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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

देवी ,तुम तो काले धन की बैसाखी पर टिकी हुई हो- नागार्जुन



( यह कविता इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि कल तृणमूल की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने अपने एक भाषण में सीपीएम के कॉमरेड़ों को 1972-77 जैसे सबक सिखा देने की सरेआम धमकी है,वे मंच पर घूम घूमकर भाषण दे रही हैं, उल्लेखनीय है यह दौर पश्चिम बंगाल में अर्द्धफासीवादी आतंक के नाम से जाना जाता है,इस दौर में माकपा के 1200 से ज्यादा सदस्य कांग्रेस की गुण्डावाहिनी के हाथों मारे गए थे और 50 हजार से ज्यादा को राज्य छोड़कर बाहर जाना पड़ा था, उस समय बाबा नागार्जुन ने यह कविता लिखी थी ,जो ऐतिहासिक दस्तावेज है,यह कविता आज भी प्रासंगिक है,इसके कुछ अंश यहां दे रहे हैं)


लाभ-लोभ के नागपाश में
जकड़ गए हैं अंग तुम्हारे
घनी धुंध है भीतर -बाहर
दिन में भी गिनती हो तारे।

नाच रही हो ठुमक रही हो
बीच-बीच में मुस्काती हो
बीच-बीच में भवें तान कर
आग दृगों से बरसाती हो।

रंग लेपकर ,फूँक मारकर
उड़ा रहीं सौ -सौ गुब्बारे
महाशक्ति के मद में डूबीं
भूल गई हो पिछले नारे।

चुकने वाली है अब तो 
डायन की बहुरूपी माया
ठगिनी तू ने बहुत दिनों तक
जन-जन को यों ही भरमाया।



 (ममता बनर्जी ने जमकर पैसा खर्च किया है और इसमें काले धन की बड़ी भूमिका भी है,ढ़ेर सारे वाम और दाएँ बाजू के बुद्धिजीवी भी उसकी सेवा में हैं,अपराधियों से लेकर बुद्धिजीवियों तक का ऐसा भयानक गठबंधन बेमिसाल है,ममता बनर्जी पर बाबा की कविता का यह अंश काफी घटता है)

जैसी प्रतिमा ,जैसी देवी
वैसे ही नटगोत्र पुजारी
नए सिंह,महिषासुर अभिनव
नए भगत श्रद्धा-संचारी

ग्रह-उपग्रह सब थकित -चकित हैं
सभी हो रहे चन्दामामा
चन्दारानी की सेवा में
लिखा सभी ने राजीनामा


(ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के चुनाव भाषणों में एक बार भी मँहगाई का जिक्र नहीं किया है। भ्रष्टाचार पर कुछ नहीं बोला है। कल से सरेआम धमका रही हैं । बार बार पश्चिम बंगाल के पिछड़ेपन का रोना रो रही हैं ,और मीडिया महिमामंडन में लगा है, इस पर बाबा की पंक्तियां पढ़ें)


मँहगाई का तुझे पता क्या !
जाने क्या तू पीर पराई !
इर्द-गिर्द बस तीस-हजारी
साहबान की मुस्की छाई !

तुझ को बहुत-बहुत खलता है
'अपनी जनता ' का पिछड़ापन
महामूल्य रेशम में लिपटी
यों ही करतीं जीवन-यापन

ठगों-उचक्कों की मलकाइन
प्रजातंत्र की ओ हत्यारी
अबके हमको पता चल गया
है तू किन वर्गों की प्यारी



(ममता बनर्जी ने अंध कम्युनिस्ट विरोध के आधार पर पापुलिज्म की राजनीति का जो सिक्का चला है वह भविष्य में पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए अशुभ संकेत है। बाबा ने ऐसी ही परिस्थितियों पर लिखा था,पढ़ें-)


जन-मन भरम रहा है नकली
मत-पत्रों की मृग-माय़ा में
विचर रही तू महाकाल के
काले पंखों की छाया में


सौ कंसों की खीझ भरी है
इस सुरसा के दिल के अंदर
कंधों पर बैठे हैं इस के
धन-पिशाच के मस्त-कलंदर

गोली-गोले,पुलिस -मिलिटरी
इर्द-गिर्द हैं घेरे चलते
इसकी छलिया मुस्कानों पर
धन-कुबेर के दीपक जलते


शुक्रवार, 18 मार्च 2011

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- कविता के नए लोकतंत्र की तलाश में


    हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्यनीय बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र क्रियाएं आरंभ हो गयी हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएं हो रही हैं उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।
   मसलन नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी बना रहे हैं। उनकी कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांत्रिक है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र के समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है जो बुर्जुआ लोकतंत्र के दमनात्मक रूप का उदघाटन करती है। उसके रेशनल को ध्वस्त करती है।  इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को बनाया है।अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकथाओं,रूपकों,मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केन्द्र में आ गया है। हिन्दी में इन दोनों इस तरह के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं , उन पर बातें बंद हैं। बाबा के बहाने हम सोचें कि कविता के सामने आज क्या संकट है या चुनौतियां हैं।
    कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है सामयिक यथार्थ के मर्म को पकड़ने की। पहले एक नयी स्थिति पर ध्यान दें। एक जमाना था साहित्य में दुनिया के सवाल उठाए जाते थे,लेकिन नए दौर में साहित्य के बारे में ही ,कविता के बारे में सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य और कविता की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
    एक जमाना था कविता में कल्पना का बोलवाला था। लेकिन बाबा ने कल्पना को गौण और सच को प्रधान बनाया और यह काम बड़े ही कौशल के साथ किया है। वे कविता की अधिरचना को सतही यथार्थ के जरिए आरंभ करते हैं और फिर उसके वास्तव मर्म के अंदर चले जाते हैं। यहां उनका यथार्थ के प्रति आग्रह प्रबल हो उठता है। इस प्रसंग में उनकी कविता ‘कौन हाँफ रहा है’ (1990) को देख सकते हैं। यह समाजवाद के पतन पर लिखी शानदार कविता है। लिखा है- ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/ वो कम्युनिज्म की तरफ /तेजी से बढ़ा जा रहा था/ हाय,बीच रास्ते में ही/ इसका दम क्यों फूलने लगा ?/ क्या वे कोलखोज यक्-ब-यक् / ऊसर हो गए ? / सामूहिक कृषि-फार्म के / गेंहूँ तो हम तक भी पहुँचे थे/ दूर ग्रामांचल में,‘तरौनी’गांव तक / सोव्रवोज वाली सुनहली फसलों की खुशबू/मेरे ग्रामांचल की आबोहवा में भी /जाने कितनी बार फैली है.../ यह सब कुछ तुम्हें बतलाएँगे /कामरेड चतुरानन -झा!! / साथी श्यामलकिशोर / आप बतलाओ/वे कोलखोज क्या अब /बालू ही बालू रह गए/ क्या सचमुच रूस के लोग भूखे-प्यासे/ दिन पर दिन गुजारते हैं अब ? / ‘पेरेस्त्रोइका’ क्या हुआ ! / ‘ग्लासनोस्त’शंख-नाद का क्या हुआ !/ कामरेड गोर्बाचोब सच-सच बतलाओ- / सोवियत -भूमि में इन दिनों/ क्या कुछ कर रहे हैं लोग ?’’  
     इस कविता में फिक्शन और गैर फिक्शन दोनों घुले मिले हैं। कल्पना और सच दोनों घुलमिल गए हैं। विचारधारा और कविता दोनों घुल मिल गए हैं। यह कविता एक तरह से गैर-काल्पनिक फॉर्म है। यह कविता नहीं है बल्कि एक तरह का लेखन है। पत्रकारिता है। कविता को लेखन में तब्दील करने की कोशिश है।
     बाबा की कविता में एक और प्रयास नजर आता है वह है राजनीतिक कविता की साख बनाने का। वे हिन्दी में कलावादियों के द्वारा बनाए अराजनीतिक कविता के वातावरण को तोड़ते हैं। राजनीतिक कविता की साख बनाते हैं। निश्चित रूप से इसमें प्रगतिशील काव्यधारा की भी बड़ी भूमिका रही है लेकिन बाबा की अन्यतम भूमिका रही है। राजनीतिक कविता में सामाजिक सच्चाई को प्रभावी ढ़ंग से व्यक्त किया जा सकता है, इस बात की स्वीकृति बाबा ने ही करायी है। वैविध्यपूर्ण राजनीतिक कविता लिखकर कविता को जहां विचारधारा के दायरे के परे ले गए वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के भी परे ले गए। राजनीतिक कविता को साहित्यिक स्वीकृति दिलाकर बाबा ने शीतयुद्ध का जबाव दिया है। वे किसी भी तरह शीतयुद्ध के इस या उस खेमे के साथ बंधते नहीं हैं। वे जिस समय राजनीतिक कविता की साख बना रहे थे उसी समय हिन्दी की भी साख बना रहे थे। हिन्दी भाषा को प्रतिवाद की भाषा बना रहे थे। वे कविता में नए-नए राजनीतिक विमर्शों को रच रहे थे। कविता में विमर्श के वे सबसे बड़े कवि हैं। जो लोग इन दिनों साहित्य में विमर्श को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं उनके लिए बाबा सटीक जबाव हैं। वे कविता में विमर्श के कवि हैं। जिस तरह शमशेर कवियों के कवि हैं। बाबा विमर्शों के कवि हैं। जो लोग यह कहते हैं विमर्श की संस्कृति उत्तर आधुनिक संस्कृति है,आयातित संस्कृति है,परायी संस्कृति हैं उनको बाबा की कविता को देखना चाहिए। वे बड़े पैमाने पर विमर्शों को कविता में ले आते हैं।
   बाबा हिन्दी में पैराडाइम शिफ्ट के कवि हैं। पैराडाइम शिफ्ट का कवि वह होता है जो अपनी कविता के जरिए अन्य संस्कृति की ओर ले जाए। बाबा ने अपनी राजनीतिक कविताओं ,खासकर हिन्दी,बांग्ला और मैथिली कविताओं के माध्यम से यह संभावनाएं पैदा की हैं।  उनकी कविता एक ही साथ कई संस्कृतियों में विचरण करती है। वे कविता को खासकर प्रगतिशील कविता को एक नए पैराडाइम में लेजाते हैं। वे उन चंद कवियों में हैं जो हिन्दी कविता को दैनन्दिन राजनीति के करीब ले जाते हैं। दैनन्दिन राजनीति के पास कविता के जाने का असर यह हुआ है कि कालांतर में हिन्दी कवियों ने दैनन्दिन जीवन पर केन्द्रित होकर कविताएं लिखीं। दैनन्दिन जीवन कविता के केन्द्र में आया। दैनन्दिन राजनीतिक कविताएं सामयिक आंदोलनों के प्रत्युत्तर और जरूरतों के लिहाज से लिखी गयी थीं,इन कवियाओं को बाद में साहित्य की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी मान लिया गया।
      प्रगतिशील कविता का साम्यवादी आंदोलन के बाहर भी भविष्य है इसकी ओर भी बाबा ने ध्यान खींचा है। वे कविता में पहलीबार व्यापक रूप में मानवाधिकारों के सवालों को ले आते हैं। बाबा के पहले मानवाधिकारों को कविता के केन्द्र में कोई नहीं लाया । कविता को मजदूर-किसान के स्टीरिटाईप से निकालकर मानवाधिकारों के बृहत्तर कैनवास में लाकर बाबा ने पैराडाइम शिफ्ट का काम किया है। बाबा की 1970-71 से मानवाधिकारों पर केन्द्रित कविताएं आनी शुरू होती हैं और यह सिलसिला थमता नहीं है। वे अब कविता में उन विषयों की ओर मुड़ते हैं जो मानवाधिकारों से संबंधित हैं। इस प्रसंग में उनकी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हुई बूथ केप्चरिंग और अर्द्धफासी आतंक पर लिखी कविताएं प्रस्थान बिंदु के रूप में देखी जानी चाहिए। ये कविताएं बाबा को प्रगतिशील कवि की प्रचलित कोटि के बाहर ले जाती हैं और वे हठात मानवाधिकारों के रक्षक कवि के रूप में सामने आते हैं। वे दल और विचारधारा की सीमाओं का भी इसी आधार पर अतिक्रमण करते हैं और इसी आधार पर लोकतंत्र के खोखलेपन की आलोचना भी करते हैं। हमें 1970-71 के बाद की बाबा की कविताओं को मानवाधिकार साहित्य परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। वे पहलीबार प्रगतिशील कविता की सहमति को तोड़ते हैं। प्रगतिशील कवियों में अनेक सवाल हैं जिन पर आम सहमति नहीं है इनमें बाबा की कविताएं ज्यादा हैं जो आम सहमति को तोड़ती हैं। वे चीन-भारत युद्ध का सवाल हो या,नक्सलों के चित्रण का सवाल हो,संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रश्न हों या आपात्काल के प्रश्न हों, आपातकाल के बाद तो यह सिलसिला और भी तेज गति से आगे बढ़ता है। मानवाधिकार के पैराडाइम में आने के साथ प्रगतिशील कविता में बनी आम सहमति टूट जाती है। प्रगतिशील कविता के पैराडाइम में अधिकांश कवि साम्यवादी विचारधारा से बंधे थे। लेकिन बाबा ने जबसे मानवाधिकारों की दुनिया में शिफ्ट किया सारा मामला बदल गया। वे साम्यवादी विचारधारा के बाहर चले गए। यह शिफ्ट आया तो भारत-चीन युद्ध के समय से है,लेकिन उसने आधार बनाया पश्चिम बंगाल के 1972-77 के अर्द्ध -फासी आतंक के समय को। उसके बाद से बाबा ने कविता में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को छोड़ा नहीं। इसी अर्थ में बाबा को पैराडाइम शिफ्ट का बड़ा कवि कह सकते हैं। मुक्तिबोध,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर,त्रिलोचन,शीलजी आदि की एक ही मुश्किल है कि वे पैराडाइम शिफ्ट के कवि नहीं हैं। यही हाल बाद के कवियों रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, ,केदारनाथ सिंह आदि का है। ये एक की पैराडाइम में बंधे हैं।
