मंगलवार, 3 अगस्त 2010

सामाजिक मोनोपॉज है मनमोहन कोड

          मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उन्हें सार्वजनिक राजनीतिक वक्ता के रूप में कोई नहीं जानता। उनका प्रभावशाली वक्ता के रूप में सभा ,मंच,मैदान , संसद और टीवी में अनुस्थित रहना, उनकी इमेजों का अनुपस्थित रहना और इन सबके बीच में उनका असरदार प्रधानमंत्री बने रहना, अपने आपमें बड़ी उपलब्धि है। अनुपस्थिति को उपलब्धि में उन्होंने कैसे बदला है ? इस तरह का बाना क्यों बनाया है ? इसकी विचारधारात्मक क्या परिणतियां हो सकती हैं ? इत्यादि सवालों के बारे में हम अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं।
      मनमोहन की इमेजों की अनुपस्थिति यह आभास देती है कि वे नहीं हैं। लेकिन उनका प्रधानमंत्री के रूप में प्रभावशाली भूमिका निभाना यह संदेश देता है कि वह हैं। वह हैं भी और नहीं भी के द्वंद्व में फंसे हैं। इस क्रम में उनकी पहचान का बने रहना और उसके पीछे समूची कांग्रेस पार्टी और कारपोरेट लॉबी का एकजुट भाव से बने रहना इस बात का संकेत है कि उनकी राजनीतिक साख है। उनकी राजनीतिक साख निजी व्यक्ति के रूप में नहीं है बल्कि सामूहिक तौर पर कांग्रेस की साख का ही वे प्रतिबिम्बन करते हैं।
   मनमोहन कोड ने व्यक्तिगत राजनीति,व्यक्ति केन्द्रित राजनीति,पार्टी केन्द्रित राजनीति की बजाय सूचना केन्द्रित राजनीति को स्थापित किया है। वे सूचना की रूपान्तरणकारी भूमिका देखते हैं। यही वजह है कि सबसे पहले सूचना अधिकार कानून को उन्होंने लागू किया और लगातार अपनी सरकार के कामों की सूचनाएं और खबरें जारी करते रहते हैं।
      एक जमाना था किसी भी राजनीतिक ,आर्थिक फैसले को लागू करने के साथ बड़े जोर-शोर से प्रचार किया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता अब बड़ा से बड़ा नीतिगत फैसला सिर्फ खबर के रूप में,सूचना के रूप में आता है। यह सिलसिला मनमोहन सिंह सरकार के प्रथम कार्यकाल के साथ शुरू हुआ था और जमकर इसी दिशा में सरकार चल रही है। अब सरकार के प्रत्येक कामकाज को खबर में रूपान्तरित करके पेश किया जा रहा है। खबर में पेश करने का यह लाभ हुआ है कि अंदर के किसी भी किस्म के मतभेदों के प्रचार की कोई जगह नहीं रह गयी है।
    हाल ही में राष्ट्रमंडल खेलों के प्रसंग में उठे भ्रष्टाचार के आरोप और उन पर केन्द्र सरकार की संस्थाओं के द्वारा जारी एक्शन की सूचनाओं का अहर्निश फ्लो, हिन्दू आतंकवाद की सूचनाओं का सरकार की ओर से अबाधित फ्लो,मंहगाई के सवाल पर सूचनाओं का साप्ताहिक बुलेटिन आदि इस बात के संकेत है कि मनमोहन कोड ने अब प्रत्येक चीज को खबर या सूचना में तब्दील कर दिया है। प्रत्येक चीज का सूचना में रूपान्तरण यह मानकर हो रहा है कि सूचना में रूपान्तरण की क्षमता होती।
     मनमोहन कोड आम जनता की कॉमनसेंस आस्था का दोहन कर रहा है। वह मानकर चल रहे हैं कि सूचना या खबर पर लोग विश्वास करते हैं अतः हर चीज को खबर बनाकर पेश करो। सूचना में प्रत्येक घटना,नीति,बयान,हंगामे आदि का रूपान्तरण यह भी संदेश देता है कि खबरों के पीछे कुछ गड़बड़झाला भी चल रहा है।
   मनमोहन कोड द्वारा की जा रही सूचनावर्षा ने आलोचनात्मक विवेक को पंगु बना दिया है। आलोचनात्मक विवेक के आधार पर सोचने और बोलने वाले लोगों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। सूचना की व्यवस्था में जब सब कुछ समाहित कर लिया जाएगा तो उसमें नकारात्मक सूचनाएं भी समाहित हो जाएंगी। यानी सूचना में विकास की खबरें हैं तो भ्रष्ट्राचार, भाई-भतीजावाद,हिन्दुत्व,पृथकतावाद,सिनेमा, स्कैंडल,मासकल्यर आदि की भी खबरें या सूचनाएं सम्प्रेषित हो रही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सूचना या खबर की व्यवस्था समाहित करने,सब कुछ हजम कर जाने वाली व्यवस्था है। इसमें सारा कचरा अंदर चला जाता है और रिसाइकिल होकर बाहर आता है।
