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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

उत्तरआधुनिक युग में फैशन से अनजाने और फैशन में डूबे लोग ?

    फैशन पर विचार करते समय फैशन से दूरी आवश्यक है। दूरी न हो तो फैशन में फंसने की संभावना होती है। रोलां बार्थ ने लिखा कि फैशन के लेखकों की यह खूबी होती है कि वे रोज नई-नई भाषा का निर्माण करते हैं। नई भाषा फैशन को जीवन में उतारने में सफल हो जाती है। पुरानी वस्तु, पुराने फैशन रूप को तथाकथित नए रूप में उतारने में फैशन की भाषा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, जबकि फैशन आलोचक की भूमिका फैशन लेखक से भिन्न होती है। वह चीजों को भूलता नहीं, फैशन को मानव-सभ्यता के विकास के क्रम में रखकर देखता है। यह लक्ष्य तब ही प्राप्त कर सकता है जब वह फैशन के चक्कर से मुक्त हो। आज फैशन में समूचे मानवीय कार्य-व्यापार को अपने दायरे में शामिल कर लिया है। शरीर, चलने का ढंग, अभिव्यक्ति की शैली, स्वास्थ्य, बीमारी, हाव-भाव आदि इसके दायरे में आ चुके हैं।
      प्रसिद्ध फैशन आलोचक एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में इसकी परिभाषा देते हुए लिखा : 'फैशन का अर्थ है युगानुरूप स्टाइल में चरित्रागत परिवर्तन। फैशन शुध्दत: तथ्यपरक होता है, उसमें सामाजिक परिवर्तन और नियंत्राण के कारण परिवर्तन आते रहते हैं।' इसका प्रधान कारण है परांपरागत फॉर्म या रूप का अप्रासंगिक हो जाना। परिणामत: फैशन को नए को आत्मसात करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह नई परिस्थितियों का आत्मसातीकरण है। फैशन समय-केंद्रित होता है। सामाजिक गतिशीलता से उसका गहरा संबंध है। फैशन के उपभोग की जब इच्छाएं पैदा हो जाती हैं तब उसमें स्थिरता आती है। फैशन कभी भी लक्ष्यहीन और निर्विरोधपूर्ण परिवर्तनों के साथ समाप्त नहीं होता। फैशन में दिखावे और प्रदर्शन के तत्व समाहित रहते हैं। जब तक चंद लोग किसी फैशन का व्यवहार करते हैं उस पर फैशन के तौर पर बात नहीं की जा सकती। फैशन तब ही फैशन का दर्जा अख्तियार करता है जब व्यापक जनता के हिस्से प्रयोग करने लगें। फैशन का जब कोई रूप जन्म लेता है तो उसके प्रसार एवं बृहत्तर व्यवहार को रोकना मुश्किल होता है। उसका समूचे समाज पर प्रभाव होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि फैशन का एकांत में विकास नहीं होता। उसे विश्व रंगमंच चाहिए। फैशन से स्टाइल ही नहीं बदलता अपितु वह आत्मसातीकरण या समाहार की प्रक्रिया को रिवाज की तरह जीवन का अंग बना देता है। फैशन के प्रसार की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कार और सामाजिक नैतिक मानदंड दबाव का काम करते हैं। फैशन के प्रसार के लिए जरूरी है कि इसके दायरे में उन लोगों को लाया जाए जो इसके दायरे से बाहर हैं।
