गुरुवार, 30 सितंबर 2010

बाबरी मसजिद विवाद- जस्टिस एस.यू.खान की राय

     बाबरी मसजिद विवाद पर अदालत का इलाहाबाद उच्चन्यायालय की लखनऊ पीठ की तीन जजों की बैंच ने जो फैसला दिया है उसने अनेक नए विवाद खड़े कर दिए हैं। सामन्य तौर पर इन विवादों में क्या नया है और क्या पुराना है,इस पर थोड़ा ठहर कर विचार करेंगे,पहले हम जस्टिस एस.यू.खान के फैसले की मूल बातों पर गौर करें-   
GIST OF THE FINDINGS by S.U.Khan J.
1. The disputed structure was constructed as mosque by or under orders of Babar.
2. It is not proved by direct evidence that premises in dispute including constructed portionbelonged to Babar or the person who constructed the mosque or under whose orders it was constructed.
3. No temple was demolished for constructing the mosque.
4. Mosque was constructed over the ruins of temples which were lying in utter ruins since a very long time before the construction of mosque and some material thereof was used in construction of the mosque.
5. That for a very long time till the construction of the mosque it was treated/believed by Hindus that some where in a very large area of which premises in dispute is a very small part birth place of Lord Ram was situated, however, the belief did not relate to any specified small area within that bigger area specifically the premises in dispute.
6. That after some time of construction of the mosque Hindus started identifying the premises in dispute as exact birth place of Lord Ram or a place wherein exact birth place was situated.
7. That much before 1855 Ram Chabutra and Seeta Rasoi had come into existence andHindus were worshipping in the same. It was very very unique and absolutely unprecedented situation that in side the boundary wall and compound of the mosque Hindu religious places were there which were actually being worshipped along with offerings of Namaz by Muslims in the mosque.
8. That in view of the above gist of the finding at serial no.7 both the parties Muslims as well as Hindus are held to be in joint possession of the entire premises in dispute.
9. That even though for the sake of convenience both the parties i.e. Muslims and Hindus were using and occupying different portions of the premises in dispute still it did not amount to formal partition and both continued to be in joint possession of the entire premises in dispute.
10. That both the parties have failed to prove commencement of their title hence by virtue of Section 110 Evidence Act both are held to be joint title holders on the basis of joint possession.
11. That for some decades before 1949 Hindus started treating/believing the place beneath the Central dome of mosque (where at present make sift temple stands) to be exact birth place of Lord Ram.
12. That idol was placed for the first time beneath the Central dome of the mosque in the early hours of 23.12.1949.
13. That in view of the above both the parties are declared to be joint title holders in possessionof the entire premises in dispute and a preliminary decree to that effect is passed with the condition
that at the time of actual partition by meets and bounds at the stage of preparation of final decree the portion beneath the Central dome where at present make sift temple stands will be allotted to the share of the Hindus.
Order:- Accordingly, all the three sets of parties, i.e. Muslims, Hindus and Nirmohi Akhara are declared joint title holders of the property/ premises in dispute as described by letters A B C D E F in the map Plan-I prepared by Sri Shiv Shanker Lal, Pleader/ Commissioner appointed by Court in Suit No.1 to the extent of one third share each for using and managing the same for worshipping. A preliminary decree to this effect is passed. However, it is further declared that the portion below the central dome where at present the
idol is kept in makeshift temple will be allotted to Hindus in final decree. It is further directed that Nirmohi Akhara will be allotted share including that part which is shown by the words Ram Chabutra and Sita Rasoi in the said map. It is further clarified that even though all the three parties are declared to have one third
share each, however if while allotting exact portions some minor adjustment in the share is to bemade then the same will be made and the adversely affected party may be compensated by allotting some portion of the adjoining land which has been acquired by the Central Government. The parties are at liberty to file their suggestions for actual partition by metes and bounds within three months. List immediately after filing of any suggestion/ application for preparation of final decree after obtaining necessary instructions from Hon'ble the Chief Justice.Status quo as prevailing till date pursuant to Supreme Court judgment of Ismail Farooqui
(1994(6) Sec 360) in all its minutest details shall be maintained for a period of three months unless
this order is modified or vacated earlier.








बाबरी मसजिद प्रकरण- लखनऊ का सांस्कृतिक समझौता फार्मूला

       आज जब इलाहाबाद उच्चन्यालय की लखनऊ पीठ ने बाबरी मसजिद पर  फैसला सुनाया तो आरंभ में टीवी चैनलों पर भगदड़ मची हुई थी,भयानक भ्रम की स्थिति थी। समझ में नहीं आ रहा था आखिरकार क्या फैसला हुआ ? लेकिन धीरे-धीरे धुंध झटने लगा। बाद में पता चला कि उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुनियादी तौर पर विवाद में शामिल पक्षों को सांस्कृतिक समझौते का रास्ता दिखाया है। इस फैसले की कानूनी पेचीदगियों को तो वकील अपने हिसाब से देखेंगे। लेकिन एक नागरिक के लिए यह फैसला चैन की सांस लेने का मौका देता है।
     लखनऊ पीठ के फैसले की धुरी है भारत की सामयिक सांस्कृतिक-राजनीतिक विविधता और भाईचारा। बाबरी मसजिद का विवाद राजनीतिक-साम्प्रदायिक विवाद है। यह मंदिर-मसजिद का विवाद नहीं है बल्कि एक तरह से विचारधारात्मक विवाद भी है औऱ विचारधारात्मक विवादों पर बुर्जुआ अदालतों में फैसले अन्तर्विरोधी होते हैं।
    राम के जन्म को लेकर जिस चीज को आधार बनाया गया है वह कानूनी आधार नहीं है ,वह सांस्कृतिक-राजनीतिक समझौते का आधार है। अदालत के फैसले से राम पैदा नहीं हो सकते और न भगवान के जन्म को तय किया जा सकता है। भगवान अजन्मा है। यह विवाद का विषय है।
       मौटे तौर पर इस फैसले में जस्टिस एस यू. खान ने आरएसएस को विचारधारात्मक तौर पर करारा झटका दिया है। इस फैसले की पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबर ने राममंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनायी थी। संघ परिवार का प्रौपेगैण्डा इस राय से ध्वस्त होता है। संघ परिवार का सारा प्रचार अभियान इसी आधार पर चला आ रहा था कि बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनायी थी। अदालत ने इसे नहीं माना है।
    अदालत ने विवादित जमीन पर साझा स्वामित्व को स्वीकार किया है। यानी हिन्दू-मुसलमानों के साझा स्वामित्व को माना है। यानी राममंदिर की मूर्ति जहां रखी है वह वहीं रहेगी और मुसलमानों को एक तिहाई जमीन पर स्वामित्व मिलेगा। संघ परिवार की यह मांग थी कि रामजन्मस्थान पर मसजिद नहीं बननी चाहिए। इस मांग को अदालत ने एकसिरे से खारिज कर दिया है। आज की स्थिति में मंदिर -मसजिद साथ में हो सकते हैं। मुसलमानों को एक तिहाई जमीन का स्वामित्व देकर अदालत ने संघ परिवार की मांग को एकसिरे से खारिज किया है।
    संघ परिवार चाहता था कि अयोध्या में कहीं पर भी बाबरी मसजिद नहीं बनायी जाए। उसे दोबारा बनाया जाए तो अयोध्या के बाहर बनाया जाए। वे यह भी चाहते थे कि राम जन्मभूमि की जमीन पर मुसलमानों का कहीं पर भी कोई प्रतीक चिह्न न हो। लखनऊ पीठ ने विवादित जमीन पर मुसलमानों का एक-तिहाई स्वामित्व मानकर संघ परिवार को करारा झटका दिया। वक्फ बोर्ड की पिटीशन कानूनी दायरे के बाहर थी इसलिए खारिज की है।
   लखनऊ पीठ के फैसले में सबसे खतरनाक पहलू है आस्था के आधार पर रामजन्म को मानना। निश्चित रूप से आस्था के आधार पर भगवान के जन्म का फैसला करना गलत है। इस आधार पर बाबरी मसजिद की जगह पर राम जन्मभूमि को रेखांकित करना, बेहद खतरनाक फैसला है। इसके आधार पर संघ परिवार आने वाले दिनों में अपने मंदिर मुक्ति अभियान को और तेज कर सकता है और जिन 3000 हजार मसजिदों की उन्होंने सूची बनायी है उनकी जगह वह मंदिर बनाने की मांग पर जोर दे सकता है। इससे काशी विश्वनाथ मंदिर के पास वाली मसजिद और मथुरा के कृष्णजन्मभूमि के पास बनी ईदगाह मसजिद को गिराने या हटाने या हिन्दुओं को सौंपने की मांग जोर पकड़ सकती है।
   आस्था के आधार पर जब एकबार हिन्दू मंदिर या हिन्दू देवता की प्राचीनकाल में उपस्थिति को अदालत ने आधार बना लिया है तो फिर इस निर्णय के आदार संघ परिवार कम से कम इन दो मंदिरों के पास बनी मसजिदों को हासिल करने के लिए आंदोलन तेज करेगा। वे हाईकोर्ट में जा सकते हैं अथवा हाईकोर्ट के इस फैसले के आधार पर अपनी अतार्किकता को वैधता प्रदान करने की कोशिश कर सकते हैं।
    लखनऊ पीठ के फैसले पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जो बयान दिया है वह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है उन्होंने सभी से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने राम मंदिर निर्माण में सभी से सहयोग मांगा है। लेकिन वे यह नहीं बोले कि उन्हें विवादित जमीन पर मसजिद भी कबूल है। इस प्रसंग में भाजपानेता और सुप्रीम कोर्ट वकील रविशंकर प्रसाद ने जिस तरह वकील की बजाय एक हिन्दू स्वयंसेवक के नाते मीडिया को संबोधित किया उससे यही बात पुष्ट होती है कि वे वकील कम स्वयंसेवक ज्यादा है।        
       
