंधक बनाने वाला नया मॉडल है।मनमोहन सरकार अन्ना हजारे के साथ पहला प्रयोग कर चुकी है,उसमें सफल रही,अब बाबा के साथ भी यह प्रयोग सफल रहा।बेबकूफ बनी जनता ।
                       -6-

हमने पहले भी कहा था अब फिर से दोहरा रहे हैं,यह बाबा रामदेव की मनमोहन सेवा है।सब कुछ तय था। नाटक तय,अभिनय,तय,स्क्रिप्ट भी तय,आदि तय और अंत भी तय था। अब खाली थोड़ी-बहुत नाटकीयता के साथ प्रेस कॉफ्रेंस होगी या प्रेस रिलीज,फिर बाबा रामदेव अपने आश्रम चले जाएंगे कपाल भारती करने और जनता अपना कपाल फोड़े ?

                            -7-

कांग्रेस की कालेधन को देश में वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे काले धन के संरक्षण के लिए द्वि-दलीय व्यवस्था की ओट मैं दो फ्रंट बनाए हुए हैं और काला-धन नामक ड्रामा खेल रहे हैं यह शो 3 दशक से चल रहा है।वरना क्या बात अमेरिका अपना काला धन निकालकर ले गया स्विस बैंकों से हम नहीं ला पाए ?
                            -8-


बाबा रामदेव-अन्ना हजारे टाइप आंदोलनों का संबंध मीडिया के उन्मादित कवरेज के साथ है। उन्मादित कवरेज में दर्शक का विवेक बंधक बना लिया जाता है। मीडिया इमेजों के जरिए आम जनता को नचाया जाता है। यह बिलकुल मनमोहन देसाई की अमिताभ बच्चन फिल्मों की तरह है। अमिताभ बच्चन की फिल्मों की सफलता का रहस्य था कि दर्शक 3 घंटे सोचता नहीं था,बंधा रहता था। यही हाल मीडिया के उन्मादित अभियान का है।
                              -9-

बाबा रामदेव पर जो मुग्ध हैं उनके इस भाव को मीडिया ने बनाया है। इसे हम मीडिया में ज्ञात-अज्ञात की नजरों से देखेंगे तो ठीक समझ पाएंगे। बाबा रामदेव मीडिया का सबसे बड़ा ब्राँण्ड है। सबसे महंगा भी ।संपत्ति भी वह सब ब्राँण्डों से ज्यादा कमाता है।वो संत नहीं ब्राँण्ड हैं।
                           -10-

उपभोक्तावाद का प्रचार वस्तुओं के उपभोग पर बल देता है। उसकी विचारधारा छिपाता है। बाबा के मामले में भ्रष्टाचार पर बात करो,विचारधारा पर नहीं। हमें वस्तुओं का आनंद पसंद है ,लेकिन विचारधारात्मक प्रभाव के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। विचारधारा छिपाओ और वस्तु को बेचो।बाबा के लिए भ्रष्टाचार एक वस्तु है जिसकी वे ब्राँण्डिंग कर रहे हैं.जैसे कोई कार की करता है।                       

                                  -11-
काला पैसा विदेश से वापस लाना देशसेवा है। जो देश छोड़कर आप्रवासी होगए हैं बाबा उनको यहां संपत्ति सहित लाना क्यों नहीं चाहते ?
                                -12-

बाबा रामदेव का अनशन तय था कि कब तक चलेगा और कब वापस लिया जाएगा। यह बात बाबा रामदेव के बांए हाथ आचार्य बालकृष्ण की लिखी चिट्ठी में लिखी है,इसमें लिखा कि अनशन 4-6जून के बीच खत्म हो जाएगा। यह चिट्ठी आंदोलन के पहले दी गयी ।सरकार ने खुलासा किया है यह।स्टार न्यूज पर खबर देखें। नकली देशभक्त ऐसे ही होते हैं।
                                  -13-


आज रात 12.30 बजे बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में पकड़ने की कोशिश की।उनको दी गयी योग शिविर की अनुमति को रद्द कर दिया है। बाबा को उनके समर्थक घेरे हुए हैं। पुलिस-जनता में मुठभेड़ चल रही है।
                                   -14-


बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण अचानक मंच से गायब हो गए हैं। माइक काट दिया है। बाबा गायब हैं।पुलिस ने चारों ओर से पुलिस का घेरा कड़ा कर दिया गया है।पत्थरबाजी भी हो रही भी हो रही है।
                                -15-



  सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान का योगशिविर के नाम पर अनशन आरंभ करने के इस्तेमाल क्यों होने दिया ? जबकि पहले से खबरें आ रही थीं कि बाबा योग शिविर नहीं अनशन करेंगे।
                                 -16-


बाबा रामदेव गिरफ्तार हो गए हैं। रामलीला मैदान में लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले चले हैं। पचासों लोग घायल हुए हैं। बाबा अपनी जनता को असहाय और नेतृत्वविहीन छो़ड़कर पुलिस के कब्जे में हैं।
                         -17-

बाबा रामदेव का आंदोलन आरंभ हुआ जिस जोश के साथ समाप्त भी वैसे ही हुआ। पुलिस और भक्तों को झूठ क्यों बोला बाबा ने ? बाबा आंदोलन करते अनुमति लेते और करते,अनुमति नहीं मिली तो कानूनभंग करके करते,लेकिन करते। योगशिविर की आड़ में लोगों को इकट्ठा करना और फिर पुलिस से पिटवाना उनके नेतृत्व की कायरता और दिशाहीनता का संकेत है।
                           -18-

बाबा रामदेव के अनुयायियों पर पुलिस का लाठीचार्ज निंदनीय है। लेकिन हमें तथ्य और सत्य दोनों को देखना चाहिए। बाबा ने योग शिविर के लिए अनुमति लेकर असत्य क्यों बोला ? एक सन्यासी का असत्य बोलना महापाप की कोटि में आता है। बाबा आंदोलन के लिए अनुमति मांगते और संघर्ष करते समझ में आता है।
                               -19-

बाबा रामदेव ने पुलिस को कहा कि वो योग शिविर लगाना चाहते हैं 20 दिन का और 4हजार लोग आएंगे। लेकिन ये दोनों ही बातें असत्य कहीं बाबा ने। उनके जमावड़े में कोई योगशिविर नहीं था योग तो बहाना था,जनता 50 हजार से ज्यादा थी,पुलिस ने पहले ही दिन दोपहर को बाबा को पत्र दिया कि क्यों न अनुमति रद्द कर दी जाए।बाबा ने जबाव नहीं दिया। वे खेल खेल रहे थे संघ का।
                           -20-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                           -21-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                                -22-


बाबा रामदेव ने पापुलिज्म और अराजक राजनीति का जो घोल तैयार किया उसकी यही परिणति हो सकती थी।
                               -23-


 बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों का समय ठीक वही है जिस समय 2 जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम के करप्शन पर बड़े लोग सींखचों में जा रहे हैं। बाबा रामदेव ने जिस भाव से अपना आंदोलन आरंभ किया है और अन्ना हजारे,आरएसएस आदि ने उनका समर्थन किया है उससे शक है कि दूरसंचार कंपनियां सरकार पर दबाब डालने के लिए बाबा,अन्ना और आरएसएस का इस्तेमाल कर रही हैं ?
                               -24-       


काश !बाबा रामदेव सच्चे योगी होते और संघ परिवार के लोग किसी तपे-तपाए तांत्रिक से मंत्र यज्ञ कराते,वो मंत्रजप करता,बाबा योगी रूप में उड़कर जाते और स्विस बैंक से कालेधन की तिजोरी उठाकर ले आते !कहां है वे संत-महंत-तांत्रिक-पंडित जो आए दिन मंत्रशक्ति के नाम पर जनता को ठगते रहते हैं ? क्या कोई मंत्र है जिसके जप से कालाधन वापस भारत आ जाए ?
                                  -25-

संत के पैसा जो चंदा आता है वो पुण्य की कमाई का होता है ?
                             -26-

