रविवार, 30 सितंबर 2012

व्यापारियों से सीधे मुठभेड़ के मूड़ में ममता


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विकास के सपने नहीं आते। उनका खुदरा व्यापार में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विरोध उनकी नई मनोदशा की अभिव्यक्ति है। वे इन दिनों विकास की नहीं विकास के विरोध की भाषा बोल रही हैं। विकास के नाम पर जनता का असीम प्यार और समर्थन पाने के बाद ममता का विकास की बजाय बागी की भाषा में बोलना उस असंतुलन को व्यक्त करता है जो पश्चिम बंगाल में पहले से मौजूद है। लोकतंत्र में बागी और विकास में सीधे टकराव है। 

ममता की खूबी है कि उन्होंने वाममोर्चे की नाकामियों और जनविरोधी हरकतों का प्रतिवाद करते हुए बागी और विकास के बीच नकली संतुलन बनाकर जो विभ्रम पैदा किया था वह विगत पांच सालों में खूब चला। लेकिन अब यह विभ्रम टूट रहा है। सत्ता में आने के बाद बागी और विकास का नकली संतुलन टूटा है। राज्य के शासन पर बागी सवार हैं और विकास काफूर हो गया है।

ममता की मुश्किल यह है कि वे बागी के तानबाने में कैद हैं और बागी के नजरिए से राज्य प्रशासन को चलाना चाहती हैं। बागी के नजरिए से शासन चलाने का अर्थ है वस्तुगत प्रशासनिक प्रणाली का अभाव। बागी भाव से शासन चलाएंगे तो हमेशा दलतंत्र हावी रहेगा। पहले दलतंत्र की ममता आलोचना करती थीं लेकिन इन दिनों दलतंत्र की ओर जा रही हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब शासन में आई थीं तो उनसे उम्मीद थी कि वे जिस भाषा में विपक्ष में रहते हुए बोलती थीं उस भाषा और नजरिए को त्यागकर सुशासन की भाषा में बोलेंगी। लेकिन ममता ने अपनी भाषा और राजनीतिक तेवर नहीं बदले। ममता के बागी तेवर और उग्रभाषा उनकी कल तक सबसे बड़ी पूंजी थी लेकिन आज वही सबसे बड़ी बाधा है।

लोकतंत्र में अ-स्वाभाविक भाषा वह है जो अहर्निश अशांतमन और टकराव को व्यक्त करती है।इस तरह की भाषा का सामाजिक अवसाद से गहरा संबंध है। सामाजिक अवसाद बागी भाषा को सहज अभिव्यक्ति देता है। इसके विपरीत लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा वह है जिसमें सामंजस्य का भाव है और अन्य के लिए बराबर की जगह है। बागी की भाषा सामाजिक असमानता और सामाजिक अवसाद की अभिव्यक्ति है। इस तरह की भाषा असमानता को बनाए रखती है । इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भाषा और राजनीतिक तेवरों को पढ़ा जाना चाहिए।

विगत 26सितम्बर को ममता बनर्जी के दल ने राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का राज्य में निवेश स्वीकार्य नहीं है। यह ऐसा प्रस्ताव है जो राज्य के समूचे विकास को सीधे प्रभावित कर सकता है। मसलन् बड़ा बाजार का कोई व्यापारी यदि खुदरा व्यापार में 5000करोड़ रूपये का निवेश करना चाहेगा तो उसे निवेश की अनुमति नहीं होगी। यह तो सीधे व्यापारियों के व्यापार करने के अधिकार पर हमला है। केन्द्र और राज्य के व्यापार संबंधी कानूनों में कहीं पर भी यह प्रावधान नहीं है कि देशी व्यापारी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में किस सीमा तक पूंजी निवेश करेगा। देशी व्यापारी जिस किसी भी क्षेत्र में यहां तक कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी का निवेश कर सकता है। समूचे देश में मॉलकल्चर और बिग बाजार की संस्कृति जिस समय आई उस समय ममता के दल ने इसका विरोध नहीं किया था। लेकिन आज सत्ता में आने के बाद वे अचानक खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी के प्रवेश का विरोध कर रही हैं। इस तरह का विरोध न्यायसंगत नहीं है और देश के मौजूदा व्यापार कानूनों का सीधे उल्लंघन है। ममता को यह पता है कि खुदरा व्यापार में मॉल कल्चर पुराने खुदरा व्यापार की अपडेटिंग है। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह अपडेटिंग पसंद नहीं है। उनका बड़ी पूंजी के खिलाफ गुस्सा इस बात का भी संकेत है कि वे देश की सामयिक वास्तविकता को ठीक से नहीं देख पा रही हैं। खुदरा व्यापार के खिलाफ ममता फिलहाल जो भाषा बोल रही हैं वही भाषा भाजपा और अतिवामपंथी भी बोल रहे हैं।

बागी भाषा अवसाद की भाषा है। राजनेता का अवसाद जब शासन में व्यक्त होता है तो सीधे टकराव की भाषा में व्यक्त होता है।पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अवसाद का माहौल है और इस माहौल से कमोबेश सभी रंगत के नेता प्रभावित हैं। पश्चिम बंगाल में अवसाद का जिस तरह का वातावरण है वैसा वातावरण देश के अन्य राज्यों में नहीं है। अवसाद के माहौल को यहां मेले-ठेले और क्रांतिकारी लफ्फाजी के जरिए ढकने की आदत है। सामाजिक अवसाद से ध्यान हटाने के लिए व्यापारियों,पूंजीपतियों और अभिजन के खिलाफ में बोलना एक फैशन है। दिलचस्प बात यह है कि इस राज्य में अवसाद की भाषा बोलने वाले बहादुर और बागी कहलाते हैं। सच यह है कि अवसाद की भाषा कूपमंडूकों की भाषा है। एक ऐसे व्यक्ति की भाषा है जिसके पास कोई सपना नहीं है और जो निठल्ला है। ममता शासन को कायदे से इस बागी भाषा और निठल्लेपन से लड़ना चाहिए। राजनीति में बागी और निठल्ला भाव अंततः नीतिहीनता की ओर ले जाता है ,इस नीतिहीनता का एक और नमूना है हाल ही में राज्य के पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कानून 2011 में उपकुलपति की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति के चरित्र में किया गया बदलाव। सारे देश में उपकुलपति चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का प्रतिनिधि रहता है लेकिन पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रतिनिधि को चयन समिति से निकालकर उसकी जगह राज्य सरकार के प्रतिनिधि को रखा गया है जो कि गलत है। कायदे से राज्यपाल को इस संशोधन बिल को अपनी स्वीकृति नहीं देनी चाहिए,यह देश के अकादमिक नियमों का सीधे उल्लंघन है। इसी तरह ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि दानकुनी स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालमर लॉरी एंड कंपनी ने अपने ढ़ाई हजार करोड़ रूपये के प्रकल्प को बंद करने का फैसला किया है क्योंकि इस कंपनी को इस इलाके में जगह नहीं मिल रही है और ममता सरकार ने किसानों से जमीन खरीदने से मना कर दिया है। ममता सरकार की अराजक और दिशाहीन नीतियों के कारण हाल में सिंगूर से टाटा मोटर को भागना पड़ा। ममता के शासन में आने के बाद लॉर्सन एंड टुब्रो कंपनी ने 2012 में अपने बिजली प्रकल्प को बंद कर दिया।इसी साल श्याम स्टील ने अपना पुरूलिया स्थित स्टील प्रकल्प बंद करने का फैसला लिया है।बागी भाषा और नीतिहीनता के ये कुछ नमूने हैं। असल में पश्चिम बंगाल के लिए यह त्रासद समय है ,यहां लगातार विकास से जुड़े प्रकल्प बंद हो रहे हैं।