        सूचना क्रांति के मौजूदा दौर में सामाजिक रूपान्तरण वैसा नहीं होता जैसा पूर्व संचार क्रांति के जमाने में होता था। बल्कि सामाजिक परिवर्तन के अर्थ और महत्ता को अपनी आंखों क्षतिग्रस्त होते देख रहे हैं। किसी भी घटना की अर्थवत्ता का क्षय निजी आंखों देख रहे हैं। सूचनाएं हमें अमूर्तन में फेंक रही हैं। गैर-जिम्मेदार बना रही हैं। सूचनाओं में जिम्मेदारी का अभाव हमें खोखले भावबोध में बांधे रखता है। अब हमारे पास सूचनाएं तो हैं लेकिन हम खोखले हैं। अपंग हैं।
     एक जमाना था बोफोर्स कांड में साधारण से कमीशन खाए जाने के मामले पर सारे देश में राजनीतिक तूफान आ गया था। लेकिन अब प्रतिदिन भ्रष्टाचार की खबरें मीडिया में आ रही हैं लेकिन कोई राजनीतिक तूफान नहीं है। पहले कई बार आलू-प्याज के दाम बढ़ने पर देश में प्रदर्शन-आंदोलन आदि का तांता लग जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता। क्योंकि मनमोहन कोड ने सबको सूचना या खबर में रूपान्तरित कर दिया है। सूचना या खबर जब मीडिया स्क्रीन पर आए और फिर दर्शकों के मन की स्क्रीन पर उतरती है तो वह इनडिफरेंस पैदा करती है। इस इनडिफरेंस का तकनीक निर्मित इनडिफरेंस के साथ गहरा संबंध है। सूचना कैसे इनडिफरेंस पैदा करती है यह इस सामान्य तथ्य से समझ सकते हैं कि अब दंगे की खबर,दंगे में मारे गए लोगों की लाशें,जले हुए घर, तबाह इलाकों से गुजरने के बावजूद दर्शकों के ऊपर कोई असर नहीं होता वे इनडिफरेंट बने रहते हैं। यह एकदम नए वर्चुअल युग के आगमन की सूचना है। मैंने बहुत पहले इस संदर्भ की व्यापक चर्चा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के मूल्यांकन से संदर्भ में की थी।
    मनमोहन कोड में हम कब दाखिल हुए यह सटीक रूप में कहना मुश्किल है लेकिन 1991-92 में  नव्य उदार नीतियों को जबसे मनमोहन सिंह ने लागू किया और विकास का नव्य उदार रास्ता पकड़ा तब से यह सिलसिला आरंभ हुआ।
    मनमोहन कोड के कारण अब प्रत्येक व्यक्ति अपनी दुनिया में मगन है। अपनी कक्षा में भ्रमण कर रहा है। अपने निजी उबाल,तबाही,आनंद आदि में व्यस्त है। अब किसी का कोई भवितव्य नहीं है। भाग्य नहीं है। अब भाग्य वही है जहां आपके हित अन्य से मिलते हैं। हित जुड़ते हैं। अब हम सब एक ही हाइवे पर और एक ही दिशा में दौड़ते हुए एक-दूसरे को देख रहे हैं। एक दिशा में जाते हुए लोगों को देखना मछली की तरह देखना है। लगता है सहजजात संवेदनाओं से संचालित होकर एक ही दिशा में दौड़े चले जा रहे हों। एक ही दिशा में दौड़े चले जाने में एक्सीडेंट की संभावनाएं कम होती हैं। लेकिन इसमें सफाए की संभावना है। अस्तित्व के गायब हो जाने की संभावनाएं हैं। अब अन्य का न्यूनतम मूल्य रह गया है।
   मनमोहन कोड सामाजिक मोनोपॉज है। इसमें सामाजिक होने से एलर्जी पैदा हो जाती है। सामाजिक अव्यवस्था से एलर्जी हो जाती है। रेशनल डिसआर्डर हो जाता है। सपने आने बंद हो जाते हैं। बुखार सा रहता है। बेचैनी रहती है। आलस्य बना रहता है। बाल गिरने लगते हैं। इरीटेशन रहता है। अब प्रत्येक चीज इरीटेशन से शुरू होती है। हमेशा आक्रामक मुद्रा में रहने लगते हैं। वे वजह उत्तेजित रहने लगते हैं।   
      
