शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

मुक्‍ति‍बोध जन्‍मदि‍न नेट सप्‍ताह : ऐ इंसानो,ओस न चाटो


छायावादोत्तर प्रगतिशील कविता की एक परम्परा केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन और त्रिलोचन की है तो दूसरी परम्परा के वाहक हैं मुक्तिबोध . बीसवीं सदी की हिंदी कविता का सबसे बेचैन,सबसे तड़पता हुआ और सबसे ईमानदार स्वर हैं गजानन माधव मुक्तिबोध . मुक्तिबोध की कविता जटिल है . और उसकी जटिलता के कारण है . भगवान सिंह ने उनकी कविता की जटिलता का बयान कुछ इस तरह किया है,”वे सरस नहीं हैं सुखद नहीं हैं ।वे हमें झकझोर देती हैं,गुदगुदाती नहीं । वे मात्र अर्थग्रहण की मांग नहीं करतीं, आचरण की भी मांग करती हैं ।” तारसप्तक में मुक्तिबोध ने स्वयं कहा है,”ये मेरी कविताएं अपना पथ ढूंढने वाले बेचैन मन की अभिव्यक्ति हैं । उनका सत्य और मूल्य उसी जीवन-स्थिति में छिपा है .”
’ब्रह्मराक्षस’ और ’अंधेरे में’ वे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे ’टिण्टर्न ऐबी’ और ’इम्मॉर्टलिटी ओड’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल राग’ और ’वनवेला’ को पढ़ कर निराला को पहचाना जा सकता है… वैसे ही इन दो कविताओं को पढ़ कर मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व को समझा जा सकता है .
पर आज मैं एक विशेष प्रयोजन से उनकी दो छोटी छंदोबद्ध कविताएं आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहूंगा . कुछ  माह पहले पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक कविनुमा तुक्कड़ गीतकार ने अपने एक लेख में मुक्तिबोध की कविताओं पर एक अभद्र टिप्पणी की थी . मुक्तिबोध की ये कविताएं उस टिप्पणी का रचनात्मक जवाब हैं :
॥1॥
ऐ इंसानो,ओस न चाटो !
आंधी के झूले पर झूलो !
आग बबूला बनकर फूलो !
कुरबानी करने को झूमो !
लाल सबेरे का मुंह चूमो !
ऐ इन्सानो,ओस न चाटो !
अपने हाथों पर्वत काटो !
पथ की नदियां खींच निकालो !
जीवन पीकर प्यास बुझा लो !
रोटी तुमको राम न देगा !
वेद तुम्हारा काम न देगा !
जो रोटी का युद्ध करेगा !
वह रोटी को आप वरेगा !
॥2॥
नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा
तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाण की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।
तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपित तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।
सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित, जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।
हे रहस्यमय !  ध्वंस-महाप्रभु, ओ ! जीवन के तेज सनातन
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जन
हम घुटने पर, नाश-देवता !  बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख, नाप तीन जग तू असीम बन ।
मुक्तिबोध आज होते तो  बानबे वर्ष के होते .  नहीं हैं तो एक तरह से अच्छा ही है . वे होते तो देश की हालत देख कर और बेचैन होते, और छटपटाते . पर शायद होते तो हमसे हमारी पॉलिटिक्स पूछ रहे होते , हमारे अन्तःकरण के संक्षिप्त होते आयतन पर उलाहना दे रहे होते और  पर्वत काटने का हौसला बख्श रहे होते .  उनकी  92वीं जन्मजयंती पर उन्हें प्रणाम !
    ( लेखक प्रि‍यंकर पालीवाल सबसे पुराने  प्रगति‍शील नेट लेखक और साहि‍त्‍यकार हैं )

1 टिप्पणी:

  1. मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ पढकर तो लगता है कि उन्होंने एमर्जेंसी की भविष्यवाणी की हो!!!

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