मंगलवार, 25 सितंबर 2012

राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण ममता अकेली पड़ी

    ममता बनर्जी और सोनिया गांधी में कल तक मित्रता थी इनदिनों दोनों नेत्रियों में छत्तीस का आंकड़ा है। ममता की राजनीतिक अदूरदर्शिता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कल तक ममता बनर्जी पापुलिज्म की बेताज बादशाह थीं लेकिन आज वे संकट में हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बनने के एक साल के अंदर उन्होंने सबसे पहले प्रणव मुखर्जी का विश्वास खोया,हाल में मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का साथ खोया और जल्द ही उनको कांग्रेस का राज्य में साथ भी खोना पडेगा ।इसके अलावा देश-विदेश के उद्योगपतियों की नजरों में ममता बनर्जी की साख गिरी है। ममता यह मानकर चल रही थी कि वे जल्द ही तिकड़मों के जरिए भारत की राजनीति में बड़ा स्थान बना लेंगी। लेकिन अब यह सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। मनमोहन सरकार से समर्थन वापसी के बाद ममता और भी अकेली हो गयी हैं।

पिछले सप्ताह कोलकाता के टाउनहॉल में टीएमसी सांसदों-विधायकों और मंत्रियों की बैठक में एक दर्जन सांसदों ने भरी सभा में साफ कहा कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस नहीं लेना चाहिए। इस पर ममता बनर्जी ने कहा कि समर्थन वापस लेते ही केन्द्र सरकार गिर जाएगी और उनको भरोसा है कि समाजवादी पार्टी उनका साथ देगी। लेकिन दिल्ली में घटनाक्रम जिस गति से चला उसने ममता बनर्जी को अदूरदर्शी नेता साबित किया है। जिन एक दर्जन टीएमसी सांसदों ने मनमोहन सरकार को समर्थन जारी रखने की मांग की थी उनका कहना था कि केन्द्र सरकार की मदद से चलने वाले सभी प्रकल्प इस फैसले से प्रभावित होंगे।साथ ही हर महिने रिजर्व बैंक से जो ओवरड्राफ्ट राज्य सरकार ले रही है उस पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के जिन मंत्रियों ने मनमोहन सिंह सरकार से इस्तीफा दिया है वे निजी तौर पर शांति महसूस कर रहे है। टीएमसी के एक पूर्व केन्द्रीयमंत्री का कहना था हमलोग जब से दिल्ली मंत्रीमंडल में शामिल हुए हैं हमारे ऊपर ममता दीदी की सख्त निगरानी थी और सभी मंत्रियों को ज्यादातर समय दिल्ली की बजाय कोलकाता में रहने का निर्देश था इसके कारण सभी मंत्री तनाव में रहते थे। मंत्रीमंडल से इस्तीफा देने वाले एक दूसरे मंत्री ने कहा कम से कम अब दिल्ली के बेगानेपन से वे बच गए हैं।सभी पूर्व मंत्रियों को उस समय असुविधा हुई जब वे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को समर्थन वापसी का पत्र देने पहुँचे। वे राष्ट्रपति के सामने निरुत्तर खड़े थे। तकरीबन यही स्थिति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलते समय भी थी।

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसबार ममता बनर्जी से एकबार भी बात क्यों नहीं की ? पिछले सप्ताह जिस तरह तेजी से घटनाक्रम चला है उसमें ममता बनर्जी ने एकबार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बात की थी और ममता को उम्मीद थी कि सोनिया गांधी उनको मनाने की कोशिश करेंगी,लेकिन ममता को सोनिया गांधी की बातें सुनकर तेज झटका लगा। सोनिया गांधी के करीबी सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने ममता से साफ कहा कि सरकार में निकम्मेपन को अब बर्दाश्त करना संभव नहीं है। टीएमसी के मंत्री दिल्ली के मंत्रालय ऑफिसों में आते ही नहीं हैं और इसे अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। तीन साल हो गए टीएमसी के अधिकांश मंत्रियों को दिल्ली में मंत्रालय के ऑफिस आने की फुर्सत नहीं है ,इससे अच्छा है आपके मंत्री इस्तीफा दे दें। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि ममता बनर्जी ने अपने मंत्रियों को आरंभ से ही यह निर्देश दे रखा था कि दिल्ली में कम रहो कोलकाता या अपने चुनावक्षेत्र में ज्यादा रहो।सोनिया गांधी ने ममता को दो-टूक शब्दों में यह भी कहा बताते हैं कि केन्द्र सरकार के फैसले बदले नहीं जाएंगे और टीएमसी की अड़ंगेबाजी से सरकार की साख में बट्टा लगा है। सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी को सोनिया गांधी के इस सख्त रवैय्ये से कड़ा झटका लगा है।

उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी यह दावा करती थीं कि वे जो चाहेंगी सोनिया गांधी से मनवा लेंगी। लेकिन विगत एकसाल में जब से उनकी प्रणव मुखर्जी से अनबन हुई और बातचीत बंद हुई तब से कांग्रेस के सभी केन्द्रीय नेताओं को कही कहा गया कि ममता से दूर रहो ।इस समूची प्रक्रिया में यूपीए-2 सरकार की जड़ता टूटी है और नए किस्म के राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं पैदा हुई हैं। ममता का राजनीतिक कद छोटा करने में प्रणव मुखर्जी के फार्मूले पर ही अंततःमनमोहन सरकार को आना पड़ा और अर्थव्यवस्था के बारे में कठोर फैसले लेने पड़े हैं। उल्लेखनीय है दिल्ली में टीएमसी के समर्थन वापसी की स्थितियों से निबटने की सारी तैयारियां मनमोहन सरकार के फैसला लेने के पहले ही कर ली गयी थीं।

कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि ममता ने समर्थन वापसी की घोषणा करके असल में भाजपा और एनडीए के हितों को साधने की कोशिश की है। भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए ममता ने विगत सप्ताह प्रेस कॉफ्रेंस में कांग्रेस के खिलाफ जिस भाषा का इस्तेमाल किया वह भाजपा की भाषा है।ममता की प्रेस कॉफ्रेस के तत्काल बाद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर ने सही कहा कि हमें खुशी है कि ममता अब वही कह रही हैं जो अब तक भाजपा बोलती आई है।

