शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

कम्प्यूटर भाषा या हाइपर टेक्स्ट की समस्याएं -1-

          टेक्स्ट या पाठ मुद्रण क्रांति की देन है । यह आधुनिकता की धुरी है। हाइपर टेक्स्ट परवर्ती पूंजीवाद की कम्प्यूटर क्रांति की उपज है।उत्तर आधुनिक विमर्श का आधार है।ये दोनों ही हमारे सृजन का हिस्सा हैं। सृजन, समीक्षा और चिन्तन के साथ-साथ अन्य विधाओं में इनके दबावों को साफ तौर पर देखा जा सकता है।जिन विचारकों ने हाइपर टेक्स्ट पर विचार किया है उन्होंने इससे जुड़े राजनीतिक अर्थशास्त्र की उपेक्षा की है। हाइपर टेक्स्ट का कोई विमर्श इस पहलु पर विचार किए बगैर समग्र समझ पैदा नहीं करता। परवर्ती पूजीवाद के सूचना अर्थशास्त्र के साथ इसका गहरा संबंध है।यही इसके विकास की सबसे बड़ी बाधा है।
     हाइपर टेक्स्ट से जुड़े समस्त सांगोपांग उपकरणों की कीमत, इनके प्रोग्रामों और अनुसंधान पर बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों का स्वामित्व इस बात का संकेत है कि हाइपर टेक्स्ट वाले स्वतंत्रता और स्वायत्तता का लाख वायदा करें। इसे बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों की कैद से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है।
    कम्प्यूटर युग को जो लोग मुक्ति के युग के रूप में देखते हैं उनसे एक ही सवाल है कि आखिरकार कम्प्यूटर बनाने की कितनी लागत विश्व के नागरिकों से वसूली जाएगी ?  कम्प्यूटर से जुड़े अनुसंधान में बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों का जितना धन लगा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा धन आम जनता से माल की बिक्री के जरिए वसूला जा चुका है। इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने पेटेंट अधिकारों को त्यागने,चीजों को न्यूनतम दामों पर मुहैय्या कराने के लिए तैयार नहीं हैं। स्वामित्व का आलम यह है कि हाइपर टेक्स्ट भी इनकी कैद में है।यानी भाषा के भी अब ये मालिक हैं।
     हाइपर टेक्स्ट में परिवर्तन करने का रचनाकार,यूजर आदि को कोई अधिकार नहीं है। जबकि पाठ के युग में भाषा को तब्दील करने का लेखक और जनता के पास अधिकार था। किंतु कम्प्यूटर भाषा यानी फॉण्ट को लेखक बदल नहीं सकता। वह संचार कंपनी की कैद में है। उसी के पास पेटेण्ट अधिकार हैं। कल तक भाषा पर जनता का अधिकार था। रचनाकारों की वह क्रीडास्थली थी। आज वह सूचना तकनीक उद्योग की कैद में है। हमें सोचना होगा कि हाइपर टेक्स्ट को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलामी से कैसे मुक्त करें। क्या पूंजीवाद में भाषा की मुक्ति का सपना साकार हो सकता है ?क्या पूंजीवाद खासकर परवर्ती पूंजीवाद भाषाओं के प्रति मित्रवत् व्यवहार कर रहा है या शत्रु की तरह व्यवहार कर रहा है।
    जय डेविड बोल्टर ने ''राईटिंग स्पेस: कम्प्यूटर्स, हाइपरटेक्स्ट एंड हिस्ट्री ऑफ राईटिंग'' (1991) में कम्प्यूटर के आने के बाद लेखन और विविध विधाओं के भविष्य के बारे में जो अनुमान लगाए थे।वे सभी सही साबित हुए। खासकर उपन्यास, निबंध, इनसाइक्लोपीडिया, लाइब्रेरी,परंपरागत पाण्डुलिपि आदि के भावी स्वरूप को लेकर जो अनुमान लगाए थे वे सही साबित हुए हैं।इसी पुस्तक में बोल्टर ने लिखा  है कि पोटर्ल की कोटियों की प्रकृति संकलनवादी, सर्वसंग्रहवादी है।
