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मंगलवार, 17 जून 2014

औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए


      औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का जो तूफान समाज में चल रहा है उसमें इजाफा ही होगा।

आयरनी यह है कि औरतों के ऊपर हो रहे हिंसाचार के खिलाफ औरतें अभी तक सड़कों पर निकलने को तैयार नहीं हैं। कहीं पर भी हजारों-लाखों औरतों के जुलूस नजर नहीं आ रहे। स्थिति इतनी भयावह है कि पीड़िता को देखकर भी हम अनदेखा कर रहे हैं। पुरुषों के लिए बलात्कार एक खबर होकर रह गयी, वहीं औरतों के लिए जुल्म। हमें इन दोनों के दायरे से निकलकर औरत को संघर्ष की प्रक्रिया में लाना होगा। औरत संघर्ष करेगी तो हिंसाचार थमेगा। हमें औरत को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना होगा। हमें औरतों को सामाजिक हलचलों से दूर रखने की मनोदशा बदलनी होगी। औरतों को भी अ-राजनीतिक होकर जीने की आदत और अभ्यासों को त्यागना होगा। औरत को अ-राजनीतिक बनाने में पुंस समाज को लाभ रहा है।

औरत अ-राजनीतिक न बने हमें उसके उपाय खोजने होंगे। औरतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरुकता पैदा करने के उपायों पर विचार करना होगा और यह काम औरतों के बिना संभव नहीं है। पहली कड़ी के तौर पर औरतों को अखबार पढ़ने, टीवी न्यूज देखने और राजनीतिक खबरों में दिलचस्पी लेने की आदत डालनी होगी।

औरत को सीरियल संस्कृति और मनोरंजन संस्कृति के बंद परकोटे से बाहर निकलना होगा। मनोरंजन की कैद में बंद औरत अपनी रक्षा नहीं कर सकती। यह वह औरत है जो सामाजिक -राजनीतिक भूमिका से संयास ले चुकी है।

यह सच है कि औरतें रुटिन कामों को सालों-साल करती रहती हैं और घरों में बैठे हुए बोर होती रहती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि सीरियल या मनोरंजन प्रोडक्टों का रुटिन आस्वादन और भी ज्यादा बोर करता है। उनका अहर्निश आस्वादन हमें बोर और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय बनाता है।

औरत सामाजिक तौर पर निष्क्रिय न बने इसके लिए औरतों को यह जानना होगा कि वे जिसे आनंद या मनोरंजन समझ रही हैं वह तो उनकी बोरियत बढ़ाने वाला संसाधन है। औरत को मनोरंजन की नकली भूख को खत्म करने के लिए मनोरंजन के असली और कारगर रुपों को अपनाना होगा।

औरतें अ-राजनीति के दायरे के बाहर आएं इसके लिए जरुरी है कि वे अपनी पहल पर लोकतांत्रिक महिला संगठनों की शाखाएं अपने मुहल्ले में खोलें और नए सिरे से सामाजिक सवालों पर मिलने-जुलने और काम करने का सिस्टम तैयार करें। आज स्थिति यह है कि भारत के अघिकांश मुहल्लों में महिला संगठन नहीं हैं। महिला संगठनों के बिना महिलाओं को नहीं बचा सकते।



महिलाओं को हर इलाके में थाने नहीं महिला संगठनों की जरुरत है। महिलाओं के इस तरह के संगठनों की जरुरत है जो निरंतर महिलाओं के सवालों पर सोचें और महिलाओं को सक्रिय-शिक्षित करें। महिलाएं सक्रिय-शिक्षित और संगठित बनेंगी तब ही हिंसाचार रुकेगा।

शनिवार, 12 मार्च 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर विशेष-भूमंडलीकरण के खिलाफ सार्वभौमिक प्रतिरोध (1) माकपा सांसद वृंदा कारात