ममता बनर्जी केद्वारा कांग्रेस के साथ समझौता तोड़ने का कई मोर्चों पर असर होगा। पहला असर यह होगा कि मनमोहन सरकार बिना किसी अडंगेबाजी के नीतिगत फैसले ले पाएगी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में आने वाले पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस आमने-सामने होंगे और इससे वामदलों को लाभ मिल सकता है।




रविवार, 23 सितंबर 2012

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। " नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी" संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।




रविवार, 16 सितंबर 2012

मनमोहन के फैसले ने ममता की घबराहट बढ़ायी


                 
      पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को 72घंटे का अल्टीमेटम दिया है और कहा है डीजल के बढ़े दाम और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला वापस ले। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने ये दोनों फैसले वापस नहीं लेने जा रही है। सबकी आंखें ममता के अगले कदम पर टिकी हैं।
    ममता का तर्क है कि सरकार ने हमसे सलाह नहीं ली, हमारे मंत्री ने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया।अतःहम इस फैसले को नहीं मानते। केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं की ममता के साथ अनौपचारिक बैठक हुई।इसमें पार्थ चटर्जी-सुब्रत मुखर्जी आदि ने ममता की राय से असहमति व्यक्ति की।
     तृणमूल सरकार में वरिष्ठमंत्री ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा यह फैसला यूपीए-2 सरकार का सामूहिक फैसला है। इस फैसले से यूपीए-2के सभी दल बंधे हैं। मंत्रीमंडल किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह तो सारे देश का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सत्तारूढ़ दल मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं। कोई मंत्री मंत्रीमंडल की बैठक में शामिल हो या न हो वह मंत्रीमंडल के सामूहिक फैसलों से बंधा है। शुक्रवार की रात को ही इस मंत्री ने ममता को उनके घर जाकर अपनी राय से अवगत करा दिया और कहा कि वे यूपीए छोड़ने का फैसला न लें।
     असल में  राजनीति में एक होता है सत्ताखेल और दूसरा होता है सत्तामोह। सत्ताखेल में वे नेता सफल होते हैं  जो दूरदृष्टि रखते हैं और दीर्घकालिक बृहत्तर जनहितों का ख्याल रखते हैं।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे राजनीतिक दांवपेंच सत्तामोह की देन हैं।सत्तामोह विवेकहीन बनाता है।
    पापुलिज्म ,नकली प्रतिवाद और उत्सवधर्मिता में बांधे रखता है।सत्तामोह में बंधे लोग नकली प्रतिवाद के लिए सड़कों पर हंगामे करते हैं ,मीडिया में खूब हो-हल्ला करते हैं।वामदलों में भी यह बीमारी है। सत्तामोहित नेता गैर-जिम्मेदार होता है और सामाजिक जबाबदेही से भागता है। ।
इनदिनों जो  नकली प्रतिवाद ममता और उनका दल कर रहा है यह प्रतिवाद नहीं है यह प्रतिवाद का ऑब्शेसन है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन वामदलों में भी है और ममता में भी है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन अंततः अ-राजनीतिकरण करता है और नीतिविहीन बनाता है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के विकास को अवरूद्ध करता है। आमलोगों में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था पैदा करता है।
       ममता का 72 घंटे का अल्टीमेटम एब्सर्ड पापुलिज्म की देन है। यह सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन है। सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन के कारण ही ममता बनर्जी विगत दो महिनों से यूपीए-2 की सरकार में हाशिए पर आ गयी हैं। एक जमाना था उनसे प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी बात करते थे।लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ममता बनर्जी को उनकी राजनीतिक हैसियत का एहसास करा दिया गया है। विगत बृहस्पति और शुक्रवार को मंत्रीमंडलीय उपसमिति के बैठकों से तृणमूल कांग्रेस के मंत्री नदारत थे। ममता बनर्जी ने राजनीतिक जिम्मेदारी से भागने का एक सुगम रास्ता अख्तियार किया है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल के बैठकों में उनके दल के मंत्री हिस्सा ही नहीं लेते और इसके बाद ममता बनर्जी मीडिया में हल्ला करती हैं कि उनसे पूछा नहीं गया,उनकी राय नहीं ली गयी, उन्हें मंत्रीमंडल का फैसला सुनकर अचम्भा हुआ है,इसके बाद वे धमकियां देती हैं।यह नाटक विगत 3सालों से चल रहा है और मनमोहन सिंह इसे झेलते रहे हैं। इसे ममता ने अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में प्रचारित किया है और मीडिया ने भी ममता को ताकतवर महिला के रूप में खूब उछाला है। लेकिन विगत बृहस्पतिवार और शुक्रवार के मंत्रीमंडलीय समिति के फैसलों ने ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत की सीमाओं को एकसिरे से उजागर कर दिया है। ममता की समझ है कि उनका दल यदि सरकार से समर्थन वापस ले लेता है तो सरकार गिर जायगी । लेकिन राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने से सरकार नहीं गिरने वाली। तृणमूल कांग्रेस यदि समर्थन वापस लेता है तो वैसे स्थिति में मुलायम सिंह यादव और अन्यदलों का समर्थन मिलना पक्का है।इस संदर्भ में पहले से ही राजनीतिक तैयारियां कर ली गयी हैं और बदले में समर्थक दलों के नेताओं से भी विस्तार के साथ बातें हो गयी हैं।
    केन्द्र सरकार के बयान के अनुसार रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश के सवाल पर विगत शुक्रवार को जो फैसला लिया गया वह विगत 24नवम्बर 2011 को ही मंत्रीमंडलीय समिति ने पास कर दिया था सिर्फ उसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा गया था। कार्यान्वयन के संदर्भ में 7दिसम्बर 2011 को  विभिन्न राज्य सरकारों और मजदूर, किसान,दुकानदार,छोटे व्यापारी आदि के संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई थी जिसमें दिल्ली,असम, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र,राजस्थान,हरियाणा,मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, केन्द्र शासित क्षेत्र दमन-दीउ,दादरा और नागर हवेली के प्रतिनिधियों ने रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश का समर्थन किया था जबकि बिहार, कर्नाटक, उडीसा,केरल,मध्यप्रदेश,त्रिपुरा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपना प्रतिनिधि इस बैठक में नहीं भेजा और नहीं बाद में इस पर अपनी कोई राय दी। इस बीच विभिन्न राज्यों के साथ सलाह-मशविरे के बाद यह तय पाया गया कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को राज्य सरकारें लागू करें या न करें यह उनका फैसला होगा। यानी ममता बनर्जी के लिए रास्ता खुला रखा गया है कि वे अब यह तय करें कि इसके बावजूद वे मंत्रीमंडल में रहना चाहती हैं या नहीं। इस स्थिति में ममता बनर्जी के दल में आंतरिक अन्तर्विरोध तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के केन्द्र में जो मंत्री हैं वे चाहते हैं कि उनका दल सरकार का समर्थन जारी रखे। जबकि ममता बनर्जी चाहती हैं कि मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया जाय और बाहर से सरकार का समर्थन किया जाय। पार्थ चटर्जी-सौगत राय-सुब्रत मुखर्जी आदि का मानना है कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस न लिया जाय और न ही सरकार के काम में अडंगे डाले जाएं इस सबसे तृणमूल कांग्रेस की अड़ंगेबाज पार्टी की इमेज बन रही है।
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ऑडीटर,पत्रकार ,स्टैनोग्राफर और कोलगेट मीडिया कवरेज

