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शनिवार, 27 अगस्त 2016

कश्मीरी पंडितों से क्यों नहीं मिले राजनाथ सिंह

        हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा खत्म करके लौटे हैं।इस यात्रा की शुरूआत के साथ ही उन्होंने यह घोषणा की थी उनसे जो भी मिलना चाहे मिल सकता है,वे निजी तौर पर भी कश्मीर के विभिन्न समुदायों,संगठनों,राजनीतिक दलों आदि से मिलने का मन बनाकर श्रीनगर पहुँचे थे।वे किस तरह के लोगों से मिले और उनकी क्या बातें हुईं इसका कोई विवरण अभी तक अखबारों में नहीं आया है।लेकिन जो खबरें अखबारों में आई हैं उनसे साफ पता चलता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ तनाव बना हुआ है।महबूबा स्वयं राजनाथ सिंह से मिलने गेस्ट हाउस नहीं गयीं अंत में मजबूरन राजनाथ सिंह उनके घर जाकर उनसे मिले,प्रेस कॉंफ्रेंस के दौरान में भी दोनों नेताओं की भाव-भंगिमा तनावपूर्ण थी,महबूबा मुफ्ती तो एस कदर परेशान थीं कि प्रेस काँफ्रेस बीच में ही अचानक खत्म करके उठ खड़ी हुईं,जबकि राजनाथ सिंह बैठे हुए थे।इससे इन दोनों नेताओं के बीच का तनाव सामने आ गया।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अब तक दो कश्मीर यात्राएं हुई हैं और दोनों असफल रही हैं।यहां तक कि व्यापारिक संगठनों ने दोनों बार उनसे मुलाकात करने से साफ मना कर दिया। वहीं दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों के सरकारी कर्मचारियों के संगठन के प्रतिनिधि राजनाथ सिंह से मिलने के लिए समय मांगते रहे,मिलने के लिए चक्कर काटते रहे ,लेकिन कश्मीरी पंडितों के संगठन को मिलने का समय नहीं दिया गया।जबकि मौजूदा अशांति की अवस्था में कश्मीरी पंडित बहुत परेशान हैं।इन परेशान पंडितों के बारे में किसी भी भाजपानेता या अनुपम खेर टाइप फिल्म अभिनेता तक ने अभी तक बयान नहीं दिया।



उल्लेखनीय है सन् 2010 के प्रधानमंत्री पुनर्रोजगार कार्यक्रम के तहत दो हजार कश्मीरी युवा कश्मीर घाटी में अपने घर वापस लौटे और काम-धंधा कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनको 1990 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था,लेकिन बुरहान वानी कांड के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के कारण इन लोगों को फिर से अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा ,और वे जम्मू में शरण लेकर रह रहे हैं।ये लोग राजनाथ सिंह से मिलना चाहते थे लेकिन राजनाथ सिंह ने इन लोगों से मिलने से मना कर दिया।इन लोगों के घर अनंतनाग और पुलवामा में हैं,वहां पर वे ट्रांजिट कैंपों में छह साल से रह रहे थे,हाल के घटनाक्रम के दौरान उपद्रवियों की भीड़ ने उनके कैंपों पर हमले किए जिसके कारण ये लोग जान बचाकर भागने को मजबूर हुए।ये लोग 2010 से इन इलाकों में शांति से रह रहे थे। उल्लेखनीय है कश्मीरी पंडितों के सवाल पर सभी टीवी चैनल फिलहाल चुप है,जबकि एक साल पहले कश्मीरी पंडितों के लिए ये ही चैनल घडियाली आँसू बहा रहे थे। स्थिति यह है कि स्थानीय कश्मीरी अखबारों को छोड़कर इन पीड़ितों की खबर कहीं पर नजर नहीं आएगी,यहां तक कि फेसबुक आदि पर सक्रिय मोदीभक्तों ने भी इन कश्मीरी पंडितों के बारे में कुछ भी नहीं लिखा। इससे कश्मीरी पंडितों के प्रति आरएसएस के पाखंड की पोल खुलती है।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

"नामवरजी मार्क्सवादी थे"- राजनाथ सिंह

       इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के द्वारा "नामवर सिंह की दूसरी परम्परा " के नाम से आयोजित कार्यक्रम ( 28जुलाई 2016)में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संस्कृति को सीधे धर्म से जोड़ा. सवाल यह है क्या नामवरजी भी यही मानते हैं? नामवरजी ने धर्म को संस्कृति से जोड़ने वाले संघी नजरिए का प्रतिपाद न करके,मौन रहकर,उसे सम्मति प्रदान करके हजारी प्रसाद द्विवेदीजी की संस्कृति संबंधी दृष्टि पर अपनी आँखों के सामने राजनाथ सिंह के हमले को नतमस्तक होकर स्वीकार किया।यह है नामवरजी का कायान्तरण!