फैशन की विशेषता है कि जो उसका विरोध करते हैं वे भी इसका अंग बन जाते हैं। अमूमन फैशन के प्रतिवाद का उदय तब होता है जब वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेता है। फैशन को संवृत्ति बनानेवाले तत्व हमेशा वर्तमान समय में रहते हैं। नए के प्रति आकर्षण फैशन का भविष्य तय करता है। नए के प्रति उत्सुकता असुरक्षा से पैदा होती है। इसके लिए वह सब जगह से सामग्री ग्रहण करता है। फैशन का जन्म व्यापार के कारण नहीं होता। फैशनोन्मुख व्यवहार की अनुपस्थिति में फैशन का व्यापार नहीं
है। फैशनोन्मुख व्यवहार पूरी तरह खुला होता है। यही फैशन के व्यापार के लिए ऊर्जा का कार्य करता है। व्यापार उसकी अंतर्वस्तु तय करता है। फैशन अपरिचित के प्रति अप्रतिरोधात्मक आकर्षण पैदा करता है। यह प्रक्रिया संक्रमण काल में पैदा होती है।
मसलन, बीसवीं सदी में हृष्ट-पुष्ट स्वास्थ्य की जगह देखने में आकर्षक इकहरे या छरहरे शरीर की संरचना पर जोर दिया जा रहा है। सीधे और सुव्यवस्थित हाव-भाव के लिए सूर्य जैसी चमकीली त्वचा को आदर्शीकृत किया जा रहा है। इसके लिए लोशन, पाउडर एवं प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा त्वचा रक्षा के उपायों पर बल दिया जा रहा है। इसके लिए प्रेरक व्यक्तित्व के तौर पर हीरो, हीरोइन, लोकप्रिय व्यक्तित्व, खिलाड़ी, बिजनेस एक्जीक्यूटिव, उदीयमान व्यापारी आदि का फैशन के चरित्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
कपड़ों या अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में आनेवाले पुरुष चरित्रों में चौड़े कंधे वालों को उभारा जा रहा है। अगर किसी मॉडल के कंधे चौड़े नहीं होते तो उसके लिए पैड का इस्तेमाल किया जाता है। आज के पुरुष के कंधे अपने परबाबा के कंधों से भी चौड़े हो गए हैं। अब जैकेट ढीली हो गई है। पैंट 'बैगी' हो गई है। लंबे-चौड़े ढीले-ढाले वैस्ट कोट को फुटबॉल की जर्सी ने अपदस्थ कर दिया है। यहां तक कि फुटबॉल की जर्सी कोट के नीचे ये लोग भी पहनने लगे हैं जिन्होंने कभी फुटबाल का मैदान तक नहीं देखा। इस तरह के पहनावे के कारण हमारी मुद्राएं काफी शांत, कम सख्त हो गई हैं। सीधे और आराम से पहनने लायक वस्त्रों को पहनने के कारण हमारे चलने का ढंग अति सतर्क और नजाकत भरा हो गया है। हमारी भुजाएं ज्यादा गतिशील और कम रचनात्मक हो गई हैं। इसी दौरान कलफ दिए गए कमीज के कालर के लोप ने गतिशीलता को उभारा है। पुराने वेस्ट कोट का पुनरोदय हुआ है। पुरुष की पैंट में आई शिथिलता का औरतों के वस्त्रों की लंबाई-चौड़ाई पर भी असर हुआ है।
         फैशन के बारे में यह कहना मुश्किल है कि कृत्रिम कहां है और स्वाभाविक कहां है। इस तरह का विभाजन बेमानी है। उसकी पहचान न तो कृत्रिम से होती है और न स्वाभाविक से। उसकी पहचान के अपने नियम हैं। इन नियमों की कोई सीमा नहीं है। फैशन का प्रारंभ मॉडलिंग और शारीरिक मुद्राओं से होता है। इसका दायरा एटीटयूड, पेशे, विचारों और व्यक्ति के हितों तक फैला हुआ है। अगर इकहरा शरीर फैशन के केंद्र में है तो औरतें दुबली होने की कोशिश करती हैं। युवा लड़की और भी ज्यादा छोटी उम्र की दिखने की कोशिश करती है।