           


बाबरी मसजिद प्रकरण- कारपोरेट मीडिया के कलंकित कवरेज के सबक -2-

     टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अध्ययन से अंग्रेजी दैनिकों के बारे में यह बात उभरती है कि ‘राजधानी के अंग्रेजी दैनिक सांप्रदायिकता भड़काने वालों में नहीं थे, वे सांप्रदायिकता भड़काने वालों को शह देनेवालों में थे। उनके लिए तर्क, सिद्धांत और व्याख्याएं जुटा रहे थे।’रिपोर्ट में यह बात रेखांकित हो गई है कि किस व्यक्ति के वक्तव्य को किस सीमा तक छापा जाए, इसका निर्णय हमें करना होगा। अराजक ढंग से बयान नहीं छापे जा सकते। किसी भी ट्रेन में या बस अड्डे पर कोई आदमी किसी मंत्री, प्रधानमंत्री को गाली देता हुआ मिल जाएगा तो क्या उसे छाप दिया जाए? यही हाल संपादक के नाम आनेवाले पत्रों का है। क्या पत्रों की भाषा और तेवर की कोई जिम्मेदारी अखबार पर नहीं है ? कोई अखबार ऐसे पत्रों को किस सीमा तक छूट देगा, यह तो उसे तय करना ही पड़ेगा।
यह भी सवाल उठाया जा सकता है कि पाठक को विचार-अभिव्यक्ति की छूट देने की आड़ में कहीं अखबार खुद अपना मकसद तो हल नहीं कर रहा है? मसलन, स्टेट्समैन में 4 नवंबर 1990 को एक पत्र छपा है जिसमें इस्लाम को असहिष्णु धर्म और हिंदुओं को सहनशील बताया गया। इसी पत्र में कहा गया कि राम मंदिर को बाबर ने नष्ट किया था। 21 अक्टूबर 1990 के अंक में एक पत्र छपा है, इसमें लिखा है कि बजरंग दल, शिवसेना, आरएसएस हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए जाग्रत हो गए हैं। 22 अक्तूबर 1990 के अंक में छपे पत्र में कहा गया कि पाकिस्तान बन जाने के बाद अब  भारत हिंदुओं का है। सर्वे में लिखा है कि ‘पाठक लि सकता है। ऐसे पाठक तो हैं ही। लेकिन पाठक के पत्रों का संपादन तो होता होगा। ऐसे पत्रों को प्रकाशित होने देने का क्या मतलब निकाला जाए ?
‘टाइम्स सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज’ की रिपोर्ट में हिंदी पत्रों के विवेचन के क्रम में जनसत्ता (दिल्ली) का विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘इस धखबार में 20 अक्तूबर से 3 नवंबर तक कोई भी दिन ऐसा नहीं रहा, जिस दिन रथयात्रा अयोध्या प्रकरण पर 15 से कम आइटम प्रकाशित हुए हों। किसी-किसी रोज तो यह संख्या 24-25 तक पहुंच गई है। यही हाल राजधानी से प्रकाशित होने वाले दूसरे अखबरों को भी था। भाषा संबंधी अध्ययन के लिए इस पत्र की भाषा का अध्ययन महत्वपूर्ण निष्कर्ष देता है। भाषा का सांप्रदायिक प्रयोग कैसे हो सकता है, उसकी यह पत्र मिसाल है। 3 नवंबर 1990 के जनसत्ता में प्रथम पृष्ठ पर छह कालम की रिपोर्ट छपी। लिखा था, ‘अयोध्या की सड़कें, मंदिर और छावनियां आज कारसेवकों के खून से रंग गईं। अर्द्धसैनिक बलों की फायरिंग से अनगिनत लोग मरे और बहुत सारे घायल हुए।’ यानी जो घायल हुए उनका तो कुछ अंदाजा लगाया जा सका- बहुत सारे थे लेकिन मरने वाले उससे भी ज्यादा थे। उन्हें गिना ही नहीं जा सकता था, अनगिनत थे।
बाबरी मस्जिद की जगह राममंदिर बनाए जाने की मांग पर उठे आंदोलन और 30 अक्तूबर से 2 नवंबर की घटनाओं में पुलिस फायरिंग से मरनेवालों की संख्या को 3 से 400 तक लिखे। पर, मरनेवालों की इतनी बड़ी सूची को आज तक किसी पत्र ने पेश नहीं किया और न ही विश्व हिंदू परिषद् ने ही जारी किया। विश्व हिंदू परिषद् ने जिन 59 लोगों की सूची जारी की थी, उसमें से अधिकांश व्यक्ति जिंदा हैं अथवा वे इस घटना में मारे ही नहीं गए, ये तथ्य अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका फ्रंट लाइन और हिंदी पाक्षिक पत्रिका माया के अंकों में पढ़ने से स्पष्ट होता है। इन दोनों पत्रिकाओं ने तथ्यों की छानबीन करके जो रिपोजदट छापी हैं, उनका खडडन करने का साहस किसी भी संगठन को नहीं हुआ। अत: पुलिस फायरिंग में मरे लोगों के बारे में अतिरंजना से बरें छापने के लिए दैनिक प्रतिष्ठानी पत्रों पर सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है। एक्सप्रेस ग्रुप के समाचारपत्रों ने खुलकर भाजपा और विश्व हिंदू परिषद् के पक्ष की तरफदारी की और सांप्रदायिक दृष्टि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
इस पक्षधरता का नमूना देखें : 27 अक्तूबर के जनसत्ता में निजी संवाददाता की एक रिपोर्ट छपी है। इस रिपोर्ट में लिखा है : ‘भारत के प्रतिनिधि राम और हमलावर बाबर के समर्थकों के बीच संघर्ष लंबा चलेगा।’
29 अक्तूबर 90 को निजी संवाददाता की रिपोर्ट छपी है। लिखा है : ‘श्रीमती सिंधिया ने कहा कि अगर एक भी रामभक्त पर गोली चली तो पूरे भारत में आग लगा दी जाए।’
4 नवंबर के अंक में निजी संवाददाता की रिपोर्ट में लिखा था कि ‘वृंदावन के स्वामी वामदेव महाराज ने कहा कि इस अवधि में कर्फ्यू हटाकर प्रशासन ने यदि कारसेवकों को राम जन्मभूमि में रामलला के दर्शन नहीं करने दिए तो बड़े पैमाने पर रक्तपात होगा।’
‘टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ के तत्वाधान में किए सर्वे में यह प्रश्न उठाया गया है कि ‘संवाददाता कह सकते हैं कि उन्होंने जो सुना, वहीं लिखा,लेकिन डेस्क पर बैठी संपादकीय टीम को तो यह तय करना पड़ेगा कि किसका बयान किस सीमा तक छापा जाए। इसी तरह सर्वे में बताया गया है कि 28 अक्तूबर को पहले पन्ने पर एक समाचार छपा जिसके शीर्षक में लिखा था, ‘भाजपा कार्यकर्ता ने आत्मदाह किया।’ पूरी बर पढ़ने से मालूम हो जाता है कि पुलिस ने घटना की जांच की थी और जांच से पता चला था कि श्री कपूर ने आत्मदाह नहीं किया था, यह एक महज दुर्घटना थी। इससे पहले 26 अक्टूबर को पहले पन्ने पर निजी संवाददाता की एक बर छपी थी, ‘अयोध्या में राममंदिर न बनने देने के सरकारी फैसले के खउलाफ पूरनचंद वर्मा ने रेल के नीचे कटकर जान दे दी।’बर में इस बात के प्रमाण नहीं थे। बर सिर्फ इतनी ही थी कि रेल पटरी पर जो कटी लाश मिली, उसकी शिनाख्त हुई। वह पूरनचंद वर्मा नाम के एक व्यक्ति की थी। बर में दिए गए तथ्यों से यह बात साफ हो जाती है कि राममंदिर के लिए कटकर जान देने की बात अपुष्ट है और किसी के दिमाग की उपज है। उपसंपादक उसे पकड़ सकता था।’
इस रिपोर्ट में अंग्रेजी पत्रों की छानबीन करते हुए जो बातें रेकांकित की गई हैं, वे भी गौरतलब हैं। खासकर प्रेस आयोग ने जिस तरह दिल्ली के प्रेस को निर्दोष और क्षेत्रीय हिंदी पत्रों को दोषी पाया है, वह पूरी तरह ठीक नहीं है। प्रेस आयोग ने अंग्रेजी पत्रों के सांप्रदायिक विष-वमन को अनदेखा किया है। यह कहीं न कहीं अंग्रेजी प्रेस के दबाव को ही दर्शाता है। अंग्रेजी का प्रेस साधन संपन्न, बौद्धिकता संपन्न माना जाता है। वह आभिजात्यों का प्रेस है तो हमारे देश के बौद्धिक और पुनरूत्पादन की रीढ़ है। यह प्रेस खुलकर सांप्रदायिक शक्तियों के साथ था। उदाहरण स्वरूप देखें
