हिंसा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंसा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम


     कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।
     बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
   सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।
      प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये दोनों बहनें तब जन्म लेती हैं जब समाज में कर्मसंस्कृति का क्षय होता है।परजीवी और पराजित मनोदशा में गाली और हिंसा जन्म लेती है।
     पश्चिम बंगाल में जिसे नक्सलबाडी आंदोलन कहते हैं वह इस राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन का प्रस्थान बिंदु है। पश्चिम बंगाल में हिंसाचार का श्रीगणेश यहीं से होता है। धमकी,गाली,बम,क्रांति की गजब खिचडी इस बीच पकी है। इसमें बौद्धिकों ने सुविधानुसार क्रांति और वाम राजनीति को पॉजिटिव तत्व के रुप में छांट लिया लेकिन अन्य चीजों को छोड़ दिया।
     क्रांति या वामराजनीति में गाली,घृणा (पूंजीपति और सामंती तत्त्वों के प्रति घृणा) को इस हद तक विकसित किया गया कि उसने सामाजिक-राजनीतिक संतुलन में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। हमारे अनेक वामपंथी मित्र यह पढ़कर नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है। आप अपने वर्गशत्रु से भी नफरत नहीं कर सकते। लोकतंत्र में सबके लिए स्थान है।अमीर के लिए भी और गरीब के लिए भी। पूंजीपति और बड़े जमींदारों के खिलाफ घृणा का सिलसिला अंततःगाली के मार्ग से गुजरते हुए हिंसा और बम के मार्ग तक गया। इसके कारण पहले निजी हिंसा को वैध बनाया गया,बाद राजनीतिक हिंसा भी वैध हो गयी,फिर पुलिस हिंसा भी वैध मान ली गयी।
    हमलोग अपनी सुविधा से हिंसा में अंतर करने लगे, तेरी हिंसा और मेरी हिंसा में पाप-पुण्य खोजने लगे। अपने दल की हिंसा को हिंसा न मानकर आत्मरक्षा में उठाया कदम मानने लगे।
    जबकि हिंसा तो हिंसा है और वह लोकतंत्र का विलोम है। इसी तरह घृणा तो घृणा है वह सभ्यता और लोकतंत्र का विलोम है। वर्गीय घृणा पैदा करके वोट जुटाए जा सकते हैं, सीटें जीती जा सकती हैं। सत्ता पा सकते हो लेकिन सभ्यता के क्षय को नहीं रोक सकते।
   वाममोर्चा निरंतर अपार बहुमत हासिल करके भी हिंसा को नहीं रोक पाया। इसका प्रधान कारण वही है जिसका मैंने जिक्र किया है। लोकतंत्र में हिंसा,गाली और घृणा की कोई जगह नहीं है। यदि लोकतंत्र के सारथी  हिंसा,गाली और घृणा के रथ पर सवार होकर आएंगे तो लोकतंत्र में सभ्यता के क्षय और हिंसा के विस्तार को रोक नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में वस्तुतः यही हुआ है।
    हिंसा को हर दल ने वैध बनाया,हिंसा की मदद ली और राजनीतिक वैभव का विस्तार किया। यह विलक्षण संयोग है कि नक्सली हिंसा के दमन के नाम पर कांग्रेस ने कुछ साल शासन किया लेकिन हिंसा का कांग्रेस को जो चस्का लगा वह उसे आपातकाल तक ले गया और कांग्रेस में धीरे धीरे अपराधीकरण एक स्वाभाविक फिनोमिना बन गया।
    नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले कांग्रेस के शासकों को हिंसा की राजनीति करते नहीं देखा गया। तेलंगाना आंदोलन अपवाद है। यह भी कह सकते हैं राजनीतिक हिंसाचार की जो परंपरा कांग्रेस ने तेलंगाना आंदोलन (1946-48) ने डाली, वह नक्सलबाडी आंदोलन के दौर में तरुणाई में पहुँची और आपातकाल में पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई। इस समूची प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल के भद्रसमाज में हिंसा और असभ्यता की दीमक प्रवेश कर गयी और आज उससे पूरा राज्य प्रभावित है।
    दुखद बात यह है कि वामदलों ने सभ्यता के क्षय की प्रक्रियाओं की हमेशा अनदेखी की। हिंसा को हिंसा से खत्म करने की रणनीति अपनायी, गाली का जबाव गाली से देने की पद्धति इजाद की,जो साथ नहीं वह वर्गशत्रु। जो साथ छोड़ गया वह वर्गशत्रु। इस रणनीति के परिणाम सामने हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम है सामाजिक अलगाव।  
  वामराजनीति के विकास के दौर में हिंसा कम नहीं हुई बल्कि बढी । बंगाली समाज और ज्यादा असभ्य बना।  वाम,नक्सल,कांग्रेस, टीएमसी आदि सब भूल गए हैं कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। कीचड़ को साफ करने के लिए साफ-स्वच्छ जल चाहिए। हिंसा से हिंसा खत्म नहीं होती, गाली से सभ्यता विकसित नहीं होती। हिंसा को शांति से खत्म किया जा सकता है। गाली को गाली से खत्म नहीं कर सकते,बल्कि सभ्य आचरण से खत्म किया जा सकता है।
  लोकतंत्र में सभ्यता के विकास के लिए लोकतांत्रिक सभ्य पैमानों को अपनाने की जरुरत है। गाली ,हिंसा और बम तो वर्चस्व और हताशा के पैमाने हैं। ये पैमाने लोकतंत्र में अपनाए जाएंगे तो असभ्यता का विकास होगा,समाज और भी जंगलीपन की ओर भागेगा। हम तय करें कि लोकतंत्र में कैसे जीना चाहते हैं ? सभ्यता के पैमानों के आधार जीना चाहते हैं या असभ्यता के पैमानों के आधार पर जीना चाहते हैं?        


बुधवार, 2 नवंबर 2011

माओवाद,आधुनिकतावाद और हिंसाचार





आधुनिकतावाद के दो प्रमुख बाईप्रोडक्ट है सामाजिकहिंसा और माओवाद। आधुनिकतावाद की खूबी है कि उसने हिंसा को सहज ,स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाया है फलतः हिंसा के प्रति घृणा की बजाय उपेक्षा का भाव पैदा हुआ है। हिंसा के हम अभ्यस्त होते चले गए हैं। घरेलू हिसा से लेकर वर्गीय हिंसा तक के व्यापक फलक को देखें तो पाएंगे कि आधुनिकतावाद की आंधी में विकास कम और हिंसा का विस्तार ज्यादा हुआ है। इसमें मीडिया हिंसाचार से लेकर माओवादी हिंसाचार तक का बड़ा दायरा आता है।

आधुनिकतावाद महज कला की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हिंसा से भी जुड़ा फिनोमिना है। यह संयोग की बात है कि भारत में जिस समय आधुनिकतावाद संकटग्रस्त था ठीक उसी समय नक्सलबाड़ी आंदोलन पैदा हुआ।भारत में जिन दिनों दंगे,किसानों की कर्जों के कारण आत्महत्या,औरतों की दहेज-हत्या ,घरेलू हिंसा आदि की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं ठीक उसी दौर में माओवादी संगठनों की हिंसाचार की खबरें भी आई हैं।

विचारधारात्मक सच यह है कि माओवादी विचारधारा बुर्जुआजी के अधूरे सपनों को दिखती है और उनको ही पूरा करने पर जोर देती है। बुर्जुआ समाज में जिस तरह अन्य प्रतिवादी विचारधाराएं सक्रिय हैं वैसे ही माओवाद भी सक्रिय है। मसलन् अविकसित आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वे काम करते हैं और वहीं पर विकास के सवालों को बार-बार विभिन्न रूपों में उठाते हैं। कभी विस्फोट करके,कभी हथियारबंद जंग करके,कभी मुक्तांचलों का निर्माण करके और कभी हडताल करके।



माओवादियों की मांगें व्यवहार में बुर्जुआ विकास से जुड़ी हैं। क्रांति की बातें करते हुए वे अधूरे विकास के सवालों पर रोशनी डालते हैं। सामान्यतौर पर अपने को मार्क्सवाद का असली बारिस कहते हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिककाल में दो विचारधाराओं मार्क्सवाद और उदारतावाद का जन्म हुआ। और दोनों ही मुक्तिकामी विचारधारा का दावा करती हैं। दोनों का लक्ष्य है आधुनिक समाज और आधुनिक मनुष्य का निर्माण करना। जिन समाजों में बुर्जुआ सभ्यता,संस्कृति,आचार-व्यवहार,जीवनशैली और सामाजिक विकास नहीं हुआ है उनमें मार्क्सवाद के मानने वाले विभिन्न राजनीतिक गुटों का पहला लक्ष्य होता है असमानताओं को कम करना। अविकसित क्षेत्रों में विकास और समानता की मांग मूलतः बुर्जुआ मांग है। भूमिसुधार,शिक्षा,स्थानीय जनजातियों के हितों का संरक्षण ,सड़क,पानी,बिजली आदि मांगें मूलतः बुर्जुआ मांगें हैं।

आमतौर पर माओवादी वर्चस्व और विकास के सवालों को उठाते हैं ,खासकर गांवों में सामन्तों,जमींदारों और सूदखोरों के वर्चस्व के सवालों को उठाते हैं और उनसे मुक्ति की मांग करते हैं। वे किसानों-आदिवासियों के हितों के सवालों को उठाते हैं और शहरों में मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग से जुड़े रहते हैं। यह सच है आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विकास नहीं हुआ है। अधूरे विकास की जगह पूर्ण विकास की मांग, अधूरी आजादी की जगह पूरी आजादी की मांग,पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में व्याप्त असमानता की समाप्ति की मांग मूलतः बुर्जुआ फ्रेमवर्क से आगे निकलने नहीं देती।

