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शुक्रवार, 18 जून 2010

फासीवाद मानवघाती प्रवृत्ति और व्यवहार - लालबहादुर वर्मा

    जनवाद एक सिद्धांत ही नहीं एक व्यवहार भी है। उसे एक सामाजिक व्यवस्था व्यक्ति और समुदाय की मनोवृत्ति, प्रवृत्ति और समस्त वृत्ति में व्याप्त और चरितार्थ होना चाहिए। परंतु यथार्थ यह है कि वह मुख्यत: एक राजनीतिक प्रणाली बन कर रह गया है विशेषकर भारत में। जबकि जनवाद का विलोम और नकार फासीवाद सिद्धांत से अधिक व्यवहार है। वह राजनीतिक व्यवस्था में सत्तासीन हो न हो, वह संगठनों, व्यक्तियों और पार्टियों के आचरण व्यवहार में लगातार कार्यरत रहता है कभी-कभी विस्फोटक और विध्वंसक रूप में।
      इसी तरह जैसे हजारों साल के मानव इतिहास में हर पुरुष मेंजनवादी से जनवादी और समाजवादी से समाजवादी, पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति होती ही है प्रकट या प्रच्छन्न, वैसे ही राज्य संस्था में ही फासीवादी प्रवृत्ति होती ही है जो विभिन्न अवसरों पर विविध रूपों में शासकों के हित के अनुसार अभिव्यक्त होती है। इसीलिए फासीवाद को भली भांति समझने के लिए और उसके उन्मूलन के लिए उसकी सबसे घनीभूत और बर्बर अभिव्यक्ति मुसोलिनी और हिटलर द्वारा विकसित आक्रामक और नस्लवादी राष्ट्रवाद तक ही सीमित रहना पर्याप्त नहीं होगा। फासीवाद के राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक आयाम को भी समझना होगा। वह सामुदायिक ही नहीं व्यक्तिगत स्तर पर भी कैसे चरितार्थ होता है इसे भी परना होगा।
विषय को समग्रता में देने-परने के लिए उसके 'मैक्रो' ही नहीं 'माइक्रो' आयामों को भी देलेना बहुत उपयोगी हो सकता है। नाना पाटेकर की कुछ लोकप्रिय हिंदी फिल्मों को याद करें जिनमें वह ऐसे पात्र की भूमिका निभाता है जो पूरी तरह फासीवादी होता है और उसके हर संवाद पर अंधेरे में बैठी जनता ताली बजाती है। एक फासीवादी चरित्र प्रशंसित ही नहीं होता अवचेतन पर छा जाता है और रोल-मॉडल बनने लगता है। ठाकरे जैसे चरित्र सिनेमा में ही नहीं प्रशंसित होते जीवन में भी लाखों लोगों के नेता बन बैठते हैं और 'भूमिपुत्र' का भ्रामक नारा देकर विस्थापन को राजनीतिक हथकंडा बना लेते हैं। लोग पड़ोसियों की जान के दुश्मन बन जाते हैं और तात्कालिक हितों के लिए तथाकथित उदारपंथी लोग और पार्टियां भी बगलें झांकने लगते हैं। इसे भूलना नहीं चाहिए कि इटली और जर्मनी में फासीवाद इसलिए सफल हुआ था क्योंकि वहां की लिबरल शक्तियां कमजोर और संकीर्ण थीं और उनका शुरू में फासीवाद को प्रच्छन्न समर्थन था।
यहीं पर जर्मन कवि निमोलर की सदा प्रासंगिक कविता याद कर लेने की जरूरत है :
पहले वे ट्रेड यूनियन वालों को लेने आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वे कम्युनिस्टों को लेने आए
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था
फिर वे यहूदियों को लेने आए
और मैं फिर भी नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
और फिर वे मुझे लेने आ गए
और कोई नहीं था
जो मेरे लिए बोलता।
फासीवाद की इस सर्वग्रासी प्रवृत्ति और उसके प्रति आत्मघाती प्रतिक्रिया के परिप्रेक्ष्य में ही मानव इतिहास की इस सबसे संकीर्ण और परिघटना को देना समझना समीचीन होगा।
