वैज्ञानिकचेतना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
वैज्ञानिकचेतना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 10 मई 2016

धर्म और कार्ल मार्क्स


                अनेक लोग हैं जो कार्ल मार्क्स के धर्म संबंधी विचारों को विकृत रूप में व्याख्यायित करते हैं। वे मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं को गलत देखते हैं फिर सभी मार्क्सवादियों पर हमला आंरंभ कर देते हैं। सवाल यह है क्या मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं से धर्म की कोई सही समझ बनती है ?क्या दुनिया में मार्क्सवादी धर्म के बारे में एक ही तरह सोचते हैं ॽ
कार्ल मार्क्स ने अपनी धर्म संबंधी मान्यताओं का विकास हेगेल की न्याय संबंधी मान्यताओं के मूल्यांकन के क्रम में किया था। मार्क्स ने लिखा ,´धार्मिक व्यथा, एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों है। धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन संसार का हृदय है, ठीक उसी तरह जैसे वह भावविहीन परिस्थितियों की भावना है। वह जनता के लिए अफीम है। जनता के प्रातिभासिक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है उसके वास्तविक सुख की माँग करना।मौजूदा हालात के संबंध में भ्रमों का परित्याग करने की माँग उन हालात के परित्याग की माँग करती है जिनके लिए भ्रम जरूरी बन जाते हैं। अतः ,धर्म की आलोचना भ्रूण रूप में आँसुओं की घाटी, धर्म जिसका प्रभामंडल है, की आलोचना है।´ यानी धर्म के अंत की शर्त है वास्तविक सुखों की सृष्टि,जब तक वास्तविक सुख पैदा नहीं कर पाते तब तक धर्म रहेगा,आम लोगों के दुख रहेंगे और आंसू भी रहेंगे।मार्क्स ने धर्म को ´उत्पीड़ित प्राणी की आह’ के रूप में देखा। धर्म के अंत का अर्थ है मनुष्य के दुखों का अंत। इस अर्थ में धर्म और दुख का गहरा संबंध है।

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा है, "अधार्मिक आलोचना का आधार हैः मनुष्य धर्म की रचना करता है, धर्म मनुष्य की रचना नहीं करता है।धर्म मनुष्य की स्व-चेतनता और स्व-प्रतिष्ठा है,ऐसे मनुष्य की जो अभी तक अपने आपको जान नहीं पाया है, या फिर फिर से भटक गया है।लेकिन मनुष्य जिसने इस संसार से बाहर पड़ाव डाल रखा हो,कोई अमूर्त प्राणी नहीं है। मनुष्य तो मनुष्य का संसार,राज्य और समाज है।"