   बाबा लोकतंत्र की आलोचना करते हुए आरंभ में कविता में समय को दर्ज करते हैं लेकिन बाद में उसे समयरहित अवस्था की ओर ले जाते हैं। उनकी कविता में आलोचक सामयिक राजनीतिक सत्य के साथ सामान्य सत्य की भी खोज करते रहे हैं। कविता में सत्य की खोज को वे मूल्यांकन का हिस्सा बना देते हैं। बाबा अपनी राजनीतिक कविताओं में राजनीति के शिकार लोगों के आख्यान को सामने लाते हैं। राजनीति की आलोचना को सामने लाते हैं और यह काम कविता की सर्जनात्मकता को बनाए रखकर करते हैं। वे आलोचना को मानकों के परे ले जाकर पेश करते हैं। मसलन समाजवाद की आलोचना में लिखी उपरोक्त कविता की पंक्तियों को देखें-  ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/ उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/’’ समाजवाद के पराभव को इतने सुंदर ढ़ंग से व्यक्त किया है कि कोई सोच ही नहीं सकता है कि समाजवाद ‘ हाँफ रहा है’, यह एक वाक्य ही काफी है पराभव को रेखांकित करने के लिए। इसी अर्थ में बाबा अपनी कविताओं के माध्यम से एक नया भाषाय़ीखेल खेलते हैं।  उनकी कविता में भाषा में बहुत ही गहरे अर्थों,बहुस्तरीय अर्थों की अभिव्यंजना हुई है। वे अपने भाषागेम में किसी न किसी विचार को केन्द्र में रखते हैं। वे उस विचार की ऐतिहासिकता में नहीं जाते उसे मूल्यहीन नहीं बनाते बल्कि नए मूल्य से लैस करते हैं। वे भाषाखेल को साहित्य की परिवर्तित अवधारणा की संगति में विकसित करते हैं। रूपायित करते हैं। वे अनुभव और अभिव्यक्ति में अंतराल पैदा करते हुए,उनके बीच के अंतर को गौण बना देते हैं।
    बाबा की कविता की धुरी है ‘घृणा करो या प्यार करो’, वे इस नारे के आधार पर कविता लिखते हैं। वे समाजवाद से प्यार करते हैं या फिर घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र से प्यार करते हैं या घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र के विभिन्न रूपों के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करते हैं जो उन्हें परेशान करते हैं।
     बाबा के काव्य संकलनों की प्रकृति देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर कविताएं विभिन्न समयों पर लिखी गयी और प्रकशित हुई हैं। उन्होंने किसी विषय विशेष को ध्यान में रखकर संकलन नहीं लिखा था। बाद में उनकी बिखरी हुई कविताओं को एकत्रित करके संकलन बनाए गए हैं। ये संकलन एक तरह से भिन्न किस्म की ‘पुस्तक’ की परिभाषा के अंदर आते हैं। अगर गौर से देखें तो बाबा की कविताओं में एक खास किस्म का बिखरा-बिखरा भाव है, एक अराजकता मिलेगी। असल में उनके इस तरह के काव्य संकलन को ‘रेडीकल बुक’ की देलुत्ज-गुअतारी की ‘ ए थाउजेंडस प्लेटोज’ में वर्णित अवधारणा के दायरे में ऱख सकते हैं।
     इन संकलनों के निशाने पर कुछ खास किस्म के संकेत या साइन हैं। इन संकलनों में प्रकाशित कविताओं में ऐतिहासिक समय संदर्भ है लेकिन काव्य संकलन का कोई ऐतिहासिक समय संदर्भ नहीं है। इन कविताओं में एक कविता के बाद ‘और’फिर ‘और’ इसके बाद फिर ‘और’ की पद्धति से कविताएं संकलित की गई हैं। इस तरह की पुस्तक संरचना में यह सवाल अर्थहीन हो जाता है कि आप कहां से चले थे,कहां जाना है । मैं यहां कुछ संकलनों के सहारे इस ‘रेडीकल बुक’ की अवधारणा पर रोशनी डालना चाहता हूँ। मसलन ‘भूल जाओ पुराने सपने’(1994) को ही लें इसमें 51 कविताएं हैं और ये विभिन्न समय में देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। 1979से 1993 के बीच में प्रकाशित कविताएं इसमें हैं। इसी तरह ‘सतरंगे पंखों वाली’ (1984) संकलन में 1956-58 के बीच लिखी कविताएं शामिल की गई हैं। यही हाल ‘रत्नगर्भ ’ (1984) संकलन का इसमें 8 लंबी कविताएँ हैं जो अलग-अलग पत्रिकाओं में विभिन्न समयों में छपी हैं। यही हाल अधिकांश काव्य संकलनों का है। हिन्दी में अभी तक इस सवाल पर सोचा ही नहीं गया कि किसी कवि का जो संकलन आ रहा है वह किस तरह की ‘किताब’ की अवधारणा में बंधकर आ रहा है। हिन्दी आलोचक के लिए सिर्फ काव्य संकलन आ गया यही काफी है। यहां तक कि बाबा के नाम पर हिन्दी में जो विशेषज्ञ आलोचक हैं वे भी अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि बाबा के ‘किताब’ के फॉर्म की व्याख्या कैसे करें। बाबा के काव्य संकलन को आप कहीं से भी और किसी भी कविता से आरंभ कर सकते हैं। चाहें तो एक कविता पढ़ें या दो या तीन या पूरी किताब उलट-पलटकर पढ़ें,आपको किसी क्रम को मानने की जरूरत नहीं है। कहां से आरंभ कर रहे हैं,कहां बंद कर रहे हैं और कहां जा रहे हैं,ये सारे सवाल बाबा की कविता की किताब पढ़ते समय अप्रासंगिक हैं। इस तरह के संकलन में कहने के लिए प्रत्येक कविता स्वतंत्र है लेकिन मजेदार बात है कि एक कविता का पाठ दूसरी कविता के पाठ से जुड़ता प्रतीत होता है। यह भी कह सकते हैं कि बाबा के काव्य संकलन में एकाधिक स्तर पर कविताएं सक्रिय हैं। उनके एक नहीं बल्कि बहुस्तरीय अर्थ भी हैं। एक कविता दूसरी कविता के पूरक की भूमिका में नजर आती है। कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता कविताओं को एक ही आयाम की ओर ले जाती प्रतीत होती है। वे अनेक कविताओं से आधुनिक कविता का नया फॉर्म इजाद करते हैं। कविता का नया फॉर्म है कविता की बहुस्तरीयता और एक दिशा।
    इन संकलनों में विषय के वैविध्य के अलावा एक चीज साझा है वह है राजनीतिक कविता। बाबा ने राजनीतिक कविता के फॉर्म को बनाने के लिए विभिन्न समयों में लिखी कविताओं को एक ही ढ़ांचे में बांधा है। कविताओं के लेखन का समय अलग-अलग है,प्रकाशन समय अलग है लेकिन दिशा एक है। इन संकलनों की विशेषता है कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता। और एक दिशा है लोकतंत्र के परे चलो। कविता के प्रचलित ढ़ांचे के परे चलो।
    बाबा के लेखे लोकतंत्र में अराजकता है,कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर भरोसा किया जाए। यह ऐसा युग है जिसमें विषय और व्यक्ति के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। स्वाभाविक यथार्थ और बौद्धिक यथार्थ के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। यह ऐसा जगत है जो अपनी धुरी खो चुका है। बार-बार लोकतंत्र की कमजोरियों,अन्याय आदि का कविताओं में उदघाटन करते हुए बताते हैं की देश में लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र अपनी धुरी से उतर चुका है। अतः कविता में समाज और व्यक्ति के बीच की एकता के चिर-परिचित दायरे से भी ऊपर लेजाने की जरूरत है। वे समाजवाद के भी परे कविता को ले जाते हैं। बाबा के लिए मौजूदा जगत अपनी धुरी खो चुका है। उनकी कविता इस धुरी से उतरे जगत के रूपायन पर केन्द्रित है। समाज में अराजकता है इसलिए काव्य संकलनों में भी बिखरापन है।
    बाबा की कविताओं को संकलन में पढ़ते हुए एक किस्म के सत्य के दर्शन नहीं होते बल्कि अनेक किस्म के सत्य के दर्शन होते हैं। सत्य की बहुस्तरीयता ही उनकी कविता की धुरी है। इसे आप किसी भी किस्म की आलोचना की भाषिक चालाकी से ढंक नहीं सकते।                       