व्यक्ति में फासीवादी प्रवृत्ति उसे आत्मकेंद्रित स्वार्थी, परिप्रेक्ष्य और विवेक-वंचित, 'पर' के प्रति आक्रामक, अपने को ही सही समझने वाला (स्द्गद्यद्ध-ह्मद्बद्दध्दह्लशह्वह्य), सर्वसत्तावादी और जालिम बनाती है। ऐसा व्यक्ति तात्कालिक रूप से सफल हो सकता है पर उससे कोई निकटता नहीं महसूस करता। लोग उसकी मुंह पर भले ही प्रशंसा करें वास्तव में उससे डरते हैं। ऐसा व्यक्ति घर, पड़ोस-मुहल्ले, गांव-जवार में भय-निर्धारित प्रशंसा पाता हुआ भी नितांत अकेला होता जाता है मित्रहीन।
जाहिर है ऐसा व्यक्ति सारत: मनोरोगी हो जाता है और उसकी भूमिका दूसरों के लिए ही नहीं अंतत: स्वयं अपने लिए भी नकारात्मक हो जाती है।
फासीवाद का संगठित रूप में पहले पहल प्रादुर्भाव प्रथम विश्वयुध्द के बाद इटली में हुआ था। पूर्व समाजवादी बेनितो मुसोलिनी ने उसे असंतुष्ट और अपमानित इटली के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में प्रतिपादित किया और एक कमजोर जनतंत्र ने उसके सामने घुटने टेक दिए और वह 1921 में इटली में सत्तासीन हो गया। जर्मनी की तो प्रथम विश्वयुध्द के बाद की हो गई बर्साई की संधि में नाक रगड़ दी गई थी। वहां हिटलर ने फासीवाद का और भी आक्रामक और असहिष्णु संस्करण विकसित किया और 1933 में सत्ता पर कब्जा करते ही एक नई विश्व-व्यवस्था की नींव डालने लगा। स्पेन में युध्द के बाद एक जन-निर्वाचित जनतंत्र का प्रादुर्भाव हुआ था। उसे स्पेन की प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने नहीं स्वीकारा और जनरल फ्रांको के नेतृत्व में उसे उखाड़ फेंकने के लिए गृहयुद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध में स्पेन के जनतंत्र के साथ सारी दुनिया के जनवादी रचनाकार और बौद्धिक ड़े हुए क्रिस्टोफर कॉडवेल और राल्फ फॉक्स जैसों ने तो कलम की जगह बंदूक उठा ली पर जनतंत्र की अलंबरदार ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों ने कुछ नहीं किया। दूसरी ओर इटली और जर्मनी की फासीवादी सरकारों ने खुलेआम स्पेन के फासिस्टों की मदद की।
यह इतिहाससिद्ध है कि फासीवाद तभी शक्तिशाली होता है जब जनवादी शक्तियां असहाय लगने लगती हैं और राज्य-व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है और विध्वंसक शक्तियों पर अंकुश नहीं लगा पाती।
 ( निम्नलिखित किताब की भूमिका का अंश ) 
 फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
  लेखक-  रोजे बूर्दरों
प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
         मूल्य -275                                 
अनुवादक- लाल बहादुर वर्मा

संघ परिवार का संविधान विरोधी खेल

     भारत में आरएसएस सबसे बड़ा फासीवादी संगठन है। कहने को यह संगठन अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन इसका बुनियादी लक्ष्य है भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना। कांग्रेस पार्टी समय-समय पर संघ परिवार के सामने समर्पण करती रही है। कांग्रेस की नीतियां उदार रही हैं,उसका बुनियादी चरित्र ढुलमुल धर्मनिरपेक्ष है।