                









फिलीस्तीनी जनता पर इस्रायली जुल्म की कहानी












सोमवार, 2 अगस्त 2010

रूपक मडरॉक का इंटरनेट स्वतंत्रता पर हमला


                     (ऱूपक मडरॉक)     
जब सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक विचारक अंत का बिगुल बजाते हुए विचारधारा का अंत, समाजवाद का अंत,मार्क्सवाद का अंत,आधुनिकता का अंत,साहित्य का अंत आदि का जयघोष कर रहे थे और सबके सामने सच के ज्ञाता होने का दावा कर रहे थे उस समय उन्हें मालूम ही नहीं था कि जिस संचार क्रांति को वे उत्तर आधुनिकता की धुरी बता रहे हैं और कार्ल मार्क्स को कब्र में सुलाने के प्रयास कर रहे हैं, उसी संचार क्रांति के महामाध्यम इंटरनेट ने ‘अंत’ का ही ‘अंत’ कर दिया है।
     इंटरनेट की खूबी है कि यहां ‘दि एण्ड’ पदबंध नहीं है। यहां अंतिम पन्ना भी नहीं होता। इंटरनेट में अखबार के कल के अंक की व्यवस्था भी नहीं है। नेट पर सब कुछ रीयलटाइम और अनंत रूपों में घटित होता रहता है। इंटरनेट की अंतर्वस्तु अनंतरूपा और अंतहीन है। यह अंत का अंत है।
     इसी प्रसंग में कार्ल मार्क्स की एक बात याद आती है, उन्होंने लिखा था कि प्रत्येक चीज और वस्तु में उसका विलोम होता है। अंतर्विरोध होते हैं। अंत के अंत की थ्योरी और तकनीक में से ही अंत सामने आया है,इसकी कभी उत्तर आधुनिकों ने कल्पना तक नहीं की थी।
    आज सूचना का नियंता यूजर है। वह तय करे कि सूचना की शक्ति क्या है ? सीमा क्या है ? हाल ही में रूपक मडरॉक के न्यूज कारपोरेशन ने अपने कारपोरेशन की खबरों को गूगल द्वारा संक्षिप्त समाचार के रूप में दिखाए जाने पर पाबंदी लगा दी है । क्या न्यूज कारपोरेशन की इस हरकत से इंटरनेट आकर्षक रह जाएगा ? न्यूज कारपोरेशन वाले चाहते हैं कि उनके अखबार,पत्रिका आदि को इंटरनेट पर भुगतान के जरिए पढ़ा जाए और यह इस कारपोरेशन की अलोकतांत्रिक हरकत है।यह सीधे इंटरनेट की अबाधित संचार की धारणा में कारपोरेट हस्तक्षेप है।  इसकी जमकर आलोचना की जानी चाहिए। इंटरनेट का आनंद है इसकी असीमित अंतर्वस्तु। रूपक मडरॉक अंतर्वस्तु पर भुगतान का लेबल लगाकर अंतर्वस्तु के अनंत संसार की हत्या करना चाहता है। देखना है रूपक मडरॉक इसमें सफल होता है या इंटरनेट का जादुई संसार।
उल्लेखनीय है इस समय इंटरनेट पर सर्वोच्च 10 भाषाओं के यूजरों की संख्या इस प्रकार है-अंग्रेजी 495.8 मिलियन,चीनी 407.7 मिलियन,स्पेनिश 139.8 मिलियन, जापानी 96.0 मिलियन, पोर्चुगीज 77.6 मिलियन,जर्मन 72.3 मिलियन,फ्रेंच 57.0.रूसी 45.3 मिलियन, कोरियन 37.5 प्रतिशत और इनके अलावा भाषाओं के इंटरनेट यूजरों की कुल संख्या है 313.7 मिलियन यूजर।