                                                                                                                      अंतर्राष्ट्रीय मीडिया दुनिया को अभिजात्य पश्चिमी नजरिए से देखता है और 'नारीवादी की मौत' कहकर किलकारता है। उनके अनुसार महिला आंदोलन ने अपनी गतिशीलता खो दी है। उनका एक अमरीकी नारीवादी को इतनी तवज्जह देना, जिसने 'अंतत:' शादी कर ली, उनकी आलोचना के भोंडेपन को दरशाता है। यह बाद में सबूत के तौर पर सामने आया है कि 'कैसे चीजें बदल रही हैं', क्योंकि उनके द्वारा की गई इस व्याख्या के अनुसार 'महिला आंदोलन' के मूलभूत सिध्दांतों में से एक था पुरुषों से घृणा, अत: शादी से नफरत।
इस समझ के विपरीत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला आंदोलन अपने नए जीवन के दौर में है। यदि इसे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा पहचाना नहीं जाता है या अनदेखा किया जाता है तो वह इसलिए कि यह उस समझ के आधार पर हो रहा है जो सनसनीखेज मीडिया खांचे में फिट नहीं बैठता, यह महिलाओं के लिए आरक्षित है। यह व्यक्तियों या व्यक्तित्व पर आधारित नहीं है। पूरे विश्व भर में विभिन्न देशों में महिलाओं की बड़ी गोलबंदी महिलाओं के जीवन पर संरचनात्मक समायोजन नीतियों के प्रतिकूल असर पर गतिमान रहे हैं : कुछ साल पहले बीजिंग में महिलाओं के विश्व सम्मेलन में मीडिया ने हिलेरी क्लिटन के खड़े होकर किए गए स्वागत को तवज्जह दी। जिस हाल में उनका गुणगान हो रहा था उसके बाहर हो रहे बड़े और उग्र विरोध प्रदर्शनों को मीडिया ने अनदेखा किया। लेकिन वैश्विक आंदोलन उन नीतियों का विरोध कर रहे हैं और उन पर सवाल खड़े कर रहे हैं जो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की नई अंतर्राष्ट्रीय तिकड़ी ने दुनिया पर थोपे हैं। इस विषय पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। सिएटल और नीस में हुए प्रदर्शन इसके कुछ उदाहरण हैं। जाहिर है कि सबसे ताकतवर देश के प्रतिनिधि के सम्मुख सिर झुकाने का चलन अभी भी दुनिया में बहुत हद तक जारी है। पर सैध्दांतिक और राजनीतिक अवरोधों की सीमाओं को लांघकर महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़ता हुआ प्रतिरोध एक अहम परिवर्तन है।
2000 में महिलाओं के लिए विश्व मार्च इस बढ़ते प्रतिरोध का सबसे प्रेरणाप्रद उदाहरण था। मानव विकास और मानव अधिकारों में विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को सबसे बड़ा बाधक ठहराते हुए संरचनात्मक समायोजन की नीतियों के खिलाफ 159 से ज्यादा देशों के 6,000 महिला संगठनों ने एक साथ मिल कर मार्च किया था। यह प्रचार पूंजीवाद को सीधे अस्वीकार करने पर आधारित था। नवउदार आर्थिक नीतियों द्वारा पैदा की गई और बढ़ाई गई गरीबी और हिंसा के खिलाफ प्रचार और प्रदर्शनों में विश्व भर की लाखों महिलाओं ने 8 मार्च 2000 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से 17 अक्टूबर गरीबी विरोधी दिवस तक हिस्सा लिया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के खिलाफ न्यूयॉर्क में महिलाओं का मार्च आंदोलन का चरम बिंदु था। महिलाओं की इस वैश्विक पहलकदमी को हमारे देश में शायद इतनी प्रशंसा नहीं मिली, यहां तक कि हमारे दोस्तों से भी नहीं।अलग-अलग प्रवृत्तियों की ताकत और कमजोरियों में इस कोशिश ने बहुत महत्वपूर्ण बदलाव की रेखा खींची। इस वक्त यहां सारी व्याख्या करना संभव नहीं है।
     जो बात काबिलेगौर है वह है जिसे 'पुरातन नारीवाद' कहा जा सकता है उस चलन का कमजोर पड़ना यानी स्त्री-पुरुष समीकरण के सीमित दायरे में कार्रवाई और सामाजिक विश्लेषण। इस विचारधारा का 70 और 80 के दशक में बहुत बोलबाला था। 90 के दशक ने महिलाओं के अनुभव को बृहद नीतियों और सामाजिक-आर्थिक ढांचे के प्रसंग में महिला आंदोलन के काम और विचारधारा को और व्यापक और परिपक्व होते देखा। यद्यपि यह तो पक्का है कि इसे महिलाओं के दमन के प्रति मार्क्सवादी विचारधारा को स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता है, वह ढांचा है जो स्वयं को वाम विचारधारा वाले संगठनों (भारत में एडवा जैसे) और 'स्वतंत्र' या 'स्वायत्त' समूहों और संगठनों और गैरसरकारी संगठनों का एक मजबूत हिस्सा, जो गैरसरकारी संगठन की पूर्व यथास्थिति और 'राजनीति विरोधी' ढांचे से अलग हो चुके हैं, उसे व्यापक गठजोड़ की ओर ले जा सकता है। विश्व मार्च के आयोजकों के साहित्य के मुताबिक यह 60 के दशक में वियतनाम युध्द के खिलाफ हुए रेडिकल मार्च की याद दिलाता है। हालांकि इसका विस्तार उतना नहीं था। उन्होंने 'अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के नवीनीकरण और लोकतंत्रीकरण की मांग की। यह मांग ऐसे ऐतिहासिक समय में की गई जब वित्तीय बाजार बिना किसी कानून या नागरिकों के प्रति किसी प्रकार की जवाबदेही के बिना काम कर रहे हैं। वे दुनिया को एक विशालकाय बाजार में बदल रहे हैं जो केवल अमीरों के लिए खानपान का प्रबंध करती है और वस्तुत: मानवता के खिलाफ युध्द का संचालन कर रही है, जिसका परिणाम है घायल, बाहर कर दिए गए, शरणार्थी और मृत।'
विश्व मार्च में दिखाई दी यह अभूतपूर्व एकता एक स्पष्ट राजनीतिक समझ पर आधारित थी, जो जाहिर है कि एक रात में नहीं बनी थी। यह पूरी दुनिया भर में महिलाओं के वास्तविक अनुभवों पर आधारित थी।
पृष्ठभूमि
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय शासनों के ध्वस्त होने के बाद विश्व भर में समाजवाद को गहरा धक्का लगा था और औपनिवेशिक ताकतों के हमलों में बढ़ोतरी हुई थी। ऐसे समय में नई अर्थव्यवस्था के सैध्दांतिक योध्दाओं ने ऐलान कर दिया था कि 'पूंजीवाद' के साथ जीना सीखने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा है। इस विचार से पूंजीवाद ने 'इतिहास का अंत' स्थापित किया। इस नजरिए की झलक वाम खेमे के पूर्व बुध्दिजीवियों में भी दिखाई दी जिन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए थे। पीछे हटने का यह कदम ऐसा था जिसने अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलन के भीतर और साथ ही कई आंदोलनों को भी प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप उनका मनोबल गिरा और विखंडन हुआ। महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक फेडरेशन (डब्ल्यूआईडीएफ), यह एक ऐसी बाडी थी जिससे बहुत बड़ी संख्या में वाम धारा वाले महिला संगठन संबध्द थे, उसके नेतृत्व में वाम धारा वाले संगठनों ने कमोबेश औपनिवेशिक विरोधी संघर्षों में सोवियत संघ के नेतृत्व और विकास के सोवियत मॉडल को स्वीकार किया था। भारत में ऐसा संगठन एनएफआईडब्ल्यू था जो डब्ल्यूआईडीएफ से संबध्द था। डब्ल्यूआईडीएफ ने वैश्विक स्तर पर युध्द के खिलाफ और शांति के पक्ष में, साथ ही तीसरी दुनिया के देशों के साथ भाईचारा बनाए रखने आदि के लिए महिलाओं की गोलबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
      90 के दौरान डब्ल्यूआईडीएफ को वास्तव में लकवा मार गया था और उसने अपनी पुरानी स्थिति को खो दिया था, हालांकि बाद में उसने फिर से संगठन बनाने शुरू कर दिए थे।अन्य महिला आंदोलनों के भीतर भी 'मौजूदा सचाइयों के साथ समझौता' करने की प्रवृत्ति थी। यह दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दान से चलने वाली गैरसरकारी संगठनों के कामकाज में प्रतिबिंबित हो रहा था। इन संगठनों ने लघु परियोजना के कार्य के लिए जन प्रदर्शनों और आंदोलनों को ठुकरा दिया था। 'स्थानीय काम' पर अधिक जोर देने और उस काम को व्यापक संदर्भ में संबोधित न करने ने खांटी राजनीति को जहां एक तरफ हाशिए पर रखा और वहीं निहित स्वार्थों के लिए कपट करने का मौका मिला चाहे वे विशेष गैरसरकारी संगठन कितने अच्छे खयालों वाले या समर्पित क्यों न हों।