क्या सुंदर दृश्य है माओवादी+आरएसएस +स्वयंसेवी संगठन + सिविल सोयायटी+भाजपा अब जो बाकी हैं वे भी धीरे धीरे संत के साथ आ ही जाएंगे। कालेधन को विदेश से वापस लाने में संघ परिवार कितना 'सक्रिय' है यह बात तो एनडीए सरकार के 6 साल के शासन में समझ में आ गयी थी ,उस समय विदेशों में कालाधन ज्यादा जमा हुआ है बाबा,जरा संघवालों से पूछो वे उस समय चुप क्यों थे ?
                           -27-


कल्पना करें बाबा रामदेव प्रधानमंत्री होते ,और मनमोहन सिंह संत होते ,मनमोहन सिंह -सोनिया आमरण आमरण अनशन पर इन्हीं मांगों को लेकर बैठ गए होते तो बाबा रामदेव विदेशों में जमा कालाधन कैसे वापस लाते ?जरा बाबा के भक्त जबाव दें ?
                               -28-



बाबा रामदेव और उनका योगशास्त्र मूलतः मर्दानगी का शास्त्र है। नव्य़ आर्थिक उदारीकरण के दौर में योग को हठात महान कला साबित करने में सक्रिय कारपोरेट घरानों ने चालाकी के साथ स्त्री के वैभव और अधिकारों के विकल्प के रूप में बाबा रामदेव को मर्दानगी के नायक के रूप में इस्तेमाल किया है। योग की विचारधारा मूलतःपुंसवाद और पितृसत्ता की पोषक है। हम अपने पुराने ग्रंथों को पढ़ें तो सहज ही पता चल जाएगा।

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बाबा रामदेव को योग योद्धा कहते हैं। वे योग और भाववाद के हिमायती हैं। योग ने भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद की विचारधारा के विकास का काम किया है। बाबा रामदेव का समस्त योग स्कूल आम जनता में भाववाद का प्रचार करता है। नव्य आर्थिक उदारीकरण के लिए बाबा सबसे उपयुक्त महापुरूष हैं क्योंकि बाबा भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद का प्रचार करते रहे हैं। यही वजह है कि नव्य उदारपंथी देशी-विदेशी सभी कारपोरेट घराने और राजनीतिक दलों के नेता उनकी सेवा में खड़े हैं।
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बाबा रामदेव के योग-प्राणायाम उद्योग का टर्नओवर पन्द्रह हजार करोड़ रूपये साल का है। उद्योगपति बाबा के खेल ने आम लोगों में स्वास्थ्य की बदहाल दशा के कारण अपील पैदा की है। इस अपील को संघ परिवार अपने राजनीतिक हितों को विस्तार देने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

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बाबा रामदेव की बातें निराली हैं,अदा भी निराली है,मांगें भी निराली हैं। हम चाहते हैं कि बाबा रामदेव का सपना पूरा हो व्यवस्था बदले,बस बाबा हमारी तीन मांगों को अपनी लिस्ट में शामिल कर लें।1.भारत के सभी अरबपतियों की संपत्ति और कारखानों का राष्ट्रीयकरण,2.विदेश से पैसा लेने वाले राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी संगठनों पर पाबंदी ,3-बंद कल-कारखाने खोलने के लिए पहल और भूमिहीन किसानों में तेजी से भूमि सुधार लागू किए जाएं।
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बाबा रामदेव ने बड़े भोले मन से कहा है सत्ता नहीं,व्यवस्था परिवर्तन चाहता हूँ। सवाल यह है कैसे ?किस नजरिए से और क्यों ? व्यवस्था बदलने की जंग में पहला मुद्दा गरीबी है या काला धन ? मजदूर-किसान का मोर्चा होगा या संघ परिवार और उनके लगुओं-भगुओं का ? व्यवस्था परिवर्तन के पहले सभी मतों के धर्माचार्यों-धर्मपीठों-ईसाई संपदा आदि धार्मिक संपदा को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाए ? कालेधन और भ्रष्टाचार का एक अंश मंदिरों-संयासियों के पास भी जाता है।
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ओबामा ने स्विटजरलैंड की बैंकों में जमा काले 4हजार करोड़ डॉलर निकाले,लेकिन उससे अमेरिकी जनता की मंदी कम नहीं नहीं हुई।उलटे उसने कारपोरेट घरानों को सहायता दी। सवाल यह है कि जो धन घर में है और काला -सफेद है, क्या बाबा उसके निकाले जाने के पक्ष में हैं ? 80हजारकरोड़ रूपये बैंकों के भारत के धनियों के पास डूबे पड़े हैं,बाबा उसकी वसूली को मसला क्यों नहीं बनाते ?
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अन्ना हजारे-बाबा रामदेव फिनोमिना वस्तुतः देश की जनता में साम्राज्यवाद विरोधीचेतना के विलोप का कार्य कर रहे हैं। भ्रष्टाचार-कालेधन का मसला अमीरों का मसला है। गरीबों के मसले हैं भूमि,भोजन ,रोजगार,और मकान । इनमें से किसी मसले में इन दोनों महापुरूषों की कोई दिलचस्पी नहीं है। भ्रष्टाचार-कालेधन का संकट सत्ता और अमीरों का संकट है।