सेंसरशिप की विदाई की बेला में बेव लेखन

इंटरनेट आने बाद से सर्वसत्तावादी राज्यतंत्र की जड़ें कमजोर हुई हैं। कल तक जिन देशों में एक पार्टी का शासन था और वहां पर अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी वहां पर लिखना,पढना और स्वतंत्र विचार व्यक्त करना मुश्किल था। 1995 के बाद से सारी दुनिया में सेंसरशिप की नेट ने कमर तोड़ दी है। आज सिर्फ दो देश हैं जहां सेंसरशिप है,वे हैं-उत्तरी कोरिया और बर्मा। बाकी सारी दुनिया से सेंसरशिप की विदाई हो चुकी है। यह एक तरह से शीतयुद्ध के पुराने तंत्र के टूटने की सूचना भी है।
   संचार की तकनीक के विकास और प्रसार ने वह काम कर दिखाया है जो सारी दुनिया के बौद्धिक और राजनीतिक संघर्ष नहीं कर सके। संचार की तकनीक हमारे बीच में ऐसे बह रही है जैसे पानी बहता है। बेव पर लिखा बृहत्तर समुदाय तक तीव्रतम गति से पहुँच रहा है। बेव लेखन उन सबको दबाब में ले रहा है जो अभिव्यक्ति की आजादी के शत्रु हैं।
     बेव क्रांति का ईरान का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण है।हार्वर्ड विश्वविद्यालय के बिर्कमैन सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी के अनुसार सारी दुनिया में अरबी भाषा के पैंतीस हजार नियमित अपडेट होने वाले ब्लॉग हैं। इसके अलावा फारसी में सत्तर हजार सक्रिय ब्लॉग हैं। सारी दुनिया में 75 मिलियन लोग फारसी बोलते हैं। टेक्नोराती के अनुसार ईरान में फारसी में नेट पर लिखने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। सारी दुनिया में फारसी 10 सबसे जनप्रिय ब्लॉग भाषाओं में से एक है। ब्लॉगिंग में हजारों लोग आलोचनात्क नजरिए से लिख रहे हैं। भारत में भी ऐसा ही घटित हो रहा है।
    ब्लॉगर कैसे सत्ता,समाज और संचार को बदल रहे हैं इसका एक ही उदाहरण काफी है। मिस्र में डब्ल्यू.अब्बास ने फरवरी 2005 में ब्लॉगिंग आरंभ की और उसने घरेलू हिंसा पर केन्द्रित किया। आरंभ में थोड़े लोग पढ़ते थे। लेकिन ज्योंही उसने 2006 में पुलिस यातना के वीडियो को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया तो उस पर बड़ा हंगामा मचा। इसके कारण अनेक पुलिस अफसरों को सजा हुई। नबम्वर 2008 में अब्बास ने कहा कि मेरे ब्लॉग पर लाखों पाठक आ चुके हैं। वह उन विषयों पर लिखता है जिन पर मीडिया में कवरेज का अभाव होता है। ब्लॉगिंग के कारण अब्बास को पुलिस उत्पीड़न का बार-बार सामना करना पड़ा है।
यह भी देखा गया है कि ब्लॉगिंग और सोशल नेटवर्क का उन देशों में तेजी से विकास हो रहा है जहां दमन सबसे ज्यादा है। बेव संस्कृति का दबाब ही कहा जाएगा कि चीन जैसा देश यह मानने के लिए मजबूर है कि आर्थिक विकास के लिए बेव का बने रहना अनिवार्य और अपरिहार्य है। वे यह भी महसूस करते हैं कि बेव पर सेंसरशिप बेहद मुश्किल और खर्चीला काम है।
      नेटक्राफ्ट के द्वारा जनवरी 2010 में कराए सर्वे से पता चलता है कि बेब लेखन में तेजी से इजाफा हो रहा है। नेटक्राफ्ट को 206,741,990 बेवसाइट वालों ने जबाब भेजा,इसमें तकरीबन सभी बेव सर्वर वालों ने अपनी सूचनाएं प्रदान कीं। इससे यह भी तथ्य सामने आया है कि सभी बेवसर्वर का बाजार में हिस्सा बढ़ा है। इसमें Apache   के सन् 2009 की तुलना में 3 मिलियन होस्टनेम दर्ज हुए हैं। अब उसके पास 111.3 मिलियन ग्राहक हैं। इसके बाद दूसरा स्थान माइक्रोसॉफ्ट का है।-

आतंकवाद और अमेरिकी खेल

      आतंकवाद राजनीतिक फिनोमिना है।इसका एक आयाम राज्य आतंकवाद है।आमतौर पर राज्य आतंकवाद के संदर्भ में अमरीकी आतकवाद की भूमिका की अनदेखी होती है। अमरीकी आतंकवाद महज राजनीतिक हिंसाचार नहीं है अपितु आतंकवाद का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संगठनकर्त्ता है।यह साम्राज्यवादी हितों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों का विस्तार भी है।यह भी कह सकते हैं कि द्वितीय विश्व युद्धोत्तर दौर में आतंकवाद का साम्राज्यवाद के हितों के विस्तार के लिए संगठित ढ़ंग से विकास किया गया और इस कार्य को अमरीका,सीआईए और पेंटागन के जरिए विश्वव्यापी फिनोमिना के तौर पर फैलाया गया।इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में अपराधी गिरोहों,भाड़े के सैनिकों के सैन्य दलों का गठन किया गया।इन कार्यों के लिए अमरीकी सरकार ने पर्याप्त मात्रा मे धन,सैन्य सामग्री और प्रचार माध्यमों की सहायता मुहैयया कराई।साथ ही खुल्लमखुल्ला राजनीतिकसमर्थन भी प्रदान किया और तमाम किस्म के हत्यारों को अपने देश में शरण दी। इस कार्य में राजनीतिक मुद्दे,मकसद और मदद सुनिश्चित करने में अमरीका के विदेश विभाग और विदेश नीति का गहरा हाथ रहा है। 

अमरीकी आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं का विश्वव्यापी रहस्योद्धाटन करने में नॉम चोमस्की की अग्रणी भूमिका रही है।हाल ही में 11सितम्बर और उसके बाद के घटनाक्रम पर सबसे ज्यादा सुसंगत ढ़ंग से उन्होंने प्रकाश ड़ाला है।चोमस्की के विचारों में अमरीकी प्रशासन की समग्र नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।वह विश्व के प्रति अमरीका के समग्र नजरिए की आलोचना करते हुए विकल्प के प्रस्तावों को सामने लाते हैं। 

