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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

वे 27साल और कलकत्ते का हिन्दी छंद


आज से 27 साल पहले कलकत्ते में मेरी शिक्षक के रूप में पहली और आखिरी पक्की नौकरी लगी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 22अप्रैल 1989 को प्रवक्ता के रूप में मैंने नौकरी आरंभ की।बाद में सन् 1993 में रीडर और 2001 में प्रोफेसर बना। जिस समय नौकरी आरंभ की थी तो मेरे पास 2शोध डिग्रियां थीं,उनके शोध –प्रबंध थे,वे अप्रकाशित थे।जेएनयू में पढ़ने और छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के कारण सारे देश में कमोबेश प्रगतिशील खेमे से जुड़े लोग मुझे जानते थे।मैं शुरू से ही रिजर्व प्रकृति का रहा हूँ।कोई बोलता है तो बोलता हूं,हलो करता है तो हलो करता हूँ,अधिकतम समय घर पर रहना और पढ़ना-लिखना,यही मेरी दिनचर्या रही।इस चक्कर में कलकत्ते में 27साल तक रहने के बाद भी मैं न तो बहुत सारे लोगों को नहीं जानता और न मेरी मित्रता है।

मैं जब दिल्ली में जेएनयू में पढ़ता था तो 1979 से 1987 के बीच में मेरा अधिकतर समय जेएनयू कैम्पस में ही गुजरा,दिल्ली के लेखकों में बहुत कम आना जाना होता था,जब कभी जनवादी लेखक संघ के ऑफिस जाता तो वहां लेखकों से मुलाकात हो जाती थी,बातें हो जाती थीं।उससे ज्यादा लेखकों से मिलने का मौका मुझे नहीं मिला।कलकत्ता आया तो मेरे मन में दो लोगों से मिलने की इच्छा थी वे हैं सत्यजित राय और उत्पल दत्त।इन दोनों से मैं इनके घर जाकर मिला और बातें कीं।इनमें उत्पल दत्त से दो बार मिला।बाकी बंगला बुद्धिजीवियों से गणतांत्रिक लेखक-शिल्पी संघ के दो-तीन कार्यक्रमों में सामान्य शिष्टाचार के नाते मुलाकात जरूर हुई। चूंकि मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,इस नाते लोकसभा-विधानसभा चुनावों के समय 1989 से 2005 तक मैंने वाममोर्चे और माकपा की चुनावी सभाओं में जमकर हिस्सा लिया और उसी के बहाने पश्चिम बंगाल को करीब से गैर-कम्युनिस्ट की नजर से देखा।माकपा की चुनाव सभाओं में अधिकतर दलितों-मुसलमानों और हिन्दीभाषी बस्तियों में सभाएं करने जाता था।इसके कारण इन समुदायों के जीवन को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। इसके अलावा जनवादी लेखक संघ और पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी की गतिविधियों में भी हिस्सा लेता रहा,क्योंकि इन दोनो में एक दौर में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहा था। यही ले-देकर अपना 27 साल का राजनीतिक-सामाजिक लेखा-जोखा है।मेरी इस दौरान किसी भी नेता ,मंत्री आदि से कोई मित्रता नहीं हो पायी।जबकि मैं बहुत सारे मंत्रियों-नेताओं आदि को जानता था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में मैंने जब पढ़ाना आरंभ किया तो उस समय मेरे दो लक्ष्य थे,पहला था मीडिया को एकदम नए नजरिए से देखा और लिखा जाए जिससे हिन्दी में मासमीडिया के पठन-पाठन को बदला जाए,उस समय यह लग रहा था कि यह बड़ा क्षेत्र है जो आने वाले दौर में अकादमिक और सामाजिक तौर पर बहुत गर्म रहेगा।इसी चीज को मद्देनजर रखते हुए मीडिया पर नियोजित ढ़ंग से काम आरंभ किया।खासकर मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र,संरचना और विचारधारा के सवालों को 1960 के बाद सारी दुनिया में पैदा हुए वामपंथी विचारकों के विचारों की रोशनी में विश्लेषित करने की कोशिश की,संभवतः पहलीबार हिन्दी को मीडिया में वाम विचारकों का परिचय मेरी किताबों के माध्यम से हुआ।किताबें कब और कैसे लिखी गयीं इन पर बाद में कभी विस्तार से लिखूँगा।