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा- ´धर्म, संसार का सामान्य सिद्धान्त है,वह इसका सर्वज्ञान गुटका है,इसकी लोकप्रचलित तर्कपद्धति है,इसका आध्यात्मिक कीर्ति शिखर है,इसकी उमंग है,इसकी नैतिक स्वीकृति है,इसका भव्य अभिनंदन है,यह संतोष और औचित्य स्थापना का सार्वभौमिक स्रोत है।यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है, यद्यपि इसके मानवीय सारतत्व में सच्ची वास्तविकता निहित नहीं है। अतः धर्म के विरूद्ध संघर्ष का मतलब है, उस संसार के विरूद्ध किया जाने वाला परोक्ष संघर्ष,धर्म जिसकी आध्यात्मिक सुरभि है।´ यानी धर्म को समग्रता में देखना चाहिए,उसे अंशों में नहीं देखना चाहिए, इसलिए मार्क्स ने धर्म को ´सर्वज्ञान गुटका ´कहा है।धर्म मात्र पूजा या ईश्वर नहीं है,बल्कि उसका एक तर्कशास्त्र है,संस्कार हैं,´यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है´, धर्म के खिलाफ लड़ने का अर्थ है उसके द्वारा रचे संसार के खिलाफ संघर्ष करना।अनेक धर्म विरोधी लोग अपनी संतई चमकाने के लिए धर्म के अंश विशेष की आलोचना करते हैं,लेकिन धर्मरचित समग्र संसार की आलोचना से कन्नी काटते हैं।इस प्रसंग में प्रेमचन्द उल्लेखनीय हैं,उन्होंने लिखा है,´ इस अनीति भरे संसार में धर्म-अधर्म का विचार गलत है, आत्मघात है और जुआ खेल कर या दूसरों के लोभ और आसक्ति से फायदा उठा कर संपत्ति खड़ी करना उतना ही बुरा या अच्छा है जितना कानूनी दाँव-पेंच से।´ भारत के देवभक्तों को प्रेमचंद के इस कथन पर गौर करना चाहिए। पढ़ें, ´देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं। उन्हें अब भी संसार धर्म और नीति पर चलता हुआ नजर आता है। वे अपने जीवन की आहुति दे कर संसार से विदा हो जाते हैं। लेकिन उन्हें देवता क्यों कहो? कायर कहो, स्वार्थी कहो, आत्मसेवी कहो। देवता वह है जो न्याय की रक्षा करे और उसके लिए प्राण दे दे। अगर वह जान कर अनजान बनता है तो धर्म से फिरता है, अगर उसकी आँखों में यह कुव्यवस्था खटकती ही नहीं तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी, देवता किसी तरह नहीं। और यहाँ देवता बनने की जरूरत भी नहीं। देवताओं ने ही भाग्य और ईश्वर और भक्ति की मिथ्याएँ फैला कर इस अनीति को अमर बनाया है। मनुष्य ने अब तक इसका अंत कर दिया होता या समाज का ही अंत कर दिया होता जो इस दशा में जिंदा रहने से कहीं अच्छा होता। नहीं, मनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा। दरिंदों के बीच में उनसे लड़ने के लिए हथियार बाँधना पड़ेगा। उनके पंजों का शिकार बनना देवतापन नहीं, जड़ता है। आज जो इतने ताल्लुकेदार और राजे हैं वह अपने पूर्वजों की लूट का ही आनंद तो उठा रहे हैं। और क्या उन्होंने वह जायदाद बेच कर पागलपन नहीं किया? पितरों को पिंडा देने के लिए गया जा कर पिंडा देना और यहाँ आ कर हजारों रुपए खर्च करना क्या जरूरी था? और रातों को मित्रों के साथ मुजरे सुनना, और नाटक-मंडली खोल कर हजारों रुपए उसमें डुबाना अनिवार्य था? वह अवश्य पागलपन था। उन्हें क्यों अपने बाल-बच्चों की चिंता नहीं हुई? अगर उन्हें मुफ्त की संपत्ति मिली और उन्होंने उड़ाया तो उनके लड़के क्यों न मुफ्त की संपत्ति भोगें? अगर वह जवानी की उमंगों को नहीं रोक सके तो उनके लड़के क्यों तपस्या करें?"

न्याय-अन्याय के सवाल आज भी प्रासंगिक हैं इस पर प्रेमचंद ने लिखा, ´कहाँ है न्याय? कहाँ है? एक गरीब आदमी किसी खेत से बालें नोच कर खा लेता है, कानून उसे सजा देता है। दूसरा अमीर आदमी दिन-दहाड़े दूसरों को लूटता है और उसे पदवी मिलती है, सम्मान मिलता है। कुछ आदमी तरह-तरह के हथियार बाँध कर आते हैं और निरीह, दुर्बल मजदूरों पर आतंक जमा कर अपना गुलाम बना लेते हैं। लगान और टैक्स और महसूल और कितने ही नामों से उसे लूटना शुरू करते हैं, और आप लंबा-लंबा वेतन उड़ाते हैं, शिकार खेलते हैं, नाचते हैं, रंग-रेलियाँ मनाते हैं। यही है ईश्वर का रचा हुआ संसार? यही न्याय है?"

कथाकार प्रेमचंद ने कुछ सवाल उठाए हैं हम उन भी विचार करें,´संसार की कुव्यवस्था क्यों हैं? कर्म और संस्कार का आश्रय ले कर वह कहीं न पहुँच पाते थे। सर्वात्मवाद से भी उनकी गुत्थी न सुलझती थी। अगर सारा विश्व एकात्म है तो फिर यह भेद क्यों है? क्यों एक आदमी जिंदगी-भर बड़ी-से-बड़ी मेहनत करके भी भूखों मरता है, और दूसरा आदमी हाथ-पाँव न हिलाने पर भी फूलों की सेज पर सोता है। यह सर्वात्म है या घोर अनात्म? बुद्धि जवाब देती – यहाँ सभी स्वाधीन हैं, सभी को अपनी शक्ति और साधना के हिसाब से उन्नति करने का अवसर है मगर शंका पूछती – सबको समान अवसर कहाँ है? बाजार लगा हुआ है। जो चाहे वहाँ से अपनी इच्छा की चीज खरीद सकता है। मगर खरीदेगा तो वही जिसके पास पैसे हैं। और जब सबके पास पैसे नहीं हैं तो सबका बराबर का अधिकार कैसे माना जाए?´

