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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

इंटरनेट और सामाजिक परिवर्तन के आयाम

      
          संचार तकनीक बहुरंगी होती है।वह कभी एकायामी नहीं होती।उसका संस्कृति ,राजनीति और अर्थव्यवस्था से गहरा सम्बन्ध भी होता है। वह महज कम्युनिकेशन का उपकरण मात्र नहीं है। बल्कि वह तो समाज की धुरी है। सामाजिक अध्ययन किया जाता है वैसे ही कम्युनिकेशन का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। समाज कैसा है और कैसा होगा,इन दोनों सवालों को जानने के लिए उत्पादन सम्बन्धों और कम्युनिकेशन तकनीक की अवस्था का संयुक्त रुप से अध्ययन किया जाना चाहिए। प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में लंबे समय से कम्युनिकेशन के एकाधिक तकनीकी रुप सक्रिय हैं। इनमें वह तकनीकी रुप खोजना चाहिए जो प्रभुत्वशाली हो।प्रभुत्वशाली तकनीकी रुप की पहचान संचार की गति पर आधारित है। संचार की गति के नजरिए से देखें तो आज इंटरनेट
तीव्रगामी संचार माध्यम है। यह माध्यम है और तकनीक भी है।यह ऐसा माध्यम है जिसने अपने पूर्ववर्ती सभी माध्यमों का अपने अंदर समाहार कर लिया है।इसका तकनीकी आधार है उपग्रह संचारप्रणाली और कम्प्यूटर।

कम्प्यूटर और इंटरनेट के आने के बाद कम्युनिकेशन में मूलगामी बदलाव आया है।राजनीति से लेकर संस्कृति तक सब क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन घटित हुए हैं।इसकी शक्ति और स्पीड पर सारी दुनिया मुग्ध है।लेकिन दूसरी ओर लोकतंत्र,लोकतांत्रिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थानों को इस तकनीक ने बहुत तेजी से क्षतिग्रस्त किया है। इंटरनेट और कम्प्यूटर की आर्थिक सफलता पर हम मुग्ध हैं लेकिन इसकी अन्य भूमिकाओं को लेकर विभ्रम में जी रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी खासकर दैनंदिन अभिव्यक्ति के रुपों को लेकर खुश हैं लेकिन कारपोरेट घरानों की भूमिका की अनदेखी करते रहे हैं। राजनीतिक अर्थशास्त्र के आधार पर इंटरनेट के अधिकांश मूल्याँकन असफल साबित हुए हैं । वे यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि पूंजीवाद आखिरकार किस तरह समाज को बना रहा है और पूंजीवाद अपने चरित्र का किस तरह गठन कर रहा है । साथ ही इंटरनेट को घर घर में किस तरह घरेलू मीडियम के रूप में पहुँचाया जा रहा है।इंटरनेट के " फ्लो ने इस कदर प्रभावित किया है कि हम भूल ही गए हैं कि पूंजीवाद अपनी हजम कर जाने की प्रवृत्ति के कारण किस तरह समाज में वर्चस्व बनाने का काम कर रहा है । पूंजीवाद के पक्ष-विपक्ष में बोलने वाले दोनों ही पक्ष यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारे इंटरनेट हमारे "समय "को किस तरह प्रभावित कर रहा है ? खासकर राजनीति ,समाज की प्रकृति और अन्य चीज़ों को किस तरह प्रभावित कर रहा है । मुनाफे की मंशा, व्यावसायिकता , पब्लिक रिलेशन, मार्केटिंग आदि कारपोरेट पूंजीवाद को परिभाषित करने वाले तत्व हैं । ये वे बुनियादी क्षेत्र हैं जिनके आधार पर इंटरनेट को देखा जाना चाहिए । इन्हीं आधारों पर इंटरनेट के विकास का अध्ययन चाहिए और वह इन्हीं आधारों पर विकसित होगा ।मैकचेनी ने लिखा है तकनीक को नियंत्रण के बाहर बताने वाले लोग अब व्यावसायिकता को भी नियंत्रण के बाहर बता रहे हैं ।

माध्यम विशेषज्ञ मैकचेनी के अनुसार इंटरनेट या बृहत्तर डिजिटल क्रांति का निर्धारित तत्व तकनीक मात्र नहीं है । बल्कि हमें देखना चाहिए कि तकनीक को किस शक्ल में लाया जाता है और उसके आने से समाज को किस तरह की शक्ल मिल रही है । इंटरनेट आने के बाद अमेरिका के कारपोरेट घरानों के पास अकूत राजनीतिक शक्ति संचित हो गयी है और वे लोकतंत्र के सिद्धान्तों का उल्लंघन करते रहते हैं । यह संचार नीति अपने असली रुप में निर्माता के रुप में नज़र आती है । दूरसंचार और इंटरनेट के क्षेत्र में बड़ी कंपनियां इंटरनेट व्यावसायिकता के ज़रिए अहर्निश मानवीय स्वभाव को निशाना बना रही हैं। लोगों की सूचनाएँ एकत्रित करना , उनका मुनाफे और विज्ञापन के लिए इस्तेमाल करना , निजी डाटा का दुरुपयोग करना और लोगों को विज्ञापनों के ज़रिए निशाना बनाना , निगरानी करना और प्राइवेसी का उल्लंघन करना आम बात हो गयी है । अमेरिकी राज्य अपने सैन्य हितों और "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर दुरूपयोग करता रहा है ।

कारपोरेट घरानों ने मीडिया में विगत 25सालों में खुलेपन और बहुलतावाद को सीमित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है । उनके अस्तित्व का दारोमदार मौजूदा व्यवस्था को और भी बंद या क्लोज सिस्टम में तब्दील करने पर है । वे जनता के लिए कम से कम विकल्प खुले रखना चाहते हैं । वे इंटरनेट यूजर की राज्य के ज़रिए निगरानी रखना चाहते हैं और व्यावसायिकता का बांध खोल देना चाहते हैं । आज इंटरनेट को मीडिया का सरताज कहते हैं । उसके ज़रिए उपभोक्ता की शक्ति और दांत काटी प्रतिस्पर्धा की बातें की जा रही हैं । आर्थिक विकास के इतिहास में आज यह माध्यम इजारेदारियों के विकास का सबसे बड़ा माध्यम है । डिजिटल तकनीक तेज़ी से नीचे तक जा रही है । वह उन क्षेत्रों में भी पैठ बना रही है जहाँ पर परंपरागत तकनीक घुस नहीं पायी थी । मैकचेनी ने इसे " किलर एपलीकेशन" की संज्ञा दी है । नई डिजिटल तकनीक प्रतिस्पर्धा के युग से निकलकर इजारेदाराना गति से अपना विकास कर रही है । यह सच है कि इंटरनेट की अनेक सफल फ़र्में हैं । इनका काम करने का तरीका पुराने किस्म के पूंजीवाद की याद ताज़ा करता है । सिस्टम के रुप में ये फ़र्में जो शक्ल बना रही हैं उसको समझने की ज़रूरत है । वे प्राइवेसी को नहीं मानतीं,व्यावसायिकता पर जोर देती हैं, कर अदा करने से परहेज करती हैं, टैक्सचोरी करती हैं । तीसरी दुनिया के देशों में कम पगार पर काम कराती हैं । इन सब बातों को हम बहुत ही जल्दी भूल जाते हैं । वे अपने सिस्टम के लिए खास तरीके से लोग तैयार करते हैं जिससे वे अपने कर्मचारियों के मूल्य और मनोदशा बनाने में सफल हो जाते हैं । इंटरनेट की प्रकृति पूंजी संजय की मानसिकता से बंधी है । इंटरनेट आने के बाद खुलेपन और पारदर्शिता का बंद और मुनाफाखोरी की सीमित सूचना व्यवस्था के बीच सीधे टकराव पैदा हुआ है । इंटरनेट का अपना आंतरिक तर्क है जो डिजिटल तकनीक की लोकतांत्रिक क्षमताओं पर निर्भर है। इंटरनेट पर व्यापक सार्वजनिक स्पेस और वातावरण है जो वस्तु विनिमय के संसार से बाहर ले जाता है । लेकिन निजी स्पेस को और भी क्लोज या बंद बनाता है । इसकी प्राथमिकताएं इजारेदाराना बाजार की हैं । इंटरनेट लगातार गैर- व्यावसायिक साइबर स्पेस को पैदा कर रहा है इसके बावजूद यह गैर - व्यावसायिक स्पेस हाशिए पर है।इंटरनेट को यदि लोकतंत्र का माध्यम बनना है तो उसे असमानता , इजारेदारी, भ्रष्टाचार , अ- राजनातिकरण और ठहराव की ताकतों के बढ़ाव को रोकने का काम करना चाहिए ।

डिजिटल तकनीक आज शिखर पर है । इसके कारण समाज क्या पैदा करता है और क्या पैदा नहीं करता , इसके कारकों को आसानी से देखा जा सकता है । मैकचेनी का मानना है इंटरनेट सार्वजनिक वस्तु है और यह सामाजिक विकास के लिए आदर्श माध्यम है । यह अभाव को ख़त्म करता है और उसे लोकतंत्र के हवाले करता है । नई तकनीक इससे भी आगे बढ़कर उत्पादन की प्रकृति मूलगामी तौर पर बदल रही है । आज चीज़ों के निर्माण में कम लागत आती है और ज्यादा सक्षम चीजें बन रही हैं ।समाज में विकेन्द्रीकृत उत्पादन और वातावरण की अनुगूंज देख सकते हैं। । मैकचेनी के अनुसार 80 और 90 के दशक में जब इंटरनेट की शुरुआत हुई थी तब लोगों को लगा कि यह गैर व्यावसायिक अभिव्यक्ति का समुद्र है । वहाँ आम आदमी जाकर समानता के आधार पर अपने को सबल बनाएगा । आर्थिक और राजनीतिक तौर पर ताकतवर महसूस करेगा । प्रौपेगैण्डा कर सकता है उसके ऊपर कोई निगरानी नहीं होगी । यही इंटरनेट का लोकतांत्रिक विजन है । लेकिन व्यवहार में देखा गया कि इंटरनेट आने के बाद बड़े पैमाने पर इजारेदारियां बढ़ी हैं । पूंजी का केन्द्रीकरण बढ़ा है । गूगल,अमाजा़न,एपल,फेसबुक, माइक्रोसाफ्ट आदि कंपनियां सारी दुनिया में वर्चस्व बनाए हुए हैं । धीरे धीरे इनके बीच में महाद्वीप और देश की सीमाएँ भी तय हो जाएंगी । विभिन्न वस्तुओं के पेटेंट को जिस तरह से इन कंपनियों ने अपने नाम कर लिया है उसके कारण किसी नए खिलाड़ी का इंटरनेट खेल में शामिल होना मुश्किल हो गया है ।

डिजिटल क्रांति सूचना और उसकी व्यापक शेयरिंग पर टिकी है । सूचनाओं को इस दौर में जितना शेयर किया गया पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर सूचनाएँ शेयर नहीं की गयीं । यह "सूचना बेचैनी" है। " सूचना बेचैनी" अति सूचना के कारण पैदा हुई है । डिजिटल में लाखों किताबें रोज़ छप रही हैं । अकेले अमेरिका में ही सैंकडों पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं । इंटरनेट के सारी दुनिया में 1995 में 10 मिलियन यूजर थे । सन् 2011 में इनकी संख्या दो विलियन हो गयी । सन् 2020 तक यह संख्या बढ़कर तीन विलियन हो जाएगी । अफ्रीका में मोबाइल फोन के विकास की गति सन् 2000 में दो प्रतिशत थी जो सन्2009 में बढ़कर 28 फीसदी हो गयी है । यह उम्मीद की जा रही है कि 2013 के अंत तक 70 फीसदी जनता के पास मोबाइल पहुँच जाने की उम्मीद है । IMS के शोध के अनुसार मौटेतौर 22 विलियन डिवाइस इंटरनेट और ऑनलाइन कनेक्ट हैं । सन् 2012 तक विश्व की तीन चौथाई आबादी मोबाइल से कनेक्ट हो जाएगी । सन् 2012 की विश्व बैंक रिपोर्ट में कहा कि मनुष्यों पर यह सबसे बड़े प्रभाव की ख़बर है । मैकचेनी के अनुसार इंटरनेट का विकास विगत 200 सालों के इलैक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन के शोध का परिणाम है । वेन स्कॉट के अनुसार यह त्रिस्तरीय पैराडाइम शिफ्ट है । निजी संचार , मासमीडिया और बाज़ार सूचना को नई सूचना प्रणाली में समायोजित करके पेश किया गया है इससे इन तीनों पैराडाइम का अंतर ख़त्म हो गया है । मैकचेनी का मानना है आज इंटरनेट हर उस चीज़ को अपना गुलाम बना रहा है और रुपान्तरित कर रहा है जो उसके रास्ते में आ रही है । वस्तुओं और संचार को इंटरनेट अपने उपनिवेश में शामिल करता जा रहा है। इससे भी बड़ी बात यह कि समूची मानव जाति को स्पीड के साथ एक- दूसरे से जोड रहा है । इसके कारण सभी किस्म के कम्युनिकेशन को क्षणभर में पा सकते हैं । इसके कारण समूची मानवीय संस्कृति आपकी पकड में आ गयी है । आज वह मानव सभ्यता का आमुख है और उसके ज़रिए ही वस्तुएँ और सूचनाएँ पहुँच रही हैं । यह ऐसी मशीन है जिसने हमारी मनुष्य की समझ ही बदलकर रख दी है । आज मनुष्य को समझना और भी मुश्किल हो गया है । इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी के हर पहलू को प्रभावित किया है । आज विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे जीवन को प्रभावित कर रही हैं और इनके कारण विकास की नई नीतियां सामने आ रही हैं ।