माओवादियों की भाषा क्रांति,प्रतिवाद,समाजवाद,वर्गसंघर्ष,वर्गीय अन्तर्विरोध,आदिवासी इलाकों लोकतंत्र के हनन,पुलिस उत्पीड़न,हत्या बलात्कार आदि घटनाओं से भरी होती हैं। इस तरह की भाषा और इन घटनाओं से जुड़ी विचारधारा के प्रचार से बुर्जुआ व्यवस्था के विकास में मदद मिलती है। खासकर उन इलाकों में जहां पूंजीपति वर्ग पहुंचा ही नहीं है वहां पर मार्क्सवाद से प्रभावित विभिन्न राजनीतिक दल ,जिनमें माओवादी भी शामिल हैं, लोकतंत्र के विकास के बुनियादी कामों में दिलचस्पी लेते हैं।

जिस तरह का माओवादी संगठनों के जनाधार का विकास नव्य -उदारतावाद के दौर में हुआ है वैसा विकास पहले नहीं हुआ । सन् 1990 के बाद वे जितने आक्रामक बने हैं इतने आक्रामक वे पहले कभी नहीं थे। माओवादी हों या वामदल हों, इन सबकी शक्ति में इजाफा इस बात पर निर्भर करता है कि बुर्जुआ समाज का किस गति से विकास होता है।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन का विकास क्रांति के भावों और विचारों के कारण होता है,लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। क्रांति की विचारधारा मूलतः लोकतंत्र का बायनरी अपोजीशन है। यानी बुर्जुआजी का बायनरी अपोजीशन है। मजदूरवर्ग,बुर्जुआजी अपना विकास करेगा तो उसके अपोजीशन का भी विकास होगा। उस अपोजीशन को संगठित करने वाली ताकतों का भी विकास होगा। यही वजह है कि अभी तक मजदूरवर्ग की मांगे मूलतः बुर्जुआ मांगें ही रही हैं। वे अपनी मांगों के संघर्ष के जरिए बुर्जुआ वातावरण का विकास करते हैं।

मसलन् माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को ही गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही गए हैं जब वहां किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गयी,बाँध बनाया गया,कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते। आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी मांगें क्या हैं ? वे सारी मांगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर ज्यादा जोर देते हैं।

यानी वे "सचेतनता" की बजाय "संरचना" (जमीन)को बचाने पर ज्यादा जोर देते हैं। फलतः "सचेतनता" की बजाय "संरचना" पर ज्यादा वजन पड़ रहा है। बुर्जुआजी का जोर भी "संरचना" को हासिल करने पर है और माओवादियों का भी जमीन को बचाने पर मूल जोर है। वे आदिवासी और ग्रामीण समाज में पूर्व सामंती ,सामंती मूल्यों और सामाजिक शक्तियों के खिलाफ इसके आधार पर कोई विकल्प पैदा नहीं कर सकते। आदिवासियों और किसानों को नए मूल्यों और नई सामाजिक संरचनाओं में रूपान्तरित करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पुराने वर्गों या शोषक वर्गों से मुक्ति का उनके पास एक ही रास्ता है हत्या और हिंसा। यह शत्रु को खत्म करने का प्राचीनमार्ग है। वर्गशत्रु को जमीनी और मूल्यों की जंग में परास्त करने की बजाय हिंसा के जरिए खत्म करने की पद्धति अंततः उन्हें सामंती और पूर्व-सामंती वर्गों के खिलाफ संघर्ष से विमुख करती है। इस तरह की हिंसा से माओवादियों को तत्काल मदद तो मिलती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पद्धति उनके लिए मददगार साबित नहीं हुई है।

जिन इलाकों में माओवादी वर्चस्व है वहां वे सभी काम माओवादी करने लगते हैं जो जमींदार-सूदखोर और लठैत किया करते थे।यानी वे अपने विरोधी वर्ग के अवगुणों को स्वयं अपना लेते हैं। सूदखोरों-जमींदारों को जान से मारना एक जमाने में उनके लिए गुरिल्ला संघर्ष का महत्वपूर्ण अस्त्र था।वे मानते थे इससे गांवों में जमींदारों-सूदखोरों का वर्चस्व खत्म होगा और आम किसान की सत्ता स्थापित होगी। माओवादियों की इस रणनीति के कारण अनेक जमींदार-सूदखोर इलाका छोड़कर चले गए,जो गांवों में रह गए वे मार दिए गए या उन्होंने माओवादियों के सामने समर्पण कर दिया।

माओवादियों की आरंभ में नक्सलवादी के रूप में पहचान थी ।वे गुरिल्ला पद्धति से संघर्ष में विश्वास करते थे,इसी आधार मुक्तांचलों का निर्माण और वर्गशत्रु की हत्या के काम को अंजाम दिया गया। उस समय किसानों और मजदूरों को संगठनबद्ध करने के काम को गौण माना गया। व्यापक शिरकत वाले जनांदोलन की पद्धति को अनुपयुक्त कहा गया। लेकिन कालान्तर में इस पद्धति में सुधार करते हुए माओवादियों ने विभिन्न इलाकों में अलग-अलग नामों से संगठन बनाए या बनवाए और उनके बहाने आदिवासियों-ग्रामीणों आदि को एकजुट करने,मीटिंग करने,रैली करने ,वर्गशत्रु की हत्या करने या बेदखल करने की पद्धति पर जोर दिया गया। गुरिल्ला युद्ध की पद्धति के नाम पर हत्याएं करने के काम को संघर्ष का सर्वोच्च रास्ता माना गया। वे मानते हैं कि इससे सामंती और सत्ता के दलालों के वर्चस्व को खत्म करने में मदद मिलती है।गांवों में किसानों को राजनीतिक शक्ति मिलती है। असल में यह अतिवामपंथ है जो वस्तुगत परिस्थितियों को आत्मगत अधीरभाव से देखता है। कुछ समाजविज्ञानी इसे 'अराजक-आतंकी सिद्धांत' और 'पेटी बुर्जुआ अराजकता' के नाम से भी पुकारते हैं। माओवादियों का मानना है कि उनके द्वारा वर्गशत्रु का सफाया करने की प्रक्रिया के गर्भ से समाज में एक नए मनुष्य का जन्म होगा। यह ऐसा मनुष्य होगा जो मौत से नहीं डरेगा और सभी किस्म के निजी स्वार्थ के विचारों से मुक्त होगा।

माओवादी राजनीति के उभार के कारण नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक के दौरान हुए विकास की सीमाएं बड़ी तेजी से आम लोगों के सामने उजागर हुई हैं। माओवादियों ने बुर्जुआ विकास की तमाम बातों की महानरीय-मध्यवर्गीय सीमाओं को उजागर किया है। आज 136 जिलों में माओवादी सक्रिय हैं और इस सक्रियता का बड़ा कारण है सामाजिक-आर्थिक असमानता का 63 सालों के विकास के बावजूद बने रहना।

माओवादियों ने अंधाधुंध विकास की नव्य-उदारतावादी नीतियों का देश के विभिन्न इलाकों में जनांदोलन खड़ा करके प्रतिवाद किया है ।अनेक स्थानों पर उन्होंने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। इस क्रम में कारपोरेट मीडिया में मीडिया उनका महिमामंडन भी हुआ है और माओवादियों ने गरीबी-असमानता और विस्थापन के सवालों पर सरलीकृत फार्मूलों का जमकर दुरूपयोग किया है। इसमें गरीबी को उन्होंने अपनी हिंसा के लिए वैध अस्त्र ठहराया है।



माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। उनके खिलाफ जनता को गोलबंद करना चाहिए। सवाल यह है कि क्या माओवादी हिंसा के समय जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।

दूसरी बात यह है कि जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने के लिए पुलिस दमन,आदिवासी उत्पीड़न, आदिवासियों का आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों आदिवासियों की प्राकृतिक भौतिक संपदा को राज्य के द्वारा बेचे जाने,आदिवासियों के विस्थापन आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को बुनियादी तौर पर नष्ट कर देते हैं। ऐसा करके वे भय और निष्क्रियता की सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि उनके साथ जनता है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से कांग्रेस, माकपा, भाजपा आदि दलों के लोग चुनाव के जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनकी चुनाव बहिष्कार की अपील का कोई असर नहीं पड़ता।

मीडिया के प्रचार ने कारपोरेट पूंजी निवेश का जिस तरह पारायण किया है और इसके विध्वंसात्मक आयाम पर पर्दादारी की है, उसे गायब किया है, उससे दर्शकीय नजरिया बनाने में मदद मिली है। प्रचार के जरिए हर चीज का जबाब बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। बाजार,पूंजी निवेश, परवर्ती पूंजीवाद को वस्तुगत बनाने के चक्कर में मीडिया यह भूल ही गया कि वह जनता को सूचना संपन्न नहीं सूचना विपन्न बना रहा है। हमसे यह छिपाया गया है कि पूंजीवाद आखिरकार किन परिस्थितियों में काम करता है।

माओवादी संगठनों के संदर्भ में बुनियादी सवाल यह है कि क्या मौजूदा हिंसाचार जायज, तार्किक,वैध,और न्यायपूर्ण है ? क्या इस हिंसाचार से भारत के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? क्या माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहा है ? माओवादी संगठन अपने प्रभाव वाले इलाकों में जबरिया धन वसूली कर रहे हैं ।

दूसरा सवाल यह है कि माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? कौन हैं वे देशी-विदेशी संगठन और लोग जो इतने बड़े पैमाने पर माओवादी गुरिल्लाओं को पैसा भेज रहे हैं ?

माओवादियों की बात मानें तो आदिवासी अतिदरिद्र हैं। और वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ? हिन्दुस्तान की गरीब जनता और खासकर आदिवासियों को यह जानने का हक है कि माओवादियों के पास धन कहां से आता है ?और किन मदों में खर्च होता है ?