यह एक विलक्षण संयोग है कि मैंने मीडिया पर जितना भी लिखा निरूद्देश्य लिखा,किसी पाठ्यक्रम के लिए नहीं लिखा,मैंने जिन विषयों पर लिखा वे विषय पाठ्यक्रम में कहीं पर भी पढ़ाए नहीं जाते थे, लेकिन बाद में किताब बाजार में आने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों के मीडिया पाठ्यक्रम बदले गए और आज स्थिति तुलनात्मक तौर पर बहुत बेहतर है।संतोष की बात है मेरी सभी किताबें बिना किसी प्रचार के बिकी हैं,एक किताब को छोड़कर कोई किताब सरकारी खरीद में नहीं ली गयी,सारी किताबें छात्रों-शिक्षकों और पाठकों ने खरीदीं और मुझे संतोष दिया।

मैंने रॉयल्टी के लिए लेखन आरंभ नहीं किया।बल्कि यह कहना सही होगा कि किताब लिखने में मेरे पैसे ज्यादा खर्च हुए,संतोष यह था कोई किताब मैंने अपने पैसे नहीं छपवाई,प्रकाशक को जैसे उचित लगा उसने किताबें बेचीं,मैंने कभी हिसाब नहीं मांगा,उसने मन मर्जी से जो दे दिया वह मैंने ले लिया।क्योंकि मुझे बाजार की हकीकत का अंदाजा है। बाजार का सत्य यह है कि किताब की रायल्टी से मेरा एक महिने का खर्चा नहीं उठ सकता।मैंने फिर भी किताबें लिखीं ,क्योंकि यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी का अंग है।लेखन को मैं लाइफ लाइन मानता हूँ। जो लिखता नहीं है वह मर जाता है।सन् 1989 में कोई किताब नहीं थी,आज तकरीबन 50 किताबें हैं।यही ले-देकर मेरा सबसे बड़ा सुख है।यही मेरा संतति-सुख भी है।यह पिछले 27साल की सामान्य गतिविधि का लेखा-जोखा है।

मेरा दूसरा लक्ष्य था विभाग के सहकर्मियों के साथ न्यूनतम मतभेद रखकर काम किया जाय।मैं जब कोलकाता आया था तो मेरा बाहरी व्यक्ति के रूप में,पार्टी कैडर के रूप में जमकर प्रचार किया गया, बहुत ही विपरीत माहौल था।आज भी है। संभवतःबंगाल में हिन्दी में मैं पहला पार्टी मेम्बर था जिसकी नियुक्ति हुई थी।उस समय माकपा के सारे देश के विश्वविद्यालयों में चंद शिक्षक थे जो पार्टी मेम्बर थे।मेरे नौकरी जॉयन के करने के साथ ही स्थानीय अखबारों में खूब उलटा-पुलटा छपवाया गया,इसकी कहानियां बाद में फिर कभी लिखूँगा।लेकिन यह सच है कि मैंने 27 साल एकदम विपरीत माहौल में काम किया ।मैंने कभी सहकर्मियों के साथ संवाद बंद नहीं किया । साथ में काम करना है तो इतना स्पेस छोड़ना होगा कि सहकर्मी अपने मन की कर सकें।कुल मिलाकर विभाग में दो बार विभाग की अध्यक्षता पूरे समय रही ,इसके अलावा कार्यवाहक अध्यक्ष का काम मुझे लेक्चरर के रूप में ही मिल गया जो कि वि.वि. में थोड़ा विरल है।मैं अपने 27 साल के कार्यकाल में कभी किसी भी काम से वीसी से नहीं मिला।मेरी प्रकृति है मैं अधिकारियों से दूर रहता हूँ। मुझे अपना काम पसंद है अधिकारियों से मिलना-जुलना,उनकी गुडबुक में रहना,चमचागिरी करना यह मेरी प्रकृति में नहीं है। मैंने इसकी कीमत भी दी,लेकिन कीमत बहुत कम है।मेरा मानना है एक शिक्षक को अपना स्वाभिमान और निजता की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए।