रविवार, 27 फ़रवरी 2011

नागार्जुन के जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- कविता के उपनिवेश का अंत और नागार्जुन


                (आलोचक नामवर सिंह और बाबा नागार्जुन)     
       साइबरयुग में कविता और साहित्य को लेकर अनेक किस्म की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। कुछ लोग यह सोच रहे हैं लोकतंत्र में कविता या साहित्य को कैद करके रखा जा सकता है ? यह सोचते रहे हैं कि साहित्य हाशिए पर पहुँच गया है।लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। इसके विपरीत साहित्य और कविता का विस्तार हुआ है। इसके अलावा आधुनिककाल में नवजागरण के साथ तर्क की महत्ता और तर्क के दायरे में सब कुछ रखकर सोचने की जो प्रक्रिया आरंभ हुई उसने तर्क,अतर्क,विवेक आदि को लेकर लंबी बहस खड़ी की है। आलोचकों ने साहित्य में रेशनल और लोकतंत्र का मायाजाल भी खड़ा किया है। ये आलोचक विद्वान यह भूल गए कि इस संसार को रेशनल में कैद नहीं रखा जा सकता है। नागार्जुन की कविता इसी परंपरा में आती है जो रेशनल के उपनिवेश में नहीं सोचते। रेशनल के उपनिवेश में सोचने वालों का हिन्दी की पहली परंपरा से लेकर दूसरी परंपरा और बाद में पैदा हुईं तीसरी और चौथी परंपरा में भी बोलवाला है।
    साहित्य को परंपरा की कोटि में बांधना एक तरह रेशनल की केटेगरी में ही बांधना है। नागार्जुन हिन्दी के अन्तर्विरोधी कवि हैं इन्हें आप रेशनल के दायरे में कैद नहीं कर सकते। बाबा की कविता का समाजवादी रूप किसी को अपील करता है तो किसी को बुर्जुआ लोकतंत्र को नंगा करने वाला रूप आकर्षित करता है। किसी को संपूर्ण क्रांति वाला तो किसी को आपात्काल विरोधी,किसी को बाबा में बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण दिखाई देता है। मजेदार बात यह है कि बाबा के यहां ये सारी प्रवृत्तियां हैं।
     बाबा की कविता में एक खास किस्म का उन्माद है। वे जिस पर भी लिखते हैं उन्मादित भाव में लिखते हैं। वे कविता में उन्मादी भाव पैदा करके कविता के बहाने आम आदमी के साथ संवाद करते हैं। साहित्य और उन्माद के अंतस्संबंध की एक झलक देखें- उनकी एक कविता है ‘‘भूल जाओ पुराने सपने’’(1979), इसमें कहते हैं- ‘ सियासत में/ न अड़ाओ / अपनी ये काँपती टाँगें/ हाँ,महाराज/ राजनीतिक फतवेबाजी से / अलग ही रक्खो अपने को / माला तो है ही तुम्हारे पास / नाम-वाम जपने को / भूल जाओ पुराने सपने को।’
    इसी तरह ‘‘जपाकर ’’ ( 1982) शीर्षक कविता में लिखा- ‘ जपाकर दिन-रात/ जै जै जै संविधान/ मूँद ले आँख-कान/ उनका ही दर ध्यान/  मान ले अध्यादेश/ मूँद ले आँख-कान/ सफल होगी मेधा/ खिचेंगे अनुदान/ उनके माथे पर / छींटा कर दूब-धान/ करता जा पूजा-पाठ/ उनका ही धर ध्यान/ जै जै जै छिन्मस्ता/ जै जै जै कृपाण/ सध गया शवासन/ मिलेगा सिंहासन।’
    यहां पर बाबा ने कविता में एक नयी भाषा का प्रयोग किया है यह लोकतंत्र के आत्मविध्वंस की भाषा है। इसके बहाने बाबा ने लोकतंत्र,संविधान आदि के खोखलेपन को व्यक्त किया है। इसी क्रम में ‘‘ अपना देश महाऽऽन’’ (1979) शीर्षक कविता लिखी,इसकी बानगी देखें-
‘ अपना यह देश है महाऽऽन!                                               
 जभी तो यहाँ चल रहा भेड़िया धसाऽऽन!
 शब्दों के तीर हैं जीभ है कमाऽऽन!
 सीधे हैं मजदूर और बुद्धू हैं किसाऽऽन!
 लीडरों की नीयत कौन पाएगा जाऽऽन
 अपना यह देश है महाऽऽन।’
  यहां लोकतंत्र के तर्क के परे ले जाकर भाषा के रूपान्तरणकारी प्रयोग के जरिए बाबा ने अपनी बात को रखा है। यह कविता ऐसे समय में लिखी गयी जब चारों ओर लोकतंत्र की जय जय हो रही थी। लोकतंत्र से भिन्न किसी अन्य आधार पर लेखक-आलोचक सोचने को तैयार नहीं थे। वह आपातकाल के बाद का दौर था । यहां कविता,समाज, राजनीति और लोकतंत्र के अन्तस्संबंध की ऐतिहासिकता को बनाए रखकर बाबा ने अपनी बात की है। वे लोकतंत्र के खोखलेपन को गंभीरता के साथ महसूस करते हैं और लोकतंत्र के लिए उनके अंदर गहरी तड़प भी थी,लेकिन वे लोकतंत्र के दायरे में कैद रहकर सोचने और लिखने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें लोकतंत्र में आजादी नहीं उपनिवेश की गंध आती थी। लोकतंत्र में वे गुलामी का भाव महसूस करते थे।वे जब भी लोकतंत्र पर लिखने जाते थे तो उन्हें लोकतंत्र के खोखलेपन का अहसास होता था। आदमी,समाज, राजनीति,मूल्य आदि सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र  का खोखलापन महसूस होता था। लोकतंत्र की भाषा खोखली नजर आती थी। बाबा जब भी अपनी काव्यभाषा चुनते हैं तो उसमें देज चलताऊ भाषा का ज्यादा प्रयोग करते हैं। लोकतंत्र के पदबंधों,संकेतों,प्रतीकों आदि का ज्यादा प्रयोग करते हैं।  लेकिन वे लोकतंत्र की समृद्धि की बजाय खोखलेपन की ओर ध्यान खींचते हैं। वे जब भी लोकतंत्र के संकेतों को उठाते हैं उसके साथ में उसकी परिस्थितियों को भी व्यक्त करते हैं। वे लोकतंत्र को व्यक्ति की तरह देखते हैं,जिस तरह व्यक्ति के अस्तित्व को देखते हैं,बाबा वैसे ही लोकतंत्र के अस्तित्व के ऊपर विचार करते हैं। वे कविता को भी व्यक्ति की तरह देखते हैं। उसे ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के बाहर ले जाते हैं। वे कविता को ऐतिहासिक परिस्थितियों से बांधकर नहीं देखते बल्कि उसके परे ले जाते हैं।  मसलन ‘‘ शताब्दी-समारोह’’ (1980) कविता देखें-
     ‘दिन है-/शताब्दी -समारोह के समापन का/दिन है-/पंडों की धूमधाम का ,विज्ञापन का/दिन है-/प्रतिबद्धता के व्रत-उद्यापन का/ दिन है-/ धान रोपने का,सावन का/दिन है-/स्मृतियों की सरिता में प्लावन का।’
      बाबा की कविता को आमतौर पर आलोचकों ने ऐतिहासिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों से बांधकर देखा है,जबकि बाबा का नजरिया कविता को ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों से बांधकर देखने का नहीं है। वे ऐतिहासिक परिस्थितियों के परे ले जाते हैं। इसके लिए वे भाषा का इस्तेमाल करते हैं। भाषा उन्हें ऐतिहासिक परिधि के बाहर ले जाती है। फलतः कविता के अर्थ को भी ऐतिहासिक परिस्थितियों के परे ले जाते हैं। वे लोकतंत्र के प्रतीकों का विलक्षण ढ़ंग से इस्तेमाल करते हैं। वे लोकतंत्र पर लिखी कविताओं में उसकी स्ट्रेंजनेस पर ध्यान खींचते हैं। वे लोकतंत्र के अर्थ को अन्य जगह स्थानान्तरित कर देते हैं। लोकतंत्र के अर्थ का अन्यत्र स्थानान्तरण अंततः उन्हें लोकतंत्र की कैद से बाहर ले जाता है। बाबा ने लोकतांत्रिक कविता की नयी संरचना को निर्मित किया है। इस संरचना में कविता का आंतरिक और बाहरी तंत्र एकदम खुला रहता है। इसमें सत्यता ,गांभीर्य ,नैतिकता, पारदर्शिता और स्वाभाविकता पर जोर है।  इससे ही लेखक की प्रामाणिक इमेज बनी है। इसके आधार पर ही वे कविता को लोकतंत्र के दायरे के परे ले जाते हैं। वे अपनी कविता में आमफहम बातचीत के शब्दों का ज्यादा प्रयोग करते हैं। वे कविता को शब्द के लिखित अर्थ के परे ले जाते हैं। वे लोकतंत्र पर लिखी कविताओं के जरिए लोकतंत्र की समस्त वैध परिभाषाओं की धज्जियां उड़ाते हैं। वे लोकतंत्र के मसलों पर चुप नहीं रहते । लोकतंत्र में लेखक यदि चुप रहता है तो उसके बारे में गॉसिप का बाजार गर्म होने की संभावनाएं रहती हैं।
     बाबा ने लोकतंत्र के प्रत्येक बड़े प्रसंग पर लिखा है। उनकी लोकतंत्र संबंधी कविताओं के दो स्तर हैं ,पहले वर्ग में उन कवियाओं को रखा जा सकता है जिनमें उन विषयों को उठाया गया है जो लोकतंत्र की वैधता को चुनौती देते हैं। लोकतंत्र की प्रामाणिकता पर संदेह बढ़ाते हैं। इस वर्ग में वे कविताएं आती हैं जो दर्शक के भाव से लिखी गयी हैं। दूसरे वर्ग में वे लोकतंत्र के बारे में जजमेंट करते हैं। उसके बारे में फैसले सुनाते हैं। इस क्रम में वे लोकतंत्र को कविता में दर्ज करते चले जाते हैं। लोकतंत्र में उत्पीड़न, हिंसा आदि पर लिखी उनकी कविताएं इसी कोटि में आती हैं। इनमें वे व्यक्ति के निजी कष्टों, निजी उत्पीडन को सामाजिक बनाते हैं। इस बहाने वे लोकतंत्र को बेपर्दा करते हैं। लोकतंत्र के उत्पीड़न पर लिखी उनकी कविताएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनकी रीडिंग भिन्न ढ़ंग से की जानी चाहिए। वे उत्पीड़न पर लिखी कविताओं के बहाने पीड़ित के दर्द को उभारने के साथ-साथ लोकतंत्र के दर्द को उभारते हैं। निजी दर्द को लोकतंत्र के दर्द में तब्दील कर देते हैं। इस तरह की कविताओं के जरिए बताते हैं कि हमारा देश अभी पूर्व आधुनिक युग में है। उत्पीड़न का दर्द उन्हें आधुनिक लोकतंत्र के अंदर सक्रिय पूर्व आधुनिकता की अवस्था की ओर ले जाता है। बाबा के लिए लोकतंत्र एक संकेत या साइन है। वे एक प्रतीक की तरह उसका रूपायन करते हैं। लोकतंत्र की संकेत की तरह नजरदारी करते हैं। उनके यहां लोकतंत्र एक सिस्टम की तरह नहीं आता बल्कि संकेतों के बहाने अनुभूति के रूप में आता है. वे लोकतंत्र के बारे में अपनी अनुभूतियों को शेयर करते हैं और फिर उनके बहाने लोकतंत्र पर नजरदारी करते हैं। वे जब अपनी लोकतंत्र संबंधी अनुभूतियों को पेश करते हैं तो जाने-अनजाने कई जगह आत्म-स्वीकृतियां व्यक्त हुई हैं। कविता में व्यक्त आत्म-स्वीकृतियों में उनकी लोकतंत्र के प्रति असहमतियां रूपायित हुई हैं।
        बाबा के लिए लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें सब कुछ पवित्र है,सुंदर है, सहज प्राप्य है। मसलन लोकतंत्र के प्रतीकों को ही लें। लोकतंत्र में वोट डालना परम पवित्र है। वोट मांगना और उसके लिए प्रचार करना,जनता की तारीफ करना,लोकतंत्र की महानता के गीत गाना और नेता की उपलब्धियों का प्रचार करना एक आम रिवाज है। आम तौर पर मतदाता की महानता पर चुनाव के समय बहुत कुछ कहा जाता है। इस प्रौपेगैण्डा के तिलिस्म के परे जाकर बाबा ने ‘‘ इतना भी क्या कम है प्यारे’’ (1979) शीर्षक कविता लिखी है। यह कविता कई मायनों में महत्वपूर्ण है पहलीबार इस कविता के जरिए वोट की राजनीति में आए नए परिवर्तनों को कलमबंद किया गया है। यह कविता 1979 की है। वोटरों की तुलना इस कविता में बाबा ने ‘लाश’ से की है । लिखा है- ‘ लाशों को झकझोर रहे हैं/ मुर्दों की मालिश करते हैं/ ...ये भी उन्हें वोट डालेंगी ! / ’’ जीत पर बाबा ने लिखा- ‘ लाशें भी खुश-खुश दीखेंगी/मुर्दे भी खुश-खुश दीखेंगे/ उनकी ही सरकार बनेगी/’’ लोकतंत्र में आलोचना और प्रतिवाद की महत्ता होती है उसके प्रति उपेक्षाभाव नहीं रखना चाहिए। बाबा ने लोकतंत्र के मतपत्र को बेसन की उपमा दी है। यह बड़ी ही अर्थपूर्ण उपमा है। लिखा है- ‘‘ मत-पत्रों की लीला देखो/ भाषण के बेसन घुलते हैं/ प्यारे इसका पापड़ देखो/प्यारे इसका चीला देखो/ चक्खो,चक्खो पापड़ चक्खो/गाली-गुफ्ता झापड़ चक्खो/मनपत्रों की लीला चक्खो/भाषण के बेसन का ,प्यारे ,चीला चक्खो.../’’बाबा की लोकतंत्र पर लिखी कविताओं की विशेषता है वे लोकतंत्र को अनुभव के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। उसके मर्म के डिक्शनरी के आधार पर नहीं रचते बल्कि अनुभव के आधार पर रचते हैं। बाबा के लिए लोकतंत्र कोई परम पवित्र गंगा नहीं है। जिसमें नहाने के बाद सारे सामाजिक-राजनीतिक पाप धुल जाते हों!
    बाबा ने लोकतंत्र को सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर बार बार परखा है और जीवन में व्यक्त यथार्थ को तरजीह दी है। इस क्रम में बाबा ने उस स्टीरियोटाईप को तोड़ा है जिसे मीडिया ने बनाया है और उसे ही हम लोकतंत्र का सच मान लेते हैं। मीडिया निर्मित लोकतंत्र पर विचारधारा की चादर ढकी रहती है जिसके कारण हम यथार्थ के साथ लोकतंत्र को सही मायने में जोड़कर देख ही नहीं पाते। हम लोकतंत्र के बारे में उन्हीं तर्कों का इस्तेमाल करते हैं जो हमें मीडिया ने सप्लाई किए हैं। मीडिया प्रौपेगैण्डा ने समझाया है लोकतंत्र माने चुनी हुई सरकार,स्वतंत्र मतदान, निष्पक्ष चुनाव,स्वच्छ राजनीति,सांसदों और विधायकों की ईमानदारी आदि। बाबा को ये सारे स्टीरियोटाईप अपील नहीं करते। वे उसकी अलोकतांत्रिक परतें उघाड़ते हैं तो उसमें वे प्रच्छन्नतः एक बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि हमारे यहां लोकतंत्र तो है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य नहीं है। डेमोक्रेसी है लेकिन डेमोक्रेट नहीं हैं।  लोकतांत्रिक मनुष्य के बिना लोकतंत्र अर्थहीन है । लोकतंत्र तब ही सार्थक है जब लोकतांत्रिक मनुष्य भी हों। भारत में लोकतंत्र के महान जयघोष में लोकतांत्रिक मनुष्य का लोप हुआ है। लोकतांत्रिक मनुष्य के बिना लोकतंत्र बेजान है। 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- लोकतांत्रिक कविता की संरचनाएं