कोलगेट कांड पर मीडिया लबालब भरा है।कोई भी अखबार उठाओ या चैनल देखो चारों ओर कोलगेट की वर्षा हो रही है।इस तरह की समाचार वर्षा हाल-फिलहाल के दिनों में किसी भी खबर की नहीं देखी गयी। कोलगेट कांड में सच क्या है यह सब लोग जानते हैं। इसमें धांधली हुई है। यह धांधली मुख्यमंत्रियों ने की या केन्द्रीय मंत्री ने की या प्रधानमंत्री ने की ,लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली आवंटन के पहले हुई या बाद में हुई यह सवाल भी बेमानी है।लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि धांधली हुई है। एक कंपनी ने की या चार ने की लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली पर कोई विवाद नहीं है। सभी दल मानते हैं कि कोलगेट में कुछ न कुछ गड़बड़ है।पहले कांग्रेस मानने को तैयार नहीं थी लेकिन अब वह भी मान रही है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। दो सांसदों की शिकायत पर सीबीआई जांच कर रही है,कई कंपनियों के खिलाफ नियमों के उल्लंघन को लेकर एफआईआर दायर की गयी हैं।विपक्ष का कोलगेट कांड पर गुस्सा और प्रतिवाद जायज है।

इस सबसे अलग हटकर हमें यहां पर इस विषय पर विचार करना है कि आखिरकार मीडिया में कोलगेट रिपोर्टिंग का स्रोत क्या है ?क्या यह पत्रकारों के परिश्रम का खेल है ? क्या यह खोजी पत्रकारिता की देन है ? या फिर यह सरकारी स्रोत की लीक रिपोर्ट पर आधारित है ? कोलगेट कांड को किसी पत्रकार ने उजागर नहीं किया । यह सीएजी ( कंट्रोलर ऑफ ऑडीटर जनरल) रिपोर्ट पर आधारित है। सीएजी रिपोर्ट कैसे बाहर आय़ी,संसद में बहस किए जाने के पहले ही कैसे लीक हुई,बिना संसद में पास हुए और पीएसी के बिना तहकीकात किए किस तरह इसे वैध माना जाय,ये सारे सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

लेकिन कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं जिनका इस प्रसंग में जिक्र करना समीचीन होगा। मसलन् सीएजी की रिपोर्ट गोपनीय होती है।वह पहले संसद में पेश की जाती है उसके बाद संसद की मुहर लगने के बाद पब्लिक एकाउंट कमेटी के पास जाती है और फिर वहां से जांच पूरी होने के बाद सरकार को एक्शन के लिए भेजी जाती है। कोई भी सीएजी रिपोर्ट स्वयं में तब तक मान्य नहीं है जब तक उसके तथ्यों और सूचनाओं की पीएसी जांच न कर ले। सीएजी की रिपोर्ट का पीएसी (पब्लिक एकाउंट कमेटी) द्वारा जांच किया जाना अनिवार्य है और उसके बाद ही सरकार उस पर कार्रवाई करने को बाध्य है। कोलगेट कांड सीएजी रिपोर्ट के संदर्भ में अभी तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। यह रिपोर्ट संसद में पेश किए जाने के पहले ही लीक कर दी गयी। किसने लीक की,क्यों लीक की और सीएजी ने इस रिपोर्ट के लीक किए जाने की अभी तक जांच क्यों नहीं करायी,यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है। विपक्ष भी सीएजी रिपोर्ट पर संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही एक्शन चाहता है। प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा गया है।

इसी प्रसंग में कांग्रेसनेता दिग्विजय सिंह ने हैडलाइन टुडे टीवी चैनल में एक साक्षात्कार में सवाल किया है कि सीएजी की रिपोर्ट जब तक संसद में पेश नहीं हो जाती तब तक सीएजी के महानिदेशक की यह जिम्मेदारी है कि वह उस रिपोर्ट की गोपनीयता बनाए रखें,लेकिन महानिदेशक विनोद राय ने सचेत तरीके से सीएजी रिपोर्ट को मीडिया में लीक किया और बाद में वह रिपोर्ट संसद में पेश की गयी। आश्चर्य की बात है विनोद राय ने रिपोर्ट लीक किए जाने की अभी तक जांच कराए जाने की मांग नहीं की है। संसद में रिपोर्ट पेश करने के पहले मीडिया को रिपोर्ट लीक हो जाने के लिए विनोद राय को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। सवाल यह है कि केन्द्र सरकार ने या पीएमओ ने अपनी पहल पर इस पहलू की जांच क्यों नहीं करायी ?कांग्रेस को जांच कराने से किसने रोका था ?

एक अन्य पहलू है जिस पर गौर करें और यह कवरेज से संबंधित है। कोलगेट कांड का कवरेज किसी संवाददाता की देन नहीं है।यह तो सीएजी रिपोर्ट की देन है और बिना छानबीन के सीएजी के बताए तथ्यों या सूचनाओं का प्रचार है। यह मूलतःनिष्पन्न खबर की कटपेस्ट कला है।इसमें सत्य कितना है और असत्य कितना यह कोई नहीं जानता। लेकिन कांग्रेस के आरोप में दम है कि सीएजी ने अपनी जांच के संवैधानिक दायरे का अतिक्रमण किया है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कोयला खानों के उपयोग की कानूनी समूची और वैज्ञानिक प्रक्रिया की रिपोर्टिंग में एकसिरे से अनदेखी हुई है।इस प्रसंग में सरकार के मंत्रियों को ही बीच बीच में बोलना पड़ा है।लेकिन मीडिया की इस प्रक्रिया को जानने और बताने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मीडिया यह भी देखना नहीं चाहता कि जिनलोगों को आवंटन हुआ है वे किस दशा और दिशा में काम कर रहे हैं।

