बुधवार, 18 अगस्त 2010

सांस्कृतिक वर्चस्व का विकल्प क्या है

   आज हम विचार करें कि मीडिया में छाए सांस्कृतिक वर्चस्व का विकल्प क्या है ?इस दिशा में सबसे पहले हाल तक की तकनीकी और भौतिक वस्तुस्थिति की जानकारी,उच्चस्तरीय ज्ञान के आधार पर चुनाव और अपने देश की संस्कृति और सूचना से जुड़े कार्यकलापों को लोकप्रिय बनाने की दिशा मे लगातार प्रयास किया जाना चाहिए।
    हमारा प्रधान लक्ष्य सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता हासिल करना प्रधान होना चाहिए। साम्राज्यवादी विचारधारा के खिलाफ संघर्ष के लिए एकमात्र विकल्प संघर्ष है,बचाव नहीं। इसके लिए जनता के बीच बहस,चिंतन,विश्लेषण और मूल्यांकन का सिलसिला चालू किया जाय। 
     हर्बर्ट शिलर के शब्दों में ''सबसे सचेत और व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष से वैचारिक विनाश और सांस्कृतिक दासता से बचने की आशा की जा सकती है। इसका मतलब है,प्रतिरोध का दूसरा सिध्दांत; वर्गीय दृष्टिकोण से इतिहास की पुनर्व्याख्या जो आम जनता की समझ के भीतर हो।'' 
     ''संस्कृति संग्रहालय में पड़ी वस्तुओं का संग्रह नहीं है और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद विरोध परंपरा के पक्ष में खड़ा होना नहीं है।लेकिन इन सूत्रों से यह निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं है कि वर्चस्ववाद विरोधी आंदोलन से ही इतिहास की शुरूआत होती है।वर्चस्व के विरोध में संस्कृति और संचार संबंधी आंदोलन के वर्तमान दौर में इतिहास की भूमिका को कम नहीं किया जा सकता।उत्पीड़कों द्वारा अतीत के तथ्यों को जानबूझकर तोड़ने-मरोड़ने या सही तथ्यों को नजरअंदाज करने की जगह इतिहास की जीवंत घटनाओं / अनुभवों को इतिहास ही याद दिलाएगा।''
''स्वाभाविक रूप से यहां इतिहास का मतलब उत्पीड़क वर्गों के दस्तावेज संभालने वालों द्वारा पेश किया गया विवरण नहीं है।'' इस क्रम में जहां जनता का सही इतिहास खोजना होगा।वहीं दूसरी ओर भाषा के क्षेत्र में सक्रिय वर्चस्व को चुनौती देने की जरूरत है।हमें वंचितों की भाषा निर्मित करनी होगी।वर्चस्वशाली ताकतों की भाषा में उत्पीड़ितों का जीवन समझना बेहद मुश्किल है। 
    संचार नीति,प्रौद्योगिकी और समाज व्यवस्था के समस्त ताने-बाने का मूल्यांकन के बाद शिलर ने लिखा ''यहां इरादा इस बात पर जोर देना नहीं है कि संचार और संस्कृति से जुड़ी नीति के विस्तार में नई प्रौद्योगिकी से बचा जाए,उसे खारिज किया जाए या उसका कम से कम उपयोग किया जाए।संचार व्यवस्था के विस्तार का उद्देश्य होता है -गंभीर चेतना के निर्माण में मदद पहुँचाना।जिस तरह सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता अपने-आप में उत्पादक नहीं हो सकती, उसी तरह प्रौद्योगिकी का अंधाधुंध खारिज किया जाना कमजोरी और पस्तहिम्मती को बुला लेने के बराबर है।जरूरत इस बात की है कि निर्णय लेने वाले क्षेत्र में यह माना जाए कि प्रौद्योगिकी सामाजिक उत्पाद है।यह निरपेक्ष नहीं है।इस पर उस सामाजिक व्यवस्था की छाप रहती है जो इसका उत्पादन करती है।''