इंटरनेट के प्रभाव का यह परिणाम है कि अब हम यह नहीं जानते कि भविष्य में कैसा मनुष्य जन्म लेगा । इंटरनेट के बारे में उपलब्ध सामग्री का विवेचन करते हुए रॉबिन मनसैल ने लिखा कि इंटरनेट सामग्री मूलत: दो कोटि में आती है ,पहली कोटि उस साहित्य की है जो उत्सवधर्मी है और इंटरनेट को महिमामंडित करता है दूसरी कोटि में वह साहित्य आता है जो पलायनवादी है ,ये लोग इंटरनेट की किसी भी किस्म की सकारात्मक भूमिका नहीं देखते। इंटरनेट अध्ययन के क्षेत्र में ये दोनों कोटियां खूब फल फूल रही हैं । हम यहां इंटरनेट के महिमामंडन करने वालों के नजरिए तक सीमित रखेंगे। मैकचेनी ने लिखा मैं इन दोनों कोटियों से प्रभावित हूं और दोनों कोटियाँ संतोषजनक समाधान नहीं देतीं । ये दोनों कोटियाँ बंद गली में ले जाती हैं । इन कोटियों में विभाजन करने वाली कोई बर्लिन की दीवार नहीं है । बल्कि यह दो किस्म के मानसिक गठन के लोगों का विवेचन है ।जेम्स कुरेन ने " मिसअंडरस्टेंडिंग इंटरनेट "( 2012) में लिखा हमें बताया गया इंटरनेट क्रांतिकारी परिवर्तनों का वाहक है । वह व्यापार को संगठित करेगा । समृद्धि लाएगा । वह नए युग के सांस्कृतिक लोकतंत्र का जनक है । यह भी कहा गया पुराना मीडिया ख़त्म हो जाएगा । वह लोकतंत्र को नया जीवन देगा । ई गवर्नेंस के ज़रिए पारदर्शिता बढ़ेगी । कमज़ोर और हाशिए के लोग ताकतवर बनेंगे । ऑटोक्रेट धराशायी होंगे । शक्ति संतुलन बदलेगा । इंटरनेट के कारण दुनिया छोटी हो जाएगी और दो देशों में आपसी संवाद बढ़ेगा । दुनिया में एक दूसरे के प्रति समझदारी बढ़ेगी । एक वाक्य में कहें तो इंटरनेट अबाधित शक्ति है । यह कहा गया कि प्रिंट और बारुद की तरह इंटरनेट अपरिवर्तनीय शक्ति है जो समूचे समाज को स्थायी और अपरिवर्तनीय तौर पर बदल देगा । यह भी कहा गया कि इंटरनेट के द्वारा संसार को बेहतर रुप में बदल दिया जाएगा । इसके बाद संसार को पहचानना मुश्किल होगा । "इंटरनेट केन्द्रित" विश्वासों के कारण उसे सभी तकनीकों का मूलाधार घोषित कर दिया गया । उसे सभी एजेंसियों का आधार बताया गया । जबकि मनसेल के अनुसार डिजिटल तकनीक की खोज और इंटरनेट पर वर्चुअल स्पेस के उदय ने एक किस्म की रहस्यात्मक गुणवत्ता को जन्म दिया है। इस बीच में कईबार मंदी आई लेकिन इंटरनेट और सूचना उद्योग इस संकट से निकलते गए । क्ले सिर्की ने"कागनेटिव सरप्लस" (2010) में लिखा आज जिस तरह की शिरकत नज़र आती है यह उसका छोटा उदाहरण है और यह चारों ओर फैलेगा । यही चीज़ हमारी संस्कृति का आधार हो जाएगी।समस्या यह है कि हमारी संस्कृति कैसी हो । युवा लोग मानते हैं कि नेटमीडिया तो उपभोग, प्रस्तुति, और शेयरिंग का काम करता है । साथ ही वह सबके लिए खुला है । मानवता के लिए लिखने का अर्थ है विश्व के लिए फ्री टाइम को संसाधन बनाना । नए किस्म की शिरकत और शेयरिंग ही इस नए किस्म के संसाधन की विशेषता है। इससे हमारा समाज मूलगामी तौर पर बदलेगा । यही "कागनेटिव सरप्लस "है जो हमारे जीवन को बदलेगा ।हेनरी जैनकिंस ने लिखा, इंटरनेट पर लेखन मशरूम की तरह आ रहा है । यह "सामूहिक बौद्धिकता " की निशानी है । क्योंकि इंटरनेट पर आप अपने संसाधनों एवं कौशल को काम पर लगाते हैं तो उसे सामूहिक बौद्धिकता में रुपान्तरित करते हैं ।मिशेल नेलशेन (फिजिसिस्ट और क्वांटम कम्प्यूटर वैज्ञानिक ) ने "री इनवेंटिंग डिस्कवरी"( 2012) में लिखा इंटरनेट ने जन सहभागिता को संभव करके विज्ञान में कॉगनेटिव वैविध्यगत मूलगामी परिवर्तन किए हैं । ऑनलाइन उपकरणों की उपलब्धता के कारण वैज्ञानिकों की खोजों का रूप ही बदल दिया है । इसके कारण विज्ञान और समाज का संबंध बुनियादी तौर पर बदल गया है । यहाँ पर असंख्य लोगों के शिरकत करने की संभावनाएं हैं और असंख्य लोग शिरकत कर रहे हैं । ऑनलाइन सहभागिता के कारण एकदिन ऐसा भी आएगा कि नोबुल पुरस्कार सामूहिक तौर पर काम करने वाले एमेच्योर वैज्ञानिकों के समूह को मिलेगा । इंटरनेट से सिर्फ़ व्यापार ही नहीं होगा बल्कि अब हर चीज़ का पेटेंट कराने की ज़रूरत होगी और यह भी पता चलेगा कि ज्ञान को कैसे निर्मित किया जाता है । इस प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता । इंटरनेट आने के बाद मानवीय प्रकृति में बुनियादी बदलाव आया है । हम बेहतरी की ओर बढ़े हैं । चारों ओर नेट पर एक दूसरे से सहयोग करके लोग काम कर रहे हैं । सहभागिता से काम कर रहे हैं । ईमानदारी से काम कर रहे हैं , सही दिशा में काम कर रहे हैं । उदार व्यवहार कर रहे हैं । समूहों में मिलकर काम कर रहे हैं । सही बातों के लिए सहयोग कर रहे हैं । सभ्यता और ममता के साथ पेश आ रहे हैं । विकीपीडिया जैसे ओपन सोर्स मंच खुले हैं ।



मैकचेनी ने लिखा है एक ज़माना था जब सुस्टेंस जैसे लोग कहते थे कि इंटरनेट के कारण लोग असामाजिक हो रहे हैं ।जनता से कट रहे हैं । लेकिन 2006 में सुस्टेन्स ने ही इंफोटोपिया में लिखा कि मनुष्य को इंटरनेट से संचित ज्ञान मिल रहा है ।विकीपीडिया के आने के साथ हमने सूचना की आक्रामकता को मानना आरंभ कर दिया है । उसके प्रति सहिष्णु बने हैं । परा-राष्ट्रीय , परा-भाषी संबंध बने हैं । निज के स्वार्थ और सामाजिक स्वार्थ की पूर्ति के मामले में संतोष मिला है । जैफ जरविस ने इंटरनेट के सार्वजनिक पहलू पर रोशनी डालते हुए लिखा ,"इंटरनेट आने के बाद अभूतपूर्व सार्वजनिकता का उदय हुआ है । यह पब्लिकनेस युगान्तरकारी है ,फलत : पूरी तरह डिसरप्टिव है । इस पब्लिकनेस ने उन संस्थानों को चुनौती दी है जो सूचना और दर्शकों को नियंत्रित करते थे । पब्लिकनेस एक तरह से उन संस्थानों की कीमत पर सशक्तिकरण हासिल करने का प्रयास है ।तानाशाह,राजनेता , मीडिया मुग़ल बताया करते थे कि हम क्या सोचें और क्या न सोचें, लेकिन अब इन लोगों का ज़माना लद गया । आज हमारा समाज वास्तव अर्थों में सार्वजनिक समाज बना है । राजनेता सुनने को मजबूर हैं कि इंटरनेट पर क्या कहा जा रहा है या जनता क्या कह रही है । राजनेताओं को जनता का सम्मान करने की , व्यक्ति के तौर पर सम्मान करने की आदत डालनी होगी । क्योंकि समूह के तौर पर पब्लिक के तौर पर जो शक्ति हासिल की है ,यह उसका सम्मान है । इंटरनेट आने के बाद लोकतांत्रिक शक्तियों की ताकत में इजाफा हुआ है । इंटरनेट तो लोकतंत्र की शक्ति है । यह सूचना की इजारेदारी और केन्द्रीकृत नियंत्रण का अंत है " सोशलमीडिया एंड टैक्नोलाजी " में पामेला लुंड ने लिखा " यह माध्यम पहले की तुलना में और भी ज्यादा शक्ति देता है, मनुष्य को इतनी शक्ति पहले कभी नहीं मिली ।" जरविस ने लिखा है कि "इस माध्यम के खिलाफ़ प्रतिरोध निरर्थक है "











शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

पूंजीवादी अंधविश्वास और प्रौपेगैण्डा का संगम हैं निर्मल बाबा



निर्मल बाबा के टीवी विज्ञापनों और बेशुमार सालाना आमदनी की लेकर हठात मीडिया ने ध्यान खींचा है। मीडिया में चल रही बहस के दो आयाम हैं, पहला, मीडिया का एक वर्ग निर्मल बाबा के धर्म के धंधे की आलोचना कर रहा है और उन्होंने जो दौलत कमाई है उसके अन्य कामों में इस्तेमाल करने पर आपत्ति कर रहा है।  धर्म के धंधे में आमदनी है,साथ ही धर्म की आय का अन्य कामों में इस्तेमाल होना भी आम बात है।
   मीडिया में चल रही बहस का एक दूसरा आयाम है बाबा के चमत्कारों की आलोचना का। बाबा का इन दोनों के संदर्भ में कहना है कि वे वैध ढ़ंग से कमाई कर रहे हैं, वे करदाता है ,उनके यहां दौलत के आय-व्यय को लेकर पारदर्शिता है, और जो कुछ भी वे खरीदते हैं उसका पेमेण्ट चैक से करते हैं।
      बाबा का यह भी कहना है उन्होंने कभी चमत्कार की बात नहीं की। उन्होंने  कभी अंधविश्वासों का प्रचार नहीं किया, वे तो मात्र भगवान की कृपा बांट रहे हैं।
  धर्म की अमीरी -
       निर्मल बाबा की अमीरी की झलक लेने के पहले कुछ बातें दौलत के तर्कशास्त्र पर कहना चाहेंगे। लोकतंत्र में सबको धन कमाने का हक है यहां तक कि भगवान को भी धन कमाने का हक है। दौलत कमाना और सुख से रहना पूंजीवाद का आम लक्षण है। पूंजीवाद में दौलत कैसे कमाते हैं ,यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है दौलत।
    दौलत कभी ईमानदारी से नहीं कमा सकते। ईमानदारी से पेट भर सकते हैं। सुख से सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन अकूत संपत्ति अर्जन के लिए अन्य का सरप्लस हजम करने की कला में पारंगत होना चाहिए। जो परजीवी लोग है वे बिना परिश्रम किए सरप्लस कमाते हैं और धर्म उनके विचरण का प्रधान क्षेत्र है। निर्मल बाबा इस धर्म के क्षेत्र के बड़े सरप्लस कमाने वाले व्यक्ति हैं।
     सतह पर बाबा हो सकता है वैध ढ़ंग से ही कमा रहे हों,कानून का पालन करके कमा रहे हों,इसके आधार पर वे यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कोई भी पैसा अवैध ढ़ंग से नहीं कमाया। सवाल यहां सवाल वैध-अवैध ढ़ंग से कमाई का नहीं है।पैसा वैध है या अवैध है यह देखने का काम आयकर विभाग और अन्य सरकारी संस्थान करेंगे।हमारे लिए महत्वपूर्ण  सवाल है विचारधारा का। किस नजरिए से निर्मल बाबा अपने कामों के जरिए और किसकी वैचारिक सेवा कर रहे हैं? क्या वे जनता की सेवा कर रहे हैं ? या फिर अमीरों या पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपतिवर्ग की सेवा कर रहे हैं ?
     निर्मल बाबा के समूचे तंत्र का भगवान की कृपा और जनता की सेवा से कोई संबंध नहीं है।बल्कि निर्मल बाबा परवर्ती पूंजीवाद के अंधविश्वास उद्योग के बड़े प्रोडक्ट हैं। वे बड़े ही कौशल के साथ अंघविश्वास का प्रचार करके दौलत कमा रहे हैं और आम जनता की अति पिछड़ी भावनाओं का शोषण कर रहे हैं। पहले उन तथ्यों और खबरों को देखें जो उनके अर्थतंत्र के संबंध में अखबारों में आई हैं।   
   दैनिक भास्कर के अनुसार बाबा ने 'आज तक' को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि उनका सालाना टर्न ओवर 235-240 करोड़ रुपये का है और वह पूरी रकम पर इनक्मटैक्स देते हैं। लेकिन शनिवार को 'प्रभात खबर' ने उनके खातों से जुड़ी जो जानकारी सार्वजनिक की है, उससे बाबा की बात पूरी तरह सच नहीं लगती। इसके मुताबिक निर्मल बाबा के दो खाते हैं। एक निर्मल दरबार के नाम से (जिसका नंबर टीवी पर चलता रहता है) और दूसरा निर्मलजीत सिंह नरूला के नाम से। इस खाते का नंबर है 1546000102129694। यह खाता नंबर टीवी पर नहीं दिखाया जाता। इस खाते में चार जनवरी 2012 से 13 अप्रैल 2012 के बीच 123 करोड़ (कुल 1,23,02,43,974) रुपये जमा हुए। इस राशि में से 105.56 करोड़ की निकासी भी हुई। 13 अप्रैल को इस खाते में 17.47 करोड़ रुपए बचे थे।
  निर्मल बाबा को विभिन्न प्रकार के जमा पर 13 मई 2011 से 31 मार्च 2012 तक के बीच ब्याज के रुप में 85.77 लाख रुपये मिले।  यह खबर है कि उन्होंने अपने पैसों का विदेशी खातों में ट्रांसफर किया है । बाबा ने 25 करोड़ की एफडी भी करा रखी है।
प्रभात खबर' की रिपोर्ट के मुताबिक निर्मल दरबार के नाम से आईसीआईसीआई बैंक में खुले खाते (संख्या 002-905-010-576) में शुक्रवार को सिर्फ 34 लाख रुपये जमा किये गये। पहले इस खाते में प्रतिदिन औसतन एक करोड़ रुपये जमा किये जा रहे थे। पहले औसतन चार से साढ़े चार हजार लोग प्रतिदिन निर्मल बाबा के खाते में राशि जमा कर रहे थे, लेकिन शुक्रवार शाम पांच बजे तक देश भर के 1800 लोगों ने ही बाबा के आईसीआईसीआई बैंक खाते में राशि जमा की थी। यानी 40 फीसदी कम।
     हिन्दी के दैनिक अखबारों में यह भी छपा है कि बाबा अपने भक्तों से दो किस्म का शुल्क लेते हैं पहला है ,निबंधन शुल्क ,यह एक प्रकार से समागम में आने की एंट्री फीस है, जिसमें 2 साल से ऊपर के बच्चे से भी दो हजार रुपए लिए जाते हैं।दूसरा है दसबंद शुल्क , जिसमें बाबा के भक्तों को पूर्णिमा से पहले अपनी आय का 10वां हिस्सा निर्मल दरबार को देना होता है।
     मीडिया अनुमान के अनुसार बाबा के खाते में विगत तीन महीनों में 109 करोड़ जमा हुए हैं। ए‌क हिंदी अखबार ने बाबा के तीन बैंक अकाउंटों का खुलासा किया है। अखबार के मुता‌बिक पंजाब नेशनल बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और यस बैंकों में बाबा के खाते हैं, जिनमें से दो खातों को रिकॉर्ड हाथ लगा है। इनमें से एक खाते में केवल जनवरी 2012 से अप्रैल 2012 के पहले सप्ताह तक 109 करोड़ रुपए जमा किए गए हैं। यानि 1.11 करोड़ रुपए प्रतिदिन जमा किए गए।
वहीं दूसरे बैंक खाते में 12 अप्रैल 2012 को 14.93 करोड़ रुपए जमा हुए हैं। यह रकम सुबह 9.30 बजे से दोपहर 1 बजे तक जमा की गई। शाम तक इस खाते में करीब 16 करोड़ रुपए जमा किए गए। इसके अलावा एक बैंक में बाबा के नाम से 25 करोड़ रुपए का फिक्‍स्ड डिपोजिट भी है। बाबा का एक खाता निर्मलजीत सिंह नरूला और दूसरा खाता निर्मल दरबार के नाम से है। निर्मल दरबार में भक्तों द्वारा जमा की रकम को बाद में बाबा अपने अकाउंट में ट्रांसर कर लेते हैं।

एक अखबार ने यह भी लिखा है कि हाल के वर्षों में लोगों का झुकाव अध्यात्म व धार्मिक कार्यों की ओर पहले की अपेक्षा बढ़ा है। जिसके कारण चारों ओर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में सहभागिता करने की लोगों में होड़ सी मची हुई है। वहीं लोग धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता देकर अपनी किस्मत की रेखाओं को दुरूस्त करने में लगे हुए हैं। इस मामले में गिरिडीह के लोग भी पीछे नहीं है। टोटकों और पूजा बाजार में मिलने वाले आधुनिक यंत्रों की खरीदारी से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में ये दो कदम आगे हैं।

