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सोमवार, 14 मार्च 2016

ममता पर संकट के बादल छाए

      मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस बात का श्रेय जाता है उन्होंने पश्चिम बंगाल से हमेशा के लिए समाजवाद और उससे जुड़े राजनीतिक स्टीरियोटाइप को बड़े कौशल के साथ विदा कर दिया है।आगामी विधानसभा चुनाव में    वामफ्रंट की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि आम जनता को किस तरह राजनीतिक विमर्श में शामिल किया जाए। सबसे सचेत राज्य के रूप में चिर-परिचित इस राज्य की आज सबसे बड़ी त्रासदी है आम जनता का राजनीतिकतौर पर तटस्थ या अन्यमनस्क हो जाना ।एक जमाना था जब हर विषय पर पश्चिम बंगाल के नागरिक में तेज प्रतिक्रिया व्यक्त होती थी,लेकिन विगत पांच साल में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि आम जनता के अंदर राजनीतिक सचेतनता का माहौल पूरी तरह नष्ट हो गया है। पहले विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले से ही राजनीतिक गहमागहमी शुरू हो जाती थी,लेकिन इन दिनों राजनीतिक सन्नाटा पसरा हुआ है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पांच साल पहले ´अंध-वाम विरोध´ के आधार पर बड़े पैमाने पर वोट मिला था,इसका विगत पांच सालों में ममता ने सुनियोजित ढ़ंग से लाभ उठाया है।उसने बड़े ही कौशल के साथ वामदलों के सांगठनिक ढ़ांचे को तोड़ा,स्थानीय वाम इकाईयों को अप्रभावी बनाया,इसके लिए वाम कार्यकर्ताओं पर शारीरिक हमले से लेकर बहलाने फुसलाने तक सभी तरकीबें इस्तेमाल कीं,शहर से लेकर गांवों तक तृणमूल कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे को विस्तार दिया,खासकर मध्यवर्ग के विभिन्न पेशेवर तबकों में कार्यरत विभिन्न वाम मजदूर संगठनों को निष्प्रभावी बनाया,संघर्ष की राजनीति की बजाय सुविधावाद और अवसरवाद की राजनीति को प्रमुखता दी। फलतःपश्चिम बंगाल के माहौल में वाम राजनीतिक गंध एकसिरे से गायब है ,इस काम में सबसे पहले ममता ने शिक्षकों को निशाना बनाया। ममता ने बिना किसी दवाब के शिक्षकों को वाम राजनीतिक संगठनों से विमुख कर दिया।उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में शिक्षक समुदाय सबसे प्रभावशाली सचेतन राजनीतिक समुदाय है,विगत पांच सालों में प्राइमरी से लेकर कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर तक अधिकांश शिक्षकों को वाम विचारधारा के संगठनों से बाहर निकालने में तृणमूल कांग्रेस सफल रही है। दूसरी ओर ममता ने सत्ता में आने के बाद वामविरोध को छोड़ दिया। उलटे यह कहा कि उनके दल में वाम विचारधारा के लोगों का स्वागत है,इससे वाम की वैचारिक नाकेबंदी का समूचा तंत्र पूरी तरह टूट गया।इसके अलावा आम जनता को अ-राजनीतिक बनाने में समूचे राज्य में फैले क्लबतंत्र की बड़ी भूमिका है।ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के बाद से राजकोष से क्लबों को सालाना एकमुश्त राशि के भुगतान की व्यवस्था करके स्थानीय आक्रोश को नियंत्रित करने में कौशलपूर्ण ढ़ंग से सफलता हासिल कर ली।उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल के हर मुहल्ले में क्लब हैं जिनमें स्थानीय लोगों का आना-जाना रहता है, संपर्क -संबंध रहता है।स्थानीय लोग छोटी-मोटी समस्याओं के समाधान हेतु क्लब सदस्यों की मदद लेते हैं और ये क्लब स्थानीय स्तर पर ममता सरकार के स्थानीय एजेंट की तरह काम कर रहे हैं।इसने स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले असंतोष को नियंत्रित और नियमित करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है।

यह एक खुला सच है कि ममता सरकार राज्य में औद्योगिकीकरण की दिशा में कोई प्रभावशाली काम नहीं कर पायी है।इवेंट,मेला,मनोरंजन और स्थानीय स्तर पर सुविधाओं के विस्तार के काम को ममता सरकार ने प्राथमिकता दी, गांवों में विद्यार्थियों को साइकिल वितरण,गांवों के क्लबों को टीवी सैट और सालाना धनराशि का आवंटन,गरीबों के लिए मकान बनाने के लिए धन का आवंटन,मस्जिदों और मौलवियों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज आदि जनप्रिय कार्यों के जरिए ममता ने अपने सांगठनिक तंत्र का विस्तार किया,इस काम को करते हुए सचेत ढ़ंग से कांग्रेस ,माकपा और वामदलों के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं को साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति के आधार पर तोड़ा गया,यही वजह है कि विभिन्न जिलों के ग्रामीण इलाकों में वाम और कांग्रेस का सांगठनिक ढ़ांचा एकसिरे से गायब है।इसके अलावा आम गरीबों में सस्ते खाद्य वितरण की योजना को लागू करके फिलहाल आम जनता के आक्रोश को ठंड़ा रखने में ममता सरकार सफल रही है।यही वह परिदृश्य है जिसमें ममता बनर्जी दोबारा वोट हासिल करना चाहती हैं।

दूसरी ओर वामफ्रंट पूरी शक्ति लगाकर तृणमूल कांग्रेस को हराने की कोशिश में है इसके लिए उसने कांग्रेस के साथ अनौपचारिक तौर पर सीटों का समझौता भी कर लिया,वामफ्रंट का मुख्यजोर राज्य में नए सिरे से औद्योगिकीकरण पर है ,वह उन योजनाओं को नए सिरे शुरू कराने का वायदा लेकर जनता में जा रहा है जो औद्योगिक योजनाएं ममता सरकार के आने के बाद बंद हो गयीं या फिर उनके काम को ममता सरकार आगे नहीं बढ़ा पायी।खासकर सिंगूर में नैनो कार के कारखाने को पुनःशुरू करने की अभिलाषा लेकर वाममोर्चा आम जनता में जाएगा। वाममोर्चा और कांग्रेस दोनों ही राज्य की खस्ताहाल कानून और व्यवस्था , कॉलेज-वि.वि. स्तर पर बढ़ी हुई हिंसा ,सारधा आदि चिटफंड़ घोटाला कांड से जुड़े सवालों पर वोट मांगने का मन बना चुका है। इसके अलावा औरतों की सुरक्षा का सवाल भी प्रमुख है। देखना होगा तृणमूल कांग्रेस और वाम का सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर क्या रूख रहता है। क्योंकि तकरीबन साढ़े 6लाख कर्मचारियों का भविष्य इससे जुड़ा है,फिलहाल राज्य कर्मचारियों को केद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में64 प्रतिशत कम डीए मिलता है और इसे लेकर कर्मचारियों में व्यापक असंतोष है,देखना होगा यह असंतोष मतदान के दिन क्या रूख अख्तियार करता है।इसके अलावा कर्मचारियों का तकरीबन 55फीसदी धन छठे वेतन आयोग का बकाया है। यदि वाम-कांग्रेस ने इस मसले को हवा देने में सफलता हासिल कर ली तो तृणमूल कांग्रेस के दोबारा चुने जाने के मार्ग में समस्याएं खड़ी हो सकती हैं,क्योंकि राज्य कर्मचारियों के भरोसे ही चुनाव मशीनरी चलती है।



रविवार, 14 अप्रैल 2013

पश्चिम बंगाल के माफियातंत्र के सामने बौने लग रहे हैं भद्रलोकनेता

विगत शुक्रवार को प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में चांसलर और राज्य के राज्यपाल एम.के नारायणन ने छात्रों से कैम्पस में हुई तोड़फोड़ और हिंसा से छात्रों की रक्षा न कर पाने के लिए माफी मांगी। चांसलर का स्वर पीड़ा से भरा था लेकिन वे भरोसा पैदा नहीं कर पा रहे थे।कायदे से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को माफी मांगनी चाहिए लेकिन यह काम राज्यपाल से कराया गया।


प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने बुधवार को प्रतिवाद करते हुए हिंसा का ताण्डव किया ,कैम्पस में गेट का ताला तोड़कर प्रवेश किया,छात्र-छात्राओं पर हमले किए, ऐतिहासिक बेकर लैव में जाकर तोड़फोड़ की। उपकुलपति मालविका सरकार ने इस हिंसक ताण्डव को अपनी आंखों से देखा, रजिस्ट्रार ने पुलिस से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही।


उल्लेखनीय है 9 अप्रैल को दिल्ली में योजना आयोग भवन के अहाते में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके साहयोगी मंत्रियों के खिलाफ एसएफआई ने प्रदर्शन किया था वे मांग कर रहे थे सुदीप्त गुप्ता की पुलिस कस्टैडी में हुई मौत की न्यायिक जांच करायी जाय, उस समय किन्हीं कारणों से एसएफआई कार्यकर्त्ता उत्तेजित हो गए और उन्होंने ममता बनर्जी और उनके सहयोगी मंत्रियों के साथ धींगामुश्ती की,हमला किया,जिसमें राज्य के वित्तमंत्री के कपड़े फट गए और उनको सिर में चोट भी आई। यह निंदनीय घटना थी और लोकतांत्रिक प्रतिवाद की सभी घोषित प्रतिज्ञाओं का खुला उल्लंघन भी। इस घटना के समय मौके पर आंदोलनकारियों में माकपा का दिल्ली नेतृत्व मौजूद था। स्वयं माकपा के राज्यसचिव और एसएफआई के महासचिव जुलूस में मौजूद थे,इसके बाबजूद इस तरह की अशोभनीय घटना घटी। इस घटना के तत्काल बाद समूचे पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने माकपा के दफ्तरों पर हमले किए,तोड़फोड़ की,आग लगायी।


यहां पर यह उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल के वामशासन में कभी भी मुख्यमंत्री के ऊपर शारीरिक हमला नहीं किया गया,यहां तक कि दिल्ली में भी कभी ज्योति बसु या बुद्धदेव भट्टाचार्य के खिलाफ हिंसक प्रतिवाद उनके विरोधियों ने नहीं किया। जबकि वामशासन में विपक्ष के हजारों कार्यकर्ताओं की माकपा के लोगों के हाथों मौत हुई है। एसएफआई का दिल्ली में हिंसक प्रतिवाद निंदनीय है । इस प्रतिवाद से पता चलता है कि माकपा के अंदर असहिष्णुता और हिंसा की दीमक लग चुकी है। माकपा ने जल्द ही इसका समाधान नहीं खोजा तो जिस तरह हिन्दीभाषी राज्यों में माकपा अस्तित्वहीन हो गयी है कालान्तर में पश्चिम बंगाल में भी उसके अस्तित्वहीन हो जाने का खतरा है। आज स्थिति यह है कि ममता के कुशासन के बाबजूद माकपा पर जनता विश्वास नहीं करती।


9अप्रैल के दिल्लीकांड ने एक अन्य संदेश दिया है कि पश्चिम बंगाल इनदिनों अपने विलोम में जी रहा है। एक जमाना था जब बंगाली समाज शांतिप्रिय, विद्वत्तापसंद, राजनीतिक सचेतन और लोकतंत्र पसंद था। यही चेतना यहां के राजनेताओं में थी। लेकिन इनदिनों यह राज्य एकदम विलोम अवस्था में जी रहा है।


इनदिनों बंगाल का अर्थ है अशांत और असामान्य राज्य। यहां लंपट कल्चर ने सभ्य -लोकतांत्रिक संस्कृति को पदस्थ कर दिया है। नियमहीनता इस राज्य का प्रधान मूल्य है। राजनीति से लेकर प्रशासन के विभिन्न स्तरों और विभागों तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य-उद्योग और जनसेवा के क्षेत्रों तक नियमहीनता और धन वसूली ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।


वामशासन में पार्टी के आदेश पर काम होता था इनदिनों घूस के आदेश पर काम होता है। वामशासन में हिंसा थी इनदिनों अराजकता है। वामशासन में सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवादहीनता और निजी हिंसा थी इनदिनों संवादहीनता और सामाजिक हिंसा है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह के हालात बन गए हैं उसमें शांति या सामान्य स्थिति की निकट भविष्य में संभावनाएं नजर नहीं आतीं।


चौंतीस साल के वामशासन के अवसान के बाद यह माना जा रहा था कि राज्य में हिंसा ,बमबाजी, तोड़फोड़, धमकी देना,धन वसूलना आदि बंद होगा लेकिन अब यह सब स्वप्न लगता है। समूची राजनीति को उत्पाती मानसिकता ने घेर लिया है।


पश्चिम बंगाल का सामान्य फिनोमिना है उलटा चलो। उलटा चलो या उलटा करो की संस्कृति तब पैदा होती है जब कान बंद हो जाएं,आंखों से दिखाई न दे और बुद्धि का आंख-कान में संबंध खत्म हो जाय। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर विमान बसु तक सभी में उलटा चलो की संस्कृति को सहज ही देखा जा सकता है।


उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में हिंसा की संस्कृति को कांग्रेस ने रोपा,नक्सलियों ने सींचा,माकपा ने हिंसा के खेतों की रखवाली की और इसकी कई फसलें उठायीं और इनदिनों ममता सरकार उसी हिंसा की फसल के आधार पर अपने राजनीतिक कद का विस्तार करना चाहती हैं।