चोमस्की ने 17 फरवरी के न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख के जबाव में 19फरवरी2002 को जेड नेट वेबसाइट को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा कि 11 सितम्बर को अमरीका में आतंकी हमले के बाद बहुराष्ट्रीय प्रचार माध्यमों ने जिस तरह एकायामी ढ़ंग से अमरीकी सरकार के भोंपू का कार्य किया उससे आतंकवाद के बारे में सही समझ बनने की बजाए भ्रम की सृष्टि ज्यादा हुई। मसलन् यह कहा गया कि 11 सितम्बर के हमले के पीछे लादेन का हाथ था। यदि यह सच भी हो तब भी हमें यह जानना चाहिए कि उसके क्या कारण थे ?इससे गरीबों और असहाय लोगों को तो कोई मदद मिलने से रही।यहां तक कि फिलिस्तीनियों को भी इससे कोई मदद मिलने से रही।यदि लादेन ने इसकी योजना बनाई थी तो उसका लक्ष्य क्या था ? इसके जबाव में चोमस्की ने कहा कि हमें इसके प्रति सतर्क होकर सोचना चाहिए। 

रॉबर्ट फिस्क के अनुसार (जिसने लादेन के कई लंबे-लंबे साक्षात्कार लिए थे)इस क्षेत्र की जनता में फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजराइली हिंसाचार और उत्पीड़न को अमरीका द्वारा दिए गए समर्थन के खिलाफ गुस्सा था साथ ही इराक के खिलाफ आर्थिक पाबंदी के नाम पर जो तबाही मचाई गई उसके कारण अमरीका के खिलाफ तीव्र गुस्सा था।इस सबको लादेन महसूस न करता हो इसमें संदेह है। 

अनेक लोग यह भी मानते हैं कि अफगानिस्तान की गुफाओं में रहने वाले लादेन में 11सितम्बर जैसे सुव्यवस्थित और उच्च तकनीकी संपन्न हमला करने की क्षमता नहीं हो सकती।किन्तु उसके नेटवर्क का इसमें हाथ हो सकता है।वह अपने अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहा है।इसके बावजूद याद रखें कि इस नेटवर्क का ढ़ांचा विकेन्द्रित रहा है।इसका गैर हायरार्कीकल ढांचा है।इनमें सीमित स्तर पर संचार संबंध हैं।चोमस्की ने कहा कि जब विन लादेन यह कहता है कि उसे 11सितम्बर की घटना के बारे में कुछ भी नहीं मालूम तो संभवत: वह सच बोल रहा हो। क्योंकि वह वाचाल है यदि उसने इस आपरेशन की अनुमति दी होती तो वह जोर-जोर से इसकी घोषणा भी करता। 

चोमस्की ने कहा कि इन सब बातों को छोड़ भी दें तब भी हमे यह ध्यान रखना होगा कि विन लादेन क्या चाहता है इसे लेकर उसका इरादा एकदम साफ है।यह बात वह किसी पश्चिमी से बात करते समय ही ध्यान में नहीं रखता अपितु किसी अरब से बात करते समय भी ध्यान में रखता है।आम लोगों में प्रसारित उसके कैसेट बताते हैं कि वह पश्चिम को बताना चाहता है कि सऊदी अरब और इस क्षेत्र के भ्रष्ट और जुल्मी शासनों के खिलाफ उसके अंदर जबर्दस्त गुस्सा है।इनमें से कोई भी सच्चा ''इस्लामिक''नहीं है। वह और उसका नेटवर्क मुसलमानों का गैर मुसलमानों के खिलाफ समर्थन करता रहा है।चेचेन्या,बोसनिया,श्मीर,पश्चिमी चीन,दक्षिण-पूर्व एशिया,उत्तरी अफ्रीका आदि स्थानों पर वह मुसलमानों का समर्थन करता रहा है।उन्हें मुस्लिम अफगानिस्तान से सोवियत संघ (उनके अनुसार यूरोपीय)को खदेड़ देने और युध्द जीतने का मौका मिला।वे अमरीका को सऊदी अरब से निकाल बाहर करने के प्रति और भी ज्यादा उत्साही थे।इससे भी बड़ी बात यह कि वे सऊदी अरब एक पवित्र देश है और इससे अमरीका को बाहर किया जाए।साथ ही वे सऊदी अरब के बर्बर, भ्रष्ट और गिरोहवाज शासकों को उखाड़ देना चाहता था।यह भी सच है कि लादेन के अपराध इस क्षेत्र के गरीबों और सबसे ज्यादा शोषितों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह हैं।उसका ताजा हमला फिलिस्तीनियों के लिए सबसे क्षतिकारक है।लेकिन दूर से देखने पर ऐसा नहीं लगता। जो साहस के साथ उत्पीड़को के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं उन्हें यह वास्तव में हीरो लगता होगा। किंतु बहुसंख्यक गरीबों के लिए उसके एक्शन क्षतिकारक हैं।यदि अमरीका उसको मारने में सफल हो जाता है तब वह और भी बड़ा शहीद हो जाएगा और उसके कैसेट और भी ज्यादा सुनाई देंगे।वह प्रतीक है।वस्तुगत शक्ति है।खासकर अमेरिका और इस क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता के लिए। 

