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सोमवार, 11 नवंबर 2019

मोदी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति -





मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है

मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

नए राष्ट्रपति का उदय और संघ की नई रणनीति-

         रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के साथ ही आरएसएस का देश के सर्वोच्च का शिखर पर पहुँचने का सपना पूरा हो गया।यह संघ का बाल स्वप्न था। इस सपने में अनेक अंतर्विरोधी चीजें शामिल हैं। इनको सिलसिलेबार ढ़ंग से समझें। पहली बात यह कि कोविंद का राष्ट्रपति बनना ,दलित वोटबैंक राजनीति में कोई मदद नहीं करेगा।क्योंकि इस पदपर दलित को बिठाकर कांग्रेस को कोई दलित वोट नहीं मिला।दूसरी बात यह कि कोविंद के राष्ट्रपति बनने के पहले से ही सुरक्षित सीटों पर भाजपा की बेहतर स्थिति रही है।इसलिए आरक्षित सीटों में 19-20 का अंतर ही आएगा।
एक अन्य भय पैदा किया जा रहा है कि भारत का संविधान अब सुरक्षित नहीं है। यह भय निराधार है। भारत में मौजूदा स्थिति में आरएसएस का लक्ष्य संविधान नहीं है बल्कि सत्ता है और सत्ता की विभिन्न संरचनाओं को वे अपने अनुसार चलाने की कोशिश करेंगे। संविधान परिवर्तन करना इनके बूते के बाहर है और यह फिलहाल लक्ष्य नहीं है।
आरएसएस की मौजूदा मुहिम को दक्षिणपंथी क्रांति कहना समीचीन होगा।यह ऐसी क्रांति है जिसके बनियान और अंडरबियर आरएसएस के हैं और ऊपरी सभी कपड़े कांग्रेसी हैं। मोदी सरकार पूरी निष्ठा के साथ नव्य आर्थिक नीतियों को लागू कर रही है।इससे यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि संघ के लोग देशी नीति को लागू करने में विश्वास करते हैं।आरएसएस ने अपने स्वदेशी जागरण मंच के जरिए जितनी भी घोषणाएं की थीं उन सबको मोदी सरकार के जरिए कब्रिस्तान पहुँचा दिया है।
कोविंद के सत्तारूढ़ होने से आरएसएस की धर्मनिरपेक्षताविरोधी इमेज को कुछ हद तक साफ करने में मदद जरूर मिलेगी। आरएसएस के लोग केन्द्र की सत्ता में लंबी पारी खेलने के मूड में हैं। लेकिन मोदीजी के निजी रूख और नजरिए ने आरएसएस की लंबी पारी खेलने की आशाओं पर वैसे ही पानी फेर दिया है जैसे मनमोहन सिंह ने गांधी परिवार के सत्तारूढ़ होने के सपनों पर पानी फेरा था।
कोविंद-नायडू-सुमित्रा महाजन ये तीनों उस इलाके से आते हैं जहां आरएसएस कमजोर है।मोदीजी ने चालाकी के साथ मजबूत इलाकों के नेताओं को संवैधानिक पदों पर नहीं आने दिया है।इससे आरएसएस की लंबी पारी खेलने की संभावनाएं धूमिल हो गयी हैं।
दूसरी एक बात और वह यह कि समाज और मीडिया में हिंदू राष्ट्रवाद के प्रधान एजेंडा बन जाने के बाद विकास का एजेंडा गायब हो गया है।जबकि 2014 का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया था,लेकिन 2019 में विकास नहीं हिंदू राष्ट्रवाद प्रधान मसला होगा और वैसी स्थिति में 2019 में मोदीजी की वापसी संभव नहीं है। मोदी के बाद सिर्फ दो विकल्प होंगे ,पहला देश फिर से उदारतावाद की ओर लौटे या मोदी से ज्यादा कट्टरपंथी को शासनारूढ़ करे।


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रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदीजी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति

        मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है



मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



सोमवार, 8 अगस्त 2016

मोदीजी गाय प्लास्टिक नही वोट खाती है !

        मोदीजी को पीएम बने दो साल से ऊपर हो गया लेकिन सुरक्षाबलों और जासूसों ने कभी खबर नहीं दी कि उनकी जान को खतरा है,इसलिए वे बहुत बोर महसूस कर रहे हैं ! जान को खतरे की सूचना आती रहती है तो खबरों के जरिए थ्रेट परसेप्शन बनाए रखने में मदद मिलती है। लेकिन इधर हाल यह है कि कोई इस तरह की खबर नहीं बन रही थी तो हैदराबाद में अपने आप ही बोल बैठे कि दलित को नहीं मुझे गोली मारो।अब बताओ थ्रेट परसेप्शन बना या नहीं !

मोदी जी परसेप्शन में रहते हैंं,ये कमबख्त टीवी वाले कई दिनों से गऊ गऊ करके जो कवरेज दिखा रहे थे उसने परसेप्शन बिगाड़ दिया जिसका सुपरिणाम था गोगुंडों के बारे में दिया गया बयान।

साहब की टीवी देखने की आदत है,टीवी में वे अपने को देखना बहुत पसंद करते हैं,लेकिन टीवी वाले उनको न दिखाकर गोगुंडों को दिखा रहे हैं,अतःटीवी से गोगुंडों को भगाने के लिए उनके खिलाफ बयान देना पड़ा।सारा मैनेजमेंट चूंकि प्रचार कंपनियां करती हैं तो उन्होंने भी बताया कि न्यूज फ्लो गऊ और दलित का है तो उसी संदर्भ में कुछ भी बोलिए टीवी पर छा जाएंगे।इसलिए टीवी पर छाने की रणनीति के कारण गोगुंडों और दलितों के बारे में बयान देने पड़े।

वरना आप सोचिए मोदीजी पीएम हैं, वे विपक्ष में नहीं हैं जो बयान देकर कहें कि वे क्या चाहते हैं,वे चाहें तो सीधे एक्शन ले ही सकते हैं,कोई सर्कुलर भेजकर राज्यों को आदेश दे ही सकते हैं,लेकिन वे कोई एक्शन नहीं लेते,वे सिर्फ दलितों और गोगुंडों पर बयान देते हैं,इससे पता चलता है मामला परसेप्शन का है प्रचार का है,एक्शन का नहीं है,वरना पीएम को बोलने के लिए नहीं एक्शन के लिए कुर्सी मिली है लेकिन मोदीजी यह सामान्य सी बात समझने को तैयार नहीं हैं।

मोदीजी पहले दलितों से रोज मिलो,फिर मांग पत्र लो,फिर गाली खाओ,फिर देखते हैं सपने में रामजी आते हैं या दलित !दलित की तो आपके लिए बददुआएं और ब्राह्मणों की गालियां ही काफी हैं।

चलो फंदा कटा अब दलित नहीं मारे जाएंगे,गऊओं के नाम पर नहीं सताया जाएगा।जिसे सताने का मन होगा पीएम के घर की ओर जाएगा,खुशी खुशी उनको सताएगा और मजे में घर लौटेगा।पीएम स्वयं सब दलित उत्पीड़न अपने ऊपर लेने को तैयार हैं.सच में सतयुग आ गया। इसी क्षण का इंतजार था,आज से गाय भी मस्त रहेंगी,हाशिए के लोग भी मस्त रहेंगे।इसे कहते हैं मस्त मोदी की मस्त बातें।मस्ती में राजनीति इसी को कहते हैं,मोदीजी किसी पीडित के घर नहीं गए,किसी उत्पीड़क को दण्डित नहीं किया और सब कुछ मस्ती में बदल दिया,बाकी मस्ती की घूंट चैनल वाले और जनसंपर्क कंपनियां आपके घर तक पहुँचादेंगी।आनंद लो,चिन्ता मत करो।दलित उत्पीड़न खत्म,गऊ उत्पीड़न खत्म।मैं सिर्फ यही सोच रहा हूं जो बात हैदराबाद में मोदीजी ने आज बोली वही बात रोहित वेमुला की माँ के घर जाकर ,रोहित की मौत के बाद क्यों नहीं बोले । असल में पीएम का ग़ुस्सा कितना आरामदायक होता है कि वह विज्ञापन के जिंगल की तरह लगता है! पीएम को गोगुण्डों पर ग़ुस्सा आया है तो कम से कम भाजपा के उन नेताओं को भाजपा से निकाल बाहर क्यों नहीं करते जो गोगुण्डों की टीवी पर हिमायत करते रहे हैं।

चलिए देखते हैं राजस्थान, मध्यप्रदेश गुजरात और महाराष्ट्र में कितने गोगुण्डों को राज्य सरकार गिरफ़्तार करती है।

काला धन वापस आएगा और हर नागरिक के बैंक खाते में 15लाख जमा होंगे,यह बात सुनने के बाद लोग उत्तेजित हो गए और मोदीजी को वोट भी दे आए।ये बुद्धिहीन लोग नहीं थे,बल्कि लोभ में पड़कर बुद्धि का उपयोग नहीं करना चाहते। अच्छे दिन आएंगे लेकिन नहीं वह दिन नहीं आए,इसका प्रधान कारण है हमारे मन का हमेशा लोभ के नशे में डूबे रहना,नशे के कारण सहज रूप में सोच ही नहीं पाते।अभी भी बहुत बड़ी संख्या है जो नशे में डूबी हुई है



कश्मीर में कर्फ़्यू लगे तीस दिन हो गए। ५४ लोग मारे जा चुके हैं। छह हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। लेकिन पीएम के पास एक बयान देने का समय नहीं है। जनता में गए वहाँ पर कल और आज उनको कश्मीर की याद नहीं आई । सवाल यह है कि पीएम मोदी जनता की तकलीफ़ के समय सक्रिय क्यों नहीं होते? बयान क्यों नहीं देते ? जनता से तकलीफ़ में कन्नी काटना तानाशाह भाव है। कश्मीर और कोकराझार पर पीएम नरेन्द्र मोदी चुप्पी अर्थपूर्ण है! नरेन्द्र मोदी वहाँ चुप रहते हैं जहाँ असफल रहते हैं!

