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सोमवार, 25 जुलाई 2011

ममता बनर्जी में माकपा की आवाजें


  ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद आमलोगों को लग रहा था कि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव आएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे लगातार उसी मार्ग पर चल रही हैं जिसे माकपा ने वाम शासन में बनाया था। प्रत्येक क्षेत्र में ममता और उनके दल के कारनामे एक ही तथ्य की पुष्टि करते हैं कि पिछले वाम शासन के रास्ते से ममता मूलतः बंधी हुई हैं। राजनीतिक दलीय उत्पीड़न, जमीन, किसान,शिक्षा,संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में वे अभी तक नया कुछ भी नहीं कर पायी हैं।  इस बात की पुष्टि हाल ही में पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के गठन की घोषणा से भी होती है।
     पश्चिम बंग बिन्दी अकादमी से जिस तरह का अपमानजनक व्यवहार वाम सरकार ने किया था वैसा सारे देश में किसी सरकार ने नहीं किया। उल्लेखनीय बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने समूचे 8 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में हिन्दी अकादमी का गठन ही नहीं किया था।जबकि प्रत्येक 4 साल में गठन होना चाहिए। वाम सरकार ने विगत विधानसभा चुनाव से 2 माह पहले किसी तरह अकादमी की गवर्निंग बॉडी घोषित कर दी। कम से कम ममता बनर्जी को इसबात का श्रेय जाता है कि उन्होंने चुनाव जीतने के बाद ही अकादमी गठित कर दी। लेकिन वे वाम शासन के रास्ते को छोड़ नहीं पायी हैं। विगत वाम सरकार ने हिन्दी अकादमी की गवर्निंग बॉडी में 5 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी लिखना नहीं जानते थे,15 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी साक्षर-शिक्षक थे,लेकिन लेखक नहीं थे।
हाल ही में ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का गठन किया है। इसमें राज्य का एक भी बड़ा लेखक शामिल नहीं है। अकादमी में हिन्दी के अ-साहित्यिकों , भू.पू.पुलिस अफसरों और लालाओं को रखा गया है। इनमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने सतीप्रथा और भारतीय फासिज्म का महिमामंडन किया है।ज्यादातर लोग खाकीनेकर मार्का फासिज्म के प्रचारक हैं। इन्होंने कभी भी हिन्दीभाषा और संस्कृति के लिए कुछ नहीं किया है। ज्यादातर लोगों को ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं आता। हां ,धन कमाने और फासीवाद का प्रचार करने की कला में वे कुशल जरूर हैं। मूलतःइनलोगों का  कला-साहित्य संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।यह हिन्दी साहित्य ,जनता और लेखकों का अपमान है। ममता सरकार ने हिन्दी अकादमी को वामशासन की तरह हिन्दीसेवियों की संस्था बना दिया है।