नामवरजी के सामने राजनाथ सिंह ने कहा धर्म वैज्ञानिक होने का प्रयास नहीं कर रहा,बल्कि धर्म तो वैज्ञानिक है ही।यानी इस तरह उन्होंने गिरीश्वर मिश्र की धारणा का विरोध किया। मजेदार बात यह थी दोनों मंत्री महेश शर्मा-राजनाथ सिंह ने अलिखित भाषण दिया,लेकिन नामवरजी ने लिखित भाषण पढ़ा।राजनाथ सिंह ने सीधे कहा "नामवरजी जब मार्क्सवादी थे।" सवाल यह है क्या नामवरजी अब मार्क्सवादी नहीं रहे ? क्या मोदी सरकार के वरिष्ठमंत्री की इस शानदार घोषणा के लिए इस कार्यक्रम को रखा गया था ?

संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का बयान बहुत ही अर्थपूर्ण है वे बार बार कर्तव्य निर्बाह की ओर ध्यान दिलाते रहे,बड़ी निर्लज्जता के साथ उन्होंने कहा लोकतंत्र और आजादी के दो पाटों का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए।यह सीधे नामवरजी और संगोष्ठी में बोलने वालों के लिए हिदायत थी।

कमाल उस समय हो गया जब राजनाथ सिंह ने कलियुग के बहाने प्रतीकात्मक ढ़ंग से हिदायती स्वर में कहा नामवरजी "मर्यादा का कभी अतिक्रमण नहीं कर सकते।"

लेकिन इस समारोह का आदर्श लक्ष्य क्या है ? महेश शर्मा ने बताया-

"बूढ़े बैलों के संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी है।" अब मोदी की गोदी में बैठने का वैचारिक प्रतिफलन इससे बेहतर नहीं हो सकता था नामवरजी !!



नामवरजी का स्वाभाविक चरित्र लिखकर भाषण देने का नहीं है। इंदिरा गांधी कला केन्द्र में उनका कल जो भाषण लिखित रूप में उनके द्वारा पढ़ा गया हमारा अनुमान है वह मोदी सरकार के द्वारा पास किया भाषण है । मोदीजी की साफ़ धारणा है सरकार के मंचों से सरकार के बारे में एक भी वाक्य आलोचना का नहीं होना चाहिए।मोदीजी की इस नीति का नामवरजी ने पालन किया । जो लोग नामवरजी महान कर रहे हैं वे ज़रा सोचें कि नामवरजी ने कल राजनाथ सिंह और महेश शर्मा के वक्तव्य में व्यक्त विवादास्पद बातों पर एक भी वाक्य क्यों नहीं बोला ? नामवरजी की यह स्वाभाविक प्रकृति नहीं है कि राजनेता कुछ भी उनके सामने बोलकर चले जाएँ और नामवरजी उस पर कुछ न बोलें। मोदी की गोदी में बैठने का यह साइड इफ़ेक्ट है कि नामवरजी की स्वतंत्र अभिव्यक्ति नदारत!

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

राजनाथ सिंह की वाचिक हिंसा

      कल संसद में गुजरात में दलितों के प्रतिवाद के विरोध में गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भाषण सुनकर लगा कि हमारे देश में इस तरह का संवेदनहीन गृहमंत्री होगा यह तो कभी सोचा ही नहीं था,सत्ता में रहने का तकाजा है कि मोदी एंड कंपनी के लोग विनम्रता से सामाजिक जीवन में घट रही गलतियों को बिना हील-हुज्जत के मानें और विनम्रता के साथ कार्रवाई का आश्वासन दें ,लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे ,उलटे दलितों पर हो रहे हमलों की प्रच्छन्नतः हिमायत कर रहे हैं, राजनाथ कह रहे थे कि पहले भी अत्याचार हुए हैं आंकड़े देखो,गुजरात में कम हो रहे हैं।शर्म आनी चाहिए इस तरह के वाक्य मुंह से कैसे निकलते हैं !