इस प्रतिस्पर्धा के युग में जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना को देखते हुए लोगों का रुझान आध्यात्मिकता ही नहीं, बल्कि नए किस्म के धार्मिक अनुष्ठानों पर भी है।
अखबारों में छपे विवरण के अनुसार निर्मल बाबा उर्फ निर्मल जीत सिंह नरूला एक आध्यात्मिक गुरू है, जो दिल्ली की कैलाश कालोनी में रहते हैं। इससे पूर्व ये झारखंड के डाल्टनगंज में ठेकेदारी का काम करते थे। निर्मल बाबा के अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार निर्मल बाबा के पास छठी इंद्रिय (सिक्स्थ सेंस) है। कहते हैं कि इस रहस्यमयी छठी इंद्रिय के विकसित होने से मनुष्य को भविष्य में होने वाली घटना के बारे में पहले से ही पता चल जाता है।
    बाबा का दावा है छठी इंद्री का कुंडलिनी से गहरा ताल्लुक है।कुंडलिनी जागृत करने के पश्चात मनुष्य त्रिकालदर्शी बन जाता है। लेकिन कुंडलिनी जागृत करने के लिये कठिन साधना की जरूरत होती है। ये एक सतत प्रक्रिया है, जब दैहिक शुद्धि के पश्चात, मानसिक शुद्धि अनिवार्य होती है। शास्त्रों में इस क्रिया में गुरू की असीम भागीदारी को भी जरूरी बताया गया है। इसका इस्तेमाल शास्त्रों में सिर्फ मानवीय हितों को साधने के निहित किया गया है। इन तंत्र-मंत्रों के बल पर मनुष्य अतीत, वर्तमान और भविष्य को आसानी से देख, सुन और समझ सकता है।
 बाबा की वेबसाइट के अनुसार निर्मल बाबा 10 साल पहले साधारण व्यक्ति थे, लेकिन बाद में उन्होंने ईश्वर के प्रति समर्पण से अपने भीतर अद्वितीय शक्तियों का विकास किया। ध्यान के बल पर वह ट्रांस (भौतिक संसार से परे किसी और दुनिया में) में चले जाते हैं। ऐसा करने पर वह ईश्वर से मार्गदर्शन ग्रहण करते हैं, जिससे उन्हें लोगों के दुख दूर करने में मदद मिलती है। निर्मल बाबा के पास मुश्किलों का इलाज करने की शक्ति है। वे किसी भी मनुष्य के बारे में टेलीफोन पर बात करके पूरी जानकारी दे सकते हैं। यहां तक कि सिर्फ फोन पर बात करके वह किसी भी व्यक्ति की आलमारी में क्या रखा है, बता सकते हैं। उनकी रहस्मय शक्ति ने कई लोगों को कष्ट से मुक्ति दिलाई है।
ये सारी बातें निर्मल बाबा की ईश्वरीय इमेज बनाने और  अंधविश्वासी इमेज बनाने वाली हैं।
निर्मल बाबा के अंधविश्वास-
        निर्मल बाबा के प्रचार अभियान के जो टीवी कार्यक्रम बनाए गए हैं वे काफी मेहनत और कानूनी दांव-पेंच से बचने और तर्कवादियों के हमलों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। बाबा का यह कहना गलत है कि वह अंधविश्वास और चमत्कार का इस्तेमाल नहीं करते।
   इस प्रसंग में पहली बात यह है कि बाबा की इमेज के पक्ष में जो तर्क दिए गए हैं वे सबके सब अवैज्ञानिक और काल्पनिक हैं। बाबा के पास दिव्यशक्ति जैसी कोई चीज नहीं है। संसार में दिव्यशक्ति जैसी कोई चीज अभी तक किसी ने नहीं देखी है ।बाबा के पास दिव्यशक्ति होने का दावा करना ही अपने आपमें अंधविश्वास फैलाना है और इसका प्रत्येक स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।
   दूसरा अंधविश्वास यह कि बाबा के ऊपर ईश्वर कृपा है और वे अपने प्रवचनों से लेकर विज्ञापनों तक सिर्फ ईश्वरकृपा ही बांटते हैं। असल में , ईश्वरकृपा के नाम पर अंधविश्वासों का प्रचार किया जा रहा है। ये अंधविश्वास पुराने किस्म के अंधविश्वासों से भिन्न नए किस्म के हैं।
     मसलन् ,एक व्यक्ति ने कहा मेरे बिजनेस में घाटा हो गया तो बाबा ने पूछा आपने कल दही खाया था तो उस व्यक्ति ने कहा नहीं ,तो बाबा बोले आज रात को दही खाकर सोना सब ठीक हो जाएगा।
   एक अन्य व्यक्ति ने कहा मेरे पैरों में दर्द हो रहा है किसी दवा से ठीक नहीं होता। बाबा ने कहा तेरे पास अलमारी में दस के नोटों की गड्डी है ,उसने कहा नहीं ,तो बाबा बोले जा अलमारी में एक दस के नोटों की गड्डी रख दे दर्द ठीक हो जाएगा।
समूचा प्रचार इस तरह के नॉनसेंस उपायों के आधार पर नए किस्म के अंधविश्वासों को संप्रेषित करता है। अंधविश्वास की खूबी है कि उसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं होता , वह संबंधित समस्या से हमेशा डिसकनेक्ट होता है। मसलन् किसी के पैर में दर्द है तो उसका दस के नोट की गड्डी से क्या संबंध है ? इसी तरह बाबा कहने के लिए सतह पर ढोंगियों की भाषा और इमेज का इस्तेमाल नहीं करते। वे जिस चीज का दोहन करते हैं वह है लोगों का विश्वास।
     बाबा के भक्त मानते हैं कि बाबा की बात पर विश्वास करेंगे तो समस्या हल हो जाएगी। आम लोगों के विश्वास का अंधविश्वास और धंधे के लिए इस्तेमाल सीधे ठगई है। इस ठगई को 40 टीवी चैनलों से अहर्निश विज्ञापन चलाकर वैधता प्रदान की जा रही है। यह काम वैसे ही किया जा रहा है जैसे कोई कंपनी अपने माल की बिक्री बढ़ाने के लिए झूठ का प्रचार करती है। मसलन क्रीम बनाने वाली कंपनी का यह दावा असत्य है कि उसकी क्रीम का प्रयोग करने से रंग गोरा हो जाएगा। सच यह है कि क्रीम लगाने से रंग गोरा नहीं हो सकता।  रंग को किसी भी कॉस्मेटिक के जरिए बुनियादी तौर पर बदला नहीं जा सकता। हां,मेकअप के जरिए कुछ देर के लिए बदल सकते हैं लेकिन इससे बुनियादी रंग खत्म नहीं होगा।
     निर्मल बाबा ने जिस कदर दौलत कमाई है उससे यह भी पता चलता है कि हमारे मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग में आज भी एक बड़ा तबका है जिसके मन के अंदर अंधविश्वासों की जड़ें गहरी हैं। जो मीडिया अहर्निश उपभोक्ता वस्तुएं के बारे में तरह तरह के अंधविश्वास फैलाता रहता है वह मीडिया कैसे निर्मल बाबा को चुनौती दे सकता है ?
   निर्मल बाबा के अंधविश्वासों का फ्लो वस्तुतः मीडिया विज्ञापनों में प्रतिदिन छप रहे अंधविश्वासों के वैचारिक फ्लो में  आ रहा है। ऐसी अवस्था में मीडिया में निर्मल बाबा के बारे में आप कुछ भी कहें वे और ताकतवर बनेंगे। निर्मल बाबा नए युग के उपभोक्ता मालों की दुनिया के अंधविश्वास उद्योग के बड़े ब्रॉँड हैं। इनकी जड़ें पूंजीवादी विज्ञापन कला के वैचारिक ताने-बाने से बनी हैं। इस वैचारिक तानेबाने को जब तक समग्रता में वैचारिक चुनौती नहीं मिलती,निर्मल बाबा जैसे लोग मसलन बाबा रामदेव,श्रीश्री रविशंकर,मुरारी बापू आदि फलते-फूलते रहेंगे। निर्मल बाबा का सवाल वैध संपत्ति का सवाल नहीं है बल्कि अंधविश्वास उद्योग से कैसे लड़ें, इसके परिप्रेक्ष्य से जुड़ा है।
       निर्मल बाबा पूंजीवादी मालों के संसार में एक माल है। इसकी धुरी है विज्ञापन और आधुनिक अंधविश्वास। इसमें सिरों की गिनती का महत्व वैसे ही जैसे फ्रिज की बिक्री में सिरों की गिनती का महत्व है,बालों के रंग की बिक्री में जिस तरह सिरों की गिनती का महत्व है वैसे ही बाबा भी कह रहे हैं मेरे लाखों अनुयायी हैं। यानी महत्वपूर्ण है सिरों की गिनती। सिरों की गिनती के आधार पर नए पूंजीवादी युग का अंधविश्वासों से भरा तंत्र और उसकी विचारधारा काम कर रही है। आप जब तक इसकी विचारधारात्मक जड़ों पर हमले नहीं करेंगे इसका कुछ भी बाल बांका नहीं कर सकते।
    इसकी विचारधारा का आधार है जो कहा जा रहा है उस पर विश्वास करो और मानो। सवाल न करो। उपभोग करो। अनुकरण करो। यह मूलतः विवेकहीन उपभोक्ता संस्कृति के निकृष्टतम तर्कों से रची विचारधारा है। इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।इसका पूंजी के उत्पादन और पुनर्रूत्पादन से संबंध है। यह स्व-निर्मित विचारधारात्मक वातावरण में रमण करती है।
    आप देखेंगे कि सभी रंगत के बाबा इन दिनों विज्ञापनों,टी चैनलों और इलैक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन के रूपों से लेकर प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों और जन-संपर्क एजेंसियों की मदद ले रहे हैं। यह स्व-निर्मित वातावरण है और कालान्तर में वे इसे समाज निर्मित वातावरण के नाम से प्रचारित करने लगते हैं।
     वे इनदिनों फेसबुक और इंटरनेट आदि का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।एक अखबार ने लिखा है- निर्मल बाबा ट्विटर और गूगल पर ट्रेंडिंग टॉपिक बन गए हैं। गूगल पर 'निर्मल बाबा फ्रॉड' खूब सर्च किया जा रहा है। मीडिया में नकारात्‍मक खबरें आने के बाद लगता है बाबा ने भी इंटरनेट को हथियार के रूप में इस्‍तेमाल करने की ठोस पहल की है। उनके फेसबुक पेज से साढ़े तीन लाख से अधिक लोग जुड़े हैं और रोजाना हजारों नए लोग जुड़ रहे हैं। देश के सबसे बड़े फेसबुक पेज 'इंडिया' जिससे करीब 39 लाख लोग जुड़े हैं, पर हुई पोस्ट पर भी इतनी प्रतिक्रियाएं या 'लाइक' नहीं आते जितने बाबा के पेज पर आ रहे हैं।
 हजारों भक्त बाबा के फेसबुक पेज पर कोटि-कोटि प्रणाम कर रहे हैं। कोई निर्मल बाबा में आपनी आस्था का वर्णन कर रहा है तो कोई उनसे बंगला और गाड़ी मांग रहा है। लेकिन dainikbhaskar.com ने तीन दिन तक निर्मल बाबा के फेसबुक पेज का गहन अध्ययन किया तो संदेह बढ़ाने वाली कुछ अलग ही कहानी समझ में आई।
 बाबा के पेज पर मीडिया के खिलाफ भी खूब भड़ास निकाली जा रही है। शुक्रवार को 'स्टार न्यूज' पर जब निर्मल बाबा पर कार्यक्रम चल रहा था तब मात्र दो घंटे के भीतर करीब पांच हजार प्रतिक्रियाएं बाबा के फेसबुक पेज पर आईं। इनमें अधिकतर में बाबा की शक्तियों का गुणगान किया गया। ये अलग बात है कि बाबा के विरोध में पोस्ट हो रही प्रतिक्रियाओं को तुरंत हटाया भी जा रहा था। 'आजतक' पर जब निर्मल बाबा 'प्रकट' हुए तब भी उनके भक्त फेसबुक पेज पर सक्रिय हो गए और बाबा का जमकर गुणगान करने लगे।
   अखबार ने लिखा है बाबा का गुणगान कर रहे सैंकड़ों प्रोफाइल ऐसे थे जो देखते ही फर्जी प्रतीत हो रहे थे। जब हमने और गहन पड़ताल की तो पता चला कि इनमें से अधिकतर प्रोफाइल मार्च के अंत में या अप्रैल के पहले सप्ताह (ध्यान दें, इसी दौरान बाबा ब्लॉगों की चर्चा से निकलकर मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खी बने थे) में बनाए गए हैं। इन फर्जी लग रहे प्रोफाइलों से बाबा के फेसबुक पेज पर नियमित टिप्पणियां की जा रही हैं। उनकी कृपा बरसने से जुड़े के किस्से भी बारी-बारी से सुनाए जा रहे हैं। हमने ऐसे ही पचास से ज्यादा प्रोफाइलों की आईडी सेव भी की है। अधिकतर लड़कियों के नाम से बनाए गए इन प्रोफाइल में लोकेशन भी अलग-अलग शहरों की बताई गई है, ताकि ये संदिग्‍ध नहीं लगें। पर इनमें से किसी पर भी प्रोफाइल पिक्‍चर पोस्ट नहीं है।हमने इनमें से कुछ प्रोफाइलों को संदेश भेजकर इनके अनुभव मांगे। लेकिन एक ने भी अपना अनुभव साझा नहीं किया। एक से जवाब आया भी तो उसने फोन पर बात करने से इनकार कर दिया।
 बाबा के फेसबुक पेज से 3 लाख 57 हजार से अधिक लोग जुड़े हैं और इस पेज पर विजिट करने वाले प्रोफाइल में करीब 60 प्रतिशत महिलाएं हैं जिनमें से ज्यातार युवा और पढ़ी लिखी पेशेवर हैं। बाबा के पेज से छात्र भी भारी संख्या में जुड़े हैं। एक छात्र ने बाबा के पेज पर अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि कॉलेज उसे परीक्षा नहीं देने दे रहा था लेकिन उसने बाबा से प्रार्थना की तो उसे इम्तिहान में बैठने की अनुमति मिल गई।
  एक अन्य अखबार ने लिखा फेसबुक पर बाबा के 32 लाख प्रशंसक हैं। टीवी और इंटरनेट के जरिए निर्मल बाबा पूरे भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी रोज लोगों तक पहुंचते हैं। निर्मल बाबा के समागम का प्रसारण देश-विदेश के तकरीबन 39 टीवी चैनलों पर सुबह से लेकर शाम तक रोजाना करीब 25 घंटे अलग-अलग समय पर किया जा रहा है। भारत में विभिन्न समाचार, मनोरंजन और आध्यात्मिक चैनलों के अलावा विदेशों में टीवी एशिया, एएक्सएन जैसे चैनलों पर मध्य पूर्व, यूरोप से लेकर अमेरिका तक उनके समागम का प्रसारण हो रहा है। फेसबुक पर निर्मल बाबा के प्रशंसकों का पेज है, जिसे करीब 32 लाख लोग पसंद करते हैं। इस पेज पर निर्मल बाबा के टीवी कार्यक्रमों का समय और उनकी तारीफ से जुड़ी टिप्पणियां हैं। ट्विटर पर उन्हें 50 हजार लोग फॉलो कर रहे हैं।

मीडिया ने सवाल  उठाया  है कि आखिरकार निर्मल बाबा ने पिछले दस सालों में ऐसा क्या किया कि वे आज एक असाधारण रहस्यमय शक्ति के माल‌िक बन बैठे है? इस रहस्यमय शक्ति की बदौलत करोड़ों रुपये प्रतिदिन की आमदनी अर्जित करने वाले निर्मल बाबा देश के उन गरीबों और लाचारों को अपना आशीर्वाद क्यों नहीं देते जिन्हें दो जून की रोटी के लिए रोज मशक्कत करनी पड़ती है।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