    आज हमारे इनसाइक्लोपीडिक इम्पल्स को इलैक्ट्रोनिक क्षमताएं निर्देशित कर रही हैं। इसकी खूबी है 'सुनिश्चित मुद्रित रूप' ,जो हमें हाइपर टेक्स्ट के रूप में उपलब्ध है। यही साइबर स्पेस को संगठित करने का आधार बना।यह सामयिक यथार्थ का प्रत्युत्तर है।
     परिभाषा के रूप में वेब अस्थिर,व्यक्तिगत और बौध्दिक गतिशील विजन की शुरूआत करता है। सूचना और ज्ञान का यह अवसरवादी रूप है।हम उम्मीद करते हैं कि सूचना और ज्ञान की संरचना सामयिक और सम्पूरक होगी।
    किंतु इनसाइक्लोपीडिया और पुस्तक में ऐसा नहीं होता।वहां तकनीकी ज्ञान के द्वारा स्थायी संरचना का निर्माण किया जाता है। आज हमारे ज्ञान का अर्थ है विचारों का संकलन। इसे बहुरूपी,क्रमानुवर्ती एवं इसके सहयोगी रूपों मे देख सकते हैं। इसका प्रत्येक पैटर्न एक ही तरह के पाठक की जरूरतों को एक ही समय पर पूरा करता है।वेब में इस तरह की सांस्कृतिक और इनसाइक्लोपीडिया  प्रस्तुतियों की निरंतर समीक्षा की जानी चाहिए।
   आज हम ग्लोबल लाइब्रेरी के युग में हैं।इसमें सामग्री का संगठन इनसाइक्लोपीडिया की तर्ज पर किया जाता है। इसमें पाठ संकलन की प्रवृत्ति है। उसे हम नियंत्रित करते हैं,हजम करते हैं,इसमें पुस्तकालयाध्यक्ष की मानसिकता से मिलती-जुलती प्रवृत्तियां हैं।उल्लेखनीय है कि आज हम जो सार्वभौम लाइब्रेरी बना रहे हैं।उससे जुड़े हैं।हाइपर टेक्स्ट बना रहे हैं। उसका व्यवहार कर रहे हैं।इन सबका आधार है टेड नेल्सन का एक्सनाडु सिस्टम और टुफ्टस नेटवर्क द्वारा तैयार संरचनाएं।नेल्सन का 'यूनीवर्सल डाटा स्ट्रचर'' मौजूदा नेटवर्क से ज्यादा सुसंगत था।उसने जो ढ़ांचा तैयार किया था उसमें एक ही पाठ से किसी भी अन्य पाठ को खोजा जा सकता था।
    हाइपर टेक्स्ट को विभिन्न विद्वानों ने व्याख्यायित करते हुए इसकी जो परिभाषाएं बनायी हैं वे देखने योग्य हैं।हाइपर टेक्स्ट मूलत: संगठित करने का सिद्धान्त है।टेड नेल्सन ने हाइपर टेक्स्ट पदबंध को जन्म दिया।नेल्सन ने 'हाइपर' को 'विस्तारित,साधारणीकृत और बहुआयामी'' माना है। मिशेल हेम ने लिखा है कि ''यह पदबंध मूलत: लैटिन के बीविंग यानी बुनना शब्द की पैदाइश है।यह वर्ण प्रोसेसिंग के लिए सबसे उपयुक्त शब्द है।ज्ञान के बहुआयामी धागे उन तमाम बौद्धिक सूत्रों से जुड़े हैं जो पुस्तकालयाध्यक्ष के लिए चिर- परिचित हैं। यही वजह है कि हाइपर टेक्टस पर बात करते हुए पुस्तकालय की पदावली का ज्यादातर प्रयोग किया जाता है। हाइपर टेक्स्ट का यह सार है कि इसमें गतिशील सम्पर्क संकेत रहते हैं। ये पाठक को बताते हैं कि वह कैसे अनुकरण करे। वहां पर वह स्वत:स्फूर्त्त प्राथमिकता क्रम पाता है। इसे अपने नियंत्रण में पाता है।यहां विषय का दायरा लेखक या संपादक तय नहीं करता।बल्कि पाठक तय करता है।हाइपर टेक्स्ट बहुरूपी होता है। इसे आप इच्छित रूप में रूपान्तरित कर सकते।इसके अक्षरों का आकार छोटा-बड़ा कर सकते हैं। अभी इसमें गैर डाटा जैसे रूप -ग्राफिक्स, एनीमेशंस,डिजिटल साउण्ड आदि को पा सकते हैं। अब इसमें 'इनटरेक्टिव मीडिया' भी आ गया है। वह हाइपर टेक्स्ट को अपदस्थ कर सकता है। क्योंकि डिजिटल वर्ल्ड,साउण्ड,टेक्स्ट और सभी इमेजों का वायनरी सिगनल और माइक्रो कम्प्यूटर्स में हमारी क्षमताओं का उपयोग होगा। साथ ही सीडी क्वालिटी स्टीरियो साउण्ड और उच्च श्रेणी का हाई रिजोल्युशन वीडियो दिखने लगेगा। कनवर्जन के कारण कम्प्यूटर में ही सभी पूर्ववर्ती माध्यमों को देख,सुन सकेंगे।



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