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ (दिल्ली) ने हिंदू संप्रदायवादियों के समर्थन में ऐरे-गैरे लोगों के नाम से बयान छापे हैं। 21 अक्टूबर 1990 के हिंदुस्तान टाइम्स में निजी संवाददाता की रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘राम टेंपल फर्वर इन गुजरात’ लिते हैं, (अनुवाद): ‘एक अंतर्निहित भावना कि मंदिर वहीं बनना चाहिए जहां राम का जन्म हुआ था। यह भावना न सिर्फ मध्य वर्गीय परिवारों एवं लोगों में बल्कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, व्यापारियों, उद्योगपतियों एवं अन्य बुद्धिजीवियों में भी देखी गई।’
सर्वे रिपोर्ट में इस पर टिप्पणी की है कि  ‘संवाददाता महोदय यह तो कह सकता है कि उन्होंने लोगों में जो भावना देखी, वही लिखी और इसका प्रभाव क्या पड़ता है, यह देना उनका काम नहीं है। लेकिन वे यह नहीं कह सकते कि उन्होंने सिर्फ वही लिखा जो देखा क्योंकि उन्होंने राम, राम का भगवान होना और भूमि को उनकी जन्मभूमि बनते नहीं देखा था।’
 इस तरह 21 अक्तूबर को ही निजी संवाददाता की एक अन्य रिपोर्ट छपी थी शीर्षक है, ‘सेंटर टेक्स ओवर सेक्योरिटी ऑफ टेंपल’। सरकार विवादास्पद स्थल की सुरक्षा करेगी यह भी लिने की जरूरत महसूस नहीं की गई, सिर्फ मंदिर की सुरक्षा की बात लिखी गई। ऐसा इसलिए कि ऊपर से निष्पक्ष रिपोर्टिंग का मुलम्मा लगा है, अवचेतन में मंदिर ही बैठा है। 25 अक्टूबर को इसी पत्र में एक बर छपी,‘इंडियंस अब्रोड बैंक कारसेवा।’ इस शीर्षक से यह आभास मिलता है कि सभी आप्रवासी भारतीय ऐसा चाहते हैं,। जबकि वास्तविकता यह नहीं है। 26 अक्तूबर को बर छपी ‘मुस्लिम्स फॉर कारसेवा’ इसके मुकाबले यह खबर कभी नहीं छपी कि ‘हिंदूज अगेंस्ट डिमॉलिशन ऑफ मास्क’। जबकि, ऐसे हिंदुओं की तादाद काफी है।
यही स्थिति दैनिक हिंदू (दिल्ली) की भी थी। 23 अक्तूबर के अंक में एक बर है, ‘मुस्लिम लीडर्स क्वेश्चन मोस्कस एग्जिस्टेंस‌’। इसका आशय क्या है ? मुसलमान मस्जिद के मुद्दे पर विभाजित हैं लेकिन सही बात यह है कि हिंदू उससे ज्यादा विभाजित हैं। दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी पत्रों के मुकाबले हिंदू का नजरिया कुछ निरपेक्ष इस अर्थ में था कि उसने किसी दिन सिर्फ राम जन्मभूमि नहीं लिखा। हमेशा ‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद’ लिखा। इसके विपरीत टाइम्स ऑफ इंडिया, दिल्ली की भूमिका सांप्रदायिकता को शह देने वाली ही थी।
20 अक्तूबर से 8 नवंबर तक इस प्रकरण पर छपने वाली बरों में मात्र 17 बरें बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी या मुस्लिम समुदाय के किसी प्रतिनिधि तबके या संगठन से संबंध र¹ती हैं इसमें भी यह बरें दो या दो से अधिक कॉलम की हैं। शेष सभी सिंगल कॉलम की, जबकि 20 अक्तूबर से पांच नवंबर तक रोजाना इस प्रकरण पर बीस-बीस ¹बरें छपती रही हैं। मुश्किल से एक या दो दिन ऐसा रहा होगा जब पूरे अखबार में इस प्रकरण पर 17 से कम बरें छपीं।
‘टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ की रिपोर्ट में बताया है कि किसी व्यक्ति को हीरो बनाने में अखबार का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, यह जानना हो तो इंडियन एक्सप्रेस के 20 से 26 अक्तूबर 1990 के अंक दे लें। रिपोर्ट में इस अखबार के बारे में निष्कर्ष देते हुए लिखा कि ‘अखबार में इस दौरान छपी तस्वीरों और बरों से उसकी हिंदू-समर्थक छवि बनी। हिंदू नेताओं और साधु-महंतों की बरों और तस्वीरों को छापने पर खास ध्यान दिया गया।’
अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन (दिल्ली) ने 20 अक्तूबर से 8 नवंबर तक रथयात्रा और मंदिर-मस्जिद प्रकरण पर करीब 424 बरें छापीं। यानी रोजाना 21 बरें।
स्टेट्समैन के संपादकीय तथा संपादकीय पृष्ठ के अन्य लेखों में सांप्रदायिक शक्तियों की आलोचना की गई पर बरों में हिंदुत्व को बढ़ावा दिया गया। बरों और चित्रों के कैप्शन में विवादास्पद स्थल को राम जन्मभूमि कहा गया। अयोध्या को रामनगरी लिखा गया।
18 अक्तूबर 1990 को स्टेट्समैन ने पांचवें पृष्ठ पर एक फोटो छापा। उसका कैप्शन था, ‘ड्रीमर इन क्वेस्ट आफ हिज ड्रीमलैंड’। प्रश्न उठता है क्या किसी भी तरह का सपना देने वाले को स्वप्नदर्शी कहा जा सकता है। इसी दिन इसी पृष्ठ पर एक बर में आडवाणी और हिंदू राष्ट्र की भावना को प्रोत्साहन दिया गया और कहा गया कि हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना कई लोगों का सपना है। कई लोगों का या भाजपा का ? कई लोग कहकर उसे भाजपा के दायरे से बाहर लाया गया। 30 अक्टूबर को छठे पृष्ठ पर दो कॉलम की बर में कहा गया कि शक का फायदा हिंदुओं को मिलना चाहिए और मुसलमानों को रहीम में राम देना चाहिए। यही अपील हिंदुओं से क्यों नहीं की गई?
1 नवंबर 1990 को एक लेख ‘बहुसंख्यकों की आत्मजागृति’ छपा, इस ले में कहा गया कि हिंदुओं को वर्षों से दबाया जा रहा है और आज जो भी हिंदू विद्रोह हो रहा है, वह इसी का नतीजा है।
प्रतिष्ठानी प्रेस के इस तरह के सांप्रदायिकीकरण के जरिए को अमूमन अनदेखा किया जाता है। कानूनी प्रावधानों के बावजूद सरकार इस तरह की बातें छपने देती है। तथाकथित स्वतंत्र प्रेस अपनी स्वतंत्रता के नाम पर अविवेकपूर्ण और तथ्यहीन पत्रकारिता में मग्न रहता है। प्रेस आयोग जैसे पंगु संस्थानों का ही इस तरह के लेन पर कोई नियंत्रण अथवा नियम लागू नहीं होता। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के कारण सैकड़ों लोगों की सांप्रदायिक दंगों में जानें गईं। अल्पसंख्यकों के मन में भय और आतंक का सृजन हुआ और सामाजिक तनाव को इससे विस्तार मिला। प्रेस आयोग ने भड़काऊ और तथ्यहीन ले के लिए हिंदी के क्षेत्रीय पत्रों को तो दोषी पाया, उनकी भर्त्सना की, पर दिल्ली के अंग्रेजी राष्ट्रीय दैनिकों को उसने टिप्पणी लायक भी नहीं समझा, जबकि इन पत्रों ने भी सांप्रदायिकता को शह देने वाले मुस्लिम विरोधी और तथ्यहीन बरों का अंबार लगा दिया। यह प्रेस आयोग की अंग्रेजियतपरस्ती और आभिजात्यवादी दृष्टि भी है। यह प्रेस आयोग का एकांगी दृष्टिकोण है।
हकीकत में यह माध्यम निर्मित यथार्थ का युग है। ‘माध्यम निर्मित यथार्थ’ के प्रभाववश हम ‘वस्तुगत यथार्थ’ देखने में असमर्थ होते जा रहे हैं। आज ‘वस्तुगत यथार्थ’ की प्रामाणिकता पर कम ‘प्रोजेक्टेड यथार्थ’ की प्रामाणिकता पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
अभी तक हम पांच परंपरागत संवेदना इंद्रियों के माध्यम से जिस यथार्थ का अनुभव करते थे, उसमें और ‘प्रोजेक्टेड यथार्थ’ में अंतर करना बेहद कठिन हो गया है। आज हमारा पर्सेप्शन माध्यमों द्वारा निर्मित यथार्थ से निर्मित हो रहा है। आज विश्व में आलम यह है कि वह घटना , घटना ही नहीं मानी जाती जिसकी माध्यमों ने बर नहीं दी। ध्यान रहे कि जो बर रिपोर्ट की गई है जरूरी नहीं है कि वह घटित भी हुई हो। अधिकतर रिपोर्टिंग सुनिश्चित अनुमानों एवं पूर्वग्रहों के आधार पर तैयार होती है।
प्रसिद्ध माध्यम विशेषज्ञ पीटर ब्राह्म ने लिखा है कि तथ्य स्वयं के आधार पर टिके नहीं होते, बल्कि वे व्यापक स्तर पर फैले सुनिश्चित अनुमानों के तहत ही उनकी खोज करनी चाहिए और कौन या तथ्य स्टोरी के लिए महत्वपूर्ण है, यह निर्भर करता है कि कौन से निश्चित अनुमानों को आधार बनाया जाता है।