नागरिकों को धर्म मानने और न मानने की आजादी है, ये दोनों संविधान सम्मत हैं। सवाल यह है कि धर्म न मानने वालों से इतनी नाराजगी क्यों ? समाज में ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो धर्म को नहीं मानते,ईश्वर को नहीं मानते और समाज उनको सम्मान की नजर से देखता रहा है। हमारे समाज में धर्मविरोधी को कभी दण्डित नहीं किया गया। दण्ड देने का चलन अंग्रेजों के आने साथ आया है। धर्म का आधुनिकयुग में सबसे बड़ा संरक्षक साम्राज्यवाद है,कारपोरेट घराने हैं। किसान-मजदूर धर्म को नहीं मानते,क्योंकि उनके पास धार्मिक कर्मकांड के लिए समय ही नहीं होता। अधिकांश औरतें भी धर्म के कांडों में शामिल नहीं होतीं। धर्म समाज में प्रतीकात्मक भूमिका निभाता है।धर्म अमीरों का वैचारिक रक्षा कवच है।

मार्क्सवाद को नापसंद करने वालों में एक वर्ग है जो कल्पना और अज्ञानता के आधार पर नापसंद करता है,दूसरे वे हैं जो विचारधारा के आधार पर नापसंद करते हैं, तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो व्यक्तिगत कारणों से नापसंद करते हैं।मार्क्सवाद विज्ञान है,विश्वदृष्टिकोण है। यह पसंद-नापसंद से परे मुक्तिमार्ग है।भारत की सामाजिक अवस्था को हम जीतना गहराईसे जानेंगे उतनी ही गहराई में जाकर वाम संगठनों के संघर्षों की प्रासंगिकता,मार्क्सवाद की आवश्यकता को भी महसूस करेंगे।मार्क्सवाद कोई किताबी ज्ञान नहीं है,यह सामाजिक मुक्ति का विज्ञान है।जो लोग कूपमंडूक,अकर्मण्य और संकीर्ण हैं उनमें मार्क्सवाद विरोधी रूझान तेजी से पनपते हैं।विज्ञानसम्मतचेतना का जहां सामान्य वातावरण है वहां मार्क्सवाद विरोधी भावनाएं कम दिखती हैं। यह भी कह सकते हैं नॉनसेंस और मार्क्सवाद विरोध जुड़वां भाई हैं।मध्यवर्ग-निम्नमध्यवर्ग में कूपमंडूकता से लड़ने शक्ति नहीं होती जिसके कारण वह ज्यादा अंधविश्वासी-ईश्वरभक्त होता है। इसके अलावा चाटुकारिता,पुश्तैनी भ्रष्टाचार ,चरित्रहीनता और दीनता भी होती है,जिसके कारण वे सत्ता और शासकवर्गों पर आश्रित होते हैं।सवाल यह है कि मध्यवर्ग की कूपमंडूकता कैसे खत्म हो ?हमारे अनेक फेसबुक दोस्त हैं जो मार्क्सवाद का नाम सुनकर भड़कते हैं। कुछ हैं जिनकी भारतीयता ,हिन्दुत्व आदि जाग पड़ते हैं।कुछ हैं जो बिना सोचे ही लिख देते हैं,इन सभी से एक सवाल है समाज में किसका वर्चस्व हो ? किसान-मजदूर का या पूंजीपतिवर्ग ?अथवा किसी का भी वर्चस्व न हो ? तो कैसे ?