वर्तमान के अपराधों को वैध ठहराने के लिए हर शैतान अतीत का सहारा लेता है,आरएसएस का यही पैंतरा है।चूँकि पहले यह हुआ था इसलिए आज यह हो रहा है।यह आपराधिक भाषा है राजनाथ सिंह ! दूसरी बात यह आँकड़े बिकिनी की तरह होते हैं,वे अपने आप नहीं बोलते,उनको जैसे बोलने को कहोगे वे वैसा ही बोलेंगे।

राजनाथ सिंह जी! यथार्थ देखो खुलेआम आरएसएस के लोग विभिन्न क्षेत्रों में दलितों और औरतों को निशाना बनाते रहे हैं।

राजनाथजी! सच ताक़तवर होता है , आँकड़े बेजान होते हैं, सच बेजान नहीं होता। आँकड़ों के ज़रिए न तो बहस जीत सकते हो और नहीं दलितविरोधी बटुकसंघ को बचा सकते हो!



शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

शब्दों के कातिल


     देश बहुत बुरे दौर में दाखिल हो चुका है,हमारे शासक और उनके भक्तगण असहिष्णु हो चुके हैं। उन्हें शब्द अच्छे नहीं लगते,वे खुलेआम कह रहे हैं “सेकुलरिज्म” का दुरुपयोग बंद करो।कल तक वे “सेकुलर” की आत्मा और शरीर पर हमले कर रहे थे,अब वे “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के इस्तेमाल को बंद करने की मांग कर रहे हैं।मजेदार बात यह है कि राजनाथ सिंह के बोलते ही उनके फेसबुकगण “पंथ-निरपेक्षता” का नाम लेकर भाषाज्ञान कराने उतर पड़े हैं। इससे एक बात का पता तो चलता है कि “सेकुलरिज्म” को लेकर इनके अंदर किस कदर घृणा भरी हुई है।
      समाज में शब्दों की हत्या जब होने लगती है तो समझो सत्ता और समाज असहिष्णु हो गया है।मनुष्य के नाते शब्द हमारे हैं और हम शब्दों के हैं।हमने कभी नहीं कहा कि फलां शब्द का इस्तेमाल न करो। सत्ता के शिखर से पहले किसी ने नहीं कहा कि देश में “सेकुलरिज्म” या “धर्मनिरपेक्ष” पदबंध का इस्तेमाल न करो । सत्ता के कर्ताओं की शब्दविशेष को लेकर घृणा पहलीबार नजर में आई है। यह पहलीबार हुआ है कि सत्ता ने शब्द को ललकारा है,एक ऐसे शब्द को ललकारा है जिसमें 125करोड़ लोगों की आत्मा निवास करती है।पहले यह कभी नहीं हुआ कि सत्ता के शिखर से कहा गया हो कि धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग बंद हो।
     सवाल यह है धर्मनिरपेक्ष शब्द ने क्या बिगाड़ा है संघी सत्ताधारियों का ? इस शब्द से क्यों कांप रहे हैं ये लोग ? इस शब्द के क्यों पीछे पड़े हैं? कल जब संविधान दिवस पर संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह बोल रहे थे तो वे “सेकुलर” शब्द के खिलाफ बोल रहे थे,वे कह रहे थे,इस शब्द का प्रयोग बंद होना चाहिए। राजनाथ सिंह भूल गए कि शब्द महज शब्द नहीं होता ,उसके साथ विचार भी होता है,मूल्य भी होता है,संवेदनाएं भी होती हैं,शब्द महज शब्दकोश का शब्द नहीं होता। सवाल यह है “सेकुलर” शब्द में निहित विचार,संवेदना, अनुभूति आदि पर राजनाथ सिंह क्या सोचते हैं ? क्या उसे भी त्याग दें ?
     ध्यान रहे संविधान दिवस के संदर्भ में सारी बहसें हो रही हैं। कुछ देर बाद वे बोले “सेकुलर” का हिन्दी में संवैधानिक अनुवाद है पंथ निरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता का दुरुपयोग बंद करो। राजनाथ सिंह ने जाने-अनजाने “सेकुलरिज्म” के प्रति अपनी समस्त बुरी भावनाएं व्यक्त करके यह साबित कर दिया। राजनाथ सिंह पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं,जिम्मेदार नागरिक हैं,अनेक बार संविधान की सौगंध खा चुके हैं,हम जानना चाहते हैं कि उनको “सेकुलरिज्म” से क्या परेशानी है ? यदि परेशानी है तो काहे को “सेकुलर”राज्य का शासन संभालने गए ? किसने कहा था  “सेकुलर” राष्ट्र की बागड़ोर संभालो,”सेकुलर” राजनीति करो।“सेकुलर संविधान” की सौगंध खाओ।
    “सेकुलरिज्म” से इतनी ही चिढ़,विरोध और घृणा मन में भरी है तो सीधे भाजपा के संविधान में लिखो कि भाजपा “सेकुलरिज्म” को नहीं मानती,उसकी “सेकुलरिज्म” में आस्था नहीं है, उसकी भारत के “सेकुलर स्टेट” में आस्था नहीं है,उसकी भारत के “सेकुलर सामाजिक ताने-बाने में आस्था” नहीं है। किसने रोका है भाजपा और आरएसएस को खुलेआम “सेकुलरिज्म” का नाम लेकर विरोध करने से। संघ को धर्मनिरपेक्षता पर छद्म रुपों में हमले बंद करने चाहिए।  हमारे देश में उनको भी स्वतंत्रता प्राप्त है जो इस देश से नफरत करते हैं,”सेकुलर स्टेट” से नफरत करते हैं। भाजपा तो “स्वतंत्रचेता” नेताओं का  दल है उसे सबसे पहले अपने राजनीतिक कार्यक्रम में से “सेकुलरिज्म” का प्रयोग बंद करना चाहिए। आम जनता से “सेकुलरिज्म” के खिलाफ अपने “मन की बातें” चुनाव घोषणापत्र के जरिए कह देनी चाहिए। वैसे बहुत ही बारीकी से “मन की बात” का नायक यह काम कर रहा है,लेकिन हम चाहते हैं कि “सेकुलरिज्म” को लेकर संघ-भाजपा और मोदी सरकार एकदम पारदर्शी रुप में आचरण करे। संघी मंत्री-सांसद ईमानदारी से खुलकर “सेकुलरिज्म” का विरोध करें। उन तमाम सरकारी किताबों और दस्तावेजों से “सेकुलरिज्म” शब्द निकालने का आदेश दें जो पहले छप चुके हैं।
   राजनाथ सिंह जब कल “धर्मनिरपेक्षता” शब्द का विरोध करते हुए “पंथ-निरपेक्षता” का विकल्प सुझा रहे थे तो मन में यह सवाल भी उठा कि “पंथ निरपेक्षता” पदबंध समाज में प्रचलन में क्यों नहीं आ पाया क्यों धर्मनिरपेक्षता पदबंध आम जनता के जीवन का कण्ठहार बन गया ? कभी इस पहलू पर गंभीरता से राजनाथ सिंह संसद के आधिकारिक दस्तावेजों का सर्वे सराएं कि संसद में “धर्मनिरपेक्षता” और “पंथ-निरपेक्षता” का हमारे सांसदों ने कितनीबार प्रयोग किया है ? इससे यह बात साफ हो जाएगी कि आम जनता के नेता अनुवाद की भाषा में बात करते हैं या मौलिक मन की भाषा में बात करते हैं !