हिंसा के आधार पर राजनीति कद का विस्तार करने की कला का बीजवपन कांग्रेस ने 1971-72 में किया था,कालान्तर में इस फसल से राजनीतिक लाभ लेने की सभीदलों ने कोशिश की। हिंसा के आधार पर राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में कांग्रेस का यहां अस्तित्व समाप्त हो गया और अब वामदलों का जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है,कालान्तर में ममता और उनके दल को भी अप्रासंगिक होना पड़ेगा। ऐसी अवस्था में राज्य में अपराधी गिरोहों की गुटबाजी में राज्य की राजनीति में फंसकर रह जाएगी।


राजनीतिक दलों के हिंसक होने का अर्थ है माफियातंत्र की प्रतिष्ठा। लोकतंत्र में हिंसा तात्कालिक बढ़त देती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर अप्रासंगिक बना देती है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल इन दिनों भद्रलोक से निकलकर माफियालोक की ओर जा रहा है। माफिया गिरोहों के सामने माकपा से लेकर टीएमसी तक सभी बौने नजर आ रहे हैं। माफिया गिरोह जिस तरफ इच्छा होती है उधर चीजों को मोड़ रहे हैं। माफिया मानसिकता ने विगत दो दशक पहले माकपा के पार्टीतंत्र में प्रवेश किया था और आज वह पूरे समाज में छायी हुई है।आज सभी दल इसके सामने नतमस्तक हैं।

रविवार, 10 मार्च 2013

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का दिल जीतने में जुटी ममता सरकार


     
       पश्चिम बंगाल का बजट आनेवाला है और राज्य का आर्थिक संकट गहरा हो गया है।नियमानुसार कोई राज्य अधिकतम जितना रूपया उधार ले सकता है उस सीमा तक ममता सरकार उधार ले चुकी है। आज स्थिति यह है कि राज्य को यदि किन्ही कारणों से जरूरत पड़े तो बैंक से लेकर बाजार तक कोई कर्ज नहीं मिल सकता। पिछले साल अक्टूबर2012 में राज्य सरकार के कर्मचारियों आदि की तनख्बाह –पेंशन आदि देने के लिए 45दिन के लिए 4000 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। पिछले साल रिजर्व बैंक ने कर्ज के नियमों में दोबार ढ़ील देकर राज्य को 22,423करोड़ रूपये का कर्ज दिया। सन् 2012-13 के बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य की कर से होने वाली अनुमानित आय 76,943करोड़ रूपये और व्यय 83,801 करोड़ रूपये आंका गया है। यानी अनुमानित बजट घाटा 6,585करोड़ रूपये का आंका गया है। लेकिन सन् 2013-14 में यह घाटा बढ़ जाने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा राज्य पर इस साल कर्ज की रकम 2.26लाख करोड़ हो जाएगी। फलतःभारत के कर्जगीर राज्यों में उसका नाम सबसे ऊपर आ गया है। मार्च 2012 तक पश्चिम बंगाल के ऊपर 2,08,382 करोड़रूपये का कर्ज था मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए उसे सालाना 23,199 करोड़ रूपये का भुगतान करना होगा। ममता के शासन में आने के बाद कर वसूली में सुधार आया है लेकिन राज्य सरकार की फिजूलखर्ची कम नहीं हुई है। इसके अलावा छठे वेतन आयोग का राज्य कर्मचारियों का एरियर का पैसा अभी तक नहीं मिला है। इसके कारण राज्य कर्मचारियों में क्षोभ बढ़ता जा रहा है। राज्य कर्मचारियों के ऊपर सरकार का दबाव है कि अपनी वफादारी वाम यूनियनों के प्रति खत्म करें और इंटक(तृणमूल कांग्रेस) के साथ अपने को जोड़ें। इसके अलावा राज्य सरकार 'मनरेगा' योजना को क बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में लागू करने जा रही है। ममता की यह चिन्ता है कि किसी भी तरह राज्य कर्मचारियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का भरोसा हासिल किया जाय. यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आनेवाले दिनों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा संचालित  'मनरेगा' स्कीम को हथियार बनाने जा रही है। टीएमसी नेतृत्व का मानना है कि 'मनरेगा' योजना में दैनिक मजदूरी पानेवाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी बढ जाती है तो वे इसे वाम के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर सकते हैं और इसी मंशा के तहत  पश्चिम बंगाल के 'मनरेगा' योजना में काम करने वाले मजदूरों की दैनिक पगार को प्रतिदिन 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये कर देने के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने मान लिया है। 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी इस वृद्धि को ममता सरकार अपनी ओर से मजदूर हितैषी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करने जा रही है। यह पगारवृद्धि एक अप्रैल 2013 से लागू होगी।
    ममता का मानना है यदि 'मनरेगा' को ठीक से लागू कर दिया जाय और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में इसे एक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाय तो मजदूरों के बड़े हिस्से को वाममोर्चे से विमुख किया जा सकता है। अब देखना यह है कि क्या 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी बढोत्तरी से ममता के वोट बैंक में कोई इजाफा होता है या नहीं ?
      उल्लेखनीय है कि वाममोर्चे के शासन के दौरान दो बार 'मनरेगा' मजदूरों की पगार बढ़ायी गयी थी लेकिन वामशासन इस स्कीम को लागू करने में असफल रहा। ममता सरकार में पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी को यह दायित्व सौंपा गया है कि वे 'मनरेगा' योजना के जरिए ममता का जनाधार बढाएं। पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने अप्रैल2012 के बाद से 'मनरेगा' की मजदूरी बढ़ाने के लिए केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को 9 पत्र लिखे थे ,इसके पहले केन्द्र सरकार ने 'मनरेगा' मजूरी को एक अप्रैल 2012 से 130रूपये से बढ़ाकर 136 रूपये कर दिया था जिससे ममता सरकार खुश नहीं थी ,इसके बाद से राज्य के पंचायतमंत्री ने मजदूरी बढ़ाने के लिए 9पत्र लिखे। इन पत्रों के जबाव में पिछले सप्ताह केन्द्र सरकार ने उनको सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 'मनरेगा' मजदूरों की मजदूरी 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये की जाती है। इस बढोत्तरी को राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के खिलाफ दबाव की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है वहीं पर राज्य कांग्रेस अध्यक्ष ने इस तरह के किसी दबाव से साफ इंकार किया है।जबकि इस मजदूरी का कृषि मजदूरों के लिए 2011 के आधार पर निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और महंगाईभत्ते की दर से संबंध है। मजूरी कम से कम कितनी दी जाय यह तय है लेकिन अधिकतम की सीमा तय नहीं है। ममता शासन में 'मनरेगा' मजदूरी में 15रूपये की वृद्धि हुई है। लेकिन वामशासन के दौरान सन् जनवरी 2010 में 25 रूपये और जनवरी 2011 में 30रूपये की बढोत्तरी हुई थी।सामान्यतौर पर पश्चिम बंगाल में न्यूनतम दैनिक पगार 67 रूपये सन् 2005-06 में तय की गयी थी।
     उल्लेखनीय है कि 'मनरेगा' स्कीम में काम करने वाले मजदूरों को 9 राज्यों और 3 केन्द्रशासित क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल से ज्यादा मजदूरी मिलती है।

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

सत्यजित राय के सपनों का अंत


            
 पश्चिम बंगाल में विलक्षण फिनोमिना देखने में आया है। यहां पर नेता एक-दूसरे की नकल में व्यस्त हैं। राजनीति में नकल सबसे बुरी छवि बनाती है। राजनेता का अनुकरणीयभाव कभी नए की सृष्टि नहीं करता। बुरी नीतियों का तबाही मचा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस पार्टी (माकपा) से सबसे ज्यादा नफरत करती हैं व्यवहार में उसी पार्टी की गलत नीतियों का इन दिनों अनुसरण कर रही हैं। हाल ही में राज्य सरकार संचालित फिल्म लेबोरेटरी रूयायन को बंद किए जाने का ममता सरकार ने मन बना लिया है। रूपायन लेबोरेटरी का स्टूडियो  सॉल्टलेक सेक्टर -5 में है और इस स्टूडियो के पास अपना बहुत बड़ा फिल्मी जखीरा है। यह राज्य में फिल्म संपादन की एकमात्र लेबोरेटरी है। सॉल्टलेक में इसके पास 2.5 एकड़ जमीन है जिसमें एक एकड़ में लेबोरेटरी है और बाकी जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लेबोरेटरी में फिल्म संपादन की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं और तकनीक उपलब्ध है लेकिन पेशेवर लोग नहीं हैं।
     इनदिनों इस लैब में बंगाली फिल्मकार अपनी फिल्मों का संपादन कम करते हैं,ज्यादातर फिल्मकार फिल्म संपादन के लिए चेन्नई जाते हैं.वाममोर्चा शासन के अकुशल प्रबंधन ने इस लेबोरेटरी को कबाड़ बनाया। वामशासन की मंशा थी कि इसे निजीक्षेत्र के हवाले किया जाय।
   ममता सरकार आने के बाद बंगाली फिल्मकार उम्मीद कर रहे थे कि इस लेबोरेटरी को नए सिरे से संगठित किया जाएगा। लेकिन ममता बनर्जी ने भी वही रास्ता पकड़ा जो वाम मोर्चा सरकार ने पकड़ा। 
राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी के निर्देश पर इसे बंद करने का फैसला लिया जा चुका है और इसमें काम रहे सभी 49कर्मचारियों को वीआरएस देने का फैसला ले लिया गया है।
    उल्लेखनीय है कि रूपायन इस राज्य की बेहतरीन फिल्म संपादन लेबोरेटरी है .विगत बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार इस लैब को जीन्यूज को औने-पौने दामों पर बेचने का फैसला लेचुकी थी .लेकिन उस समय यहां के सभी संस्कृतिकर्मियों और फिल्मी हस्तियों के जमकर प्रतिवाद किया। फलतः वाम सरकार को फैसला बदलना पड़ा और इसे बीमार उद्योग घोषित करके पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए नए सिरे संगठित करने का फैसला लिया गया। संयोग की बात है कि जब यह फैसला लिया  गया उसके कुछ महिने बाद ममता बनर्जी की सरकार आ गई और रूयायन को नए सिरे से संगठित करने का फैसला ठंड़े बस्ते में चला गया। दो सप्ताह पहले ममता सरकार को ख्याल आया कि रूपायन लेबोरेटरी को बंद कर दिया जाय।
   रूपायन को समूचे उत्तर-पूर्वी राज्यों में श्रेष्ठतम फिल्म लेबोरेटरी माना जाता है। इसमें बंगाली ,असमिया,संथाली,उड़िया, मणिपुरी,  भोजपुरी,नागपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के संपादन के अलावा बड़े पैमाने पर डबिंग का काम भी होता रहा है। इसके अलावा बंगलादेश की फिल्मों के संपादन के काम में इस लेबोरेटरी की बड़ी भूमिका है।
   आधिकारिक तौर पर रूपायन लेबोरेटरी पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम के तहत संचालित संगठन है। पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम की आय में वामशासन काल में ही गिरावट आनी शुरू हो गई थी और इस संगठन पर कर्ज का आर्थिक बोझ बढ़ गया था। नई सरकार ने इस समस्या पर विचार ही नहीं किया और सीधे  लेबोरेटरी बंद करने का फैसला ले लिया है।
  उल्लेखनीय है ममता सरकार आने के बाद संस्कृति के क्षय की जो प्रक्रिया में तेजी आई है। सत्ता ने संस्कृति के संरक्षण के काम को त्याग दिया है।  अब संस्कृति संरक्षण के नाम पर सत्ता के संसाधनों का अपव्यय हो रहा है। जो राज्य संस्कृति संरक्षण के लिए विख्यात खा आज सांस्कृतिक अपव्यय में सर्वोपरि है।  राज्य सरकार की संस्कृति के विकास और नवनिर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं है। ममता बनर्जी संस्कृति का जितना गायन कर रही हैं उससे कई गुना ज्यादा बुनियादी क्षति कर रही हैं। वे नई नई योजनाएं घोषित कर रही हैं, शिलान्यास कर रही हैं,मेले-समारोह-उत्सव-जलसे कर रही हैं। इससे यह आभास मिलता है कि ममता की संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है लेकिन इसके ठीक विपरीत वे सत्ता में बैठकर इस तरह के फैसले ले रही हैं जिससे पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक और बौद्धिकवैभव क्षतिग्रस्त हो रहा है। रूपायन के बंद करने का फैसला सत्यजित राय के सपनों का अंत है। यह लेबोरेटरी उनके सपने की उपज है।यह वही लेबोरेटरी है जिसमें सत्यजित राय की महान फिल्म पाथेर पांचाली तैयार की गयी।इस लेबोरेटरी के साथ बंगाल के अग्रणी फिल्मकारों की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह बिडम्बना है कि एक तरफ मता सरकार राज्य में फिल्म उद्योग को चंगा करने के लिए 20करोड़ रूपये खर्च करके नई फिल्म सिटी बनाने र शाहरूख खान को ब्रॉण्ड एम्बेसडर बनाकर यश कमाना चाहती है वहीं दूसरी एर रूपायन को बंद करने जा रही है। रूपायन के साथ टॉलीबुड की यादें जुड़ी हैं। रूपायन के बंद होने का अर्थ है टॉलीवुड के एक बड़े अध्याय का अवसान।
   उल्लेखनीय है कोलकाता में प्रतिवर्ष 35-40 बंगला फिल्में रिलीज होती हैं और तकरीबन 50 करोड़ रूपये का कारोबार करती हैं। राज्य में 522 सिनेमा पर्दे हैं इनमें मात्र 52 डिजिटल पर्दे हैं।राज्य में फिल्म संस्कृति के विकास के लिए राज्य सरकार को तेजी से सिनेमाघरों के नवीनीकरण के लिए कार्ययोजना बनानी चाहिए। इसके अलावा रूपायन को बंद करने का फैसला वापस लेना चाहिए।    