इसके बावजूद एक और चलन उभरकर सामने आ रहा था। नई आर्थिक व्यवस्था में उनके जीवन-यापन और जिंदगी पर हो रहे क्रूर अत्याचार के संदर्भ में विश्व भर में महिलाएं आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर संगठित हो रही थीं। जो लोग सुन रहे थे, दुनिया भर में महिलाएं एक जैसी बातें कह रही थीं। वे बता रही थीं कि जीवन और कितना ज्यादा मुश्किल हो गया है। उनको कितना ज्यादा काम करना पड़ता है। वे बता रही थीं कि दो जून की रोटी का जुगाड़ करना कितना मुश्किल है। और ये आवाजें न केवल पूर्व समाजवादी देशों, न केवल तीसरी दुनिया के देशों से आ रही थीं बल्कि पहली दुनिया से भी ऐसी ही पुकार सुनाई दे रही थी।
1995 में बीजिंग में ही संकेत स्पष्ट थे जब विश्व भर से महिलाओं के समूहों ने समानांतर एनजीओ सम्मेलन में विश्वीकरण और नवउदार नीतियों का महिलाओं के जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव पर बहस की थी। संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम को जानबूझकर हटाने और 'नई आर्थिक नीतियों' को अधिक गरीबी लाने वाली नीतियों के रूप में संबोधित करने के लिए इस सम्मेलन के आधिकारिक दस्तावेज की भरसक निंदा की गई थी। यह पहली बार था जब वैश्विक महिला आंदोलनों द्वारा उपनिवेवाद से प्रेरित विश्वीकरण की नीतियों की इतने तीखे स्वर में आलोचना की गई। उसने हकीकत को देखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को बाध्य किया। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी एजेंसियों द्वारा आयोजित आधिकारिक सम्मेलनों को विश्वीकरण के दौर में महिलाओं के और अधिक हाशिए पर चले जाने पर बार-बार ध्यान आकर्षित करना पड़ा। स्वीकार के बावजूद, जाहिर से कारणों के लिए, जिसमें स्वयं संयुक्त राष्ट्र को किनारे पर रखना शामिल है, कोशिश यही है कि इस नई तिकड़ी की आलोचना को नरम रखा जाए। अत: आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों द्वारा नीतियों को कोई चुनौती नहीं दी गई और जनविरोध को 'सामाजिक सुरक्षा नेट' और 'गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम' का हवाला देकर निस्तेज कर दिया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और हमारे देश में भी कुछ ऐसे महिला संगठन हैं जो इस विकृत तर्क को मानते हैं और व्यवहार में विश्व बैंक की विचारधारा के संवाहक के रूप में कार्य करते हैं।
लोगों की जिंदगियों पर हमला
पूर्व समाजवादी देशों में
लेकिन सत्य को स्वयं साबित करने का एक तरीका है। साम्राज्यवादी प्रचार तंत्र द्वारा प्रचारित मिथ को स्वयं पूर्व समाजवादी देशों के भीतर से महिलाओं के अनुभवों द्वारा चुनौती दी गई। एक 'माडल' बनना तो दूर, जैसा कि साम्राज्यवाद ने वादा किया था, ये देश निर्मम शोषण और दमन के शिकारगाह बन गए। जब तक उनके देश समाजवादी बने रहे महिलाओं और बच्चों को इन देशों में विकसित देशों से पहले एक बेहतर जीवन स्तर और सामाजिक और कानूनी स्थिति को लेकर आश्वस्त कर दिया गया था। लेकिन सबसे पहले और सबसे तकलीफदेह चोट इन्हीं को पहुंची। तथ्य सभी मालूम हैं।
     यूनिसेफ की एक सर्वे रिपोर्ट ने आकलन किया कि इन देशों में पिछले दशक में 2.5 करोड़ नौकरियां गई हैं उनमें से 1.4 करोड़ नौकरियां यानी आधे से अधिक महिलाओं के पास थीं। 70 फीसदी महिलाओं, जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी, को या तो अपने ओहदे से छोटे ओहदे की और कम तनख्वाह की नौकरी करनी पड़ी थी। न्यायपालिका में महिलाएं एक-तिहाई महत्वपूर्ण ओहदों पर थीं जो अब घटकर 10 फीसदी से कम पर आ गईं। राजनीतिक भागीदारी के प्रतिशत में अधिक गिरावट आई है। सर्वे में जिन 27 देशों को शामिल किया गया उनमें महिलाओं की जीवन प्रत्याशा घटकर आधी रह गई है। एड्स के मामलों में नौ गुना बढ़ोतरी हुई है, जो कि मूल रूप से महिलाओं की खरीद-फरोख्त की बढ़त को प्रतिबिंबित करता है। बाल सुरक्षा सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास और खाद्य सुरक्षा पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है जिसके परिणामस्वरूप गरीबी के स्तर में जोरदार बढ़ोतरी हुई है : यह ऐसे देशों में हुआ जहां न्यूनतम मानव आवश्यकताओं के लिए तंत्र मौजूद था जो कि अधिकतर विकसित देशों को मात देता था।
'विकसित' पश्चिम में
अपने स्वयं के देशों में भी बड़े व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने जबरन ऐसे कार्यक्रम लागू किए हैं जो कि कल्याण लाभों को ठीक हृदय पर काटते हैं। इन लाभों को विकसित पूंजीवादी देशों की कामगार जनता ने बीसवीं सदी में समाजवादी क्रांति के दबाव में विशेष रूप से हासिल किया। समाजवादी व्यवस्था में रहने वाले लोगों को राज्य की जिम्मेदारी के नाते स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, आश्रय और काम का आश्वासन आदि में प्राप्त ढेर सारे लाभ के उदाहरण की ताकत को पहचानते हुए पूंजीवादी देशों के शासकों को अपने देशों में कामगार लोगों के लिए कुछ कल्याणकारी व्यवस्था करने को बाध्य होना पड़ा।
इसलिए समाजवाद को लगे झटके का असर इन सरकारों की नीतियों पर भी पड़ा। अत: वे नवउदारवादी उपायों के एक हिस्से के रूप में जो भी कल्याणकारी उपाय मौजूद थे, भले बहुत ही अपर्याप्त कल्याणकारी उपाय थे, उनमें कटौती करने लगे। उदाहरण के लिए, इन देशों में, जैसे ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस में असमानताएं बहुत बढ़ गईं क्योंकि गरीबी और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए जो सब्सिडी राज्य द्वारा दी जाती थी वह समाप्त कर दी गई। ऐसा आकलन किया गया है कि अमरीका में पिछले दशक में जनसंख्या के 75 फीसदी हिस्से ने अपनी वास्तविक आय में गिरावट को देखा है। अमरीका में आज 365 लाख लोग गरीबी में रह रहे हैं और हर चार में से एक बच्चा अभावों का शिकार है। देश की एक फीसदी जनता उसकी 47 फीसदी दौलत की मालिक है। यह वह समय है जब कल्याणकारी उपायों को वास्तव में कम कर दिया गया है, खत्म कर दिया गया है। जो लोग किसी सहायता पर हैं उन्हें पांच साल की ग्रांट मिलती है और उसके बाद वे किसी प्रकार की सहायता के अधिकारी नहीं होते हैं चाहे उनके पास नौकरी न हो। अगर उन्हें काम दिया जाता है तो वह बहुत कम पगार वाला होता है। उदाहरण के लिए, किसी नौकरी में यदि एक नियमित कामगार को 15 या 20 डॉलर प्रति घंटा मिलता है तो एक सहायता प्राप्त व्यक्ति को पांच डॉलर मिलेगा। उसके पास दो ही रास्ते हैं : एक या तो सहायता को जाने दे या फिर कम वेतन वाली नौकरी स्वीकार कर ले, जो कि किसी भी सूरत में स्थायी नहीं है। अत: कामगारों के इन नियोक्ताओं के लिए कम वेतन लागतों के कारण अधिक मुनाफा कमाने में राज्य सहायक होगा। ऐसे समय में जब छंटनी और काम से निकाल देना सामान्य है, कामगार लोगों, खासकर महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह सच केवल शहरों का ही नहीं है बल्कि उससे भी अधिक यह खेत मजदूरों का है, जिसमें महिलाएं अधिक हैं।
     टमाटर चुनने वालों के एक सर्वे ने यह दरशाया कि आज जो भी पैसा ये कामगार महिलाएं पाती हैं वह उससे कम है जो वह आज से तीस साल पहले कमाती थीं। एक टोकरी टमाटर के लिए उन्हें 35 से 40 सेंट मिलते हैं जबकि तीन दशक पहले 45 सेंट मिलते थे। इसके साथ ही शिशु सदन (क्रेच) सेवाओं के न होने से भी महिला कामगारों के सामने मुश्किल पेश आती है। जो हैं भी तो वह बहुत महंगे हैं और अधिकतर कामगार महिलाओं के बजट से बाहर हैं। अमरीका ने समान वेतन विधेयक को पास करने से इनकार कर दिया है। अधिकांश नौकरियों में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले एक-तिहाई से एक-चौथाई कम पगार मिलती है।संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप तीसरी दुनिया के देशों में महिलाओं के लिए परिस्थितियां और ज्यादा खराब हैं।(क्रमशः)
(भारतीय नारी संघर्ष और मुक्ति,वृंदा कारात,अनुवाद-उषा चौहान,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली,से साभार)