प्रत्येक दृष्टि से वह जो कह रहा है उस पर ध्यान देना चाहिए।इसके अपराध सीआई के लिए शायद आश्चर्यजनक हों।क्योंकि इस्लामिक तत्ववादियों को संगठित करने और हथियारबंद करने में अमेरिका-मिस्र-फ्रांस-पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका रही है। 





रविवार, 1 अगस्त 2010

मनमोहन के डिजिटल विभ्रम में चमकती गरीबी

       मनमोहन सिंह का दावा है कि वह विकास पुरूष हैं। विकासपुरूष का उनका विभ्रम सबको आकर्षित कर रहा है। विकास के नाम पर उन्होंने भौतिक आकांक्षाओं का विभ्रम पैदा किया है। कारपोरेट मीडिया को विकास के विभ्रम में कहीं कोई खोट नजर नहीं आ रहा। यदि कोई खोट दिखाने की कोशिश करता है तो उसे कारपोरेट मीडिया हूट करता है, हास्य-व्यंग्य का पात्र बना देता है। विकासविरोधी कहता है। विकास के विभ्रम का ऐसा विराट वायवीय तानाबाना तैयार किया गया है कि उसके अलावा कुछ भी सोचना संभव नहीं है।
     मनमोहन  कोड ने विकास के विभ्रम को मूलगामी परिवर्तन के साथ गड्डमड्ड कर दिया है। वह ऐसा विभम पैदा कर रहे हैं जो अनुभूतियां विकास की पैदा कर रहा है किंतु वास्तविकता सामाजिक पिछड़ेपन की निर्मित कर रहा है। मसलन ग्लोबलाइजेशन की आत्मगत अनुभूतियों ने ठोस वास्तविकता के साथ व्यापक अलगाव पैदा कर दिया है। इस क्रम में विभ्रम चमक रहा है और यथार्थ धुंधला पड़ गया है अथवा आम बातचीत से गायब हो गया है।
    मनमोहन कोड ने कु-यथार्थ की सृष्टि की है। कु-यथार्थ को ही हम यथार्थ समझने की भूल कर रहे हैं। यथार्थ को कु-यथार्थ में उलझा देना, विभ्रमों में व्यस्त रखना,विभ्रम को वास्तव के रूप में प्रचारित करना,एक ऐसी सच्चाई है जिसे हम डिजिटल परिप्रेक्ष्य के बिना समझ नहीं सकते।
    विकास विभ्रम को वास्तविकता नहीं बनाया जा सकता । विभ्रम कभी यथार्थ में तब्दील नहीं होता। वह विभ्रम ही रहता है। विभ्रम आत्मगत होता है और आत्मगत ही रहता है। लेकिन अब मनमोहन कोड के बहाने उलटा शास्त्र पढ़ाया जा रहा है आत्मगत को वस्तुगत बताया जा रहा है। लेकिन आत्मगत को वस्तुगत नहीं बनाया नहीं जा सकता। आत्मगत विभ्रम को वस्तुगत विभ्रम में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता।
     वस्तुगत विभ्रम की कायिक उपस्थिति होती है। लेकिन मौजूदा डिजिटल जगत में किसी भी चीज की कायिक उपस्थिति नहीं होती। यहां कोई भी चीज मसलन औरत, सेक्स. कुर्सी,मेज कोई भी चीज कायिक तौर पर मौजूद नहीं रहती, ऐसे में विकास को हम कैसे कायिक तौर पर देख सकते हैं। अब कोई भी चीज वास्तव शक्ल में नहीं नजर आती। चीजें हमसे दूर रहती हैं। वे साथ ही साथ पास हैं,रीयलटाइम में हैं और साथ ही अति दूर भी हैं।
   विभ्रम के आंकड़ों का खेल देखिए टाहम्स ऑफ इण्डिया ( 1.8.10) में एक रिपोर्ट छपी है जिसमें नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि भारत में पहलीबार समृद्धों की संख्या गरीबों की संख्या से ज्यादा हो गयी है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2010 तक उच्च आयवर्ग के परिवारों की संख्या 46.7 मिलियन हो जाएगी। जबकि कम आय वाले परिवारों की संख्या 41 मिलियन आंकी गयी है। सन् 2001-02 में उच्च आयवर्ग के लोगों की आय सालाना 1.8 लाख रूपये थी। उस समय 65.2 मिलियन परिवार कम आयवर्ग की केटेगरी में आते थे। यानी उनकी सालाना आमदनी 45,000 रूपये प्रतिवर्ष थी। जबकि मध्यवर्ती आयवर्ग (45,000 हजार से 1.8लाख रूपये के बीच में ) में आने वाले परिवारों की संख्या एक दशक में 109.2 मिलियन से बढ़कर 140.7 मिलियन हो गई है। इसके विपरीत आर्थिक मंदी के कारण मध्य वर्ग के परिवारों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है।
