रविवार, 8 अगस्त 2010

समाज से बाहर औरत का समाज

       कार्ल मार्क्स ने लिखा था सर्वहारा इसी समाज में होता है किन्तु वह 'समाज' का  हिस्सा नहीं माना जाता। समाज में तदनुरूप स्वीकृति नहीं मिलती जैसी अन्य वर्गों को मिलती है। हम जिसे सोसायटी कहते हैं, वह सोसायटी मजदूरवर्ग को अपना हिस्सा नहीं मानती। सोसायटी में सिर्फ अभिजन के लिए जगह है। इसी बात को आधार बनाकर लूस  इरीगरी ने लिखा कि औरत इसी समाज में होती है किन्तु हम उसे स्वायत्त रूप में कभी इस समाज का हिस्सा नहीं मानते। यदि परंपरागत नजरिए से देखें औरत को अपनी पहचान बनाने के लिए मर्द से जुड़ा होना चाहिए।
     स्त्री की अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं होती। स्त्री की अपनी पहचान हो,इसके लिए जरूरी है कि उसे मर्द की पहचान से मुक्त करके देखा जाए। स्त्री हमेशा परेशानी खड़ी करती है, उसकी पहचान बनने या उसकी अस्मिता के निर्माण का अर्थ है अस्तव्यस्तता। वह तयशुदा चीजों, धारणाओ और मूल्यों को अस्त-व्यस्त करती है। यदि वह बोलना चाहती है तो उसे मर्द की भाषा में बोलना होता है। यदि वह अपनी कामुकता की तुलना करना चाहती है तो उसे पुंसवादी मानकों के साथ तुलना करनी होती है।यह यह अहसास अपने अंदर तुरंत महसूस करती है कि उसे लिंग नहीं है। इसके साथ ही तुरंत मर्द प्रतीकात्मक व्यवस्था को सामने खड़ा कर देता है। प्रतीकात्मक व्यवस्था के जरिए वह स्त्री और समाज के बीच में मध्यस्थ की भूमिका अदा करता है। इसके कारण ही वह स्त्री को अन्य में बदल देता है। यही वजह है कि स्त्री अपने को प्यार नहीं कर पाती। स्वयं को प्यार कैसे किया जाए इसे वह जानती तक नहीं है। इसका प्रधान कारण है मर्दवादी तत्वों का मध्यस्थ के रूप में बीच में आ जाना। फलत: वह अपने को वस्तुगत रूप में देख ही नहीं पाती। दूसरी ओर मर्द अपने को ऑब्जेक्ट के रूप में प्रस्तुत करने में सफल हो जाता है और वही औरत को ऑब्जैटिफाई करता है। तुलनात्मक तौर पर औरत को समाज और संस्कृति में पुरूष की तुलना में प्रवेश के कम अधिकार होते हैं। यही वह बिन्दु है जहां लूस  इरीगरी ने मजदूर एवं समाज संबंधी मार्क्स के नजरिए की स्त्री और समाज के संबंध में तुलना की है। स्त्री सिर्फ स्त्री है उसका समाज से कोई संपर्क नहीं होना चाहिए। इसी प्रसंग में इरीगरी ने माँ-बेटी के संबंध पर विचार किया है।
   माँ-बेटी के संबंध पर विचार विमर्श की मनोशास्त्रियों में लंबी परंपरा रही है। माँ से बच्चे के पृथक होते ही भाषा दाखिल होती है,बेटे को पिता का नाम मिलता है। बच्चे की पहचान का आधार पिता बनता है। यहां तक कि बेटी को भी पिता के नाम से पहचाना जाता है। बचपन से ही बेटे और बेटी में भेद करके चला जाता है। बेटा धीरे-धीरे पुंसवादी प्रतीकात्मक व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। जबकि बेटी अपने को माँ के साथ जोड़ लेती है। बेटी के लिए कोई प्रतीकात्मक व्यवस्था नहीं मिलती।वह यदि समाज से संवाद करना चाहे तो उसे पुंसवादी प्रतीकात्मक व्यवस्था के जरिए संवाद करना होता है। इस विभाजन के कारण मर्द मर्दों में औरत औरतों में सम्प्रेषित करती है। इरीगरी ने सन् 70 से लेकर आज तक पुंसवादी प्रतीकात्मक व्यवस्था और माँ-बेटी के संबंध पर विस्तार से विचार किया है। इस क्रम में औरत की स्वतंत्र प्रतीकात्मक व्यवस्था हो सकती है,इसे स्थापित करने में इरीगरी को सफलता मिली है। स्त्री की प्रतीकात्मक व्यवस्था अपनी शर्तों पर बनेगी। वह स्वायत्त होगी। स्त्री स्वयं का ही प्रतिनिधित्व करेगी।स्त्री का स्वयं के रूप में प्रतिनिधित्व करना मर्र्द से भिन्न होगा स्त्री वास्तव अर्थ में सामाजिक प्राणी के रूप में प्रतिनिधित्व करेगी।जबकि मर्द सिर्फ अपना प्रतिनिधित्व करता है। स्त्री को अपनी प्रतीकात्मक व्यवस्था को अपने लक्ष्य और मान्यताओं के आधार पर बनाना चाहिए।वह एक-दूसरे के बीच सकारात्मक संबंध के आधार पर व्यवस्था बनाती है। इस तरह के प्रतीकात्मक अभ्यास से गुजरने के लिए जरूरी है कि हम भिन्न किस्म की भाषायी रणनीति अपनाएं।यह रणनीति मूलत: स्त्री के शरीर,पृथ्वी,अग्नि,वायु,जल,आकाश आदि की तरह हमारे जीवन में घुली-मिली होगी। इसमें कविता की प्रमुख भूमिका होगी। इसका प्रधान लक्ष्य होगा स्त्री के गुमशुदा रूपों ,चुप्पी का उद्धाटन करना।इसके लिए हमें धार्मिक परंपराओं का भी इस्तेमाल करना होगा। धार्मिक परंपराओं में स्त्री के सकारात्मक रूपों की खोज करनी होगी।स्त्री रूपी देवियों के जरिए स्त्री की इमेजरी को विस्तार देना होगा। देवी रूपों के जरिए स्त्री के शरीर ,शक्ति, क्षमता,सामाजिक भूमिका आदि के बारे में नए सिरे से विमर्श तैयार करना होगा। इसी के आधार पर स्त्री के बहुरूपी चरित्र,भिन्नता,लय ,प्रवाह आदि की खोज करने में मदद मिलेगी। ईश्वर की देवी परंपरा के अनुसार नए किस्म के एथिक्स भी तैयार किए जाने चाहिए।इससे स्त्री की वैकल्पिक व्यवस्था जन्म लेगी।

                 

                  

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