     वर्चस्व के खिलाफ ज्यों ही संघर्ष तेज होता है।शासक वर्ग गैर जरूरी मुद्दों को हवा देने लगता है।अथवा सामाजिक आर्थिक संकट के समय वह ऐसी अवस्था पैदा करता है कि आप संयुक्त संघर्ष कर ही न पाएं।इसलिए पहली जरूरत यह है कि शासकवर्ग की सही रूप में पहचान स्थापित की जाए।इसके बाद उन मुद्दों को तय किया जाए जिनको लेकर संघर्ष चलाया जाना है।इस संघर्ष में कौन दौस्त होंगे और कौन शत्रु होंगे यह भी तय करना होगा।शिलर ने लिखा है ''गलत लेबल लगाना और विकृत लक्ष्य तय करा देना शासक वर्ग की चेतना के टकसाल के ऐसे माल हैं जो अतीत में भी ढलते रहे हैं,आज भी ढल रहे हैं और आगे भी ढलते रहेंगे।''
''इसलिए वस्तुओं और प्रक्रियाओं की परिभाषा निश्चित करने की प्रक्रिया पर नियंत्रण फिर से प्राप्त करने की दिशा में पहला कदम होगा कि इस बात की कोशिश हो कि परिभाषा के कुछ निर्णायक क्षेत्रों में समझौते का रूख बिलकुल न अपनाया जाए।इस रूख का मतलब होगा,प्रभुत्व के खिलाफ होना।वे शब्द और विचार जिन्होंने सदियों से मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा मानवीय गुण अपनाने को प्ररित किया है,वैचारिक प्रभुत्व के सामने नष्ट होने के लिए नहीं छोड़े जा सकते।उनके बचाव में जूझना होगा।जैसे 'अंतर्राष्ट्रीयतावाद'शब्द का प्रयोग विश्व नागरिक की आड़ में बहुराष्ट्रीय निगमों की कार्यप्रणाली का विवरण देने के लिए किया जाए तो इसे चुनौती मिलनी चाहिए।इसके साथ ही इसके साथ ही इन एकाधिकारवादी दैत्यों की पैठ क्षमता पर विजय पाने के प्रयास को संकीर्ण,राष्ट्रवादी तथा छोटे-छोटे प्रयासों के रूप में उभरने से बचाने का भरपूर प्रयास होना चाहिए।''
    संचार और संस्कृति नीति की अंतर्वस्तु को अंतर्राष्ट्रीय होना चाहिए।इस नीति को अंतर्राष्ट्रीयतावाद को अपना केन्द्रीय बिन्दु बनाना होगा।यह संभव नहीं है कि राष्ट्रीय हितों के बारे में संकीर्ण दायरे में सोचा जाए।राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीयतावाद के बीच संतुलन कायम करते हुए नीति निर्धारण की जाए।राष्ट्रीय स्तर के संघर्ष को सर्वव्यापी प्रभुत्व के खिलाफ चल रहे संघर्षों से जोडकर देखा जाना चाहिए।शिलर के शब्दों में ''सूचना क्षेत्र में,जहां मुक्ति संघर्ष तात्कालिक जरूरत है,अंतर्राष्ट्रीयतावाद हाशिए का मुद्दा नहीं है।यह केन्द्रीय मुद्दों का तुच्छ उपांग भी नहीं है।राष्ट्रीय दायरे का जो संघर्ष सर्वव्यापी प्रभुत्व के खिलाफ जनता की दृढ़ एकता को नकारता या नजरअंदाज करता है,उसकी मुक्ति की कल्पना तक नहीं की जा सकती।'' 
     मीडिया की मौजूदा तकनीक के बारे में शिलर ने लिखा ''वर्तमान तकनीक सिर्फ चेतना के दमन और वर्चस्ववादी सत्ता को बचाए रखने में उपयोगी है।सामाजिक संकुल को उलट देने के लिए नया ढांचा,नई अंतर्वस्तु तथा हावी होता अंतर्राष्ट्रीय परिवेश जरूरी है।'' 
