रविवार, 15 अगस्त 2010

स्वाधीनता का कारपोरेट महाआख्यान


स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी उपलब्धियों का जयगान नहीं है। स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी नीतियों के दायरे में बांधकर सोचना भी नहीं है। स्वाधीनता का अर्थ यह भी नहीं है कि इस पर किसी नेता,प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति या मीडिया सर्वे करने वाले छुटभैय्ये ज्ञानियों के ज्ञानसागर में डुबकी लगाना। आज के दिन मीडिया में स्वाधीनता दिवस पर तरह -तरह के विचार छपे हैं । स्वाधीनता को व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इस कोशिश में आम जनता और उत्पादक शक्तियां कहीं पीछे छूटती नजर आ रही हैं। अब स्वाधीनता के जनाख्यान की जगह कारपोरेट आख्यान ने ले ली है।
     स्वाधीनता का कारपोरेट आख्यान जनता को नियम ,कानून और सरकारी नीतियों के दायरे में बांधने की कोशिश करता है। स्वाधीनता दिवस के बारे में कोई भी बात नियम के दायरे में बांधकर नहीं की जा सकती। स्वाधीनता का दायरा नियम के आधार पर तय नहीं हो सकता। जब भी हम स्वाधीनता की सीमा तय करते हैं तो जाने-अनजाने स्वाधीनता का ह्रास करते हैं।
    स्वाधीनता को नियमों के फ्रेम में देखने का नजरिया शासकवर्गों का है। विगत 63 सालों में हम स्वाधीनता को नियमों के फ्रेमवर्क में रखकर देखने के आदी हो चुके हैं। उसका ही यह परिणाम निकला है कि साधारण आदमी ज्योंही अपने हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करने जाता है,हड़ताल करता है,जुलूस निकालता है,आंदोलन करता है ,उसकी आवाज को संविधान और कानून की विभिन्न धाराओं के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
      नियमों में बंधी स्वाधीनता अमीरों की सेवा करती है। गरीबों के हितों को सीमित करती है। नियमभंग का अमीरों के  पास अधिकार है। गरीबों को नियमभंग का दण्ड भोगना होता है। यह दैनन्दिन जीवन में मजदूरों और किसानों के संदर्भ में हम आए दिन देखते हैं। देश स्वाधीनता के किस नुक्कड़ पर खड़ा है ? उसे जानने का सबसे सटीक पैमाने उत्पादक शक्तियां हो सकती हैं । स्वाधीनता का मीडियाराग उत्पादक शक्तियों को आधार बनाकर चर्चा नहीं करता। उसके केन्द्र में अनुत्पादक शक्तियां हैं। वह केन्द्र के सवालों या जनता के बुनियादी सवालों पर चर्चा नहीं करता बल्कि गैर-जरूरी सवालों पर चर्चा करता है।
    मसलन् यदि आप यह पूछेंगे कि भारत ने विगत 63 सालों में तरक्की की है या नहीं ? उत्तर होगा हां। कौन कहेगा भारत ने तरक्की नहीं की है। यदि उत्पादक शक्तियों को केन्द्र में रखकर सवाल पूछा जाएगा कि विगत 63 सालों में मजदूर की दैनिक आय या मासिक घटी है बढ़ी है ? तो परिणाम भिन्न होंगे । किसानों की स्थिति में सुधार आया है या गिरावट आयी है ? तो उत्तर नहीं में आएगा। किसान-मजदूर की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ? निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग की विगत 63 सालों में संपत्ति घटी है बढ़ी है ? आप अपने घर में देख सकते हैं कि विगत 63 सालों में सोना,चांदी,पीतल,जमा धन घटा है या बढ़ा है ? इसके विपरीत कारपोरेट घरानों की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ?  आज मध्यवर्ग का कोई नौकरीपेशा व्यक्ति ऐसा नहीं है जिस पर बैंकों का कर्जा न हो। कहने का अर्थ है आम लोगों के जीवन में पामाली बढ़ेगी।  