मैंने अपनी 27 साल की नौकरी में एक नियमित शिक्षक के रूप में काम किया,इसका मुझे फल मिला,छात्रों और शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिला।मैंने जब नौकरी आरंभ की उस समय विष्णुकांत शास्त्री,पीएन सिंह,शंभुनाथ पढा रहे थे,चन्द्रा पाडेय ने मेरे साथ ही नौकरी आरंभ की इस विभाग में।बाद में अमरनाथजी आए, उसके बाद सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी ने विभाग में सहकर्मी के रूप में काम करना शुरू किया।इस समय अमरनाथ ,सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी साथ काम कर रहे हैं।इन सभी को बहुत शुक्रिया।यही 27 साल की कहानी है।





शनिवार, 3 सितंबर 2016

एक शिक्षक के नोट्सः आत्मकथ्य

        मैंने जब सन् 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर काम करना शुरू किया यहां का हिन्दी विभाग और यहां काम कर रहे शिक्षकों के पढ़ाने की परंपरा को समझना सबसे पहली चुनौती थी।सामान्य तौर पर विद्यार्थियों की पढ़ने-पढ़ाने की आदत बनाने में विभाग की सामूहिक जिम्मेदारी होती है।पढ़ाने की दूसरी बड़ी चुनौती छात्र-छात्राओं की अकादमिक अभिरूचियों को जानना था। कक्षा में मुझे हिन्दी साहित्य का इतिहास, संस्कृत काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र पढ़ाना था।बाद में हिन्दी पत्रकारिता पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गयी।

मैं जब पहलीबार अप्रैल1989 में कक्षा में गया तो विद्यार्थियों से पूछा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल या हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहासग्रंथ पढ़े या देखे हैं,तो कक्षा में सबने कहा न तो देखे हैं और न पढ़े हैं। यह मेरा पहला अनुभव था।मैं कई साल तक एम ए प्रथम वर्ष में आने वाले विद्यार्थियों से नियमित यही सवाल पूछता रहा और हमेशा उनको शुक्लजी और द्विवेदीजी के इतिहास ग्रंथ पढ़ने के लिए कहता रहा।तकरीबन छ-सात साल बाद पहलीबार यह सुनने को मिला कि हां शुक्लजी या द्विवेदीजी के इतिहास ग्रंथ देखे या पढ़े हैं।इससे आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि बीए ऑनर्स के स्तर तक किस तरह के पठन-पाठन की दशा थी और मेरे यहां आने के पहले कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास किस तरह पढाया जाता था.अनुभव से यह भी पता चला कि मुक्तिबोध को हमारे यहां न तो पढ़ते हैं और न पढ़ाते हैं। खैर,तब से लेकर आज तक बहुत कुछ बदला है।लेकिन यह सिर्फ झांकी मात्र है। इस समस्या की जिसकी ओर मैं आपको ले जाना चाहता हूं।

मूल समस्या यह है एक शिक्षक के नोट्स कैसे हों ॽ नामवरसिंह के क्लास नोटस सामने आ चुके हैं।उन पर कभी फुर्सत में विस्तार से लिखने का मन है।इधर उनके नोटस पर कुछ लिखा भी है,जो आपको मेरी नई किताब ´नामवर सिंहः समीक्षा के सीमान्त´में देखने को मिलेगा। सवाल यह है क्लास नोटस कैसे हों ॽ खासकर जब किताब की शक्ल में आएं तो उनको किस रूप में पेश करें ॽहिन्दीवालों के सामने सबसे बेहतरीन मानक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रखा है ´हिन्दी साहित्य का इतिहास´ लिखकर।यह इतिहास ग्रंथ आज भी साहित्येतिहास में मील का पत्थर है।

मैंने पत्रकारिता के अपने सारे नोट्स ´हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की भूमिका´के नाम से लिखकर हिन्दी के पत्रकारिता के विद्यार्थियों के हवाले कर दिए।मैंने महसूस किया कि एक शिक्षक के नोटस वे होते हैं जो नए नजरिए और विश्लेषण के नए उपकरणों को सामने लाएं,विषय से संबंधित नयी खोज,अवधारणाओं आदि के विश्लेषण पर जिनमें जोर दिया गया हो। एक शिक्षक के नोटस पहले कही गयी बातों की पुनरावृत्ति मात्र न हों।

