रविवार, 2 जनवरी 2011

उत्तर आधुनिकतावाद,नारीवाद और मार्क्स- केरॉल ए.स्टेविले-3-


मार्क्सवादी क्यों नहीं ?
उत्तर आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों की उत्पत्ति की व्याख्या करने के लिए हमें 1950 और 1960 के दशकों में पूंजीवाद की सफलताओं ( उपभोक्ता पूंजीवाद या तथाकथित समृध्द समाज के अभ्युदय) तथा 1970 और 1980 के दशकों में इसकी असफलताओं की गवेषणा करनी होगी। हम लोगों को उन दशकों में अकादमिकों की स्थितियों में आए परिवर्तनों की भी पड़ताल करनी होगी। हालांकि इन जटिल परिवर्तनों का उल्लेख करना इस लेख के दायरे से बाहर है फिर भी आज अकादमी की उन स्थितियों का वर्णन करना इतना कठिन नहीं है जिसने आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संदर्भों से अलग भाषा और 'स्थायी अस्मिता' के बौध्दिक केंद्रत्व को बढ़ावा दिया है।
बौध्दिक वामपंथ में 'अर्थशास्त्रीय' चिंताओं से मुक्त प्रवृत्तियों का पुराना इतिहास रहा है। बौध्दिक आचरण द्वारा उत्पादन संबंधी कार्य के वर्तमान विस्थापन को पूंजीवाद के अपेक्षाकृत संपन्न समयों में देखा जा सकता है, जब बहुत से लोगों को विश्वास था कि उपभोक्ता पूंजीवाद ने मजदूर वर्ग के दिलो-दिमाग को जीत लिया है। उस समय से पूंजीवाद की परिवर्तनशील संरचना, पूंजी की बढ़ी हुई गमनशीलता और 'उपभोक्ता समाज' के विकास ने इस अवधारणा को बल दिया है कि अस्मिता (आइडेंटिटी) परिवर्तनशील है जो 'जीवनशैली' और उपभोग पैटर्न (कम से कम उनके लिए जो इसका भार वहन कर सकते हैं) में परिवर्तनों पर निर्भर करता है। अन्यों के लिए पूंजी की शक्ति तथा निर्धन और मजदूरवर्ग पर इसके क्रूर आक्रमणों ने परिवर्तन को असंभव सा बना दिया है। लेकिन यदि पूंजीवादी सफलता का वर्तमान प्रवृत्तियों से कोई सरोकार है तो आज ये प्रवृत्तियां पूंजीवादी अवनति से सुदृढ़ हुई हैं। स्वयं अकादमी पर वित्तीय दबाव से भी ये कम सुदृढ़ नहीं हुई हैं।
जैसा कि शिक्षा स्वयं ही दिन-ब-दिन अधिकाधिक वस्तूकरण और पूंजीवाद की आर्थिक अनिवार्यताओं का विषय बनती जा रही है, अत: शिक्षाविदों के लिए रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत सीमित और असुरक्षित होते जा रहे हैं। हालांकि शैक्षिक पेशा अभी भी विशेषाधिकार-प्राप्त आजीविका है लेकिन आज स्नातक छात्र जिनमें से कई छात्रों ने अकादमी से बाहर कम वेतन और असुरक्षित रोजगारों में पहले ही काम किया है, संभव है कि वे अपने आपको कंर्ज में, अस्थायी और असुरक्षित शैक्षिक कार्य में, या बेरोजगारी की अवस्था में पाएं। कनिष्ठ प्राध्यापक वर्ग को अपने आपको 'लब्ध प्रतिष्ठित' करने के लिए अत्यधिक प्रोत्साहन है। ऐसा वे अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित, यौनाकर्षक और 'आधुनिकतम' सिध्दांतों को अपना करके कर सकते हैं। जो सिध्दांत वर्ग संघर्ष की कड़वी, नीरस सच्चाइयों तथा पूंजीवादी शोषण की व्याख्या करते हैं वे पसंद नहीं किए जाते, खास तौर पर जब अन्य सिध्दांतों, मान लीजिए, मैडोना के 'प्रतिरोधी' नारीवाद से इनकी तुलना की जाती है। और जीवनशैली तथा उपभोग पर आधारित इस प्रकार का 'प्रतिरोध' भयावह हुए बिना रैडिकल प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त प्रकाशन के दबाव ने उत्पादन प्रक्रिया में तेजी ला दी है; गुणवत्ता पर मात्रा को तरजीह दी जा रही है तथा स्थानिक समसामयिक मुद्दों पर बल देने वाले कार्य, जिन्हें प्रकाशित करना अपेक्षाकृत आसान और सस्ता है, को ऐतिहासिक विवरणों या फील्डवर्क पर आधारित सावधानीपूर्वक अनुसंधान किए गए विश्लेषणात्मक कार्य की तुलना में अधिक महत्व दिया जा रहा है।