विवादास्पद कोयलाखानों की जमीनी सच्चाई को किसी भी पत्रकार ने उदघाटित करने की कोशिश नहीं की । मीडिया तो सीधे सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है उसे ब्रह्म वाक्य मानकर चल रहा है अथवा नेताओं के बाइटस को प्रमाण मान रहा है।नेताओं के बाइटस प्रमाण नहीं प्रचार हैं। असल में मीडिया ने इस घोटाले को सनसनीखेज बनाकर रख दिया है। घोटाले को सनसनीखेज बनाने से अंततःलुटेरों को फायदा होता है। सनसनीखेज प्रस्तुति सत्य को आंखों से ओझल कर देती है।बोफोर्स इस तरह की प्रस्तुतियों का आदर्श उदाहरण है।मूल अभियुक्त देश से सकुशल चले गए और राजीव गांधी और अमिताभ-अजिताभ बच्चन पर मीडिया निशाने लगाता रहा और 25साल बाद पता चला कि ये तीनों लोग निर्दोष हैं।बोफोर्स मामले में इन तीनों का अंततः निर्दोष साबित होना मीडिया कवरेज की सनसनीखेज प्रस्तुतियों की पराजय थी। सनसनीखेज प्रस्तुति देखने में अच्छी लगती है पढ़ने में अपील करती है। लेकिन असल में फेक होती है।

उल्लेखनीय है फेक स्टोरियों से एक जमाने में राममंदिर का उन्माद पैदा किया गया,तथ्यों को गढ़ा गया,जनता को गुमराह किया गया। प्रेस कौंसिल ने भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिन्दी के चार बड़े अखबारों की इस आंदोलन के संदर्भ में जो भूमिका रही थी उसकी तीखी आलोचना की ।

कोलगेट के दस्तावेज या उससे जुड़ी खबरों का सीएजी की रिपोर्ट लीक होने के पहले क्षेत्रीय मीडिया से लेकर नेशनल मीडिया में अनुपस्थित रहना,इस बात का संकेत है कि पत्रकार अब खबरें खोजने नहीं जाते बल्कि बनी-बनायी खबरें उनके पास चली आती हैं।सीएजी रिपोर्ट पर सिलेसिलेबार आया कवरेज इस बात को पुष्ट करता है।

यही हाल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा के मामले में आए कवरेज के समय भी देखा गया ,उस समय लोकपाल की रिपोर्ट के आधार पर दनादन खबरें आईं। कायदे से जहां घटना घट रही है वहां पत्रकार को होना चाहिए और इसके बाद तथ्य संकलन करके लिखना चाहिए। इनदिनों मीडियावाले सीधे किसी सरकारी स्रोत की तलाश में रहते हैं।सरकारी स्रोत जब पत्रकारिता के प्रमाण बन जाते हैं तो मीडिया अपनी स्वतंत्र भूमिका,भाषा और विवेक खो देता है।

कोलगेट से जुड़ी सभी स्टोरियां इसलिए फेक हैं,निष्पन्न हैं, रेडीमेड हैं,वर्चुअल हैं, क्योंकि वे सीएजी की रिपोर्ट से हैं या सीबीआई की एफआईआर से ली गयी हैं। ये रिपोर्ट किसी पत्रकार के खोजी परिश्रम का कमाल नहीं हैं ।यह तो हमारे ऑडीटरों की देन है।ऑडीटर को पत्रकार नहीं कहते।ऑडीटर की रिपोर्ट के आधार पर निर्मित कवरेज में पत्रकार कम ऑडीटर ज्यादा बोलता रहा है।

सवाल यह है कि क्या पत्रकार को ऑडीटर के जरिए अपदस्थ कर सकते हैं ? क्या पत्रकार और ऑडीटर के काम करने का तरीका एक है ? यदि सीएजी रिपोर्ट ही कवरेज के केन्द्र में है तो मीडिया में किसी भी चैनल ने या प्रिंट मीडिया ने देश के ख्यातिलब्ध ऑडीटरों की राय क्यों नहीं ली ? ऑडिट का क्या नियम है और कहां मेनीपुलेशन है इसे ऑडीटर ही बता सकता है कोई पत्रकार नहीं। इस अर्थ में कोलगेट कवरेज एकदम फेक है। इस तरह का कवरेज देकर मीडिया ने फेक को महान बनाया है।

सवाल यह भी है कि कोलगेट जब घट रहा था तब मीडिया कहां सोया था ? सीएजी रिपोर्ट लीक होने के पहले किसी भी पत्रकार को या टीवी समाचार संपादक को इस घोटाले के दर्शन क्यों नहीं हुए ? जबकि लूट तो पहले से चल रही थी,किसी भी भाजपा या विपक्ष के सांसद ने यह मसला सीएजी रिपोर्ट के पहले मीडिया के सामने पेश क्यों नहीं किया और जब सीएजी रिपोर्ट आ गयी तो संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने तक इंतजार क्यों नहीं किया ?

भारत के मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह किसी भी घोटाले की तह तक जाने में असमर्थ रहा है और उसने सत्य को सामने रखने का साहस नहीं दिखाया है। इसके विपरीत मीडिया ने लगातार राजनीतिक प्रौपेगैंडा के अस्त्र का काम किया है। बोफोर्स कांड से लेकर राममंदिर आंदोलन तक के अब तक के कवरेज की त्रासदी यह है कि रिपोर्टर अपनी स्वतंत्र सत्ता-महत्ता को त्यागकर प्रौपेगैंडा करने लगता है या फिर रिपोर्टर न होकर स्टैनोग्राफर हो जाता है। कोलगेट कांड पर पत्रकार अभी तक सीएजी के स्टैनोग्राफर का ही काम करते रहे हैं । कायदे से पत्रकार को स्टैनोग्राफर नहीं होना चाहिए। उसे घटना की अपने नजरिए से जांच करनी चाहिए और घटना जब घट रही हो या घटने के बाद घटनास्थल पर जाकर जांच करनी चाहिए और संबंधित सभी पक्षों को यथोचित कवरेज भी देना चाहिए।

हिन्दी के 12 कटु सत्य


1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।

2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।

3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।

4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।

5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।

6.ज्यादातर मोबाइल में हिन्दी का यूनीकोड़ फॉण्ट तक नहीं है।ज्यादातर शिक्षित हिन्दी भाषी यूनीकोड फॉण्ट मंगल का नाम तक नहीं जानते।ऐसी स्थिति में हिन्दी का विकास कैसे होगा ?

7.राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.