मैं जिस समय पत्रकारिता पढ़ा रहा था तो देश बड़ी गंभीर समस्याओं में उलझा हुआ था,उन सभी समस्याओं की अभिव्यंजना पत्रकारिता की कक्षाओं में भी होती थी और वो मेरी किताब में भी है।मैं अपने तरीके से पत्रकारिता के पठन-पाठन का एक नया मॉडल लेकर चल रहा था,मेरे सामने किसी भी विश्वविद्यालय का पत्रकारिता का पाठ्यक्रम नहीं था।´हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की भूमिका´ नामक किताब सन् 1997 में प्रकाशित हुई,मैंने अपनी पत्रकारिता या मीडिया संबंधी समझ,धारणाएं आदि बनाने में हेबरमास,रेमण्ड विलियम्स,एस.हॉल,एडोर्नो आदि से मदद ली।

मैंने उस किताब की भूमिका में लिखा ´पत्रकारिता अध्ययन का एक स्वतंत्र अनुशासन है।इसे अधिरचना के किसी क्षेत्र या अनुशासन का विस्तारित केन्द्र वहीं मान लेना चाहिए।साथ ही राजनीतिक आंदोलन का यह प्रतिबिम्ब मात्र नहीं है,अपितु यह एक स्वतंत्र अधिरचना है।इसका अधिरचना के अन्य रूपों से गहरा संबंध एवं संपर्क है।आधार की शक्तियों के संघर्ष इवं अंतर्विरोधों ,वैचारिक अंतर्वस्तु एवं रूपों,अभिरूचियों एवं आदतों के निर्माण में इसकी निर्णायक भूमिका होती है।इसकी प्रक्रिया,विचारधारा एवं संरचना का अद्ययन जनमाध्यमों के नियमों,प्रक्रियाओं एवं सिद्धान्तों की रोशनी में ही संभव है।माध्यमों की प्रक्रिया का बहुआयामी प्रभाव होता है।इसीलिए इसके किसी एक किस्म के प्रभाव को खोजने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।´

शिक्षण के मामले में मैं रोलां बार्थ के पढ़ाने की कला का कायल हूं।संभवतःपढाते समय वे मेरे जेहन में रहते हैं। मैं रोलां बार्थ से सहमत हूँ कि शिक्षण को फैंटेसी की तरह होना चाहिए।यानी इसमें आपकी इच्छाएं आएं और जाएं,शिक्षक उनको अंतहीन रूप में अभिव्यंजित करे।एक अच्छे शिक्षक के अध्यापन की कला फैंटेसी पर निर्भर करती है।यह फैंटेसी साल-दर-साल बदलती रहती है।फलतःक्लास नोटस भी बदलते रहते हैं।शिक्षक का काम अपनी भाषा को छात्र के अंदर उतार देना नहीं है,बल्कि वह तो छात्र की भाषा को बदल देता है।शिक्षण का काम है तीसरी भाषा पैदा करना है,अन्य अर्थ की सृष्टि करना । कक्षा लेना असल में भाषणशक्ति के जरिए विरेचन करना भी है।जब आप पढ़ाते हैं तो मैं और तुम की भाषा में नहीं पढ़ाते,बल्कि तीसरी भाषा में पढ़ाते हैं,’ नेचुरल भाषा´में पढ़ाते हैं।वायनरी अपोजीसन की भाषा में नहीं पढ़ाते,बल्कि ´नेचुरल भाषा´में पढ़ाते हैं।तटस्थ भाव से पढ़ाते हैं।आप सपनों से मुक्त होकर पढ़ाते हैं।पाठ के अर्थ से मुक्त होते हुए पढ़ाते हैं।पाठ के अर्थ से बंधकर पढ़ाने में मुश्किल यह है कि आप तीसरे अर्थ की सृष्टि नहीं कर सकते,नए अर्थ की सृष्टि नहीं कर सकते,विरेचन नहीं कर सकते,नई भाषा की सृष्टि नहीं कर सकते।शिक्षण का अर्थ है नई भाषा और नए अर्थ की सृष्टि करना।