शुक्रवार, 13 मई 2016

फेक डिग्रियों के खेल में-


          पी एम नरेन्द्र मोदी की बीए,एमए की डिग्री के मामले पर डीयू के रजिस्ट्रार ने जिस तरह का बयान दिया है वह बताता है कि मोदीजी की डिग्रियां फेक हैं।रजिस्ट्रार का कहना है नाम और वर्ष की त्रुटियां सामान्य बात है।रजिस्ट्रार गलत कह रहे हैं,किसी भी छात्र के प्रमाणपत्र और अंकतालिका में ये त्रुटियां पकड़ी जाने पर आपराधिक मामला बनता है।वि.वि.संबंधित छात्र पर केस करता है या फिर उसे दाखिला नहीं देता।दूसरी बात नाम और वर्ष की त्रुटियों को तो प्रकारान्तर से रजिष्ट्रार ने मान लिया है,ऐसे में मोदीजी की डिग्रियां फेक है।डीयू के वीसी ने रजिस्ट्रार के बयान से अपने को पृथक रखा है,यानी डिग्री फेक हैं।असल में,  मोदीजी को अपनी डिग्रियों का मूल रूप दिखाना चाहिए।गुजरात वि वि और दिल्ली विवि के मौजूदा प्रशासन को इस बीच में उन्होंने शामिल क्यों किया है ? उनको डिग्री मिल चुकी है,मूल उनके पास है वही दिखाया जाना चाहिए।डुप्लीकेट का सवाल तब पैदा होता है जब मूल खो जाए,मूल खोया नहीं है,मूल उनके ही पास है,यदि खोया है तो उन्होंने पहले कभी डुप्लीकेट निकलवाया होगा वही दिखाएं। यह भी बताएं डुप्लीकेट कब बनवाया और क्यों बनवाया। 
आज जब केजरीवाल ने डिग्री पर सवाल खड़े किए हैं तो डुप्लीकेट इन विश्वविद्यालयों से निकलवाकर दिखाने का मतलब क्या है ? आम आदमी पार्टी ने इन दोनों विश्विद्यालयों से 18सवाल उनकी डिग्री के बारे में पूछे हैं जिनका जबाव मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश के बावजूद इन दोनों विश्वविद्यालयों ने लिखित रूप में नहीं दिया है।मोदीजी की डिग्रियां असली हैं तो इन 18सवालों के जबाव देने से ये दोनों विश्वविद्यालय क्यों मना कर रहे हैं।इन सब स्थितियों को देखते हुए यही लगता है डिग्रियां फेक हैं।
जिन 18सवालों को आम आदमी पार्टी ने पूछा है वे सामान्य सवाल हैं उनसे देश की एकता-अखण्डता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं पहुँचेगा,वैसी अवस्था में उन सवालों के जबाव न देना गलत है और सूचना प्राप्ति अधिकार कानून का उल्लंघन है।यह राष्ट्रीय सूचना आयुक्त के आदेश की अवहेलना भी है,इस अर्थ में संविधान का अपमान है,कानून का अपमान है।

शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री का मायाजाल और हनुमानभाव


     जब हमने कह दिया तुम भगवान हो तो भगवान हो ! जब हमने कह दिया तुमसे ज्यादा कोई बलिष्ठ नहीं है,तो कोई नहीं है ! हमारे यानी भक्त के कहने का मूल्य है ! तुम तो जानते ही हो भगवान को भगवान खुद भगवान ने नहीं बनाया बल्कि भक्तों ने भगवान को भगवान बनाया है!तुम जान लो श्रीराम –श्रीराम न होते यदि भक्त हनुमान न होते ! हमने देखा है भगवान के पेशाब से चिराग जलता है,हमने महसूस किया भगवान के इशारे पर सारे मीडिया की आवाज बंद हो जाती है ! सारा मीडिया भगवान –भगवान करने लगता है ! यह भगवान का ही खेल है कि आरएसएस जैसा संगठन भेड़ बन गया है! भगवान के जब इतने खेल चल रहे हों तो ऐसी अवस्था में ये क्या डिग्री दिखाओ –डिग्री दिखाओ लगा रखा है !

डिग्री की जरूरत मूर्खों की पड़ती है !देवता और अक्लमंद डिग्री से नहीं पहचाने जाते ! तुम कम अक्ल हो, इसीलिए डिग्री-डिग्री चिल्ला रहे हो!भगवान तो भगवान हैं ,वे महाअक्ल हैं!वे कृपानिधान हैं! सर्वगुण सम्पन्न हैं! उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता! वैंकेय्या नायडूजी आप उनसे भी महान् हैं! हमारे यहां हिन्दी साहित्य में कहावत है भक्त भगवान से बड़ा होता है ! भगवान और भक्त में भक्त ताकतवर होता है! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर मेरा मन भक्त-भक्त हो गया है ! आपसे अंदर से ईर्ष्या भी हो रही है कि मैं आप जैसा भक्त क्यों नहीं बन पाया !

नायडूजी आपने सही कहा पीएम नरेन्द्र मोदी भगवान की देन हैं,स्वयं भगवान हैं!कमाल की खोज की है आपने ! सही कहा है किसी ने ,जो चीज भक्त को नजर आती है वह चीज भगवान में गैर-भक्तों को नजर नहीं आती ! नायडूजी आपकी जय हो!आपने हम सबकी आँखें खोल दीं! आप कितने महान् हैं कि आपने मोदी भगवान् की खोज कर ली !आप इसलिए भी महान् हैं क्योंकि आपने भगवान् को भगवान् बना दिया!

पत्थर की मूर्ति में भगवान् की जो प्राणप्रतिष्ठा करता है उसका लोग परम भक्त के रूप में प्रतिदिन स्मरण करते हैं! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर इस समय ईश्वर के रीयल भक्त भी थर-थर काँपने लगे हैं,पश्चाताप की आग में जल रहे हैं कि अरे सामने भगवान खड़े थे,घर –घर में टीवी स्क्रीन में भगवान गीता पढ़ रहे थे,लेकिन हम अभागे उनको देख ही न पाए!नायडूजी रीयल भक्त दुखी हैं और पीड़ित भी हैं कि हमारे जैसे धर्मप्राण भारत में साक्षात भगवान पधारे और वे उनको पहचान नहीं पाए! नायडूजी आपने भारत की भक्तप्राण जनता की आँखें खोल दीं,आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

नायडूजी आपकी भक्ति और दिव्यदृष्टि देखकर अरविन्द केजरीवाल पर गुस्सा आ रहा है,लगता है यह आदमी ठीक नहीं है,भक्त को नहीं पहचानता ! भगवान को नहीं पहचानता ! पता नहीं यह मोदी भगवान को छोड़कर काहे को रोज जय हनुमान –हनुमान करता रहता है !

जिस तरह हर गली में हनुमान घूमते रहते हैं वैसे ही यह भी घूमता रहता है,जिस तरह गली के छोरे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो झल्लाकर रख देते हैं,इसने भी गली के छोकरों की तरह मूर्खतापूर्ण सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं,कह रहा भगवान की डिग्री फेक है! पागल हो गए हो केजरीवाल ! लेकिन नहीं हमें उसकी बात पर गौर करना चाहिए।असल में केजरीवाल तो हनुमान भाव में रहता है! हनुमान भाव बेहद खतरनाक है यह रावण को मौत के मुँह तक पहुँचा चुका है,वह बहुत सारी डिग्रियों से युक्त पंडित था,लेकिन हनुमान भाव ने रावण की ,सत्ता,डिग्रियों और विद्वता को एक ही झटके में राख करके रख दिया था,सोने की लंका में आग लगा दी ।हनुमान भाव में निडरता और पूंछ बहुत महत्वपूर्ण है,लंका में आग लगाने के लिए हनुमान की निडरता और पूंछ ही महान् हैं!

हनुमान भाव के सामने महाबली ,महापंडित रावण का सारा कौशल बेकार गया! हनुमान भाव से राम भी प्रभावित थे।हनुमान भाव यानी आग लगाने वाला भाव,लंका जलाने वाला भाव!इस भाव के सामने सब कुछ नश्वर है,भगवान भी नश्वर है,विद्वान भी नश्वर है,राम की विजय में हनुमान भाव की कभी किसी ने उस तरह चर्चा नहीं की है,लेकिन आप तो जानते ही हैं हनुमान भाव महान है। हनुमान भाव का लक्ष्य है रावण का वध ! हनुमान भाव के लिए सत्य,तथ्य, तर्क-वितर्क महत्वपूर्ण नहीं है।हमने बार-बार देखा है भक्तभाव के जितने रूप हैं उनमें हनुमान भाव सबसे ताकतवर है।भगवान राम के भक्त काम नहीं आए,हनुमान भाव काम आया! तुम यादकरो हनुमान के पास क्या था ॽ सिर्फ हनुमान भाव था!हनुमान भाव यानी निडरता! केजरीवाल इसलिए सुंदर लगता है क्योंकि वह निडर है!भक्त कमजोर होता है क्योंकि वह निडर नहीं होता!तुम तो जानते हो लोकतंत्र की कुंजी उनके हाथ में है जो निडर हैं ! अब सोचो तुमको भक्त बनना है या निडर बनना है।निडर बनना है तो हनुमान भाव में जाओ,लंका में आग लगाओ !



शुक्रवार, 6 मई 2016

मोदी-ईरानी निराश न हों! डिग्रियां ही डिग्रियां!