 प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास के लिए जरूरी है,लेकिन यह भी जरूरी है कि यह रहस्य के धुएं में जनता की नजर में अदृश्य हो जाए और उसकी पकड़ से बाहर हो।शिलर ने लिखा  ''हमेशा ही इस विश्वास के प्रति मोह बना रहता है कि उद्धोषित लक्ष्य निश्चित तो है,किंतु दूर है।उच्चतम चेतना की प्राप्ति अंतिम लक्ष्य नहीं है।उल्टे,यह एक जारी रहने वाली प्रक्रिया है जिसका विस्तार पहले से हावी चिंतन और जीवन पध्दति को चकित और पराजित करता रहता है।यह काम मानव विकास के ऐतिहासिक मार्ग के कदम-कदम पर संपन्न होता है।संचार और संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया को इसी रूप में देखना और समझना चाहिए।सूत्र चाहे जितने आधुनिक हों या जितने आदिम,वे मानव क्षमता की अनुभूति के अनंत राजमार्ग पर महज मील के पत्थर हैं।''
     न्यूज पेपर एडवरटाइजिंग ब्यूरो के उपाध्यक्ष लिओ बोगर्ट ने ''दि अमेरिकन मीडिया सिस्टम एंड इट्स कॉमर्शियल कल्चर'' निबंध में लिखा ''सामयिक अमरीकी संस्कृति के पास संप्रेषण के लिए तो कोई मूल्य हैं और कोई अर्थ ही है। उसके पास सिर्फ बाजार मूल्य है।जिसे हम दाम के तौर पर जानते हैं जिसे कोई देने के लिए तैयार हो।वे माल इसलिए पेश करते हैं जिससे उसकी बिक्री से मार्केटिंग की जरूरतें पूरी कर सकें।''  इसका अर्थ है कि देश के व्यापक रचनात्मक तबके को जबर्दस्ती व्यावसायिक दायरे में ठेला जा रहा है।उन्हें फिल्म और टेलीविजन प्रस्तुतियों में विज्ञापनदाता और प्रायोजक के विशेष निर्देशों का ख्याल करना होता है।यह सब उन्हें अपनी रचनात्मक कल्पनाशीलता और जनता की सांस्कृतिक संतुष्टी की कीमत पर करना होता है।ऑडिएंस को विज्ञापन के हमले झेलने होते हैं।इस क्रम में नागरिक अब उपभोक्ता का पर्याय बन जाता है।
इस संदर्भ में हमें 'ग्लोबलाइजेशन' पदबंध का इस्तेमाल करते हुए सतर्क रहना चाहिए।इससे यह आभास मिलता है कि सभी इसमें भाग ले रहे हैं अत: तुम भी भाग लो।यदि भाग नहीं लोगे तो पिछड़ जाओगे,हमें प्रतिस्पर्धी होना चाहिए इत्यादि।ग्लोबलाइजेशन सीधे सुपर कारपोरेशन की दिशा में जा रहा है।वे विश्व को बाजार की तरह माल बेचने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे उनके माल की विश्व के कोने-कोने में पैठ हो सके।किंतु विश्व की जनता के साथ ये कंपनियां जो कर रही हैं उसमें और इसमें विशाल अंतर है।हमें यह देखना होगा कि यह किस प्रक्रिया के तहत घटित हो रहा है।हम भोले और दरिद्र मूल्यों के युग में जी रहे हैं।जनता हताशा में जीवन के मायने अस्मिताएथिनिसिटीलिंग आदि में खोज रही है। ये सभी वैध हैं। किंतु ज्योंही वे इनको लेकर आग्रहशील हो उठते हैं तब मुश्किल से ही दिखाई देता है कि इनके पीछे कौन सी बुनियादी ताकतें काम कर रही हैं। 

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