बाबरी मसजिद प्रकरण- कारपोरेट मीडिया के कलंकित कवरेज के सबक -1-

     आज इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बैंच बाबरी मसजिद विवाद पर साठ साल बाद फैसला करने जा रही है। जब से यह मुकदमा चल रहा है तब से बाबरी मसजिद प्रकरण में बहुत कुछ अनचाही चीजें घट चुकी हैं। उसमें सबसे बुरी तीन बातें हुई हैं। पहला, अनेक साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनमें अनेक निर्दोष लोगों की जान गई। दूसरा बाबरी मसजिद को संघ परिवार ने गिरा दिया। तीसरा, कारपोरेट मीडिया ने सबसे घिनौनी भूमिका अदा की, साम्प्रदायिक कवरेज दिया और सारे वातावरण को विषाक्त बनाया। आज जब फैसला सुनाया जाएगा तो सारे देश की आंखें लखनऊ की ओर लगी हुई हैं। सारे देश में कारपोरेट मीडिया ने भय का वातावरण बना दिया है। जबकि ऐसा अभी तक कुछ भी नहीं घटा है जिसे लेकर चिंतित हुआ जाए। विवादित मसले पर विभिन्न पक्षों ने सिर्फ अपनी राय का इजहार किया है लेकिन मीडिया कवरेज ने अचानक सारे देश में भय और सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना दिया है।  हमें इस पर विचार करना चाहिए कि कारपोरेट मीडिया ने यह भय का वातावरण क्यों बनाया है ?
   दूसरी समस्या यह है कि बाबरी मसजिद प्रकरण संपत्ति विवाद नहीं है। प्रॉपर्टी विवाद नहीं हैं,धार्मिक विवाद नहीं है। यह हिन्दू साम्प्रदायिकता की विचारधारात्मक जंग का केन्द्रीय मुद्दा है। जजमेंट कुछ भी हो कोई भी पक्ष हारे या जीते हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें इस मसले को छोड़ने वाली नहीं हैं। साम्प्रदायिक मसले साम्प्रदायिक गोलबंदी और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से नहीं जीते जाते बल्कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष से जीते जाते हैं। साम्प्रदायिक ताकतें किसी बात पर कान नहीं देतीं, उन्हें हाशिए पर डालने के लिए धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक आधार पर जनता को गोलबंद किया जाना चाहिए।
    इस प्रसंग में हमारे समाने क्या फैसला आता है उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है भारत में साम्प्रदायिक सदभाव को हम कैसे बचा पाते हैं। मंदिर और मसजिद से ज्यादा महत्वपूर्ण है साम्प्रदायिक सदभाव और आम आदमी की सामान्य जिंदगी को बनाए रखना।साम्प्रदायिक ताकतों को हाशिए पर डालना। पिछला अनुभव बताता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण पर कारपोरेट मीडिया ने घृणित सांप्रदायिक प्रचार किया था। उस प्रचार के दौरान प्रथम प्रेस आयोग से लेकर प्रेस परिषद् तक सभी की सुझाई नियम संहिता का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया था। इलैक्ट्रॉनिकी माध्यमों और वीडियो -ऑडियो का सांप्रदायिक शक्तियों ने जमकर दुरूपयोग किया था, इससे हिंसा भड़की एवं सांप्रदायिक उन्माद पैदा हुआ।
    इसबार स्थिति भिन्न है। इस समय कोई साम्प्रदायिक संगठन सड़कों पर हंगामा नहीं कर रहा है। लेकिन पुराने अनुभवों के आधार पर लोग डरे हुए हैं। पुराने अनुभव पर एक नजर डालना समीचीन होगा।
बाबरी मस्जिद प्रकरण को हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक संगठनों ने पूरी शक्ति के साथ 1989-90 के वर्ष में उठाया। 30 अक्टूबर 1990 को बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण प्रारंभ करने की घोषणा की गई। भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने इसी उद्देश्य से सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा प्रारंभ की। तत्कालीन हिंदी-अंग्रेजी और बांग्ला के कारपोरेट मीडिया ने सांप्रदायिकता को प्रश्रय देने का काम किया था।
इस पूरे प्रकरण में एक बात साफ तौर पर उभरकर आई। वह यह कि किसी भी भाषा के प्रतिष्ठानी अबार ने सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा किए गए विषैले प्रचार की तह में जाकर छानबीन करने की कोशिश नहीं की। किसी भी खोजी पत्रकार ने बाबरी मस्जिद प्रकरण के तथ्यों का समग्रता से उद्धाटन नहीं किया। खोजी पत्रकारिता के धुरंधर पत्रकारों का बाबरी मस्जिद प्रकरण पर खो नहीं करना हमें सोचने को मजबूर करता है कि क्या आम जनता को बाबरी मस्जिद प्रकरण के सभी तथ्यों की जानकारी देना उनका कर्तव्य नहीं था ? इस प्रकरण में तथ्यों का उद्धाटन इतिहासकारों ने किया, जबकि प्रेस को यह जिम्मेदारी अदा करनी थी। खासकर हिंदी के बड़े समाचार पत्रों की भूमिका सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने वाली थी, यह बात प्रेस आयोग ने भी रेखांकित की है।
बाबरी मस्जिद प्रकरण के संदर्भ में हिंदुत्ववादी संगठनों के पक्ष में हवा तैयार करने, उनके बयानों और विचारों को व्यापक रूप से तरजीह देने, इतिहास विरोधी, तथ्यहीन, मुस्लिम विरोधी, न्यायपालिका और संविधान विरोधी भावनाएं तैयार करने में हिंदी का प्रतिष्ठानी प्रेस अग्रणी था। उसने सांप्रदायिक संगठनों के असत्य और अफवाह फैलाने वाले बयानों को वरीयता देकर छापा। इसके विपरीत तथ्यपूर्ण और अफवाह विरोधी भूमिका का निर्वाह करने में हिंदी का प्रतिष्ठानी प्रेस पूरी तरह असफल रहा। इस संदर्भ में घटी घटनाओं के प्रति वे निष्पक्ष नहीं थे। वे इस प्रकरण से जुड़ी बरों के सामाजिक प्रभाव के प्रति जानबूझकर उदासीन रहे। अतिरंजना और उत्तेजनात्मक बरों को बिना तहकीकात के प्रकाशित करते रहे। इससे सांप्रदायिकता का प्रसार हुआ। कारपोरेट मीडिया की पिछली भूमिका की समीक्षा करना समीचीन होगा। यहां पर कुछ हिंदी पत्रों की बाबरी प्रकरण के संदर्भ में समीक्षा की जा रही है।