      आज ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ (15 अगस्त 2010) में एक सर्वे छपा है जिसमें कुछ सवाल पूछे गए हैं। यह सर्वे कई तथ्यों की ओर ध्यान खींचता है। पहला संदेश यह देता है कि उत्पादक शक्तियों (मजदूर-किसान) के लिए मीडिया के पास सवाल नहीं होते। जाहिर है जब मजदूर-किसान के लिए सवाल नहीं होंगे तो उसकी राय भी नहीं होगी। यही वजह है कि यह सर्वे दिल्ली,कोलकाता,मुम्बई,बंगलौर और चेन्नई में किया गया। किस वर्ग के लोगों में किया गया इसे सर्वे करने वालों ने नहीं बताया है। यह कहा गया है कि 500 लोगों में आमने-सामने बैठकर बात करके यह सर्वे किया गया है।
      इस सर्वे से दूसरा संदेश यह निकलता है कि स्वाधीनता के असली अर्थ का ह्रास हुआ है। मसलन् सर्वे में पहला सवाल था स्वाधीनता का अर्थ क्या है ? इसमें जिस क्रम और अनुपात में लोगों ने जबाब दिया वह काबिलेगौर है। क्रमशःजबाब था- चुनाव में वोट देने का अधिकार (27 प्रतिशत),स्वच्छंद विचरण का अधिकार (28प्रतिशत), चयन की स्वतंत्रता (17 प्रतिशत),अदालत,सुरक्षाबलों आदि को पाना ( 9 प्रतिशत) ,बुनियादी सुविधाएं ( 15 प्रतिशत), संघर्ष का अधिकार (4 प्रतिशत)।
 इस प्रश्नोत्तर में साफ है कि जिन अधिकारों को सबसे कम लोग चाहते हैं वह है प्रतिवाद का अधिकार। यह उत्तर इस बात का संकेत है कि जिन लोगों में यह सर्वे किया गया है वे खाए-अघाए लोग हैं। वे अधिकारों के प्रति सही नजरिया तक नहीं रखते।
   इस सर्वे में  एक प्रश्न हरियाणा की खाप पंचायत को लेकर है,मजेदार बात यह है कि खाप पंचायतों का ऊपर बताए महानगरों से कोई संबंध नहीं है। यदि यह सवाल किया जाना ही था तो हरियाणा में पूछा जाता तो सटीक राय जानने का मौका मिलता लेकिन खाप पंचायत के बारे में दिल्ली,मुम्बई,चेन्नई,कोलकाता,बंगलौर में किए गए सर्वे का कोई अर्थ नहीं है,इन शहरों के लोगों के लिए खाप पंचायतें अप्रासंगिक हैं।
     इसी तरह समलैंगिक विवाह के बारे में सवाल किया गया है। समलैंगिक विवाह करने वालों की संख्या भारत में नगण्य है। यह सवाल अमेरिका के लिए प्रासंगिक हो सकता है। भारत के लिए नहीं।
      स्वाधीनता की चेतना का किस हद तक विकास हुआ है इसे जानने का सबसे अच्छा आधार हो सकता है प्रतिवाद की स्वतंत्रता का सवाल। संदर्भ था कि क्या व्यवस्था की गडबडि़यों के खिलाफ आवाज उठाना असली स्वतंत्रता है। 45 प्रतिशत मानते हैं हां, 32 प्रतिशत मानते हैं कुछ हद तक,21 प्रतिशत मानते हैं देश की सुरक्षा के लिए, 2 प्रतिशत लोग हैं कि वे नहीं जानते।
    स्वतंत्रता बनाम प्राइवेसी के संदर्भ में पूछा गया राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को टेलीफोन कॉल ,बैंक एकाउण्ट,ईमेल आदि की छानबीन करने का हक है 53 प्रतिशत ने कहा हां,28 प्रतिशत ने कहा नहीं, 19 प्रतिशत ने कहा कि सिर्फ जिन पर संदेह हो। दिल्ली में 66 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि उनके कॉल मॉनीटर किए जाएं। कोलकाता में 30 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि जिन पर संदेह हो उन पर ही नजरदारी की जाए।