मंगलवार, 29 जनवरी 2013

असत्य- सत्य के भाषायी खेल में फंसी ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असत्य-सत्य के खेल में फंस गयी हैं। वे मंच पर भाषा में खेलती हैं और बाद में फंसती हैं। भाषाखेल खतरनाक होता है , अमूमन इसमें फंसने का खतरा होता है। ममता जब मंच से बोलती हैं तो यह भूल जाती हैं वे मुख्यमंत्री हैं। ममता यह भी भूल गयी हैं कि वाममोर्चे के अत्याचारों से तंग आकर लोगों ने बड़ी आशाओं के साथ उनको जिताया था और यह सोचा था कि उनके नेतृत्व में राज्य सरकार लोकतांत्रिक मान-मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करेगी। राज्य में कानून-व्यवस्था का शासन स्थापित होगा। मस्तानों-दादाओं के राज की विदाई होगी। लेकिन ममता बनर्जी की अराजक कार्यशैली ने इन सपनों को नष्ट किया है। आमलोगों में तेजी से असंतोष पैदा हुआ है। एकवर्ग अभी भी ममता से आस लगाए बैठा है कि वे अपनी कार्यशैली को सुधारें। लेकिन ममता का निरंकुश मन नियंत्रण में काम करने को तैयार नहीं लगता। 

आज से दो साल पहले ममता राज्य के लोगों का सुंदर सपना थीं और इनदिनों वे दुःस्वप्न की तरह लग रही हैं।पहले उनके भाषण को लोग टीवी पर मन लगाकर सुनते थे ,इनदिनों उनका भाषण ज्योंही टीवी पर आता है दर्शक चैनल बदल लेते हैं।

ममता भूल गयी हैं कि मुख्यमंत्री के तंत्र का सारा हिसाब विभिन्न खातों में दर्ज होता है। वे पहले तृणमूल कांग्रेसनेत्री थीं, वे स्वतंत्र थीं मनमाने काम करने के लिए। वे स्वतंत्र थीं मनमाने ढ़ंग से खर्च करने को। लेकिन मुख्यमंत्री के पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। मुख्यमंत्री के पास अबाध अधिकार हैं लेकिन इन अधिकारों के उपयोग-दुरूपयोग का हिसाब रहता है। उनकी हर गतिविधि खाते में दर्ज होती है । उनके काम का अन्य संस्थाएं मूल्यांकन करती हैं। यही वह बिन्दु है जहां ममता फंस गयी हैं। वे राज्य सरकार के कामकाज को अपने दल के कामकाज की तरह चला रही हैं। वे भूल कर रही हैं कि दल में वे सर्वेसर्वा हैं लेकिन मुख्यमंत्री के नाते वे जनता की नजरों में,विपक्ष की नजरों में ऑडीटरों की नजरों में कैद हैं।इनलोगों की सख्त जांच-परख के सामने उनके सारे भाषाखेल की परतें जल्द ही खुल जाती हैं।

ममता और उनके दल को यह भी ध्यान रखना होगा कि असत्य के पैर नहीं होते। असत्य हमेशा निराधार होता है। असत्य को यदि मीडिया या आमसभाओं में बार बार दोहराया जाएगा इससे तालियां मिल सकती हैं,कवरेज मिल सकता है लेकिन सत्य की सृष्टि नहीं हो सकती।

असत्य को यदि राजनीति में विरोधी को परास्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसमें येन-केन प्रकारेण सफलता मिल जाती है तो एक अवधि के बाद आमलोग असत्य को समझ जाते हैं और फिर से सत्य की खोज करने लगते हैं। जिस तरह असत्य का आधार नहीं होता उसी तरह सत्य कभी निराधार नहीं होता। असत्य और सत्य का यह खेल अंततःसत्य को प्रतिष्ठित करता है।

ममता सरकार में कुछ मंत्री हैं जो लगातार असभ्यभाषा का बोल रहे हैं। इनमें मदनमित्र,बेचाराम मन्ना,ज्योतिप्रिय मल्लिक आदि प्रमुख हैं। यह अभी तक रहस्य बना हुआ है कि तृणमूल कांग्रेस के अधिकांश कार्यक्रमों में इन तीनों मंत्रियो को ही क्यों बुलाया जाता है ?

ममता के असत्य प्रचार के जबाब में माकपा ने हमले तेज कर दिए हैं। ममता को यह बात समझनी ही होगी कि जनता के मन को सत्य से जीतते हैं असत्य से नहीं। वाममोर्चे के विगतशासन में आमलोग बेहद कष्ट में थे जिसके कारण वाममोर्चा बुरी तरह चुनाव हारा । लेकिन इस जीत को ठोस सत्य का आवरण पहनाने में ममता असफल रही हैं। वे भूल गयीं कि मुख्यमंत्री झूठ नहीं बोल सकता। उसकी निगरानी होती है। उस पर कई अंकुश लगे हैं। ममता अपने अंदर झांककर देखें कि उनसे कहां गलती हो रही है।

ममता ने सत्ता संभालते ही राज्य की अर्थव्यवस्था के बारे में आम लोगों से सत्य नहीं बोला। राज्य की अर्थव्यवस्था के बारे में उनके बताए सारे आंकड़े और दावे सही नहीं हैं। अर्थव्यवस्था के बारे में असत्य कहने से उनकी राजनीतिक साख ही खतरे में पड़ गयी है। उनका मानना है राज्य में अर्थसंकट है और केन्द्र उनकी मदद नहीं कर रहा। विगत वामशासन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया और सरकार के पास एक भी पैसा नहीं है।

वामशासन में लंबे समय तक वित्तमंत्री रहे असीमदास गुप्ता ने इस संदर्भ में जो तथ्य पेश किए हैं उनकी रोशनी में ममता के दावों में दम नजर नहीं आता। असीमदास गुप्ता का मानना है राज्य की सकल आय 100366 करोड़ रूपये है और सकल खर्चा है 100375 करोड़ रूपये। यह आंकड़ा ममता सरकार के वित्तमंत्री ने 2012-13 के राज्य बजट में विधानसभा में पेश किया है। इस तथ्य से ममता के दावे का खण्डन होता है।

ममता सरकार की अराजक कार्यशैली के कारण विभिन्न विकास प्रकल्पों के लिए धन का अबाध फ्लो बाधित हुआ है। मसलन् विकास प्रकल्पों के लिए जो धन पहले दिया गया है उसके खर्चे का ब्यौरा जब तक संबंधित विभाग में जमा नहीं होता तब तक अगली किश्त जारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में विकास प्रकल्प बंद पड़े हैं। ममता सरकार की अकर्मण्यता है कि विभिन्न विभागों में खर्चे का हिसाब जमा नहीं हो पा रहा । इसमें पुराने वामशासन की कोई भूमिका नहीं है। केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन की भी यही स्थिति है।

अधिकांश केन्द्रीय योजनाएं ठप्प पड़ी हैं क्योंकि आवंटित धन का राज्य सरकार इस्तेमाल ही नहीं कर पा रही है। मसलन् राज्य के पिछड़े इलाकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने 8,756 करोड़ रूपये सन् 2011 सत्र के लिए आवंटित किए थे।लेकिन राज्य सरकार इस पैसे का इस्तेमाल ही नहीं कर पायी। इस योजना के 2500 करोड़ रूपये की पहली किश्त सन् 2012 की जनवरी में आई थी लेकिन इनके खर्चे का हिसाब अभी तक केन्द्र सरकार को नहीं भेजा गया है।

असल में इस योजना के लिए आवंटित धन को राज्य सरकार समुचित ढ़ंग से खर्च करने में असफल रही है। पिछली आवंटित राशि के बिल जमा किए बगैर ममता सरकार ने अगली किश्त के तौर पर कुछ माह पहले मात्र 750 करोड़ रूपये की मांग की है। जाहिरातौर पर केन्द्र यह राशि नहीं दे सकता ,क्योंकि पहले जो धन दिया है उसका हिसाब अभी तक सरकार ने नहीं दिया है।




मंगलवार, 15 जनवरी 2013

विकास के नए सपने की तलाश में ममता


           
पन्द्रह जनवरी2013 को ममता सरकार हल्दिया में अपने माथे पर निरूद्योगीकरण के कलंक के टीके को मिटाना चाहती है और नई उद्योगनीति की घोषणा करने वाली है। इस नीति को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनदिनों बेहद परेशान हैं। उनकी मुश्किल यह है कि उनको एक साथ अपने सांस्कृतिक और माओपंथी मित्रों को खुश करना है तो दूसरी ओर पूंजीपतियों काभी दिल जीतना है।
    हल्दिया में आने वाली नई उद्योगनीति के बारे में ममता के करीबी सूत्रों का कहना है सन् 1994 की वामशासन में बनी नीति की बुनियादी धारणाओं में कोई बदलाव ममता सरकार नहीं करने जा रही है। हो सकता है कपड़ा ,चाय और जूट उद्योग के लिए कुछ नए नीतिगत प्रस्ताव घोषित कर दिए जाएं।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी बाधा यह है सत्तारूढ़ होने के बाद उनकी मीडिया में रेटिंग तेजी से गिरी है। इन दिनों मीडिया में उनकी साख सबसे नीचे है। मीडिया में साख उठे इसके लिए जरूरी है कि पूंजीपतियों का दिल जीता जाय और राज्य में पूंजी निवेश का माहौल बनाया जाय। बेकार नौजवानों में तेजी से असंतोष बढ़ रहा है। इस असंतोष के कारण राज्य में अपराधों में तेजी आई है। ममता के दल की गुटबाजी और आपसी झगड़े हर जिले में समस्या बन गए हैं और पुलिस सक्रिय हस्तक्षेप नहीं कर पा रही है। इसके कारण राज्य में पूंजीपतियों में पूंजी निवेश का माहौल नहीं बन पा रहा है।  
   पिछले दो सप्ताह में राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री और उद्योगमंत्री के साथ राज्य के व्यापारियों की कई बैठकें हुई हैं. लेकिन किसी भी बैठक में खुलकर यह बात सामने नहीं आई कि राज्य सरकार नया क्या करने जा रही है। नए को रहस्य बनाकर रखने की नीति पर राज्य के व्यापारी खुश नहीं हैं। व्यापारियों के साथ जिस तरह की ठंड़ी मीटिगें हुई हैं उनके अनुभव के आधार पर फिक्की के एक पदाधिकारी ने कहा कि ममता सरकार में उद्योग जगत को आकर्षित करने की इच्छाशक्ति का अभाव है।
     आगामी 15-17 जनवरी के बीच हल्दिया में व्यापारियों को रिझाने के लिए ‘बंगाल लीडस सम्मिट’ हो रही है। उल्लेखनीय है कि ममता सरकार को आए दो साल गुजर चुके हैं लेकिन राज्य में औद्योगिक हलचल कहीं पर भी नजर नहीं आ रही। ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के साथ जिस गति से काम करने का वायदा किया था उसकी दूर-दूर तक झलक नजर नहीं आ रही। हल्दिया सम्मेलन में 15 जनवरी को उम्मीद की जा रही है कि सरकार नई उद्योग नीति लेकर आएगी।
     ममता के करीबी सूत्रों के अनुसार राज्य के उद्योगमंत्री ने व्यापारियों के संगठनों के सामने उद्योग नीति का जो मसौदा पेश किया था। उसमें व्यापारियों के हितों की एकसिरे से उपेक्षा की गयी थी। इस मसौदे में नई नीति जैसी कोई बात नहीं रखी गयी। राज्य सरकार की बैठकों में चेम्बर ऑफ कॉमर्स और फिक्की के द्वारा दिए गए सुझावों में से अधिकांश सुझावों पर ममता सरकार का ठंडा रूख था।  नई नीति में संभावना है कि राज्य सरकार भूमिबैंक के जरिए उद्योगों के लिए जमीन लेने पर जोर दे। इसके अलावा जमीन की खरीददारी में व्यापारियों की मदद न करने की भी घोषणा आ सकती है। व्यापारियों का मानना है कि राज्य सरकार यदि दर्शक रहेगी तो राज्य में पूंजी निवेश नहीं होगा। राज्य सरकार को सक्रिय एजेंट के रूप में हस्तक्षेप का मन बनाना चाहिए।
  फिक्की के एक पदाधिकारी ने कहा कि इनदिनों जो उद्योगनीति चल रही है उसे वाममोर्चा सरकार ने 1994 में बनाया था और यह नीति राज्य के विकास में कोई खास योगदान नहीं कर पायी।
     पश्चिम बंगाल के व्यापारियों  का मानना है कि राज्य सररकार के मन में रहीं न कहीं पूंजीपति विरोधी भावनाएं गहरे जड़ें जमाए बैठी हैं। इसके कारण राज्य की ओर व्यापारीवर्ग आना नहीं चाहता। ममता की इच्छा है कि राज्य में पूंजीपति वैसे ही निवेश करें जिस तरह वे गुजरात में निवेश करते हैं। वे विकास के मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को अपना आदर्श मानती हैं। लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि पूंजीपति उन पर भरोसा नहीं करते। इसके विपरीत मोदी पर भारत के पूंजीपति भरोसा करते हैं। मोदी ने कभी भी उद्योगपति विरोधी रूख अख्तियार नहीं किया। चेम्बर ऑफ कॉमर्स के एक प्रतिनिधि का कहना है कि ममता बनर्जी यदि अपने पुराने राजनीतिक मनोभावों को बदल लेती हैं और खुलकर भूमि की खरीद में व्यापारियों की मदद करें और निचले स्तर पर दादाओं पर नियंत्रण स्थापित करती हैं तो राज्य में औद्योगिक माहौल फिर से चंगा हो सकता है। ममता बनर्जी के शासन में आने के बाद से कानून-व्यवस्था की स्थिति में गिरावट आई है। कम से कम इसे तो वे तत्काल रोकें।
   एक अन्य व्यापारी ने कहा कि ममता को एक नए यूटोपिया को खड़ा करने की जरूरत है। राज्य के औद्योगिक विकास के यूटोपिया का होना जरूरी है। पश्चिम बंगाल में किसी भी किस्म की आशाओं के संचार की संभावनाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही हैं। ऐसी स्थिति में हमें नीति से भी ज्यादा जरूरी है आशाओं के नए संकेतों की और ये संकेत राज्य सरकार के मंत्रियों के व्यवहार में झलकने चाहिए। 
     