    मसलन्, मेरठ से प्रकाशित अमर उजाला की भूमिका को लें। इस पत्र का संपादकीय प्रत्यक्ष: सांप्रदायिक नहीं था। परंतु, बरों की प्रस्तुति सांप्रदायिक थी। बरों के लिए इस पत्र ने 30 अक्टूबर के पहले से ही अपने पृष्ठ बढ़ा दिए, जिससे अयोध्या की घटनाओं पर ज्यादा बरें दी जा सकें। पाठकों के पत्रों के कालम में 60 फीसदी से ज्यादा पत्र ऐसे छापे गए जो आक्रामक हिंदू दृष्टिकोण को व्यक्त करते थे।
रिपोर्टों में हिंदू सांप्रदायिकता के पक्ष में और राज्य प्रशासन के खिलाफ लिखा गया। मसलन, 20 अक्तूबर को अमर उजाला ने निजी संवाददाता की रिपोर्ट छापी। शीर्षक था ‘भूमिगत नेताओं की धर-पकड़ का अभियान टांय-टांय फिस्स’। इस मुहावरे के प्रयोग में राज्य प्रशासन, पुलिस और सरकार के प्रति उपहास का भाव निहित है। उल्लेनीय है कि संवाददाता को मखौल उड़ाने की आजादी नहीं होती। इस पद्धति के आधार पर वह प्रत्येक अवस्था में दूसरे को नीचा दिखा सकता है। पुलिस सख्ती करे तो लिखा जाएगा कि बर्बर, अमानवीयता कृत्य नरमी बरती जाए तो लिखा जाएगा, ‘टांय-टांय फिस्स’।
20 अक्टूबर के अंक में ही एक अन्य बर है, ‘थाने का घेराव कर महिलाओं ने हिंदू नेताओं को छुड़ाया।’ शीर्षक में तीन बातें हैं। थाना कमजोर पड़ रहा है, महिलाओं की शांत बिरादरी भी उठकर प्रशासन के रूबरू ड़ी हो गई है, और हिंदू नेताओं के पीछे इतना प्रबल जनमत है। यह पाठक को आंदोलन की व्यापकता से सम्मोहित करने का प्रयास है। बर का शीर्षक यह भी हो सकता था कि पुलिस ने महिलाओं की बात मानी। इससे पुलिस और राज्य प्रशासन का चेहरा मानवीय नजर आता। अमर उजाला का संवाददाता यह कतई नहीं चाहता। इस पत्र ने बरों के शीर्षक इस तरह बनाए जिससे अतिरंजना बोध पैदा होता है। अस्पष्टता के माध्यम से राम मंदिर आंदोलन की व्यापकता का बोध जगाया गया।
अमर उजाला में संपादकीय और बरों के दृष्टिकोण में अंतर था। वहीं पर दैनिक जागरण (आगरा) के संपादकीय और बरें एक ही दृष्टिकोण को व्यक्त करते थे। इस पत्र को सांप्रदायिक प्रचार के लिए प्रेस आयोग ने दोषी पाया। इस पत्र ने कारसेवक के लिए रामभक्त कहा, उन्हें शहीद बताया। ‘रामभक्तों का नरसंहार’, ‘राम नगरी में सुरक्षा बलों द्वारा किए गए नरसंहार’, ‘रामनगरी के मंदिरों में जमा एक ला रामभक्त कारसेवा पुन: शुरू करने के लिए बलिदान को तैयार’ जैसे जुमलों का प्रयोग किया। इसके अलावा बरों के भड़काऊ शीर्षक दिए गए। इस पत्र ने अपने संवाददाता की रिपोर्टों को प्राथमिकता दी और समाचार एजेंसियों की बरों को संक्षेप में अथवा एक कॉलम में छापा।
दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स में बरों की प्रस्तुति में भी सांप्रदायिक सोच व्यक्त होता है। यह सोच बर की प्राथमिकता में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बरों को किस तरह कम या ज्यादा महत्व दिया जा रहा था। यह बात स्पष्टत: संपादकीय दृष्टि से मेल खाती है। मसलन्, 2 नवंबर के नभाटा में यह बर थी ‘सरयू में लाशें मिली’। यह एकदम सामान्य बात थी, जिसे असामान्य ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी। यह बर प्रथम पेज पर छापी गई। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी ने अपील की थी कि हिंदुओं की रक्षा की जाए, यह बर पेज तीन पर छपी। ‘हिंदुओं ने ईदगाह बनाई’, यह बर पेज तीन पर छपी थीं, लेकिन ‘कारसेवक फिर कोशिश करेंगे’ यह बर पेज एक पर छपी, ‘हिंदुओं की रक्षा की बाबरी मस्जिद कमेटी की अपील’, पेज तीन पर एक कॉलम में छपी, लेकिन उसी पेज पर विश्व हिंदू परिषद् का वक्तव्य दो कॉलम में छपा। ऐसा लगता है मानो दूसरे पक्ष की बातों को कोई महत्व ही नहीं है या जानबूझकर उसे भीतर के पन्नों में डाला जा रहा है।
दैनिक हिंदुस्तान (दिल्ली) का रवैया भी कमोवेश यही था। 2 नवंबर को पेज एक पर दो कॉलम की एक बर छपी, जिसका शीर्षक था ‘अयोध्या प्रकरण पर ढाका में दंगा: छह मरे।’ शीर्षक से यह लगता है कि दंगे में उस दिन छह लोगों की मौत हुई है। आमु में भी यही है। बर का तेवर ऐसा है जैसे ढाका में हिंदुओं को बेदर्दी से पीटा गया। ढाका में हिंसा की बर पहले पन्ने और इरशाद का आश्वासन ग्यारहवें पन्ने पर।
टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक अध्ययन (नभाटा, 24 फरवरी 1991) का इस प्रसंग पर निष्कर्ष है कि ‘इस दौरान छपी बरों में एक बात देने में आई। जहां एक ओर विशेष संवाददाताओं की रपटें संतुलित थीं, वहीं अधिकांश अंशकालिक संवाददाताओं और कार्यालय संवाददाताओं की बरें अतिरंजक और पक्षपातपूर्ण थीं। बरें लिने के उनके अंदाज से लगता था कि वे कारसेवकों को श्रद्धालु, रामभक्त और निर्दोष आदि मानकर चल रहे थे। वे यह भी मानकर चल रहे थे कि अयोध्या में गोलीबारी में मारे गए कारसेवक शहीद हुए थे और वहां पुलिस ने भयंकर जुल्म किए।’
  