         जब देश में प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री की डिग्रियां फेक हों तो सोचो इनके निशाने पर सबसे पहले कौन होगा ॽ जाहिरा तौर पर शिक्षा क्षेत्र होगा।विश्वविद्यालय होंगे,दिल्ली विश्वविद्यालय होगा।हमारे सीपीआईएम के शिक्षकनेता खासतौर पर सुन लें कि उनकी यह पहली जिम्मेदारी बनती थी कि वे नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी की फेक डिग्री के मामले को उठाते और इन दोनों नेताओं को बेनकाब करते।लेकिन उन्होंने यह काम नहीं किया।जबकि शिक्षक संघ में उनका नेतृत्व है। हम नहीं मानते कि इस मामले में माकपा के नेताओं ने अनजाने चूक की है,बल्कि यह माकपा के शिक्षक नेताओं में बढ़ रही अ-राजनीतिक मनोदशा का परिणाम है।सोचने वाली बात यह भी है कांग्रेस का दमदार नेतृत्व है डीयू में लेकिन उसने भी यह काम नहीं किया,क्योंकि उनको भी मोदीजी से लेन-देन की राजनीति करनी है।

आम आदमी पार्टी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने पीएम नरेन्द्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की फेक डिग्रियों के मसले को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया।ताज्जुब की बात यह है कांग्रेस और माकपा दोनों ने संसद में इन दोनों नेताओं की फेक डिग्री के मसले को आजतक पुरजोर ढ़ंग से नहीं उठाया,एक भी दिन संसद ठप्प नहीं की। इस मसले की इन दोनों दलों द्वारा उपेक्षा अनजाने में नहीं हुई है।बल्कि सुनियोजित समझ का परिणाम है।

संसद में इन दोनों नेताओं पर दबाव डाला जाए कि ये दोनों नेता अपनी वैध डिग्रियां संसद के पटल पर पेश करें,जिससे उनकी वैधता की जांच करायी जा सके।लेकिन सत्ता और विपक्ष में इस मामले में नूरा कुश्ती चल रही है।पूरा विपक्ष मोदीजी और ईरानीजी को घेर सकता था लेकिन घेर नहीं रहा।क्यों नहीं घेर रहा ॽ क्यों अकेले आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने यह फ्रंट संभाला हुआ है ॽ क्या विपक्ष की इस मामले में कोई जिम्मेदारी है या नहीं ॽ

ईरानीजी और मोदीजी की फेक डिग्रियों के प्रसंग में मुझे 1970 के दशक की दिल्ली की दीवारें याद आ रही हैं,उस समय इन दीवारों पर पोस्टर लगे रहते थे-हाईस्कूल फेल निराश न हों,सीधे बी.ए. करें।इसी तरह-बी.ए.फेल निराश न हों सीधे एम.ए. करें।सचदेवा इंस्टीट्यूट के इस तरह पोस्टरों से दिल्ली भरी रहती थी। इन पोस्टरों का मुख्य शीर्षक हुआ करता था,´निराश न हों´,हमें लगता यही है इन दोनों नेताओं ने इस तरह के पोस्टरों से प्रभावित होकर अपनी डिग्री की अभिलाषा को पूरा किया होगा !!

इस तरह के इंस्टीट्यूट उस जमाने में हजारों निराश युवक-युवतियों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आए थे।लाखों निराश युवाओं के इनके जरिए घर बसे,डिग्री पाने की अभिलाषा पूरी हुई। वरना यह कैसे संभव है कि आम आदमी पार्टी चीख-चीखकर कह रही है पीएम की डिग्रियां फेक हैं लेकिन पीएम जबाव नहीं दे रहे,ईरानी जबाव नहीं दे रहीं।

आम आदमी पार्टी ने इन दोनों नेताओं की डिग्रियों के बारे में सही ढ़ंग से खोज की है और सारे तथ्य जुटाए हैं और राजनीतिक पहल करके हमला बोला है।इस समय आम आदमी पार्टी के हाथ में इन दोनों नेताओं की गर्दन है।हम भी देखें सच्चाई कब तक सामने आती है। पीएम मोदी और ईरानीजी ने लगातार विभिन्न स्तरों पर अपनी डिग्रियों को लेकर सफेद झूठ बोला है।यदि उनके दावे में जान होती तो ये दोनों नेता अपनी डिग्री को संसद के पटल पर रख देते और सारी बहस खत्म हो जाती।लेकिन पीएम की एमए डिग्री के बारे में गुजरात वि.वि. के उपकुलपति बोले जो कि स्वयं में समस्या खड़ी करके चले गए,उनके बयान में साफ था कि पीएम मोदी की एम.ए.डिग्री ऊपर के दवाब में आनन-फानन में तैयार की गयी है।वरना सभी सूचनाएं एक साथ सामने रखी जानी चाहिए।



हम मांग करते हैं पीएम मोदी और मानव संसाधन मंत्री ईरानीजी अपनी सारी डिग्रियां संसद के पटल पर रखें जिससे सच्चाई सामने आ सके।यदि इन्होंने झूठ बोला है तो इनको पद छोड़ना चाहिए।मोदी सरकार को इस्तीफा देना चाहिए।मुखिया के नाते राजनीतिक तौरपर वे जिम्मेदार हैं और झूठ बोलने के लिए उन्हें दण्डस्वरूप सरकार से इस्तीफा देना चाहिए।

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

टीवीयुग में कन्हैया कुमार की सीमाएं-

        मेरे कल के आलेख ´कन्हैया कुमारःविभ्रम और यथार्थ´ पर टिप्पणी करते हुए प्रियंकर पालीवाल ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पालीवाल का मानना है,´कन्हैया कुमार,राज ठाकरे, लालूप्रसाद और नरेंद्र मोदी इन सबके भाषण उनके समर्थकों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं . सेंस ऑफ ह्यूमर ? खांटीपन ? देसी मुहावरा ? लफ्फाज़ी ? अन्य के लिए घृणा-प्रचार ? आखिर क्या है इनकी लोकप्रियता का राज ? इसका विश्लेषण होना चाहिए . अगर जे.एन.यू. के पूर्व छात्र नेताओं से ही तुलना करनी हो तो डी.पी.त्रिपाठी या सीताराम येचुरी से कर ली जाए . जगदीश्वर चतुर्वेदी से ही कर ली जाए . पर एक बात तय है कि कन्हैया की लोकप्रियता अभिजात वाम की लोकप्रियता नहीं है. वह वाम के आभिजात्य को तोड़ने वाली ग्रामी-वामी यानी भदेस-वामी लोकप्रियता है .´

इस प्रसंग सबसे पहली बात यह कि कन्हैया कुमार के भाषण को राज ठाकरे,लालू प्रसाद यादव ,नरेन्द्र मोदी के साथ तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।राज ठाकरे लंपट राजनीति का मीडियानायक है,लालू यादव बिहार का सबसे जनप्रियनेता है,नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के नायक हैं, जबकि कन्हैया कुमार जेएनयू का छात्रनेता है।इन चारों में यह बुनियादी अंतर है।इन चारों का जनाधार अलग है और राजनीतिक नजरिया भी अलग है।चारों की भाषा और मुहावरे में भी अंतर है।कौन नेता कैसा है यह इस पर निर्भर करता है कि उसका जनाधार किस तरह के लोगों में है और वह राजनीति को किस नजरिए से देखता है।सेंस ऑफ ह्यूमर या देसी खांटीपन,कभी भी टिकाऊ नेता नहीं बनाते।उपरोक्त चारों नेताओ में राज ठाकरे घृणा की राजनीति करते रहे हैं,जबकि लालू यादव और कन्हैया कुमार ने घृणा की राजनीति नहीं की है।उनकी राजनीति का बुनियादी आधार लोकतांत्रिक परिवेश से जुड़े सवालों पर केन्द्रित रहा है।जबकि नरेन्द्र मोदी ने घृणा और विकास के रसायन के आधार पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति की है। ।

उल्लेखनीय है वाम विचारधारा कभी आभिजात्य में लोकप्रिय नहीं रही।जेएनयू में भी वह आभिजात्य की प्रिय विचारधारा नहीं है।जेएनयू में वाम राजनीति में शामिल होने वालों में अधिकांश गैर-आभिजात्य वर्ग से आए छात्र रहे हैं।यह मिथ है कि जेएनयू में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र आभिजात्य होते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।एक अन्य चीज है जिसे हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए, भाषण की जनप्रियता हमेशा संदर्भ,मीडिया और परिवेश की संगति-असंगति के संबंध पर निर्भर करती है।इसका कोई तयशुदा नियम नहीं है।

कन्हैया कुमार के 9फरवरी के पहले और बाद के भाषण जनप्रिय हुए हैं,वह आम लोगों को इंटरनेट पर अपनी ओर खींचने में सफल रहा है।लेकिन वह उतने लोगों को भविष्य में अपने भाषणों के करीब नहीं खींच पाएगा।इसका प्रधान कारण है कि टीवी प्रसारण में उसकी अनुपस्थिति। टीवी प्रसारण में कन्हैया के पहले वाले भाषण आए,प्रसारित हुए,उसने उसके इंटरनेट पर उपलब्ध भाषणों की दर्शक संख्या भी बढ़ा दी।आज भी हमारे समाज में कम्युनिकेशन में टीवी चैनलों की निर्णायक भूमिका है।मेरा अनुमान है जेएनयू कैंपस के बाहर कन्हैया कुमार तब तक ही जनप्रिय रहेगा जब तक वह टीवी पर रहेगा,टीवी से गायब होते ही उसके भाषण के प्रति आकर्षण कम हो जाएगा। इसका प्रधान कारण है टेलीविजन कम्युनिकेशन। इन दिनों जितने भी नेता जनप्रिय हैं वे अपने भाषणों के कारण जनप्रिय नहीं हैं वे जनप्रिय हैं टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण।



जिस व्यक्ति को टीवी ने उछाल दिया वह जनप्रिय हो गया,चाहे वह निर्मल बाबा हो या श्रीश्री रविशंकर हो या बाबा रामदेव हो,या मोदी हो या लालू हो।इन सबकी जनप्रियता इनके भाषण कला के कारण नहीं है,बल्कि टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण है। इस युग में जो टीवी में है वह जनप्रिय है जो टीवी में नहीं है वह जनप्रिय नहीं है।नरेन्द्र मोदी की महा-लोकप्रियता इसलिए नहीं है कि मोदी ने महान कार्य किए हैं,बल्कि इसलिए है कि उसने टेलीविजन नेटवर्क को सबसे अधिक घेरा हुआ है।इस युग के नेता तब तक जिंदा हैं जब तक वे टीवी पर्दे पर हैं।

रविवार, 24 जनवरी 2016

मोहनमंडली का मोहनराग

          