     सन् 2007-08 में मध्यवर्ग की संख्या मध्यवर्गीय परिवारों की संख्या 135.9मिलियन थी जो सन् 2009-10 में बढ़कर 140.7 मिलियन हो गई। लेकिन समग्रता में मध्यवर्ग की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। इसी अवधि में मध्यवर्ग की संख्या 62 प्रतिशत से घटकर 61.6 प्रतिशत हो गई है। सर्वे बताता है कि निम्न और उच्च आयवर्ग के लोगों की आय पर मंदी का कोई असर नहीं हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर उच्च आयवर्ग के लोगों पर हुआ है, उनकी संख्या 16.8 प्रतिशत से बढ़कर 20.5 प्रतिशत हो गई। कम आय वाले परिवारों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।
    मंदी के विगत तीन सालों में कम आय वाले परिवारों की संख्या 21.1 प्रतिशत से घटकर 17.9प्रतिशत हो गई है। विश्व बैंक के अनुसार 2से10 लाख रूपये की आय वाले को मध्यवर्ग में रखा जा सकता है। ऐसे मध्यवर्ग की तादाद सन् 2009-10 में 28.4 मिलियन थी। जबकि 1995-96 में इस कोटि में 4.5 मिलियन लोग आते थे। सन् 2001-02 में यह संख्या बढ़कर 10.7 मिलियन हो गयी। भारत का दो-तिहाई  मध्यवर्ग शहरों में रहता है। भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा बचत करने वाले देश के रूप में जाना जाता है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद का 36 प्रतिशत बचत खाते में जाता है।
   इस आंकड़े की बाजीगरी से असली भारत नजर नहीं आएगा। सवाल यह है कि एक लाख अस्सी हजार सालाना कमाने वाला परिवार कहां रहता है ? क्या खाता है ? किस तरह के कपड़े पहनता है ? किस तरह की चीजें खरीदता है ? क्या उसके पास स्वाश्थ्य और शिक्षा पर खर्चा करने लायक कुछ बचता है ? क्या वह अपने लिए कभी भी कोई छोटा सा घर खरीद सकता है ? आदि सवाल हैं जिनके उत्तर खोजते ही भयावह यथार्थ सामने आएगा। वास्तविकता यह है कि ये वे लोग हैं जो ज्यादातर कच्ची गंदी बस्तियों या भाड़े के घरों में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर की क्रय-शक्ति में लगातार गिरावट आई है। आय बढ़ी है यह बात मान भी लें तो यह बात विचार करनी चाहिए कि क्या उनकी क्रय-शक्ति बढ़ी है ? सच यह है कि मंहगाई और अन्य कारणों से उच्च और निम्न आयवर्ग के लोगों की क्रय-शक्ति घटी है। उनमें दरिद्रता बढ़ी है। इनमें से अधिकांश के पास पीने के साफ पानी और शौचालय की भी व्यवस्था नहीं है। ये लोग अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। समुचित इलाज नहीं करा पाते हैं। ऐसे में यह दावा करना कि भारत में उच्च-आयवर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है,आमदनी बढ़ी है का दावा खोखला है। आमदनी बढ़ी है तो देखना होगा कि क्या क्रय क्षमता भी बढ़ी है या नहीं वरना तो यह आमदनी के बढ़ने का विभ्रम है। सच क्या है यह अपने आसपास के परिवेश को देखकर सहज ही समझ में आ सकता है।      
   