माओवादियों के संदर्भ में तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत की बहुलता को माओवादियों के राज्य में कोई जगह मिलेगी ? आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है ऐसा ही व्यवहार साम्प्रदायिक,फंड़ामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठन भी करते हैं।

आज भारत में ऐसे दल हैं जो क्रांति लाना चाहते हैं। सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्षधर हैं। लेकिन वे भारत के बहुलतावादी समाज और राजनीतिक तानेबाने को मानते हैं और उसकी रक्षा के लिए समय-समय पर अपने दलीय स्वार्थ का भी उन्होंने त्याग किया है। उनकी लोकतंत्र और भारत के संविधान में आस्था है। भारत के दोनों कम्युनिस्ट दल इसके प्रमाण हैं।

समस्या यह है कि माओवादी बहुलतावाद के प्रति सहिष्णु क्यों नहीं हैं ? यदि सहिष्णु हैं तो वह सहिष्णुता व्यवहार में नजर क्यों नहीं आती ? ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने से लेकर दनादन मौत के घाट उतारने तक’ का माओवादियों का राजनीतिक सफर इस बात की ओर संकेत कर रहता है कि उनके यहां बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है।

क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि माओवादी शासन होगा और उसमें सभी धर्मों की आजादी बरकरार रहेगी ? सभी दलों की राजनीतिक स्वाधीनता बची रहेगी ? सभी वर्गों में भाईचारा रहेगा ? औरतों ,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक-धार्मिक और भाषायी स्वाधीनता बरकरार रहेगी ? उनके राज्य में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी सुरक्षित और स्वतंत्रभाव से रहेंगे ? और उन्हें अभी जितनी आजादी बुर्जुआ संविधान के तहत मिली हुई है उससे भी ज्यादा स्वाधीनता और अधिकार प्राप्त होंगे ?

माओवाद के संदर्भ में चौथा सवाल यह है कि क्या माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है ? जी नहीं ,माओवादी संगठन ही नहीं सभी रंगत के क्रांतिकारी संगठन मिल जाएं तो भी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में नहीं है।माकपा और वाममोर्चा लंबे समय से पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और केरल में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हैं लेकिन सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन आज भी उनके पक्ष में नहीं हैं जबकि उन्हें जनता में बड़ी मात्रा में जनसमर्थन प्राप्त है। इसकी तुलना में माओवादियों का किसी भी राज्य में राजनीतिक वर्चस्व नहीं है,सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दिवा-स्वप्न है। माओवादी संगठन किसान,आदिवासी और क्रांति की कितनी ही बातें करें भारत के वैचारिक, राजनीतिक, भाषायी,धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को नतमस्क होकर स्वीकार करना होगा। बहुलतावाद के इन रूपों को अस्वीकार करने के कारण सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सभी देशों में समाजवाद गिर गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर से विभिन्न रंगत के पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी,अपराधी, राज्य की संपत्ति के लुटेरे पूंजीपतियों का समूह रातों-रात पैदा हो गया था। समाजवादी व्यवस्था के पराभव के साथ ही हठात् कम्युनिस्टों के अंदर से ऐसे तत्व बाहर आए हैं जिनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। आज पूर्व समाजवादी देशों की जनता का कम्युनिस्टों पर विश्वास नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि वैचारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र वास्तविकता हैं। इनको हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

माओवादी राजनीति का राजनीतिक बहुलतावाद से बैर है।राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र में आस्था नहीं है ऐसे में बहुलतावाद का क्या होगा ? क्या माओवाद के नाम पर भारत के लोग बहुआयामी बहुलतावाद की बलि देने को तैयार हैं ?

एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? इस कत्लेआम का उनके प्रतिवादी संघर्षों और किसान-आदिवासियों में नव्य-उदारतावादजनित विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष के एजेण्डे गहरा संबंध है।

आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। वे राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं।

आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?

माओवादियों ने हाल वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनायी थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गयी है।

नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने का संकेत है।

माकपा और वामदलों ने नव्यउदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाय लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य-उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख्याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए ?

माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है नव्य-उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

गुलामी का अस्त्र है राजनीतिक हिंसा


ममता बनर्जी की आंधी का असर सीधे वाम मोर्चा और खासकर माकपा नेताओं जैसे बुद्धदेव भट्टाचार्य और गौतम देव के टीवी टॉक शो और टीवी खबरों में साफ देखा जा सकता है। वे स्वीकार कर रहे हैं कि उनके दल से गलतियां हुई हैं। वे जानते हैं उनके रणबाँकुरे जो करते रहे हैं वह भारत के संविधान और कानून की खुली अवहेलना है। मसलन् ,राजनीतिक हिंसा के सवाल को ही लिया जाए। राजनीतिक हिंसा के सवाल पर पक्ष -विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा रहा है। दोनों ही पक्ष मान रहे हैं कि विगत 35 सालों में राजनीतिक हिंसा में हजारों लोग मारे गए हैं। मारे गए लोगों की संख्या को लेकर विवाद हो सकता है। तेरे-मेरे मारे गए लोगों की संख्या को लेकर विवाद हो सकता है। लेकिन राजनीतिक हिंसा होती रही है और निर्दोष लोगों की जानें गयी हैं। इसके बारे में कोई विवाद नहीं है। सवाल यह है कि हिंसा के प्रति क्या रूख हो ? क्या हिंसा का महिमामंडन करना सही है ? माकपा नेताओं की मुश्किल यह है कि वे हिंसा में अपने दल की भूमिका को आलोचनात्मक ढ़ंग से नहीं देख रहे हैं। पश्चिम बंगाल में माकपा निर्मित हिंसा के कई रूप हैं। पहला रूप है वाचिक हिंसा का, दूसरा रूप है कायिक हिंसा का और तीसरा रूप है अधिकारहनन का। वाचिक हिंसा के तहत वे अपने विरोधी पर तरह-तरह के सामाजिक दबाब पैदा करते हैं जिससे वह अपना मुँह बंद रखे। वे ऐसा वातावरण पैदा करते हैं कि मुखरित व्यक्ति महसूस करे कि उसने अगर माकपा नेताओं की बात नहीं मानी तो उसका भविष्य अंधकारमय है। मुखरित व्यक्ति यदि सरकारी नौकर है तो उसे अकल्पनीय परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वे मुखरित व्यक्ति का बहिष्कार करते हैं,चरित्रहनन करते हैं, दैनंदिन अपमान और उपेक्षा करते हैं। यह अहर्निश मानसिक उत्पीड़न है। माकपा के लोग जानते हैं कि अफवाह उडाना, चरित्रहनन करना ये फासिस्ट हथकंडे हैं। वाचिक हिंसा का दायरा बहुत व्यापक है और इस व्यापक वातावरण के खिलाफ बुद्धदेव भट्टाचार्य से लेकर गौतमदेव तक ,विमान बसु से लेकर रज्जाक मुल्ला तक किसी भी नेता को सरेआम मुँह खोलते किसी ने नहीं देखा है। वाचिक हिंसा का सर्वव्यापी रूप है लोकल यूनियन । आमतौर पर यूनियनों और संगठनों का काम होता है अधिकारों के लिए लड़ना। लेकिन पश्चिम बंगास में यूनियन का काम अधिकारों के लिए लड़ना नहीं है । बल्कि इनका काम है सदस्यों की निगरानी करना। उन्हें नियंत्रित करना। वे किसी अन्य विचारधारा के संगठन में न चले जाएँ,इसके लिए दबाब पैदा करना।
    पश्चिम बंगाल के हिंसाचार का दूसरा रूप है अन्य को जेनुइन राजनीतिक गतिविधियां करने से वंचित करना। इसके लिए साम,दाम,दण्ड,भेद सभी हथकंडे अपनाए जाते हैं। मसलन ममता बनर्जी को बेवजह माकपा कार्यकर्ता मीटिंगस्थल या घटनास्थल पर जाने से रास्ते में रोकते रहे हैं और टीवी चैनलों पर बैठे नेतागण इस तरह की अलोकतांत्रिक हरकतों की निंदा करना तो दूर की बात है उसकी हिमायत करते रहे हैं। सिंगूर-नंदीग्राम की घटनाओं के लाइव कवरेज और खासकर टीवी चैनलों द्वारा ममता बनर्जी के एक्शन के अहर्निश लाइव कवरेज के कारण इस तरह की चीजें लगातार एक्सपोज हुई हैं और राज्य प्रशासन इस मामले में मूकदर्शक रहा है। कभी किसी माकपा नेता ने इसके लिए माफी नहीं मांगी। यह एक तरह से हिंसा का महिमामंडन है।
     यह संभव है राज्य प्रशासन किसी खास कारण से किसी नेता को घटनास्थल पर न जाने दे। किसी खास वजह से 144 धारा लगाकर स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करे। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि धारा 144 को राजनीतिक उत्पीडन और हिंसा का अस्त्र बना दिया जाए और 1 साल और 2 साल तक धारा 144 लागू कर दी जाए और सारी राजनीतिक गतिविधियां ठप्प कर दी जाएं और सिर्फ माकपा की राजनीतिक गतिविधियां चलें। लालगढ़ से लेकर सिंगूर-नंदीग्राम के घटनाक्रम में यह देखा गया कि धारा 144 का भयानक राजनीतिक उत्पीड़न के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल हुआ है। सामान्य राजनीतिक जुलूसों-रैलियों आदि तक को करने की इजाजत नहीं दी गयी। नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के समय बार-बार ममता बनर्जी को माकपा सदस्यों ने सरेआम रोका और अपमानित किया। इस तरह की घटनाएं जो राजनीतिक हक छीनती हों वे हिंसा की कोटि में ही आती है। इसी तरह मंगलकोट में कांग्रेसी विधायकों और नेताओं को आतंकित करके दौड़ाना भी हिसा की कोटि में आता है। इस प्रसंग में जर्मनी के प्रसिद्ध मार्क्सवादी सिद्धान्तकार-आलोचक वाल्टर बेंजामिन ने लिखा है हिंसा पर कानून और न्याय के नजरिए से विचार करना चाहिए। हिंसा के मामले में माकपा ने न्याय और कानून का पालन नहीं किया है। मसलन् ममता बनर्जी को अकारण राजनीतिक रैली में जाने से रोकना उनके बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का हनन है । विगत 35 सालों में इस तरह की घटनाओं के संदर्भ में राज्य प्रशासन ने माकपा के किसी भी कार्यकर्ता को कभी गिरफ्तार तक नहीं किया । कम से कम नंदीग्राम-सिंगूर-मंगलकोट की घटनाओं में विपक्षी नेताओं के एक्शन को बाधित करने वाले लोगों को राज्य प्रशासन गिरफ्तार करके एक संदेश दे सकता था। लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। वाचिक हिंसा हो या कायिक हिंसा,ये दोनों किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। लोकतंत्र में इस तरह की हिंसा को रोकना राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी है। हिंसा में कोई मारा जाए तो उसके लिए आर्थिक सहायता राशि देना कानूनन राज्य की जिम्मेदारी है। क्योंकि हिसा रोकने में राज्य असमर्थ रहा है । यह मानवाधिकार कानूनों के अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन में आता है । भारत में ये अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन लागू है। इसके ही आधार पर नंदीग्राम और नेताई के पीडि़तों को हाईकोर्ट के आदेश से आर्थिक सहायता राशि मिली है। कायदे से राज्य को घटना होने के साथ ही स्वतः ही आर्थिक सहायता राशि घोषित करके देनी चाहिए थी। उन तमाम हिंसा के शिकार लोगों को सहायता राशि राज्य को देनी चाहिए जिन्हें राजनीतिक हिंसाचार से बचाने में राज्य सरकार असमर्थ रही है। नई राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह विगत 35 सालों में राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों के लिए आर्थिक मदद की घोषणा करे।यह काम दलीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर होना चाहिए।