    इन दिनों फेसबुक से लेकर मीडिया तक जिस तरह का हंगामा मोहनमंडली मचाए हुए है वह काबिलेगौर है।सारा नाटक सुभाषचन्द्र बोस के गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किए जाने की आड़ में हो रहा है।इस समूचे प्रसंग को मोहनप्रसंग कहें तो अनुचित न होगा।मोहनमंडली जिस भाव और मंशा के साथ इतिहासनिर्माताओं को प्रदूषित करने के काम में लगी है उससे इतिहास में नए तथ्य और सूचनाएं कम जुड़ेंगे, इतिहास का विकृतिकरण ज्यादा होगा।क्योंकि इनकी पूरी मंशा इतिहास को विकृत करने और इतिहास के प्रति नफरत पैदा करने की है।भारत जैसे लोकतंत्र में साम्प्रदायिक ताकतें इतिहास के प्रति नफरत पैदा करके ही जिंदा रह सकती हैं।जबकि तालिबानी इलाके में इस तरह की ताकतें इतिहास का विध्वंस करती हैं।बाबरी मसजिद विध्वंस एक नमूना मात्र है,उनके पास भविष्य में विध्वंस करने वाली ऐतिहासिक इमारतों की लंबी सूची है।वे सिर्फ उचित माहौल की तलाश में हैं ,ज्योंही अनुकूल माहौल देखेंगे फिर से बाबरीयोजना कहीं पर भी लागू कर सकते हैं। इसका प्रधान कारण है उनका इतिहास के प्रति द्वेषभाव।इसलिए मोहनमंडली में इतिहासप्रेम खोजना चील के घोंसले में मांस का टुकड़ा खोजने के बराबर है।
इतिहास में नफरत पैदा करने के लिए जरूरी है कि पहले इतिहास निर्माता को मारो,हत्या करो।यह काम वे महात्मा गांधी की हत्या करके कर चुके हैं।उनके हत्यारे हाथों से जो बच गए हैं उनको ‘वे हमारे हैं वे हमारे हैं’ का राग अलाप करके मारने में लगे हैं।गांधीजी की हत्या के बाद उनको सबसे पहले दो लोग पसंद आए वे थे विवेकानन्द और भगतसिंह । इन दोनों ही विभूतियों के विचारों को लेकर मोडनमंडली ने जिस तरह का जहर युवाओं में भरा है उसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता।
     बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मोहनमंडली के इतिहास विध्वंसक अभियान की राष्ट्रीय योजना में कई नए नाम नाम शिखर पर आए हैं इनमें महामना पंडित ,बल्लभभाई पटेल,मदनमोहन मालवीय,बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस प्रमुख हैं। मोडनमंडली की पूरी योजना यह है कि युवापीढ़ी को इन विभूतियों के सकारात्मक वैचारिक मूल्यों से दूर रखा जाए। इनको डिजिटल इमेज मात्र बनाकर पेश किया जाय।वे इन विभूतियों को अपने साम्प्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों और दैनंदिन घृणित धर्मनिरपेक्षताविरोधी वैचारिक अभियान के पैकेज में पेश कर रहे हैं।
    आज जब हम मोहनमंडली के वैचारिक प्रदूषण पर विचार करें तो यह बात ध्यान रखें कि बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद इस मंडली का बुनियादी लक्ष्य रहा है धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को नष्ट करना।धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ युवाओं में नफरत के बीज बोना।इस काम में उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली है,उनकी सफलता के पीछे कई कारण रहे हैं, पहला बड़ा कारण है भारत के कारपोरेट घरानों का हिन्दुत्वप्रेम। दूसरा बड़ा कारण है धर्मनिरपेक्षदलों,खासकर कांग्रेस  का धर्मनिरपेक्षता को लेकर ढ़ुलमुल रवैय्या।कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को लेकर सख्त वैचारिक रवैय्या अपनाया होता तो आज धर्मनिरपेक्षता इस तरह कलंकित न होती।तीसरा बड़ा कारण मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ,जिनके कारण धर्मनिरपेक्ष माहौल कमजोर हुआ और उपभोक्तावाद पुख्ता बना।इन तीन कारणों ने बुनियादी तौर पर आमलोगों को धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से दूर लेजाने में बड़ी भूमिका अदा की है।मोहनमंडली ने बड़े कौशल के साथ इन तीनों कारणों का लाभ उठाया है।
       मोहनमंडली के टुईंया से लोग आए दिन धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहते हैं,तमाम मीडिया लगातार धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए चलाए आंदोलन के समय से सक्रिय है और उसने जितनी बड़ी कु-सेवा सेवा समाज  की है उसकी लोकतंत्र में मिसाल मिलनी असंभव है। धर्मनिरपेक्षताविरोधी मुहिम के कारण समाज में जहां एक ओर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है वहीं दूसरी ओर वाम ताकतें कमजोर हुई हैं।वाम ताकतों ने कभी सोचा ही नहीं कि सामान्य धर्मनिरपेक्ष माहौल जब नष्ट होगा तो उन पर इसका किस तरह का नकारात्मक असर होगा।
     बाबरी मसजिद विध्वंस के समय वाम विचारधारा ने वैचारिक तौर पर जिस ऊर्जा का प्रदर्शन किया था उसको यदि कांग्रेस ने सही ढ़ंग से समझा होता तो देश का नक्शा कुछ और होता।लेकिन वोटबैंक राजनीति के चलते कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का मार्ग पकड़ा और अंततःवे समूचा मैदान मोहनमंडली को खैरात में सौंपकर मैदान से भाग खड़े हुए।यूपी से कांग्रेस का साफ होना सामान्य घटना नहीं है।बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद कांग्रेस के साफ होने का अर्थ है धर्मनिरपेक्ष माहौल का कमजोर होना। मोहनमंडली के धर्मनिरपेक्षताविरोधी प्रचार अभियान को जब तक एकजुट होकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें वोट से लेकर विचारधारा के विभिन्न क्षेत्रों तक चुनौती नहीं देतीं तब तक धर्मनिरपेक्षताविरोधी माहौल को तोड़ना बहुत मुश्किल है।
     इस प्रसंग में यह भी ध्यान रहे बसपा और सपा सिर्फ वोटबैंक के मामले में भाजपा को यूपी में पीट सकते हैं,वैचारिक प्रचार के मामले में ये दोनों दल बेहद कमजोर हैं,बाबरी विध्वंस के बाद राज्य में भाजपा हारती रही है लेकिन लोकसभा में लगातार अपनी ताकत में इजाफा करती रही है। भाजपा के वोटबैंक में यूपी में स्थानीय स्तर पर इजाफा भले ही नहीं हुआ, लेकिन संसद के वोट में इजाफा हुआ है,इससे भी बड़ी बात यह है आम लोगों के मन में धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जहर भरने में मोहनमंडली सफल रही है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें सुभाषचन्द्र बोस –आम्बेडकर आदि के प्रति मोहनराग के मर्म को उद्घाटित करने का काम करना चाहिए।

     उल्लेखनीय है मोहनमंडली में राष्ट्रीयनेताओं के प्रति वास्तव अर्थ में कोई श्रद्धा नहीं है। वह सिर्फ श्रद्धा का नाटक कर रहे हैं।मसलन्, सुभाषचन्द्र बोस को ही लें। आरएसएस ने कभी सुभाषचन्द्र बोस के जीते जी उनके विचारों और आदर्शों का समर्थन और स्वागत नहीं किया।यही दशा बाबासाहेब आम्बेडकर की थी। सवाल यह है जब ये दोनों नेता जिंदा थे तब आरएसएस के नेताओं को इनके गुण नजर क्यों नहीं आए ? अचानक बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद ही नजर क्यों आए ?भगतसिंह जब जिंदा थे तब उनके पक्ष में आरएसएस ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया ? क्यों आरएसएस लगातार स्वाधीनता संग्राम से भागता रहा,उसके साथ जुड़े तमाम नेता ब्रिटिश एजेंट का काम करते रहे ? आरएसएस ने ब्रिटिशदौर की भूमिका की आत्मालोचना तक नहीं की है।ऐसी स्थिति में उनके राजनीतिक लक्ष्य को समझने में भूल नहीं करनी चाहिए।

शनिवार, 23 जनवरी 2016

मुखौटे का सौंदर्य


अमा यार अपने ही हाथों कोई माला पहनता है ! माला वह शोभा देती है जब कोई और पहनाए ! जूते तब शोभा देते हैं जब अपने आप पहनो।तुम्हारा हाल बड़ा खराब है हर काम उलटा करते हो।जब सद्भाव रखना चाहिए,तब दंगा करते हो, जब बोलना चाहिए,तब चुप रहते हो,जब चुप रहना चाहिए,तब बढ़-चढ़कर बोलते हो।जब लेखक कह रहे थे निंदा करो,तब तुम्हारे भांड संस्था संचालक चुप थे,जब लेखक इनाम लौटा रहे थे,तब हेकड़ी में तुम गरिया रहे थे,अब कह रहे हो इनाम वापस लेने का नियम नहीं है,नियम बनाओ,डरते क्यों हो ?लेखक खा नहीं जाएंगे ! बुद्धिजीवियों का अपमान करना तुम्हारे खून में है,तुम यदि बुद्धिजीवियों का सम्मान करते तो लेखकों को बोलना न होता तुम खुद रीयल टाइम में बोलते।
रहते हो नेट पर बोलते हो पोस्टकार्टयुग की स्पीड से,यह तो पिछड़ेपन की निशानी है,इससे भारत का माथा ऊँचा नहीं होता।कल रोहित पर जब बोल रहे थे तो सच-सच बताओ इतनी देर क्यों लगी बोलने में,तुमको यह महसूस करने में इतनी देर क्यों लगी कि रोहित किसका बेटा है ? रोहित की माँ का दुख क्या है ? क्या किसी के आदेश की जरूरत थी ?
सच-सच बताओ तुम इतने बेखबर कब से रहने लगे,क्या तुमको नहीं मालूम कि देश निरंतर गैर जरूरी मसलों पर उलझता जा रहा है,समस्त कामकाज ठप्प है,समूचा मीडिया तुम्हारी मरी हुई धुन पर नाच रहा है।तुम्हारे मुखोटे लगातार बर्बर आचरण कर रहे हैं, नायक का मुखौटे इस कदर अपमान करें यह तो हमने कहीं नहीं देखा, मुखौटे तुमको रीयल रूप में और रीयल टाइम में जानते हैं,इसलिए वे तुम्हारे आंसुओं या गम पर दुखी नहीं होते,वे तो तुम्हारी रीयल अनुभूति में रहते हैं।तुम्हारा सच तो मुखौटे में व्यक्त होता है।तुम्हारी आत्मा तो मुखौटे में रहती है।तुम क्या सोच रहे हो यह तो तुम नहीं मुखौटे बताते हैं।क्योंकि तुम तो तुम नहीं हो मुखौटा हो। 
सच कहूँ,तुमसे ज्यादा ईमानदार तुम्हारे मुखौटे हैं।कम से कम वे निरंतर घृणा के भाव में रहते हैं,घृणा को खुशबू समझते हैं,गंदगी को उसूल समझते हैं।संविधान को कागज का टुकड़ा समझते हैं,दूसरों की भावनाओं-इच्छाओं और अनुभूतियों को पैरों तले कुचलने में विश्वास करते हैं।वे ही असली वंशधर हैं तुम्हारे।तुमको गलतफहमी है कि तुम रोहित के प्रति दुख व्यक्त करके जनता का दिल जीत लोगे,अरे यार, तुम पहले मुखौटों का दिल जीतकर दिखाओ,मुखौटे तो सरेआम तुम्हारे बयान पर पेशाब कर रहे हैं। यह सिर्फ हिन्दुत्व परंपरा में ही संभव है जहां मुखौटे असली से ज्यादा सुंदर होते हैं।


गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

शब्दों के कातिल

इन दिनों मीडिया वाले और भाजपावाले बहुत नाराज हैं कि केजरीवाल ने पीएम मोदी को "कॉवर्ड" और "साइकोपैथ" क्यों कहा,इसके लिए वह माफी मांगे,केजरीवाल माफी मांगे या न मांगे यह उनका निजी फैसला होगा,वे जो चाहें करें,लेकिन हमें इससे बड़े सवाल पर विचार करना चाहिए कि शब्दों के दुरूपयोग या भ्रष्टीकरण पर ये टीवीवाले या भाजपावाले पहले कभी इस कदर आक्रामक नजर क्यों नहीं आए ? क्या किसी शब्द का पहलीबार गलत इस्तेमाल हुआ है या पहलीबार किसी ने किसी को गाली दी है ?
जरा अपने सामने टीवी स्क्रीन को गौर से देखें तो पता चलेगा कि टीवीवाले और राजनेता शब्दों के सबसे बड़े कातिल हैं।ये बड़ी ही बेशर्मी के साथ रोज शब्दों को भ्रष्ट कर कर रहे हैं लेकिन हमें कभी गुस्सा नहीं आता,हम क्यों इतने अचेत हैं या नियंत्रित सचेत हैं कि अचानक कॉवर्ड और साइकोपैथ पर बिफरे घूम रहे हैं ? हमें क्या यहां लिस्ट बताने की जरुरत है कि राजनेताओं और मीडिया,खासकर विज्ञापनों ने किस तरह शब्दों की हत्या की है,किन -किन शब्दों की हत्या की है,उनका अर्थ नष्ट किया है,विकृत किया है । जब शब्द मर रहे हों या उनका भ्रष्टीकरण हो रहा हो तो हमें गुस्सा क्यों नहीं आता ? हमें मोदी या किसी नेता के द्वारा प्रयुक्त होने या गाली या असभ्यभाषिक प्रयोग पर ही गुस्सा क्यों आता है ? क्या नेता को हमने शब्दों का मालिक बना दिया है ?क्या नेता शब्दों के प्रयोग,भ्रष्टीकरण आदि को तय करेंगे ? यदि ऐसा है तो यह बेहद खतरनाक स्थिति है। किसी व्यक्ति की महानता इस बात से तय होती है कि उसने प्रचलित शब्दों को किस तरह सकारात्मक अर्थ दिए हैं,किस तरह नए सामाजिक समूहों से शब्दों और अवधारणाओं को जोड़ा है। कबीर-तुलसी से लेकर दादू तक, गांधी से लेकर आंबेडकर तक,राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर तक,प्रेमचंद से लेकर भीष्म साहनी तक ,आरएसएस से लेकर मुस्लिम लीग तक,कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्टों तक सभी की परीक्षा शब्दों को अर्थवान और अर्थहीन बनाने के परिप्रेक्ष्य में करें तो संभवतःहमें यह एहसास होगा कि शब्दों के अर्थ का भ्रष्टीकरण कितना बड़ा अपराध है,यह भ्रष्टीकरण हम रोज अपने आसपास देखते हैं,टीवी विज्ञापनों में देखते हैं,लेकिन हमें गुस्सा नहीं आता,उलटे हमें शब्दों के भ्रष्टीकरण में मजा आने लगा है। आरएसएस जैसे संगठन का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उसने धर्मनिरपेक्षता शब्द को नष्ट कर दिया है।उसने बहुत बड़ी कुर्बानियों से निर्मित धर्मनिरपेक्षता के अर्थ को विकृत करके समूचे देश में धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ घृणा भर दी,इस शब्द को अछूत बना दिया। किसी शब्द के अर्थ के विध्वंस का इतना बड़ा हादसा हमारी आँखों के सामने रोज होता रहा और हम चुप रहे,हमारा मीडिया चुप रहा,उलटे आरएसएस वालों को बढ़-चढ़कर धर्मनिरपेक्षता पर हमले करने का उसने मौका दिया,व्यापक कवरेज दिया,धर्मनिरपेक्षता क्या है उसका अर्थ क्या है उसके बारे में मीडिया ने कभी आरएसएस को गलत अर्थ में इसका प्रचार करने से नहीं रोका,हमसे पूछें तो शब्दों के कातिलों के प्रति हमें बेरहम होना चाहिए।खासकर उन नेताओं और संगठनों के प्रति बेरहम होना चाहिए जो शब्द के साथ जुड़े अर्थ को भ्रष्ट करते हैं,गलत अर्थ में उसका प्रचार करते हैं।आरएसएस ने शब्दों के लठैत की भूमिका अख्तियार कर ली है,वे बोलने पर हमला करने लगते हैं,इस तरहकी असहिष्णुता तो पहले कभी नहीं देखी। आरएसएस वालों और भाजपाईयों को गालियों से यदि चिढ़ है तो उनको अपने साइबर लठैतों को सबसे पहले रोकना चाहिए जो आए-दिन असभ्यभाषा,गाली-गलौज की भाषा का फेसबुक पर इस्तेमाल करते हैं। यदि सर्वेे किया जाए तो पाएंगे कि साइबर जगत में गाली की गंगा के वे भगीरथ हैं । गालियां कोई भी दे,गलत है,राजनीति में सही नाम से प्रवृत्तियों और राजनीतिक केटेगरी में ही नेता या दल पर राय दी जानी चाहिए। लेकिन जिस समय भाषा का भ्रष्टीकरण हो रहा हो,लोकतंत्र पर हमले हो रहे हों,उस समय कईबार दुश्मन की नींदहराम करने के लिए गालियां निकलती हैं,असल में गालियां सोने नहीं देंतीं,वे गोली से भी ज्यादी पैनी होती हैं,सीधे हृदय तक मार करती हैं।बशर्ते सही समय पर दी जाय।हम भाजपा की मुश्किल समझ सकते हैं कि उनको जब कोई गाली देता है तो चुभती है,लेकिन वे जब किसी अन्य को गाली देते हैं तो परपीड़क आनंद लेते हैं। परपीड़क आनंद गाली का मूलभाव है ,जो भी दे ,वह आनंद की सृष्टि नहीं करती,पीड़ा देती है। गाली न दें तो बेहतर हो,लेकिन हमारे नेता अभी सभ्य नहीं बने हैं,वे असभ्य ही हैं अतःगाहे-बगाहे अपनी असभ्यता को वे गाली के जरिए व्यक्त करते हैं।

रविवार, 29 नवंबर 2015

धर्मनिरपेक्षता,धर्म की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र


           
संसद में इन दिनों भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर दो दिवसीय बहस हो रही है, इस बहस ने संविधान के सवालों को नए सिरे उठा दिया है।खासकर “धर्मनिरपेक्षता” के सवाल को प्रमुख सवाल बनाकर खड़ा कर दिया है। सत्ताधारी भाजपा को “धर्मनिरपेक्षता” को लेकर पहले से आपत्तियां थीं,लेकिन पहले वे कभी-कभार बोलते थे, लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद वे बार-बार “सेकुलर” शब्द पर आपत्ति कर रहे हैं,उसके खिलाफ घृणा अभियान चलाए हुए हैं, लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने सबसे घटिया ढ़ंग से “धर्मनिरपेक्षता” पर हमला किया।

हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर संसद में चल रही बहस में भी “धर्मनिरपेक्षता” को निशाना बनाया, प्रधानमंत्री तो” सेकुलर “ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करते। यही वह संदर्भ है जिसमें संविधान निर्माण के समय “धर्मनिरपेक्षता” पर चली बहस के कुछ पहलुओं का नए सिरे से मूल्यांकन करना बेहद जरुरी है।संविधान के प्रति प्रतिबद्धता जताने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है “देश में 'सेक्युलर' शब्द का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हुआ है और इसे बंद किया जाना चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि 42वें संविधान संशोधन के जरिए आपातकाल में संविधान के प्रियम्बुल में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को जोड़ा गया। राजनाथ सिंह के बयान में कई मसले निहित हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि 42वें संविधान संशोधन के सभी काले कानूनों को 44वें संविधान संशोधन के जरिए हमेशा के दफ्न कर दिया गया,उस समय जनता पार्टी की सरकार थी।वह आपातकाल विरोध की आंधी पर सवार होकर आई थी, लेकिन संविधान की प्रस्तावना से “धर्मनिरपेक्षता” और “समाजवाद” को नहीं निकाला गया। क्योंकि ये दोनों धारणाएं प्रासंगिक,संवैधानिक और वैध हैं। संविधान का क ख ग जानने वाला व्यक्ति भी इस तथ्य को जानता है,इसके बावजूद आरएसएस और उनकी भजनमंडली “धर्मनरपेक्षता” और “समाजवाद” के खिलाफ विषवमन करती रही है। लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद हासिल करना हमारे संविधान का मूल लक्ष्य है। इस लक्ष्य से देश को विचलित नहीं किया जा सकता। अब थोड़ा उस पहलू पर विचार करें जो संघियों को परेशान किए हुए हैं।