      'जनसत्ता' (कोलकाता संस्करण,25जुलाई2011) के अनुसार 13सदस्यीय कमेटी बनाई गयी है। इसमें विवेक गुप्ता(अध्यक्ष),अरूण चूडीवाल,पुष्करलाल केडिया,दिनेश बजाज, शांतिलाल जैन,सुल्तान सिंह,आरके प्रसाद,कुसुम खेमानी,राजकमल जौहरी,निर्भय मल्लिक, मंजूरानी सिंह,रूपा गुप्ता, और जेके गोयल को सदस्य के रूप में रखा गया है। मजेदार बात यह है राज्य के सूचना और संस्कृति विभाग ने 29जून2011 को प्रेस विज्ञप्ति जारी की, लेकिन किसी भी अखबार ने इसे आज तक नहीं छापा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ,जिन्हें अपनी सामान्य सी गतिविधि को टीवी को बताने में मजा आता है, उन्होंने भी इसकी मीडिया को जानकारी नहीं दी। यह खबर इतने लंबे अंतराल के बाद प्रेस में क्यों आई ? क्या यह हिन्दी अकादमी के प्रति हिन्दीप्रेस का शोभनीय आचरण है ? जबकि राज्य का सूचना और संस्कृति मंत्रालय स्वयं ममता बनर्जी देख रही हैं।
    विगत अकादमी के गठन पर हिन्दीप्रेस ने बड़ा हंगामा किया था। लेकिन इसबार हिन्दीप्रेस ने भी यह खबर नहीं छापी। मजेदार बात यह है कि विगत अकादमी की घोषणा के बाद हिन्दी के अखबारों जैसे जागरण,प्रभातखबर,सन्मार्ग,जनसत्ता में अलेखकों को रखे जाने के खिलाफ खूब बयानबाजी छपी थी। वाम सरकार की तकरीबन सभी लेखकों ने निंदा की थी। लेकिन इसबार अकादमी का 29जून को गठन हुआ और किसी अखबार ने 26 दिनों तक इस खबर की ओर ध्यान नहीं दिया। मैंने जब फेसबुक पर इस पर लिखा तब लोगों का इस ओर ध्यान गया और उसके बाद जनसत्ता ने खोजकर खबर बनायी। हिन्दीप्रेस की वाम सरकार के खिलाफ अति सक्रियता और ममता सरकार की एक सही खबर का प्रकाशित न होना कई सवाल खड़े करता है।  असल में हिन्दीप्रेस,वाममोर्चा और ममता प्रशासन इन तीनों के लिए हिन्दीवाले वोटबैंक से ज्यादा महत्व नहीं रखते। ये लोग हिन्दीप्रेमी और हिन्दीलेखक का अंतर नहीं जानते।यह बंगला राजनीति और हिन्दीमीडिया में फैले सांस्कृतिक अज्ञान की अभिव्यक्ति है।               
     ममता बनर्जी सरकार ने हिन्दी अकादमी के गठन में जिस तरह हिन्दी लेखकों का अपमान किया है । सवाल उठता है क्या वे ऐसा बंगला अकादमी में कर सकती हैं ? क्या महाश्वेतादेवी के स्थान पर किसी अनपढ़ जाहिल आईपीएस अफसर या बंगला पूंजीपति को बांग्ला अकादमी का अध्यक्ष बना सकती हैं ?क्या बंगला अकादमी में बंगला लेखकों की बजाय बंगाली भाषानुरागी रखे जा सकते हैं ?
पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का वामशासन में सबसे बुरा हाल था। विगत विधानसभा चुनाव के दो माह पहले सरकार ने गवर्निंग बॉडी बना दी। 8साल तक इसका पुनर्गठन नहीं किया। 8 सालों में कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। अकादमी के पास ऑफिस नहीं है। निदेशक,सचिव से लेकर चपरासी तक सब पार्टटाइम हैं। अकादमी को सालाना 4 लाख रूपये के आसपास पैसा मिलता था। जिससे चपरासी,टाइपिस्ट,बिजली का बिल,फोन बिल का भुगतान होता था।ज्योति बाबू के शासनकाल से लेकर बुद्धदेव बाबू के शासनकाल तक हिन्दी अकादमी को घनघोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। राज्य सरकार ने अकादमी को कभी सामान्य संसाधन तक मुहैय्या नहीं कराए,बुनियादी सुविधाएं नहीं दीं। हम उम्मीद करते हैं नयी सरकार हिन्दी अकादमी को बुनियादी सुविधाएं और संसाधन देगी जिससे वे काम कर सकें।