सोमवार, 10 जनवरी 2011

स्वजनहाराओं का क्रंदन और गूंगा मुख्यमंत्री

    लालगढ़ में स्वजनहाराओं का क्रंदन और बर्बरता चरम पर पहुँच गए हैं। राज्य में स्वजनहाराओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। लगता है इसबार का चुनाव स्वजनहाराओं के क्रंदन के प्रतिवाद में लड़ा जाएगा। खबरों के अनुसार लालगढ़ में 7 मार्च को बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है। इसमें अब तक 7 लोग मारे गए हैं और 18 घायल हुए हैं। यह सर्वहारा संरक्षकों की पराजय का संकेत है। लज्जा की बात है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को लालगढ़ की 7 मार्च की हिंसा ने उद्वेलित नहीं किया है। वे 24 घंटे बाद बोले ‘ निंदा’ करता हूँ। उनकी ‘निंदा’ में वह जोर और आक्रोश नहीं था जो एक मुख्यमत्री की भाषा में होना चाहिए। लगता है उन्हें हिंसा में मारे गए लोगों की खबरें बेचैन नहीं करतीं ? यदि बैचैनी होती और स्वजनहाराओं की पीड़ा का उन्हें एहसास होता तो वे खबर सुनकर दौड़कर लालगढ़ क्यों नहीं गए ? लालगढ़ की हिंसा की खबर सुनकर ममता जा सकती है, कांग्रेस के नेता जा सकते हैं,मुख्यमंत्री क्यों नहीं गए ? मुख्यमंत्री घायलों से मिलने कोलकाता में अस्पताल भी नहीं गए ? मुख्यमंत्री अच्छी तरह जानते हैं जिन पर गोली चलाई गई और जो मारे गए हैं वे माकपा के हमदर्द हैं जबकि मारने वाले माकपा के हथियारबंद कॉमरेड हैं। कम से कम माकपा के स्वजनों के नाते तो मुख्यमंत्री को कठोर भाषा बोलना चाहिए। माकपा को यह सोचना चाहिए कि यह कैसी पार्टी तैयार हुई है जो अपने ही कॉमरेडों और हमदर्दों को गोलियों से भून रही है। यह कैसा माओवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रतिवाद है जिसमें गांव वालों को प्रति परिवार एक बच्चा हथियारबंद प्रशिक्षण के लिए देने के लिए कहा जा रहा है। क्या यह वही माकपा है जो एक जमाने में हथियारबंद जंग का रास्ता छोड़ चुकी थी। लालगढ़ में 7 मार्च को हुआ हत्याकांड भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन की महान त्रासद और अपमानजनक घटना है। माकपा को जान लेना चाहिए सशस्त्र जंग का मार्ग उन्हें संसद की गलियों से निकालकर जंगली बीहड़ों में ले जाएगा। माकपा को पहल करके उन अपराधियों को पुलिस को सौंपना चाहिए जो इस हत्याकांड में शामिल हैं। साथ ही उन्हें पार्टी से भी निकाला जाना चाहिए। माकपा ने अपनी इमेज रक्षा के लिए पीसीपीए के एक नेता दिलीप हांसदा का बयान माकपा नियंत्रित चैनलों '24 घंटा ’और ‘आकाश' पर शनिवार को दिखाया जिसमें पीसीपीए ने 7 मार्च की हिंसा की जिम्मेदारी ली है। यह नकली बयान है। 
    मुख्यमंत्री जानते हैं इस तरह की हिंसा होने पर पीडितों को आर्थिक और मेडीकल मदद देना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उल्लेखनीय है नंदीग्राम की घटना के बाद राज्य सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार कमीशन ने पीडितों को सहायता राशि देने का आदेश दिया था। लालगढ़ की ताजा घटना के प्रसंग में भी यही किया जाना चाहिए।
   सवाल उठता है मुख्यमंत्री इतने हृदयहीन कैसे हो गए ? हिंसा की वे दो टूक ढ़ंग से निंदा क्यों नहीं कर पाते ? असल में,मन में विभाजन रखकर ,विचारधाराओं में बांटकर , तेरे-मेरे में बांटकर वाममोर्चे ने पश्चिम बंगाल में जो राजनीति की है उसका दुष्परिणाम है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य हिंसा में मारे गए लोगों के प्रति समानभाव से अपनी सामान्य भाषा में निंदा का भावबोध भी खो चुके हैं।
   असल में मुख्यमंत्री की हृदयहीनता का स्रोत है ‘इलाकादखल’ की राजनीति। ‘इलाका दखल’ की राजनीति का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है,लोकतंत्र से कोई संबंध नहीं है, यह विशुद्ध रूप से फासिस्ट राजनीति है। लालगढ़ के जितने भी एपीसोड अभी तक टीवी पर आए हैं वे एक ही संदेश देते हैं कि लालगढ़ में इलाका दखल का पागलपन थमा नहीं है। इसके आतंक ने लालगढ़ की समूची जनता को घेर लिया है। माओवादी बर्बरता से बचाने के नाम पर जनता माकपा की बर्बरता में घिर चुकी है। लालगढ़ के समूचे मसले का संबंध न तो जमीन से है और न सुरक्षा से है और न औद्योगिकीकरण से है बल्कि इसका संबंध इलाकादखल से है। यह स्वजनों के खिलाफ अपराधियों की खुली जंग है। यह माकपा के अंदर पैदा हुए कुलीन अहंकारी मार्क्सवाद की पराजय और बर्बरता की अभिव्यक्ति हैं। माकपा के कुलीन अहंकारी जानते हैं कि मार्क्सवाद शॉर्टकट नहीं है। इसे बयानों ,आदेशों,जनतांत्रिक संरचनाओं और आम जनता के दिल को तोड़कर लागू नहीं किया जा सकता। मार्क्सवाद दखल करने का शास्त्र नहीं है। यह दिल जीतने और सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है। माकपा वाले जितना दखल करेंगे उतने बर्बर बनेंगे। अमानवीय बनेंगे। दखलतंत्र का लोकतंत्र ,मार्क्सवाद,उदारतावाद से कोई संबंध नहीं है। दखल करना बर्बरता है। इसे चाहे जो भी करे। 
शक्ति प्रदर्शन और जनतंत्र के नाम पर ''इलाका दखल'' का रास्ता अहर्निश वाचिक-कायिक हिंसा का रास्ता है। ''इलाका दखल'' के लिए हिंसाचार और दादागिरी जरूरी है। इसके विरोधी और समर्थक दोनों एक ही साथ नायक -खलनायक हैं।
     ‘इलाका दखल’ असल में भय की राजनीति है। भय की राजनीति जनतांत्रिक नहीं होती। भय में स्वाधीनताबोध संभव नहीं है। भय को समर्पण और पलायन की जरूरत होती है। भय में रहना चाहते हैं तो समर्पण कीजिए और भय से मुक्त रहना चाहते हैं तो पलायन कीजिए अथवा भय का सामना कीजिए, अपने को गोलबंद कीजिए। लालगढ़ में आज जो एकता सतह पर दिखाई दे रही है वह भयजनित एकता है। भयजनित एकता टिकाऊ नहीं होती। गरीबों के बीच में राजनीति करने के लिए सिर्फ हंगामे से काम चलने वाला नहीं है। गरीब आरंभ में यदि हंगामे को पहचान नहीं पाया है तो इसका यह निष्कर्ष नहीं निकालना चहिए कि वह आगे भी नहीं पहचानेगा। गरीब को अपने दोस्त और दुश्मन की मध्यवर्गीय नेताओं से ज्यादा गहरी पहचान होती है। 