आम जीवन का सघन विकास, अनेक फैशन रूपों का सृजन और लोप, जीवन में फैशन की गति को बढ़ा देता है। फैशन आज के सांस्कृतिक आविष्कार का कारखाना है जो सनक के साथ आता है और खारिज फैशन रूपों का अंबार खड़ा करके चला जाता है। फैशन के एक रूप के लोप के साथ ही नया रूप जन्म ले लेता है। यहां नए को कभी हतोत्साहित नहीं किया जाता। इससे मनुष्य की रचनात्मक समृध्दि का पुनर्निर्माण होता रहता है जो मनुष्य की रचनात्मक क्षमता को उभारता है। उम्र और वर्गगत अंतर ड्रेस में किस तरह की भूमिका अदा करते हैंऌस विषय पर हरबर्ट स्पेंशर की कृति प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलाजी (चार खंड) में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वह लिखता है कि 'फैशन का उच्च और निम्नवर्ग विकास करते हैं। निम्नवर्गों के द्वारा फैशन का कोई रूप अपना लिये जाने के बाद उच्च वर्गों पर दबाव पड़ता है कि वे अपनी वेशभूषा बदलें।' स्पेंशर ने फैशन को हैसियत से जोड़ा है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज में प्रचलित नजरिए का ही विकास है। एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में स्पेंशर के दृष्टिकोण का दृढ़ता से खंडन किया है। उनकी धारणा है कि 'पूंजीवादी समाज में फैशन में वर्गीय अंतर्विरोध दिखाई नहीं देते। अत: सामाजिक हैसियत को फैशन का एकमात्रा स्रोत नहीं मानना चाहिए।'
फैशन का सामाजिक हैसियत से भी रिश्ता होता है, इसके बगैर फैशन पर चर्चा संभव ही नहीं है। दूसरी बात यह कि फैशन का उदय हमेशा उच्चवर्गों में हुआ। फैशन को लेकर इसी वर्ग में प्रतिस्पर्धा रही है। प्रतिस्पर्धा के कारण अनेक नए रूपों ने जन्म लिया। उच्चवर्ग के फैशन रूपों के प्रयोग की निम्नवर्गों को किसी अवसर विशेष पर ही अनुमति दी जाती थी, यह स्थिति पूर्व-आधुनिक दौर में थी।




शनिवार, 20 मार्च 2010

धर्म से ज्यादा सुरक्षित है फैशन में समाज



     लोकवादी संस्कृति फैशन की जननी है। फैशन की भाषा सामाजिक हैसियत की भाषा है। फैशन ने व्यक्ति को बेझिझक, औपचारिक और संशयहीन बनाया, जीवन में खुलेपन को बढ़ाया। फैशन सजावट या पहनावा या शैली मात्र न होकर 'एटीटयूड' है, दृष्टिकोण है, विचार है। मनुष्य के भावों को संयमित, नियमित और अभिव्यक्त करने का माध्यम है। आत्माभिव्यक्ति के बहाने सामाजिक हैसियत, वर्गीय अवस्था और जीवन की प्रतिस्पर्धा को व्यक्त करने का चैनल है। जीवन के विविध मायावी रूपों की जननी होने के साथ धार्मिक रूढ़ियों और बंधनों के खिलाफ हस्तक्षेप है। यह प्रभुत्वशाली वर्ग की माया है। आस्कर वाइल्ड के शब्दों में कहें तो 'फैशन ने व्यक्ति को जो सुरक्षा दी है वह धर्म कभी नहीं दे सकता।' यानी फैशन सामाजिक सुरक्षा का कवच है। यह सामाजिक संवृत्ति है।
फैशन के पर्याय के रूप में पहनावे को देखने की परंपरा बड़ी पुरानी है। यह फैशन के विकास का सबसे पुराना तत्व है। पहनावा हमें पर्यावरण से सुरक्षा दिलाने का उपकरण भी है। नंगे और वस्त्रहीन समाज में फैशन की संवृत्ति की जबर्दस्त भूमिका हो सकती है।
आरंभ में फैशन का संबंध पहनावे से था, कालांतर में कामुकता से संबंध बना। यह एकदम नया क्षेत्र था। जे.सी. फ्लीगल ने 'वस्त्र का मनोविज्ञान' (1930) शीर्षक निबंध में लिखा कि ‘‘पहनावे के प्रति हमारा दृष्टिकोण शुरू से ही अस्थिर रहा है। हम ड्रेस की पूजा करते रहे हैं, उसे सम्मान का दर्जा देते रहे हैं। ड्रेस की पूजा और सम्मान के भाव-