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

ईमानदार पेशेवर शिक्षण और विचारधारा

          मुझे निजी तौर पर जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे सभी पेशेवर ईमानदार शिक्षक थे।मथुरा में नगरपालिका के प्राइमरी स्कूल जवाहर लाल स्कूल, माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय और अंत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे अध्ययन-अध्यापन के प्रति एकदम पेशेवर नजरिया रखते थे,विद्यार्थियों के साथ बेहद मानवीय व्यवहार करते थे।फलतः मेरे मन में पेशेवर शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई,एक ऐसा शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई जो शिक्षा के प्रति ईमानदार रहे,पेशेवर तैयारी के साथ कक्षा में जाए,शिक्षा को धंधा न बनाए,मेरा कोई भी शिक्षक धंधेबाज नहीं था।दिलचस्प बात यह कि जितने भी शिक्षक मिले वे किसी न किसी विचारधारा को मानते और जानते थे,उनके पास राजनीतिक नजरिया था।एकमात्र आचार्य सवलकिशोर पाठक ऐसे थे जो कभी राजनीति पर नहीं बोलते थे, वे दर्शनशास्त्र के बहुत ही बेहतरीन विद्वान थे, व्यवहार में वे कांग्रेसी विचारधारा से प्रभावित थे,लेकिन आम बातचीत में छात्रों से राजनीति की कभी बातें नहीं करते थे।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि किसी भी शिक्षक ने राजनीति करने के लिए मेरे या अन्य के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया।जेएनयू में पढ़ते समय तो अनेक मर्तबा गुरूजनों के खिलाफ ही आंदोलन करना पड़ा लेकिन कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि विचारधारा जहर है,विचारधारा के कारण शिक्षक परेशान कर रहे हैं।शिक्षकों से वैचारिक मतभेद सामान्य चीज थी,इससे शिक्षकों के साथ कभी टकराव पैदा नहीं हुआ,यह जमा पूंजी थी मेरे छात्र जीवन की जिसको लेकर मैं अध्यापकीय जीवन में दाखिल हुआ।मैंने निजी तौर पर अनेक शिक्षकों को जेएनयू ,डीयू आदि में देखा था जो छात्रों से राजनीतिक मतभेद के कारण दुर्व्यवहार करते थे।जेएनयू में कभी-कभी यह प्रवृत्ति नामवरजी के अंदर अभिव्यक्त होती थी,जिसके कारण छात्रों के साथ उनका टकराव होता था।इस पूरे अनुभव का निचोड़ यह कि शिक्षक को कभी विचारधारा के डंडे से अपने विद्यार्थियों को नहीं हांकना चाहिए।जो शिक्षक राजनीतिक विचारधारा के डंडे से हांकेगा वह छात्रों का अहित ही करेगा।

शिक्षा में राजनीति होगी,राजनीति होनी भी चाहिए,लेकिन श्रेष्ठ राजनीति करो,लेकिन पठन-पाठन को गौण न बनाओ। निकृष्ट राजनीति मत करो।छात्रों को राजनीति करने,अपनी विचारधारा,अपने मन का छात्र संगठन चुनने की आजादी हो,हर मसले पर उनकी राय लो,हर स्तर उनकी शिरकत को सुनिश्चित करो,शिक्षा को पेशेवर और ईमानदार आचरण का आईना बनाओ।यही मनोदशा थी जिसे लेकर मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में नौकरी ली,जब कोलकाता आया था तो बड़े सपने थे मन में,लेकिन कलकत्ता विश्वविद्यालय में काम करने के साथ ही चंद दिनों में सारे सपने दफ्न करने पड़े,इसका एकमात्र कारण वाम राजनीति थी, आयरनी यह कि वाम ने ही सपने पैदा किए,वाम ने ही सपने दफ्न किए।इसलिए मेरे अंदर सपनों के दफ्न हो जाने का दुख नहीं था।