शुक्रवार, 11 मार्च 2011

महिलाओं का बहुआयामी संघर्ष- (समापन किश्त)- माकपा सांसद वृंदा कारात


   यहां हम उस दूसरे मुद्दे पर आते हैं जो मैं उठाना चाहती हूं। वह है राजनीतिक ढांचों, मंचों, दलों और उनकी नीतियों और व्यवहार के संबंध में महिलाओं की स्थिति। मैं कहूंगी कि सत्व की दृष्टि से नारी आंदोलन बहुत ज्यादा ही राजनीतिक है क्योंकि यह यथास्थिति को चुनौती देता है। जब आप महिलाओं की स्थिति को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक अलग-अलग ढांचों में रखते हैं, जो कि महिलाओं की स्थिति को और उन पर पड़ने वाले प्रभाव को निश्चित करता है, तब आप वैयक्तिक रिश्तों और अनुभवों से परे दमन की जड़ों तक जाते हैं। आप ढांचों को देखते हैं और यह भी कि क्या उनको बदलाव की आवश्यकता है? क्या वे बदले भी जा सकते हैं या क्या वह बदलाव उसे पूर्ण रूप से नष्ट करके ही आना होगा? उदाहरण के लिए क्या जाति के ढांचों को कुछ टुकड़े जोड़कर बदल सकते हो? साफ तौर पर मेरी समझ से नहीं। वास्तविक सशक्तीकरण के लिए (न कि विश्व बैंक के दस्तावेजों के कृत्रिम सशक्तीकरण से) हमें निहित स्वार्थों को अशक्त करने की आवश्यकता है; और किसी भी हिस्से को नि:शक्त करने के लिए, पूरे तंत्र को बदलने के लिए अधिक मजबूत राजनीतिक इच्छा की जरूरत है।
महिलाओं की स्थिति पर असर डालने वाले ढांचों के बारे में आंदोलन के भीतर जैसे-जैसे बहस और समझ बढ़ी, वैसे-वैसे यह आभास भी बढ़ा कि व्यापक आंदोलन एक व्यापक अर्थ में मूलभूत रूप से राजनीतिक था। महिलाओं के आंदोलन के एक हिस्से के रूप में सीधे राजनीतिक मुद्दों पर बहस करना संभव हो गया। 'राजनीतिक' होने का अर्थ आवश्यक नहीं था कि किसी राजनीतिक दल के सदस्य हों लेकिन यह आवश्यक था कि जो मुद्दे राजनीतिक माने जाते हैं उन पर आप एक स्टैंड लें। यह स्वायत्तता के नाम राजनीति से महिला समूहों की गतिविधियों को अलग रखने की पहले की कोशिशों के बिलकुल विपरीत था। राजनीतिक दलों से स्वायत्तता का अर्थ राजनीति से स्वायत्तता बन गया था। आंदोलन के भविष्य के लिए यह सौभाग्य रहा कि इस विचारधारा को बहुत लंबे समय तक समर्थन नहीं मिला। महिलाओं के आंदोलन के एक हिस्से के बतौर जब इन सवालों को पहली बार उठाया गया तो मीडिया के कुछ हलकों और कुछ राजनीतिक दलों ने इसे नकारते हुए कहा कि आप क्या कर रहे हैं, राजनीति के विषय में बात करना आपका काम नहीं है। आपका काम है दहेज या बलात्कार, या अन्य (तथाकथित) सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष करना। आपको उन महिलाओं की मदद करनी है जो जलाई जा रही हैं। जब हमने अन्य मसलों को उठाया तो मीडिया ने प्राय: उसे अनदेखा कर दिया। यह एक जाल है, हम जब भी आंदोलन के एक हिस्से के रूप में अधिक व्यापक सामाजिक मसलों को उठाते हैं तो हमसे कह दिया जाता है कि यह राजनीतिक हैयह आशा नहीं की जाती है कि हम यथास्थिति को चुनौती दें।
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह हुआ कि 1989 में लोकसभा चुनावों की पूर्वसंध्या पर सात राष्ट्रीय महिला संगठनों ने एक अपील जारी की। इसमें उन्होंने महिला मतदाताओं से धर्मनिरपेक्ष दलों को ही वोट डालने की बात कही। तब से हर चुनाव की पूर्वसंध्या पर ऐसी ही अपील की जाती है। अत: सबसे सकारात्मक घटनाक्रम यह हुआ कि कई महिला संगठन और समूह, जिनके अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण थे, कई नाजुक राजनीतिक मसलों पर एक साथ आ सके हैं। आंदोलन का धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए और सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरपंथ के विरुध्द एक लंबा और स्पष्ट संघर्ष इन सब मुद्दों में सबसे महत्वपूर्ण है।
एक समय था जब सांप्रदायिकों की आक्रामकता अपनी पूरी पराकाष्ठा पर थी और आंदोलन के भीतर एक छोटा सा हिस्सा यह कहकर समझौता करने का इच्छुक
था कि वे लोग जो इस सांप्रदायिक तनाव के लिए जिम्मेदार हैं वे राजनीति से बहुत ज्यादा जुड़े हुए हैं। इस पर बहस हुई। इसका श्रेय महिला संगठनों को जाता है कि इसमें यह फैसला लिया गया कि इसके लिए जो राजनीतिक दल और ताकतें जिम्मेदार हैं उनका नाम लिया जाएराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, शिवसेना और उनके सभी प्रमुख संगठन। पूरे देश भर से आईं हजारों औरतों ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के पक्ष में भाजपा शासित लखनऊ में ऐतिहासिक मार्च किया जिसमें मसजिद की रक्षा करने की मांग की गई। वह महिला संगठनों द्वारा बड़े राजनीतिक परिवर्तनों को महिलाओं के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़ने की दिशा में उनके परिपक्व होने का प्रतीक था। यह समझना और जानना आवश्यक था कि ऐसे घटनाक्रमों का अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं पर क्या विशेष प्रभाव पड़ा।
फिर भी इन मसलों पर मौजूदा संदर्भ में नजर डाली जाए तो एक चलन है जिसे 'जनता के आंदोलनों' के नाम से पेश किया जाता है। यह सभी राजनीतिक दलों को भ्रष्ट, या पितृसत्तात्मक, या धर्मतंत्रात्मक मानता है। इसके लिए राजनीतिक प्रतिबध्दता का अर्थ है सभी राजनीतिक दलों को गालियां देना और उनको 'अछूत' मानना। मैं इस तरह की विचारधारा से सहमत नहीं हूं। यह व्यवहार राजनीतिक पागलपन की निशानी है। जाहिर है, चूंकि मैं एक राजनीतिक दल की सदस्य हूं, आप इसे प्रेरित दृष्टिकोण कह सकते हैं। लेकिन मैं यहां किसी एक राजनीतिक दल की बात नहीं कर रही हूं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि सांप्रदायिकता और अयोध्या के अपराध और अत्याचार के मुद्दे पर अगर महिला संगठनों ने कहा होता कि हम सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं और बराबर के जिम्मेदार हैं? तो इससे किसे लाभ होता? बेशक भाजपा और उसके द्वारा प्रवर्तित की हुई फासीवादी ताकतें। एक और उदाहरण, महिलाओं की जानी-मानी एक पत्रिका की संपादक ने सभी संसद सदस्यों को ठग और गुनाहगार कहकर वर्णित किया। उनको शायद कुछ उतने ही निंदक मध्यवर्गीय श्रोताओं से तारीफ मिली होगी। पर क्या सभी संसद सदस्य एक जैसे होते हैं? क्या सभी राजनीतिक दल एक जैसे होते हैं? क्या हम तानाशाही की हिमायत कर रहे हैं? ऐसे नारे जो लोकप्रिय प्रतीत होते हैं वास्तव में आंदोलन के लिए बहुत हानिकारक हैं, क्योंकि ये असल मसले को धुंधला देते हैं और महिला आंदोलन को एक रणनीति के बतौर अपने दोस्त और दुश्मन पहचानने की जो जरूरत है उसे नकार देते हैं। किसी इस और उस राजनीतिक दल की आलोचना करना या उसे दोषी ठहराना एक बात होती है और सब कुछ मिलाकर एक पिंड सा बना देना और अपने व्यवहार से अधिक पवित्र आचार-व्यवहार अपनाना दूसरी बात होती है। जो कि केवल बहुत ज्यादा बाहुबली या फिर भ्रष्ट को मदद करता है।
इसके अलावा राजनीतिक तंत्र को साफ करने की जरूरत और अपराधियों और कुछ खास किस्म के राजनेताओं के बीच हलकी होती सीमा-रेखा को समाप्त करने की आवश्यकता पूरे राजनीतिक तंत्र को कोसने से शायद ही पूरी हो पाएगी। पिछला आम चुनाव, जिसमें भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा, एक बड़ा राजनीतिक युध्द था। करोड़ों महिलाओं ने अपना मत दिया। ऐसे समय में सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में हम क्या कह सकते हैं? क्या हम पीछे हटकर यह कह सकते हैं कि वे सभी खराब हैं, क्या फर्क पड़ता है कि तुम किसको वोट डालते हो? क्या हम अपने हस्तक्षेप को उम्मीदवार के कथित प्रमाणपत्र के मूल्यांकन तक ही सीमित कर सकते हैं? उस राजनीति और राजनीतिक मंच का क्या होगा जिसका ऐसे उम्मीदवार प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वे मसले हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। निर्वाचित संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को समर्थन देने बल्कि आरक्षण की मांग करते हुए हमें यह स्पष्ट करना होगा कि राजनीति में भागीदारी मात्र चुनावी राजनीति तक ही सीमित नहीं है। छाया राजनीति, या फिर जिसे पंच-पति सिंड्रोम कहती हूं (जहां चुने गए सदस्य का पति हर बैठक में उसका प्रतिनिधित्व करता है), के जरिए तोड़-फोड़ करने के बजाए आरक्षण नीति के लिए हमें अधिक से अधिक महिलाओं को सक्रिय राजनीति में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है।
एक दूसरा खतरा भी है। जैसे-जैसे हमारा आंदोलन अधिक राजनीतिक होता है और मूल ढांचों को चुनौती देता है तो सह-विकल्प के तरीके हरकत में आने लगते हैं। यह धन के जरिए हो सकता है, जो कि ज्यादा स्पष्ट है। यह पद द्वारा हो सकता है। लेकिन यह दृष्टिगत रेडिकल एजेंडा को कपटपूर्ण तरीके से दिए गए प्रोत्साहन से भी हो सकता है। जो कि वास्तव में आंदोलन को ताकतवर नहीं कमजोर बनाता है। मैं समझती हूं कि विखंडन के जरिए सह-विकल्प देश में आयात किया गया नया तरीका है। पश्चिमी फंडिंग एजेंसियों का जो एजेंडा है वह अब दलितों, आदिवासियों, देशज लोगों आदि के बारे में बात करता है। उत्पीड़ितों के इन हिस्सों के लिए अलग-अलग संगठनों के निर्माण के लिए पैसा उपलब्ध है। लेकिन छुपा एजेंडा है सामाजिक मनमुटाव का बीज बोना और उसे पालना-पोसना ताकि उत्पीड़ितों की एकता और ताकत नष्ट हो जाए। उन उत्पीड़ित तबकों को हमारे सक्रिय समर्थन की आवश्यकता है, जो अपने अधिकारों के लिए आगे आ रहे हैं और अपने उस नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने उन्हें नाम भर के लिए समर्थन दिया लेकिन उनकी दासता को अमर बना दिया है। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे जैसे कि महाराष्ट्र में जहां किस तरह से फासीवादी ताकतों ने दलित संगठनों को लक्ष्य बनाया और उन पर हिंसा का कहर बरपाया। महाराष्ट्र इस बात के लिए भी एक अच्छा उदाहरण है कि यथास्थिति को चुनौती देने के लिए कैसे सबसे अधिक उत्पीड़ितों के संगठनों ने प्रगतिशील राजनीतिक ताकतों के साथ हाथ से हाथ मिलाया। समस्या वहां खड़ी होती है जब फूट डालने वाली नीति के तहत दलित या आदिवासी संगठनों को उत्पीड़ितों के अन्य संघर्षों के आगे तुच्छ दिखाकर उन्हें दोस्त न होकर दुश्मन जताने का प्रयास किया जाता है। इन समुदायों के दमन और शोषण में विशिष्टता है, लेकिन मात्र यह तथाकथित पहचान की राजनीति अधिकारों के सर्वमुक्तिवाद को नष्ट या कम से कम क्षरण कर रही है। हम जानते हैं कि पूर्वी यूरोप में जातीय पहचानों के नाम पर क्या हुआ था। आज सबसे खतरनाक स्थिति असम में है जहां वे समुदाय जो पहले शांति और सद्भावना से रहते थे वे एक-दूसरे के विरुध्द हिंसा का रास्ता अपना रहे हैं या फिर कम से कम उनको यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि उनका विकास दूसरे के अविकसित होने में है। सचाई यह है कि सभी विकास से दूर और शोषित भी हैं। तो किसको लाभ हुआ?
आज हम तीसरी दुनिया के हर देश में सह-विकल्प और विखंडन की राजनीति देख रहे हैं। यह एक नई चुनौती है जिसका सामना करना होगा और जिस पर विजय प्राप्त करनी होगी। यह पक्का है कि यह किसी पौराणिक एकता के नाम पर खास शोषण और मांगों को अनदेखा करके नहीं होगा, जो कि वास्तव में उच्च धर्माधिकारी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन यह हमारे संघर्षों को खंडित करके भी नहीं होगा। जहां तक महिलाओं के आंदोलन का सवाल है तो हमें बहुत उत्साह के साथ अपनी एकता की सुरक्षा करनी होगी। उदाहरण के लिए, हम यह नहीं मानते हैं कि मुसलिम महिलाओं को अपनी समस्याओं से अकेले ही निबटना होगा। हम यह नहीं मानते कि दलित महिलाओं का उत्पीड़न एक ऐसी समस्या है जिसे उन्हें अकेले ही चुनौती देनी होगी। हम नहीं मानते कि ईसाई महिलाओं का संघर्ष मात्र उनका ही अपना संघर्ष है। महिलाओं के आंदोलन को इन सभी तबकों का प्रतिनिधित्व करना होगा और इन तबकों के संगठन व्यापक संघर्ष का एक अभिन्न हिस्सा हैं।
हालांकि भिन्न-भिन्न तौर-तरीकों में विवाद और मतभेद बने रहते हैं। भारत में नारी आंदोलन की ताकत आम चिंता के क्षेत्रों में एक साथ काम करने का विवेकशील प्रयत्न है। पिछले 15 सालों में, पूरे स्पैक्ट्रम में महिला समूह नए मुद्दों से जुड़ गए हैं और यह समझने लगे हैं कि ढांचागत समायोजन का सारा बोझ गरीब महिलाओं पर है। प्राथमिकता के रूप में महिलाओं के सबसे अधिक शोषित और उत्पीड़ित तबकों के हितों की रक्षा करने में और उन्हें मजबूत बनाने के आधार पर ही हम यथास्थिति को सफलता के साथ चुनौती दे सकते हैं और विकास को एक वैकल्पिक प्रक्षेप-पथ दिखा सकते हैं।




