शनिवार, 28 नवंबर 2009

सेक्‍स के प्रति‍ आधुनि‍क नजरि‍या






          
फूको का मानना है कि 'सेक्स' हमारा जीवन सत्य है। यह आधुनिक सभ्यता की आत्म-स्वीकृति का बुनियादी सिध्दान्त है। अन्तोनी गिदेन का मानना है कि आधुनिक विचारों को ऊर्जस्वित करने में मुश्किल से इससें कोई मदद मिलती है। एक अन्य विचार यह है कि सेक्स एक तरह से लत की संवृत्ति के रूप में सामने आता है।वह आधुनिक समाज में कामुक व्यवहारों को मजबूरी बना देता है। कामुक व्यवहारों की लत और अनिवार्यता के कारण ही पोर्नोग्राफी, कामुक पत्रिकाओं,फिल्मों आदि की व्यापक पैमाने पर खपत दिखाई दे रही है।
 सवाल पैदा होता है कि कामुकता के प्रति हमारा रवैयया क्या होना चाहिए ? इस संदर्भ में पहली बात यह कि कामुकता को वैविध्यमय और स्वैच्छिक होना चाहिए। कामुकता का एकायामी रूप सामाजिक तनावों को जन्म देता है। हमारे समाज में कामुक वैविध्य के प्रति सहिष्णुता होनी चाहिए। कामुकता के संदर्भ में दूसरी बात यह कि कामुकता सिर्फ शारीरिक क्रिया-व्यापार तक सीमित नहीं है , उसकी राजनीति भी होती है। समाज किस दिशा में जाएगा इसके लिए कामुकता को सही नजरिए से देखा जाए। कामुकता को व्यक्तिगत बनाया जाए,साथ ही व्यक्तिगत जीवन के मानक और मर्यादाएं भी बनायी जाएं। कामुकता के नियमन में सत्ता और वर्चस्वशाली ताकतों का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। आंतरिक लगाव की धारण को सही अर्थों में लागू किया जाए। व्यक्तिगत जीवन की आधारभूत संरचनाओं के निर्माण पर जोर दिया जाए। कामुकता के क्षेत्र में जनतंत्र की स्थापना की जाए। व्यक्तिगत जीवन का जनतांत्रिकीकरण किया जाए। कामसूत्र में कामुकता का समूचा विमर्श जनतांत्रिक या व्यक्तिगत इच्छाओं पर आधारित है। वहां सिर्फ सेक्स और काम क्रियाओं के बारे में ही सब कुछ नहीं कहा गया। बल्कि व्यक्ति की जीवनशैली के बारे में,उसकी निजता आदि के बारे में भी सुझाव दिए गए हैं। कामसूत्र में जोर- जबर्दस्ती,दण्ड ,सत्ता का दबाव, सामाजिक दबाव या पारिवारिक दबाव आदि का कहीं जिक्र नहीं है। व्यक्तिगत जीवन और कामुकता के जनतांत्रिकीकरण का यह आदिम दस्तावेज है। 
फूको ने स्त्री और कामुकता के प्रसंग में सबसे उत्तेजक पुस्तक ' हिस्ट्री ऑफ सेक्सुअलिटी' चार खण्डों में लिखी। यह किताब तीन खण्डों में प्रकाशि‍त है, इस किताब का चौथा खण्ड अप्रकाशि‍त है। फूको का मानना था कि उसके मरने के बाद उसकी अप्रकाशि‍त रचना प्रकाशि‍  न की जाए। इस किताब के तीन खण्ड फूको के सन्  1984 में मरने के पहले प्रकाशि‍त हो चुके थे। इसका सबसे चर्चित पहला खण्ड 'इण्ट्रोडक्' शीर्षक से फ्रांस में 1976 में आया और उसका अंग्रेजी अनुवाद 1977 में छपा। इस खण्ड में विगत दो सौ वर्षों में सेक्सुअलिटी के साथ पावर के अन्तस्संबंध की विस्तार से समीक्षा करते हुए 'वायो पावर' के उदय का विश्‍लेषण किया गया है। बाद में दूसरा खण्ड 'यूज ऑफ प्लेजर' और तीसरा खण्ड 'द केयर ऑफ सेल्फ' के नाम से प्रकाशि‍त हुआ। ये दोनों सन् 1984 में फ्रांस में प्रकाशि‍त हुए। दूसरे खण्ड का 1985और तीसरे खण्ड का  1986 में अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशि‍त हुआ।
      'दि हिस्ट्री ऑफ सेक्सुअलिटी' के प्रथम खण्ड के आरंभ में फूको ने लिखा विक्टोरियन षासन के समर्थन की कहानी आज भी वर्चस्व बनाए हुए है।साम्राज्य की मिथ्या लज्जाशीलता ने धैर्य, मौन और छद्म सेक्सुअलिटी (कामुकता) का अपहरण कर लिया। सत्रहवीं षताब्दी में शुरू हुई स्पष्‍टवादिता को आज भी सामान्य तौर पर देखा जा सकता है। कामुक कार्यकलापों को अब बमुष्किल गुप्त रखा जा सकता था। शब्दों को धारण किए बिना बोला जा सकता है।चीजों को छिपाए बगैर प्रस्तुत किया जा सकता था। इस दौर में एक तरफ अवैध के प्रति चिरपरिचित सहिष्‍णुता है।दूसरी ओर संहिता हमारे असभ्य रूपों का नियमन कर रही है। इसकी अनुपस्थिति में अशालीनता पूरी तरह प्रत्यक्ष हो जाती है । इस दौर में प्रत्यक्ष भाव-भंगिमाओं ,लज्जाहीन विमर्शों और खुले अतिक्रमण के जरिए शरीर विज्ञान को दिखाया गया और इच्छाशक्ति के साथ सम्मिश्रित कर दिया गया। यह जानते हुए भी कि बच्चे इसे देखकर बड़ों की हंसी उडाएंगे,यह वह समय था जब षरीर को स्वयं प्रदर्षन करना था।