बुधवार, 29 सितंबर 2010

सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कार्ल मार्क्स के नजरिए से देखें- भारतीय विद्रोह की स्थिति

      भारत से आने वाली पिछली डाक के साथ-साथ जो भारी-भरकम रिपोर्ट लंदन पहुंची थी, उससे दिल्ली पर कब्जा किए जाने की अफवाह इतनी तेजी से फैल गई थी और उसने इतनी अधिक मान्यता प्राप्त कर ली थी कि सट्टा बाजार के कारोबार पर भी उसका असर पड़ा था। इस खबरों की हलकी-फुलकी सूचना तारों के जरिए पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। सेवास्तोपोल पर कब्जा करने के झांसे का, छोटे पैमाने पर, यह दूसरा संस्करण था! अगर मद्रास से आने वाले उन अखबारों की, जिनमें अनुकूल खबर आई बताई गई थी, तारीखों और उनके मजमूनों की जरा भी जांच कर ली जाती, तो यह भ्रम दूर हो जाता। कहा जाता है कि मद्रास संबंधी सूचना आगरा से 17 जून को भेजे गए निजी पत्रों के ऊपर आधारित है, लेकिन 17 जून को ही लाहौर से जारी की गई एक आधिकारिक विज्ञप्ति बताती है कि 16 तारीख के तीसरे पहर के चार बजे तक दिल्ली के आसपास सब कुछ शांत था। और 1 जुलाई की तारीख को बंबई टाइम्स लिखता है कि 'कई हमलों को रोक देने के बाद, 17 तारीख की सुबह को जनरल बरनार्ड सहायता के लिए आने वाले और सैनिकों का इंतजार कर रहे थे।' मद्रास से आई सूचना की तारीख के बारे में इतना ही काफी है। जहां तक इस सूचना के मजमून का ताल्लुक है, तो स्पष्ट है कि दिल्ली की कुछ ऊंची जगहों पर बलपूर्वक अधिकार कर लेने के संबंध में 8 जून को जारी की गई जनरल बरनार्ड की विज्ञप्ति और घेरेबंदी में पड़े लोगों द्वारा 12 और 14 जून को किए गए अचानक हमलों के संबंध में प्राप्त कुछ निजी रिपोर्टें ही उसका आधार हैं।
आखिरकार, ईस्ट इंडिया कंपनी की अप्रकाशित योजनाओं के आधार पर दिल्ली और उसकी छावनियों का एक फौजी नक्शा कैप्टन लॉरेंस ने तैयार कर दिया है। इससे हम देख सकते हैं कि दिल्ली की मोर्चेबंदी इतनी कमजोर नहीं है जितनी वह पहले बताई गई थी, और न वह इतनी मजबूत ही है जितनी इस समय जतलाई जा रही है। उसके अंदर एक किला है जिस पर यह तो अचानक धावे के जरिए फांदकर या सीधे रास्तों से अंदर जाकर कब्जा किया जा सकता है। उसकी दीवारें, जो सात मील से भी अधिक लंबी हैं, पक्के ईंट-चूने की बनी हुई हैं; लेकिन उसकी ऊंचाई बहुत नहीं है। खाई संकरी है और बहुत गहरी नहीं है, और बाजू की मोर्चेबंदियां फसील से कायदे से नहीं जुड़ी हुई हैं। बीच-बीच में कोटे (ऊंचे रक्षा-स्तंभ) हैं। वे अर्ध-गोलाकार हैं और बंदूकें रखने के लिए उनमें जगह-जगह छेद बने हुए हैं। फसील के ऊपर से कोटों के अंदर होती हुई, नीचे के उन कमरों तक चक्करदार सीढ़ियां जाती हैं जो खाई के धरातल पर बनी हुई हैं और इनमें पैदल सैनिकों के लिए गोली चलाने के छेद बने हुए हैं। इनमें से की जाने वाली गोली-वर्षा खंदक को पार कर फसील कर चढ़ने वाली टुकड़ी के लिए बहुत परेशानी का कारण बन सकती है। फसील की रक्षा करने वाले बुर्जों के अंदर राइफलमैनों के बैठने के लिए सुरक्षित स्थान भी बने हुए हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को तोपों के जरिए रोका जा सकता है। विप्लव जिस समय शुरू हुआ था, उस समय शहर के अंदर के शस्त्रागार में 9,00,000 कारतूस, घेरा डालने की तोपखाने वाली दो पूरी ट्रेनें, बहुत सी तोपें और 10,000 देशी बंदूकें थीं। बारूदखाने को, वहां के बाशिंदों की इच्छा के अनुसार, दिल्ली से बाहर की छावनियों में पहुंचा दिया गया था। उसमें बारूद के 10,000 से कम पीपे नहीं थे। फौजी महत्व की जिन ऊंचाइयों पर 8 जून को जनरल बरनार्ड ने कब्जा किया था, वे दिल्ली से उत्तर-पश्चिम की दिशा में उसी स्थान पर स्थित हैं जहां दीवारों के बाहर की छावनियां भी कायम की गई थीं।
प्रामाणिक योजनाओं पर आधारित जो ब्योरा प्राप्त हुआ है, उससे यह बात अच्छी तरह समझ में आ जाएगी कि जो ब्रिटिश सेना आज दिल्ली के सामने पड़ी हुई है, यदि वह 26 मई को वहां पर होती तो उसके एक ही जोरदार हमले से विद्रोह का गढ़ धराशाई हो जाताऔर यह सेना उस वक्त वहां पहुंच सकती थी यदि वहां जाने के लिए पर्याप्त साधन उसे मुहैया कर दिए जाते। जून के अंत तक विद्रोह करने वाली रेजीमेंटों की संख्या बंबई टाइम्स में छपी और लंदन के अखबारों में पुनर्मुद्रित सूची और उनके विद्रोह की तारीखों को देखने से स्पष्ट रूप में यह सिध्द हो जाता है कि 26 मई को दिल्ली पर केवल 4 से 5 हजार सैनिकों का कब्जा था। इतनी सेना सात मील लंबी फसील की हिफाजत करने की बात क्षण भर के लिए भी नहीं सोच सकती थी। दिल्ली से मेरठ केवल चालीस मील के फासले पर स्थित है। 1853 के आरंभ से ही, हमेशा उसने बंगाल के तोपखाने के सदर मुकाम की तरह काम किया है, इसलिए वहां फौजी वैज्ञानिक कामों की प्रमुख प्रयोगशाला मौजूद थी और  मोर्चे पर लड़ने और घेरा डालने के पैंतरों का अभ्यास करने के लिए वहां परेड का भी एक मैदान था। इस वजह से इस बात को समझना और भी मुश्किल हो जाता है कि वहां के ब्रिटिश कमांडर के पास उन साधनों की कमी क्योंकर हो गई थी जिनके जरिए एक जोरदार अचानक हमला करके नगर पर वह कब्जा कर लेताउसी तरह का अचानक हमला जिस तरह के हमलों से भारत की अंगरेजी फौजें देशी लोगों के ऊपर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने में हमेशा सफल हो जाती हैं। पहले हमें सूचित किया गया था कि घेरा डालने की तोपखाने वाली ट्रेन का* इंतजार था; फिर कहा गया कि सहायता के लिए और सैनिकों की जरूरत थी; अब दि प्रेस, लंदन के सबसे अधिक जानकार पत्रों में से है, वह हमें बताता है कि हमारी सरकार को इस तथ्य का पता है कि जनरल बरनार्ड के पास सामानों और गोले-बारूद की कमी है, कि उनके पास गोला-बारूद की सप्लाई केवल 24 राउंड फी सैनिक के हिसाब से है।