महिलाओं का बहुआयामी संघर्ष- (2)- माकपा सांसद वृंदा कारात


करीब दो दशक पहले इस प्रकार के विचार जो कि स्त्री-पुरुष संबंधों के ढांचे के बाहर हैं, किसी भी प्रकार से महिला की स्थिति को समझने में प्रासंगिक हैं, प्रचारित हो रहे थे। ये आपातकाल के तुरंत बाद के दिन थे। देश भर में लोकतांत्रिक अधिकारों और संसाधनों के पक्ष में एक लहर उठी थी। इस लहर के एक हिस्से के रूप में शहर आधारित महिलाओं के समूह की एक बहुत बड़ी भीड़ थी, जिनमें से अधिकतर महिलाओं के आंदोलन के अंतर्राष्ट्रीय चलन से प्रभावित थीं, जिसने महिलाओं के अधिकारों के पूरे संघर्ष को स्त्री-पुरुष के संदर्भ में लाकर रख दिया।
स्वयं महिलाओं के बीच असमानताएं थीं। उदाहरण के तौर पर, उनके बीच वर्ग और जाति के आधार पर श्रेणियां थीं। महिलाएं एक समान समाज नहीं था। ये विवादास्पद मुद्दे थे। यह चलन जो उस समय के आंदोलन में स्पष्ट रूप से प्रभावित
था, उसने परिवार में एक महिला की स्थिति पर अवरोधक लगा रखा था जो कि एक महिला की स्थिति को सबसे अधिक और सबसे गहरे रूप से प्रभावित करती है। महिलाओं के एक-दूसरे से बहनापा जैसे संबंधों का स्वागत था, यह स्वीकार्य था। जो कि वर्ग, जाति या समुदाय से संबंधित किसी भी पहचान को मिटा देता था। इनको 'राजनीतिक' उपनाम दिया गया जिनका महिलाओं से कोई सरोकार नहीं था। आप किसी विषय को अति सामान्य तरीके से पेश करने का आरोप लगा सकते हैं। यदि अकादमिक शब्दजाल को एक तरफ कर दिया जाए तो इन महिलाओं का पूरा ध्यान इस बात पर रहता था कि एक परिवार में क्या हो रहा है या स्त्री और पुरुष के बीच क्या हो रहा है। मुझे उस समय दिया गया एक नारा याद है, 'हर पुरुष में एक बलात्कारी बैठा है।' जिसके आधार पर दिल्ली विश्वविद्यालय में हुए यौन प्रताड़ना के एक बहुत ही अत्याचारपूर्ण हादसे के खिलाफ हुए प्रदर्शन में पुरुषों को हिस्सा नहीं लेने दिया गया। यह उदाहरण काफी अतिवादी प्रतीत हो सकता है लेकिन यह संघर्ष की रणनीति, उसकी खामियां और सोच की संकीर्णता को इंगित करता है।
'केवल महिलाओं के लिए' लिखा दिखने वाला साइनबोर्ड माना कि परिवार के भीतर महिलाओं का एक खास तरह से किए जा रहे दमन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उपयोगी था लेकिन यह उस सामाजिक-आर्थिक ढांचे से खुद को रूबरू करने में नाकामयाब रहा जो परिवार और उसके भीतर स्त्री की स्थिति को प्रभावित कर रहा था।
बेशक, अब तक नजर नहीं आने के कारण घरेलू हिंसा, यौन संबंधी अत्याचार और प्रताड़ना के मसलों पर ध्यान देना आवश्यक था। समस्या इस मुद्दे से नहीं थी। समस्या थी बाहर मौजूद ढांचे से अंदर परिवार में, महिलाओं और पुरुषों के बीच, जो हो रहा था उसके बीच तालमेल बैठाना। पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह स्पष्ट है कि यदि यह आंदोलन महिलाओं के दमन को समझने की मात्र इसी दिशा तक अपनी कोशिश को सीमित कर देता तो परिणाम विनाशकारी रहते। विनाश की दिशा में एकतरफा ट्रैक पर केवल महिलाओं के लिए बोगी।
उदाहरण के लिए कई समूहों का घरेलू हिंसा की ओर रवैया व्यक्तिगत मामले पर काम करने जैसा रहता था। अर्थात पुरुष बनाम स्त्री और साहसी महिलाओं की व्यक्तिगत कहानियों को विशिष्ट रूप से प्रस्तुत करना। यह आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन उनका क्या जो इतने दमखम वाले नहीं थे। उनका क्या जिनका कहना होता : मैं दुर्व्यवहार करने वाले अपने पति को कैसे छोड़ दूं, जब मेरे पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं है, मेरे जीवन निर्वाह का कोई साधन नहीं है। यह साफ था कि उनके लिए उनकी किसी प्रकार की संपत्तिविहीन स्थिति, रोजगार की गारंटी का सवाल और आर्थिक तंत्र का सवाल बहुत ही नाजुक था। लेकिन यह समझने के लिए हमको स्त्री-पुरुष संवाद से परे हटकर उस ढांचे को समझने की जरूरत थी जिसने औरत को शक्तिहीन बनाकर रख रखा था। जायदाद के स्वामित्व की पध्दति और सरकार की नीतियों को समझने की आवश्यकता थी। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मुद्दे से निबटने के लिए भी हमें किसी खास मामले में पुरुष के आक्रमण से परे उस आर्थिक और राजनीतिक ढांचे को देखने की आवश्यकता थी जो उस हिंसा को ताकत और आधार देता है।
वापमंथ के विचार से मूलभूत सवाल यह था कि वर्ग और जाति के आधार पर मौजूद शोषण और इतनी स्पष्ट असमानताओं के होते हुए एक समान व्यवहार कैसे अपनाया जाएगा? राज्य, न्यायपालिका या सांप्रदायिकों की भूमिका का क्या होगा? यद्यपि अलग-अलग प्रवृत्तियों में शक और नफरत थी, यदि महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करनी थी तो एक संयुक्त संघर्ष और व्यापक गोलबंदी की बहुत अधिक आवश्यकता थी।
 पहला बड़ा संयुक्त संघर्ष बलात्कार और दहेज विरोध के मुद्दों पर केंद्रित था। धीरे-धीरे उनका दायरा बड़ा होने लगा, जिसमें लैंगिक दृष्टि से सरकार की सारी नीतियां शामिल होने लगीं। महिलाओं के अध्ययन और अनुसंधान केंद्रों के विकास ने भी इसमें भूमिका अदा की। अलग-अलग वर्ग की महिलाओं के सामने आ रहे अलग-अलग मुद्दों का एक साथ जुड़ना, खासकर गरीब महिलाओं का, आंदोलन का एक हिस्सा बना।
अस्सी के दशक के शुरुआती दौर में दिल्ली में दहेज विरोधी संयुक्त आंदोलन एक उदाहरण था कि कितनी ज्यादा गहरी समझ विकसित हो गई थी। हालांकि आंदोलन में कुछ ऐसे थे जो यह चाहते थे कि दहेज के मसले को केवल पुरुषों के बढ़ते हुए लालच और लोलुपता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। अन्य मसले उठाए गए, उदाहरण के लिए, संपत्ति में समान अधिकारों की मांग, कानून में परिवर्तनों की मांग, पुलिस की लापरवाही के विरुध्द या अपराधों में भागीदार होने के खिलाफ मांग। पितृसत्तात्मक मूल्यों को मजबूत बनाने में राज्य की भूमिका का मुद्दा उठाया गया। सासों और ननदों के रूप में महिलाएं ही अकसर हिंसा की एजेंट बनती हैं इसलिए दहेज हिंसा के मुद्दे को सीधे स्त्री-पुरुष मुद्दा नहीं बनाया जा सकता था, अपितु यह महिलाओं की स्थिति में गिरावट और उनको एक बोझ के रूप में देखने का एक व्यापक सवाल था।
इसके अलावा गरीब तबके की महिलाओं, कृषि मजदूरों, किसान महिलाओं, शहरी झोपड़पट्टियों में रहने वाली कामकाजी महिलाओं, दलित महिलाओं, अल्पसंख्यक महिलाओं और आदिवासी महिलाओं के साथ काम करने वाले संगठनों और समूहों के अनुभवों के आधार पर भारतीय महिलाओं के आंदोलन की राजनीति को फिर से परिभाषित करने और फिर से दोहराने में मदद मिली और जो महिलाओं के मुद्दे माने जाते थे उनका फिर से मूल्यांकन करने को बल मिला। वह इन्हीं औरतों की आवाज थी जिसने यह साफ किया कि : अगर आप चाहते हैं कि हम आपके आंदोलन का हिस्सा बनें, आप चाहते हैं कि हम घरेलू हिंसा का सामना करें, तो आपको इस स्त्री-पुरुष ढांचे से परे जाना होगा। उस हिंसा का क्या जो मुझे भू-स्वामी से सहनी पड़ती है, क्योंकि मैं भूमिहीन हूं? मुझे ऊंची जात वालों से प्रताड़ना सहनी पड़ती है, क्योंकि शूद्र हूं? मेरा तीन बार से अधिक दमन हुआ हैमेरे लिंग, मेरे वर्ग, मेरी जाति को लेकर मुझे प्रताड़ित किया गया हैऔर मेरा शोषण करने वाले, मुझे प्रताड़ित करने वाले दोनों ही हैं, स्त्री भी और पुरुष भीक्या आप कभी इसे समझेंगे। सामाजिक और परिवार के भीतर हिंसा के खिलाफ संघर्षों के अनुभव ने उन मुद्दों को जो महिलाओं के अधिक अधिकारों से जुड़े थे उन्हें केंद्रीय एजेंडा में लाने की आवश्यकता को पक्का कर दिया।
आपातकाल के बाद आंदोलनों का यह दूसरा पड़ाव था जब प्रभावशाली तबकों, विचारधारा और रणनीति ने नारे को फिर गढ़ा, 'व्यक्तिगत ही राजनीतिक है' से लेकर '...राजनीतिक व्यक्तिगत को प्रभावित करते हैं।' बड़ी संख्या में संगठन आंदोलन को स्त्री-पुरुष दुश्मनी तक ही सीमित करने के बजाए उस मूल ढांचे पर ही प्रश्न करने लगे जो आर्थिक स्थिति जैसे भूमि पर स्वामित्व का हक और उत्पादक संपत्तियों पर नियंत्रण और स्वामित्व, उन सरकारी नीतियों को जो जमीन और उद्योग में निहित स्वार्थ को मजबूती प्रदान करती हैं इत्यादि का निर्णय करता है। महिला संगठनों ने भारतीय संदर्भ में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को समझने की अपनी तलाश में भारतीय राज्य को और वह जो भी हितों का प्रतिनिधित्व करता है उसको समझने की कोशिश की और साथ ही पूंजीवाद और पितृसत्ता को जोड़ने वाली डोर का विश्लेषण करना शुरू कर दिया।
ऐसे बहुत से दस्तावेज हैं जो आंदोलन के इस महत्वपूर्ण दौर के गवाह हैं जब सरकार की बड़ी-बड़ी नीतियों की आलोचना की गई। उन पर आलोचनात्मक लेख लिखे गए। उदाहरण के लिए, अस्सी के दौर के मध्य में 'नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर वूमन' की आलोचना करते हुए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज में भूमि सुधार और गरीब ग्रामीण महिलाओं के लिए किसी भी प्रकार के टिकाऊ विकास के लिए भूमि सुधार की आवश्यकता का महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया। इस दस्तावेज में यह इंगित किया गया था कि किस प्रकार भूमि की मिल्कियत का मौजदा आर्थिक ढांचा, जहां जनता का मात्र एक छोटा सा हिस्सा विशाल भूखंडों का मालिक है और बड़ा हिस्सा भूमिहीन है, महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करता है। एक महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इस दस्तावेज को पूरे देश भर के 40 से अधिक महिला संगठनों का समर्थन प्राप्त था। वृहत और सूक्ष्म और विपरीत के बीच में संबंध जांचने का यह सकारात्मक चलन मजबूत हुआ है। बाद में बीजिंग में होने वाले विश्व महिला सम्मेलन के लिए सात राष्ट्रीय महिला संगठनों की पहल पर और सौ से अधिक समूहों और संस्थानों के समर्थन से एक वैकल्पिक राष्ट्रीय दस्तावेज तैयार किया गया। बीजिंग में उन मुद्दों पर भारतीय प्रतिनिधि मंडल के योगदान को स्वीकारा गया और दुनिया भर से आए लोगों द्वारा सराहा गया।