8.विगत 62सालों में हिन्दी में पठन-पाठन,अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरा है।

9.राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं।

10.भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता। सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलतः अनुवाद की भाषा मात्र बनकर रह गयी है

11.हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है। हिन्दीभाषीक्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है।

12.सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है।जबकि यह स्थिति बंगला,मराठी,तमिल.मलयालम,तेलुगू आदि में नहीं है।वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोड़कर देखता है।हिन्दी में हिन्दीभाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

इंफोसिस परेशान है ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों से

       हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ब्लूमवर्ग मार्केट मैगजीन ने दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशाली 50 नेताओं में स्थान दिया है और लिखा है कि भारत में केन्द्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करने वाली वह ताकतवर नेत्री है। बिडम्बना यह है कि यही ताकतवर नेत्री राज्य के लिए औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में असमर्थ रही है। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि आज ममता सरकार की नीतिहीनता सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। ममता बनर्जी के आने केबाद औद्योगिक विकास एकदम बंद हो गया है।पश्चिम बंगाल के औद्योगिक दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

हाल की घटनाएं बताती हैं कि ममता सरकार जिस तरह काम कर रही है उससे औद्योगिक समस्याएं हल होने की बजाय उलझती जा रही हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक सभी को नीतिगत दिशाहीनता ने असहाय बनाकर रख दिया है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब शासन संभाला था आमलोगों में उनको लेकर जबर्दस्त उत्साह था और यह उम्मीद भी जगी थी कि वे कुछ बेहतर और नया करेंगी लेकिन उद्योगपतियों से लेकर राजनेताओं तक,साधारण ग्रामवासी लेकर फैक्ट्री मजदूर तक सबको निराशा हाथ लगी है।

विगत डेढ़ साल में ममता सरकार की साख में गिरावट आई है। इस गिरावट के दो बड़े कारण हैं ,पहला , विगत वाममोर्चा सरकार की सही नीतियों की बजाय गलत नीतियों का अनुसरण करना ।दूसरा ,केन्द्र सरकार की नीतियों के प्रति नकारात्मक नजरिया। इन दोनों कारणों की वजह से आज ममता सरकार देश सबसे निष्क्रिय राज्य सरकार के नाम से जानी जाती है। आमलोग इसे खोखली घोषणाओं और जलसों की सरकार कहते हैं।

यही वह परिदृश्य है जिसमें राज्य के उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने विगत सप्ताह इंफोसिस के मुख्यालय जाकर इस कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। राजनीतिक हलकों में इस बैठक को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। पहला सवाल यह उठा है कि आखिर राज्य के उद्योगमंत्री को एक कंपनी के मुख्यालय जाने की क्या जरूरत थी ?यदि बात ही करनी थी तो वे अपने कोलकाता स्थित दफ्तर में कंपनी के अधिकारियों को बुलाकर बात कर सकते थे। दूसरा सवाल इंफोसिस के मालिक ने उनसे मुलाकात क्यों नहीं की ?तीसरा सवाल पार्थ चटर्जी ने ऐसा नया क्या प्रस्ताव पेश किया जिसको कंपनी ने नहीं माना ।

यह सवाल भी उठा है कि उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कंपनी को दिए अपने नए सुझावों को पत्रकारों को क्यों नहीं बताया ? उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जिस तैयारी और भरोसे के साथ इंफोसिस अधिकारियों के पास गए थे उससे उनकी असफलता सामने आई है और इसके कारण देर-सबेर उनकी कुर्सी जाने का खतरा है। उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के नए प्रस्तावों को कंपनी ने एकसिरे से खारिज कर दिया है और साथ ही राज्य सरकार के रूख की तीखी आलोचना की, उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के बार बार तर्क किए जाने पर भी उन्होंने इंफोसिस के दूसरे कैम्पस को खोलने के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। इंफोसिस के अधिकारियों ने उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी से दो-टूक शब्दों में कहा बताते हैं कि राज्य सरकार का यही रवैय्या रहा तो वे दूसरा कैम्पस चालू नहीं कर पाएंगे और वापस चले जाएंगे । अधिकारियों ने नाराजगी जताई है कि उनके द्वारा खरीदी गयी जमीन के पूरे दाम का भुगतान कर दिए जाने के बाद भी मालिकाने के कागजात कम्पलीट होकर उनके पास नहीं आए हैं। कंपनी चाहती है कि उनके मालिकाने के कागज जल्दी दिलवाए जाएं अन्यथा उनका जमा पैसा ब्याज सहित वापस दिलवाया जाय।उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी के पास उनकी मांगों के बारे में कोई सटीक उत्तर नहीं था।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस के अधिकारियों से अपील की कि वे कुछ समय और दें और राज्य सरकार और कंपनी के अधिकारी मिलकर दिल्ली जाएं और नए विकल्पों की खोज करें।यही वजह है कि इंफोसिस के मुख्यालय से बाहर निकलकर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने एक सामान्य सा बयान दिया कि इंफोसिस के अधिकारियों ने राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने का वायदा किया है। सच यह हैकि उन्होंने कोई वायदा नहीं किया बल्कि यह कहा है कि उनके औद्योगिक प्रस्ताव को मानो तो काम करेंगे वरना चले जाएंगे इस पर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा था कुछ समय और दो और वे इसके लिए राजी हो गए।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस की समस्याओं के समाधान के लिए दिल्ली जाने और केन्द्रीय वित्त और उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने का सुझाव रखा जिसे इंफोसिस ने मान लिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि इंफोसिस के अधिकारी आगामी दिल्ली यात्रा को लेकर किसी नयी आशा की संभावनाएं नहीं देख रहे हैं। इसका प्रधान कारण ममता बनर्जी का केन्द्र सरकार के नीतिगत सुधारों में अडंगा डालनेवाला रवैय्या। मनमोहन सरकार का सभी मंत्रालयों को अप्रत्यक्ष निर्देश है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति के बिना ममता सरकार के किसी भी प्रस्तावित पर कोई फैसला न किया जाय।

उल्लेखनीय है कि इंफोसिस ने विगत वाममोर्चा सरकार के अंतिम साल में विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना के तहत 50 एकड़ जमीन खरीदी थी और तत्कालीन राज्य सरकार ने उनको सेज के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं देने का वायदा भी किया था लेकिन ममता सरकार आने के बाद इंफोसिस के साथ किए गए समझौते को राज्य सरकार ने रद्द कर दिया और इंफोसिस को विशेष आर्थिक क्षेत्र के तहत सुविधाएं देने से मना कर दिया और बाद में सेजनीति को राज्य में लागू न करने का फैसला ही कर डाला और इस सबके कारण एक खास परिस्थिति पैदा हुई हैकि जो कंपनियां सेजनीति के तहत पूंजीनिवेश करने आने वाली थीं या जिनके प्रस्ताव राज्यसरकार के पास पड़े थे वे सभी प्रस्ताव रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए।

उल्लेखनीय है कि सेज नीति को केन्द्र सरकार ने तैयार किया है और उसने राज्यों से उस नीति की संगति में राज्यसेज नीति बनाने का अनुरोध भी किया है। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार ने बड़ी आनाकानी के बाद सेज नीति को लागू किया था,लेकिन ममता सरकार आने के बाद पुनःराज्य विधानसभा में पास की गयीनीति को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और राज्य फिर से नए औद्योगिक संकट में फंस गया है। पुरानी औद्योगिक नीति में औद्योगिक विकास की गुंजायश कम थी इसलिए केन्द्र सरकार ने सेजनीति बनायी थी और अधिकांश राज्यों ने उस नीति का पालन भी किया था ।