कोलकाता में पढ़ाते हुए 27साल हो गए,इन वर्षों में जो कुछ देखा है वह त्रासद ज्यादा है, सुखद कम है। सुखद यह है कि मैंने सीमित संसाधनों और तमाम किस्म की प्रतिकूल अमानवीय परिस्थितियों के बावजूद कभी शिक्षक के रूप में कक्षा को कम करके नहीं लिया,कक्षा मेरे लिए आज भी सर्वोच्चसुख है,समय पर कक्षा में जाना और पूरा समय कक्षा में रहना यह मेरी आदत है।मेरे लिए कक्षा बहुत बड़ी प्रयोगशाला है,जिसमें मुझे सबसे ज्यादा सीखने को मिला।मैंने अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए जो सीखा वह बेहद मूल्यवान है और उसका मैंने अपने जीवन में तो लाभ उठाया ही अपनी किताबों के लेखन में भी लाभ उठाया। मेरी अधिकांश किताबें सबसे पहले बीज रूप में कक्षाओं में ही पैदा हुईं,पढ़ाते हुए नए विचारों की हवा कक्षा में ही मिली,मेरे लिए छात्र एक तरह से ईंधन का काम करते रहे हैं, मैं पढ़ाता नहीं तो संभवतः किताबें नहीं लिख पाता।मेरे अधिकतर विद्यार्थी नहीं जानते कि वे मुझे क्या दे रहे हैं,लेकिन मैं सचेत रूप से उनसे लेता रहा हूँ।पेशेवर ईमानदारी से जितना बन पड़ा कक्षा में किया,जो कक्षा में नहीं कर पाया वह किताबें लिखकर किया।जिससे भविष्य में ज्ञान का सही इस्तेमाल हो।दिलचस्प बात यह कि मैंने कभी किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाया,इसका बड़ा कारण था कि मैं जिन शिक्षकों से पढ़कर आया था वे किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाते थे। मेरा मानना है कि एक बेहतरीन शिक्षक वह जो कक्षा में पढ़ते समय घुल-मिल जाए,विषय में रमकर पढ़ाए,पढ़ाते समय दिमाग की बंद खिड़कियों को खोले,आलोचनात्मक विवेक पैदा करे।मेरे लिए कक्षा का मतलब क्लास नोटस लिखाना नहीं था।मैंने कभी नोटस नहीं लिखाए।मेरे लिए पढ़ाने का मतलब है विद्यार्थी में पढ़ने की दिलचस्पी पैदा करना,पढ़ने की ललक पैदा करना,ज्ञान के लिए बेचैनी पैदा करना,यह काम जिस तरह हो पेशेवर ढ़ंग से किया जाय।मैं नहीं जानता इसमें कहां तक सफल हुआ, कहां तक असफल हुआ,लेकिन मेरे पढ़ाने का रास्ता यही रहा है।