व्यक्तिगत तौर पर, मैं ऐसा महसूस करती हूं कि कुछ भी हो नारी आंदोलन अभी तक ग्रामीण महिलाओं और खासकर महिला कृषि मजदूरों के एजेंडे को संतोषजनक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रित करने में असफल रहा है। वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट करती है कि भूस्वामित्व का आर्थिक ढांचा, ऊंची जाति के सामाजिक आधिपत्य का जातीय ढांचा और लिंग के आधार पर लगातार हो रहा दमन एक साथ आ मिलते हैं, यह निश्चित करने के लिए कि महिला मजदूरों के उस विशाल हिस्से का, जो कि दलित और भूमिहीन हैं, कैसे और शोषण किया जाए ताकि ऊंची जाति के भूस्वामियों के हित में और मुनाफा सुनिश्चित किया जा सके। महिलाएं हल जोतने के अलावा खेती से जुड़े सारे कार्य करती हैं। कृषि संबंधी काम करने वाली महिला मजदूरों की बढ़ोतरी की फीसदी दर, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा अनुसूचित जातियों से है, पुरुषों के मुकाबले अधिक तेज है। लेकिन देश के तकरीबन सभी हिस्सों में, सिवा पश्चिम बंगाल, केरल और बिहार और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़कर जहां ग्रामीण मजदूरों के आंदोलन अधिक मजबूत हैं, महिलाओं को नाम मात्र का ही पैसा दिया जाता है। इसके अलावा महिलाओं द्वारा किए गए काम को पूरे देश में हलके काम की संज्ञा दी जाती है और कानूनन भी महिलाओं को दी जाने वाली पारिश्रमिक दर पुरुषों के मुकाबले कम है। महिलाओं के काम को हलका काम कहने के इस स्वेच्छाचारी विवरण को महिलाओं के पारिश्रमिक को कम रखने की दृष्टि से भी सही आंका गया है, जो सदा ही जमींदारों के लिए खेती से बहुत ज्यादा धन लाभ का स्रोत रहा है। इन तबकों का इस बात में सदा निहित स्वार्थ रहा है कि महिलाओं के लिए यही सामाजिक तंत्र बना रहे जिसमें हमेशा ही यही बातें की जाती हैं कि महिलाएं 'कमजोर' हैं, 'पुनरुत्पादक हैं, उत्पादक नहीं', 'सहायक कार्यकर्ता' हैं, आदि। यह इसलिए क्योंकि ये पितृसत्तात्मक मूल्य उनके द्वारा महिलाओं को कम पगार देने को सामाजिक मजदूरी देते हैं। यह साफ है कि कोई भी संघर्ष जो महिलाओं के इन तबकों की स्थिति में सुधार के लिए होगा उसे सीधे-सीधे उस आर्थिक ढांचे को चुनौती देनी होगी जो महिलाओं की स्थिति का अवमूल्यन करता है। साथ ही उन मूल्यों को चुनौती देनी होगी जो जानबूझकर इसलिए मजबूत बना दिए गए हैं क्योंकि वे औरत को दूसरे दर्जे का नागरिक ठहराते हैं।
यह केवल कामकाजी महिलाओं के संघर्ष के संदर्भ में सत्य नहीं है, यह गृहिणियों के संदर्भ में भी सत्य है। बीजिंग सम्मेलन में यह गणना की गई थी कि महिलाएं सालाना जितना काम बिना वेतन के करती हैं उसका मूल्य तीन खरब डॉलर है। मैं यह तो नहीं जानती कि यह गणना कैसे की गई थी लेकिन हम ऐसा जरूर महसूस करते हैं कि भारत में भी कुछ इसी तरह का तरीका अपनाया जाना चाहिए ताकि परिवार के निर्वाह के लिए महिलाओं द्वारा किए जा रहे जोरदार योगदान पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। ऐसी सामाजिक स्वीकृति द्वारा संपत्ति पर महिलाओं के समान अधिकार की मांग को बल मिलना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में हम अपने साथ ऐसे मूल्य और विश्वास ले जा रहे हैं जो सामंतवादी काल के हैं। जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि यह संयोग नहीं है अपितु एक सोच-समझकर की गई कोशिश है जो निहित स्वार्थों द्वारा उन परंपराओं को जिंदा रखने के लिए की जा रही है जो उनके हित में हैं। इनमें से एक विश्वास यह है कि महिला का भविष्य पुरुष से जुड़ा होना चाहिए। मनु के कई सदियों बाद भी हम औरत की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के लिए लड़ रहे हैं। इस पर जोर देने के लिए यह आवश्यक है कि हम उन मूल्यों और ढांचों, दोनों से लड़ें जो औरत को किसी रूढ़िबध्द धारणा में बांध देते हैं।
संयुक्त संघर्ष का यह दौर महिलाओं के आंदोलन के सांप्रदायिकता से दृढ़ प्रतिरोध का केंद्र था। 1980 में हिंदू अधिकारों के उभार के साथ ही भारत को लगातार रक्तरंजित सांप्रदायिक दंगों ने हिला दिया। हिंदूवादी ताकतों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से महिलाओं को मंदिर और भजन मंडल जैसे उनके परंपरागत स्थानों पर अपना लक्ष्य बनाया। इन महिलाओं को एजेंट की तरह इस्तेमाल करके हिंदू अधिकार ने घरों को भेदने की कोशिश की, अन्यथा जहां पहुंचना उनके लिए असंभव था। उसी समय महिलाएं दंगों की सबसे मुख्य शिकार थीं, इसीलिए हिंसा की विरोधी थीं। इन दंगों की जांच करने में महिलाओं के समूह सबसे आगे थे और उन्होंने अपने लिए जिम्मेदारी तय की थी। सबसे अहम बात यह है कि ऐसे समय
में जब न तो सरकार, न अदालतें, न ही कानून-व्यवस्था के औजार, न ही बुर्जुआ दल कट्टरपंथ से टकराने के इच्छुक थे तब महिलाओं के समूह संगठित कार्रवाइयों के जरिए सांप्रदायिकता से लड़े। सभी सीमाओं को तोड़ कर इस अभूतपूर्व शक्ति की एकता तब सभी के सामने उजागर हुई जब हिंदूवादी गुटों को धर्मनिरपेक्ष महिलाओं के आंदोलन को टक्कर देने के लिए अपने खुद के महिला संगठन बनाने पड़े। शाहबानो के मामले ने महिलाओं के आंदोलन को सामुदायिक पहचान और महिलाओं के धर्मनिरपेक्ष अधिकारोंन केवल गुजारा भत्ते का अधिकार बल्कि शिक्षा और कार्यस्थल अधिकारों, जैसे सवाल उठाने पर बाध्य कर दिया। 1986 के बाद से वाम महिला आंदोलन ने, खासकर मुसलिम महिलाओं को शामिल करने का संचेतना भरा प्रयास किया और इससे सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए एक बहुमूल्य नेटवर्क संसाधन उपलब्ध हुआ।
एक क्षेत्र है जहां मैं समझती हूं इस संयुक्त आंदोलन को एक हस्तक्षेप की आवश्यकता है, हालांकि विभिन्न महिला संगठनों द्वारा इस दिशा में सम्मिलित स्वतंत्र कोशिशें की गई हैं, वह है जाति के आधार पर दमन और जातीय ढांचों और ऊंची जात वालों द्वारा पैदा की गई परंपराएं, गढ़े गए सिध्दांत और रूढ़िवादिता। मुझे मंडल आयोग की रिपोर्ट के समय का आरक्षण विरोधी जुनून याद है जिसने उत्तर भारत के कई हिस्सों को हिलाकर रख दिया था। उस समय बहुत से महिला संगठन और समूह मध्यवर्गीय महिलाओं और छात्रों में अपने आधार को खो देने के भय से अपनी बात को लेकर खुलकर सामने नहीं आ रहे थे। इन महिलाओं और छात्रों में से अधिकतर कई केंद्रों पर आरक्षण विरोधी कोलाहल में अग्रिम पंक्ति में थे। जातिवाद बहुत गहरा है और उसको न्यायोचित ठहराना कई रूप लेता है। बहुत से आम तर्कों में एक यह भी है कि चूंकि 'महिलाओं से संबंधित मुद्दे' हिंसा की तरह सभी वर्गों की महिलाओं को प्रभावित करते हैं, तो सभी वर्गों को एक करना उचित रहेगा बजाए कि 'विभाजक मुद्दे' उठाए जाएं। ऊंची जाति के आधिपत्य के खिलाफ विरोध करना विभाजक और विघटनकारी होगा, उसे अनदेखा करने से एकता और अखंडता बल पाती हैयह तर्क है। जहां तक मुझे याद है एडवा उन चंद संगठनों में से था जो उस समय संयुक्त महिला कार्यक्रम के साथ आरक्षण के पक्ष में सामने आया और दिल्ली में ज्यादा चीख-पुकार मचाने वाले महिला छात्रों द्वारा दीवारों पर बैनरों पर लिखे गए स्तब्ध कर देने वाले जातीय नारों का विरोध किया। उस वक्त ऐसी भावनाओं का ज्वार बह रहा था कि जब सभाओं में हमारे वक्ता आरक्षण के पक्ष में बोलते थे तो उनके खिलाफ नारे लगाए जाते थे। उस समय इस मुद्दे पर राष्ट्रीय महिला संगठनों में मतभेद थे, जिसके चलते कोई संयुक्त आंदोलन करना असंभव हो गया।
इसके अलावा जाति के ढांचे को उचित चुनौती देने में कमजोरी आज इस सचाई में भी है कि इन संगठनों में अधिकतर की जड़ें गांवों में नहीं हैं, जहां जातिवाद प्रबल है। दूसरी समस्या है, कुछ राजनीतिक दलों द्वारा जाति की वास्तविकताओं को संकीर्ण और आपत्तिजनक राजनीतिक जोड़-तोड़ से प्रभावित करना। ये राजनीतिक दल इन शोषित जातियों का मसीहा होने का दावा करते हैं। हमने ऐसे-ऐसे मामले देखे हैं जहां हिंसा की शिकार हुई किसी दलित महिला पर उसके रक्षक होने का दावा करने वाले दल ने ही यह दबाव डाला है कि वह मामला वापस ले ले। यह दबाव इसलिए डाला जाता है क्योंकि अत्याचार करने वाले भी उसी जाति के होते हैं और इसे समुदाय को बांटने के रूप में देखा जाएगा। क्या यह विडंबना नहीं है कि कुछ लोगों द्वारा एकता के झूठे तर्क का इस्तेमाल सवर्ण तंत्र के विरुध्द संघर्षों को रोकने के लिए किया जाए वहीं उसी समुदाय के कुछ लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल इसलिए किया जाए कि अत्याचार की शिकार हुई महिलाओं को न्याय न मिल सके। मैं जो बात साफ करना चाहती हूं वह यह है कि दमन करने वाले जातीय ढांचे के विरुध्द संघर्ष उन जातियों की महिलाओं की खास आवश्यकताओं में उनकी मदद तब तक नहीं कर पाएंगे जब तक कि आंदोलन पूरे विवेक के साथ इस मुद्दे को नहीं उठाता। गोलबंदी की राजनीति मतभेदों को लगातार बने रहने की इजाजत या मंजूरी देना है और छोटे-छोटे राजनीतिक लाभ के लिए तनाव है तो वह उनको जो समुदाय में ज्यादा असुरक्षित हैं या स्वयं समुदाय को भी कैसे मदद करेगी। ऊंची जातियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचार निश्चित ही आंदोलन की मुख्य चिंता होनी चाहिए और अगर मध्य वर्गीय महिलाओं का प्रतिरोध इसे ऐसा होने से रोकता है तो यह चिंता का कारण है। अल्पसंख्यक महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी बहुत मजबूत समर्थन चाहिए।(क्रमशः)