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

राजारहाट –न्यूटाउन के प्रति ममता की बेरूखी


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धीरे धीरे समझ रही है कि उनके हाथ से समय निकलता जा रहा है। वे अपने सांगठनिक पचड़ों और अपनी पुरानी राजनीतिक मनोदशा के जंजाल से मुक्त होने के बारे में नए सिरे से संगठित होने की कोशिश कर रही हैं। इस कोशिश के क्रम में उन्होंने विगत सोमवार को शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर समिति के अफसरों ,उद्योगपतियों और भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। पश्चिम बंगाल के शहरों में शहरी सुविधाओं का व्यापक अभाव है। राज्य के शहरों से जुड़े इलाकों में सामान्य शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की न्यूनतम सुविधाओं का अभाव आज एक ठोस वास्तविकता है। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस बैठक में शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। 

भवन निर्माताओं ने मुख्यमंत्री से शहरी लैण्डशिलिंग एक्ट को तुरंत समाप्त करने की मांग रखी और कहा कि देश के अधिकांश शहरों में यह कानून खत्म किया जा चुका है लेकिन कोलकाता में अभी तक यह खत्म नहीं हुआ है। इस कानून के कारण भवन निर्माण के क्षेत्र में तेजी लाने में मुश्किलें आ रही हैं। साथ ही नए पूंजी निवेश का मार्ग भी रूका हुआ है। कई भवननिर्माताओं ने राजारहाट-न्यूटाउन में सिंडीकेट की दादागिरी का मसला भी उठाया और यह कहा कि मुख्यमंत्री के सिंडीकेट के खिलाफ बयान दिए जाने के बाबजूद सिंडीकेट की दादागिरी कम नहीं हुई है। मुख्यमंत्री ने इनलोगों की बातों को गंभीरता से सुना और तुरंत कार्रवाई का वायदा किया। उल्लेखनीय है कि यह मीटिंग हाल में सम्पन्न बंगाल विल्ड कॉन्क्लेव के अग्रिम कदम के तौर पर बुलाई गई थी।

राजारहाट न्यूटाउन के प्रसंग में कई प्रमुख तथ्य हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पहली सच्चाई यह है कि इस नए शहर में सिंडीकेट का आतंक है। सिंडीकेट के बिना कोई काम नहीं किया जा सकता। सिंडीकेट की दादागिरी ममताशासन आने के बाद पैदा नहीं हुई है बल्कि यह वामशासन के दौर में ही इसका जन्म हुआ था। सिंडीकेट दादाओं ने वामपंथी शासकों से लेकर ममता शासन तक सबको ठेंगा दिखाकर रखा है और इस इलाके में उनकी समानान्तर सत्ता है। इसका समूचे इलाके के विकास पर बुरा असर पड़ा है। ममताशासन को खासतौर पर इस संदर्भ में कुछ अप्रिय फैसले लेने होंगे। सिंडीकेट सरगनाओं के खिलाफ स्थानीय पुलिस प्रशासन को सख्ती से निबटने के आदेश दिए जाने चाहिए। साथ ही इस इलाके में सिंडीकेट के आतंक के खिलाफ राज्य के विभिन्न दलों के नेतागण सिंडीकेट दादाओं के समर्थन की नीति त्यागें।

भारत में राजारहाट एक बेहतरीन नवीन शहर के रूप में विकसित होने वाला अत्याधुनिक शहर है। इसकी शहरी योजना को सभी स्तरों पर प्रशंसा मिली है। यहां तक कि यूएनओ ने भी बेहतरीन नियोजित शहर के रूप में इसकी प्लानिंग को स्वीकृति दी है।

आज राजारहाट की स्थिति बेहद खराब है वहां बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का अभाव है। अनेकों बहुमंजिला भवन पूरे के पूरे बने खड़े हैं और उनमें कोई ऑफिस तक नहीं खुला है। यही हाल रिहायशी इमारतों का है। वहां पर जो लोग रह रहे हैं उनके पास न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। यहां तक कि डाकसेवा के पहुँचने की भी व्यवस्था नहीं है। दसियों हाउसिंग सोसायटी बनी खड़ी हैं लेकिन उनमें कोई रहने वाला नहीं है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ममता सरकार बनने के बाद अचानक इस इलाके में सिण्डीकेट का आतंक चरम पर पहुँच गया और तकरीबन समूचे इलाके में निर्माण कार्य ठप्प हो गया ।

एक अनुमान के अनुसार राजारहाट न्यूटाउन में विभिन्न कंपनियों का तकरीबन 70हजार करोड़ रूये से ज्यादा पैसा लग चुका है और सारा कमकाज जहां का तहां रूका हुआ है। कंपनियां परेशान हैं कि किस तरह इस संकट से निकला जाय। सोमवार की बैठक में बिल्डरों ने अपनी आर्थिक दुर्दशा से भी मुख्यमंत्री को अवगत कराया है। एक बिल्डर ने बताया कि मुख्यमंत्री ने हमलोगों की बातें सुनीं लेकिन कोई ठोस समाधान पेश नहीं किया। उनके सामने जब हुडको के अधिकारियों और पुलिस अफसरों की बैठक के बारे में जिक्र किया गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि वे बात करेंगी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उद्योगपतियों को बैठक करते समय एक दिक्कत आ रही है कि मुख्यमंत्री कभी भी खुले मन से मीटिंग में शामिल नहीं होतीं। वे अपने एजेण्डे के साथ आती हैं और अपनी बात कहकर चली जाती हैं। इसके कारण उद्योग जगत के साथ राज्य प्रशासन का दुतरफा संवाद नहीं बन पा रहा है। कायदे से बिल्डरों और उद्योगपतियों के साथ बातचीत में उन समस्याओं पर बातें होनी चाहिए जिन समस्याओं को वे लोग उठाते हैं। लेकिन नौकरशाही ने सारा माहौल इस कदर खराब किया हुआ है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खुलकर विचार विनिमय हो ही नहीं पा रहा है। अकेले में जो उद्योगपति उनसे मिलता है उसकी वे सुनती हैं लेकिन समूह में वे सिर्फ अपनी कहती हैं। राजारहाट-न्यूटाउन को लेकर ममता सरकार ने अब तक जिस बेरूखी का परिचय दिया है उससे उद्योग जगत परेशान है।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

ज्ञानक्रांति का फैसला कब लेंगी ममता


सपने देखना अच्छी बात है। सपनों में आनंद लेना भी अच्छी बात है लेकिन सपनों को साकार करना उससे भी अच्छी बात है। जो राजनेता सपने देखता है और सपने साकार करता है वह विज़नरी कहलाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यदि पश्चिम बंगाल का सही अर्थ में आइकॉन बनना है तो राजनेता की बजाय विज़नरी बनना होगा। कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। भाषण कम और काम ज्यादा। जलसे कम और एक्शन ज्यादा की कर्मसंस्कृति पैदा करनी होगी। राज्य में पूंजीनिवेश भाषणों से नहीं होता। कोई भी उद्योगपति भाषणों से प्रभावित होकर राज्य में पूंजी निवेश नहीं करता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके हाथ से राज्य का यथार्थ खिसकता चला जा रहा है। वे जब से मुख्यमंत्री बनी हैं उनकी आमलोगों से दूरी बढ़ी है ,राज्य की समस्याओं से भी अलगाव बढ़ा है। वे अपने दल के कॉकस और नौकरशाही के घेरे में कैद हैं। कॉकस और नौकरशाही उनको खुलेमन से न तो सोचने देती है और नहीं अपने ही लोगों पर विश्वास करने देती है। जनता और यथार्थ से अलगाव के कारण व्यापक पैमाने पर मुख्यमंत्री के मन में संदेह और अविश्वास बढ़ा है। संदेह और अविश्वास के कारण इनदिनों वे जो भी बोल रही हैं उसमें साफतौर पर फांक नजर आती है। इस फांक के दर्शन इसबार आईआईटी2012 के ग्लोबल सम्मेलन में उनके द्वारा दिए गए भाषण में भी साफ नजर आई। 

एकजमाना था ममता सबको अपील करती थी, लेकिन विगत शुक्रवार को वे जब साइंस सिटी में बोल रही थीं तो वे किसी को प्रभावित नहीं कर पा रही थीं। जानकारों की राय में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भाषण किसी भी दृष्टि से अपील नहीं कर पा रहा था। मुख्यमंत्री के राजनीतिक स्वप्न और आईआईटी के युवाओं के सपनों में कोई मेल नहीं दिख रहा था। इस मौके पर एक आईआईटी स्नातक ने कहा कि ममताजी के शासन में आने के बाद हमें इस राज्य में आईटी का कोई भविष्य ही नजर नहीं आ रहा। मैंने ऐसे ही पूछा कि उन्हें मुख्यमंत्री की अपील पर भरोसा क्यों नहीं है ? उसने कहा कि आईटी क्षेत्र कोई कुटीर उद्योग नहीं है कि कम पूंजी से आरंभ किया जाय। राज्य सरकार के पास कोई विज़न नहीं है।ममता नहीं जानती कि राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी किस तरह आए और किस तरह युवाओं को रोजगार मिले। इस युवा आईआईटी स्नातक ने कहा कि अनेक आईटी कंपनियां अपना कारोबार फिलहाल पश्चिम बंगाल में न करने का फैसला ले चुकी हैं और कई कंपनियों ने अपने कारोबार को धीरे धीरे हैदराबाद एवं बंगलौर के केन्द्रों में शिफ्ट कर दिया है। सेक्टर पांच में इन दिनों कोई नई कंपनी आने को तैयार नहीं है। विगत डेढ़ साल में एक भी नई आईटी कंपनी ने अपना काम कोलकाता में आरंभ नहीं किया है।

एक अन्य स्नातक ने गुस्से में कहा कि मुख्यमंत्री को आईटी क्षेत्र को इस राज्य में लाना है तो पहले माफिया और फिरौतीबाजों को नियंत्रित करना होगा। सॉल्टलेक के सेक्टर पांच में भाड़े की दर में आई जबर्दस्त गिरावट बताती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था एकदम चरमरा गयी है।

ममता सरकार के आने के पहले सेक्टर पांच में 65-80 रूपये प्रति वर्गफुट भाड़ा था आज यह भाड़ा गिरकर 25-30 रूपये प्रति वर्गफुट हो गया है। बड़ी बड़ी बिल्डिगें खाली पड़ी हैं उनमें कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता। भारत के महानगरों में इस तरह का सुनसान माहौल कहीं पर भी नजर नहीं आएगा जैसा सेक्टर पांच में बन रहा है। नई कंपनियों का न आना और पुरानी कंपनियों का अपने कारोबार का विस्तार न करना,इस बात का संदेश है कि कहीं न कहीं मंदी और राज्य प्रशासन की नौकरशाही के कारण आईटी क्षेत्र के उद्यमी हतोत्साहित हुए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब आईआईटी ग्लोबल सम्मेलन 2012 को सम्बोधित कर रही थीं तो युवा उद्यमी राज्य सरकार की ओर से किसी नई सुविधाओं की घोषणाओं की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन इसबार मुख्यमंत्री ने नए उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कोई नया पैकेज घोषित नहीं किया। इस सम्मेलन में 600 आईआईटी स्नातक भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में भाग ले रहे दिल्ली से आए यशवंत सिंहा ने कहा कि ममताजी को यदि राज्य में सूचना तकनीक को जनप्रिय बनाना है तो उनको सीधे स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कम्प्यूटर के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। विश्वविद्यालय शिक्षा का आधुनिकीकरण करना चाहिए,शिक्षकों और छात्रों को लैपटॉप-आईपैड आदि मुहैय्या कराने चाहिए। सूचना तकनीक के प्रति अपील पैदा करने लिए उसे दैनंदिन अकादमिक कामकाज और कम्युनिकेशन का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उच्चशिक्षा को परंपरागत शिक्षण-प्रशिक्षण की पद्धति के बाहर लाया जाय। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाय और शिक्षा के आधुनिकीकरण को प्रमुख एजेण्डा बनाया जाय। मुख्यमंत्री यदि चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल फिर से भारत के मानचित्र पर उभर कर सबसे ऊपर आए इसके लिए पहली जरूरत है राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था का उच्च कम्युनिकेशन तकनीक के साथ एकीकृत करके आधुनिकीकरण किया जाय। उच्चमाध्यमिक से लेकर एमए-पीएचडी करने वालों तक राज्य सरकार मुफ्त लैपटॉप बांटे और शिक्षकों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्शन दिए जाएं। एक अन्य आईआईटी स्नातक ने कहा कि पश्चिम बंगाल में यदि बिजली की सप्लाई सही है और बिजली कभी नहीं जाती है तो परंपरागत विश्वविद्यालयों को सूचना तकनीक के उपयोग बड़ा क्षेत्र बना देना चाहिए। अकादमिक जगत में आधुनिकशिक्षा को लाने में 19वीं सदी में बंगाल अग्रणी था ,लेकिन नए आधुनिक माहौल में पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को समुन्नत संचार तकनीक से जोड़कर ज्ञानक्रांति के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जाना चाहिए। हैदराबाद से आए पी.राजू का कहना था कि इंटरनेट कनेक्शन को केन्द्र सरकार को नाममात्र के शुल्क के आधार पर मुहैय्या कराना चाहिए। इससे इंटरनेट-कम्प्यूटर आदि के उपयोग में तेजी से इजाफा होगा।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