रविवार, 9 सितंबर 2012

फेसबुक और अभिव्यक्ति की लक्ष्मणरेखा


फेसबुक पर अमर्यादित,गाली गलौज, पर्सनल कमेंटस (छींटाकशी) आदि को तुरंत हटादें साथ ही सार्वजनिक तौर पर सावधान करें। न माने तो ब्लॉक कर दें।

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फेसबुक पर स्वीकृति या साख बनाने के लिए जरूरी है कि नियमित लिखें और सारवान और सामयिक लिखें।प्रतिदिन किसी भी मसले को उठाएं तो उससे जुड़े विभिन्न आयामों को अलग-अलग पोस्ट में दें। इससे एजेण्डा बनेगा। कभी-कभार अपनी कहें ,आमतौर पर निजता के सवालों और निजी उपलब्धियों के बारे में बताने से बचें। यदि आप प्रतिदिन अपनी रचनात्मक उपलब्धियां बताएंगे तो अनेक किस्म के कु-कम्युनिकेशन में कैद होकर रह जाएंगे, इससे मन संतोष भी कम मिलेगा। मन संतोष तब ज्यादा मिलता है जब सामाजिक सरोकारों के सवालों पर लिखते हैं और लोग उस पर तरह तरह की राय देते हैं।

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फेसबुक कम्युनिकेशन के लिए इसकी संचार अवस्था को स्वीकारने और समझने की जरूरत है। मसलन् आपने किसी के स्टेटस पर कोई टिप्पणी दी,जरूरी नहीं है वह व्यक्ति आपके उठाए सवालों का जबाव दे,आपने किसी को फेसबुक चैटिंग के जरिए मैसेज दिया,जरूरी नहीं है वह आपको तुरंत जबाव दे, धैर्य रखें और गुस्सा न करें।

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फेसबुक ,चैटिंग आदि में अधीरता पागल कर सकती है, ब्लडप्रैशर बढ़ा सकती है। दुश्मनी भी पैदा कर सकती है। मिसअंडरस्टेंडिंग भी पैदा कर सकती है। फेसबुक रीयलटाइम मीडियम है यह धैर्य की मांग करता है। रीयलटाइम में अधीरता,गुस्सा आदि बेहद खतरनाक हैं, इससे उन्माद पैदा होता है। फेसबुक कम्युनिकेशन को सहजभाव से लें और अधीर न हों।इसमें आपका भला है और दूसरे का भी भला है।

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फेसबुक पर यदि कोई व्यक्ति आपकी वॉल पर नापसंद बात लिख जाए तो उसे रहने दें। इससे यह पता चलता है कि आप अन्य को चाहते हैं,पसंद करते हैं।

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फेसबुक असल में कबीर की उक्ति का साकार अभिव्यक्ति रूप है। उनका मानना था "काल करै सो आज कर,आज करै सो अब।"यानी जो कुछ कहना अभी कहो।रीयलटाइम में कहो

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फेसबुक चूंकि कम्युनिकेशन है अतः वह रहेगा, इसके पहले के कम्युनिकेशन मीडियम भी रहेंगे, यह गलत धारणा है कि पूर्ववर्ती कम्युनिकेशन रूपों या माध्यमों का लोप हो जाएगा। पहले के माध्यमों की भी प्रासंगिकता रहेगी, उपयोगिता रहेगी और फेसबुक की भी। फेसबुक या अन्य रीयलटाइम माध्यम तो इस जगत को जानने में हमारी मदद कर रहे हैं।

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फेसबुक में कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है,अन्य चीजें जैसे वंश,जाति,धर्म,उम्र, हैसियत आदि गौण हैं। फेसबुक एक तरह से अभिव्यक्ति की अति तीव्रगति का खेल है। यहां आप मुस्कराते रहिए,लाइक करते रहिए, कोई आपको हाशिए पर नहीं डाल सकता।

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वर्चुअल तकनीक में अन्य माध्यमों की तुलना में ऑब्शेसन का भाव ज्यादा है। ऑब्शेसन की यह खासियत है कि यह जल्दी अंतरंग जगत को खोल देता है। यही वजह है वर्चुअल माध्यमों के जरिए आदान-प्रदान ,संवाद, खुलेपन की अभिव्यक्ति जल्दी और सहज ढ़ंग से हो जाती है।

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कलाओं में कलाकार का लगाव व्यक्त होता है। लेकिन फेसबुक लेखन में यूजर का कोई लगाव नहीं होता। यहां लोग व्यक्तिगत तौर पर आते हैं और जातें है। लाइक करते हैं,टिप्पणी करते हैं और निर्विकार अंजान भाव से चले जाते हैं। इस तरह का परायापन अन्य माध्यमो में नहीं देखा। फेसबुक पर लिखते समय शब्द और शरीर में अंतराल रहता है। कलासृजन में यह संभव नहीं है।

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फेसबुक यूजर का ऑब्शेसन अवसाद पैदा करता है और कलाकार का ऑब्शेसन कला की आत्मा से साक्षात कराता है।

मनुष्य अकेला प्राणी है जिसकी अभिव्यक्ति की इच्छाएं कभी शांत नहीं होतीं। वह इनको शांत करने के लिए नए नए उपाय और मीडियम खोजता रहता है। फेसबुक उस प्रक्रिया में उपजा एक मीडियम है ।पता नहीं कब जल्द ही नया मीडियम आ जाए और हम सब फेसबुक को छोड़कर वहां मिलें।

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सभी मानवीय उपकरण मानसिक सुख के लिए बने हैं । फेसबुक का भी यही हाल है इससे आप मानसिक सुख हासिल कर सकते हैं। फेसबुक वस्तुतः अभिव्यक्ति का फास्टफूड है।

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फेसबुक लेखन अ-कलात्मक सपाटलेखन है। आप यहां कला के जितने भी प्रयोग करें संतोष नहीं मिलेगा। फेसबुक का मीडियम के रूप में कला से बैर है।कलात्मक अभिव्यक्ति के लिहाज से फेसबुक बाँझ है।

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फेसबुक पर लिखते समय प्रत्येक यूजर यथाशक्ति कोशिश करता है बेहतरीन लिखे,लेकिन लिखने के बाद महसूस करता है अब अगली पोस्ट ज्यादा बेहतर लिखूँगा। लेकिन बेहतर पोस्ट कभी नहीं बन पाती।

फेसबुक असंतोष को हवा देता है। लोग संतोष के लिए यहां अभिव्यक्त करते हैं लेकिन असंतोष लेकर जाते हैं।


सोमवार, 3 सितंबर 2012

पश्चिम बंगाल में पूंजीनिवेश के मित्रतापूर्ण माहौल की तलाश में रतन टाटा


पश्चिम बंगाल में औद्योगिक पूंजी निवेश में सबसे बड़ी बाधा है नेताओं का पूंजीपति विरोधी राजनीतिक कठमुल्लापन । इस राजनीतिक कठमुल्लेपन को विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों और दलों ने विगत चार दशक में समय समय पर हवा दी फलतःराज्य में पूंजीनिवेश बंद हो गया। यहां पर वह नेता जनशत्रु माना जाता है जो औद्योगिक पूंजी निवेश की बातें करता है।