डिजिटल मनमोहन के डिजिटल शत्रु

           मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 6 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। ऐसा क्यों हो रहा है कि आलोचना के केन्द्र से मनमोहन सिंह गायब हैं। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।         
      मनमोहन सिंह ने जब पहलीबार ‘यूपीए -1’ के प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला तो उस समय दो महत्वपूर्ण बातें घटित हुईं, पहली, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया और मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया।
      दूसरी बड़ी घटना यह हुई कि मनमोहन सिंह सिख थे, नव्य-उदारतावादी नीतियों के निर्माता थे। इनमें उनका सिख होना बेहद महत्वपूर्ण माना गया। यह भी कहा गया कि कांग्रेस कितनी महान पार्टी है कि उसने एक औरत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया और एक सिख को प्रधानमंत्री बनाया। ये दोनों ही बातें तथ्य के रूप में सही हैं लेकिन सिख और औरत के नाते सही नहीं हैं। सोनिया को औरत के नाते अध्यक्ष नहीं बनाया गया। मनमोहन सिंह सिख के नाते प्रधानमंत्री नहीं बने। इन दोनों का औरत और सिख वाला रूप सिर्फ प्रतीकात्मक है। असल तो राजनीति है और राजनीतिक इमेज है जिसने इन्हें अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाया। राजनीति में एक ही अस्मिता होती है वह है राजनीतिज्ञ की। समस्त अस्मिताएं इसमें समा जाती हैं या फिर अप्रासंगिक हो जाती हैं।  
     मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है,शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों का उन्हें विश्व में बेहतरीन विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपनी नीतियों के कुफल और सुफल दोनों से प्रभावित किया है। मीडिया में मनमोहन सिंह के बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।
     सवाल यह है कि डिजिटल युग में मनमोहन का कोड क्या है ? मनमोहन कोड को खोले बिना उनकी डिजिटल युग की छायाओं की सही भाषा को समझने में मदद नहीं मिलेगी। पहली समस्या है कि क्या मनमोहन कोड जैसी कोई चीज है ? हमारे देश में विद्वानों की कमी नहीं है जो इस तरह के किसी भी कोड की उपस्थिति को अस्वीकार करें।
    भारत में सन् 1980 के दौर में पंजाब में जिस तरह का आतंकी दौर था और ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ,श्रीमती गांधी की एक सिख के हाथों हत्या हुई और बाद में संगठित सिख जनसंहार हुआ, उसे देखते हुए मनमोहन सिंह का क्रमशः सत्ता के शिखर पर पहुँचना निश्चित ही बड़ी बात है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं से भी उनका सिख होना कारक या समस्या नहीं था।
      भारत की बहुलतावादी संरचनाएं इतनी ताकतवर हैं कि उन्होंने जाति और धर्म के आधार को कमजोर कर दिया है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक संस्कृति का तानाबाना जिस तरह विकसित हुआ है उसने आधुनिक सोच और आधुनिक व्यवहार की मजबूत नींव रखी है। भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक पहचान का वर्चस्व खत्म हुआ है। अब मनमोहन सिंह के पास सिख के नाम पर दाढ़ी और पगड़ी ही चिह्न के रूप में बची है।
    सवाल उठता है क्या मनमोहन सिंह को सिख अस्मिता के रूप में देखें ? या फिर उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके जीवनानुभवों की कहानियों, माइथोलॉजी,इमेज,संवेदना,वैज्ञानिक विमर्श आदि को भी देखें। क्या इतनी चीजों को मिलाकर देखने से मनमोहन सिंह का सिखभाव बचा रहेगा ?
        क्या मनमोहन के दृश्य और अदृश्य जीवन की इमेजों के आधार पर उनके सिख को परिभाषित कर सकते हैं ?क्या उससे सिख निकलेगा ?मूल समस्या यह है कि   क्या मनमोहन सिंह सिख हैं ? इसबार के लोकसभा चुनाव में पंजाब के सिखों ने कांग्रेस को ज्यादा संसदीय सीटें जीताकर दीं। क्या इस तरह की जीत को सिख मनमोहन के व्यक्तित्व से जोड़कर देख सकते हैं ?
      कांग्रेस ने अपने प्रचार में सोनिया-मनमोहन और राहुल गांधी के त्रिगुट की इमेज का इस्तेमाल किया था। इस त्रिमूर्ति की विजुअल इमेज किसी भी तरह के नस्ल संबंधी संकेत का प्रचार नहीं करती। लेकिन इस त्रिमूर्ति की इमेज का डिजिटल रूपों में जिस तरह प्रचार किया गया उसमें एक नए किस्म का स्पेस -टाइम संबंध उभकर आया है। नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है।
    मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात की है। बार-बार विकासदर को उछाला है। अपने को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।
       मनमोहन सिंह भारत के अकेले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने कभी मजदूरों-किसानों को सम्बोधित नहीं किया है। मनमोहन की इमेज से मजदूरों-किसानों का दूर रहना जितना दृश्य है उससे भी ज्यादा दृश्यगत है उनका किसानों का ऋण माफ करना। यह ऐसा पैसा था जो डूब गया था,जिसकी वसूली संभव नहीं थी, अतः उसे माफ करके उन्होंने पूंजीवाद के हित में बड़ा कदम उठाया। इस फैसले से किसानों को कम और बैंकों को ज्यादा लाभ पहुँचा है।
     मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बना दिया है। गरीबी और अभाव को एकसिरे से अपदस्थ कर दिया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित कर दिया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहन कोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। उनके लिए वे ठोस सामाजिक वर्ग भी समस्या नहीं रहे जिनके कारण गरीबी और अभाव कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।
          मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।
    माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।   
      कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
    मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की गयी। सामाजिक अस्थिरता पैदा की गयी। घृणा का वातावरण पैदा किया गया। ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।      

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