मैंने जब नौकरी आरंभ की तो कलकत्ता विश्वविद्यालय में आधुनिक आलोचना तकरीबन नहीं पढ़ाई जाती थी, परंपरागत पाश्चात्य समीक्षा और संस्कृत काव्यशास्त्र एक अतिथि अध्यापक पढ़ाते थे नाम था सदानंद सिंह,वे प्रेसीडेंसी में शिक्षक थे।मैंने उनसे एकदिन पूछा कि आप किस तरह पढ़ाते हैं,उन्होंने ईमानदारी से कहा रटकर आता हूँ कक्षा में जाकर उगल देता हूँ।मेरे लिए यह चौंकाने वाली चीज थी। इससे मुझे अंदाजा लगा कि रट्टूभाव से यदि शिक्षक पढ़ा रहा है तो वह आखिर किस तरह का वातावरण बना रहा है,रट्टूभाव से पढ़ाने का अर्थ है शिक्षा को सुला देना।कक्षा में जब गया तो और भी चौंकानेवाला अनुभव हुआ,हिन्दी साहित्य का इतिहास कोर्स में था, लेकिन विद्यार्थियों ने रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम तक नहीं सुना था। पूछा कि किसका लिखा इतिहास पढ़ते हो तो पता चला किसी शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति का लिखा इतिहास पढ़ते हैं,खोजबीन की तो पता चला सारा कलकत्ता उनका इतिहास पढ़ता है,यानी पूरे शहर से रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी गायब थे,जबकि वे स्वयं मेरे विभाग में आ चुके थे,कोलकाता शहर तो वे और उनकी दूसरी परंपरा वाले लोग साल में कई बार आते थे,लेकिन साहित्य के विद्यार्थियों में उनका कोई असर नहीं था।पता चला यह शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति कुंजीलेखक है,मैं मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र समझ रहा था.इससे यह भ्रम भी टूटा कि किसी शहर में बड़े प्रगतिशील साहित्यकार भाषण देने आते-जाते हैं तो उनसे साहित्य के विद्यार्थी प्रभावित नहीं होते, बल्कि वे कक्षा में पठन-पाठन से प्रभावित होते हैं।मुझे खुशी है कि मेरे आने के बाद पहलीबार कलकत्ते के छात्रों को रामचन्द्र शुक्ल-हजारीप्रसाद द्विवेदी के इतिहासग्रंथ पढ़ने की जरूरत महसूस हुई।पहलीबार इतिहास के कुंजीलेखक से छात्रों का संबंध टूटा।इसी तरह कलकत्ता वि.वि. में जयशंकर प्रसाद पर विशेषपत्र दसियों साल से पढ़ाया जा रहा था,लेकिन किसी ने मुक्तिबोध की किताब का जिक्र तक नहीं किया था, मुक्तिबोध की प्रसिद्ध किताब है ‘कामायनी एक पुनर्विचार’,इसका कोई जिक्र नहीं था, छात्र मुक्तिबोध का नाम तक नहीं जानते थे।क्योंकि वे पाठ्यक्रम में नहीं थे।पाठ्यक्रम में कोई सामयिक चीज,सामयिकलेखक नहीं पढ़ाया जाता था।मैंने पहलीबार जब पाठ्यक्रम बदलने पर जोर दिया , जिंदालेखकों को पढ़ाने पर जोर दिया तो इस पर बड़ी तीखी बहस हुई,कलकत्ता वि.वि. में उस समय जिंदा लेखक नहीं पढ़ाया जाता था और जिंदा लेखक पर शोध नहीं होता था।मैंने सबसे पहले अपने साथ पीएचडी करने के लिए जिंदालेखक चुनने में शोधार्थियों को मदद की तो बहुत तीखी बहस हुई,उसके बाद जिंदालेखक का प्रवेश हुआ।मेरे साथ रामविलाश शर्मा और नामवर सिंह ये दो जिंदा लेखक थे जिन पर शोध सबसे पहले हुए।इसके पहले कलकत्ता वि.वि. में जिंदालेखक को पढ़ाना और उस पर शोध कराना बंद था।आज पाठ्यक्रम में अनेक जिंदा लेखक पढाए जाते हैं,जिंदालेखकों पर शोध हो रहा है।यही तो सुख है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कलकत्ते के खट्टे-मीठे अनुभव-


मैं सन्1989 में कोलकाता आया,जिस समय मेरी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हुई उस समय हिन्दी एम.ए. में तकरीबन 45 छात्र पढ़ते थे।आज प्रत्येक सेमिस्टर में 125 छात्र पढते हैं।एम.फिल् भी है।मेरी नियुक्ति के पहले तक कलकत्ता वि.वि. में एससी,एसटी, आरक्षण नहीं था।कॉलेज सर्विस कमीशन में भी आरक्षण के आधार पर पद नहीं भरे जाते थे। यह समस्या जब मेरी नजरों में पहलीबार सामने आई तो मैंने इसे माकपा के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा और अंतमें काफी जद्दोजहद के बाद आरक्षण लागू हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी एमए का पाठ्यक्रम तकरीबन30सालों से नहीं बदला गया था,उसमें निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया आंरंभ हुई। इस काम में विभाग के अन्य शिक्षकों ने सहयोग किया,लेकिन पहल मैंने की। आज पश्चिम बंगाल हिन्दी के पठन-पाठन के लिहाज से बहुत विकास कर गया है,इसमें वाम सरकारों की बड़ी भूमिका रही है।अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है।