“धर्मनिरपेक्षता” के प्रसंग में स्व. प्रोफेसर के.टी शाह का जिक्र करना जरुरी है। वे संविधान सभा परिषद के सदस्य थे. उन्होंने दो बार यह कोशिश की थी कि संविधान में “सेकुलर” पदबंध को बुनियादी अधिकारों में शामिल कर लिया जाय, लेकिन उनको सफलता नहीं। अपने दूसरे प्रयास में उनके द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर संविधान परिषद में विचार जरुर हुआ, उनके द्वारा प्रस्तावित संशोधन था “ The state in India being secular shall have no concern with any religion ,creed or profession of faith.” शाह का मानना था कि देश में साम्प्रदायिक ताकतें सिर उठा रही हैं और उनके कारण देश को भयानक त्रासदी झेलनी पड़ रही है ऐसी स्थिति में संविधान में राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के बारे में स्पष्ट ढ़ंग से जरुर लिखा जाना चाहिए. यह अफसोस की बात है कि कानूनमंत्री को उनका संशोधन मान्य नहीं था और उनका संविधान संशोधन परिषद ने खारिज कर दिया।

हाल ही में राजनाथ सिंह एंड कंपनी ने जो बहस आरंभ की है और उसके पहले से संघ के लोग सवाल खड़े करते रहे हैं कि वे भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं मानते। वे तो हिन्दूराष्ट्र मानते रहे हैं।असल में भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को परिभाषित करने के लिए जरुरी है कि संविधान में वर्णित धर्म की स्वतंत्रता, नागरिकता और राज्य और धर्म के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों नए सिरे से विचार करें।

हमारा संविधान व्यक्ति और समुदाय दोनों ही स्तरों पर धर्म की स्वतंत्रता को सुनिश्चित बनाता है। धर्म की साझा आस्थाओं, रीतियों, और अनुशासनों को स्वतंत्रता देता है। मजेदार बात है कि धर्म की स्वंत्रता मात्र व्यक्ति तक सीमित नहीं है,बल्कि “ सभी व्यक्तियों” तक इसका विस्तार किया गया है। यानी भारत में देश के बाहर से आकर रहने वालों को भी धर्म की स्वतंत्रता है। यही वजह है कि भारत के बाहर से आए ईसाई संत और मिशनरियों को भी धर्म की स्वतंत्रता का संवैधानिक लाभ मिलता है। धर्म की स्वतंत्रता का संविधान में प्रावधान असल में कांग्रेस के 1931 के करांची अधिवेशन में पारित मूलभूत अधिकार संबंधी प्रस्ताव से सीधे लिया गया है,यहां तक कि दोनों की भाषा में भी समानता है। उस समय अनेक हिन्दुत्व समर्थकों ने धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता का यह कहकर विरोध किया था कि ईसाई मिशनरियों के द्वारा इसका दुरुपयोग हो सकता है।वे इसके बहाने धर्मान्तरण कर सकते हैं। उनके इन सब तर्कों को संविधान सभा ने नहीं माना।

धर्म की स्वतंत्रता में धर्मचेतना का प्रचार प्रसार शामिल है। लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसमें एक राज्य का नियंत्रण भी लगाया ,मसलन्, यदि धर्म के प्रचार से कानून-व्यवस्था में बाधाएं खड़ी हों,नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी गड़बड़ी पैदा हो तो धर्म के प्रचार को राज्य रोक सकता है।इसी क्रम में बताया गया कि धार्मिक प्रचार नियमन के दायरे में आता है।जबकि धर्मचेतना के बारे में राज्य को व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार संविधान नहीं देता। इस प्रसंग में राज्य की भूमिका सामाजिक जीवन को सामान्य बनाए रखने की है। लेकिन धर्मचेतना के बारे में व्यक्ति के अधिकार एकदम सुरक्षित माने गए हैं,उसमें राज्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी तरह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295-98 में धर्म संबंधी अनेक अपराधों का जिक्र किया गया है ।

संविधान के प्रसंग में यह सवाल भी उठा कि “धर्म” क्या है ? इसे कौन परिभाषित करेगा ? संविधान के अनुच्छेद 25(1) में इसे परिभाषित किया गया है । सवाल यह है धर्म को व्यक्ति,धार्मिक संस्था और राज्य कौन परिभाषित करेगा ? इस धारा के प्रसंग में दर्जनों अदालती फैसले आ चुके हैं और न्यायालय संविधान सम्मत निर्देशों के पालन पर अनेकबार राजसत्ता को निर्देश दे चुका है। न्यायालयों ने आम्बेडकर की धारणाओं में भी संशोधन किए हैं। आम्बेडकर ने पर्सनल लॉ के प्रसंग में संविधान सभा में बहस में बोलते हुए कहा था कि हमारे देश में धर्म की अवधारणा जन्म से मृत्यु पर्यन्त फैली हुई है।यहां कोई चीज ऐसी नहीं है जिसे धर्म न कहते हों,हमें यदि पर्सनल लॉ की रक्षा करनी है तो सामाजिक विषयों पर इस गतिरोध से निकलना होगा।यहां संस्कार और आस्था धर्म में गिने जाते हैं,अतः धार्मिक संस्कार-उत्सव तक तो यह ठीक है, लेकिन उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार आदि में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्यापक अधिकार नहीं दिए जा सकते। यही वजह है कि आम्बेडकर ने धार्मिक संस्कारों और समारोहों को तो धर्म के दायरे में रखा।

मनुष्य की अनेक धार्मिक गतिविधियां धर्मनिरपेक्ष गतिविधि के दायरे में आती हैं,यह भी हो सकता है कि धर्म के धर्मनिरपेक्ष आयाम भी हों,ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्ष धार्मिक गतिविधियों को धर्म का अंग नहीं माना जाना चाहिए। यही बात आस्था और विश्वास के साथ जुड़े सवालों पर भी लागू होती है। संविधान इस मामले में एकदम साफ है कि नागरिक के आस्था और विश्वासों को धार्मिक संस्थाएं नियमित और नियंत्रित नहीं कर सकतीं। पूजा-अर्चना,खानपान और पहनावे के मामले में धार्मिक मान्यताओं को संविधान मानता है लेकिन अन्य मामलों में नहीं।मसलन्,मंदिर में पूजा कैसे होगी,क्या प्रसाद चढ़ाया जाएगा,मंदिर में क्या पहनकर जाएं ,मंदिर में पुजारी किस तरह के वस्त्र पहनेगा,मंदिर कब खुलेगा,कब बंद होगा,मंदिर में उत्सव कब मनाए जाएंगे,भगवान क्या पहनेंगे और कैसे पहनेंगे , कौन से मंत्र पढ़े जाएंगे आदि चीजों का फैसला संबंधित धार्मिक संस्था करेगी,उसमें राज्य दखल नहीं देगा,न्यायालय भी दखल नहीं देगा। लेकिन किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकार क्या होंगे यह धर्म तय नहीं करेगा।

उल्लेखनीय है धर्म के दायरे में क्या आता है इसका दायरा संविधान बनाने के बाद से अदालतों की व्याख्याओं के बाद बढ़ा है। यह भी ध्यान रहे कि संविधान धर्म की स्वतंत्रता देता है तो संविधान के अनुच्छेद धारा25(2) के तहत राजसत्ता को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार भी है। इस प्रावधान के तहत ही कई मामलों में मंदिर प्रबंधन आदि के अधिकार राजसत्ता ने अपने हाथ में ले लिए । इसी के आधार पर बड़े पैमाने पर हिन्दू पर्सनल लॉ (शादी,तलाक,गोद लेने का कानू,उत्तराधिकार आदि) में परिवर्तन किए गए। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के तहत राजसत्ता को समाजसुधार से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भी है। इसके आधार पर ही हिन्दुओं में बहुपत्नीप्रथा समाप्ति के लिए कानून बनाया।जबकि हिन्दूधर्म के अनुसार बहुपत्नी प्रथा वैध थी। मंदिर में हरिजन प्रवेश को वैधता दी गयी।अछूत परंपराओं के खिलाफ कानून बनाए गए।जबकि हिन्दू धर्म में हरिजनों का मंदिर प्रवेश निषिद्ध था,अछूत प्रथा वैध थी।हिन्दुओं के पर्सनल लॉ में लाए गए सुधारों ने सबके लिए समान नागरिक अधिकारों की मांग का बहुत बड़ा आधार निर्मित किया है।

संविधान के तहत राजसत्ता के पास धार्मिक संस्थानों के वित्तीय क्षेत्र को नियंत्रित करने का हक भी है। उल्लेखनीय है मध्यकाल में अनेक राज्यों में राजाओं का मंदिरों के वित्तीय क्षेत्र पर नियंत्रण और स्वामित्व था।



धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का एक छोर धर्म की स्वतंत्रता से जुड़ा है तो दूसरा छोर नागरिकों के अधिकारों और नागरिकता की अवधारणा से जुड़ा है। हमारा संविधान व्यक्ति को आधारभूत सामाजिक इकाई मानकर नागरिकता पर विचार करता है, वह समूह या समुदाय को आधारभूत यूनिट मानकर विचार नहीं करता। हमारे यहां नागरिक का आधार व्यक्ति है,समूह,जाति या समुदाय या धर्म नहीं है। राज्य ने संविधान के तहत व्यक्ति के अधिकारों और जिम्मेदारियों दोनों का खुलासा किया है।इसे हम व्यक्ति और राजसत्ता के अन्तस्संबंध के रुप में देख सकते हैं।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

वर्चुअल नायक की औसत वाणी



   
आज मैं यू-ट्यूब के कारण पीएम नरेन्द्र मोदी का संसद में कल दिया गया भाषण सुन पाया। उदयप्रकाश जैसे प्रखर लेखक की राय उनके भाषण की प्रशंसा में पढ़ चुका था इसलिए और भी उत्सुकता थी कि आखिर मोदी ने ऐसा क्या कहा जिसने उदयप्रकाश जैसे लेखक को प्रभावित कर लिया,मुग्ध कर लिया। पहली बात यह कि पीएम मोदी को अपने भाषण में कांग्रेस और उसके नेताओं की भूमिका का नाम लेकर जिक्र करने से परेशानी हो रही थी,उन्होंने अपनी संघी परंपरा का निर्वाह करते हुए संविधान निर्माण में एक भी बार पंडित नेहरु या कांग्रेस पार्टी का नामोल्लेख तक नहीं किया।