ममता के हस्तक्षेप के इंतजार में 35 बंगाली मजदूर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कल तक उनको किसी भी बंगाली पर हमला होने,उसकी अवैध गिरफ्तारी पर गुस्सा आता था लेकिन इनदिनों वे बदली हुई सी लग रही हैं। ममता का बंगाली जाति के प्रति प्रेम निर्विवाद है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बंगाली जाति के प्रति बेरुखी बढ़ी है। उनकी बेरुखी की जड़ें हमारी राजनीतिक संस्कृति में हैं। भारत में इनदिनों जिस तरह की वोटबैंक संस्कृति पैदा हुई है उसमें आम जनता के प्रति बेगानापन और जातीय घृणा का बढ़ना स्वाभाविक बात है। 

वोटबैंक संस्कृति दलीय मोह पैदा करती है।भाषायी,धार्मिक और जातिवादी घृणा के जरिए अपना विस्तार करती है। यह राजनीति में नकारात्मक फिनोमिना है। इसके कारण सामाजिक विभाजन तेज होता है। मन में दरारें पैदा होती हैं। प्रशासनिक संरचनाएं इसकी गिरफ्त में जल्दी आती हैं। साथ ही वंचितों और हाशिए के लोगों से प्रशासन की दूरी बढ़ती है। अनुयायियों के प्रति प्रेम में इजाफा होता है। इसके अलावा अविश्वास और संशय में तेजी से वृद्धि होती है। उत्तर- पूर्व के राज्यों में यह बीमारी पहले आई बाद में इसने अन्य राज्यों में पैर पसारने आरंभ कर दिए । हाल ही में महाराष्ट्र में यह फिनोमिना जोरों पर है। वहां पर गैर-मराठियों के प्रति विद्वेष की राजनीति को जिस तरह स्थानीय दलों ने हवा दी है उससे महाराष्ट्र का पुलिस प्रशासन पूरी तरह प्रभावित है । भारत में बोले जानेवाली भाषाओं और बोलियों के बाशिंदों के प्रति संदेह और घृणा का भाव अंततः भारत की एकता और अखण्डता को नष्ट करता है साथ ही इससे भारत के संविधान का अपमान होता है।

भारत का संविधान सभी भारतवासियों को चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों,देश में कहीं पर भी आने-जाने, व्यवसाय करने और काम करने की आजादी देता है। हमारे संविधान में भाषा,धर्म और जाति के आधार पर किए गए भेदभाव को दण्डनीय अपराध माना गया है। इसके बावजूद भारत में आए दिन भेदभाव और उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। ये खबरें किसी भी देशभक्त को परेशान कर सकती हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के मौजूदा शासकों को ये चीजें कम परेशान कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो ममता सरकार का बंगालियों के प्रति जो बेगानापन बढ़ रहा है वह समझ में आएगा। ममता सरकार का राज्य की आम जनता और उसकी समस्याओं के प्रति सजग भावबोध तेजी से क्षीण हुआ है। राज्य की आम जनता पर पुलिस के हमले बढ़े हैं,साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है।

सत्तारूढ़ होने के पहले तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और बंगाली जाति से जुड़े हर सवाल पर सक्रिय थीं लेकिन इन दिनों वे और उनके अनुयायी एकसिरे से बंगालियों पर बढ़ रहे हमलों पर चुप रहते हैं।

हाल ही में माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने एक महत्वपूर्ण मसले की ओर ध्यान खींचा है। महाराष्ट्र में 35बंगालियों को बंगला बोलने के कारण पुलिस ने बंगलादेशी का आरोप लगाकर गिरफ्तार करके कैद किया हुआ है। जबकि ये सभी मजदूर हैं और पुरूलिया के रहने वाले हैं। आश्चर्य की बात है कि माकपा सांसद के द्वारा इन बंगालियों की अवैध गिरफ्तारी का सवाल पहले उठाया गया और राज्य सरकार ने अभी तक इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा। ये लोग दो महिने से जेल में बंद हैं। ये सभी पुरूलिया जिले के बाशिंदे हैं। ये लोग काम की तलाश में महाराष्ट्र आए थे । 22 सितम्बर को इन सभी को मुंबई पुलिस के बांकुला थाना इलाके में बंगलादेशी कहकर गिरफ्तार कर लिया और तब से ये सभी जेलों में बंद हैं। माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने इस मसले पर 9 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र लिखकर जानकारी दी और उनसे फोन पर विस्तार से बातें करके हस्तक्षेप करने की अपील की । माकपा सांसद ने इस बीच महाराष्ट्र के गृहमंत्री से भी बात की है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप की अपील करते हुए उनको 31 अक्टूबर को एक पत्र लिखा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्तक्षेप का आश्वासन देते हुए वासुदेव आचार्य को 6 नवम्बर को पत्र लिखा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का कोई अभीप्सित परिणाम नहीं निकला है।

सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मसले में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? असल में ममता की विचारधारात्मक संरचना में पापुलिज्म पहले आता है। इस पापुलिज्म का दलतंत्र की मनोदशा से गहरा संबंध है। इसके अलावा ममता उनसभी विषयों को संदेह की नजर से देखती हैं जो समाधान की मांग करते हैं। ममता की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो समाधान की मांग नहीं करते। मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 35 बंगाली मजदूर अपनी रिहाई की मांग कर रहे हैं और उनकी रिहाई को दलीय स्वार्थ त्यागकर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में बंगाली मजदूरों की अवैध गिरफ्तारी के मसले को उठाने का फैसला किया है और हम उम्मीद करते हैं कि उनके प्रयासों से ये मजदूर तत्काल रिहा होंगे।

ममता का नया आनंदराग जमीन लो और कारखाना खोलो


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी राजनीति मूलतःआनंद, महोत्सव, मेले, ठेले आदि के तानेबाने में बुनी है। ममता की धारणा है आनंद है तो विकास है। आनंद का जितना व्यापक राजनीतिक उपभोग ममता सरकार ने पैदा किया है वैसा अन्य किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया। वे राजनीतिक तनावों को आनंद से धोना चाहती हैं।  9 नवम्बर को उद्योगपतियों के साथ बैठक-डिनर का आयोजन था और 10 को कोलकाता फिल्म महोत्सव का आरंभ होने जा रहा है। जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर हीरो शाहरूख खान आदि के उपस्थित रहने की संभावना है। 

ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग और संस्कृति उद्योग को चंगा करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे अपने नए बदले मिजाज में नजर आ रही हैं। वे तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। राज्य की राजनीति के स्वस्थ विकास के लिए यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री विकास के सवालों पर केन्द्रित करे। विकास के सवालों पर मुख्यमंत्री की सक्रियता आनंदमय वातावरण के जरिए दिखाई दे रही है। कुछ लोगों को इसमें असुविधा हो सकती है। लेकिन राज्य के राजनीतिक वामस्वर को मद्धिम करने के लिहाज से ममता का आनंदराग मददगार साबित हो सकता है। इससे स्थानीयस्तर पर अ-राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही राज्य सरकार विरोधी मीडिया उन्माद के सामाजिक प्रभाव को कम करने में भी मदद मिलेगी। 9 नवम्बर को उद्योगपतियों की बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आनंदराग की पूरी छाप देखने को मिली। वे स्वयं आनंद के मूड में थीं और नए बदले मिजाज में थीं। पहलीबार ऐसा हुआ कि ममता को विगतदिनों में घटित तनावपूर्ण घटनाओं से मुक्तभाव में देखा गया। ममता के बदले मिजाज से अनेक उद्योगपति अचम्भे में थे,वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार नए तेवर की ममता को कैसे समझें।

इस बैठक में मौजूद उद्योगपतियों के मन में ममता विरोधी मीडिया उन्माद का दबाव था इसके कारण वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे सवाल करने से कन्नी काट रहे थे। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य सरकार ने ठीक से मीडिया प्रबंधन नहीं किया है। राज्य में मीडिया का राज्य सरकार के प्रति आक्रामक रूख इस संदर्भ में एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हुआ है। मीडिया का राज्य की प्रत्येक घटना को उन्माद की हद तक ले जाकर प्रचारित-प्रसारित करना स्वयं में राज्य के विकास के लिए बड़ी समस्या है।उल्लेखनीय है विगत वाममोर्चा सरकार को भी इस मीडिया उन्माद का सामना करना पड़ा था और उसका राजनीतिक लाभ ममता को मिला था।

पश्चिम बंगाल के बारे में विचार करते समय यह बात सब समय ध्यान में रखी जानी चाहिए कि राज्य के खिलाफ मीडिया हमेशा से आक्रामक मूड में सक्रिय रहा है। मीडिया का आक्रामक रूख मीडिया को तो लाभ पहुँचाता है लेकिन राज्य के विकास में बाधाएं खड़ी करता है। विकासविरोधी और उद्योग विरोधी माहौल बनाने में स्थानीय मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। स्थानीय मीडिया की इस तरह की नकारात्मक भूमिका अन्य राज्यों में नजर नहीं आती। खासकर आनंदबाजार समूह की भूमिका इस संदर्भ में नकारात्मक रही है। राज्य के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी है कि मीडिया की राज्यविरोधी भूमिका के परे जाकर देखा जाय। इस प्रसंग में वामदलों ,कांग्रेस और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलकर काम करने की जरूरत है। राज्यविरोधी भूमिका निभाते हुए आनंदबाजार समूह की संपत्ति में इजाफा हुआ है। इसके अलावा राज्य का औद्योगिक और राजनीतिक वातावरण तनावपूर्ण बना है। अराजक राजनीतिक शक्तियों को इससे मदद मिली है। यही वो नया परिप्रेक्ष्य है जिसमें 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उद्योगपतियों तो सम्बोधित किया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा जो भी उद्योगपति राज्य में उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें राज्य सरकार के भूमि बैंक से सीधे जमीन मिल सकती है। जो अन्यत्र उद्योग लगाना चाहते हैं तो उनके प्रस्ताव पर विशेष तौर पर राज्य सरकार ध्यान देगी। प्रस्ताव के आधार पर भूमिबैंक के बाहर की जमीन के बारे में भी राज्य सरकार खरीद-फरोख्त में मदद कर सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं-दलालों को घूस देने से परहेज करें। मुख्यमंत्री का यह बयान राज्य के औद्योगिक विकास के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है और इससे उद्योगपतियों का मिजाज बदलेगा। अभी राज्य के पास भूमिबैंक में बड़े पैमाने पर जमीन पड़ी हुई है उस पर कोई बड़ा प्रकल्प नहीं बन पाया है। इसके अलावा जिनलोगों ने उद्योग के नाम पर वामशासन के जमाने में जमीन ली थी और अभी तक काम आरंभ नहीं किया उन सभी उद्योगपतियों को कल-कारखाने खोलने के लिए दबाव पैदा किया जाना चाहिए। पुरानी आवंटित जमीन में एक अच्छी-खासी मात्रा में ऐसी भी जमीन है जिस पर वर्षों से कोई काम आरंभ नहीं हुआ है,ऐसे लोगों से जमीन वापस लेने की प्रक्रिया आरंभ की जानी चाहिए।

राज्य के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी समस्या है स्थानीय राजनीतिक दादाओं का आतंक। इससे निबटने के लिए राज्य सरकार को खास प्रयास करने होंगे। साथ ही पुराने राजनीतिक सोच से बाहर निकलना होगा। पुराना राजनीतिक सोच पूंजीपति को वर्गशत्रु मानकर चलता है। ममता के वाम मित्रों ,खासकर माओवादियों और सांस्कृतिक मित्रों का भी यह मानना है कि पूंजीपति वर्गशत्रु हैं और उनसे ममता सरकार को दूर रहना चाहिए।

शुक्रवार के उद्योगपतियों के जमावड़े में टाटा स्टील प्रोसेसिंग एंड डिस्ट्रीब्यूसन कंपनी लिमिटेड के संदीपन चक्रवर्ती,आईटीसी के कुरूश ग्रांट ,पीयरलेस के एस.के.राय इसके अलावा उद्योगगपति हेमंत कनोरिया,एम.के.जालान ,दीपक जालान,अलका बांगुर, उज्जवल उपाध्याय,आदित्य अग्रवाल, संजीव गोयनका,संजीव गोयनका ,हर्ष नेवटिया आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा एस्सोचैम,फिक्की,बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स,सीआईआई,कलकत्ता चैम्बर ऑफ कॉमर्स आदि संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में भाग लिया। कई उद्योगपतियों से जब इस बैठक के बारे में बातें हुईं तो उनका मानना था कि ममता ने यदि स्थानीय दादाओं के आतंक और धन वसूली को नियंत्रित कर लिया तो इससे औद्योगिक वातावरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इस बैठक की खास बात यह थी कि इसमें उद्योगपतियों के पास मुख्यमंत्री से पूछने के लिए सवाल नहीं थे। उद्योगपतियों ने मुख्यमंत्री से सवाल न करके यह संदेश दिया है कि वे ममता सरकार के काम से मौटे तौर पर संतुष्ट हैं। लेकिन मीडिया में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सवाल पूछने से ममता नाराज हो सकती थीं इसलिए सवाल नहीं किए गए।