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

क्रांति ,भूख और माओवाद

       मैं पिछले 35 सालों से क्रांतिकारियों का साहित्य पढ़ रहा हूँ। इनमें कई रंगत के क्रांतिकारी रहे हैं जिनको पढ़ता रहा हूँ। खासकर माओवादियों और उनके हमदर्दों का किसानों के हितों को लेकर हल्ला इन दिनों ज्यादा मच रहा है। उसके बारे में और उनकी किसानचेतना के बारे में कुछ बातें कहना चाहता हूँ।
    माओवादी विचारकों को इस सवाल का जबाब देना चाहिए क्या भारत के किसान क्रांति को तैयार हैं ? क्या किसान में क्रांतिचेतना होती है ? क्या माओवाद प्रभावित इलाकों में क्रांति दस्तक दे रही है ? क्या क्रांति को अपने विरोधी दल के कार्यकर्ताओं की हत्या करके संपन्न किया जा सकता है ?
    क्या आदिवासी और किसानों की चेतना इतनी विकसित हो गयी है कि वे क्रांति के लिए जान तक देने को तैयार हैं ? यदि ऐसा ही था तो हजारों किसानों ने माओवाद प्रभावित आंध्र प्रदेश में आत्महत्याएं क्यों कीं ? हम जानना चाहते हैं माओवादी संगठन कैसी विचारधारा प्रसारित कर रहे हैं जिससे मरने,आत्महत्या करने या हत्या करने से रोक क्यों नहीं पाते ?
    माओवादी और उनके समर्थक विचारक किसान और आदिवासी समस्या के बारे में बुनियादी रूप से गलत सोच रहे हैं। भारत का किसान और आदिवासी क्रांतिचेतना से लैस नहीं है। आदिवासी या किसान वर्ग आधुनिककाल में क्रांति का नेतृत्व नहीं कर सकता। यह क्रांतिकारी वर्ग नहीं है।
    भारत के माओवाद प्रभावित आदिवासी-किसान इलाकों में क्रांति की लहर नहीं बह रही है। बल्कि हिंसा और अपराध की लहर चल रही है। एक तरफ कारपोरेट घरानों के द्वारा संचालित संगठित हिंसाचार और अपराध हैं। दूसरी ओर माओवाद के नाम पर अपराध हो रहे हैं। माओवादी जब किसी की हत्या करते हैं तो वे क्रांति की सेवा नहीं करते बल्कि अपराध करते हैं। क्रांति कभी अपराध के कंधों पर सवार होकर नहीं आती बल्कि जनता की लहर पर सवार होकर आती है। क्रांतिचेतना का अपराधचेतना से कोई संबंध नहीं है।
     आदिवासी और किसान आज सबसे ज्यादा असंगठित हैं। असंगठित लोग क्रांति नहीं कर सकते। क्रांति के लिए जनता का संगठित होना अनिवार्य शर्त है। आदिवासी और किसान सक्रिय और संगठित हों और उनके शत्रु कमजोर और असंगठित हों तब कहीं जाकर माओवादी राजनीति राष्ट्रीय दबाब पैदा कर सकती हैं।  लेकिन आज स्थितियां यह हैं कि माओवादियों की तुलना में उनके विरोधी ज्यादा संगठित हैं,उनके पास जनाधार या जनसमर्थन है। सत्ता उनके साथ है। सामाजिक शक्ति संतुलन उनके साथ है।  माओवादियों का शत्रु ढुलमुल नहीं है बल्कि पक्के इरादों वाला है । पुख्ता जमीन पर खड़ा है । ऐसे में माओवादियों को अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने में सफलता मुश्किल से ही मिल पाएगी।
     माओवादियों के हिंसाचार से एक बात साफ निकल रही है कि वे क्रांति को अभी समझे नहीं हैं। किसान और आदिवासी के साथ वे तादात्म्य नहीं बिठा पाए हैं। माओवादियों की हरकतों और लेखन को देखकर नहीं लगता कि वे सही ढ़ंग से आदिवासियों और किसानों का मनोविज्ञान समझ पाए हैं। उन्हें आदिवासियों-किसानों की समस्या और चेतना का वास्तविक ज्ञान नहीं है।
    स्वामी सहजानंद सरस्वती  ने किसानचेतना के जिस पिछड़े पहलू की चर्चा की थी,उस पर जरा गौर करें । मसलन् ‘‘गाय-भैंसों को लीजिए। यदि उन्हें खूब दाना, घास, खल्ली, भूसा न खिलाइए,   पानी न पिलाइए, फिर भी दुहने का बर्तन लेकर जाइए तो क्या होगा ? दूध मिलेगा ? वे दुहने देंगी ? दूध तो नहीं, उसकी जगह उनकी लत्ती (लात की चोट) मिलेगी और बर्तन भी फूटेगा। यदि थोड़ा-बहुत उसमें दूध रहा तो वह भी जाएगा। इतना ही नहीं। उन्हें खूब खिला-पिला कर रखिये। मगर रात में उनके बैठने-लोटने की जगह ठीक न हो, उसमें कीचड़ और पानी हो तो क्या होगा? अगर यह भी ठीक हो, मगर मच्छरों ने रात-भर काट खाया और आपने उनसे बचने का कोई यत्न नहीं किया, तो भी क्या वे दूध देंगी ? वही उछलकूद और वही लात दूध की जगह। अगर आपने यह सब भी किया। मगर दूहने के पहले एक लाठी कसके जमा दी तो? ऐसी दशा में दूध की आशा आप कर ही नहीं सकते। आपको उनकी सींगों की चोट का सामना करना और जख्मी होना भले ही पड़े।’’

    ‘‘मगर किसान को तो जरा देखिए। खाने बिना मर रहा है। तन पर न मांस है,   न चमड़ा। हड्डियाँ भी नहीं हैं। मालूम होता है कमाते-कमाते घिस गईं। जठरानल ने,   प्रचण्ड क्षुधा ज्वाला ने सबको जला दिया है। फिर भी लगान दिए चला जा रहा है,   चौकीदारी समय पर अदा करता ही है, साहूजी का पावना सूद दर सूद के साथ एक का दस पैसे-पैसे चुकता करता ही है। वह तो सरकार की, जमींदार की और साहूकार की दुनिया की, कामधेनु है। वही घी, दूध, गेहूँ, चावल सबके लिए मुहय्या करता है। मगर कभी इस कामधेनु की चिन्ता सरकार ने, जमींदार ने, या दुनिया ने, मतवाली और अन्‍धी दुनिया ने,  की है, कि क्या खाया-पिया इसने, या कतई खाया-पिया भी कि नहीं?

    ‘‘फिक्र करें भी क्यों, जब इस कामधेनु को खुद इसकी,  अपने खाने-पीने की परवाह नहीं? जब कि यह बिना खाये-पिये ही दूध देने को बराबर तैयार है, तो कौन नादान इसकी परवाह करे और इसे खिलाये-पिलाये। यदि ये शोषक,  ये जमींदार वगैरह,  कभी पूछने तक नहीं आया तुमने खाया-पिया भी है या क्या खाया है, तो इसमें उनका दोष ही क्या? इतना ही नहीं इसे खूब पीटते और मारते-मारते दम निकाल लेते हैं,  जैसा कि बराबर ही होता है,  और जेल में भी डाल देते हैं। फिर भी यह तो ऐसी बेहूदी कामधेनु है कि पूरा दूध दिये चली जाती है। नहीं-नहीं, पीटने से और पीटने के डर से तो और भी देती है। फिर वे क्यों न मौज करें और इसकी परवाह क्यों न छोड़ दें? वह इसके जैसे नादान और नालायक-पागल थोड़े ही हैं कि इस बला में फँसें। उनने तो अच्छा बेवकूफ फाँसा है।’’

    ‘‘एक बात और। जब फसल खेतों में लगती है, तैयार होकर खलिहान में जमा की जाती है, या घर लायी जाती है तो चूहे, पक्षी, कीड़े-मकोड़े और राह चलते या चोर वगैरह उसे जरूर ही खाते हैं। आप हजारों कोशिश करें। मगर उन्हें रोक नहीं सकते। वह अपना हिस्सा ले ही जाते हैं। यही नहीं कि केवल पेट-भर लेते हैं। आगे के लिए जमा भी करते हैं। चूहों की तो खास बात है जमा करने की। ताकि जब फसल के दिन न हों तब खाएँ-पिएँ। ऐसा क्यों होता है। क्यों चूहे और दूसरे जानवरों को रोका नहीं जा सकता? क्यों घूमने-फिरने वाले जानवर भी खा जाते हैं? इसीलिए न कि वह खेत के मालिक से, किसान से पूछने नहीं जाते, आज्ञा लेने नहीं जाते कि खाएँ? वे आरजू-मिन्नत भी नहीं करते कि दया करके खाने दीजिए। वे कोई भी नियम-कानून या अपना-पराया वाला सवाल नहीं जानते। वह तो एक ही मन्‍त्र और एक ही सिद्धान्त जानते हैं कि पेट भर लो। जो सामने आए वही हमारा है। उदर में रख लो और उसी में से आगे के लिए भी प्रबन्ध कर लो। अगर वे पूछने जाते या आरजू करते तो क्या कोई खेत वाला उन्हें खाने देता। वे खाने में आगा-पीछा करते, मेरा हक है या नहीं,   यह मेरा है या और का आदि बातें भी यदि सोचते तो भी भूखे ही मरते। क्योंकि इतने ही में खेतिहर आकर रोक देता। इसलिए पेट के सवाल में वे उसे जैसे हो भर लेने के अलावे कुछ भी नहीं जानते। इसलिए मौज भी करते हैं।’’

    ‘‘मगर किसान? इसे तो हजार फिक्र पड़ी है। यह तो लाख बार आगा-पीछा करता है। सामने आया घी, दूध और गेहूँ, चावल पेट में रखने के बजाय जमा करता है कि मालिक को देना है, साहूकार को देना है। मेरा हक नहीं है कि खाऊँ, यही मानता है। कानून और व्यवस्था के वाहियात पचड़े में पड़ जाता है। सैकड़ों तरह के खयाल और भय उसकी हाथ-मुँह और उसकी जबान रोक देते हैं। वह जमा करने में लग जाता है। फलत: जैसे मधुमक्षिका की जमा की हुई शहद गैरों के हाथ लगती है, न कि उसके या उसके बाल-बच्चों के; ठीक वही हालत किसान की भी होती है। पैदा करता और जमा करता है वह। खाते हैं दूसरे लोग। अगर चूहों और पशु-पक्षियों से भी खाने-पीने की यह अक्ल वह सीख लेता तो उसकी यह दुर्दशा नहीं होती। उसका उद्धार हो जाता।