वर्ग और अस्मिता ये दो बड़े आधार हैं सामाजिक गोलबंदी के।अस्मिता का आधार मनुष्य और उसकी मुक्ति को बनाया जाए तो समस्याएं कम हो सकती हैं। सामाजिक मुक्ति के अनेक विकल्प हैं. उनमें एक मार्क्सवाद भी है।लेकिन मुक्ति का एकमात्र विकल्प मार्क्सवाद नहीं है।मात्र वर्गसंघर्ष और वर्ग के आधार पर सामाजिक एकता संभव नहीं है

जिस तरह भक्ति साहित्य को प्रेम के बिना नहीं सकते वैसे ही लोकतंत्र को धर्म को त्यागे बिना नहीं समझ सकते। धर्म तो लोकतंत्र में महाबाधा है। लोकतंत्र का कुर्बानी के बिना विकास नहीं होता और बाबा रामदेव टाइप लोग बगैर कुर्बानी के लोकतंत्र के चैम्पियन बन जाते हैं। यह संभव नहीं है।

भारत में अनेक लोग हैं जो 'भगवान की खोज' और 'भगवान निर्माण' के काम में लगे हैं। लेनिन के शब्दों में यह देवत्व पूजा की शव-कामुकता है।हेगेल ने कहा था, ´जीवन अन्तर्विरोधों से आगे बढ़ता है।जीवन्त अन्तर्विरोध ,जैसाकि प्रथम दृष्टि में दिखाई पड़ते हैं,कहीं अधिक महत्वपूर्ण,विविध एवं गहन होते हैं।´

लेनिन का मानना है ,´काम और संघर्ष किए बगैर पुस्तिकाओं से प्राप्त कम्युनिस्ट ज्ञान बेकार है ,क्योंकि यह सिद्धान्त और व्यवहार के पुराने अलगाव को जारी रखेगा तथा पूंजीवादी समाज का अत्यधिक घातक लक्षण उस दरार को बनाए रखने में मदद देता है।´लेनिन का मानना था- ''आप कम्युनिस्ट तभी हो सकते हैं जब आप मानवजाति द्वारा निर्मित सम्पूर्ण ज्ञान के खजाने से सम्पन्न हों।"मार्क्स-एगेल्स का मानना था- आदर्श की कसौटी आर्थिक वास्तविकता होती है।

मार्क्स-एंगेल्स ने इसी आदर्श को सामने रखकर अपना व्यवहारिक कार्य किया । यही वजह है कि उन्होंने पूंजीपतियों की सेवा करने की बजाय उत्पादक शक्तियों की आत्मचेतना को विकसित करने का काम किया।मार्क्स-एंगेल्स का एक साझा आदर्श था- आवश्यकता को स्वतंत्रता के अधीन बनाने,अंधी आर्थिक शक्तियों को मानव बुद्धि के अधीन बनाने का आदर्श।





रविवार, 7 दिसंबर 2014

संसद ,अंधविश्वास और वैज्ञानिकचेतना



जिस देश में प्रधानमंत्री से लेकर सांसद तक अंधविश्वासी और गँवार संतों की चरणरज को परम प्रसाद मानते हों!कूपमंडूक और जाहिल संतों को प्रेरक मानते हों!जिस देश के सांसद कूपमंडूक ज्ञान को विज्ञान मानते हों और लाखों जनता उनको जय- जय हो करके चुनती हो! गंभीरता से सोचो उस देश की संसद की चेतना कैसी होगी ?  हमने कभी लोकतंत्र के परम स्वायत्तरुप संसद और "परम मनुष्य "सांसदों के बारे में वैज्ञानिकचेतना की कसौटी पर बातें नहीं कीं।इससे अनेक क़िस्म के लोकतांत्रिक अंधविश्वास फैले हैं।
    लोकतंत्र में दो तरह के अंधविश्वास हैं, पहली कोटि में परंपरागत अंधविश्वास आते हैं, ये हमें विरासत में मिले हैं, दूसरी कोटि में पूँजीवादी अंधविश्वास आते हैं जो हमें पूँजीवाद के आगमन के साथ समाजवाद और बुर्जुआ लोकतंत्र ने दिए हैं। मज़ेदार बात है हमने कभी न तो समाजवादरचित अंधविश्वासों पर बहस की और न बुर्जुआ अंधविश्वासों पर सवाल खड़े किए । समाजवाद ने पुराने या विरासत में प्राप्त अंधविश्वासों को नष्ट किया लेकिन नए समाजवादरचित अंधविश्वासों पर किसी को सवाल ही खड़े करने नहीं दिया गया। भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने से लेकर आजतक ईश्वर की सत्ता को ख़ारिज करना अपराध घोषित कर दिया गया, मज़ेदार बात तो यह है कि हमारे यहाँ भगवान के नाम पर ज़मीन-जायदाद होती है, भगवान मुकदमे लड़ता है!ऐसे में उसके न होने की बातें करना तो "महान अपराध "ही माना जाएगा!संविधान की सौगंध सबसे बड़ा अंधविश्वास है! सांसदों का आचरण उसके अनुरूप नजर ही नहीं आता,इसके बावजूद सांसद महान हैं! कहने का आशय यह कि बुर्जुआ लोकतंत्र में पुराने और नए अंधविश्वास बने रहते हैं , विभिन्न तरीक़ों के जरिए उनको क़ानूनी और अन्य क़िस्म का संरक्षण मिला हुआ है।