सोमवार, 29 नवंबर 2010

पश्चिम बंगाल में हिन्दीभाषियों की उपेक्षा

 ( पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार द्वारा संचालित पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी नामक संस्था है जिसे लेकर स्थानीय लेखकों में जबर्दस्त रोष है,उस पर प्रेस में तीखी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं, हम यहां उन्हें सिलसिलेबार दे रहे हैं,जिससे वाममोर्चे का हिन्दीभाषियों के प्रति क्या रूख है उसे जानने का आप सबको मौका मिले,यहां पर हम हाल ही में गठित शासी निकाय के एक सदस्य डा.अशोक सिंह द्वारा  मुक्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नाम भेजा गया पत्र प्रकाशित कर रहे हैं,यह पत्र कई महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान खींचता है।)


श्री बुद्धदेव भटाचार्य                                              
                                              दिनांक: 25 नवंबर 2010
मुख्यमंत्री
पश्चिम बंगाल सरकार
राइटर्स बिल्डिंग, कोलकाता

विषय: पश्चिम बंग हिंदी अकादमी का पुनर्गठन और साधारण परिषद की सदस्यता से इस्तीफा

आदरणीय मुख्यमंत्री जी,
                     18 नवंबर 2010 को पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना और संस्कृति विभाग की ओर से पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के पुनर्गठन की लिखित सूचना अकादमी के एक कर्मचारी के माध्यम से सुरेन्द्रनाथ सांध्य कालेज, कोलकाता में मिली| पश्चिम बंग हिंदी अकादमी की 41 सदस्यीय साधारण परिषद में 29 वें स्थान पर मेरा नाम था| 15 सदस्यों वाली गवर्निंग बॉडी के सदस्यों की सूची थी| No.2864/1(28)-ICA के इस सरकारी NOTIFICATION की तारीख 2 नवंबर 2010 थी|
कोलकाता से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना और संस्कृति विभाग के राज्य मंत्री श्री सोमेन्द्रनाथ बेरा ने एक साक्षात्कार में पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के शीघ्र पुनर्गठन के बारे में कहा था| लेकिन आश्चर्य की बात है कि 2 नवंबर 2010 को NOTIFICATION जारी होने के बाद सरकारी स्तर पर इसकी घोषणा नहीं की गई| 18 नवंबर 2010 के पहले किसी भी सदस्य को सूचना नहीं मिली| 19,20,21 और 22 नवंबर 2010 के कोलकाता के समाचार पत्र ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित नवगठित साधारण परिषद के सदस्यों श्रीमती उषा गांगुली, डॉ.शम्भुनाथ, डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र जैसे राष्ट्रीय साहित्यिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व ने कहा कि अकादमी में उनकी सहमति लिए बिना नाम दिया गया और अभी तक उन्हें कोई लिखित सूचना नहीं मिली|
अकादमी की साधारण परिषद में सूचना और संस्कृति विभाग के तीन अधिकारियों को छोड़कर 38 सदस्यों की सूची में 20 ब्राह्मण हैं| पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार के सूचना और संस्कृति विभाग की हिंदी अकादमी में मार्क्सवाद का ब्राह्मणवाद में बदल जाना बेहद चिंताजनक है| हिंदी में उच्च शिक्षा के स्तर पर काबिज शिक्षा माफिया ने पहले से ही मार्क्सवाद को ब्राह्मणवाद में बदल दिया है| पश्चिम बंग हिंदी अकादमी पश्चिम बंगाल में रह रहे हिंदीभाषियों के सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक है| नवगठित अकादमी के साधारण परिषद की सूची ने पश्चिम बंगाल के हिंदीभाषियों के स्वाभिमान को अपमानित किया है| पश्चिम बंगाल की हिंदी अकादमी पूरे देश के लोगों के सामने एक उदाहरण पेश कर सकती थी लेकिन कवि सुकांत भट्टाचार्य के भतीजे और साहित्यकार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति ने निराशा भर दी है|
अहिन्दीभाषी प्रदेशों में पहली बार साहित्य अकादमी से सम्मानित कथाकार कोलकाता की श्रीमती अलका सरावगी , कोलकाता कारपोरेशन द्वारा इसी वर्ष टाउन हॉल में नागरिक अभिनन्दन से सम्मानित किये गये हिंदी के पहले साहित्यकार वरिष्ठ कवि ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’, नाट्य शोध संस्थान की संस्थापक राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉ. प्रतिभा अग्रवाल, मीडिया लेखन में हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित लेखक डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी, प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया, नुक्कड़ नाटक में अविस्मरणीय महेश जायसवाल, राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि एकांत श्रीवास्तव, वरिष्ठ कथाकार अनय, वरिष्ठ कवि आलोक शर्मा, वरिष्ठ कवि नवल, हिंदी में दुष्यंत कुमार की गज़ल परंपरा को बढ़ाने वाले नूर मोहम्मद नूर, शब्द कर्म विमर्श के संपादक हितेंद्र पटेल, ‘काव्यम’ पत्रिका के संपादक प्रभात पाण्डेय, कवियत्री डॉ.नीलम सिंह, बंगाल के हिंदी रंगमंच का गर्व निर्देशक अज़हर आलम का नाम नवगठित हिंदी अकादमी में शामिल नहीं है| इससे मालूम होता है कि पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना और संस्कृति विभाग को पश्चिम बंगाल में हिंदी भाषा ,साहित्य और संस्कृति के बारे में कोई जानकारी नहीं है| साधारण परिषद में उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार सांसद ए.एस.मलीहाबादी और वयोवृद्ध लेखक सालिक लखनवी को किस आधार पर शामिल किया गया है ? क्या उर्दू अकादमी में भी हिंदी लेखकों को स्थान दिया गया है ?                                                                                                                                                                                                                    