    जो खाने-पीने के सामान स्वयं किसान पैदा करता है उसे ही मुफ्तखोर जमींदार,   धनी और अधिकारी वर्ग खाते हैं। उनके लिए कहीं आसमान से कोई दूसरी चीज नहीं आती और न दूसरा कोई उनके लिए ये वस्तुएँ पैदा ही करता है। ताज्जुब है कि हजार इच्छा और प्रचण्ड भूख के रहते हुए भी ये नालायक किसान उनके लिए रख छोड़ता है उनके पास पहुँचाता है और खुद परिवार के साथ भूखों मरता है। यदि कहा जाए कि गंगा की धारा में एक प्यासा हुआ आदमी है, तो लोग आश्चर्य करेंगे। बात पर विश्वास न करेंगे। मगर अपार दूध, घी और गेहूँ, चावल पैदा करने वाले किसान का भूखों मरना और क्या है यदि गंगा के बीच प्यासे मरना नहीं है? घास खाने वाले जानवर के बच्चे के सामने घास रख दीजिए और उस जानवर को कहीं भूखा छोड़ दीजिए। आप देखेंगे कि अपने बच्चे के सामने की सब घास खा जाएगा और यह परवाह कतई न करेगा कि बच्चा भूखा है, वह बच्चा जिसकी रक्षा के लिए वह परेशान रहता और बड़े प्रेम से जिसे चाटता है। जिसे अपना दूध पिलाता है और शत्रुओं के आक्रमण से बचाता है। उसकी यह हरकत यदि किसान को इतना भी सिखा सकती कि अपने भूखे रह के गैरों के पेट भरने की कोशिश ठीक नहीं तो उसका निस्तार हो जाता। अपना पेट भर लेना सबसे प्रधान और पहला काम है। अगर वह इतना ही समझ जाता तो उसका कल्याण हो जाता। दुनिया में अनायास ही क्रान्ति हो जाती।’’

   











सोमवार, 13 सितंबर 2010

ब्रह्मवादिनी अरूंधती राय का माओवादी ब्रह्म

       इन दिनों फंड़ामेंटलिस्टों के बयानों की मीडिया में बयार बह रही है। हर दल के पास एक या एकाधिक फंडामेंटलिस्ट हैं। वे विचारों के वाहक और प्रचारक होते हैं। उसी तरह भारत के स्वयंसेवी संगठनों और माओवादियों की फंड़ामेंटलिस्ट हैं अरूंधती राय । नामी हस्ती हैं। उन्हें विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त है। अरूंधती राय की बुनियादी मुश्किल यह है कि वे रहती हिन्दुस्तान में हैं लेकिन अभी तक इस देश को जानती नहीं हैं। उनके लिखे और बोले पर कुर्बान होने वाले मरजीवड़ों की भारत में कमी नहीं है। वे भारत के बुद्धिजीवियों की पेज थ्री संस्कृति की नायिका हैं। सैलीबरेटी हैं। उनके बयान पर मीडिया ठुमकता है। तथाकथित स्वतंत्रचेता वाम बुद्धिजीवी बलिहारी रहते हैं और भक्तों की तरह वाह-वाह करते रहते हैं।
    हाल ही में अरूंधती राय ने करन थापर को सीएनएन-आईबीएन के लिए दिए साक्षात्कार में कई विलक्षण बातें कही हैं जिससे इस बात का अंदाजा लगता है कि आखिर स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी भारत के बारे में क्या सोच रहे हैं।
राय ने कहा- I don't think there is anything revolutionary about killing a person that is in custody. I have made a statement where I said it was as bad as the police killing Azad, as they did, in a fake encounter in Andhra. But, I actually shy away from this atrocity-based analysis that's coming out of our TV screens these days because a part of it is meant for you to lose the big picture about what is this war about, who wants the war? Who needs the war?
सवाल यह है कि माओवादी हिंसा की इतने ठंड़े शब्दों में चर्चा क्यों ? वे माओवादियों के निरंतर हिंसा करने के बावजूद उनसे जुड़ी हुई क्यों हैं ? दूसरी बात यह कि माओवादियों के खिलाफ वे सशस्त्रबलों की कार्रवाई को ‘युद्ध’ कह रही हैं। इससे वे ‘युद्ध’ की परिभाषा ही बदले दे रही हैं। माओवादियों के खिलाफ देश में कोई ‘युद्ध’ नहीं चल रहा सिर्फ आधे-अधूरे मन से केन्द्रीय सशस्त्रबलों का ऑपरेशन चल रहा है।
     अरूंधती राय की वाक-कला की खूबी है वह माओवादी हिंसा को समर्थन दे रही हैं लेकिन शब्दों का जाल फैलाकर। मूल सामयिक प्रसंग से ध्यान हटाकर। अरूंधती राय का तर्कशास्त्र पुराने पंडितों जैसा है वे किसी भी व्यक्ति की वर्तमान दशा को व्याख्यायित करने के लिए हमेशा पुनर्जन्म और भाग्य या ग्रहदशा का बहाने रूप में इस्तेमाल करते थे अरूंधती राय भी यही करती हैं। वे बार-बार माओवादी हिंसा को सरकार के कर्मों का फल बताती हैं। चूंकि सरकार ने आदिवासियों के साथ अन्याय किया है फलतः  इन इलाकों में हिंसा भड़क उठी है। केन्द्र सरकार अन्याय नहीं करती तो आदिवासी इलाकों में माओवादी हिंसा नहीं भड़कती। अरूंधती के तर्कों का तरीका टिपिकल मध्यकालीन गीता के तर्कों से मिलता-जुलता है। जिसमें सब कुछ कर्मों के फल का भोग बताया गया है। सरकार ने आदिवासियों को सताया है,उत्पीडित किया है ,विस्थापित किया है अतः माओवादियों की प्रतिवाद में हिंसा जायज है। सरकार जैसे कर्म करेगी उसे वैसा ही फल भोगना होगा। अरूंधती राय ने समूचे तर्कशास्त्र में कर्मफल के सिद्धांत को बड़े ही सलीके से लपेटकर पेश किया है और यही वह विचारधारात्मक प्रस्थान बिंदु है जहां पर अरूंधती राय माओवाद के नाम पर मध्यकालीन विचारधारात्मक दार्शनिक नजरिए का प्रतिपादन कर रही हैं। यह बुनियादी तौर पर फंडामेंटलिज्म है। इसका वैज्ञानिक चिंतन पद्धति से कोई लेना-देना नहीं है।
   अरूंधती राय का मानना है कि भारतीय राज्य आक्रामक है । अरूंधती राय जानती हैं कि राज्य हमेशा आक्रामक रहा है। समाजवाद से लेकर पूंजीवाद तक सभी में राज्य आक्रामक है। सवाल उठता है क्या माओवादी शासन में राज्य नहीं होगा ? यदि राज्य नहीं होगा तो देश चलाएगा कौन ? यदि राज्य होगा तो कृपया माओवादियों से पूछकर बताएं कि माओवादी शासन में राज्य कैसा होगा ? क्या राज्य के पास दंड का अधिकार नहीं होगा ? क्या राज्य अपना वर्चस्व त्याग देगा ? जी नहीं,माओवादी शासन में राज्य होगा और फासिस्ट राज्य होगा। वहां स्वाधीनता,धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र का का बुर्जुआ वातावरण भी नहीं होगा। उस राज्य में अरूंधती-मेधा पाटेकर को भी बोलने की आजादी नहीं होगी। कम से कम बुर्जुआ राज्य में आम आदमी को इतना स्पेस तो अभी मिला हुआ है कि वह संघर्ष कर सके। सरेआम रो सके। प्रतिवाद कर सके। मन हो तो माओवादियों की तरह अंधाधुंध हत्याएं कर सके और बाद में सरकार से बातचीत के बहाने अपने सभी हत्याकाण्डों में शामिल हत्यारों को दण्डित होने से बचा ले और उन्हें वीरपुंगव का खिताब दे।
      जिस तरह आदिवासियों के प्रति अन्याय करने के लिए राज्य दोषी है उसी तरह हिंसा करने,हत्याएं करने, ससार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने, आम लोगों की सामान्य जिंदगी को अस्त-व्यस्त करने के लिए माओवादियों को दण्डित किया जाना चाहिए। यह कैसे हो सकता है कि राज्य को हिंसा के जिम्मेदार ठहराएं और माओवादियों को निर्दोष। यह तो वैसे ही हुआ कि जैसे पंडित करते हैं आम आदमी से कहते हैं तुम फलां दिन बैगन मत खाना दोष होता है और घर में आकर वही पण्डित उसी दिन बैगन बनाकर खाता है।
    तर्क का अरूंधतीशास्त्र फंड़ामेंटलिस्टों के दार्शनिक पैराडाइम में चल रहा है। इससे आधुनिक समाज और आधुनिक नजरिए का जन्म नहीं होगा बल्कि इससे फंडामेंटलिस्ट नजरिए को बल मिलता है। मजेदार बात यह है कि अरूंधती राय कह रही हैं कि भारत के सभी प्रतिवादी समूह संविधान के असली रखवाले हैं। उल्लेखनीय है माओवादियों का संविधान में कोई विश्वास ही नहीं है तो वे रखवाले कैसे हो सकते हैं ? आप ही देखें करन थापर ने क्या पूछा था और अरूंधती राय ने क्या था।
Arundhati Roy: I see the government absolutely, as the major aggressor. As far as the Maoists are concerned, of course, their ideology is an ideology of overthrowing the Indian state with violence. However, I don't believe that if the Indian state was a just state, if ordinary people had some minor hope for justice, the Maoists would just be a marginal group of militants with no popular appeal.
Karan Thapar: So the Maoists get support and strength from the fact that you don't believe that the Indian state is just.
Arundhati Roy: Let me tell you, forget the Maoists. Every resistance movement, armed or unarmed, and the Maoists today are fighting to implement the Constitution, and the government is vandalising it.
Karan Thapar: So the real constitutionalists are the Maoists and the real breakers of the Constitution is the government?
Arundhati Roy: Not only the Maoists, all resistance groups.
इससे बड़ा झूठ क्या हो सकता है कि माओवादी संगठन भारत के संविधान को लागू कराना चाहते हैं। माओवादी भारत के संविधान को लागू कराना चाहते हैं तो वे क्या राजनीतिक बहुलतावाद को समाप्त करके यह काम करना चाहते हैं ? जो माओवादी इन दिनों हिंसा में मगन हैं वे भारत के संविधान में कोई आस्खा नहीं रखते। यह बात उनके पार्टी कार्यक्रम और एक्शन में दिखती है। अरूंधती राय बताएं कि माओवादियों ने भारत के संविधान के प्रति,उसकी रक्षा और उसे सटीक रूप में लागू करने के बारे में कहां लिखा है ?
   अरूंधती राय की तर्कप्रणाली पुराने ब्रह्मवादियों जैसी है वे माओवादियों को ब्रह्मवादियों की तरह देख रही हैं,मान रही हैं और प्रचारित कर रही हैं। पुराने ब्रह्मवादी मानते थे ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या उसी तर्ज पर अरूंधती कह रही हैं माओवादी सत्य हैं और जगत मिथ्या है। इसे कहते हैं बहुराष्ट्रीय फंडिंग से उपजे ज्ञान में फंडामेंटलिज्म।
   अरूंधती राय और उनके जैसे विचारकों का तर्क यह है कि वे माओवादियों के प्रतिवाद के साथ हैं लेकिन भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकने और उसकी जगह सर्वहारा के अधिनायकवाद के लक्ष्य के साथ नहीं हैं। यह तो वैसे ही हुआ गुड़ खाएं और गुलगुलों से बैर करें। माओवादी कत्लेआम करके जो तथाकथित क्रांतिकारी जंग लड़ रहे हैं उसका मूल लक्ष्य किंतु आदिवासी-किसान नहीं हैं बल्कि सर्वहारा का अधिनायकत्व स्थापित करना है और भारत का संविधान इस समझ को खारिज करता है। ऐसे में अरूंधती राय ही बताएं कि माओवादी किस तरह भारत के संविधान के असली रखवाले हैं ?
    अरूंधती राय जैसे लोग जब ब्रह्मवादियों की तरह सोचेंगे और देखेंगे तो उन्हें उलटी चीजें नजर आएंगी। वे सीधी चीज को उलटा और उलटी चीज को सीधा देखती रही हैं। यह विचारधारात्मक विभ्रम है। वे वास्तव को अवास्तव और अवास्तव को वास्तव बनाने की विचारधारात्मक कला में माहिर हैं। यही वजह है उन्हें भारत का राज्य उन्हें  ‘‘corporate, Hindu, satellite state’’ नजर आता है। ब्रह्मवादियों की तरह कहती हैं - If I say that I support the Maoists' desire to overthrow the Indian State, I would be saying that I am a Maoist. But I am not a Maoist. यानी ब्रह्मवादियों की तरह ‘है भी और नहीं भी।’ की तर्ज पर उन्होंने कहा माओवादी हूँ भी नहीं भी हूँ।   
   