        संसद को लेकर जिस तरह का पूजाभाव हमारे ज़ेहन में है वह अपने आपमें एक रुढि है, सांसदों को लेकर जो मान्यता है वह भी रुढिग्रस्त है,इससे भी बड़ी बात यह कि लोकतंत्र भी रुढियों और तथाकथित लोकतांत्रिक अंधविश्वासों से भरा हुआ है। लोकतांत्रिक अंधविश्वास न हों तो लोकतंत्र ख़त्म हो जाय। हमने कभी विचार ही नहीं किया है हमारे सांसद कितने वैज्ञानिकचेतना संपन्न है? कोई सर्वे भी नहीं किया कि जिन सांसदों को हम आज़ादी के बाद से लेकर आज तक चुनते रहे वे वैज्ञानिकचेतना से लैस हैं या नहीं? सच यह है हमारे अधिकांश सांसद अंधविश्वासी और अवैज्ञानिक चेतना से लैस हैं।इसके बावजूद संसद महान हैं!
   हमारे न्यायाधीशों में अधिकांश में वैज्ञानिकचेतना का अभाव है,इसके बावजूद न्याय महान है !न्यायाधीश महान हैं! ये धारणाएँ बताती हैं कि हमारे अंधविश्वास और रुढियों के खिलाफ कोई गंभीर जंग न तो संसद में लड़ी गयी और न संसदीय संरचनाओं में ही लड़ी गयी।
      यूपीएससी पास करने वाले अधिकतर "महानजन" भगवान के आगे भीख माँगते,रोते बिसूरते देखे गए हैं! जिस देश के क्रीम कहे जानेवाले "महानजनों" में अंधविश्वास का यह आलम हो वहाँ वैज्ञानिकचेतना की रक्षा करना , उसका प्रचार- प्रसार करना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसी अवस्था में भारत विश्वगुरु कैसे बन सकता है ?
वैज्ञानिकचेतना हासिल करना नए मनुष्य के निर्माण के आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया से जुडा है। हमने अपने देश में सतही संरचनाओं को तो यूरोप की नक़ल पर तैयार कर लिया , यूरोप जैसे कपड़े पहन लिए हैं, यूरोपीय वस्तुएँ जमा कर लीं,लेकिन नए यूरोपीय वैज्ञानिक मूल्यों को ग्रहण नहीं किया , मूल्यों की पुरानी मीनारों में बंद रहकर हम विश्वगुरु का सपना देख रहे हैं लेकिन साक्षात जीवन में घट रही अनहोनी और अमानवीय ज़िन्दगी के प्रति बेख़बर बने हुए हैं। 
     वैज्ञानिकचेतना की सबसे बड़ी खूबी है कि हम अमानवीय मूल्यों और ऐसी चीजों को न मानें जिनको यथार्थ में रेशनल तर्क की कसौटी पर परख न सकें।हमारे वैज्ञानिक सोच का आलम यह है कि हमने सवाल खड़े करने बंद कर दिए हैं!" हाँ जी-हाँ जी कहना उसी गाँव में रहना", की मनोदशा ने पुरानी और नई रुढियों और अंधविश्वासों के प्रति हमें गूँगा बना दिया है। वैज्ञानिकचेतना हमने गूंगेपन से मुक्त करती है।" हाँ जी" के गुलामबोध से मुक्त करती है ।सोचो क्या गूंगाभारत विश्वगुरु बन सकता है ?

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...