    यही है नए मध्यवर्ग की गुलाम मानसिकता का आदर्श मीडिया नमूना। नया महानगरीय मध्यवर्ग और कारपोरेट लोकतंत्र के पहरूए चाहते हैं कि उन पर निगरानी रखी जाए। इस सर्वे में सबसे मजेदार सवाल था स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने वाली चीज कौन सी है ?  38 प्रतिशत ने कहा सुरक्षाबल,24 प्रतिशत ने कहा पत्रकार,16 प्रतिशत ने कहा जज,11 प्रतिशत ने कहा सिविल सोसायटी, 7 प्रतिशत ने कहा राजनीतिज्ञ, 3 प्रतिशत ने कहा फिल्म निर्माता,अभिनेता,गायक,पेण्टर आदि। 2 प्रतिशत मानते हैं कि बाबू और नौकरशाही से ही स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है।
     इन लोगों की बुद्धि पर तरस आता है कि इन्हें आम आदमी दिखाई नही दिया, हिन्दुस्तान के मजदूर-किसान दिखाई नहीं दिए। हिन्दुस्तान की सुरक्षा किसी के हाथों में सुरक्षित है तो वह है आम जनता और उत्पादक शक्तियां। आज हम जितनी भी स्वतंत्रता का भोग कर रहे हैं उसे सुरक्षित रखने और समृद्ध करने में आम जनता और उत्पादक शक्तियों की केन्द्रीय भूमिका है। किसान और मजदूर अपना हाथ खींच लें तो सारी स्वतंत्रता धरी रह जाए। सुरक्षाबलों का समूचा ढ़ांचा चरमरा जाए। मध्यवर्ग की कमर टूट जाए।
      संसद ,अदालत,न्यायपालिका,पेशेवर तबका हमारी स्वतंत्रता के बुनियादी संरक्षक नहीं हैं। बुनियादी संरक्षक हैं उत्पादक शक्तियां। खेत-खलिहान से लेकर कल-कारखानों में काम करने वाले लोग। ये लोग देश के लिए संपदा पैदा करते हैं और अपने लिए दरिद्रता और अभाव। हम मीडिया की चकाचौध और बुर्जुआजी के विचारधारात्मक प्रचार अभियान के हंगामे के बीच में आम जनता और उत्पादक शक्तियों को भूल गए हैं।
    शासकवर्गों और उनके सहयोगी वर्गों ने कभी भी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की है उन्होंने स्वतंत्रता का भोग किया है,दुरूपयोग किया है और अपने हितों का विस्तार किया है। शासकवर्गों के लिए स्वतंत्रता वर्चस्व बनाए रखने का औजार मात्र है।
    इसके विपरीत आम जनता के लिए स्वतंत्रता लाइफलाइन या प्राणवायु है। आम जनता और उत्पादक शक्तियों के लिए स्वतंत्रता लग्जरी नहीं है। उन्हें स्वतंत्रता पाने के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। शासकवर्ग और उसके सहयोगी वर्गों को स्वतंत्रता के लिए कम से कम कुर्बानी देनी पड़ती है। ये वर्ग असल में उत्पादक शक्तियों की कुर्बानी के फल खाते हैं और परजीवी की तरह समाज में स्वतंत्रता का उपभोग मात्र करते हैं।
    मध्यवर्ग का एक अच्छा खासा अनुत्पादक समुदाय है जो परजीवी की तरह शासकवर्गों के भोंपू और ढ़ाल का काम करता है। कारपोरेट मीडिया में आने वाले सर्वे और राय देने वाले इसी परजीवी-भोंदूवर्ग से आते हैं। यह समाज से कटा हुआ वर्ग है। यह वर्ग अपने को अहर्निश असुरक्षित महसूस करता है यही वजह है इसे स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक सुरक्षाबल ही नजर आते हैं,क्योंकि आम जनता की शक्ति और आस्थाओं के सामने यह अपने को बौना महसूस करता है,फलतः आम जनता को यह स्वतंत्रता का संरक्षक नहीं मानता। यही वर्ग स्वाधीनता के कारपोरेट महाख्यान का सर्जक है।
 




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