बहुलतावाद के शत्रु हैं माओवादी

       भारत में एक तबका है जो माओवादियों के नृशंस कर्मों पर इन दिनों फिदा है और आए दिन मीडिया और इंटरनेट में माओवादियों के पक्ष में ‘जय हो-जय हो’ करता रहता है। माओवाद के प्रति जाने-अनजाने हो रही इस जय-जयकार में असली सवालों पर बातें नहीं हो रही हैं।
    पहला सवाल यह है कि माओवादी संगठनों का मौजूदा हिंसाचार क्या जायज है, तार्किक है,वैध है,न्यायपूर्ण है ? क्या इस हिंसाचार से भारत के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? क्या माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहा है ? क्या माओवादी संगठन अपने प्रभाव वाले इलाकों में जबरिया धन वसूली कर रहे हैं या नहीं ? माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? कौन हैं वे देशी-विदेशी संगठन और लोग जो इतने बड़े पैमाने पर माओवादी गुरिल्लाओं को पैसा भेज रहे हैं ? माओवादी जबाब दें।  
   माओवादियों की बात मानें तो आदिवासी अतिदरिद्र हैं और वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ? माओवादी यदि पारदर्शिता में विश्वास करते हैं तो उन्हें अपने आय-व्यय को सबको बताना चाहिए।
    हिन्दुस्तान की गरीब जनता और खासकर आदिवासियों यह  जानने का पूरा हक है कि माओवादियों के पास धन कहां से आता है ?और किन मदों में खर्च होता है ? भारत में सच्चा-झूठा हिसाब प्रत्येक दल को देना होता है। माओवादियों को कम से कम अपने उन बैंक खातों के बारे में बताना चाहिए जो बेनामी ढ़ंग से भारत में हैं या भारत के बाहर हैं। यदि नहीं हैं तो आखिर कोषाध्यक्ष कौन है ?
   आय के स्रोत न बताने के मामले में एक ही संगठन है जो माओवादियों जैसा है वह है आरएसएस। वह भी अपनी आय का स्रोत नहीं बताता। लेकिन भाजपा कम से कम बताती है। विश्व हिन्दू परिषद का भी हिसाब आयकर विभाग वालों ने राममंदिर निर्माण के लिए वसूले गए धन के चक्कर खोला है।
    माओवादियों के पक्ष में जो लोग राय रखते हैं वे सोचें और बताएं कि आखिर भारत के बहुलतावादी राजनीतिक विचारधारात्मक,धार्मिक और जातीय स्वभाव के बारे में उनकी क्या राय है ? क्या भारत की बहुलता को माओवादियों के राज्य में कोई जगह मिलेगी ? आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है ऐसा ही व्यवहार साम्प्रदायिक,फंड़ामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठन भी करते हैं। सवाल यह है बहुलतावाद के प्रसंग में इनमें और माओवादियों में अंतर क्या है ?
    आज भारत में ऐसे दल हैं जो क्रांति लाना चाहते हैं। सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्षधर हैं। लेकिन वे भारत के बहुलतावादी समाज और राजनीतिक तानेबाने को मानते हैं और उसकी रक्षा के लिए समय-समय पर अपने दलीय स्वार्थ का भी उन्होंने त्याग किया है। उनकी लोकतंत्र और भारत के संविधान में आस्था है। इनमें भारत के दोनों कम्युनिस्ट दल इसके प्रमाण हैं।
     समस्या यह है कि माओवादी बहुलतावाद के प्रति सहिष्णु क्यों नहीं हैं ? यदि सहिष्णु हैं तो वह सहिष्णुता व्यवहार में नजर क्यों नहीं आती ? ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने से लेकर दनादन मौत के घाट उतारने तक’ का माओवादियों का राजनीतिक सफर इस बात की ओर संकेत कर रहता है कि उनके यहां बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है।
    क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि माओवादी शासन होगा और उसमें सभी धर्मों की आजादी बरकरार रहेगी ? सभी दलों की राजनीतिक स्वाधीनता बची रहेगी ? सभी वर्गों में भाईचारा रहेगा ? औरतों ,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक-धार्मिक और भाषायी स्वाधीनता बरकरार रहेगी ? उनके राज्य में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी सुरक्षित और स्वतंत्रभाव से रहेंगे ? और उन्हें अभी जितनी आजादी बुर्जुआ संविधान के तहत मिली हुई है उससे भी ज्यादा स्वाधीनता और अधिकार प्राप्त होंगे ?
    माओवाद को भारत की मुख्य राजनीतिक शक्ति मानने वाले जबाव दें कि क्या भारत का सामाजिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में है ? क्या माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है ? जी नहीं ,माओवादी संगठन ही नहीं सभी रंगत के क्रांतिकारी संगठन मिल जाएं तो भी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दूर की बात है। 136 जिलों में सभी रंगत के वाम संगठनों और माओवादी मिल ताएं तो भी बुर्जुआ शक्ति संतुलन को जरा सा भी बदलने की स्थिति में नहीं हैं।
    माकपा और वाममोर्चा लंबे समय से पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और केरल में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हैं लेकिन सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन आज भी उनके पक्ष में नहीं हैं जबकि उन्हें जनता में बड़ी मात्रा में जनसमर्थन प्राप्त है। इसकी तुलना में माओवादियों का किसी भी राज्य में राजनीतिक वर्चस्व नहीं है,सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दिवा-स्वप्न है। ऐसी स्थिति में एक ही निष्कर्ष निकलता है कि माओवादी संगठन भारत के स्वाभाविक छंद से भिन्न रास्ते पर हैं। यह ऐसा रास्ता है जिसमें फासीवादी अधिनायकवाद होगा।
     माओवादी संगठन किसान,आदिवासी और क्रांति की कितनी ही बातें करें भारत के वैचारिक, राजनीतिक, भाषायी,धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को नतमस्क होकर स्वीकार करना होगा। बहुलतावाद के इन रूपों को अस्वीकार करने के कारण सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सभी देशों में समाजवाद गिर गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर से विभिन्न रंगत के पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी,अपराधी, राज्य की संपत्ति के लुटेरे पूंजीपतियों का समूह रातों-रात पैदा हो गया था। ये सारे लोग समाजवाद और कम्युनिस्ट पार्टी का मुखौटा लगाए बैठे थे।
        समाजवादी व्यवस्था के पराभव के साथ ही हठात् कम्युनिस्टों के अंदर से ऐसे तत्व बाहर आए हैं जिनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। आज पूर्व समाजवादी देशों की जनता का कम्युनिस्टों पर विश्वास कम हुआ है।
     कहने का अर्थ यह है कि वैचारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को आज के हालात में सिर्फ बुर्जुआ लोकतंत्र में ही बचा सकते हैं। समाजवाद या माओवादी राजनीति का राजनीतिक बहुलतावाद से बैर है। ऐसी अवस्था में महाश्वेता देवी-अरूंधती राय-मेधा पाटेकर आदि से सवाल है कि माओवाद का भारत के राजनीतिक बहुलतावाद से भावी संबंध किस रूप में देखती हैं ?  
      राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र में आस्था नहीं है ऐसे में बहुलतावाद का क्या होगा ? क्या माओवाद के नाम पर भारत के लोग बहुआयामी बहुलतावाद की बलि देने को तैयार हैं ?
    एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? इस कत्लेआम  का उनके प्रतिवादी संघर्षों और किसान-आदिवासियों में नव्य-उदारतावादजनित विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष के एजेण्डे गहरा संबंध है। आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना।  हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं।
    वे राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं। माओवादी भी लालगढ़ में पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के बैनरतले आगामी विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं और इस दिशा में तैयारियां चल रही हैं।
    आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?
    एक और समस्या है वह यह कि माओवादियों ने हाल वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनायी थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गयी।
       नव्य-उदारतावाद की आर्थिकमंदी के साथ ही विदाई हो चुकी है। नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का  संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने के कारण हुआ है।
    माकपा और वामदलों ने नव्यउदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाए लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य-उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख्याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून भी लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए ?
   माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं।
     नव्य-उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है। इसने माओवादियों की कुण्ठा को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है और वे अब सिर्फ हत्याएं कर रहे हैं। उनकी इस तरह की हरकतों ने आम जनता की तकलीफें और घेराबंदी बढ़ा दी है। फलतः आज आदिवासी इलाकों में वे किसी भी किस्म की राजनीतिक गतिविधि को पसंद नहीं कर रहे हैं और सिर्फ हत्याएं कर रहे हैं।        
  