गुरुवार, 10 मार्च 2011

महिलाओं का बहुआयामी संघर्ष- (1)- माकपा सांसद वृंदा कारात

(इस साल सारी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है,समूचे साल हम अपने ब्लॉग पर महिलाओं के संघर्षों और समस्याओं पर विभिन्न क्षेत्र के विचारकों और स्त्रीवादियों के आलेख उपलब्ध कराएंगे, इस कड़ी में भारत के महिला आंदोलन की गंभीर मीमांसा करते हुए का.वृंदा कारात के लेख को उनकी किताब से साभार किश्तों में छाप रहे हैं,यह लेख महिला आंदोलन की समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है)  
    स्वतंत्रता संघर्ष की कुठाली में भारतीय नारी आंदोलन का जन्म हुआ था। इसीलिए प्रारंभ से ही दूसरे नारी आंदोलनों के विपरीत, खास तौर पर पश्चिम में समकालीन नारी मुक्ति संघर्षों के विपरीत, जिनके सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष संबंधों को संबोधित करने के मुख्य उद्देश्य की तलाश समाप्त हो जाती थी, हमारा (भारतीय) आंदोलन एक सीमित लैंगिक ढांचे से परे अधिक श्रेष्ठ हो आगे बढ़ पाया। भारतीय नारी आंदोलन की चेतना के साथ औपनिवेशिक सत्ता से स्वाधीनता और मुक्ति के सवाल बड़ी जटिलता के साथ उलझे हुए थे। स्त्रियों की वह चेतना जो न केवल पुरुषों से संबंधित थी अपितु पूरे विश्व से उसकी चेतना की डोर बंधी थी। यह अहसास कि मुक्ति के लिए सभी संघर्ष अविभाज्य हैं, समानता के लिए वैश्विक संघर्ष में हमारे आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस पहला अखिल भारतीय महिला संगठन था। उसका चरित्र उसको स्पष्ट रूप से स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्य धारा से एकरूप करता था। बुर्जुआ उदारवादी और वामपंथी दोनों ही अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में साथ ही आ जुड़े थे। इसका गठन 1920 में महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक लोकप्रिय बनाने के आह्वानों के साथ खड़ा हो गया। महात्मा गांधी का यह आह्वान संघर्ष को उसकी ऊंची जाति और अभिजात्य वर्ग की जकड़ से अलग करने के लिए किया गया था। अत: अखिल भारतीय महिला कांग्रेस, और जो उससे जुड़े हुए थे, ने न केवल स्त्रियों के अधिकार और सम्मान की लड़ाई में एक अहम मुकाम हासिल किया अपितु इस दायित्व को स्पष्ट तौर पर देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक इकाई के रूप में स्थापित कर दिया। यही वह वास्तविक शक्ति थी जो नारी आंदोलन ने अपने जन्म के समय अर्जित की जो आंदोलन के हृदय स्थल में अभी तक संजो कर रखी गई है। यह एक ऐसी परंपरा है जो आंदोलन के खास स्वरूप में इस प्रकार गतिमान है कि उसके मार्ग में आने वाले उतार-चढ़ावों में आजतक उसका मार्गदर्शन कर रही है।
58 साल पहले पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के इतर सांप्रदायिकता और बंटवारे के साथ जो मिला वह एक ऐसी विशिष्ट स्थिति थी जो नारी आंदोलन के लिए चिंता का विषय थी। आजादी के साथ हिंसा का एक बहुत बड़ा ज्वार भी आया था। महिला संगठनों को सबसे पहला सामना हिंसा, सांप्रदायिकता और धार्मिक समुदायों के आधार पर बंटी पीड़ित महिलाओं से करना था। हिंदू और मुसलिम दोनों ही महिलाएं सांप्रदायिक लोगों की ज्यादतियों की सीधी शिकार हुई थीं। सरकारी साहित्य में इन आघातों को थोड़ी ही आवाज मिली है। शायद वह इसलिए कि त्रासदी का विस्तार इतना बड़ा था कि जो महिलाएं हिंसा का शिकार हुई थीं उनका सारा ध्यान अपनी बिखरी जिंदगियों के कोनों को समेटने में और उन्हें फिर से जोड़ने में लगा था। पंजाब, दिल्ली और बंगाल में महिलाओं के साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं का इस स्थिति से आमना-सामना हुआ। एक बार फिर से स्पष्ट था कि नारी आंदोलन को महिलाओं पर पड़े सांप्रदायिकता के विशेष प्रभाव को समझते हुए एक व्यापक राजनीतिक संघर्ष के बीच काम करना होगा।
मोटे तौर पर इसी समय के आसपास एक बहुत ही बड़ी महत्वपूर्ण धारा नारी आंदोलन में उभरकर आई। अफसोस की बात है कि इस विषय के अकादमिक अध्ययनों में इसे वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी। वाम-रेडिकल प्रवृत्ति गरीब औरतों के बीच काम करने से आकार ले पाई थी। सूखे से निबटने के लिए जिस प्रकार की जबरदस्ती महिलाओं के साथ की जा रही थी उसे देखकर ऐसी बहुत सी महिलाएं जो पहले अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में थीं वे नारी आत्म रक्षा समिति (एनएआरएस) में शामिल होने के लिए प्रेरित हुईं। यह आंदोलन तेजी से बढ़ा और उसने संगठित वाम से बहुत ही परिपक्व संगठनात्मक संबंध विकसित किए। नारी आत्म रक्षा समिति के सदस्यों ने ऐतिहासिक तेभागा संघर्ष का समर्थन किया और उसमें भाग भी लिया। देश के अन्य स्थानों पर वाम राजनीतिक झुकाव के साथ महिलाएं कामकाजी वर्ग और तेलंगाना के संघर्ष जैसे क्रांतिकारी किसान संघर्षों में शामिल थीं। तेलंगाना वाम के लिए एक बहुत ही प्रभावशाली सीखने वाला अनुभव साबित हुआ, जिसने यह दरशाया कि महिलाएं संघर्ष कर सकती हैं।
महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष नेराष्ट्रीय विकास के संबंध में, राजनीति के संबंध में और उनकी खुद की जिंदगियों और परिवारों के संबंध मेंआजादी के बाद भारतीय नारी आंदोलन को एक आकार दिया। आजादी के बाद बुर्जुआ-उदार विचारधारा वालों में से अधिकतर का यह विश्वास था कि एक बार स्वतंत्रता मिल जाए तो सत्ता का नया ढांचा महिलाओं की समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा। अत: आवश्यकता थी स्त्री का व्यवस्था में ही प्रतिनिधित्व करने की और साथ ही उनकी चिंताओं को उचित रूप से स्पष्ट किया जाता, तब उसके बाद उनकी मांगों को पूरा किया जाता। बुर्जुआ-उदार महिला आंदोलन जो कि तब जाहिर है सैध्दांतिक रूप से कांग्रेस से जुड़ा हुआ था, महिलाओं के लिए बराबरी का मौका चाहता था, उन्हें इस खेल से कोई आपत्ति नहीं थी।
आजाद भारत के वजूद में आने के छह साल में ही यह आत्मसंतोष चकनाचूर हो गया। शायद यह विडंबना ही है कि महिला आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी चिंता के रूप में सांप्रदायिकता और कट्टर पंथ से किसी और से काफी पहले ही उलझना पड़ा। महिला आंदोलन को कोड बिल और हिंदू पर्सनल ला सुधार के मामले में तुरंत की सभी दलों में मौजूद हिंदू अंधराष्ट्रवादियों के रूप में मौजूद बहुसंख्यक कट्टरपंथ से भिड़ना पड़ा। जिन महिलाओं ने कट्टरपंथियों के विरुध्द युध्द किया उन्होंने इस जंग में एक असाधारण साहस का परिचय दिया। वामपंथ में रेणु चक्रवर्ती, अहिल्या रांगनेकर और कई अन्य महिलाएं और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस से कमलादेवी चट्टोपाध्याय, पद्मजा नायडू और अन्य कई महिलाएं जहां तक महिलाओं का सवाल है नेहरूवादी परियोजना के प्रतीक चिह्न थे। इन्हें मजबूरन इस प्रक्रियावादी हिंदू दक्षिणपंथ के मध्ययुगीन चेहरे से दो-दो हाथ करने पड़े जिसके सुधार विरोधी पक्ष को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का समर्थन प्राप्त था।