पीएम मोदी के लिए संविधान का असल में क्या अर्थ है यह तो वे ही जानें लेकिन यदि उनके कल के भाषण में जो कहा गया है वह यदि संविधान का अर्थ है तो हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि पीएम ने हमें निराश किया है।वे संविधान के मर्म को समझ नहीं पाए हैं,दूसरी बात यह कि जिस व्यक्ति ने भी पीएम का भाषण लिखा था उसे कम से कम अच्छा भाषण लिखना नहीं आता।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में “सरलीकरण” और “सामूहिकीकरण” के भाषिक पदबंधों का असल मंतव्य पर पर्दा डालने के लिए कौशलपूर्ण ढ़ंग से इस्तेमाल किया। जैसे “राष्ट्र के महापुरुष” ,”सबने अपनी भावना प्रकट की”,”मैं भी अपनी भावना प्रकट कर रहा हूँ”,,”संविधान की पवित्रता”, “संविधान की सर्वोच्चता”,”, कईयों की तपस्या”,”संविधान की शक्ति”,”गौरवगान”,”उत्तम संविधान”,”संविधान के मूल्य”,”संविधान सदन तक सीमित न रह जाय” आदि। जिन लोगों को उद्धृत किया और नाम लिया ,वे हैं, आम्बेडकर,ग्रेन विले आस्टीन, राधाकृष्णन, गजेन्द्र गडकर, सच्चिदानंद सिंह,अटल बिहारी बाजपेयी,एक सांसद, राजा राममोहन राय,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर,राममनोहर लोहिया और उनके बहाने पंडित नेहरु,राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी और अंत में संस्कृत की उन पंक्तियों और नारों का जिक्र किया जो कई सालों से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और संस्थाओं के प्रतीक के रुप में प्रचलन में हैं।भक्ति आंदोलन से लेकर नवजागरण तक का जिक्र किया लेकिन बहुत सारे लोगों को वे अपनी सुविधा और विचारधारात्मक सीमाओं के कारण छोड़ते चले गए।

मोदी के अनुसार संविधान का नया अर्थ- “डिग्नी फॉर इण्डियन, यूनिटी फॉर इण्डिया,” सरकार का एक धर्म “इण्डिया फर्स्ट”, भारत का संविधान प्रथम। इस समूची प्रस्तुति को देखकर आपको आभास ही नहीं होगा कि भारत के संविधान का धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और समाजवाद के लक्ष्यों से कोई संबंध है। समूचे भाषण में एक बार “पंथ-निरपेक्षता” पदबंध का पीएम ने इस्तेमाल किया। संक्षेप में कहें तो यह संविधान की नए सिरे से सौगंध लेने के बहाने संविधान से आँखें चुराने वाली बातें ज्यादा नजर आईं। पीएम ने यह बात जरुर कही कि उनकी सरकार संविधान बदलने के बारे में नहीं सोच रही,आरक्षण खत्म करने के बारे में नहीं सोच रही । लेकिन वे आर्थिक विकास की सुस्तदशा,अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों आदि पर चुप रहे।

“अंत में आइडिया ऑफ इण्डिया” का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने जल्दी-जल्दी चक्की चलाते हुए संस्कृत पंक्तियों की ताबड़तोड़ वर्षा कर दी,इस क्रम में वे भूल ही गए कि वे जिन पंक्तियों को वे बोल रहे हैं उनका अर्थ क्या है ? उनका संदर्भ क्या है ? कम से कम रुककर उनके हिन्दी में अर्थ ही बता देते,वे र्थ क्यों नहीं बोल पाए हम समझने में असमर्थ हैं ! मोदी द्वारा उद्धृत संस्कृत की अनेक पंक्तियां सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों और कंपनियों के “मोटो” में हैं !

पीएम मोदी ने आम्बेडकर के साथ मनमाना व्यवहार करते हुए जो कहा है उससे आगे निकलकर हम देखें कि 25नवम्बर 1949 को आम्बेडकर ने क्या था । पता नहीं क्यों सोनिया गांधी और पीएम मोदी दोनों ने आम्बेडकर के व्यक्तिपूजा के खिलाफ कहे कथन का जिक्र करना जरुरी नहीं समझा,क्योंकि इन दोनों नेताओं में व्यक्तिपूजा के कु-संस्कार कूट-कूटकर भरे हुए हैं। इन दोनों नेताओं की मनोदशा को व्यक्तिपूजा पसंद है। दिलचस्प बात है कि दोनों ने एक ही उद्धरण पेश किया।पेश करने का तरीका अलग-अलग था।

अपने इसी भाषण में व्यक्तिपूजा के बारे में आम्बेडकर ने कहा-" जिन महान व्यक्तियों ने आजीवन राष्ट्र की सेवा की,उनके प्रति कृतग्यता रखने में कोई हर्ज़ नहीं।किंतु उस कृतग्यता की भी कुछ सीमा होती है।आयरिश देशभक्त ओकानेल के कथन के अनुसार अपनी आत्मप्रतिष्ठा की बलि देकर कोई भी पुरुष कृतग्य नहीं रह सकता; कोई भी नारी अपना सतीत्व भंग करवाकर कृतग्य नहीं रह सकती; और अपनी अपनी स्वतंत्रता की बलि देकर कोई भी राष्ट्र कृतग्य नहीं रह सकता।अन्य किसी भी देश की अपेक्खा भारत में यह सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि भारत की राजनीति में व्यक्तिपूजा का इतना जबर्दस्त असर पड़ता है कि वैसा असर विश्व के किसी भी अन्य देश की राजनीति पर नहीं पड़ता। हो सकता है,धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखा सकती हो,किन्तु राजनीति में भक्ति या व्यक्तिपूजा अधोगति का या अन्त में तानाशाही का निश्चित मार्ग है,यह ध्यान में रखें।"

आम्बेडकर ने अपने भाषण में संविधान लिखने में मदद करने वाले संविधान लेखकों के नामों का जिक्र किया है। संविधान के बारे में बोलते हुए आम्बेडकर ने कहा “ संविधान में बुने गए तत्व विद्यमान पीढ़ी के मत हैं। और मेरा यह विधान शायद अतिरंजित लगे,तो यह स्वीकार किया जाए कि यह मत सदन का है। संविधान कितना भी अच्छा या बुरा हो,तोभी वह अच्छा है या बुरा है, यह आखिरकार में राज्यकर्ताओं के संविधान के इस्तेमाल करने पर ही निर्भर होगा। ” आम्बेडकर ने यह भी कहा “ लोगों को पहली बात यह करनी चाहिए कि अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य सफल बनाते समय संविधानात्मक साधनों का मार्ग स्वीकार करना चाहिए। असहयोग,कानूनभंग और सत्याग्रह के मार्ग छोड़ दें;क्योंकि संविधानबाह्य मार्ग यानी केवल अराजकता का व्याकरण है।” दिलचस्प बात यह है मोदी ने आज उपरोक्त बातों का अपने भाषण में जिक्र किया,इसमें पहले वाले उद्धरण का मोदी और सोनिया दोनों ने जिक्र किया लेकिन व्यक्तिपूजा की बात को छोड़ दिया।



आम्बेडकर ने अपने भाषण में सबसे महत्वपूर्ण यह कही ,जिसका मोदी-सोनिया ने जिक्र ही नहीं किया,यह बात हम सबके लिए आज भी प्रासंगिक है,आम्बेडकर ने कहा, “भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करते समय भारतीयों को तीसरी बात यह करनी चाहिए कि वे राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट न रहें।उनको राजनीतिक लोकतंत्र का सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र में रुपान्तरण करना चाहिए।अगर राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र पर अधिष्ठित नहीं किया गया ,तो वह टिक ही नहीं सकता; क्योंकि सामाजिक लोकतंत्र स्वतंत्रता,समता और बंधुभाव को जीवन के तत्वों के रुप में पहचानता है।स्वतंत्रता,समता और बंधुभाव एक अखण्ड और अभंग त्रिमूर्ति है। अगर सामाजिक समता न होगी तो स्वतंत्रता का अर्थ मुट्ठीभर लोगोंका आम जनता पर राज्य करना होगा।अगर समता स्वतंत्रताविरहित होगी,तो व्यक्ति के जीवन की स्वयंप्रेरणा नष्ट करेगी।अगर बंधुभाव न होगा तो स्वतंत्रता और समता की वृद्धि सहजता से नहीं होगी।भारतीय जनता को एक बात स्वीकार करनी चाहिए कि भारतीय समाज में दो बातों का अभाव है।ये दो बातें हैं- सामाजिक समता और आर्थिकसमता।” अपने आवेशपूर्ण भाषण में आम्बेडकर ने यह भी कहा “ 26जनवरी1950 को हमें राजनीतिक समता प्राप्त होगी। किन्तु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता रहेगी। अगर यह विसंगति यथासंभव दूर करने का प्रयास हमने नहीं किया,तो विषमता की आँच लगी हुई है,वे लोग संविधान समिति द्वारा बड़े परिश्रम से बनाए इस राजनीतिक लोकतंत्र की मीनार मिट्टी में मिलाए बिना नहीं रहेंगे।” अपने इसी भाषण में आम्बेडकर ने जातिभेद पर हमला किया था। अफसोस की बात है इस पहलू की ओर पीएम मोदी का ध्यान ही नहीं गया। आम्बेडकर ने 40 मिनट तक अपना भाषण दिया था। संविधान समिति ने 26 नवम्बर को संविधान स्वीकार किया था,इसलिए इस तिथि का महत्व है । आम्बेडकर ने अपने बिगड़े हुए स्वास्थ्य की अवस्था में संविधान निर्माण के काम को पूरा किया था। संविधान का मसौदा किस अवस्था में तैयार हुआ इस पर 5नवम्बर1948 को संविधान समिति के सदस्य टी.टी.कृष्णमाचारी ने संविधान समिति के सामने जो कहा वह बेहद महत्वपूर्ण है,उन्होंने कहा, “ सदन को शायद यह मालूम हुआ होगा कि आपके चुने हुए सात सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया उसकी जगह रिक्त ही रही।एक सदस्य की मृत्यु हुई।उसकी जगह भी रिक्त ही रही।एक अमेरिका गए,उनकी जगह भी वैसे ही खाली पड़ी रही।चौथे सदस्य रियासत संबंधी कामकाज में व्यस्त रहे।इसलिए वे सदस्य होकर भी नहीं के बराबर थे।दो-एक सदस्य दिल्ली से दूरी पर थे।उनका स्वास्थ्य बिगड़ने से वे भी उपस्थित न हो सके।आखिर यह हुआ कि संविधान बनाने का सारा बोझ अकेले डॉ.आम्बेडकर पर ही पड़ा।इस स्थिति में उन्होंने जिस पद्धति से वह काम पूरा किया, उसके लिए हम उनके हमेशा ऋणी रहेंगे।” संविधान समिति की अनेक बैठकों में आम्बेडकर और उनके कार्यवाहक ही सिर्फ उपस्थित रहते थे.इस दृष्टि से संविधान का सारा मसौदा अकेले आम्बेडकर ने बेहद कष्ट की अवस्था में पूरा किया।