वाममोर्चा सरकार के 34 वर्षों के शासन में इस राज्य के हिंदीभाषी  अपने को अपमानित और ठगा महसूस कर रहे हैं | दुनिया बदल देने के दर्शन में विश्वास करनेवाली, संसदीय लोकतंत्र में विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को सिर्फ हिंदी में प्रश्न पत्र देने में 32 वर्ष लग गये| सूचना और संस्कृति विभाग की ओर से प्रकाशित ‘पश्चिम बंगाल’ पत्रिका के पूरे बंगाल में दर्शन नहीं होते|
माननीय मुख्यमंत्री जी, इस राज्य के हिंदीभाषियों का दुर्भाग्य है कि आज तक वाममोर्चा के किसी भी मुख्यमंत्री ने हिंदीभाषी समाज से संवाद करने की कोशिश नहीं की| 1997 में कलकत्ता सूचना केन्द्र में हिंदी के लेखकों, बुद्धिजीवियों और संस्कृति कर्मियों से एक मुलाक़ात में आपने हिंदी अकादमी के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि हिंदी अकादमी का गठन करने वालों ने आपको सूचित नहीं किया था| तब हिंदी अकादमी उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत थी| तब आपने वचन दिया था कि आप प्रत्येक वर्ष हिंदीभाषी बौद्धिकों से संवाद बनायेंगे|जो संस्थाए और व्यक्ति कार्य कर रहे हैं उनको लेकर हिंदी अकादमी की कमिटी बनाने का आपने वचन दिया था | लेकिन लगता है कि आप अपने वायदे को भूल गये|
मुख्यमंत्री जी, 34 वर्षों में वाममोर्चा की सरकार ने शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में बंगाल के हिंदीभाषियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा| राज्य में करीब 15% अर्थात एक करोड़ बीस लाख हिंदीभाषियों की जनसंख्या है| 34 वर्षों में 5 वर्षों को छोड़ दें तो 29 वर्ष तक आप सूचना और संस्कृति विभाग के मंत्री रहे| इन वर्षों में बजट में आंबटित राशि में कितना प्रतिशत इस राज्य के हिंदीभाषियों के सांस्कृतिक विकास पर खर्च किया गया ? इस राज्य में एक भी हिंदी माध्यम का सरकारी स्कूल नहीं है| इस राज्य में हिंदीभाषी लड़कियों के लिए एक भी ‘गर्ल्स हास्टल’ नहीं है| सूचना और संस्कृति विभाग के अंतर्गत ‘शिशु किशोर अकादमी’ बनायीं गई है| उसमे हिंदीभाषी शिशु-किशोरों के लिए कोई जगह नहीं है| युवा कल्याण विभाग द्वारा आयोजित ‘युवा छात्र उत्सव’ आयोजित करते समय राज्य सरकार (1999 को छोड़कर) प्रतिवर्ष हिंदीभाषी युवा छात्रों को भूल जाती है| 1999 में सांसद मोहम्मद सलीम की पहल पर पहली बार ‘युवा छात्र उत्सव’ में हिंदीभाषियों के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थी|
लोकतंत्र की सार्थकता भाषाई एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के समान विकास पर होती है| रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए की गई सिफारिशों पर पश्चिम बंगाल सरकार अभी तक खामोश क्यों है ?
देश की आज़ादी को भारतीय सिनेमा के जीनियस ऋत्विक घटक ने अपनी पहली फिल्म ‘नागरिक’ में एक नागरिक के रूप में देखा था| उनकी मृत्यु के बाद यह फिल्म प्रदर्शित हुई थी | पश्चिम बंगाल के एक नागरिक की हैसियत से मैं यह महसूस करता हूँ कि पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार राज्य के हिंदीभाषियों में लोकतंत्र के प्रति अभी तक विश्वास पैदा नहीं कर सकी है | अगले पाँच महीनों के बाद राज्य में विधान सभा चुनाव है| चुनाव के पहले हिंदी अकादमी का पुनर्गठन सरकार की नीयत पर प्रश्न चिन्ह पैदा करता है|
पश्चिम बंगाल के एक नागरिक की हैसियत से मैं अपने आप को अपमानित महसूस करता हूँ| इसके प्रतिवाद में मैं पश्चिम बंग हिंदी अकादमी की साधारण परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देता हूँ| आप अकादमी के अध्यक्ष हैं इसलिए यह पत्र आपको लिखा है|
                    
                                                       आपका विश्वसनीय
                                                                                                                               
                                                                                                                
                                                 डॉ. अशोक सिंह ( 9830867059)
      प्रवक्ता,हिंदी विभाग, सुरेन्द्रनाथ सांध्य कालेज,24/2, महात्मा गांधी रोड,कोलकाता-700009 


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