     लेकिन कांग्रेस में उदार और अनुदार दोनों ही किस्म के लोग हैं। कांग्रेस की नीतियां समय-समय पर पापुलिज्म के दबाब में आती रही हैं। यही वजह है कांग्रेस का राष्ट्रीय चरित्र अनेक बार कई मसलों पर उसकी स्थानीय इकाईयों और नेताओं की भूमिका के साथ मेल नहीं खाता। कांग्रेस इन दिनों नव्य-उदारवादी आर्थिक नीतियों के दबाब में है और इन नीतियों का गहरा असर संघ परिवार से भी है। जहां-जहां ये नीतियां लागू हुई हैं वहां अनुदारवादी राजनीति को इससे मदद मिली है। अनुदार या कंजरवेटिव मसले संघ के एजेण्डे पर आए हैं।
    कंजरवेटिव राजनीति और फासीवाद का गहरा संबंध है। सारी दुनिया में फासीवादी ताकतों के उदारवादी पूंजीवाद का विरोध किया था और आज भी कर रहे हैं। भारत में बिहार के 1974 के जेपी आंदोलन और 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में संघ परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी, नरेद्र मोदी,लालूयादव,नीतीश कुमार आदि उसी समय की राजनीतिक खेती की देन हैं।
    सन् 1974 में संघ परिवार ‘इन्दिरा गांधी हटाओ देश बचाओ ’ के नारे लगाने वालों में सबसे आगे था। यही संघ परिवार जून 1975 में आपात्काल लगते ही इंदिरा का भक्त हो गया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक ने इन्दिरा गांधी को आपात्काल लागू करने के लिए पूरे सहयोग का वादा किया था,आपात्काल का समर्थन किया था। उल्लेखनीय है उस समय संघ पर केन्द्र सरकार ने पाबंदी लगा दी थी।
      आपात्काल में जनता के सभी अधिकार छीन लिए गए थे, विपक्ष के सभी नेता जेलों में बंद थे,संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ता जेलों में बंद थे, इसके बावजूद संघ परिवार ने आपात्काल में सहयोग का प्रस्ताव देकर अपने बुनियादी जनतंत्र विरोधी और अधिनायकवादी नजरिए का प्रतिपादन किया था। संघ परिवार का ऐसा करना उसके उदारवाद विरोधी राजनीतिक नजरिए का हिस्सा है।
     इसी प्रसंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फासीवाद के निर्माताओं के उदारतावाद विरोधी नजरिए को देखें तो पता चलेगा कि संघ परिवार का देशी विचारों का दावा गलत है और वह फासीवाद के विदेशी विचारों का प्रचारक-प्रसारक है।
    फासीवादी संगठनों का प्रधान शत्रु है मार्क्सवाद। मार्क्सवाद को विध्वस्त करने के लिए उदार पूंजीवाद पर हमला करना जरूरी है। क्योंकि उदार पूंजीवादी वातावरण में मार्क्सवाद फलता-फूलता है। सारी दुनिया में समाजवाद के पराभव में मार्क्सवाद की आंतरिक कमजोरियों के साथ उदार पूंजीवाद विरोधी नीतिगत रूझानों की बड़ी भूमिका है। मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको ने जमकर उदार पूंजीवाद का विरोध किया था। भारत में संघ परिवार के अनुदारवादी राजनीतिक नजरिए के ये ही मार्गदर्शक हैं।
रोजे बूर्दरों ने ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक किताब में लिखा है कि फासीवाद के तीन तिलंगों मुसोलिनी,हिटलर और फ्रैंको द्वारा ‘‘ उदारवाद की आलोचना इस विचार पर आधारित है कि उदार राज्य मार्क्सवाद के खिलाफ प्रभावी संघर्ष में असमर्थ है। राजनीतिक स्तर पर उदार राज्य की जन्मजात कमजोरी उसे मार्क्सवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाने से रोकती है।