     कविता का नया अर्थ है लोकतंत्र का संचार। अछूते को स्पर्श करना। उन विषयों पर लिखना जो कविता के क्षेत्र में वर्जित थे। प्रतिवादी लोकतंत्र के पक्ष में कविता का जितना विस्तार होता गया वह उतना ही लोकतांत्रिक होती गयी। कविता में लोकतंत्र का अर्थ है कविता और माध्यमों की पुरानी सीमाओं का अंत। लोकतंत्र का अर्थ है अनंत सीमाओं तक कविता के आकाश का विस्तार। कविता की पुरानी संरचनाओं का अंत।
    कविता के लिए पहले राजनीति बेमानी थी,कविता ने अपना छंद बदला राजनीति को अपना लिया। कविता में पहले प्रकृति,श्रृंगार और शरीर की लय का सौंदर्य था। आज कविता इनके पार समूचे मानवीय कार्य-व्यापार तक अपना दायरा विकसित कर चुकी है।
     कविता में आज भेद खत्म हो चुका है। पहले कविता में विषयों को लेकर भेदभाव था ।आज ऐसा नहीं है। कविता ने अछूते विषयों की विदाई कर दी है। कविता में पहले अर्थ छिपा होता था। अर्थ और संरचनाएं रहस्यात्मक होते थे। उन्हें खोलना होता था। अर्थ खोजने पड़ते थे। आलोचक-शिक्षकरूपी मिडिलमैन की जरूरत होती थी। आज कविता को किसी मिडिलमैन की जरूरत नहीं है।
     कविता की आंतरिक संरचनाओं का वि-रहस्यीकरण हुआ है। कविता और उसके अर्थ आज ज्यादा पारदर्शी हैं। कविता का जीवन संघर्षों के साथ सघन संबंध स्थापित हुआ है। कविता पहले प्रशंसा में लिखी जाती थी आज यथार्थ पर लिखी जाती है। कविता में जीवन की आलोचना का आना कविता के लोकतांत्रिक होने का संकेत है।
     कविता को पहले मिथों की जरूरत थी आज कविता मिथों को तोड़ती है। कविता में मिथों का लोप हो चुका है। मिथों की जगह जीवन का यथार्थ आ गया है। जीवनशैली के प्रश्न आ गए हैं। पहले कविता में अप्रत्यक्ष वर्चस्व हुआ करता था इनदिनों कविता का वर्चस्व के खिलाफ जमकर विस्तार हुआ है।
   पहले कविता मनोरंजन का साधन थी,आज कविता जीवन की प्राणवायु है। कविता ने तरक्की की है वह सहज ही हमारी दैनंदिन सांस्कृतिक आस्वाद प्रक्रिया का हिस्सा बन गयी है।
    पहले कविता लेखक और पाठक तक सीमित थी,आज उसने संस्कृति उद्योग तक अपना विस्तार कर लिया है। पहले कविता मुद्रण तक सीमित थी आज वह ऑडियो-वीडियो ,नेट ,वेब तक फैल गयी है। कविता का इतना फैलाव होगा हमने कभी सोचा नहीं था। यह सच है सभ्यता के विकास के साथ कविता का भी विकास हुआ है। कविता मरी नहीं है बदली है। हमें इसकी बदली हुई धुन और मिजाज को पकड़ना होगा।
      आज पुराने काव्यमानकों के आधार पर कविता नहीं लिख सकते। यदि लिखोगे तो कोई पढ़ेगा नहीं। कविता के इस बदले मिजाज पर व्यंग्य करते हुए बाबा ने लिखा-‘‘ वो रूठ गई है/उसे परेशान मत करो/जाने किस मुहूर्त्त में/उसे अपमानित किया था तुमने /तुम्हारी धुली मुस्कान पे/ उसे घिन आती है.../आपके शब्दालंकार/भुस की बोरियाँ हैं उसके लिए/प्लीज,हट जाओ सामने से/ उसे परेशान मत करो आप/अभिधा-लक्षणा-व्यंजना/सबकी सब सहेलियाँ हैं उसकी/सबकी सब.../उसे खो चुके हो आप,सदा-सदा के लिए !’’
    कविता के बदले पैराडाइम में नया है कविता में अछूते विषयों और नए माध्यमों का आना। इसका एक नमूना देखें- ‘‘जन्म लिया /मेरे काव्य शिशु ने/गहन रात्रि में/क्या किसी ने सुना उसका क्रन्दन/क्या किसी ने सुना उसका आर्त्तनाद/मैं स्वयं ही इस नवजात की धात्री/मैं स्वयं ही इस नवजात की जननी/जन्म लिया है /मेरे शिशु ने /गहन रात्रि में।’’