सावधान इंटरनेट पर सीआईए आपकी जासूसी कर रहा है


   कल तक इंटरनेट पर आनंद और स्‍वाधीनता के दि‍न थे। अब खतरा सामने आ गया है। अमेरि‍की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए ने अपने पैर इंटरनेट पर रख दि‍ए हैं। सीआईए की नजरदारी का काफी गंभीर अर्थ है। अब सीआईए के 'ई जासूस' आपके ब्‍लॉग पढ़ना चाहते हैं,ट्वि‍टर और फेसबुक में आप क्‍या कर रहे हैं उसे देखना चाहते हैं। यहां तक कि‍ वे यह भी जानना चाहते हैं कि‍ इंटरनेट से आप कौन सी कि‍ताब 'अमाजॉन' से खरीद रहे हैं ,कौन सी कि‍ताब आप इंटरनेट पर पढ़ रहे हैं। इस सबका हि‍साब सीआईए तैयार कर रहा है। अमेरि‍का की एक नि‍वेश कंपनी ' इन -क्‍यू- टेल' ने अपनी पूंजी का बड़ा हि‍स्‍सा इस क्षेत्र में नि‍वेश करने का फैसला लि‍या है। यह फर्म सीआईए की सहयोगी कंपनी है। इस कंपनी ने दृश्‍य तकनीकी संसार में पैसा लगाने का फैसला कि‍या है। यह काम वह अनेक साफटवेयर कंपनि‍यों में पैसा नि‍वेश करके करना चाहती है। इसके बहाने वह पूरे इंटरनेट पर नजरदारी करेगी।
     अमेरि‍का में गुप्‍तचर सेवाओं में एक बड़ा आन्‍दोलन चल रहा है जि‍सके तहत नेट की सूचनाओं को जानने,एकत्रि‍त करने और फि‍र उसे सीआईए,एफबीआई आदि‍ के काम में लगाने के लि‍ए हजारों लोग लगे हैं। अब आपकी इंटरनेट पर लि‍खी प्रत्‍येक चीज उनके नि‍शाने पर है। 
    इस समय इंटरनेट पर मीडि‍या के वि‍भि‍न्‍न माध्‍यमों के जरि‍ए सूचनाओं,कार्यक्रमों आदि‍ के संचार की बाढ़ आयी हुई है। एक अनुमान के अनुसार वेब 2.0 साइट पर जाने वाले लोगों की तादाद प्रति‍दि‍न पांच लाख है। इसी तरह तकरीबन एक मि‍लि‍यन से ज्‍यादा लोग प्रति‍दि‍न ब्‍लॉग,बातचीत,ई व्‍यापार, फ्लि‍कर,यू ट्यूब,आदि‍ का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। सीआईए के गुप्‍तचर अपने '' जासूसों के जरि‍ए यह भी वर्गीकरण कर रहे हैं कि‍ कौन कि‍तना प्रभावशाली संप्रेषण कर रहा है। प्रभावशाली,कम प्रभावशाली और सामान्‍य संप्रेषण के नाम से तीन वर्ग बनाए गए हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि‍ यूजर कि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं व्‍यक्‍त कर रहा है। यूजर कौन सी पोस्‍ट को फार्वर्ड कर रहा है। नेट लेखक के साथ  यूजर कि‍स तरह का संवाद कर रहा है। जि‍न मसलों पर सोशल नेटवर्क या ब्‍लाक पर चर्चाएं हो रही हैं उनका वि‍श्‍व राजनीति‍ पर क्‍या असर होगा। अगर असर गंभीर होने की संभावनाएं हैं तो सीआईए जासूस चेतावनी देंगे। ये बातें 'इन-क्‍यू टेल' के प्रवक्‍ता डोनाल्‍ड ति‍घे ने कही हैं।  इस कार्य के लि‍ए खास कि‍स्‍म का सॉफ्टवेयर इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍सके जरि‍ए आपकी सूचनाएं एकत्रि‍त की जा रही हैं। यह सॉफ्टवेयर बताता है कि‍ कि‍सकी पोस्‍ट पॉजि‍टि‍व है, कि‍सकी नेगेटि‍व है। वि‍भि‍न्‍न संचार उपकरण बनाने वाली कंपनि‍यां और संचार बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यां इस सॉफटवेयर का इस्‍तेमाल कर रही हैं। 'इन-क्‍यू-टेल' कंपनी अपनी इस योजना के आधार पर एक पायलट सर्वे करने जा रही है और यह पायलट सर्वे यदि‍ सफल रहता है तो इसके बड़े ही दूरगामी परि‍णाम होंगे। यह सीधे व्‍यक्‍ति‍ के मौलि‍क अधि‍कारों के साथ मानवाधि‍कारों का हनन है। 'आई-क्‍यू-टेल' कंपनी ने इस काम में अभी 90 लोगों को लगाया हे और आरंभि‍क तौर पर 20 मि‍लि‍यन डालर का नि‍वेश कि‍या है, लेकि‍न यह नि‍वेश बढ़ भी सकता है। इस मामले में वि‍देशी भाषाओं पर भी नजरदारी रहेगी। अभी 9 वि‍देशी भाषाएं इस प्रयोग के लि‍ए चुनी गयी हैं। यह सारा काम 'वि‍जि‍वि‍ल टेक्‍नोलॉजी' कंपनी के जरि‍ए कराया जा रहा है। उसने ही इसका सॉफ्टवेयर बनाया है। यह कंपनी 2008 से इस क्षेत्र में प्रवेश पाने की कोशि‍श कर रही थी और अंत में उसे सफलता मि‍ल ही गयी। यह कंपनी अमरीकी गुप्‍तचर संस्‍था की सहयोगी कंपनी के रूप में काम कर रही हे और इसने वि‍भि‍न्‍न भाषाओं के वि‍शेषज्ञ और सैन्‍य वि‍शेषज्ञ इंजीनि‍यर जुगाड़ कि‍ए हैं। इनका काम है वि‍भि‍न्‍न भाषाओं की नेट संचार सामग्री की जांच-पड़ताल करना। इस समय अरबी,फ्रेंच, उर्दू, फारसी और रूसी पर नजरदारी चल रही है। इस कंपनी ने अपनी 'सूचना व्‍यवस्‍था सुरक्षा इंजीनि‍यरों' की एक वि‍शालकाय फौज तैयार की है इसमें सूचना तकनीक के कुशल लोगों को शामि‍ल कि‍या गया है। इसमें वे लोग भी शामि‍ल कि‍ए गए हैं जो पॉलि‍ग्राफ सुरक्षा में कुशल माने जाते हैं।
    सीआईए परेशान है सोशल नेटवर्किंग साइट की बढ़ती जनप्रि‍यता से। वे लगातार छान फटक रहे हैं कि‍ कौन सी साइट जनप्रि‍य है और उस पर तुरंत अपने '' जासूस लगा देते हैं। ये '' जासूस लगातार बेचैन आत्‍मा की तरह एक साइट से दूसरे साइट की ओर भागते रहते हैं। अमेरि‍का के जासूस परेशान हैं कि‍ नेट के 70 प्रति‍शत यूजर गैर अमेरि‍की हैं। ये अमेरि‍का के बाहर रहते हैं। इनका जाल दुनि‍या के 180 देशों में फैला हुआ है। तकरीबन 200 गैर अंग्रेजी भाषी ब्‍लागर-ट्वि‍टर समूह हैं, ये लोग रीयल टाइम में तूफान मचाए हुए हैं। इन्‍हें सीआईए नजरअंदाज नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि‍ यह रीयल टाइम सूचना सुनामी है। हम उन्‍हें अबोध कहकर नजरअंदाज नहीं कर सकते।





                     
    

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

कम्युनिकेशन का बदलता चरित्र

इंटरनेट आने के साथ ही मीडिया और कम्युनिकेशन का समूचा परिवेश बुनियादी रूप से बदल गया है। भारत सरकार तमाम ग्राम पंचायतों, विश्वविद्यालयों,कॉलेजों ,शोध संस्थानों आदि को इंटरनेट से जोड़ने जा रही है। सामान्य तौर पर ई गनर्नेंस की दिशा में हमारा समाज जा रहा है। इससे मानवीय व्यवहार में बुनियादी बदलाव भी आ रहे हैं। पुरानी दूरियां घटी हैं। नई दूरियों ने जन्म लिया है। पुरानी पहचान नष्ट हुई है। नई पहचान सामने आयी है। बातचीत की पुरानी आदतों को नई आदतों ने अपदस्थ करना आरंभ कर दिया है। कहने का अर्थ यह है कि नए संचार माध्यमों ने नए मानवीय व्यवहार,आदतें, संस्कार, एटीट्यूट आदि को जन्म दिया है। इसने संचार के नए असंख्य नए संकेतों को जन्म दिया है। संकेतों के कम्युनिकेशन को नई ऊँचाईयां दी हैं।

कैरोलिन मारविन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, 'इलेक्ट्रॉनिक संचार का इतिहास संचार में तकनीकी क्षमताओं के विकास के बजाए सामाजिक जीवन के व्यवहार संबंधी प्रश्नों पर विचार अधिक करता है। इन प्रश्नों में शामिल हैं कौन बोल सकते हैं और कौन नहीं, किसके पास अधिकार है और किस पर विश्वास करना चाहिए, इत्यादि जैसी समस्याएं।'
 (मार्विन, कैरोलिन, व्हेन ओल्ड, टेक्नोलॉजीज वेयर न्यू : थिंकिंग अबाउट इलेक्ट्रिक कम्यूनिकेशन इन द लेट नाइंटींथ सेंचुरी ,न्यूयॉर्क :ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,1988)
      कैरोलिन दर्शाती हैं कि टेलीफोन के प्रयोग से मात्र दूर-स्थित लोगों के बीच बातचीत ही संभव नहीं हुई : इससे परस्पर बातें करने वालों के बीच की सीमाएं समाप्त होने लगीं अर्थात कौन किससे बातें कर सकता है और किससे नहीं,और इस प्रकार वर्तमान वर्ग-संबंधों पर खतरा पैदा हो गया। इसने प्रेम-संबंध स्थापित एवं विकसित करने के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन ला दिया। इसी प्रकार बिजली के बल्बों ने जन-पैमाने के मनोरंजन के स्वरूपों एवं संस्कृति में बदलाव ला दिए। उदाहरण के लिए, इन बल्बों के कारण रात में खेलों का आयोजन संभव हुआ जिसका जन-संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉनिक संचार महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न खड़े करता है।

मारविन ने लिखा नई इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजियों 'का उद्देश्य हमारी सामान्य सामाजिक गतिविधियां बढाना, उन्हें सरल बनाना और अधिक चुस्त-दुरुस्त करना होता है लेकिन वे उन्हें इस प्रकार पुनर्गठित करते हैं कि वे स्वयं ही नई घटनाएं बन जाते हैं।

मारविन की उपरोक्त धारणाएं महत्वपूर्ण हैं लेकिन संचार माध्यमों के स्वामित्व के सवाल को दरकिनार नहीं किया जा सकता। संकेत,संचार और व्यवहार के अन्तस्संबंध की खोज करते हुए मार्क पोस्टर ने लिखा है '' हर युग में संकेतों के विनिमय के अपने आंतरिक और बाहरी ढांचे होते हैं और संकेतीकरण के माध्यम और संबंध भी। सूचना-पध्दति की निम्नलिखित मंजिलें दरशाई जा सकती हैं आमने-सामने मौखिक विनिमय, छपाई के जरिए लिखित विनिमय और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए विनिमय। पहले वाले में संकेतों का आदान-प्रदान होता है तो दूसरे में संकेतों के प्रतिनिधि का; तीसरे में सूचना का चित्रण होता है। प्रथम, मौखिक, मंजिल में आत्म का निर्माण आमने-सामने के संबंधों की संपूर्णता में उसके स्थान के निर्णय से होता है। दूसरी अर्थात छपाई की मंजिल में आत्म का निर्माण तार्किक काल्पनिक स्वायत्तता के माध्यम के रूप में होता है। लेकिन तीसरी अर्थात इलेक्ट्रॉनिक मंजिल में व्यक्ति का मनोगत अस्तित्व निरंतर अस्थिरता में विकेंद्रित, छितराया हुआ और संख्या में बढ़ता हुआ होता है ।'' ''प्रत्येक मंजिल में भाषा और समाज, विचार और कार्य, आत्म (अस्तित्व) तथा इतर-अस्तित्व के परस्पर संबंध अलग-अलग होते हैं।"

संचार माध्यमों की खूबी है कि इसमें हमेशा वर्तमानकाल में रखकर विचार कर सकते हैं। मसलन आप कितनी ही पुरानी किताब पढ़ें ,पढ़ते समय बार-बार वर्तमान के नजरिए से पढ़ते हैं। यानी कम्युनिकेशन के रूप एक ही साथ ऐतिहासिक और वर्तमान दोनों ही स्थितियों से बंधे होते हैं। संचार के नए और पुराने रूप एक ही साथ वर्तमान में अवस्थित रहते हैं। संचार रूपों पर विचार करते समय यह भी ध्यान रहे कि नया रूप हमेशा पुराने रूप के पूरक के रूम में जन्म लेता है,वह पुराने को अपदस्थ या नष्ट नहीं कर देता। इस तरह संचार रूपों में निरंतरता बनी रहती है। एक-दूसरे के बीच में अन्तर्क्रिया चलती रहती है।