         इसके कुछ ही अर्से बाद विक्टोरियन बुर्जुआजी के इकसार दौर की शुरूआत होती है। कामुकता को सचेत रूप से घर में बंदी बना लिया गया। प्रेम को घर में रहने वाले परिवार के कब्जे में दे दिया गया ,उसे प्रजनन जैसे गंभीर काम में लगा दिया गया। सेक्स के विय में चुप्पी आम नियम हो गयी। वैध युगल ही सृजन के नियम बनाने लगे । युगल को मॉडल बना दिया गया। सत्य की रक्षा ,नियमों को लागू करने और गोपनीयता की रक्षा और बोलने का अधिकार उन्हें ही दे दिया गया। कामुकता का एक ही रूप स्थिर कर दिया गया और उसे प्रत्येक व्यक्ति के घर में स्थापित कर दिया गया। यह अभिभावकों के यनकक्ष में उपयोगितावादी और उर्वर था। अन्यत्र अस्पष्‍ट था। एक रीर को दूसरे रीर के स्पर्श से दूर रखने और वाचिक कथन में  सभ्यता से पे आने की हिदायत जारी कर दी गई। तांकझांक करने को असामान्य व्यवहार कहा गया। यदि ऐसा व्यवहार निरंतर दिखाई देता था तो उसे दण्डनीय अपराध बना दिया गया। यह नहीं कह सकते कि उस समय कुछ भी व्यवस्थित नहीं था। पीढियों के हिसाब से पाबंदियां और संरक्षण की व्यवस्था कर दी गई । अब कोई सुननेवाला नहीं था। अगर कोई कुछ कहना चाहता था तो उसे खदेड़ दिया जाता,वंचित किया जाता और चुप करा दिया जाता । कामुकता के बारे में ऐसा नहीं था कि वह इससे पहले मौजूद नहीं थी। बल्कि यह कहना सही होगा कि उसे मौजूद रहने का अधिकार ही नहीं था। फलत: उसे अदृष्य कर दिया गया। उसका कोई भी रूप या षब्द अभिव्यक्त नहीं हो सकता था। सब जानते थे कि बच्चे सेक्स नहीं करते यही वजह थी कि उन्हें सेक्स के बारे में बात करने से रोका गया। जब कभी इसके साक्ष्य सामने आते तो हम आंख और कान बंद कर लेते या फिर छिपाते थे।
             हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आखिरकार इतनी सख्ती के साथ चुप्पी को क्यों थोपा गया ,इसके क्या परिणाम हुए ,फूको ने लिखा है इसके परिणामस्वरूप दमन की प्रवृत्ति ने लक्षण दिखाने शुरू कर दिए। दमन और पाबंदी को सुनिश्‍चि‍त बनाने के लिए कानून का सहारा लिया गया। दमन के कारण यह लगता था कि कामुकता गायब हो गई है और उसे चुप्पी का इंजेक्न लगा दिया गया है। इससे यह भी आभास मिलता था कि कामुकता अब नहीं है। इसका अर्थ है जो नहीं है उसके बारे में कुछ भी बोलने, देखने और जानने की जरूरत नहीं है। असल में यह बुर्जुआ समाज का मिथ्याचार और जड़ तर्क है। बुर्जुआजी ने दबाव में आकर चंद रियायतें दीं और अवैध कामुकता के लिए रास्ता खोल दिया गया। इसका भी तर्क था। कहनेका मतलब यह कि जो घटिया  हरकतें करना चाहते हैं वे कहीं और चले जाएं। इसके लिए जो जगह तय की गई वह उसे पुन: उत्पादन के क्षेत्र की बजाय मुनाफे के क्षेत्र के साथ  अन्तर्ग्रथित किया गया। सहिष्‍णुता के नाम पर वेश्‍यालय और मानसिक चिकित्सालय खोले गए। वेश्‍या, ग्राहक, दलाल, मनोचिकित्सक और पागल आदि का आनंद में स्थानान्तरण कर दिया गया।
( लेखक-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह )
       















2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उलझे हुए विषय पर कुछ सुलझे विचार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. लेख में दी गई जानकारी बहुत ही अच्छी लेकिन, कई शब्द बहुत कठिन है। उनके अर्थ ढूढ़ने पड़े।

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...