दिल्ली की ऊंची जगहों पर कब्जा करने के बाद जनरल बरनार्ड ने 8 जून को जो विज्ञप्ति निकाली थी, उससे हम देखते हैं कि शुरू में खुद उसका इरादा दिल्ली पर अगले दिन हमला करने का था। इस योजना पर वह अमल नहीं कर सका और इसके बजाए, किसी न किसी दुर्घटना के कारण, घिरे हुए लोगों के साथ वह केवल सुरक्षात्मक लड़ाई ही लड़ता रहा।
दोनों तरफ कितनी शक्तियां हैं, इसका हिसाब लगाना इस समय बहुत कठिन है। भारतीय अखबारों के वक्तव्य एकदम परस्पर-विरोधी हैं: लेकिन, हमारा खयाल है कि बोनापार्टवादी पेज के एक भारतीय संवाददाता द्वारा भेजी गई खबरों पर कुछ भरोसा किया जा सकता है जो कलकत्ता स्थित फ्रांसीसी कौंसल से प्रसारित मालूम होती हैं। उक्त संवाददाता के बयान के अनुसार 14 जून को जनरल बरनार्ड की सेना में लगभग 5,700 सैनिक थे, जिनकी संख्या उसी महीने की 20 तारीख को अपेक्षित सैनिक कुमुक पहुंचने के कारण दुगुनी हो जाने की आशा थी। उसकी ट्रेन में घेरा डालने की 30 भारी तोपें थीं। इसके विपरीत, विप्लवकारियों की फौज में लगभग 40,000 सैनिक होने का अनुमान था, जिनका संगठन तो काफी बुरा था पर वे आक्रमण और बचाव के सभी साधनों से अच्छी तरह लैस थे।
चलते-चलते हम यहां इस बात का भी उल्लेख कर दें कि अजमेरी गेट के बाहर, शायद गाजी खां के मकबरे में, जो 3,000 विद्रोही सैनिक कैंपों में थे, वे अंगरेजी फौज के आमने-सामने नहीं थे जैसा कि लंदन के कुछ अखबार कल्पना करते हैं; बल्कि इसके विपरीत उन दोनों के बीच दिल्ली की पूरी चौड़ाई जितनी दूरी थी, क्योंकि अजमेरी गेट आधुनिक दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी भाग के एक छोर पर, प्राचीन दिल्ली के खंडहरों के उत्तर में स्थित है। नगर के उस भाग में विद्रोहियों के इसी तरह के कुछ और कैंप कायम किए जाने में कोई चीज बाधक नहीं बन सकती है। नगर के उत्तर-पूरब या नदी की दिशा में नावों का पुल उनके अधिकार में है जिससे अपने देशवासियों के साथ उनका संपर्क निरंतर बना हुआ है और वे बिना किसी रोक-टोक के सैनिकों और सामानों की सप्लाई प्राप्त करते रहते हैं। छोटे पैमाने पर दिल्ली एक किला जैसा प्रतीत होती है जिसका अपने देश के अंदरूनी भाग के साथ संचार का मार्ग (सेवास्तोपोल की भांति ही) खुला हुआ है।
अंगरेजी फौज की कार्रवाइयों में हुई देरी की वजह से न केवल घेरे में बंद लोगों को अपनी रक्षा के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों को जुटाने का अवसर मिल गया है, बल्कि कई हफ्तों तक दिल्ली पर कब्जा किए रहने और बार-बार हमले करके यूरोपियन फौजों को परेशान करते रहने की अनुभूति ने और इसी के साथ-साथ पूरी सेना में हो रहे नए विद्रोहों की रोजाना आने वाली खबरों ने सिपाहियों के मनोबल को निस्संदेह मजबूत कर दिया है। अंगरेज अपनी छोटी फौजों से शहर को घेरने की बात हर्गिज नहीं सोच सकते, वे तो अचानक हल्ला बोल कर ही उस पर कब्जा कर सकते हैं। लेकिन, अगली साधारण डाक से दिल्ली पर अधिकार कर लिए जाने की खबर यदि नहीं आती है, तो इस बात को हम लगभग पक्का मान सकते हैं कि अंगरेजों की तरफ से की जाने वाली तमाम गंभीर कार्रवाइयों को कुछ महीनों के लिए स्थगित कर देना पड़ेगा। वर्षा ऋतु जोरों से शुरू हो जाएगी और 'जमुना की गहरी और तेज धार' नगर के उत्तर-पूर्वी भाग को सुरक्षित बना देगी। दूसरी तरफ, 75 डिग्री से लेकर 102 डिग्री तक की गर्मी पड़ेगी और उसके साथ औसतन नौ इंच तक की बारिश जुड़ी रहेगीइससे यूरोपियनों को असली एशियाई हैजे का शिकार बनना पड़ेगा। तब फिर लार्ड एलेनबरो के ये शब्द सच चरितार्थ हो जाएंगे :
मेरी राय है कि सर एच. बरनार्ड जहां पर हैं, वहीं बने नहीं रह सकतेजलवायु ऐसा नहीं होने देगी। वर्षा जब जोरों से शुरू हो जाएगी, तब मेरठ, अंबाला और पंजाब से उनका संबंध कट जाएगा; भूमि की एक बहुत संकरी पट्टी में वे कैद हो जाएंगे, और, तब खतरे की तो मैं नहीं कहूंगा, लेकिन ऐसी स्थिति में वह जरूर पहुंच जाएंगे जिसका अंत केवल विनाश और विध्वंस में ही हो सकता है। मेरा विश्वास है कि वह समय रहते ही वहां से हट जाएंगे।
तब फिर, जहां तक दिल्ली का संबंध है, हर चीज इस प्रश्न पर निर्भर करती है कि जनरल बरनार्ड के पास इतनी काफी सेना और गोला-बारूद इकट्ठे हो जाते हैं कि नहीं कि जून के अंतिम सप्ताह में वह दिल्ली पर हमला कर सकें। दूसरी तरफ, उनके वहां से पीछे हट जाने से विद्रोह की नैतिक शक्ति अत्यधिक मजबूत हो जाएगी और, इससे संभवत:, बंबई और मद्रास की फौजों के भी खुले तौर से विद्रोह में शामिल होने का फैसला हो जाएगा।
(18 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5094, में प्रकाशित )