संचार रूपों के बारे में विचार करते समय वर्तमान अपरिहार्य और निर्णायक संदर्भ है। संचार या मीडिया के समस्त विमर्श इसी अर्थ में वर्तमान से जुड़े होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो संचार , अंतर्वस्तु और अवधारणाएं वर्तमान में संचार की अवस्था से पुनर्परिभाषित होती हैं। इसी ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए मार्क्सवादी सूचनाशास्त्री मार्क पोस्टर ने इंटरनेट युग यानी संचार की तीसरी मंजिल के संदर्भ में 'सूचना' की बदली हुई अवधारणा पर विचार करते हुए लिखा ,"तीसरी मंजिल में वह एक विशेष अर्थ (संबंध) धारण करता है। एक अर्थ में अब सारे संकेत सूचना माने जाते हैं, जैसा कि साइबरनेटिक्स में, या आम तौर पर सामान्य अर्थों में भी माना जाता है, जिसमें 'सूचना' को 'शोरगुल' या अर्थहीनता के विपरीत माना जाता है। हमारी संस्कृति में सूचना एक विशेषाधिकार प्राप्त शब्द बन गया है। सूचना सेवाओं संबंधी टी.वी. विज्ञापनों में उपभोक्ताओं और कारपोरेट कर्ता-धर्ताओं को चेतावनी दी जाती है कि यदि वे नवीनतम सूचनाओं से अवगत नहीं होते रहें तो वे और उनके बच्चे सफलता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। सूचना को समकालीन जीवन की सफलता की कुंजी के रूप में पेश किया जाता है। समाज को सूचना में धनी और सूचना में गरीब के बीच विभाजित किया जाता है। अत्याधुनिक सूचनाओं से लैस 'जानकार' व्यक्ति को आज का नया आदर्श बताया जाता है, खासकर मध्यम वर्ग के लिए।"
इसी प्रसंग में सूचना पद्धति के प्रमुख क्षेत्रों के अध्ययन-अध्यापन की ओर भी हमारा समाज मुड़ रहा है।सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है -सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है -

"तीसरी मंजिल में वह एक विशेष अर्थ (संबंध) धारण करता है। एक अर्थ में अब सारे संकेत सूचना माने जाते हैं, जैसा कि साइबरनेटिक्स में, या आम तौर पर सामान्य अर्थों में भी माना जाता है, जिसमें 'सूचना' को 'शोरगुल' या अर्थहीनता के विपरीत माना जाता है। हमारी संस्कृति में सूचना एक विशेषाधिकार प्राप्त शब्द बन गया है। सूचना सेवाओं संबंधी टी.वी. विज्ञापनों में उपभोक्ताओं और कारपोरेट कर्ता-धर्ताओं को चेतावनी दी जाती है कि यदि वे नवीनतम सूचनाओं से अवगत नहीं होते रहें तो वे और उनके बच्चे सफलता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। सूचना को समकालीन जीवन की सफलता की कुंजी के रूप में पेश किया जाता है। समाज को सूचना में धनी और सूचना में गरीब के बीच विभाजित किया जाता है। अत्याधुनिक सूचनाओं से लैस 'जानकार' व्यक्ति को आज का नया आदर्श बताया जाता है, खासकर मध्यम वर्ग के लिए।" इसी प्रसंग में सूचना पद्धति के प्रमुख क्षेत्रों के अध्ययन-अध्यापन की ओर भी हमारा समाज मुड़ रहा है।

सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है ,"इसमें सूचना के भंडारण और उसे हासिल करने के स्वरूपों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इनमें गुफाओं की चित्रकारी और मिट्टी के पकाए टुकड़ों पर दर्ज जानकारी से लेकर कंप्यूटर के डाटाबेस तथा उपग्रह संचार शामिल हैं। सूचना एकत्र तथा प्रेषित करने का प्रत्येक तरीका संबंधों के ताने-बाने के रूप में समाज पर गहरा प्रभाव डालता है।"

सच यह है आधुनिक समाज की परिकल्पना मीडिया के बिना नहीं की जा सकती। खासकर छापे की मशीन आने के बाद ही हमारा समाज आधुनिक सामाजिक निर्माण की दिशा में सक्रिय होता है। पोस्टर के अनुसार " समकालीन व्यापक उत्पादक समाज की कल्पना छपाई के प्रेस के बिना नहीं की जा सकती। राजनीतिक घटनाएं, समुदाय का स्वरूप, आर्थिक संरचना, यह सब संचार मीडिया से संबंधित होता है। यदि पवन-चक्की सामंतवाद से संबंधित है और भाप का इंजन पूंजीवाद से, तो मार्क्स की ही तर्ज पर मैं कहना चाहूंगा कि इलेक्ट्रॉनिक संचार-प्रणाली सूचना-पध्दति से जुड़ी हुई है। समाज का स्वरूप इस बात से तय होता है कि स्थान और काल किस हद तक संचार को सीमित करते हैं। इसमें शक नहीं कि सूचना पध्दति में स्थान और काल संबंधी दूरी का अध्ययन महत्वपूर्ण है, लेकिन मुख्य मुद्दा कुछ और ही है। उपर्युक्त चर्चा में संचार क्षमता का सवाल तो उठाया गया लेकिन सूचना विनिमय की संरचना का मूल प्रश्न नहीं है। मैं इसे भाषा का आवरण कहूंगा। जब तक हम समाज के बारे में परंपरागत मान्यताओं और सिध्दांतों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाएंगे, संचार से संबंधित दूरियों का प्रश्न परंपरागत दृष्टिकोण में ही बंद पड़ा रह जाएगा, भले ही वह कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो। यदि संचार का काम अन्य गतिविधियों को मात्र बढ़ाना-घटाना ही है तो उसका कोई स्वतंत्र महत्व नहीं है। ऐसी स्थिति में उत्पादन-पध्दति सरीखी नई अवधारणाओं का विशेष औचित्य नहीं रह जाता है। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि किसी भी समाज में संचार की संरचना एक अलग स्वायत्त विश्लेषणात्मक क्षेत्र है, जिसका अपने-आप में अध्ययन किया जाना चाहिए। इसके अलावा बीसवीं सदी में नई संचार पध्दतियों का द्रुत गति से फैलाव सैध्दांतिक और विस्तृत परीक्षण का महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है। हमारे अध्ययन का विषय नई भाषा संरचनाएं हैं जो सामाजिक संबंधों के जाल को काफी बदल देती हैं, संबंध की पुनर्रचना करती है और अपने द्वारा रचित मनोगत अस्तित्वों की पुनर्रचना करती हैं।"