कलकत्ते का सारा माहौल पुराने पैटर्न,आदतों,संस्कारों पर टिका है।नई दुनिया का उसमें प्रवेश बेहद धीमी गति से हो रहा है।चीजें बदल रही हैं लेकिन बेहद धीमी गति से। विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी समस्या है पुस्तकों की।जरूरत की पुस्तकों को पढ़ने-पढ़ाने का यहां रिवाज कम है।अधिकतर शिक्षक भी उससे अपरिचित हैं।इसके कारण विद्यार्थियों तक सही सूचनाएं ,पुस्तकों के नाम नहीं पहुँच पाते। स्थिति की गंभीरता समझने के लिए मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूँ।हमलोगों ने एमफिल् का पाठ्यक्रम आरंभ किया। पहला बैच था,उसमें मुझे साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाना था,किताबें नहीं मिल रही थीं, मैंने स्व.विष्णुकांत शास्त्री,जो विभाग के वरिष्ठतम प्रोफेसर थे,बेहतरीन शिक्षक थे, से पूछा कि मुझे मिखाइल बाख्तिन पढ़ाना है,क्या आपके पास उनकी कोई किताब है,वे बोले मैंने तो नाम ही पहलीबार सुना है,मैं सुनकर चौंक गया।दूसरे दिन मैंने भाषाविज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर से पूछा कि क्या उनके पास बाख्तिन की कोई किताब है तो वे बोले, हां,वे बोले मेरे पास सब किताबें हैं,मैंने शास्त्रीजी से कहा कि देखिए कितना अंतर है ,हिन्दी के प्रोफेसर को नाम तक नहीं मालूम और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर के पास किताबें तक हैं।इस एक घटना ने मेरी आंखें खोल दी साथ में यह भी मैसेज दिया कि हिन्दी के शिक्षक आधुनिक विचारकों के लेखन से परिचित होना तो दूर,उनका नाम तक नहीं जानते। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से मैंने काम आरंभ किया।

मैं जेएनयू से पढ़कर आया था,नए विषय,नए विचारक,सिद्धान्तकार आदि के बारे में गुरूमुख पढ़कर आया था अतःमेरे सामने वह संकट नहीं था जो यहां के शिक्षकों के सामने संकट था। कहने का आशय यह कि विद्यार्थी ज्ञान के नए स्रोतों से बाकिफ तब होगा जब शिक्षक बाकिफ होगा।कोलकाता जैसे महानगर में रहते हुए दुनिया के ज्ञान के बेखबर रहने वाला शिक्षक निश्चित रूप से तेजगति से अपना विकास नहीं कर सकता। पहले ज्ञान-विज्ञान के नए क्षितिज शिक्षक स्पर्श करे,बाद में वह अपने विद्यार्थियों को मौका दे,सारी समस्या की जड़ यहां पर है।



मैं जब कोलकाता आया तो मैंने पता किया कि यहां विदेशी किताबें कहां मिलती हैं ? पता चला कि विदेशी पुस्तक भंडार नाम से एक किताबों की दुकान है,मैं दुकानदार से मिला,उसने नई-नई किताबें दिखायीं,बात करने पर पता चला कि नामवरजी जब भी कलकत्ता आते हैं उस किताब वाले के यहां जरूर आते हैं, मैं नामवरजी से उस किताबवाले के बारे में जेएनयू में छात्रजीवन में सुन चुका था, नामवरजी जब भी कोलकाता आते सेमीनार आदि से जो भी रूपये मिलते उससे उस पुस्तक बिक्रेता से किताबें खरीदकर ले जाते।साल में कम से कम 3-4बार उनका कोलकाता आना होता था, मैंने किताब वाले से पूछा क्या कोई और हिन्दी का शिक्षक भी उससे किताबें खरीदने आता है तो उसने कहा कि हिन्दी का कोई शिक्षक कभी किताब खरीदने नहीं आया।यह वाकया इसलिए बताना जरूरी है कि हिन्दी शिक्षकों के दुनिया से संपर्क-संबंध को हम पहचान सकें।कलकत्ता वि.वि.की लाइब्रेरी से कभी किसी हिन्दी शिक्षक ने 1989 तक पश्चिमी समीक्षा की किताबें, आलोचना की नई किताबें निकलवाकर नहीं पढ़ीं,मैं पहला शिक्षक था जो किताबें निकालकर लाता और पढ़ता था।मेरे लिए यह सारी चीजें बेहद निराशा पैदा करने वाली थीं,जब आप नई किताबें नहीं पढ़ेंगे तो नई बहसों में शामिल कैसे होंगे, ज्ञान के समुद्र में दुनिया के साथ हिन्दीवालों को कैसे जोड़ेंगे? यह काम आशीर्वाद मात्र से नहीं हो सकता।

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