     विचारधारा के स्तर पर न्याय संगत परिवेश के दर्शन के पास बृहत्तर जनता को आकर्षित करने वाली कोई जीवंतता नहीं है। मुसोलिनी अपने वक्तव्यों में उदार राज्य की कृतियों और सिद्धांत की नपुंसकता की भर्त्सना करता है। हिटलर घोषित करता है : 'एक ऐसा राज्य जो एक कोढी, मार्क्सवाद वास्तव में यही तो है, के विकास को नहीं रोक सका वह भविष्य के किसी अवसर का क्या इस्तेमाल कर पायेगा।’’ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमाम भाषण मुसोलिनी की इसी हुंकारभरी शैली में ही होते हैं।
     भारत में संघ परिवार समानता के सिद्धांत का विरोध करता है और राष्ट्रवाद, वर्णव्यवस्था और हिन्दू वर्चस्व को नैसर्गिक मानता है। अगर हम इन चीजों को नैसर्गिक मान लेंगे तो फिर समानता की सभी बातें खोखली हैं। समानता को सही रूपों में लागू करने के लिए वर्णव्यवस्था,जातिप्रथा, राष्ट्रवाद और हिन्दू वर्चस्व या धार्मिक वर्चस्व की धारणा को त्यागना जरूरी है। अगर कोई संगठन इन चीजों में विश्वास करता है तो वह स्वभावतः संविधान विरोधी राजनीतिक भूमिका निभाता है। इस अर्थ में भारत के संविधान की बुनियादी स्प्रिट के साथ संघ परिवार का कोई मेल नहीं बैठता। भारत का संविधान उदार पूंजीवाद की शानदार अभिव्यक्ति है। जबकि फासीवाद को उदार पूंजीवाद से घृणा है।  

गुरुवार, 17 जून 2010

सामाजिक कैंसर है हिन्दू राष्ट्रवाद


  भारत में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं है जो राष्ट्रवाद का आए दिन डंका बजाते रहते हैं। राष्ट्रवाद का नारा देने वाले यह भूल जाते हैं राष्ट्रवाद आधुनिक युग का कैंसर है। यह बात रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर प्रेमचंद तक सभी बड़े भारतीय बुद्धिजीवियों ने रेखांकित की है। जो लोग राष्ट्रवाद को धर्म से जोड़कर हिन्दू राष्ट्रवाद का नारा देते हैं वे समाज का और भी नुकसान करते हैं यह तो वैसे ही हुआ कि कैंसर के मरीज को एड्स।
     राष्ट्रवाद को फासीवादी ताकतें भी प्यार करती हैं। मुसोलिनी,हिटलर ,फ्रैंको आदि का राष्ट्रवाद का नारा मानव सभ्यता को विनाश की ओर ले जा चुका है, उसी तरह हिन्दू राष्ट्रवाद भी भारत में सामाजिक जहर का गोमुख है। 
     संघ परिवार ने नस्ल के फासीवादी सिद्धांत से प्रेरणा लेकर हिन्दुत्व की धारणा विकसित की है। हिन्दू की धार्मिक-नस्लीय श्रेष्ठता पर जोर दिया है। संघ परिवार की विचारधारा में मनुष्य की धारणा से ऊपर हिन्दुत्व को महत्ता प्रदान की गई। मानवीय मूल्यों और मानवाधिकारों को संरक्षण देने की बजाय राजनीति का आधार हिन्दू और हिन्दुत्व को बनाया है और उसे राष्ट्रवाद से वैसे ही जोड़ा है जैसे हिटलर-मुसोलिनी ने राष्ट्रवाद को नस्ल से जोड़ा था।
          रोजे बूर्दरों ने ‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार नामक किताब में लिखा है कि फासीवादी आंदोलनों के संस्थापक कुछ बातों पर जोर देते हैं, वे ’‘स्वेच्छा से मिस्तीक या रहस्य की बात करते हैं। उदाहरण के लिए, प्रीमो क्रांतिकारी मिस्तीक के बरअक्स 'शाश्वत कर्तव्य का मिस्तीक' प्रस्तुत करता है। नात्सियों के यहां नस्ल का मिस्तीक, फासीवाद में राष्ट्र का। 'हमने अपना मिथ रचा है। हमारा मिथ है राष्ट्र।' (मुसोलिनी, 1922) जर्मनी में नस्लवाद 'बीसवीं शताब्दी का मिथ है।'