आमजनता की ग्राम्यचेतना के सबसे पिछड़े मूल्यों को बनाए रखकर औद्योगिकीकरण का विरोध करना यहां के नेताओं और सांस्कृतिक नायकों की विशेषता है। विगत वाम मोर्चा सरकारों से लेकर मौजूदा ममता सरकार के आने के बाद भी यह राजनीतिक कठमुल्लापन खत्म नहीं हुआ है।सच यह है कि जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करने और वोट जुटाने के लिए राजनीतिकदलों ,स्वयंसेवी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने विभिन्न रूपों में राजनीतिक कठमुल्लेपन को हवा दी है।

राजनीतिक कठमुल्लापन स्थानीय मीडिया में भी व्यापक कवरेज और सम्मान प्राप्त करता रहा है।इसके कारण राज्य के बौने नेता अपने को महान नेता समझते हैं। जिन नेताओं ने कभी राज्य में एक भी पैसे का पूंजीनिवेश नहीं कराया वे जनहितकारी होने का दावा करते हैं.उनकी राजनीतिक भाषा में भय और संत्रास व्यक्त होता रहा है .वे अपने को राज्य का उन्नायक मानते हैं .और वे ही राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक नायक-उपनायक भी हैं।

राज्य के तथाकथित सांस्कृतिक नायकों –उपनायकों की सामान्यभाषा में तथाकथित क्रांति या जनहित की भाषा में पूंजीविरोधी उन्माद को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है और मीडिया ने उसका महिमामंडन किया है। यही वो प्रतिकूल परिवेश है जिसकी ओर प्रकारान्तर से प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा ने हाल ही में अपनी यात्रा के दौरान प्रकाश डाला। उल्लेखनीय है रतन टाटा विगत दिनों टाटा ग्लोबल व्रेबरीज या टाटा टी कंपनी के शेयरधारकों की आमसभा में बोल रहे थे। रतन टाटा के इस सभा में दिए गए बयान में बहुत गंभीर संकेत छिपे हैं जिनको राजनेताओं-सांस्कृतिककर्मियों को गंभीरता से पढ़ना चाहिए।

रतन टाटा का सीधा संदेश था कि पश्चिम बंगाल राजनीतिक कठमुल्लेपन से मुक्ति हासिल करे। इस संदेश ने ममता बनर्जी सहित सभी नेताओं को दुविधा में डाल दिया है।ममता बनर्जी और उनके सलाहकार समझ ही नहीं पा रहे हैं कि राज्य के औद्योगिक माहौल में आए गतिरोध को कैसे तोड़ा जाए।

आमतौर पर कोई भी बड़ा उद्योगपति जब कोलकाता आता है तो उससे सत्तारूढ़ दल के नेतागण मिलते हैं या वो उनसे मिलता है। पिछलीबार टाटा ग्रुप के नए चेयरमैन सायरस मिस्त्री कोलकाता आए थे तो राज्य के उद्योगमंत्री सहित कई आला अधिकारी उनसे मिले थे। लेकिन इसबार विलक्षण बात हुई कि रतन टाटा और सायरस मिस्त्री कोलकाता आए तो उनसे सत्तारूढ़ दल का कोई नेता मिलने नहीं गया। यह खुशी की बात है कि राज्यपाल ने उनके लिए निजी भोज दिया।

रतन टाटा के लिए इसबार की यात्रा बेहद महत्वपूर्ण रही। उनके संदेश ने राजनीतिक गलियारों में बेचैनी पैदा की है। टाटा टी कंपनी के शेयरधारकों की आमसभा को सम्बोधित करते हुए रतन टाटा ने जो कहा है वह राज्य के सत्तारूढ़दल के लिए एक तरह का खुला निमंत्रण है कि यदि टाटा ग्रुप का राज्य में पूंजी निवेश बढाना है तो सत्तारूढ़ दल को अपने राजनीतिक कठमुल्लेपन को त्यागना होगा।

रतन टाटा ने उम्मीद जतायी कि एकदिन यहां पर ऐसा राजनीतिक वातावरण जरूर पैदा होगा जिसमें पूंजीपति अपने लिए सुरक्षित महसूस करेंगे।जब तक राज्य में पूंजीपतियों के लिए मित्र वातावरण पैदा नहीं होता तब तक असुविधा बनी रहेगी। रतन टाटा ने अपने स्वभाव के अनुकूल भावुक होकर साफ शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल से उनकी कंपनी भाग नहीं रही है, उनकी कंपनी यहां पर है और रहेगी।विभिन्न क्षेत्रों में टाटा ग्रुप का यहां पर करोड़ों रूपये का पूंजीनिवेश है और आगे इसमें इजाफा होगा।

जब एक शेयरहोल्डर ने राज्य में कार का कारखाना खोलने के बारे में सवाल किया तो रतनटाटा ने बड़ी मार्के की बात कही। टाटा ने कहा कि वे राज्य में कहीं पर भी कार का कारखाना लगाने को तैयार हैं उन्हें राज्य सरकार मित्रभाव से बुलाए। रतनटाटा का मित्रभाव की मांग करना और इस मित्रभाव का पश्चिम बंगाल में अभाव उनको बार बार परेशान करता रहा है। शेयरहोल्डरों की आमसभा में बोलते समय रतन टाटा अपने लिए जब मित्रभाव की मांग कर रहे थे तो वे प्रच्छन्न तरीके से राजनीतिक कठमुल्लेपन से लड़ने के लिए राज्य के नेताओं और संस्कृतिकर्मियों को साफ संदेश दे रहे थे कि वे पहले अपना रवैय्या ठीक करें.पूंजी और पूंजीपतिवर्ग के प्रति द्वेषभाव को त्यागें.

रतनटाटा ने कहा कि हमने यहां पर दुनिया का श्रेष्ठतम कैंसर अस्पताल खोला है।इस अस्पताल में वे सभी सुविधाएं हैं जो दुनिया के किसी भी बेहतरीन अस्पताल में होनी चाहिए। आमसभा में रतन टाटा ने कोलकाता के साथअपने निजी लगाव की बातें भी कहीं।उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा है और वे भी भारत का अभिन्न अंग हैं। इसीलिए उनकी कंपनियां यहां पर रहेंगी। एकदिन ऐसा भी आएगा जब उनकी कार कंपनी का राज्य में स्वागत किया जाएगा। रतनटाटा ने कहा कि सिंगूर की घटना से वे दुखी महसूस करते हैं।राज्य में उनकी कार कंपनी निवेश करे इसके लिए जरूरी है राज्य के सत्तारूढ़दल के नेता पहल करें और मित्रता का माहौल बनाएं। रतन टाटा ने कहा कि उनके मन में राज्य को लेकर न तो कोई पूर्वाग्रह है और न मतभेद हैं और नहीं इस राज्य को छोड़कर चले जाने की इच्छा है।