आर्थिक सच्चाइयों के इस प्रत्यक्ष अनुभव को देखते हुए आज के शिक्षाविदों, और खास तौर पर नारीवादियों को पूंजीवाद की ऐसी आलोचनात्मक व्याख्या करनी चाहिए जो विशेष रूप से अकाटय हो क्योंकि जिन अंतर्विरोधों का उन्हें सामना करना पड़ रहा है, वे अधिकाधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं। लेकिन मार्क्सवाद तथा इसकी प्रविधियों को 'सर्वसत्तात्मक' (क्योंकि यह समाज की विवेचना इसकी उत्पादन की रीतिपूंजीवाद के माध्यम से करना चाहता है), 'लघुकारक' (क्योंकि कहा जाता है कि आर्थिक संरचनाएं वैधानिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचनाओं का निर्माण करती हैं) या 'सार्वभौमकारी' (क्योंकि वर्ग चेतना का निर्माण करता है) मानकर इसे पूरी तरह खारिज कर देना अकादमी में एक प्रकार की बौध्दिक सहज बुध्दि बन गई है। मुख्य नारीवादी समालोचना यह रही है कि महिलाओं और महिला मजदूरों को इस मार्क्सवादी विवेचना से बाहर रखा गया था। ये लताड़ मारने जैसी प्रतिक्रियाएं इतनी व्यापक हो गई हैं कि 'सर्वसत्तात्मक', 'लघुकारक' या 'सार्वभौमकारी' का अर्थ क्या है इसके अब विश्लेषण की आवश्यकता नहीं है। दरअसल उन्हें केवल समझा जाता है। विद्वानों की अपेक्षा युवा पीढ़ी, जिनके विकास कालीन राजनीतिक अनुभव विभिन्न नारीवादी आंदोलनों के रहे हैं, कीमार्क्सवादोन्मुख राजनीतिक सक्रियतावाद की अस्वीकृति मार्क्सवाद में निहित पुरुषवादी तीव्रता के बारे में कई मिथकों पर आधारित है।
मार्क्सवाद की यह अस्वीकृति कितनी उचित है? आइए, हम नारीवादियों द्वारा इसके विरुध्द लगाए गए तीन मुख्य आरोपों पर नंजर डालें : यह 'लघुकारक' है; यह अति 'सार्वभौमवादी' है और यह महिला श्रमिकों पर विचार करने में असफल है। पहले आरोप पर यह आम धारणा है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद दमन की संरचनाओं को लघु करके वर्गशोषण तक सीमित कर देता है, जिससे यह लिंग-भेदवाद, नस्लवाद और समलैंगिक से भय की अनदेखी करता है या इन्हें कमतर आंकता है। यह सच है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद उत्पादन के संबंधों को समाज की बुनियाद में रखता है लेकिन ये संबंध दमनों की संरचना कैसे करते हैं, इस बारे में कुछ भी सरल या लघुकारक नहीं है। प्रत्युत लिंग-भेदवाद, नस्लवाद या समलैंगिक से भय (होमोफोबिया) जैसे दमन के किसी एक रूप की पड़ताल करने के बजाए ऐतिहासिक भौतिकवादी विवेचनाएं यह छानबीन करती हैं कि ये सभी महिलाओं और पुरुषों के जीवन के विकल्पों के निर्धारण में वर्ग प्रभुत्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तंत्र में किस प्रकार कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए न्यूयार्क शहर की महिला स्वेटशॉप मजदूर मध्य वर्ग की