       जर्मन और इतालवी विचारधाराओं ने अपने सिद्धांतों के अतर्कसंगत आधारों पर जोर दिया है। नए फासीवादी राज्य का विश्लेषण करते हुए जेंतील याद दिलाता है कि एक प्रकार का निरंकुश उदारवाद फासीवादी के लिए अपरिचित नहीं हैं। लेकिन वह यह भी कहता है कि एक शक्तिशाली राज्य की अवधारणा 'कमोबेश बौद्धिक जड़सूत्र' के अलावा कुछ नहीं है। इस अवधारणा का वास्तव में कोई आधार नहीं है। फासीवाद के कारण यह जड़सूत्र एक विचार-शक्ति, एक आवेग बन गया है। भीड़ और शक्तिशाली विचार के बीच तत्काल एक दिया स्थापित हो जाता है, जैसे उसे प्रकाश मिल गया हो। कर्म पर आवेग हावी हो जाता है। इस प्रकार सुसंगत सिद्धांत से जुड़ाव के कारण गति नहीं पैदा होती है, उल्टे, इसके विपरीत, कर्म द्वारा जनता में विचारशक्ति एक अतर्कसंगत उद्गार और आवेश उद्वेलित करता है एक प्रकार से रहस्यात्मकता का उद्धाटन। इस प्रकार व्यक्ति और सिद्धांत के मिलन की तात्कालिकता नात्सियों में कम नहीं है। कार्ल श्मिट सिद्धांत की समझ और कर्म के प्रारंभ के लिए किसी तर्क संगत या भावात्मक मध्यस्थता को नकारता है।’’
   बुर्दरों ने लिखा है ‘‘उल्लेखनीय है कि एक संगत छवि तत्काल छवि या तुलना से बढ क़र लगती है वह स्वयं एक प्रेरणा होती है। हमारी अवधारणा को न तो किसी मध्यस्थ छवि की आवश्कयता है न प्रतिनिधि तुलना की। वह किसी दृष्टांत या बारीक प्रतिनिधित्व से नहीं आती है, न ही देकार्तवादी एक 'सामान्य विचार' से। वह तो एक तत्काल उपस्थित और व्यावहारिक धारणा है। कहना ही हो तो कहेंगे इस सिद्धांत का उत्स दैवीय है-हिटलर कहता नहीं है कि इसमें ईश्वर की प्रेरणा हैं? 'मैं तो सर्वशक्तिमान अपने रचयिता की प्रेरणा से काम करता हूँ, यहूदियों के विरुद्ध अपनी रक्षा करते समय मैं ईश्वर के कामों की ही रक्षा में संघर्ष करता होता हूं।'' (माइन कांफ, पृष्ठ 72)
''इस प्रकार, आधार कुछ विचार-शक्तियां होनी चाहिए जो लोगों को आवेग मुक्त कर सकें और ऊर्जा लामबंद की जा सके कुछ निरपेक्ष सत्य जो बस विश्वास में ही अभिव्यक्त होते हैं। उन्हें बस आधारतत्व के रूप में घोषित किया जा सकता है वांछित तत्काल प्रभाविता के लिए यह जरूरी होता है।''
"विमर्श की प्रक्रिया इन्हीं संचालक सिद्धांतों से संचालित होती है। अकसर ही शुरुआत होती है कुछ अभिपुष्टियों से बिना किसी और बात का खयाल किए। इटालियन इनसाइक्लोपीडिया में फासीवाद की परिभाषा पर गौर करें तो उसमें कोई तर्कणा या बहस नहीं है बस कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक, अभिपुष्टियां हैं। ('फासीवाद है, 'फासीवाद की धारणा', 'फासीवाद का विचार' ऐसा है..) इसके अलावा सत्य का वाहक होने का विश्वास किसी व्याख्या को निरर्थक बना देता है। नेशनल सिंडिकलिज्म की व्याख्या इस प्रकार है : चूंकि वह सत्य का वाहक है और चूंकि सत्य एक ही होता है इसलिए नेशनल सिंडिकलिज्म को लेकर किसी भी प्रकार के विवाद की संभावना स्वीकार्य नहीं हैं।"