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

संचार क्रांति और तुलसीदास

                     
       आज यह बात बार-बार उठायी जा रही है कि आम लोगों में पढ़ने की आदत घट रही है। सवाल उठता है क्या तुलसीदास आज कम पढ़े जा रहे हैं ? क्या 'रामचरितमानस' कम बिक रहा है ? तुलसीदास आज भी सबसे ज्यादा पढ़े,सुने और देखे जा रहे हैं। सवाल उठता है पढ़ने की आदत पहले कैसी थी ? क्या हम पहले ज्यादा पढ़ते थे ? पढ़ने के मामले में हम पहले कोई ज्यादा बेहतर अवस्था में नहीं थे। हमारे पूर्ववर्ती कम पढ़ते थे। औपचारिक शिक्षा का प्रसार पढ़ने की संभावनाएं पैदा करता है। पहले कुछ ही लोग थे जो पढ़ते थे। संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने की आदत को देखने पर जटिलता का आभास होता है। पढ़ने की जटिलताओं की अनुभूति साक्षरतायुग में नहीं थी।
    हम अमूमन शिकायत सुनते हैं कि बच्चे टीवी के सामने बैठे रहते हैं या इंटरनेट में उलझे रहते हैं और कम पढ़ते हैं। सच क्या है ? जब भी संचार माध्यमों का विस्तार होता है तो उससे वर्तमान और भविष्य के बारे में जागरूकता पैदा होती है, वर्तमान और भविष्य सुंदर नजर आता है। अतीत को नए सिरे से सजाने का काम करते हैं। मीडिया के विस्तार के कारण जिस तरह वर्तमान के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां पाते हैं वैसे ही अतीत के बारे में भी जानकारियां पाते हैं। मीडिया का प्रसार वर्तमान और भविष्य को ही समृद्ध नहीं करता बल्कि अतीत के प्रति हमारी समझ को भी समृद्ध करता है। जो लोग वर्तमान के प्रति उपेक्षाभाव रखते हैं उनमें अतीत के प्रति भी अचेतनता होती है। सवाल उठता है क्या लेखन के विकसित होने के पहले मनुष्य के जीवन को जानना संभव था ? जी नहीं, अतीत का वास्तव रुप हम नहीं जानते थे। अतीत के बारे में दावे के साथ जो भी कहा जा रहा है वह लेखन के उदय के बाद ही सामने आया है। यह सारा का सारा निर्मित है। साक्षरता-पूर्व युग तुलसीदास का युग था। इस युग की वे ही बातें कमोबेश विश्वसनीय हैं जिन्हें किसी न किसी तरह लिपिबद्ध कर लिया गया था। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह घोड़े के बिना ऑटोमोबाइल की कल्पना संभव नहीं है। उसी तरह लेखन के बिना संस्कृति की कल्पना संभव नहीं है।
      वाचिकयुग कान-मुँह की संस्कृति का युग है। वाचिक संस्कृति में मनुष्य क्रमश: अपने अतीत के साथ बौद्धिक संपर्क खोता चला जाता है। वाचिक संस्कृति इतिहास को वैसे नहीं जानती जैसे इतिहास को हम आज जानते हैं। किसी भी वास्तविक घटना के विवरण और ब्यौरे चश्मदीद लोग बताते हैं अथवा वे लोग बताते हैं जो चश्मदीद के करीबी हों। लेकिन जो घटना बहुत समय पहले घटी हो तो उसके बारे में ,जैसे तुलसीदास का जन्म और लेखन तो इसके बारे में किसी भी बात को दावे के साथ कहना संभव नहीं है। यही स्थिति अन्य मध्यकालीन लेखकों की है। उनके जीवन प्रसंगों के बारे में विवाद हैं। वाचिकयुग में छात्र पढ़ते थे। शिक्षक पढ़ाते थे। किसी भी किस्म की परीक्षा नहीं होती थी। कोई लिखित अभ्यास नहीं करना पड़ता था। शिक्षक के सभी व्याख्यान मौखिक होते थे। शिक्षा की जितनी भी व्यवस्था थी वह मौखिक थी। छात्र को अपनी शैक्षणिक क्षमता का मौखिक ही प्रदर्शन करना पड़ता था। संगठित मौखिक बहस होती थीं। इसे हम शास्त्रार्थ के रूप में  जानते हैं। इसमें प्रभाव ही बड़ी शक्ति था। इसके कारण इस युग को ''वाचिक-प्रभावयुग' के नाम से जानते हैं।
   भारत में दो किस्म की परंपराएं थीं। यहां सीखने-पढ़ने की परंपरा थी साथ ही पाण्डुलिपि की भी परंपरा थी। पाठ का यहां पर बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल किया जाता था। तुलसीदास ने जिस समय लिखना आरंभ किया था उस समय भारत में लेखन संस्कृति का व्यापक विकास हो चुका था। पाण्डुलिपि संस्कृति के कारण ही हम संस्कृति को जान पाए। संस्कृति का संरक्षण संभव हो पाया।मनुष्य के विचारों पर अक्षर के उदय का व्यापक असर हुआ किंतु सबसे ज्यादा गंभीर असर तब हुआ जब छापेखाने के अक्षर का निर्माण हुआ। यह काम 15वीं शताब्दी में ही आरंभ हो गया था। भारत में 16वीं शताब्दी में छापे की मशीन आ गयी थी। तुलसीदास की कविता पुराने किस्म की कविता से अनेक अर्थों में भिन्न है। कमोबेश यह फिनोमिना सभी भक्ति आंदोलन के कवियों में मिलता है। तुलसीदास की कविता में कविता से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसमें व्यक्त 'तर्क'। यह 'तर्क' द्वंद्वात्मक है। इसको हम सहज रूप में विमर्श के अर्थ में भी परिभाषित कर सकते हैं। तुलसीदास अपनी कविता के माध्यम से विमर्श तैयार करते हैं। विमर्श की कला का विकास करते हैं। यह ऐसा विमर्श है जो 'संप्रेषणीयता' और 'सामाजिकता' के गुण को अपने अंदर समेटे हुए है। तुलसीदास की कविता में 'तर्क' सीधे 'रेटोरिक' के रूप में आता है। यही वजह है कि तुलसी के मानस पर व्याख्यान ज्यादा अच्छे लगते हैं।
        रामकथा को काव्य के रूप में सुनने से ज्यादा रामचरित मानस पर व्याख्यान ज्यादा सुखद लगता है, ज्यादातर समय तुलसीदास की रामकथा का भाषण के जरिए अथवा कथा के रूप में आनंद तब ही मिलता है जब उस कविता को वार्ताकार 'रेटोरिक' में तब्दील कर देता है। निश्चित रूप से रामकथा तुलसीदास के जमाने में कविता के रूप में ही जनप्रिय रही होगी, आज भी समाज में रामचरितमानस के अखण्ड पाठ व्यापक जनप्रिय हैं। किंतु छापे की मशीन आने के बाद रामकथा का तार्किक तौर पर रेटोरिक अथवा प्रवचन के रूप में तेजी से प्रसार होता है। छापे की मशीन के आने के बाद तुलसीदास के 'तर्क' को ज्यादा से ज्यादा व्याख्यायित करने की परंपरा का विकास होता है। 'तर्क' के विकास का अर्थ है प्रवचन परंपरा का ज्यादा प्रसार । रामकथा के वाचिकयुगीन परिप्रेक्ष्य का ही यह प्रभाव है कि आज हमारे बीच में रामकथा के प्रवचन जितने जनप्रिय हैं, उतने किसी नेता के भाषण जनप्रिय नहीं हैं।छापे की मशीन आने के बाद तुलसीदास के पाठ का पाठक के साथ निजी संबंध गहरा हुआ है। छपा पाठ व्यक्ति को निजी तौर पर पढ़ने और पाठ की प्राइवेसी की ओर ठेलता है। तुलसीदास के साथ इस मामले में उलटा हुआ है। छापे की मशीन और बाद में इलैक्ट्रोनिक मीडिया आने के बाद तुलसीदास का पाठ प्राइवेट पाठ नहीं बन पाया है। तुलसीदास का पाठ निजी पाठ क्यों नहीं बन पाया ? अन्य पुराने धार्मिक पाठ छापे की मशीन के आने बाद प्राइवेट पाठ बनकर रह गए हैं। पुराने पाठों में 'रामचरितमानस' और ''श्री मद्भागवत कथा'' ही ऐसे पाठ हैं जो निजी पाठ नहीं बन पाए हैं। ये दोनों पाठ रेटोरिक कला के आदर्श उदाहरण हैं। इन दोनों के प्रवचनों में जितने व्यापक संदर्भों का कथावाचक इस्तेमाल करते हैं उतना अन्यत्र नजर नहीं आता। प्रवचनों में व्यापक स्तर पर संदर्भों का आना इस बात का संकेत भी है कि अब हम वाचिक संदर्भ की बजाय मुद्रित संदर्भ में आ गए हैं। किताब के युग में आ गए हैं। प्रवचन,भाषण,व्याख्यान कला के विकास का गहरा संबंध रैनेसां के साथ है। रैनेसां के आने के बाद रेटोरिक का तेजी से विकास होता है। पुराने किस्म का रेटोरिक नयी ऊर्जा प्राप्त करता है। छापे के युग में पाठ का ज्यादा सुसंगत संचय होता है। तथ्यों को ज्यादा व्यवस्थित ढ़ंग से संचित कर सकते हैं। अब तथ्यों को याद करने की नहीं बल्कि खोजने अथवा देखने की जरूरत होती है। पाण्डुलिपि के युग में तथ्यों को स्मृति में रखते थे किंतु छापे की मशीन के आने के बाद तथ्यों के दृश्य पर जोर है। मध्यकाल में प्राचीनकाल की तुलना में ज्यादा साक्षर थे और मध्यकाल की तुलना में आधुनिककाल में ज्यादा साक्षर हैं। रैनेसां की तुलना में आज ज्यादा साक्षर हैं। यानी रैनेसां की तुलना में आज के साइबरदौर में रीडिंग की आदत में इजाफा हुआ है।आज किताबें ज्यादा बिकती हैं, किताबों का प्रकाशन ज्यादा हो रहा है। अखबार और पत्रिकाएं ज्यादा पढ़ी और खरीदी जा रही हैं। लिखित पेज ने स्मृति के विकल्प के तौर पर अपने को विकसित कर लिया है। लिखित पेज के आगे अब हम डिजिटल पेज में दाखिल हो चुके हैं। डिजिटल पेज लिखित पेज से भी ज्यादा सुंदर ,उदार,गतिशील और प्रभावोत्पादक है। जिस तरह मौखिक परंपरा को शब्द ने लिपिबध्द किया वैसा ही शब्द की परंपरा को छापे की मशीन और अब छापे की मशीन की परंपरा को डिजिटल किताब रूपान्तरित कर रही है फलत: आज हम प्राचीनकाल से भी ज्यादा मौखिक काम करने लगे हैं। डिजिटल में ज्यादा बातें करने लगे हैं। डिजिटल ने वाचिक परंपरा को नए सिरे से जीवित कर दिया है। पहले वाचिक आख्यान को संरक्षित नहीं कर सकते थे किंतु आज ऐसा नहीं है। आज वाचिक आख्यान संरक्षित किया जा सकजा है। इसका आप वार्ताकार की अनुपस्थिति में भी आनंद ले सकते हैं। यह ऑडियो-वीडियो संस्कृति के विकसित होने के बाद ही हो पाया है। उसकी असंख्य प्रतियां तैयार कर सकते हैं। तुलसीदास के जमाने में सब कुछ बोलता था,यहां तक कि भगवान भी बोलता था। किंतु छापे की मशीन के आने के बाद से 'चुप्पी' या साइलेंस का युग शुरू होता है। अब कोई नहीं बोलता। चुप्पी के युग में मनुष्य सबसे बड़े संप्रेषक के रूप में सामने आता है। अब प्रत्येक चीज उस रूप में ही दिखाई देती है जिस रूप में मनुष्य उसे पैदा करता है। वाचिक परंपरा ने महान रचनाएं दीं हैं ,इनमें वेद हैं, महाकाव्य हैं,गीता है,रामचरितमानस है वहीं आधुनिकयुग में वाचिक परंपरा के जरिए नयी महान चीजें आयी हैं। भगवान के बारे में जितनी बेहतरीन रचनाएं मनुष्य ने वाचिकयुग में दीं वैसी रचनाएं आज दुर्लभ हैं। वाचिक संस्कृति बहुत ही समृद्ध संस्कृति है। हमारी समस्त कथाएं वाचिक परंपरा की ही देन हैं। प्राचीन दर्शन का समस्त श्रेष्ठतम रूप वाचिक की देन है। इसको ही कालान्तर में हमने उपदेश,प्रवचन,भाष्य, संवाद, विमर्श आदि में रूपान्तरित करके वर्गीकृत किया गया। हम जितना आगे जाना चाहते हैं उतनी ही तेज गति से अतीत भी अपनी ओर खींचता है। फलतःअतीत को खोले बिना भविष्य में जाना संभव ही नहीं है। आप ज्यों ही नए मीडिया को जन्म देते हैं पुराना मीडिया और भी चुस्त-दुरूस्त और सुंदर रूप में सामने आ जाता है। पुराना हमारा पीछा ही नहीं छोड़ता। यही वजह है वाचिक भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। हम अपने भविष्य का जितना विस्तार करते जाते हैं अतीत का भी उतना ही विस्तार होता है। भविष्य में जाते समय आपका अतीत से संबंध नहीं कटता।  वाचिक परंपरा के जो निर्माता थे,जो मौखिक परंपरा में जीते थे उन लोगों ने ही अक्षर परंपरा को जन्म दिया। जो ज्यादा बोलते थे उन्होंने ही लिखने की परंपरा को जन्म दिया। सड़कों पर काम करने वाले बातें करना बंद नहीं करते। यह सच है कि लेखन ने संप्रेषण को नयी दिशा दी। किंतु इससे बोलना कम नहीं हुआ। आज संदेश पहले की तुलना में ज्यादा आते हैं, आज पहले के किसी भी युग की तुलना में ज्यादा बातें करते हैं। आप जितना पढ़ते हैं उससे ज्यादा बातें करते हैं। वाचिकयुग का साहित्य आधुनिक किताबयुग आने के बाद और भी ज्यादा समृद्ध होता है,अर्थविस्तार पाता है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया के जमाने में अब सब कुछ संचित करके रख सकते हैं। ज्ञान का सार्वभौम की बजाय स्थानीय उत्पादन कर सकते हैं। अपने कम्प्यूटर में  छापें और मुद्रित करें। छापे की मशीन ने ज्ञान की स्थानीयता पैदा की थी। इसे नयी ऊँचाई पर कम्प्यूटर ने पहुँचाया। आज हम बिजली की तेज गति से आगे जा रहे हैं।  आज हमें लेखन और मुद्रण से भी परे जाने की जरूरत है। आज जरूरी हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति लिखना सीख ले। जिससे हम तेजी से इलैक्ट्रोनिक मीडिया के परे जा सकें। आज प्रत्येक को प्रिंट करना आना चाहिए, टाइप करना आना चाहिए। इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने मुद्रण और लेखन दोनों को ही बदल दिया है। साथ ही मीडियम को भी बदल दिया है। 
    













गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मीडिया भाषा ,वाइरस और कम्प्यूटर संस्कृति