इन महिलाओं की निंदा की गई। इन्हें गाली दी गई। यह दिलचस्प है कि सती विरोधी और बाद में हुए अन्य नारी आंदोलनों में हमारे खिलाफ इस्तेमाल किए गए विशेषणों की ये महिलाएं पहली शिकार थीं। जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया उनमें से चंद थे 'पाश्चात्य', 'भारतीय परंपरा से दूर', 'झूठे धर्मनिरपेक्षतावादी'। इन बहसों में जो मुहावरा इस्तेमाल नहीं हुआ वह है 'बालकटी' (परकटी)। सालों के संघर्ष के बाद भारतीय नारी आंदोलन ने आंशिक विजय हासिल की है। फिर भी, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय राज्य और बुर्जुआ राजनीति का असली चेहरा सबके सामने बेपरदा हो गया है।
कुछ भी हो 1960 में ही यह तीखा संघर्ष हलका पड़ गया था। वह एक ऐसा समय था जिसका चेहरा-मोहरा युध्दों और सभी जन आंदोलनों से बना था, इस संकट की स्थिति में, पीछे हटना और आत्मविश्लेषी बन गया। इस दौर में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस अपना सारा ध्यान कल्याण और सामाजिक कार्यों पर केंद्रित करते हुए अपनी राह चल पड़ा। वामपंथ अपनी परंपरा के अनुरूप भूमिका अदा करते हुए अपने आधार को बढ़ाने और मौजूदा प्रभाव वाले क्षेत्रों को संगठित करने में लगा हुआ था। 1970 तक वामपंथी नारी आंदोलन महिलाओं के काम और कार्यस्थल पर समानता के मुद्दे पर श्रमिक संगठनों को प्रभावित करने की स्थिति में था। 1970 का दौर पारंपरिक उद्योगों, खासकर कपड़ा और जूट में एक बहुत बड़ी छंटनी का साक्षी रहा है। वामपंथ में महिला संगठन इस स्थिति को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थे, क्योंकि यह स्पष्ट था कि महिलाएं काम पर बहुत ही मुश्किल से रखी जाती थीं पर सबसे पहले बहुत आसानी से निकाल दी जाती थीं।
वामपंथ में महिलाओं को 1970 के दौरान कम से कम कुछ तो बड़ी सफलताएं मिली थीं : समान काम के लिए समान वेतन के महत्वपूर्ण कानूनों को पास कराने में उन्होंने योगदान दिया पर शायद बहुत ही संकेतात्मक तरीके से। हालांकि ऐसे कोई भी संयुक्त संघर्ष नहीं हुए जिनमें सभी प्रकार के महिला संगठन शामिल हों। शायद यह कुछ लोगों में एक व्यापक भ्रम के कारण था कि कदाचित एक महिला प्रधानमंत्री महिलाओं की स्थिति को सही मायने में बेहतर करने की दिशा में ज्यादा कार्य कर सके। ऐसा कुछ नहीं हुआ। बुर्जुआ-उदारवादी महिला संगठनों और वामपंथी महिला संगठनों के बीच मतभेद और गहरा गए। यह स्पष्ट है कि दरार पुराने सैध्दांतिक मुद्दों पर नहीं चटकी थी अपितु उसका ताल्लुक वास्तविक महिला के रोजमर्रा के जीवन से तत्काल बहुत ही निराशाजनक तरीके से था। अन्य कई संघर्षों की तरह भारतीय नारी आंदोलन के इतिहास के लिए भी आपातकाल एक विभाजक साबित हुई। 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की की गई घोषणा के जवाब में सरकार द्वारा प्रस्तुत भारत में महिलाओं की स्थिति रिपोर्ट इसका एक कारण था। यह कहना पड़ेगा कि भारतीय नारी आंदोलन को प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलनों से फायदा हुआ, क्योंकि लैंगिक मुद्दों पर इनका अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर बड़ा प्रभाव था। भारत में हम भाग्यशाली थे कि भारतीय महिला की स्थिति रिपोर्ट, जो कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के लिए जारी की गई थी, महिलाओं की एक ऐसी समिति ने तैयार की थी जिसकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता था। इसका जो परिणाम निकला था वह एक प्रारंभिक दस्तावेज था, जिसको जांचने के लिए वह सभी स्थितियां सामने रख दी गईं जिनमें आजादी के बाद महिलाओं को फायदा और नुकसान हुआ।
आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के दौरान कई नए महिला संगठन उभरकर सामने आए, जिन्होंने पहले से ही स्थापित महिला संगठनों की राजनीति को नकार दिया और पश्चिम में महिला संगठनों ने जो विचार सामने रखे थे उनकी ओर रुख किया। 1970 के दशक के दौरान अकादमिक विमर्श और विश्वविद्यालयों में युवा महिलाओं में लिंग संबंधी मुद्दों को काफी महत्व मिला। उदाहरण के लिए, यहां तक कि दिल्ली के कम रेडिकल माने जाने वाले कॉलेजों में 'मिश फ्रेशर' प्रतियोगिताओं के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। यदि आपातकाल के कारण यह तय था कि इन प्रवृत्तियों का कोई परिणाम नहीं निकल सकता था, ये संगठन लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन का एक हिस्सा बनकर फूटे और बाद में स्वायत्त समूहों के रूप में उभरे। अब भारतीय महिलाओं के आंदोलन में तीन तरह की प्रवृत्तियां थीं बुर्जुआ उदारवादी, वामपंथी और स्वायत्त समूह। जल्दी ही एक चौथा भी उभर कर सामने आयागैरसरकारी संगठन, जो कि महिलाओं को सेवाएं और एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए समर्पित था और जिनको महिलाओं को लाभ पहुंचाने के लिए जन राजनीति को एक साधन मानना स्वीकार नहीं था।
शुरुआती दौर में इन नई प्रवृत्तियों ने भारतीय नारी आंदोलन की परंपराओं को पूरी तरह से अनदेखा किया और उनकी अवमानना की और उनकी राजनीति संकीर्ण लिंग (जेंडर) राजनीति के इर्द-गिर्द आकार लेने लगी। पुराने महिला संगठनों की जो आलोचना की गई उसके केंद्र में यह बात थी कि महिला की परिवार में भूमिका और उसके बाद खुद के लिए निजी जगह को इन संगठनों द्वारा पूर्ण रूप से नजरअंदाज किया गया था। इस तर्क में कुछ दम तो था। महिलाओं के आंदोलन के विकास की राह मेंइसमें मैं वामपंथी महिलाओं के आंदोलन को शामिल करती हूंएक असमान और उत्पीड़ित पारिवारिक परिस्थितियों में एक महिला की भूमिका पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया था। यह बात विवाद के परे थी कि इस सवाल का समाधान ढूंढ़ना जरूरी था। पर इससे कैसे निबटा जाए यह एक गंभीर बहस का मुद्दा बना।
                                                                                        (क्रमशः)
(भारतीय नारीःमुक्ति और संघर्ष,वृंदा कारात,अनुवाद-उषा चौहान,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली से साभार)

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