     "विचारधारात्मक स्तर पर एक प्रदर्शनात्मक आकर्षण हो सकता है लेकिन उसमें भी पूर्वापेक्षा यही है कि न कोई विवाद हो न निरूपण। इसको विशेष रूप से माइन कांफ में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए 'जन और नस्ल' नामक अध्याय में नस्ल की असमानता की अभिपुष्टि को मान कर ही चला गया है ,उसी पर यह बहस आधारित है कि आर्य श्रेष्ठ होते हैं और यहूदियों ने सारे विश्व पर अपना प्रभुत्व कायम कर रखा है। ज्यादा से ज्यादा यह पुष्टि पर्यवेक्षण पर आधारित की जाती है जिसे अपने में एक सबूत, एक बोध, स्वाभाविक, ऐतिहासिक या वैज्ञानिक की तरह पेश किया जाता है। इस प्रकार घोषित सत्य के प्रति एक सावधानी बरतने की बात कर दी जाती है। इस प्रकार तीनों ही आंदोलनों में समान रूप से श्रेणीबद्धता के सिद्धांत और जीवन के लिए संघर्ष के संदर्भ में एक नैसर्गिकता चिह्नित है जिसमें किसी तरह की समानता का कोई अस्तित्व नहीं है न व्यक्तियों के बीच, न नस्लों के बीच। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद और नस्ली असमानता को इतिहास में तथ्यसंगत और तथ्यपरक बताया गया है। इस बिंदु पर इन आंदोलनों की विचारधाराएं निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक नियति की तरह प्रस्तुत की गई है।
        नात्सीवाद ने प्राकृतिक विज्ञान में वनस्पति संसार एवं जंतु संसार के उदाहरणों से दिखाया कि एक 'सिद्धांत है 'रचयिता का सिद्धांत और दूसरा है 'परजीविता' का। फिर वह परजीवियों से मनुष्यों के संघर्ष का उदाहरण लेता है और एक 'वैज्ञानिक' सिध्दांत प्रतिपादित करता है कि यह संघर्ष तभी खत्म होगा जब या तो परजीवियों का अंत हो जाए या मानव समाज का। यह बात मानव समाज पर भी लागू होती है क्योंकि नियम सार्विक (यूनीवर्सल) है और इसलिए मानवजाति बच सके इसके लिए परजीवियों का अंत होना चाहिए। इस प्रकार तर्क पूरी गंभीरता के साथ प्रयोग की पध्दति पर आधारित है। लेकिन इस तर्कणा की विकृति एकदम स्पष्ट है।
      1.     सिद्धांत रचयिता और परजीवी का निरपेक्ष सत्य, जिस पर सारी प्रस्तुति आधारित है, एक सामान्य अभिपुष्टि की तरह लिया गया है जिसे प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं समझी गई है।
      2.    समन्वयन के स्तर पर, जिससे झूठे तर्क जुटाए गए हैं जंतु विज्ञान की एक बात को सामाजिक संरचना पर लागू कर दिया गया है। इस तरह दिखाई कुछ भी पडे, यह सब है पूरी तरह अतर्कसंगत।
    इस तरह हमें अतर्कसंगतता के स्तर पर पटक दिया जाता है। इस प्रकार हम ऐसी विचारधारा के रूबरू हैं जो उन मूलभूत सत्यों पर आधारित है जिन्हें निर्विवाद और जडसूत्र की तरह अभिपुष्ट मान लिया गया है। जिनका व्यक्ति और जन-समुदाय तत्काल साक्षात्कार करता है। लेकिन अगर हम प्रभाविता की कसौटी पर इसे कसें तो ये विचार शक्तियां खास एक प्रकार का व्यवहार चिन्हित करती हैं। यहीं जरूरत है कि सिध्दांत और व्यवहार के बीच संबंध पर इनकी सोच का विश्लेषण कर लिया जाए।’’
   फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
  लेखक-  रोजे बूर्दरों
प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
         मूल्य -275 

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