      आमतौर पर मीडिया को हम लोग हजम कर रहे हैं,कम से कम विश्लषण और विवेचन कर रहे हैं। मीडिया विशेषज्ञों को छोड़कर आम लोगों में मीडिया साक्षरता बढ़ी है। सवाल उठता है कि क्या मीडिया का कोई मार्क्सवादी नजरिया संभव है ? यदि हां तो उसके पैमाने क्या हो सकते हैं ? मीडिया अनुसंधान करने वालों की चिंता के दायरे में मार्क्सवादी नजरिए के प्रति दिलचस्पी बढ़े और वे गंभीरता के साथ मार्क्सवादी औजारों का इस्तेमाल करें इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर यह लेखमाला आरंभ कर रहे हैं। भारत में जनसंख्या ज्यादा मीडिया कम है। संचार माध्यमों की पहुँच के दायरे में क्रमशः विस्तार हो रहा है। इसके बाबजूद आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा मीडिया के दायरे के बाहर है।
इस प्रसंग में मीडिया विशेषज्ञ मार्क पोस्टर ने 'आज की दुनिया में सूचना पद्धति' में लिखा है " संचार के अधिकाधिक हिस्से आज इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सुपुर्द होते जा रहे हैं। लोग टेलीविजन देखते हैं, फोन करते हैं, रेडियो सुनते हैं, फिल्म देखने जाते हैं, कंप्यूटर, फैक्स मशीनों, वी.सी.आर. और स्टीरियो इत्यादि का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार का संचार प्रत्येक संस्था और सामाजिक समूह में फैलता जा रहा है। राजनीति, काम-काज, उपभोग, परिवार, फौज, चर्च, शिक्षा, मनोरंजन इत्यादि क्षेत्रों में संचार के लिए इलेक्ट्रॉनिक तंत्रों का कमोबेश उपयोग किया जा रहा है।"
  मीडिया के चौतरफा विस्तार ने सूचना प्रवाह को बढ़ा दिया है। इस प्रक्रिया में मीडिया के जरिए एकदम नयी भाषा निर्मित हो रही है। मीडिया भाषा के किन रूपों का  निर्माण हो रहा है और यह भाषा किस तरह अन्य सर्जनात्मक और विचारधारात्मक क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। इस पर गंभीरता के साथ सोचने की जरूरत है। नई भाषा संकेतों से बन रही है। ये संकेत बाइटस के जरिए आ -जा रहे हैं। बिजली,उपग्रह प्रणाली ,कम्प्यूटर आदि के जरिए नए भाषा अनुभव का जन्म हुआ है। यह अनुभव दैनंदिन जीवन की भाषा को भी प्रभावित कर रहा है। एक जमाने में प्रेस ने सीमित रूप में यह काम किया है,लेकिन कम्प्यूटर,सैटेलाइट, मोबाइल .इंटरनेट आदि ने एक नए किस्म के भाषा प्रयोग और अनुभव को जन्म दिया है।
मार्क पोस्टर ने लिखा है " कुछ लोगों का विचार है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रयोग से संचार के स्वरूप में कोई खास अंतर नहीं आया है। आखिर राजनीतिज्ञ टी.वी. के जरिए प्रचार करता हुआ आम लोगों के वोट संवैधानिक जनतंत्र के अनुसार ही तो मांगने की कोशिश करता है। उस मजदूर को जो फैक्टरी की असेंबली लाइन कंप्यूटर के सहारे नियंत्रित करता है या चिट्ठी टाइप करता है, पहले के ही समान अपने काम के लिए पैसा मिलता है। टी. वी. देखने वाले उपभोक्ता को उससे उन वस्तुओं के बारे में जानकारी मिलती है जिन्हें वह दूकानों से खरीद सकता है। यह तो अखबार पढ़ने के समान ही होता है। सिपाही कंप्यूटर का प्रयोग करके अपना गोला या बम या मिसाइल निशाने पर साधता है। वह शत्रु पर वार करने की कला बेहतर बनाता है। इस प्रकार इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या यंत्र संचार-माध्यमों की क्षमता बढा भर देते हैं। इस दृष्टि से यदि देखा जाए तो भाषा सक्रिय मानवों के लिए एक जरिया-मात्र है। वह निश्चित संस्थाओं की सीमाओं के अंदर व्यक्तियों के इरादे मात्र पूरा करती है।"
"इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक यंत्र संचार माध्यमों के स्वरूपों संबंधी सिध्दांतों में अन्य कोई परिवर्तन नहीं लाते हैं। मार्क्सवादियों की दृष्टि में नए संचार माध्यमों को भी वर्गीय दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए अर्थात हमें सूचना समाज में हमारी वर्गीय स्थिति के अनुरूप ही प्राप्त होती है। नवमार्क्सवादियों की दृष्टि से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्कृति-उद्योग को बढ़ावा देता है। इससे विचारधारा का प्रभुत्व बढ़ता है। अर्थशास्त्री के अनुसार बाजार के नियम तय करते हैं कि कंप्यूटर का प्रयोग कौन करेगा, कौन टेलीविजन में विज्ञापन देगा, रेडियो से किनके गीत प्रसारित होंगे। एक वेबरवादी की दृष्टि में इलेक्ट्रॉनिक संचार समाज में विभेदीकरण बढ़ाता है और उप-प्रणालियों का निर्माण करता है। साथ ही वह नौकरशाही की ताकत बढ़ाता है। एक उदारवादी की दृष्टि में वह विभिन्न दलों के बीच सत्ता-संघर्ष का उद्देश्य बनता है। टेक्नोलॉजिकल निर्णयवादी भी संचार साधनों में कुछ नया नहीं देख पाते : वे मात्र मशीनों के विकास की प्रगति की पुष्टि ही करते हैं जो श्रम को हलका बनाते हैं और प्रकृति को मानव की इच्छाओं के अनुरूप ढालते हैं। इस प्रकार, भले ही जिसका जो भी विचार हो, अकाटय रूप से नतीजा यही निकलता दीख पड़ता है कि इलेक्ट्रॉनिक संचार कोई मूल परिवर्तन नहीं लाता है।"
"उपर्युक्त सारे परिप्रेक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा एक परिवर्तन अवश्य स्वीकार करते हैं और उसकी व्याख्या करते हैं : मानवों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान अब देश (स्थान) और काल की सीमाओं से कहीं कम बंधे हैं। सिध्दांत रूप में अब सूचना सारी धरती के पैमाने पर तुंरत उपलब्ध हो जाती है और उसे तब तक भंडारित किया जा सकता है तथा हासिल किया जा सकता है जब तक बिजली उपलब्ध है। काल और स्थान (देश) अब सूचना का आदान-प्रदान सीमित नहीं करते।"एक जमाने में मैकलुहान कीधारणाओं को लोग गंभीरता के साथ नहीं लेते थे,लेकिन आज ऐसा नहीं है। मैकलुहान की ग्लेबल विलेज की धारणा का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में मार्क पोस्टर ने लिखा "मैकलुहान का 'विश्व ग्राम' अब तकनीकी रूप से संभव है। यह बड़े ही महत्व का है जो वर्तमान सिध्दांतों और स्थितियों की पर्याप्तता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। 1960 के दशक के अंत में अमरीकी घरों में वियतनाम की घटनाओं के दृश्यों के प्रसारण का राजनीति पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा था। 1985 में फिलीपाइंस के विद्रोहियों द्वारा एक सरकारी टेलीविजन स्टेशन पर कब्जे तथा उसके बाद वहां से जनता को अपनी सफलता के आश्वासन ने मारकोस की सत्ता के भाग्य-निर्णय पर गहरा प्रभाव डाला। टेलीविजन प्रत्यक्ष खुदरा व्यापार उपभोक्ता सामानों की खरीद-बिक्री के तौर-तरीकों में क्रांति का आधार तैयार करता है। उंगलियों की छाप के कंप्यूटर विश्लेषण के जरिए संदेहास्पद अपराधियों का पता किया जा सकता है। इससे कानून-व्यवस्था संस्थाओं को नया रास्ता मिला। त्वरित और सार्वत्रिक सूचना ने जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जन्म दिया, स्पष्ट रूप से समाज को प्रभावित किया है। इसकी व्यापकता अभी भी पूरी तरह आंकी नहीं गई है। लेकिन स्थान और काल पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विजय संचार की नई तरंगों के साथ विचारों और व्यवहार का मात्र थोड़ा तालमेल ही नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह क्रांति सामाजिक संस्थाओं एवं विचारों के लिए और भी काफी मायने रखती है।"
  इंटरनेट आने केबाद वायरस का तंत्र सामने आया है उसने जहां ए ओर सूचना क्षमताओं के विकास ,सुरक्षा और संरचनाओं की सुरक्षा की ओर ध्यान खींचा है तो दूसरी ओर मीडिया और इंटरनेट की अन्तर्कियाओं को जन्म दिया है। उलत वाइरस कम्प्यूटर के साथ मीडियातंत्र पर भी असर छोड़ने लगता है।  
पोस्टर ने लिखा है " 'वाइरस' एक छोटा 'प्रोग्राम' या निर्देशों का तंत्र होता है जो कंप्यूटरों के अन्य प्रोग्रामों या फाइलों से जुड़ जाता है। फिर वह कार्य के दौरान समूचे प्रोग्राम में फैलता जाता है। यह वाइरस एक कंप्यूटर के अंदर भी फैलता है और जब एक कंप्यूटर से अन्य में संदेश या फाइलें स्थानांतरित की जाती हैं तब भी फैलता हैॅ वाइरस में विभिन्न प्रकार के कमांड (निर्देश) हो सकते हैं बिना हानि वाला अर्थहीन 'स्क्रीन पर 'गोत्चा दर्शाइए' से लेकर खतरनाक 'हार्ड डिस्क की सारी फाइलें मिटा दीजिए' तक! नवंबर '88 के उक्त वाइरस ने लगातार प्रसार करते हुए कंप्यूटरों की मेमोरी को ही जाम कर दिया। कंप्यूटरों पर काम करना दूभर हो गया। हालांकि कोई फाइल नष्ट नहीं हुई, कोई सूचना खोई नहीं और न ही कोई अपराध किए गए, लेकिन इसे फैलाने वाले की खोज में एफ.बी.आई को बुलाना पड़ा।"
"वाइरस वह जीव होता है जो जीवों में बीमारियां फैलाता है। कंप्यूटरों के संदर्भ में इस शब्द का सांकेतिक प्रयोग किया जा रहा है क्योंकि कंप्यूटर नेटवर्क की जीवित प्रणालियों से तुलना की जाती है : कंप्यूटर परस्पर इतने अधिक अंतरसंबंधित होते हैं कि वे जीवित शरीर के अंगों के समान कार्य करते हैं। वैसी मशीनें जो यांत्रिक रूप से एक दूसरे के साथ जुड़ी होती हैं आम तौर पर अपनी भौतिक शक्ति दूसरी मशीनों को हस्तांतरित नहीं कर पातीं। फलस्वरूप यदि किसी बिंदु पर कोई खराबी पैदा हो जाती है तो उसका प्रभाव उन तक नहीं पहुंच पाता। कंप्यूटर आपस में सूचना के सहारे जुड़े होते हैं। इसलिए वे जीवित प्रणालियों के समान होते हैं जो जटिल निर्देशों को एक से दूसरे तक पहुंचाते हैं। इनमें वे सूचनाएं भी होती हैं जिनके सहारे समूची कंप्यूटर प्रणाली (नेटवर्क) निष्क्रिय बना दी जा सकती है। आज अधिकाधिक संस्थाएं कंप्यूटर नेटवर्कों के सहारे परस्पर जुड़ती जा रही हैं और उन पर निर्भर होती जा रही हैं। इस प्रकार समाज ने ऐसी इलेक्ट्रॉनिक सूचना-प्रणालियों ('जीवों') को जन्म दिया है जो मानव समुदायों के ही समान 'छुआछूत की बीमारियों' का शिकार बनती हैं। जहां एक ओर मानव समाज एड्स से पीड़ित है वहीं कंप्यूटरों का समाज 'वाइरसों' से पीड़ित है।"
 "साइबर-विश्लेषण एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण परस्पर संबंधित क्षेत्र बन सकते हैं। कंप्यूटर वाइरस अब व्यापक और सामान्य हो चुके हैं और बार-बार आ रहे हैं। जनवरी और फरवरी 1989 में कुल 3,000 वाइरस पाए गए हैं। फ्रायडवादी ऑडिपसवादी घटना के बजाए वाइरसों को कंप्यूटर सूचना का नियंत्रण करने वालों के खिलाफ प्रतिरोध का एक स्वरूप भी माना जा सकता है।"
मार्क पोस्टर ने लिखा है कि " ऐसी रिपोर्ट मिल रही हैं कि एक अन्य स्तर पर, कंप्यूटर मानीटर, यहां तक कि समूचा कंप्यूटर तंत्र, स्वयं काम करने वाले व्यक्ति के शरीर के डी.एन.ए. (शरीर के जीन का मुख्य रसायनअनु.) को ही प्रभावित कर रहा है। यदि वाइरस का प्रतीक कंप्यूटर नेटवर्क को एक नई सामाजिक प्रणाली के सदृश्य रखता है तो कंप्यूटर मानीटर के उपयोग को करने का परिणाम कंप्यूटर और कंप्यूटर के प्रयोगकर्ता के बीच विकिरण के रूप में गहरे संबंध के रूप में होता है। मानव और मशीन के बीच ऐसा एकीकरण होता दिखाई दे रहा है जिसमें दोनों परस्पर एक दूसरे पर निर्भर होते जा रहे हैं। फलस्वरूप हमारे आप-पास की दुनिया में हमारे शरीर की सीमाएं लुप्त होती प्रतीत होती हैं। हो सकता है कि मानव द्वारा कंप्यूटरों के निर्माण के बाद अब कंप्यूटर मानवों की नई प्रजाति का निर्माण कर रहे हैं। इस विषय पर कई फिल्में बन चुकी हैं जैबे रोबोकॉप और काल्पनिक वैज्ञानिक कहानियां लिखी जा चुकी हैं जैसे फिलिप के डिक द्वारा। इन संभावित घटनाओं संबंधी कल्पनाओं औरअटकलबार्जियों के कारण हमें मुख्य विषय से नहीं भटकना चाहिए हालांकि उनके भी महत्वपूर्ण परिणाम हो रहे होंगे।"
"जिस तेजी से कंप्यूटर वाइरसों का फैलाव हो रहा है वह सूचना-पध्दति के युग में समाज की नाजुक स्थिति का पता चलता है। वाइरस के प्रसारित होते ही समूचे नेटवर्क बंद होने लगे। इसी प्रकार अक्टूबर 1987 में स्टॉक मार्केट के धराशाई होने की खबर न्यूयॉर्क से तुरंत लंदन और टोकियो पहुंच गई और उतनी ही तेजी से उनकी प्रतिक्रिया तुरंत न्यूयॉर्क वापस पहुंच गई। इन दूरियों के बीच कोई ऐसा अवकाश बिंदु नहीं था जिसमें घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया निर्मित होने का समय मिले। वित्तीय अफरा-तफरी एक स्थान से दूसरे स्थान तक वैसे ही फैल गई जैसे पशुओं के किसी झुंड में खतरे का आभास फैल जाता है। न्यूयॉर्क टाइम्स में इस घटना की रिपोर्ट में स्टॉक कीमतों में गिरावट पर कंप्यूटरों का प्रभाव नोट किया गया। विश्व भर के वित्तीय केंद्र त्वरित सूचनाएं पाने के लिए एक दूसरे से संचार माध्यमों से जुड़े रहते हैं। लेकिन ये ही माध्यम उनके त्वरित आर्थिक पतन का कारण भी बनते हैं। इस प्रकार भाषा के अतिद्रुत प्रेषण का सरल और उपयोगी साधन मात्र अत्यधिक गति के कारण एक नई सामाजिक घटना बन जाती है जिसमें मात्र 'द्वंद्वात्मक' रूप से गुण में परिवर्तित हो जाता है। और कदाचित यह सामाजिक प्रक्रिया हमें अभूतपूर्व रूप से संस्कृति के भाषा पहलू पर सावधानी से विचार करने और उसकी जांच करने पर मजबूर कर देती है।"




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