सच्चाई यह है हिन्दी में ही नहीं भारत की किसी भी भाषा में “सेकुलरिज्म” का सटीक पर्यायवाची शब्द उपलब्ध नहीं है। स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इस समस्या पर  संभवतः1961 में कहा भी था कि यह आश्चर्य की बात है कि हिन्दी में “सेकुलर” शब्द का सटीक पर्यायवाची शब्द नहीं है। राजनाथ सिंह जिस बात को लेकर अड़े हैं वह रुख सही नहीं है।  उपन्यासकार बंकिम चन्द्र चटर्जी ने बहुत पहले एक जगह लिखा था कि अनुवाद का मतलब यह नहीं होता कि अंग्रेजी के एक शब्द का हिन्दी या बंगला में पर्यायवाची ढूँढ लें।शब्द का पर्यायवाची तो ढूँढ लेंगे लेकिन उस “आइडिया” का क्या करोगे जो शब्द में निहित होता है।  सवाल यह है कि राजनाथ सिंह और उनकी समस्तसंघी मंडली से हम जानना चाहते हैं कि वे “सेकुलर” के पीछे निहित विचार के बारे में क्या सोचते हैं ? क्या भारत “सेकुलर राष्ट्र है” ? क्या भारत “सेकुलर समाज है” ? क्या भारत में रहने के लिए “सेकुलर आइडिया” के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए ? 

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...