रविवार, 25 नवंबर 2012

मुस्लिम वोटबैंक की घेराबंदी में जुटी माकपा और ममता


    
      पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए माकपा और ममता दोनों ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। धार्मिकनेताओं को बहला-फुसलाकर मतदाताओं को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यहां 30 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। दूसरी ओर ममता ने राज्य सरकार की ओर से मौलवियों को सरकारी भत्ते की घोषणा करके मुस्लिम मतदाताओं को महत्वपूर्ण बना दिया है और साथ ही यह भी संदेश दिया है आगामी चुनावों में मौलवियों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। माकपा इस सबसे बेहद परेशान है। असल में ममता ने चंद वर्षों में ही मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पुख्ता पकड़ बनाकर माकपा के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है।

उल्लेखनीय है ममता को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में वामदलों को मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफलता नहीं मिली।जबकि वहां पर तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा था। पिछले दिनों माकपा महासचिव प्रकाश कारात ने यह चिन्ता व्यक्त की कि पश्चिम बंगाल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म सिर उठा रहा है और राज्य की भावी राजनीति के लिए यह अशुभ संकेत है।

तृणमूल कांग्रेस की समूची रणनीति की धुरी ये मुस्लिम वोट हैं। इन वोटों को बचाए रखने के लिए तृणमूल काग्रेस ने अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जो हमारे धर्मनिरपेक्ष शासन की राजनीति के साँचे में फिट नहीं बैठते। मसलन् मस्जिद के मौलवियों को सरकारी भत्ते की स्कीन को लागू करके तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों के दिल जीतना चाहती है और इस काम में उसे एक हद तक सफलता भी मिली है।

दूसरी ओर माकपा ने अपने कद्दावरनेता अब्दुल रज्जाक मुल्ला को इस काम में लगाया है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला को कुछ दिन पहले यह इल्हाम हुआ कि वे मुसलमान हैं और उनको हज जाना चाहिए। वे हज गए और लौट भी आए हैं और उनकी हज यात्रा के बाद सामान्यतौर पर धार्मिक हलकों में उनका सम्मान-सत्कार भी हो रहा है। एक नागरिक के नाते वे हज जा सकते हैं। लेकिन वे इसका प्रचार क्यों कर रहे हैं ? वे नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन वे इसका मीडिया में प्रचार क्यों कर रहे हैं ? एक राजनेता का धार्मिक प्रचार राजनीति में अनुदार ताकतों की मदद करता है।

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म को मानने और न मानने के लिए स्वतंत्र है। धर्म एक निजी मसला है। लेकिन जब व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्थाओं को सार्वजनिक करता है और उनका प्रचार करता है तो वह धर्म के नाम पर राजनीति करता है। धर्म के नाम पर राजनीति करने से धर्म में अनुदार तत्वों की ताकत बढ़ती है। राजनीति में धार्मिक अनुदारवाद को बल मिलता है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला के द्वारा अभी तक अपनी हज यात्रा और उसके बाद के धार्मिक कदमों को मीडिया में प्रचारित करने से वाम राजनीति को कम धार्मिक अनुदार राजनीति को ज्यादा बल मिला है।

सवाल यह है कि अब्दुल रज्जाक मुल्ला तपे-तपाए कम्युनिस्टनेता हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के इस दौर में अचानक धार्मिक पहचान का इल्हाम क्यों हुआ ? वे बार बार अपने को मुस्लिम के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं ? एक कम्युनिस्ट के लिए धर्म निजी कार्य-व्यापार है। लेकिन मुल्ला ने अपनी धार्मिक पहचान और धार्मिक कार्यकलापों का मीडिया में प्रचार करके धर्म को राजनीति से जोड़ा है जो गलत है और वाम राजनीति के उसूलों के खिलाफ है। इसके बावजूद माकपा ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया है।

धार्मिक अनुदार राजनीति कैंसर है। यह अस्मिता की राजनीति का हिस्सा है। अस्मिता की राजनीति यदि अस्मिता में बांधे रखे और अस्मिता से आगे लेजाकर सामाजिक मुक्ति में रूपान्तरित न करे तो पलटकर सामाजिक विभाजन का काम करती है। यह सभी रंगत के धर्मनिरपेक्ष और उदार विचारों का निषेध है। यह धार्मिक फंडामेंटलिज्म है।

पश्चिम बंगाल में धार्मिक अनुदार राजनीति को अभी तक पर्दे के पीछे काम करते देखा गया था। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी से बदलाव आया है और इस तरह की राजनीति को चुनाव के मैदान में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए देखा गया है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में धार्मिक अनुदार राजनीति को तकरीबन 10 फीसदी वोट मिले हैं और इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही रंगत के संगठन शामिल हैं। इतने वोट धार्मिक फंडामेंटलिस्ट संगठनों को हाल-फिलहाल के वर्षों में कभी नहीं मिले।

असल में राज्य में बढ़ रहे धार्मिक फंडामेंटलिज्म को नष्ट करने की जिम्मेदारी सभीदलों की है। इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों को साझामंच बनाकर काम करना चाहिए। खासकर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिम्मेदारी ज्यादा है कि वे धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया पर नजर रखें और इस तरह के नीतिगत कदम उठाएं जिनसे धार्मिक फंडामेंटलिज्म कमजोर हो।

धार्मिक अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के लिए धर्म और धार्मिकतंत्र की मदद नहीं ली जाय। इसके विपरीत विकासमूलक योजनाओं के बहाने अल्पसंख्यकों को मैनस्ट्रीम राजनीति के अंदर सक्रिय किया जाय।


सोमवार, 5 नवंबर 2012

उद्योगपति सम्मेलन को लेकर ममता सरकार तनाव में


आगामी 9 नवम्बर को राज्य सरकार की ओर से उद्योगपतियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की देश के प्रसिद्ध उद्योगपतियों से सामूहिक मुलाकात होगी। उद्योगपतियों के सामने पिछले साल उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा किसी भी नए प्रकल्प पर राज्य में काम आरंभ नहीं हुआ है। राज्य प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाने की बजाय दलतंत्र के आधार पर चलाया जा रहा है इससे देश के उद्योगपति परेशान हैं। उद्योगपतियों में ममता सरकार के बंद विरोधी नजरिए को लेकर सकारात्मक भाव है लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार इससे आगे जाए और स्थानीय अशांति और राजनीतिक दादागिरी को नियंत्रित करे। कई उद्योगपतियों ने यह भी कहा कि ममता सरकार का बंद विरोधी रवैय्या असल में माकपा विरोध की राजनीति से जुड़ा है। इसके पीछे कोई पॉजिटिव सोच नहीं है। जिन उद्योगपतियों से इस बीच में हमारी बातचीत हुई उनमें से अधिकांश राजनीतिक मिलिटेंसी को लेकर बेहद चिन्तित हैं। इस बीच में कई उद्योगपतियों ने निजी तौर पर राज्यप्रशासन को अपनी भावनाओं से भी अवगत कराया है। 

उद्योग जगत को उम्मीद है 9 नवम्बर को ममता सरकार कोई लोकलुभावन पैकेज लेकर आए। उद्योगपतियों की कई मांगें हैं जिनको इस मौके पर उठाए जाने की संभावना है। उनकी पहली मांग है कि स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन राजनीतिक गुण्डई पर रोक लगाए और ममता सरकार इस समस्या के प्रति कड़े रूख का इजहार करे। उद्योग जगत की दूसरी मांग है स्थानीयनेताओं की हफ्ता वसूली को तुरंत रोका जाए। तीसरी मांग है राज्य प्रशासन प्रकल्प स्वीकृति की प्रक्रिया आसान और त्वरित बनाए और चौथी मांग है कि उद्योगधंधों के लिए जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के लिए ममता बनर्जी स्वयं दिलचस्पी लें।

उल्लेखनीय है पिछले साल ममता सरकार ने उद्योगपतियों से जब मुलाकात की थी तो राज्य में जीत का माहौल था, आम उद्योगपति उम्मीदें लगाए बैठे थे कि नई सरकार शांति स्थापित करने में मदद करेगी। लेकिन ऐसा करने में सरकार असफल रही है। कई बड़ी कंपनियां राज्य छोड़कर जाने का मन बना चुकी हैं और नई कंपनियां पूंजीनिवेश के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल ग्रहण कर ली है। उल्लेखनीय है कि मिलिटेंसी और झूठ एकसाथ चलते हैं। मिलिटेंसी हमेशा झूठ का सहारा लेती है। राज्य में विगत कई सालों से इस क्षेत्र में एक नया फिनोमिना सामने आया है वह है मिलिटेंसी के नाम पर गुण्डई।

मिलिटेंसी की खूबी है कि वह हमेशा जन समस्याओं के बहाने सिर उठाती है। जनहितैषी तर्कशास्त्र ,बाहुबल और शस्त्र इसके प्रमुख उपकरण हैं। उद्योग जगत परेशान है कि हल्दिया पोर्ट ट्रस्ट की ताजा समस्या ने गुण्डई में रूपान्तरण कर लिया है। कई उद्योगपतियों ने कहा है कि मिलिटेंसी को ’सब सामान्य है’ के मुहावरे में बांधकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी साख को दांव पर लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि पहले वाम शासन में ट्रेड यूनियन मिलिटेसी के कारण पश्चिम को व्यापक स्तर महत्वपूर्ण उद्योगों से हाथ धोना पड़ा है। आम आदमी यह उम्मीद कर रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रवृत्ति को अपने शासन के दौरान पनपने नहीं देंगी। इस प्रसंग में कुछ मुख्य बातें हैं जो साफ दिखाई दे रही हैं। राज्य प्रशासन का दलतंत्र के रूप में विस्तार हुआ है। पापुलिज्म बनाए रखने के लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बस्तियों के बाशिंदों का गुण्डावाहिनी के रूप में जमकर दुरूपयोग हो रहा है।

मिलिटेंसी जब भी सिर उठाती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी सबसे पहले पंक्चर हो जाती है है। आमतौर पर ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी संबंधित उद्योग तक सीमित रहती है लेकिन मौजूदा दौर में यूनियन मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल अख्तियार कर ली है। राज्य का मौजूदा नेतृत्व खुलकर इस अपराधीकरण को संरक्षण दे रहा है। मसलन् किसी कंपनी ने मजदूरों के खिलाफ एक्शन लिया है तो मजदूर संगठनों को उसका एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए। लेकिन इस तरह का रास्ता न अपनाकर हल्दिया में गुण्डई का मार्ग पकडा गया। हल्दिया में घटना का आरंभ हुआ तब हुआ जब एचबीटी कार्गो कंपनी ने अपने यहां काम करने वाले 270 कर्मचारियों को सीधे नौकरी से निकाल दिया। इस प्रसंग में कंपनी का तर्क है कि उसने बंदरगाह के आधुनिकीकरण पर 200 करोड़ रूपये खर्च किए हैं और उसे इन कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है,साथ यह भी कहाकि कंपनी ने मजदूरों से संबंधित कानूनों का पालन करते हुए ही इन मजदूरों को नौकरी से निकाला है। स्थानीय टीएमसी सांसद ने स्थानीय स्तर प्रतिवाद का नया तरीका अपनाया और पूरे इलाके में आतंक पैदा कर दिया। कंपनी के 3 अधिकारियों का पूरे परिवार के साथ अपहरण कर लिया, बंदरगाह पर काम पर जाने वाले मजदूरों को मारा-पीटा और आतंकित किया। उल्लेखनीय बात यह है कि सत्तारूण तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाले मजदूर संगठन इंटक ने कोई आंदोलन मजदूरों की छंटनी के खिलाफ संगठित नहीं किया बल्कि सीधे कंपनी के खिलाफ गुण्डई शुरू कर दी। उद्योग जगत चाहता है कि मजदूरों और कंपनियों के बीच के विवाद आपसी बातचीत से हल हों या कानूनीमंचों पर हल हों। बाहुबलियो के जरिए इस तरह की समस्याओं के समाधान तलाशने से बचा जाय। उद्योग जगत उम्मीद कर रहा है कि ममता बनर्जी 9 नवम्बर की बैठक में मिलिटेंसी की आलोचना करेंगी और कोशिश करेंगी कि उस बैठक के पहले हल्दिया विवाद के समाधान के लिए कोई मध्यममार्ग निकल आए।


रविवार, 28 अक्टूबर 2012

सिंगूरग्रंथि और ममता की चौदह घंटे की चुप्पी


सिंगूर–माकपा-मीडिया-पूंजीपतिग्रंथि ने पश्चिम बंगाल को पंगु बना दिया है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं। राज्य के विकास और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए जरूरी है कि इन चारों ग्रंथियों से राज्य को निकाला जाय। दुर्भाग्य की बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनमें कैद हैं। ममता के मार्ग में पग-पग पर ये ग्रंथियां बाधा बनकर खड़ी हुई हैं। राज्य के मुखिया के नाते उनका इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होकर प्रशासन चलाना बेहद जरूरी है। 

पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है कि पहले वामशासन बुर्जुआग्रंथि से ग्रस्त था और उन तमाम चीजों को रोक रहा था जिनका पूंजीपतिवर्ग से संबंध है। ममता के शासन में आने पर यह लग रहा था कि राज्य प्रशासन को राजनीतिक ग्रंथियों से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि राज्य प्रशासन पहले से चली आ रही बुर्जुआग्रंथि से अभी तक मुक्त नहीं हुआ है,उलटे प्रशासन में सिंगूर-माकपा-मीडियाग्रंथि ने वायरस की तरह प्रसार कर लिया है।