    
   







रविवार, 12 सितंबर 2010

माफिया तंत्र खड़ा करना चाहते हैं माओवादी



    शशिकांत जी, माकपा ने सिंगूर और नंदीग्राम में जो किया ओर उनके प्रतिवाद में विपक्ष ने जो किया उस पर मैं अपनी किताब में विस्तार से लिख चुका हूँ। नंदीग्राम-सिंगूर के प्रसंग में , जमीन अधिग्रहण के माकपा और पश्चिम बंगाल सरकार के तरीके से भी मेरी असहमति है।
आज सवाल माओवादी राजनीति का नहीं है। माओवादी हिंसाचार का है। राजनीति के नाम पर बहस करने के नाम पर गोल-गोल बहस करने से हम कहीं नहीं पहुँचेंगे। माओवादी जेनुइन सवाल उठाने के नाम पर फ्रॉड कर रहे हैं। हिंसा कर रहे हैं। किसी भी कीमत पर हिंसा को समर्थन नहीं दिया जा सकता चाहे वह माकपा की हिंसा हो या माओवादियों की। थोड़ा सत्य जान लें तो बेहतर होगा, पश्चिम बंगाल सरकार ने नंदीग्राम-सिंगूर विवाद के बाद सारे राज्य में कहीं पर जमीन अधिग्रहण नहीं किया है। कहीं पर भी किसानों की जमीन नहीं ली गयी है। बल्कि इसके उलटे सैंकड़ों एकड़ नई जमीन किसानों और खेतमजदूरों में बांटी गयी है।
दूसरी बात यह कि माओवाद प्रभावित किस इलाके में भूमि सुधार लागू किए गए हैं ? माओवादी यदि किसानों के बड़े हितैषी हैं तो उन्होंने भूमि सुधार को अपने संघर्ष का प्रधान एजेण्डा क्यों नहीं बनाया ?माओवादी और उनके साथी-हमदर्द अनेक मसलों पर हंगामा और हिंसाचार कर रहे हैं लेकिन भूमिसुधार पर नहीं। जरा बताइए उनका छत्तीसगढ़ से लेकर आंध्र तक पहला एजेणडा क्या है ?
माओवादी संगठन किसान हितों की रक्षा के नाम पर जमींदारों की जमीन बचाने का खेल खेल रहे हैं। माओवादियों को क्रांति से कम कुछ नहीं चाहिए भूमि सुधार को वे मानते नहीं और क्रांति होने वाली नहीं है ऐसे में जमींदारों के हितों और जमीनी स्वामित्व की वे रक्षा नहीं कर रहे हैं तो क्या कर रहे हैं। माकपा की अनेक नीतियों की आलोचना की जा सकती है हम भी करते हैं लेकिन माकपा और वाममोर्चे की एक बड़ी उपलब्धि है भूमिसुधार कार्यक्रम को लागू करना और उसके तहत लाखों किसानों को जमीन मिली है। कम से कम यह वास्तविकता सभी मानते हैं और आप भी मानें। सवाल यह है नहीं कि माकपा विधानसभा चुनाव में हारती है या जीतती है। सवाल यह है गांव के किसानों में लागू किए गए भूमिसुधारों को तृणमूल कांग्रेस कैसे देखती है ,क्योंकि माओवादियों से लेकर कांग्रेस तक,महाश्वेता देवी से लेकर आप जैसे लोग सभी तृणमूल की जीत पर आशा टिकाए बैठे हैं।
बंधुवर यह खुला सच है कि तृणमूल कांग्रेस नव्य उदारनीतियों की अंधी अनुयायी फासीवादी संरचना वाला ,सबसे भ्रष्ट दल है। उसका गांव में प्रधान राजनीतिक आधार उजड़े हुए जमींदार हैं। ये जमींदार उसके लिए रसद जुटाने का काम कर रहे हैं और उन जमींदारों को अपनी जमीन वापस चाहिए। तृणमूल कांग्रेस इन जमींदारों के आधार पर ही गांवों में आ रही है।
सवाल यह है कि माओवादी संगठनों, महाश्वेता देवी और उनकी भक्तमंडली जो आए दिन नव्य उदारवाद का विरोध करती है वह तृणमूल कांग्रेस जैसी अंध नव्यउदारतावाद समर्थक पार्टी के साथ खड़ी किस आधार पर है ? शशिकांत बाबू माओवाद को पश्चिम बंगाल में एक पंचायत की सीट पर विजय मिलना असंभव है ,प्रमुख विपक्ष तो ख्बाब की बातें हैं। जान लीजिए जो नक्सलबाड़ी है वहां पर उनका कोई नामलेवा नहीं है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के बिना वाममोर्चे का विरोध करना संभव नहीं है उसी तरह पश्चिम बंगाल की विपक्ष की राजनीति का निर्धारक तत्व माओवादी नहीं हैं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस है। आप हमें बताइए ममता बनर्जी का कांग्रेस की किस नीति से मतभेद है। ममता और कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर जब कोई नीतिगत मतभंद ही नहीं है तो प्रकारांतर से ममता का समर्थन करके माओवादी किसका समर्थन कर रहे हैं ? ध्यान रहे लालगढ़ में ममता ने माओवादियों की मदद से रैली की। वेदांत प्रकल्प को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की हरी झंड़ी न मिलने पर राहुल गांधी ने वेदांत प्रकल्प के पास जो तथाकथित मीटिंग की उसमें इस इलाके के माओवादी नेता मंच पर थे उन्होंने वहां भाषण भी दिया। बंधुवर अखबारों की खबरें यह भी बताती हैं कि मेधापाटकर और सोनिया गांधी की बैठक भी कुछ समय पहले हुई है। आखिर माओभक्त और कांग्रेस और उनके अनुयायी दलों में क्या खिचड़ी पक रही है ?

सत्य के अहेरी बाबू, आपको लालगढ़ में आंदोलन किस चश्मे से दिख गया। लालगढ़ में कहीं पर कोई जमीन अधिग्रहण नहीं हुआ है। जिंदल के कारखाने के लिए जमीन सालबनी में दी गयी है। लगता है माओ-माओ करते करते लालगढ़ का भूगोल ही भूल गए बंधुवर। रही बात व्यक्तिगत नौकरी की तो बंधुवर ब्लॉग उसकी जगह नहीं है।
यह बताओ माओवाद की हिमायत में गाली के अलावा क्या जानते हो। हत्या और गाली की भाषा सिर्फ असभ्य लोग बोलते हैं और व्यक्तिगत हमले कमजोर लोग करते हैं। बेकसूरों को मौत के घाट उतारकर उसके लिए नए-नए आवरण क्यों खोज रहे हैं माओवादी और उनके हमदर्द ।
माओवादी हिंसा वास्तव हिंसा है यह अपराध है। इस हिंसा में शामिल सभी अपराधियों को दण्डित किया जाना चाहिए। जिंदल के लिए जिस सालबनी इलाके में जमीन ली गयी है। वहां के निवासियों की रजामंदी से ली गयी है और यह बंजर-पथरीली जमीन है। उस इलाके के किसी भी बाशिंदे ने इस जमीन अधिग्रहण का विरोध नहीं किया था। जिंदल के कारखाने के लिए एक बीघा भी उपजाऊ जमीन नहीं दी गयी है। किसी किसान को जमीन से बेदखल नहीं किया गया है।
शशिकांत बाबू माओवाद राष्ट्रीय विपक्ष नहीं राष्ट्रीय विपत्ति है। विपत्ति और विपक्ष में अंतर होता है। माओवादियों को अपने जनाधार पर इतना ही भरोसा है तो एक बात बताओ आदिवासी इलाकों में चुनाव के समय लोग उनकी मतदान बहिष्कार की अपील की अनसुनी करके वोट देने क्यों जाते हैं ? ऐसा क्यों है किआदिवासी इलाकों या वे जिन इलाकों में सालों से क्रांति का बिगुल बजा रहे हैं वहां से माकपा,भाजपा,कांग्रेस के सांसद-विधायक चुनकर आते हैं। थोडा माओवादियों पर कम और आम जनता पर विश्वास करना सीखें बंधु। भारत की गरीब जनता अच्छी तरह जानती है कि माओवाद से किसी का भला होने वाला नहीं है। माओवाद के नाम पर आप जो कुछ देखकर रहे हैं यह प्रायोजित हिंसाचार है ,समानान्तर अवैध व्यवस्था खड़ा करने की माफिया राजनीति है।
(मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर चल रही बहस में लिखी टिप्पणियां)



























विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...