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जिन मांगों पर बाबा अनशन करने जा रहे हैं। उनमें से कुछ के बारे में सरकार कहने जा रही है- हम काले धन को वापस लाने के लिए कड़े कानून बनाएंगे। नया कानून बनाने के लिए मसौदा समिति बनाएंगे। करप्शन के खिलाफ यू एन कन्वेंशन को मानेंगे,काला धन वालों को कड़ी सजा के रूप में सजा-ए-मौत का भी प्रावधान होगा। 15 अगस्त तक लोकपाल बिल पास हो जाएगा। अनशन कुछ दिन चलेगा क्योंकि तैयारियों के लिए पेमेंट हो चुका है।
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बाबा रामदेव का अनशन एक मजेदार मेला है। रामलीला मैदान के 2.5 लाख स्क्वेयर फुट के एरिया में शानदार पंडाल लगाया गया है,इसमें 1000हजार सिलिंग फेन लगाए गए हैं।50 एम्बुलेंस रखी हैं। एंटेसिव केयर यूनिट स्थापित की गई है। एक हजार टॉयलेट बनाए गए हैं। 5लाख लीटर पानी का इंतजाम किया गया है,अनशन के दौरान योग कैंप चलेंगे।विलीबोर्ड बनाए गए हैं। कोई कह सकता है कि इस अनशन में कोई कष्ट होगा ? यानी मजे में संघर्ष।
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बाबा रामदेव की मांग यदि यह होती कि सारे देश में भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किया जाए और वे अनशन पर बैठते तो क्या सरकार मनाने जाती ? या फिर बाबा रामदेव की मांगों पर लालकृष्ण आडवाणी या वामनेतागण अनशन पर बैठ जाते तो क्या मंत्रियों का झुंड मिलने जाता ?
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बाबा रामदेव अनशन करेंगे।अन्ना हजारे ने आमरण अनशन किया था।सरकार अनशन पर सब तरह की व्यवस्था करेगी। रामलीला मैदान के आसपास पूरा रोशनी-मेला-ठेला -दुकानें-भजन-कीर्तन-जागरण-खाने-पीने की दुकानें-लैट्रीन -बाथरूम सब होगा,सिर्फ एक चीज की गारंटी करनी है बाबा को वहां किसी राजनीतिक दल का नेता अनशन न करे। अन्ना हजारे से भी यही उम्मीद थी उन्होंने माना। यानी राजनीति हो बिना राजनीतिज्ञ और दल के। इसीलिए यह मित्र संघर्ष है।
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बाबा रामदेव और मनमोहन मंडली में वर्गीय मित्रता है और बाबा रामदेव का संघर्ष मित्र संघर्ष है।यही वजह है कि 4 मंत्री बाबा को मनाने एयरपोर्ट गए थे।

                                      





















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