प्रशासन में ग्रंथियां पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और सहज-त्वरित फैसले से रोकती हैं। ममता को यदि सही मायने में राज्य के प्रभावशाली मुखिया की भूमिका अदा करनी है तो उसे इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होना होगा। ग्रंथियां एकाकी मन और राजनीतिकदल को नकारात्मक दिशा में सक्रिय रखती हैं। ग्रंथियां हाइपर एक्टिव रखती हैं। ममता से लेकर माकपा तक सबमें यह हाइपर सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है।

हाल ही ममता की सिंगूर -मीडियाग्रंथि का नया रूप सामने आया है जो निश्चित रूप से चिंता की बात है। बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय का 23 अक्टूबर को जब आकस्मिक निधन हुआ तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे से ज्यादा समय लगा। वैसे निजी तौर पर वे इसके लिए स्वतंत्र हैं कि वे कब शोक व्यक्त करें या शोक व्यक्त न करें,लेकिन एक मुख्यमंत्री के नाते उनके पास यह स्वतंत्रता नहीं है।

राजनीतिक हलकों में ममता बनर्जी को स्वतःस्फूर्त्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले राजनेता के रूप में जाना जाता है। लेकिन सुनील गंगोपाध्याय की मृत्यु पर मुख्यमंत्री के शोकसंदेश का चौदह घंटे तक न आना स्वयं में चिन्ता की बात है,साथ ही यह राज्य प्रशासन की मनोदशा की भी अभिव्यक्ति है। चौदह घंटे बाद अचानक फेसबुक पर ममता ने शोकसंदेश पोस्ट किया।

सवाल उठता है मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुनील गंगोपाध्याय के घर जाकर शोक व्यक्त क्यों नहीं किया ? किसी संदेशवाहक के जरिए तत्काल शोकसंदेश उनके घर क्यों नहीं भेजा ? ममता इतने समय तक क्या कर रही थीं ? वे किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं ? किसी प्रशासनिक काम में घिरी हुई थीं ? उनको किसी सलाहकार ने मना किया कि शोकसंदेश मत दो या ममता ने स्वयं ही इतना समय लिया ? ममता को इन सवालों का जबाव देना होगा। सच यह है कि ममता न तो किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं और न किसी उधेडबुन में घिरी थीं।बल्कि ममता अपने ही मन में सिंगूर -मीडियाग्रंथि के आधार पर सुनील गंगोपाध्याय की मौत को देख रही थीं। उनके लिए सुनील ‘अपने’ नहीं ‘उनके’ (माकपा) लेखक थे। सच यह है सुनील गंगोपाध्याय सामान्य लेखक नहीं थे,उनको बांग्ला साहित्य के साथ बांग्ला जाति की पहचान के रूप में सारे देश में प्रतिष्ठा हासिल थी। उन्होंने 200 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। राज्य में बांग्ला भाषा आंदोलन के प्रतिष्ठाताओं में से एक थे। उनका मानना था आम बंगाली अपनी भाषा में पढ़े ,लिखे और दैनंदिन जीवन में उसका व्यवहार करे। वे बांग्ला में अंग्रेजी शब्दों के व्यवहार के विरोधी नहीं थे। उनका मानना था कि भाषा के चालू शब्द मिलते हों तो अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। सुनील गंगोपाध्याय ने जो सामाजिक-राजनीतिक स्वीकृति अर्जित की थी वह कम लेखकों को नसीब होती है। वे सबके चहेते थे। वे राज्य में नेताओं पर अंकुश का काम करते थे। उन्होंने सत्ता की निरंकुशता की हमेशा तीखी आलोचना की। वे ममता बनर्जी की नीतियों के कटु आलोचक भी थे,सिंगूर आंदोलन के समय उन्होंने वाम सरकार का साथ दिया था और ममता के आंदोलन की आलोचना की थी। ममता की सारी मुश्किलें इसी सिंगूर ग्रंथि से जुड़ी हैं।इस सिंगूरग्रंथि के कारण ही ममता को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे लगे। ममता का 14 घंटे तक चुप रहना,बाद में फेसबुक पर संदेश देना, ममता का उनके घर जाकर तत्काल दुख व्यक्त न करना और अंत में अपनी इज्जत बचाने के लिए अंतिमयात्रा में शामिल होना, बताता है कि ममता का राजनीतिक भावबोध निरंतर राज्य को पीछे ले जा रहा है।

बांग्ला टीवी चैनलों ने सुनील गंगोपाध्याय की मौत पर ममता की चुप्पी का अहर्निश प्रचार करके ममता को मजबूर किया कि वे बयान दें। वे मजबूर हुईं और उनका फेसबुक पर चौदह घंटे बाद बयान आया, कोई प्रेस रिलीज जारी न करके, शोकसंदेश को किसी के हाथों लेखक के घर न पहुँचाकर उन्होंने चुपके से फेसबुक पर पोस्ट करके अपने कर्म की इतिश्री समझ ली। लेकिन टीवी चैनल ,खासकर एबीपी आनंद टीवी चैनल शांत नहीं बैठा उसके दबाब के कारण ही ममता को सुनील गंगोपाध्याय की अंतिमयात्रा में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ममता के ये सारे एक्शन एक ही तथ्य बयां करते हैं कि ममता पर बांग्ला चैनलों का तेज दबाव है और वे मजबूर होकर वे सब काम कर रही हैं जो उनको पसंद नहीं हैं। उल्लेखनीय है 21 से 24 अक्टूबर तक बांग्ला के सभी समाचारपत्र बंद थे।राज्य में ऐसा कभी नहीं हुआ। हॉकरों ने वस्तुतःहड़ताल कर दी या उनसे हड़ताल करा दी गयी। किसी भी राज्य में वेबजह 4दिन तक अखबार बंद रहने की यह विरल घटना है। इसके पीछे कौन लोग हैं उनका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रेस की आजादी को सुनिश्चित बनाए। लेकिन हॉकरों की 4दिन की हड़ताल(जिसे वे पूजा की छुट्टी कह रहे हैं) ने ममता सरकार के मीडियाविरोधी रवैय्ये को एकसिरे उजागर कर दिया है। ममता सभी किस्म की हड़तालों पर बोलती रही हैं लेकिन प्रेस में जबरिया करायी गयी इस चार दिन व्यापी हड़ताल पर वे चुप रहीं। हो सकता है ममता के सलाहकार मानते हों कि कम से कम चार तक दीदी को मानसिक शांति दी जाय।लेकिन मीडियाशांत नहीं था। सुनील गंगोपाध्याय की मौत ने समूचे मीडिया को उद्वेलित रखा साथ ही ममता को भी।




















रविवार, 30 सितंबर 2012

व्यापारियों से सीधे मुठभेड़ के मूड़ में ममता


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विकास के सपने नहीं आते। उनका खुदरा व्यापार में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विरोध उनकी नई मनोदशा की अभिव्यक्ति है। वे इन दिनों विकास की नहीं विकास के विरोध की भाषा बोल रही हैं। विकास के नाम पर जनता का असीम प्यार और समर्थन पाने के बाद ममता का विकास की बजाय बागी की भाषा में बोलना उस असंतुलन को व्यक्त करता है जो पश्चिम बंगाल में पहले से मौजूद है। लोकतंत्र में बागी और विकास में सीधे टकराव है। 

ममता की खूबी है कि उन्होंने वाममोर्चे की नाकामियों और जनविरोधी हरकतों का प्रतिवाद करते हुए बागी और विकास के बीच नकली संतुलन बनाकर जो विभ्रम पैदा किया था वह विगत पांच सालों में खूब चला। लेकिन अब यह विभ्रम टूट रहा है। सत्ता में आने के बाद बागी और विकास का नकली संतुलन टूटा है। राज्य के शासन पर बागी सवार हैं और विकास काफूर हो गया है।

ममता की मुश्किल यह है कि वे बागी के तानबाने में कैद हैं और बागी के नजरिए से राज्य प्रशासन को चलाना चाहती हैं। बागी के नजरिए से शासन चलाने का अर्थ है वस्तुगत प्रशासनिक प्रणाली का अभाव। बागी भाव से शासन चलाएंगे तो हमेशा दलतंत्र हावी रहेगा। पहले दलतंत्र की ममता आलोचना करती थीं लेकिन इन दिनों दलतंत्र की ओर जा रही हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब शासन में आई थीं तो उनसे उम्मीद थी कि वे जिस भाषा में विपक्ष में रहते हुए बोलती थीं उस भाषा और नजरिए को त्यागकर सुशासन की भाषा में बोलेंगी। लेकिन ममता ने अपनी भाषा और राजनीतिक तेवर नहीं बदले। ममता के बागी तेवर और उग्रभाषा उनकी कल तक सबसे बड़ी पूंजी थी लेकिन आज वही सबसे बड़ी बाधा है।

लोकतंत्र में अ-स्वाभाविक भाषा वह है जो अहर्निश अशांतमन और टकराव को व्यक्त करती है।इस तरह की भाषा का सामाजिक अवसाद से गहरा संबंध है। सामाजिक अवसाद बागी भाषा को सहज अभिव्यक्ति देता है। इसके विपरीत लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा वह है जिसमें सामंजस्य का भाव है और अन्य के लिए बराबर की जगह है। बागी की भाषा सामाजिक असमानता और सामाजिक अवसाद की अभिव्यक्ति है। इस तरह की भाषा असमानता को बनाए रखती है । इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भाषा और राजनीतिक तेवरों को पढ़ा जाना चाहिए।

विगत 26सितम्बर को ममता बनर्जी के दल ने राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का राज्य में निवेश स्वीकार्य नहीं है। यह ऐसा प्रस्ताव है जो राज्य के समूचे विकास को सीधे प्रभावित कर सकता है। मसलन् बड़ा बाजार का कोई व्यापारी यदि खुदरा व्यापार में 5000करोड़ रूपये का निवेश करना चाहेगा तो उसे निवेश की अनुमति नहीं होगी। यह तो सीधे व्यापारियों के व्यापार करने के अधिकार पर हमला है। केन्द्र और राज्य के व्यापार संबंधी कानूनों में कहीं पर भी यह प्रावधान नहीं है कि देशी व्यापारी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में किस सीमा तक पूंजी निवेश करेगा। देशी व्यापारी जिस किसी भी क्षेत्र में यहां तक कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी का निवेश कर सकता है। समूचे देश में मॉलकल्चर और बिग बाजार की संस्कृति जिस समय आई उस समय ममता के दल ने इसका विरोध नहीं किया था। लेकिन आज सत्ता में आने के बाद वे अचानक खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी के प्रवेश का विरोध कर रही हैं। इस तरह का विरोध न्यायसंगत नहीं है और देश के मौजूदा व्यापार कानूनों का सीधे उल्लंघन है। ममता को यह पता है कि खुदरा व्यापार में मॉल कल्चर पुराने खुदरा व्यापार की अपडेटिंग है। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह अपडेटिंग पसंद नहीं है। उनका बड़ी पूंजी के खिलाफ गुस्सा इस बात का भी संकेत है कि वे देश की सामयिक वास्तविकता को ठीक से नहीं देख पा रही हैं। खुदरा व्यापार के खिलाफ ममता फिलहाल जो भाषा बोल रही हैं वही भाषा भाजपा और अतिवामपंथी भी बोल रहे हैं।

बागी भाषा अवसाद की भाषा है। राजनेता का अवसाद जब शासन में व्यक्त होता है तो सीधे टकराव की भाषा में व्यक्त होता है।पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अवसाद का माहौल है और इस माहौल से कमोबेश सभी रंगत के नेता प्रभावित हैं। पश्चिम बंगाल में अवसाद का जिस तरह का वातावरण है वैसा वातावरण देश के अन्य राज्यों में नहीं है। अवसाद के माहौल को यहां मेले-ठेले और क्रांतिकारी लफ्फाजी के जरिए ढकने की आदत है। सामाजिक अवसाद से ध्यान हटाने के लिए व्यापारियों,पूंजीपतियों और अभिजन के खिलाफ में बोलना एक फैशन है। दिलचस्प बात यह है कि इस राज्य में अवसाद की भाषा बोलने वाले बहादुर और बागी कहलाते हैं। सच यह है कि अवसाद की भाषा कूपमंडूकों की भाषा है। एक ऐसे व्यक्ति की भाषा है जिसके पास कोई सपना नहीं है और जो निठल्ला है। ममता शासन को कायदे से इस बागी भाषा और निठल्लेपन से लड़ना चाहिए। राजनीति में बागी और निठल्ला भाव अंततः नीतिहीनता की ओर ले जाता है ,इस नीतिहीनता का एक और नमूना है हाल ही में राज्य के पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कानून 2011 में उपकुलपति की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति के चरित्र में किया गया बदलाव। सारे देश में उपकुलपति चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का प्रतिनिधि रहता है लेकिन पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रतिनिधि को चयन समिति से निकालकर उसकी जगह राज्य सरकार के प्रतिनिधि को रखा गया है जो कि गलत है। कायदे से राज्यपाल को इस संशोधन बिल को अपनी स्वीकृति नहीं देनी चाहिए,यह देश के अकादमिक नियमों का सीधे उल्लंघन है। इसी तरह ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि दानकुनी स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालमर लॉरी एंड कंपनी ने अपने ढ़ाई हजार करोड़ रूपये के प्रकल्प को बंद करने का फैसला किया है क्योंकि इस कंपनी को इस इलाके में जगह नहीं मिल रही है और ममता सरकार ने किसानों से जमीन खरीदने से मना कर दिया है। ममता सरकार की अराजक और दिशाहीन नीतियों के कारण हाल में सिंगूर से टाटा मोटर को भागना पड़ा। ममता के शासन में आने के बाद लॉर्सन एंड टुब्रो कंपनी ने 2012 में अपने बिजली प्रकल्प को बंद कर दिया।इसी साल श्याम स्टील ने अपना पुरूलिया स्थित स्टील प्रकल्प बंद करने का फैसला लिया है।बागी भाषा और नीतिहीनता के ये कुछ नमूने हैं। असल में पश्चिम बंगाल के लिए यह त्रासद समय है ,यहां लगातार विकास से जुड़े प्रकल्प बंद हो रहे हैं।