आओ मोदी हम ढोएंगे पालकी

             पीएम नरेन्द्र मोदी के कल संसद में दिए भाषण पर लेखक उदयप्रकाश की फेसबुक टिप्पणी पढ़कर बेहद शर्मिंदगी का एहसास हुआ। यह कैसा समय है जिसमें लेखक टुकड़ों में देखता है,भाषिक अंशों में देखता है,राजनीति और विचारधारा के बिना देखता है। निश्चित रुप से यह लेखकों के लिए बहुत संकट की घड़ी है। कल का मोदीजी का भाषण न तो ऐतिहासिक था और बेजोड़ था। उदयप्रकाश के राजनीतिक नजरिए पर फेसबुक पर बहुत बहस होती रही है लेकिन उनकी ताजा फेसबुक टिप्पणी ने एक बात जरुर संप्रेषित कर दी है कि हमारे लेखकों के पास फासिज्म के खिलाफ जंग करने की कोई न तो दीर्घकालिक समझ है और न सही विवेक ही है।

उदयप्रकाश ने क्या कहा पहले वह ध्यान से पढ़ें-

“आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संसद में संविधान पर दिया गया भाषण किसी ऐतिहासिक अभिलेख की, किसी महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेज़ की तरह महत्वपूर्ण है। इतना लोकतांत्रिक, समावेशी, उदार और विनम्र संभाषण कम से कम इस प्रभावी शैली में मैंने अपने जीवन में नहीं सुना।
बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने पूर्ववर्ती राजनेताओं के योगदान को जिस पारदर्शिता के साथ उन्होंने स्वीकार किया, देश के प्रथम प्रधानमंत्री की लोकतांत्रिक सहिष्णुता, ईमानदारी और तार्किक विवेक की उन्होंने प्रशंसा की, इसके अलावा संविधान की मूल प्रस्तावना के अलावा इसके परवर्ती संशोधनों को, जिसमें 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' के अलावा 'आरक्षण' की अनिवार्यता को जिस तरह उन्होंने अपनी सम्मति और समर्थन दिया, वह उन्हें पक्ष और विपक्ष की दोनों सरहदों के आरपार एक सर्वस्वीकृत राजनेता के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए, भावुकता के साथ पर्याप्त था।
मैंने पहले भी कहा है कि अपनी वक्तृता में संभवत: वे सिद्धहस्त अटलबिहारी वाजपेयी जी से भी कई क़दम आगे हैं।
वे अपने व्याख्यानों में शायद, तथ्यों और इतिहास संबंधी भ्रमों-भूलों और हास्यास्पद ग़लतियों के बावजूद, अब तक के एक बेजोड़ वक़्ता- प्रधानमंत्री हैं।
संसद में बाबा साहेब अंबेडकर की स्मृति और संविधान की मूल भावनाओं के पक्ष में दिया गया उनका यह भाषण अप्रत्याशित रूप से प्रशंसनीय ही नहीं, सामयिक और महत्वपूर्ण था।
यह वक्तव्य एक झटके में उनके ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह तथा वित्तमंत्री जेटली से उनकी दूरी को प्रदर्शित करने वाला था।
उनका यह संभाषण भारत की विविधता, बहुसांख्यिकता,बहुलता के प्रति उनके सम्मान को प्रकट करने वाला था।
बहुत ख़ुशी हुई। अब उम्मीद है वे अपने सांप्रदायिक, जातिवादी, हिंसक, असामाजिक और उग्र हिंदुत्ववादी तत्वों को भी क़ानून और संविधान के दायरे में ला कर उन पर सख़्त कार्रवाई करेंगे।
लेकिन कहीं यह देश के बदलते हुए मानस को भाँप कर किसी रणनीति के तहत, चतुराई के साथ, अपने दल के 'सरहदी' उग्र सांप्रदायिक और जातिवादी गिरोहों की हरकतों से होने वाली अपनी और अपने दल की गिरती हुई छवि और साख को बचाने की कोई हार को जीत में बदलने वाली चालाक युक्ति तो नहीं है?
या कहीं जनरल सर्विस टैक्स से लेकर कई ऐसे बिलों को, अपने कार्पोरेट मित्रों और सहयोगियों के लाभ के लिए, विपक्ष की मदद से, संसद के इसी सत्र में पारित करा लेने के लिये एक सोची समझी चालाकी तो नहीं है?
आज एक ओर जब प्रधानमंत्री निवास में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी उनके साथ चाय पी रहे हैं, ठीक उसी समय चंदन मित्र और शेखर गुप्ता, दोनोंसंविधान में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' के प्रक्षेपण पर राजनाथ सिंह के तर्क के अनुसार बहस की शुरुआत कर रहे हैं।

मुझे तो यही लगता है कि संविधान की मूल आत्मा की हिफ़ाज़त देश की जनता को अपनी एकजुटता के साथ करनी होगी।

राजनीति जिन हाथों में है, पता नहीं क्यों अभी भी दोस्तो, उस पर विश्वास नहीं होता।”

उदयजी आप जानते हैं कि पीएम के नाते मोदी के पास संसद में संविधान की वैचारिक सरहदों के बाहर जाने का कोई मार्ग नहीं है। संसद में बोलना है तो संसद, संविधान और घोषित नीतियों के फ्रेमवर्क में ही बोलना होगा।इस नजरिए से देखें तो पीएम मोदी जो कुछ भी कह रहे थे वह मजबूरी में कह रहे थे,यह उनकी स्वाभाविक वैचारिक भाषा और विचारधारा नहीं है। प्रधानमंत्री के रुप में संसद में मोदी या मुख्यमंत्री के रुप में गुजरात विधानसभा के अंदर मोदी हमेशा संविधान की सरहदों में कैद होकर ही बोलते रहे हैं। यह मोदी की महानता नहीं बल्कि राजनीतिक कौशल है। संसद में बोलते हुए कोई भी पीएम घोषित नीतियों,संविधान की मान्यताओं और धारणाओं के खिलाफ नहीं बोल सकता,यदि वह ऐसा करता है तो उसको गंभीर संवैधानिक संकट और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

सवाल यह है कि यही मोदी संसद के बाहर आम जनता में किस भाषा,विचारधारा और नजरिए से बोलता है। सवाल यह भी है कि यही मोदी एक पीएम के नाते कितना लोकतांत्रिक व्यवहार अपने मंत्रीमंडल सहयोगियों के साथ करता है। समूची सत्ता को पीएम कार्यालय में केन्द्रित कर लेने वाले को लोकतांत्रिक और उदार कहना सही नहीं है बल्कि यह तो सर्वसत्तावादी नायक के लक्षण हैं। एक ऐसे नायक के लक्षण हैं जिसने लोकतंत्र के पग-पग पर धुर्रे उडाए हैं,लेखकों का अपमान किया है,लेखकों के प्रतिवाद का अपमान किया है,वह किसी भी दृष्टि से अपने राजनीतिक आचरण में लोकतांत्रिक और उदार नहीं है। इसके बावजूद उदयजी आपका उसको लोकतांत्रिक और उदार कहना गले नहीं उतरता।

सवाल यह है हम किसी नेता के संसद में दिए गए भाषण के बल पर उसके बारे में राय बनाएं या उसकी समग्र भूमिका के आधार पर राय बनाएं ? उदयजी आपने जल्दी कर दी। पीएम मोदी राजनीतिक कौशल से लैस बड़ा दुष्ट खिलाड़ी है,वह अटलजी जैसा या उनसे बेहतर नहीं है,न तो नजरिए में ,न राजनीतिक आचरण में ,इसके बावजूद आपकी प्रशंसा का कोई सामयिक तर्क मैं अभी तक खोज नहीं पा रहा हूँ।आपकी फेसबुक टिप्पणी ने यह सवाल केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है कि क्या किसी नेता के भाषण को एकल स्वायत्त रुप में देखें या फिर उसके समग्र राजनीतिककर्म के फ्लो की संगति में देखें। लोकतांत्रिक नजरिया हमें समग्र फ्लो में रखकर देखने के लिए कहता है।

उदयजी आप अच्छी तरह जानते हैं कि पीएम मोदी विनम्र नहीं हैं। उनकी भाषा,आचरण और मूल्यबोध में विनम्रता दूर –दूर तक नहीं है।इसे सहज ही उनकी इमेजों के जरिए पढ़ा जा सकता है,जिनलोगों ने उसे करीब से देखा है वे भी बार-बार इसके विपरीत ही कहते रहे हैं।आपने पत्रकार अरुण शॉरी के मोदी के शासन पर दिए गए बयान पढ़े होंगे और भी बहुत सारी चीजें आप बेहतर ढ़ंग से जानते हैं इसके बावजूद आपने विनम्रता को मोदी में खोज लिया ।सच में कहना होगा आपके पास पारखी नजर है जो लालकृष्ण आडवाणी को नजर नहीं आई लेकिन आपको दिख गयी !



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