नागार्जुन जन्मशती पर विशेष -कश्मीर में मात खाएँगे हिन्दी पंडित,पाकिस्तानी पीर

                      (जनकवि बाबा नागार्जुन)
           कश्मीर में लंबे समय से अशान्ति चल रही है। पाकिस्तान और उसके अनुयायी पृथकतावादी संगठन एक ओर हैं तो दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी संगठन हैं,बीच में कहीं तीसरा धड़ा धर्मनिरपेक्ष काश्मीरियों का है जो कश्मीर की रक्षा किए हुए हैं और उनके कारण ही आज कश्मीर भारत का हिस्सा है वरना हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें और फंडामेंटलिस्ट-पृथकतावादी अपने-अपने तरीकों से जम्मू-कश्मीर को बांट चुके होते।
    जो लोग नागार्जुन के बारे में बातें कर रहे हैं उनसे सम-सामयिक सवालों पर स्टैंड लेने के लिए कहा जाना चाहिए। बाबा की कविता का मामला साहित्य का मामला नहीं है। यह समाज और राष्ट्र का मामला भी है। बाबा नागार्जुन के पास कश्मीर को लेकर एक समझ थी और वे कश्मीर की धड़कन को अच्छी तरह पहचानते थे। कश्मीर पर लिखी उनकी कविता का शीर्षक है ‘ केसर की मासूम क्यारियों से आती आवाज’। बाबा ने लिखा-
‘‘ काश्मीरी ही काश्मीर कर सकते उद्धार/’’ जो लोग यह समझते हैं कश्मीर की समस्या देशी है वे गलतफहमी के शिकार हैं,पहले भी आज भी काश्मीर की समस्या बाहरी ताकतों के द्वारा पैदा की गई है। अमेरिका और पाक की इन दिनों कश्मीर में अतिरिक्त दिलचस्पी दर्ज की गई है। अमेरिकी रवैय्ये पर बाबा ने लिखा-‘‘ अमरीकी बन्दर पंचों की खुल जाएगी पोल/काश्मीर में बजा करेंगे काश्मीर के ढ़ोल।’’
कश्मीर को लेकर तथाकथित सुलह कराने वालों पर बाबा ने लिखा - ‘‘ डिनर नई दिल्ली में और कराची में कर लंच/ तौल रहे रावलपिंडी में लड्डू बन्दर पंच।’’
अंत में बाबा नागार्जुन ने जो लिखा वह और भी महत्वपूर्ण है। लिखा ‘‘ मात खाएँगे हिन्दी पंडित,पाकिस्तानी पीर/ लो देखो ,वह खड़ा हो रहा नया-नया कश्मीर।’’        
      







गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता

                               (बाबा नागार्जुन)
        नागार्जुन पर जो लोग शताब्दी वर्ष में माला चढ़ा रहे हैं। व्याख्यान झाड़ रहे हैं। नागार्जुन के बारे में तरह-तरह का ज्ञान बांट रहे हैं ऐसे हिन्दी में 20 से ज्यादा लेखक नहीं हैं। ये लेखक कम साहित्य के कर्मकाण्डी ज्यादा लगते हैं। आप इनमें से किसी को भी फोन कीजिए ये लोग किसी भी कार्यक्रम और किसी भी विषय पर बोलने के लिए मना नहीं करते। वे जिस भावभंगिमा के साथ प्राचीन कवि स्वयंभू पर बोलते हैं उसी भावभंगिमा और विवेक के साथ नागार्जुन पर भी बोलते हैं। वे जिस भाव से अज्ञेय पर बोल रहे हैं उसी भाव से केदारनाथ अग्रवाल पर भी बोल रहे हैं। आप तय नहीं कर सकते कि इनका इस लेखक के बारे में क्या स्टैंड है ? आपको यह पता नहीं लगेगा कि ये इस लेखक के बारे में कितना जानते हैं और इन्होंने क्या लिखा है। असल में ये हिन्दी में कीर्तिफल के उपभोक्ता हैं।
       खासकर कवि चतुष्टयी के कवियों पर विगत दस सालों में नया क्या लिखा है ? आप पता करने जाएंगे तो निराशा हाथ लगेगी। हिन्दी के ज्ञान कांड की यह वास्तव तस्वीर है। इसमें लेखकों और आलोचकों का एक झुंड है जो पूरे देश में कवि चतुष्टयी पर बोलता घूम रहा है।
   मेरी अभी तक यह समझ में नहीं आता कि जब वक्ता ने संबंधित विषय पर विगत एक दशक में नया कुछ लिखा ही नहीं तो फिर आयोजक ऐसे वक्ताओं को क्यों बुलाते हैं ? ऐसा क्यों होता है कि ये 20 हिन्दी लेखक-आलोचकों में से सभी कार्यक्रमों में लेखक बुलाए जाते हैं ? सवाल उठता है कि वर्षों से जिसने उस लेखक या विषय पर कभी लिखा ही नहीं तो ऐसे व्यक्ति को आयोजक क्यों बुलाते हैं ? संबंधित विषय के बारे में ये विद्वान कितने गंभीर हैं यह बात तो इससे ही सिद्ध हो जाती है कि उन्होंने वर्षों से उस पर लिखा ही नहीं।
    असल में हिन्दी में आयोजनों का अधिकांश ठेका इन्हीं स्वनामधन्य विद्वानों के पास है। इन लोगों ने वातावरण ऐसा बनाया है कि आपको लगेगा कि नागार्जुन वाले कार्यक्रम में इन विद्वानों को नहीं बुलाएंगे तो कार्यक्रम बढ़िया नहीं हो पाएगा। बढ़िया कार्यक्रम के लिए बढ़िया अंतर्वस्तु और नई प्रस्तुति भी चाहिए। ये लेखक विगत 20 से भी ज्यादा सालों से सभी कार्यक्रमों में आ-जा रहे हैं शोभा बढ़ा रहे हैं और हिन्दी के ज्ञानकांड को कर्मकांड में तब्दील कर चुके हैं। हिन्दी आलोचना के वातावरण को नष्ट करने में इनकी टोली और इनके मुखियाओं की जो भूमिका रही है उस पर इस शताब्दी वर्ष में कड़ी समीक्षा करने की जरूरत है।
ऐसी ही अवस्था पर नागार्जुन ने "कीर्त्ति का फल" नामक कविता लिखी थी-पढ़ें और सोचें-
अगर कीर्त्ति का
फल चखना है
कलाकार ने फिर-फिर
सोचा-
आलोचक को खुश रखना है!
अगर कीर्त्ति का
फल चखना है
आलोचक ने फिर-फिर
सोचा
कवियों को नाथे रखना है!!




नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- प्रतिवादी लोकतंत्र के जनकवि नागार्जुन

                     ( मध्य में टोपा लगाए बाबा नागार्जुन)
             हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्यनीय बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र क्रियाएं आरंभ हो गयी हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएं हो रही हैं उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।
    मसलन नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी बनाते रहे हैं। नागार्जुन की कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांक्षिक कविता है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र की समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है जो बुर्जुआ लोकतंत्र की दमनात्मकता का उदघाटन करती है। इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को बनाया है। कविता में लोकतांत्रिक संरचनाओं के निर्माण की प्रक्रिया का लोकतंत्र की समीक्षा के साथ गहरा संबंध है।
    अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकों-मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केन्द्र में आ जाता है। हिन्दी में इन दोनों ही किस्म के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं ,उन पर बातें बंद हैं। आज वोट से लेकर साहित्य तक जो चल रहा है उस पर नागार्जुन की दो पंक्तियां देखें-
 " सच-सच बतलाना
  तुमको केत्ता रुपया मिला है? "
( नागार्जुन की कविता- तुमको केत्ता मिला है , का अंश)







कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष - नामवरजी बोलो कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?

               (नामवर सिंह और बाबा नागार्जुन)
        वर्धा में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कवि चतुष्टयी जन्मशती पर आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह कमाल की बात है । अब हमारे गुरूवर बिना परिप्रेक्ष्य के सिर्फ विवरण की भाषा बोलने लगे हैं। परिप्रेक्ष्यरहित आख्यान और रिपोर्टिंग का नमूना देखें- "इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। समाजवाद का जन्म हुआ। सदी का अंत आते-आते इन ध्रुवों के बीच की दूरी मिटती गयी। तीसरी दुनिया भी बाकी दुनिया में मिलती गयी और समाजवाद प्रायः समाप्त हो गया। नामवर जी ने नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था।"
     नामवर सिंह जानते हैं कि परिप्रेक्ष्यरहित विवरण बड़े खतरनाक होते हैं। उनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता है ,इनके पैर नहीं होते। नामवर सिंह का बीसवीं शताब्दी का वर्णन जलेबी मार्का व्याख्यान कला का आदर्श नमूना है। आपको इसमें बीसवीं सदी का ओर-छोर हाथ नहीं लगेगा। कौन खिलाड़ी था और कौन पिट रहा था,यह पता नहीं चलेगा। इस तरह के व्याख्यान की मुश्किल यह है कि इसमें भारत गायब है।भारत का यथार्थ गायब है। प्रतिवादी लोकतंत्र की चुनौतियां गायब हैं। सवाल उठता है नामवर सिंह ने ऐसा क्यों किया ?
       नामवर सिंह ने यह भी नहीं बताया कि मनमोहन सिंह के नव्य उदार अर्थशास्त्र और तदजनित संस्कृति का क्या करें ? लोकतांत्रिक प्रतिवादों का जो दमन हो रहा है उसका क्या करें ? हो सकता है, उन्होंने इस पर बोला हो,पर वेब  रिपोर्ट में यह गायब है।
    लेकिन इस समूची उधेड़बुन में हमें यह सवाल तो नामवर सिंह से पूछना है कि वे अज्ञेय के अमेरिकापरस्त रूझान और बाकी कवियों के अमेरिकी साम्राज्यविरोधी नजरिए में कैसे सामंजस्य बिठा रहे हैं ? क्या अज्ञेय पर अलग से कार्यक्रम नहीं किया जा सकता था ? जो कवि (अज्ञेय) लोकतांत्रिक संघर्षों से भागता हो उसका उन कवियों के साथ कैसे मूल्यांकन कर सकते हैं जो प्रतिवादी लोकतंत्र को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। कुर्बानी देने वाले लेखक और कुर्बानीरहित लेखक के बीच में कैसे पटरी बिठायी जा सकती है ?
    अज्ञेय और अन्य कवियों में अंतर यह है कि अज्ञेय को बुर्जुआ लोकतंत्र पसंद था, लेकिन नागार्जुन,केदार और शमशेर को बुर्जुआ लोकतंत्र नापसंद था। वे अपने लिए,अपने समाज के लिए,पीड़ित जनता के लिए प्रतिवादी लोकतंत्र की तलाश कर रहे थे, प्रतिवादी लोकतंत्र का वातावरण बना रहे थे। उसके लिए विभिन्न रूपों में इन कवियों ने अनेक कुर्बानियां दीं। इसके विपरीत अज्ञेय ने लोकतंत्र के लिए कौन सी कुर्बानी दी ? सवाल उठता हिन्दी के स्वनाधन्य बड़े आलोचक अनालोचनात्मक ढ़ंग से क्यों सोचने लगे हैं ?  साहित्य,साहित्यकार और साहित्य के सामाजिक सरोकारों के प्रति वे अनालोचनात्मक क्यों होते जा रहे हैं ? वे साहित्य में सच की खोज से क्यों भाग रहे हैं ? साहित्य में सच की खोज से भागने का प्रधान कारण है लेखक का सामयिक यथार्थ से अलगाव और दिशाहीन नजरिया। नामवर सिंह और उनके समानधर्माओं के लिए नागार्जुन की एक कविता को उद्धृत करने का मन कर रहा है। बाबा ने लिखा था-
  
"यह क्या हो रहा है जी ?
आप मुँह नहीं खोलिएगा !
कुच्छो नहीं बोलिएगा !
कैसे रहा जाएगा आपसे ?
आप तो डरे नहीं कभी अपने बाप से
तो बतलाइए,यह क्या हो रहा है ?
कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?
प्लीज बताएँ तो सही...
अपनी तो बे-कली बढ़ती जा रही
यह क्या हो रहा है जी
प्लीज बताएं तो सही...."







कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान

                     (स्व.बाबा नागार्जुन)       

     बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है ? लेकिन हिन्दी के कई प्रतिष्ठित लेखकों -आलोचकों और संस्थानों ने साम्राज्यवाद और सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रूख को तिलांजलि देकर इस आयोजन का आरंभ कर दिया है।  
   बाबा नागार्जुन को मंदी और नव्य-उदारीकरण के संदर्भ में पढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। मैंने करीब एक दशक से बाबा को  नहीं पढ़ा था,कभी पढ़ा भी तो चलताऊ ढ़ंग से पढ़ा और रख दिया,लेकिन इस बीच में उनकी जो भी किताबें बाजार में दिखीं खरीदता चला गया और इस सप्ताह उन्हें मन लगाकर पढ़ गया।
   बाबा नागार्जुन से मुझे कईबार व्यक्तिगत तौर पर जेएनयू में पढ़ते समय मिलने और बातें करने का मौका मिला था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई जब मैंने उनकी आपात्कालीन कविताओं पर एम.फिल् करने का फैसला किया था। केदारनाथ सिंह गाइड थे। उसके बाद तो कईबार मिला और उनके साथ लंबी बैठकें भी कीं।
      बाबा नागार्जुन सहज,सरल,पारदर्शी और धुनी व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिवादी लोकतंत्र उनके स्वभाव में रचा-बसा था। उनकी कविता लोकतंत्र की तरह पारदर्शी और आवरणहीन है। उन्हें प्रतिवादी लोकतंत्र का बिंदास लेखक भी कह सकते हैं। प्रतिवादी लोकतंत्र की प्राणवायु में जीने वाला ऐसा दूसरा लेखक हिन्दी में नहीं हुआ। नामवर सिंह को नागार्जुन का व्यंग्य खास लगता है मुझे उनका प्रतिवादी लोकतंत्र के प्रति लगाव खास लगता है।
     नागार्जुन के व्यक्तित्व और कविता की यह खूबी थी कि वे जैसा सोचते थे वैसा ही जीते भी थे। आज हिन्दी के अधिकांश लब्ध प्रतिष्ठित लेखक इससे एकदम उलट हैं। सोचते कुछ हैं जीते कुछ हैं। आज के हिन्दी लेखकों के कर्म और विचार में जो महा-अंतराल आया है वह हमारे लिए चिन्ता की बात है। कवि चतुष्टयी की जन्मशती पर कम से कम हिन्दी के स्वनामधन्य बड़े लेखक इस सवाल पर सोचें कि उनके कर्म और विचार में महा-अंतराल क्यों आया है ? उनके हाथ से सामयिक यथार्थ क्यों छूट गया है ?
     कवि चतुष्टयी जन्मशती पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठानी जलसों की खबरें आ रही हैं । इन जलसों के बहाने सत्य को असत्य में तब्दील करने की कोशिशें आरंभ हो गयी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह काम प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं की आंखों के समाने हो रहा है वे असत्य का जयगान सुन रहे हैं। यह हिन्दी के प्रतिवादी कवियों का अपमान है। मैं यहां सिर्फ एक झलकी दिखाना चाहता हूँ।
   हाल ही में वर्धा स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने एक बड़ा ही भव्य कार्यक्रम शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन के जन्मशती पर आयोजित किया था। इसमें जो विचार वक्ताओं ने रखे हैं ,उन पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है। हमारे प्रगतिशील लेखक किस संसार की छवि बना रहे हैं और सत्ताभक्त साहित्य प्रशासक विभूतिभूषण राय किस नजरिए से संसार की छवि बना रहे हैं,इसे देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा।
   मैंने कभी राय साहब को देखा नहीं है। मिलने का भी सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन जो रिपोर्ट इस सेमीनार की सामने है उस पर कहे बिना नहीं रह सकता। एक वाक्य में कहूं तो विभूतिनारायण राय ने बाबा नागार्जुन और अन्य प्रतिवादी कवियों की आत्मा को अपने बयान से कष्ट पहुंचाया है। राय साहब ने कहा है -
"बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।"( http://hindustaniacademy.blogspot.com)
    इस साधुभाषा का हिन्दी के प्रतिवादी कवियों के सोच से क्या संबंध है ? राय साहब इतने भोले कैसे हैं कि उन्हें समाजवादी व्यवस्था का उदय और पराभव नजर नहीं आया, उन्हें दो-दो विश्वयुद्ध नजर नहीं आए और उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद का आतंकी नव्य उदार चेहरा नजर नहीं आया, आखिरकार विभूति बाबू किसकी चारण वंदना कर रहे हैं ? उन्होंने जैसा भाषण दिया है वैसा भाषण अमेरिका के ह्वाइट हाउस के कर्मचारी रोज देते हैं। हिन्दी के प्रगतिशील लेखक यह कैसे भूल सकते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद नाम का पूरा विचारधारात्मक तंत्र है जिसके जबड़े में हम सब फंसे हैं। राय साहब के साहबी बयान से तय हो चुका है कि अब ज्ञान-गंगा किधर बहेगी।
   हम सोचें कि क्या किसी लेखक को अमेरिकी साम्राज्यवाद के गुनाहों पर इस साधुभाषा के बहाने पर्दा डालने की अनुमति दी जा सकती है ? क्या नागार्जुन,केदार और शमशेर की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और अज्ञेय की अमेरिकी साम्राज्यपरस्त समझ में पटरी बिठायी जा सकती है ? जी हां ,यह काम इस साधुभाषा के बहाने किया जा रहा है।
     मजेदार बात यह है कि नागार्जुन,केदार और शमशेर और अज्ञेय को आप एक साथ कैसे रख सकते हैं ? कभी उनका नजरिया नहीं मिला तो अब उनकी एक साथ जन्मशती कैसे मना सकते हैं ? जब इस तरह का घल्लूघारा होगा तो समाजवाद और साम्राज्यवाद का क्या करोगे ? काग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ अज्ञेय के रिश्ते का क्या करोगो ? जन्मशती के नाम पर इस तरह की विचारधाराहीनता सिर्फ अब हिन्दी के सत्ताभक्तों के यहां ही संभव है यही वजह है कि विभूति बाबू ह्वाइट हाउस के कर्मचारी की भाषा बोल रहे हैं।  
    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी के मंच,गोष्ठी या सेमीनार अमेरिकी साम्राज्यवाद की भाषा के मंच नहीं रहे हैं। विभूति बाबू ने इस बयान के साथ ही सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ और भी पुख्ता कर ली है। इस मौके पर मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है,उसका शीर्षक है "इतना ही काफी है"। नागार्जुन ने लिखा है -
" बोल थे नेह -पगे बोल,
यह भी बहुत है! इतना ही काफी है!"

         





बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- बूढ़े हैं ,बीमार हैं

शासक दल से साँठ-गाँठ है,बूढ़े हैं बीमार हैं
इनसे क्या उम्मीद,यहाँ तो सभी साठ के पार हैं
अजी आपने बुला लिया है,यों ते हम बेकार हैं
बकने की लत छूट चुकी है,बूढ़े हैं बीमार हैं
आपस में कुछ कह-सुन लेंगे,सभी साठ के पार हैं
हाकिम ही तो गुणी जनों के दिलवर हैं,आधार हैं।
    -नागार्जुन 

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- यह क्या हो रहा है जी ?

                      (जनकवि स्व.बाबा नागार्जुन)
यह क्या हो रहा है जी ?
आप मुँह नहीं खोलिएगा !
कुच्छो नहीं बोलिएगा !
कैसे रहा जाएगा आपसे ?
आप तो डरे नहीं कभी अपने बाप से
तो बतलाइए,यह क्या हो रहा है ?
कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?
प्लीज बताएँ तो सही...
अपनी तो बे-कली बढ़ती जा रही
यह क्या हो रहा है जी
प्लीज बताएं तो सही....
नागार्जुन-

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- निभृत निर्जन में

लूटिए चिन्तन-सुख निभृत निर्जन में
आने न दीजिए वृथा विकल्प मन में
अति अधिक अभिरुचि रखिए न धन में
कभी कुफल भी चखिए जीवन में
लूटिए चिन्तन सुख निभृत निर्जन में।
-नागार्जुन

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