मंगलवार, 28 सितंबर 2010

हिन्दूधर्म के भ्रष्टीकरण का चरमोत्कर्ष है संघ परिवार का प्रौपेगैण्डा

     मौजूदा दौर सांप्रदायिक ताकतों के आक्रामक रवैय्ये का दौर है। इस दौर को विराट पैमाने पर माध्यमों की क्षमता ने संभव बनाया है। सांप्रदायिक ताकतों, विशेषकर हिंदुत्ववादी (आरएसएस संप्रदाय) संगठनों की सांप्रदायिक विचारधारा को व्यापक पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित करने में परंपरागत और इलैक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की प्रभावी भूमिका रही है। हिंदुस्तानी ताकतों ने किस तरह की माध्यम रणनीति आख्तियार की, उसका परिप्रेक्ष्य और विचारधारात्मक पक्ष क्या रहा है? इसका समग्रता में मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
हिंदुत्ववादी माध्यम रणनीति पर विचार करते समय पहला प्रश्न यह उठता है कि अयोध्या, मथुरा, वाराणसी का ही चयन क्यों किया गया? इनमें से अयोध्या को ही सांप्रदायिक आंदोलन का केंद्र क्यों चुना गया? क्या यह चयन किसी वैचारिक योजना का अंग है? मेरा मानना है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। इसका प्रेरक तत्व हिटलर की रणनीति से लिया गया है। हिटलर ने मीन कॉम्फ में लिखा था कि किसी आंदोलन के लिए स्थान विशेष की भौगोलिक, राजनीतिक महत्ता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। स्थान विशेष के कारण ही मक्का या रोम का महत्वपूर्ण स्थान है। किसी स्थान विशेष को केंद्र में र¹कर ही एकता को स्वीकृति मिलती है। इस एकता को अर्जित करने के लिए हिटलर ने म्यूनि¹ का चयन किया।
कैनेथ बुक ने ‘ रेहटोरिक ऑफ हिटलर्स बैट्ल्स’ में रेखांकित किया कि म्यूनि का चयन धार्मिक दृष्टि एवं पद्धति के आधार पर किया गया। यह भयानक प्रभावकारी औजार साबित हुआ। खासकर जब कई देशों में पूंजीवादी कमजोर हो रहा था। हिटलर ने जब म्यूनि को केंद्र बनाया तो आर्य श्रेष्ठता को जर्मनों से जोड़ा और स्वत:स्फूर्त ढंग से यहूदी विरोधी भावनाओं को उभारा और संसदीय प्रणाली पर हमला किया। हिटलर का मानना था कि धार्मिक महत्व के स्थान को आंदोलन का केंद्र चुनने से आर्य एकता, सम्मान, श्रेष्ठत्व अर्जित करने के लिए आंदोलन सफलता अर्जित करेगा।
हमारे यहां हिंदुत्ववादियों ने इसी धारणा से प्रेरणा लेकर हिंदू एकता के लिए धार्मिक स्थानों का चयन किया इसीलिए धार्मिक तीर्थस्थान का प्रतीक होने के कारण बन गया। हिटलर ने आर्यों की मर्यादा एवं सम्मान को धार्मिक एवं मानवीय स्तर पर अर्जित करने एवं इनके श्रेष्ठत्व की धारणा पर बल दिया। हमारे यहां हिंदुत्ववादियों ने हिंदू सम्मान एवं हिंदुओं की मर्यादा की रक्षा को मुद्दा बनाया।
हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों के माध्यमों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे भी हिंदुओं की उपेक्षा, तिरस्कार एवं अपमानजनक स्थितियों का बार-बार वर्णन करते रहे हैं। वे हिंदू को भारत का आदिम निवासी मानते हैं और गैर हिंदुओं को, विशेषकर अल्पसंख्यकों को हिंदूराष्ट्र से एकात्म स्थापित करने का आह्वान करते हैं। आरएसएस के अखबार पांचजन्य के अपना ‘भारत अंक’ (21 मार्च 1993) में आरएसएस के प्रमु सिद्धांतकार के .सी.सुदर्शन का ‘अगली सदी का हिंदूराष्ट्र’ शीर्षक ले छपा है। इसमें वे लिते हैं, ‘मुसलमान और ईसाई भी अपने आपको इस धरती के और यहां के पूर्वजों के साथ जोड़ें। देश के सांस्कृतिक प्रभाव में अपने आपको समरस कर लें। हिदूराष्ट्र की गौरव वृद्धि में योगदान दें।’
आरएसएस एवं उसके सहयोगी संगठन दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मवाद का बार-बार प्रचार करते रहे हैं। सुदर्शन ने अपने ले में लिखा कि ‘जहां तक व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व और अधिकार का प्रश्न है, हिंदू चिंतन नहीं मानता कि व्यक्ति का कोई सर्वतंत्र स्वतंत्र अस्तिव है।’
    उल्लेखनीय है हिटलर भी व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व को अस्वीकार करता था और दीनदयाल उपाध्याय का भी यही दृष्टिकोण था। व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व को अस्वीकार करने का अर्थ है भारतीय नवजागरण की उपलब्धियों का अस्वीकार एवं विरोध करना। भारतीय नवजागरण एवं यूरोपीय नवजागरण, दोनों के प्रभाववश व्यक्ति की स्वतंत्र पहचान, अधिकार एवं ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियां सामने आई। हिटलर ने उन सबको नष्ट किया। सांप्रदायिक ताकतें भारत में भी ऐसा करने का सपना देरही हैं। एकात्मवाद मूलत: सांस्कृतिक, जातीय, भाषायी वैविध्य को अस्वीकार करता है। वह हिंदू सांप्रदायिक चेतना के साथ एक रस हो जाने का संदेश देता है।
सांप्रदायिक ताकतों की माध्यम रणनीति की धुरी है धर्म का भ्रष्टीकरण। इनकी धार्मिक धारणाओं का धर्म की बुनियादी धारणाओं से दूर-दूर तक संबंध नहीं है। फासिज्म की यह रणनीति जर्मनी में भी थी। उसने धर्म का ‘डि स्टैंडराजइजेशन’ किया था। कैनेथ बुक ने लिखा कि भ्रष्टाचार उसकी धुरी था। हिटलर मानता था कि जो सबसे अच्छी चीज है उसे भ्रष्ट कर दो तो वह सबसे घृणित कार्य भी होगा। कैनेथ बुक की राय है कि धर्म को भ्रष्ट करने वाले आज दुनिया में सबसे भयानक माने जाते हैं। वे धार्मिक सिद्धांतों के अंदर विकृतियां पैदा करके नई-नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।
    हिंदू धर्म का भ्रष्टीकरण सांप्रदायिक ताकतों का मूल लक्ष्य है इससे धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं को विद्रूपीकरण की दिशा में ले जाने में मदद मिलती है। वे हिटलर की तरह ही धर्म को जीवन में सर्वोच्च स्थान देते हैं। हिटलर लोकतंत्र विरोधी था हिंदू सांप्रदायिक ताकतें भी लोकतंत्र का विरोध करती हैं। सुदर्शन ने लिखा ‘धर्म के नियम का उल्लंघन करने से यह सामंजस्य टूटता है और अव्यवस्था फैलती है।’ वे यह भी मानते हैं कि ‘दसवीं सदी के आसपास पुन: पतन की प्रक्रिया आरंभ होती है और 15 अगस्त 1947 को यह प्रक्रिया पतन के निम्नतम बिंदु पर पहुंचती है जब वेद काल से लेकर आज तक संजोई भारत माता की मूर्ति खंडित होती है।’यानी सार्वभौम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का उदय पतन का निम्नतम बिंदु है। वे माध्यमों और समाज में संविधान एवं उसके बुनियादी सिद्धांतों की अवमानना व्यक्त करते हैं।
सांप्रदायिक माध्यम रणनीति का एक पहलू यह भी है कि वे अपने विरोधियों के मंतव्य, दृष्टिकोण आदि को विकृत रूप में पेश करते हैं। साथ ही, पत्र-पत्रिकाओं में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरने के लिए प्रतिदिन विभिन्न संगठनों के नामों से ढेर सारी प्रेस विज्ञप्तियां देते हैं। इंटरनेट पर उनके स्वयंसेवक गंदी-गंदी टिप्पणियां लिखते हैं। सांप्रदायिक माध्यम रणनीति का एक अन्य पक्ष यह है कि वे अफवाहों एवं तथ्यहीन बातों का सघन प्रचार अभियान के तौर पर प्रयोग करते हैं और इसके लिए ‘पुनरावृत्ति की शक्ति’ का इस्तेमाल करते हैं। ‘पुनरावृत्ति‘ एवं नारेबाजी की शैली का जन सभाओं एवं माध्यमों में प्रयोग करते हैं। ‘पुनरावृत्ति की शक्ति’ मूलत: विज्ञापन की पर्सुएशन क्षमता का अनुकरण है। हिटलर ने अपनी कृति मीन कॉम्फ एवं जनसभा के भाषणों में इसका प्रभावी प्रयोग किया था, साथ ही, नाजी माध्यमों को पुनरावृत्ति शक्ति के प्रयोग का आदर्श नमूना माना जाता है।
हिंदू सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा माध्यमों एवं जनसभाओं में मूलत: दो विषयों का वर्णन रहा है। प्रथम, मुसलमानों के बर्बर अत्याचारों का वर्णन और मुगल शासकों की असहिष्णुता का आख्यान।  दूसरा, हिंदू एकता।
हिंदुत्ववादी अपने नेतृत्व को ‘नार्मल’ और विपक्ष को ‘एबनार्मल’ कहते हैं। वे आर्थिक कठिनाइयों से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘हिंदू एकता’ एवं ‘हिंदू गौरव’ को स्थान देते हैं। ‘हिंदू’ को वे रचनात्मक मानते हैं। यह भी बताते हैं कि हिंदुओं की परंपरा में रचनात्मक भूमिका रही है। मुसलमानों की विध्वसंक भूमिका रही है। हिंदू ‘सहिष्णु’ और मुसलमान ‘असहिष्णु’ हैं। हिटलर ने ‘नई जीवन शैली’ की बात की थी। हिंदू सांप्रदायिक ताकतें भी नई हिंदू जीवन पद्धति की वकालत करती हैं।
   सांप्रदायिक माध्यम रणनीति का यह मुख्य तत्व है कि समाचार, उसकी संरचना एवं कथ्य की प्रस्तुति इस तरह की जाए जिससे भय, असुरक्षा और संवैधानिक अवमानना के भाव की अभिव्यक्ति हो। साथ ही, पाठकों श्रोताओं को वह धार्मिक इकाई के रूप में देते हैं। इस रणनीति को पांचजन्य, आर्गेनाइजर के किसी भी अंक और उनके नेताओं के मीडिया बयानों में देसकते हैं, और जो पत्र-पत्रिकाएं इन पत्रों पर निर्भर हैं या इनका प्रभाव ग्रहण करती हैं उनमें भी यह दृष्टिकोण व्यापक रूप में प्रसारित होता रहा है।