महिलाओं से अलग किस्म के लिंग-भेदभाव और नस्लवाद का अनुभव करती हैं। उनकी यह अनुभूति मध्यवर्गीय महिलाओं की अनुभूति से गुणात्मक और परिमाणात्मक रूप से अलग होती है। निर्धन अफ्रीकी-अमरीकी युवतियों पर लागू किया जाने वाला नस्लवाद अलग संदर्भ में होता है और अकादमी में अफ्रीकी-अमरीकी महिलाओं के साथ किया जाने वाला नस्लीय भेदभाव अलग प्रकार का। यहां यह दावा करना नहीं है कि दमन के ये दूसरे रूप मौजूद नहीं हैं या ये महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि जिस भौतिक संदर्भ और ऐतिहासिक ढांचे में ये दमन होते हैं, उनके भीतर इन दोनों रूपों को अवस्थित करके हम उन परिवर्तनीय भेदमूलक व्यवस्थाओं को उजागर कर सकते हैं जो एक तंत्र के रूप पूंजीवाद के लिए केंद्रीय हैं।
लघुकरणवाद का यह आरोप मार्क्सवादी-विरोधी नारीवाद के खिलाफ लगाना अधिक उपयुक्त होगा। क्योंकि यद्यपि कुछ नारीवादियों को महिलाओं में तथा उनके बीच असमानताओं का सामना करना पड़ता है लेकिन उनमें से कुछ नारीवादियों ने उन असमानताओं पर सावधानी से विचार नहीं किया है जो महिलाओं और पुरुषों के बीच हैं। क्या यह कहना लघुकारक नहीं कि एक शिक्षित मध्यवर्गीय महिला के रूप में जिस दमन को स्पष्टतया मैं सहन करती हूं उसे मजदूर वर्ग के पुरुषों के दमन पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए? बहुत संभव है कि मजदूर वर्ग में कुछ पुरुष लिंग-भेदवादी हों, लेकिन 'उनके' लिंग-भेदवाद पर फोकस करने से मेरे वर्ग विशेषाधिकार को कैसे कम किया जा सकता है। साथ ही, लिंग-भेदवाद का सर्वाधिक शक्तिशाली और दमनकारी रूप पूंजीवादियों द्वारा अपनाया जाता है न कि शक्तिरहित मजदूरों द्वारा इस तथ्य को समाप्त करने में यह किस हद तक असर कर सकता है? संक्षेप में, जहां लिंग-भेदवाद, नस्लवाद और समलैंगिक से भय के अनुभवों की तीव्रता और अतिवादिता अलग-अलग वर्गों में अलग-अलग है वहीं (उत्पादन के संबंधों द्वारा निर्धारित) वर्ग काफी कठोर और अपरिवर्तनीशील हैं। उत्पादन के संबंधों और वर्ग स्थिति का महत्व नहीं है, ऐसा दावा करने के लिए आर्थिक कठिनाई से कुछ दूरी आवश्यक है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आर्थिक लघुकरणवाद के दावे प्राय: अपेक्षाकृत विशेषाधिकार वर्ग द्वारा ही जारी किए जाते हैं।
'सार्वभौमवाद के आरोप का लघुकरणवाद के आरोप के साथ गहरा संबंध है। यह आपत्ति आधुनिकता (मार्क्सवाद सहित) की समालोचना से आरंभ होती है जिसका आधार यह है कि सत्य, विवेक और न्याय की इसकी अवधारणाएं (दरअसल स्वयं इसकी मानवता की अवधारणा) मानवमात्र के बीच अनेक विभेदों के लिए अत्यधिक सार्वभौमवादी और बहुत अधिक असंवेदनशील हैं।' 'न्याय' और 'विवेक' की अवधारणाओं के पूंजीवाद के दमनकारी उपयोगों या विवेकशीलता और प्रगति के नाम पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विध्वंसकारी उपयोगों को चुनौती देने में इस समालोचना का अत्यधिक महत्व है। लेकिन, साथ ही, यह नारीवादियों के लिए कुछ गंभीर समस्याएं भी खड़ी करती है। पहली, यदि सत्य, न्याय या विवेक के कोई मानक नहीं हो सकते तो हम निर्णय या कार्रवाई के मानदंड के रूप में उनका आग्रह नहीं कर सकते। दरअसल