मंगलवार, 25 सितंबर 2012

राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण ममता अकेली पड़ी

    ममता बनर्जी और सोनिया गांधी में कल तक मित्रता थी इनदिनों दोनों नेत्रियों में छत्तीस का आंकड़ा है। ममता की राजनीतिक अदूरदर्शिता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कल तक ममता बनर्जी पापुलिज्म की बेताज बादशाह थीं लेकिन आज वे संकट में हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बनने के एक साल के अंदर उन्होंने सबसे पहले प्रणव मुखर्जी का विश्वास खोया,हाल में मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का साथ खोया और जल्द ही उनको कांग्रेस का राज्य में साथ भी खोना पडेगा ।इसके अलावा देश-विदेश के उद्योगपतियों की नजरों में ममता बनर्जी की साख गिरी है। ममता यह मानकर चल रही थी कि वे जल्द ही तिकड़मों के जरिए भारत की राजनीति में बड़ा स्थान बना लेंगी। लेकिन अब यह सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। मनमोहन सरकार से समर्थन वापसी के बाद ममता और भी अकेली हो गयी हैं।

पिछले सप्ताह कोलकाता के टाउनहॉल में टीएमसी सांसदों-विधायकों और मंत्रियों की बैठक में एक दर्जन सांसदों ने भरी सभा में साफ कहा कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस नहीं लेना चाहिए। इस पर ममता बनर्जी ने कहा कि समर्थन वापस लेते ही केन्द्र सरकार गिर जाएगी और उनको भरोसा है कि समाजवादी पार्टी उनका साथ देगी। लेकिन दिल्ली में घटनाक्रम जिस गति से चला उसने ममता बनर्जी को अदूरदर्शी नेता साबित किया है। जिन एक दर्जन टीएमसी सांसदों ने मनमोहन सरकार को समर्थन जारी रखने की मांग की थी उनका कहना था कि केन्द्र सरकार की मदद से चलने वाले सभी प्रकल्प इस फैसले से प्रभावित होंगे।साथ ही हर महिने रिजर्व बैंक से जो ओवरड्राफ्ट राज्य सरकार ले रही है उस पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के जिन मंत्रियों ने मनमोहन सिंह सरकार से इस्तीफा दिया है वे निजी तौर पर शांति महसूस कर रहे है। टीएमसी के एक पूर्व केन्द्रीयमंत्री का कहना था हमलोग जब से दिल्ली मंत्रीमंडल में शामिल हुए हैं हमारे ऊपर ममता दीदी की सख्त निगरानी थी और सभी मंत्रियों को ज्यादातर समय दिल्ली की बजाय कोलकाता में रहने का निर्देश था इसके कारण सभी मंत्री तनाव में रहते थे। मंत्रीमंडल से इस्तीफा देने वाले एक दूसरे मंत्री ने कहा कम से कम अब दिल्ली के बेगानेपन से वे बच गए हैं।सभी पूर्व मंत्रियों को उस समय असुविधा हुई जब वे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को समर्थन वापसी का पत्र देने पहुँचे। वे राष्ट्रपति के सामने निरुत्तर खड़े थे। तकरीबन यही स्थिति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलते समय भी थी।

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसबार ममता बनर्जी से एकबार भी बात क्यों नहीं की ? पिछले सप्ताह जिस तरह तेजी से घटनाक्रम चला है उसमें ममता बनर्जी ने एकबार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बात की थी और ममता को उम्मीद थी कि सोनिया गांधी उनको मनाने की कोशिश करेंगी,लेकिन ममता को सोनिया गांधी की बातें सुनकर तेज झटका लगा। सोनिया गांधी के करीबी सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने ममता से साफ कहा कि सरकार में निकम्मेपन को अब बर्दाश्त करना संभव नहीं है। टीएमसी के मंत्री दिल्ली के मंत्रालय ऑफिसों में आते ही नहीं हैं और इसे अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। तीन साल हो गए टीएमसी के अधिकांश मंत्रियों को दिल्ली में मंत्रालय के ऑफिस आने की फुर्सत नहीं है ,इससे अच्छा है आपके मंत्री इस्तीफा दे दें। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि ममता बनर्जी ने अपने मंत्रियों को आरंभ से ही यह निर्देश दे रखा था कि दिल्ली में कम रहो कोलकाता या अपने चुनावक्षेत्र में ज्यादा रहो।सोनिया गांधी ने ममता को दो-टूक शब्दों में यह भी कहा बताते हैं कि केन्द्र सरकार के फैसले बदले नहीं जाएंगे और टीएमसी की अड़ंगेबाजी से सरकार की साख में बट्टा लगा है। सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी को सोनिया गांधी के इस सख्त रवैय्ये से कड़ा झटका लगा है।

उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी यह दावा करती थीं कि वे जो चाहेंगी सोनिया गांधी से मनवा लेंगी। लेकिन विगत एकसाल में जब से उनकी प्रणव मुखर्जी से अनबन हुई और बातचीत बंद हुई तब से कांग्रेस के सभी केन्द्रीय नेताओं को कही कहा गया कि ममता से दूर रहो ।इस समूची प्रक्रिया में यूपीए-2 सरकार की जड़ता टूटी है और नए किस्म के राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं पैदा हुई हैं। ममता का राजनीतिक कद छोटा करने में प्रणव मुखर्जी के फार्मूले पर ही अंततःमनमोहन सरकार को आना पड़ा और अर्थव्यवस्था के बारे में कठोर फैसले लेने पड़े हैं। उल्लेखनीय है दिल्ली में टीएमसी के समर्थन वापसी की स्थितियों से निबटने की सारी तैयारियां मनमोहन सरकार के फैसला लेने के पहले ही कर ली गयी थीं।

कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि ममता ने समर्थन वापसी की घोषणा करके असल में भाजपा और एनडीए के हितों को साधने की कोशिश की है। भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए ममता ने विगत सप्ताह प्रेस कॉफ्रेंस में कांग्रेस के खिलाफ जिस भाषा का इस्तेमाल किया वह भाजपा की भाषा है।ममता की प्रेस कॉफ्रेस के तत्काल बाद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर ने सही कहा कि हमें खुशी है कि ममता अब वही कह रही हैं जो अब तक भाजपा बोलती आई है।

ममता बनर्जी केद्वारा कांग्रेस के साथ समझौता तोड़ने का कई मोर्चों पर असर होगा। पहला असर यह होगा कि मनमोहन सरकार बिना किसी अडंगेबाजी के नीतिगत फैसले ले पाएगी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में आने वाले पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस आमने-सामने होंगे और इससे वामदलों को लाभ मिल सकता है।




रविवार, 16 सितंबर 2012

मनमोहन के फैसले ने ममता की घबराहट बढ़ायी


                 
      पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को 72घंटे का अल्टीमेटम दिया है और कहा है डीजल के बढ़े दाम और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला वापस ले। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने ये दोनों फैसले वापस नहीं लेने जा रही है। सबकी आंखें ममता के अगले कदम पर टिकी हैं।
    ममता का तर्क है कि सरकार ने हमसे सलाह नहीं ली, हमारे मंत्री ने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया।अतःहम इस फैसले को नहीं मानते। केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं की ममता के साथ अनौपचारिक बैठक हुई।इसमें पार्थ चटर्जी-सुब्रत मुखर्जी आदि ने ममता की राय से असहमति व्यक्ति की।
     तृणमूल सरकार में वरिष्ठमंत्री ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा यह फैसला यूपीए-2 सरकार का सामूहिक फैसला है। इस फैसले से यूपीए-2के सभी दल बंधे हैं। मंत्रीमंडल किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह तो सारे देश का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सत्तारूढ़ दल मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं। कोई मंत्री मंत्रीमंडल की बैठक में शामिल हो या न हो वह मंत्रीमंडल के सामूहिक फैसलों से बंधा है। शुक्रवार की रात को ही इस मंत्री ने ममता को उनके घर जाकर अपनी राय से अवगत करा दिया और कहा कि वे यूपीए छोड़ने का फैसला न लें।
     असल में  राजनीति में एक होता है सत्ताखेल और दूसरा होता है सत्तामोह। सत्ताखेल में वे नेता सफल होते हैं  जो दूरदृष्टि रखते हैं और दीर्घकालिक बृहत्तर जनहितों का ख्याल रखते हैं।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे राजनीतिक दांवपेंच सत्तामोह की देन हैं।सत्तामोह विवेकहीन बनाता है।
    पापुलिज्म ,नकली प्रतिवाद और उत्सवधर्मिता में बांधे रखता है।सत्तामोह में बंधे लोग नकली प्रतिवाद के लिए सड़कों पर हंगामे करते हैं ,मीडिया में खूब हो-हल्ला करते हैं।वामदलों में भी यह बीमारी है। सत्तामोहित नेता गैर-जिम्मेदार होता है और सामाजिक जबाबदेही से भागता है। ।
इनदिनों जो  नकली प्रतिवाद ममता और उनका दल कर रहा है यह प्रतिवाद नहीं है यह प्रतिवाद का ऑब्शेसन है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन वामदलों में भी है और ममता में भी है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन अंततः अ-राजनीतिकरण करता है और नीतिविहीन बनाता है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के विकास को अवरूद्ध करता है। आमलोगों में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था पैदा करता है।
       ममता का 72 घंटे का अल्टीमेटम एब्सर्ड पापुलिज्म की देन है। यह सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन है। सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन के कारण ही ममता बनर्जी विगत दो महिनों से यूपीए-2 की सरकार में हाशिए पर आ गयी हैं। एक जमाना था उनसे प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी बात करते थे।लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ममता बनर्जी को उनकी राजनीतिक हैसियत का एहसास करा दिया गया है। विगत बृहस्पति और शुक्रवार को मंत्रीमंडलीय उपसमिति के बैठकों से तृणमूल कांग्रेस के मंत्री नदारत थे। ममता बनर्जी ने राजनीतिक जिम्मेदारी से भागने का एक सुगम रास्ता अख्तियार किया है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल के बैठकों में उनके दल के मंत्री हिस्सा ही नहीं लेते और इसके बाद ममता बनर्जी मीडिया में हल्ला करती हैं कि उनसे पूछा नहीं गया,उनकी राय नहीं ली गयी, उन्हें मंत्रीमंडल का फैसला सुनकर अचम्भा हुआ है,इसके बाद वे धमकियां देती हैं।यह नाटक विगत 3सालों से चल रहा है और मनमोहन सिंह इसे झेलते रहे हैं। इसे ममता ने अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में प्रचारित किया है और मीडिया ने भी ममता को ताकतवर महिला के रूप में खूब उछाला है। लेकिन विगत बृहस्पतिवार और शुक्रवार के मंत्रीमंडलीय समिति के फैसलों ने ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत की सीमाओं को एकसिरे से उजागर कर दिया है। ममता की समझ है कि उनका दल यदि सरकार से समर्थन वापस ले लेता है तो सरकार गिर जायगी । लेकिन राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने से सरकार नहीं गिरने वाली। तृणमूल कांग्रेस यदि समर्थन वापस लेता है तो वैसे स्थिति में मुलायम सिंह यादव और अन्यदलों का समर्थन मिलना पक्का है।इस संदर्भ में पहले से ही राजनीतिक तैयारियां कर ली गयी हैं और बदले में समर्थक दलों के नेताओं से भी विस्तार के साथ बातें हो गयी हैं।
    केन्द्र सरकार के बयान के अनुसार रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश के सवाल पर विगत शुक्रवार को जो फैसला लिया गया वह विगत 24नवम्बर 2011 को ही मंत्रीमंडलीय समिति ने पास कर दिया था सिर्फ उसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा गया था। कार्यान्वयन के संदर्भ में 7दिसम्बर 2011 को  विभिन्न राज्य सरकारों और मजदूर, किसान,दुकानदार,छोटे व्यापारी आदि के संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई थी जिसमें दिल्ली,असम, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र,राजस्थान,हरियाणा,मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, केन्द्र शासित क्षेत्र दमन-दीउ,दादरा और नागर हवेली के प्रतिनिधियों ने रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश का समर्थन किया था जबकि बिहार, कर्नाटक, उडीसा,केरल,मध्यप्रदेश,त्रिपुरा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपना प्रतिनिधि इस बैठक में नहीं भेजा और नहीं बाद में इस पर अपनी कोई राय दी। इस बीच विभिन्न राज्यों के साथ सलाह-मशविरे के बाद यह तय पाया गया कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को राज्य सरकारें लागू करें या न करें यह उनका फैसला होगा। यानी ममता बनर्जी के लिए रास्ता खुला रखा गया है कि वे अब यह तय करें कि इसके बावजूद वे मंत्रीमंडल में रहना चाहती हैं या नहीं। इस स्थिति में ममता बनर्जी के दल में आंतरिक अन्तर्विरोध तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के केन्द्र में जो मंत्री हैं वे चाहते हैं कि उनका दल सरकार का समर्थन जारी रखे। जबकि ममता बनर्जी चाहती हैं कि मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया जाय और बाहर से सरकार का समर्थन किया जाय। पार्थ चटर्जी-सौगत राय-सुब्रत मुखर्जी आदि का मानना है कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस न लिया जाय और न ही सरकार के काम में अडंगे डाले जाएं इस सबसे तृणमूल कांग्रेस की अड़ंगेबाज पार्टी की इमेज बन रही है।
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