उत्तरआधुनिक नारीवादियों सहित उत्तरआधुनिकतावादियों की प्राय: इस आधार पर आलोचना की गई है कि जिस प्रकार के मानकों को वे बड़ी ही शीघ्रता से अस्वीकार कर देते हैं उनके बिना दमन के विरोध का समर्थन करने या इसे औचित्यपूर्ण बताने का स्वयं उनके पास कोई आधार नहीं हो सकता। दूसरी, दमन के विरोध की संभावना इस पूर्वकल्पना से भी कम हो जाती है कि मानवमात्र के सामान्य हित इतने संकीर्ण और परिवर्तनशील हैं कि अति विशिष्ट और संकीर्ण किस्म के प्रतिरोध से परे कोई राजनीति असंभव है। तदनुसार लोग 'सत्ता' (अनंतिम और आकस्मिक रूप से परिभाषित) के विरुध्द केवल एक मुद्दे पर आधारित राजनीति के जरिए संघर्ष कर सकते हैं और अधिक से अधिक यह आशा की जा सकती है कि थोड़ा-थोड़ा सुधार होगा। चूंकि अब सत्ता का न तो स्थान निर्धारण किया सकता है न ही इसकी पहचान की जा सकती; 'वास्तविक' एकजुट करने वाले हित औपनिवेशिक किस्सा है, जो समान रूप से दमनकारी प्रबोधन विश्वदृष्टि (जिससे मार्क्सवाद भी संबधित है) का एक भाग है, ऐसे में एक संगठित विरोध न तो व्यवहार्य है न ही वांछनीय। क्रांति की तो बात ही छोड़िए राजनीति अब विमर्शों के बीच एक वर्चस्व की लड़ाई तक सीमित हो गई है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरुध्द तीसरा आरोप कि इसने महिला मजदूरों को अपने विश्लेषण से बाहर रखा है, हमेशा से वाद-विवाद का विषय रहा है।3 यह सच हो सकता है कि उत्पादन की रीति की पुराशास्त्रीय मार्क्सवादी विवेचना में महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम को सिलसिलेवार ढंग से शामिल नहीं किया गया हो (हालांकि मार्क्स और एंगेल्स दोनों श्रम के लैंगिक विभाजन की चर्चा करते हैं)। 1970 के दशक के बाद से इस अवधारणा में विशेष रूप से मानव विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में मार्क्सवादी संशोधन किए गएहैं। बल्कि, जहां प्रति-तत्ववादी नारीवादियों ने लिंग की और अधिक विवेचना के लिए उत्तर-संरचनावादी सिध्दांतों को अपनाने तथा संशोधन करने (कि या तो लिंग संबंधी विवेचना की उपेक्षा करो या लिंग-भेदवादी रूप में इसकी गहन व्याख्या करो) में शीघ्रता दिखाई है, वहीं ऐसा प्रतीत होता है कि इस विलोपन के आधार पर अस्वीकृति के लिए केवल मार्क्सवाद को चुन लिया गया है।
जो भी हो, समयुगीन पूंजीवाद के विकास ने कुछ हद तक इस प्रश्न को विवादास्पद बना दिया है। सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों के बीच बढ़ती हुई अस्पष्टता, पूर्ववर्ती अवैतनिक महिला श्रम (बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों की परवरिश, रसोई सफाई आदि) का अधिकाधिक वस्तूकरण और श्रम शक्ति में मध्य वर्ग की महिलाओं का बड़ी संख्या में प्रवेश से महिलाओं की स्थितियों का निर्धारण अपेक्षया अधिक स्पष्ट रूप से अधिक मार्क्सवादी अर्थ में उत्पादन के संबंधों द्वारा होता है। महिलाओं की स्थिति की व्याख्या करने में उत्पादन के संबंधों को ध्यान में नहीं रखने के कारण गैर-मार्क्सवादी नारीवाद लिंगभेद की सर्वाधिक अनदेखी करने वाले मार्क्सवाद से भी अधिक अपर्याप्त दिखने लगा है।



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