बोध के बीच अंतर्विरोध रहे हैं। ड्रेस इन दोनों के बीच संतुलन का काम करता है। यह सदा से उदारता का समर्थक रहा है। 'पूजा' और 'सम्मान' के भावबोध का आधार है कामुक इच्छाएं।’’
    कामुक इच्छाओं को ड्रेस का एकमात्र आधार नहीं मानना चाहिए, इससे फैशन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाने में मदद नहीं मिलती। फैशन वस्तुत: सामाजिक संस्थान है जो मनुष्य की इमेज बनाता है और बिगाड़ता है। यह सार्वभौम संवृत्ति है। समग्रता में मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करना इसका मूलमंत्र है। फैशन के विकास में कला एवं संस्कृति आंदोलनों की गहरी भूमिका रही है। भारत में राजनीतिक स्वाधीनता संघर्ष की फैशन के रूपों के निर्माण में बड़ी भूमिका रही है। आंदोलनों के प्रभावस्वरूप नए-नए फैशन रूपों का जन्म हुआ। दीर्घकालिक प्रक्रिया में ये फैशन के रूप स्थिर होते चले गए। सार्वभौम रूप में बदल गए। उनके साथ जातीय पहचान के तत्व जुड़ गए।
फैशन की यह विशेषता होती है कि जब कोई एक शैली चल पड़ती है तो वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेती है। कालांतर में यही सांस्कृतिक पहचान बन जाती है। आंदोलनों के गर्भ से उपजी शैलियों की यह विशेषता होती है कि वे सुनिश्चित संरचना में ही विकास करती हैं। फैशन का यह लक्षण है कि वह उदार होता है और समाहित कर लेता है, परिणामत: फैशन में अनेक संस्कृतियों के अनेक रूपों का समाहार मिलेगा। फैशन के कुछ रूप सदाबहार और सार्वभौम बन जाते हैं तो कुछ अल्पजीवी रह जाते हैं।
मसलन, भारतीय साड़ी, धोती और कुर्त्ता को ही लें। ये तीनों वस्त्र कभी भी कामुकता या कामुक इच्छाओं का प्रतीक नहीं रहे। बल्कि भद्रता, सौम्यता और सादगी के प्रतीक रहे हैं। हाल के 25-30 वर्षों से साड़ी को थोथी विलासिता, कामुकता एवं पुरुषत्ववादी दृष्टि से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
    अब साड़ी को सादगी एवं भद्रता का प्रतीक नहीं, विलासिता, समृद्धि और अभिजन के वस्त्र के रूप में उभारा जा रहा है। आज वह भोग-विलास का पर्याय है। साड़ी के साथ जुड़ी सहिष्णुता, उदारता एवं अनौपचारिक दृष्टिकोण की जगह नए मूल्यों का लाया जा रहा है। भारतीय साड़ी को पहनने की जो शैली आम जीवन और विज्ञापनों में दिखाई देती है उसमें गंभीर अंतर है। साड़ी पहनने की क्षेत्रीय शैलियां रही हैं। क्षेत्रीय स्तर पर साड़ी का आकार, स्वरूप, छापा आदि तय होता रहा है, इससे राष्ट्रीय बाजार निर्मित करने में बाधा आई। राष्ट्रीय बाजार एवं राष्ट्रीय पहचान के लिए पहनावे का एक ही रूप जरूरी था, इस ऐतिहासिक मांग की पूर्ति राष्ट्रीय आंदोलन ने की।

आधुनिक साड़ी पहनने की शैली पूरी तरह नई है। इसका श्रेय ज्ञानदानंदिनी देवी को है। वे सत्येंद्रनाथ टैगोर (प्रथम आई.सी.एस.) की पत्नी और रवींद्रनाथ टैगोर की भाभी थीं। वे आधुनिक चेतना से संपन्न थीं। संकीर्णता से मुक्त थीं। उन्होंने पारसी और कोंकणी शैली की साड़ी पहनने की शैलियों को मिलाकर आधुनिक भारतीय साड़ी पहनने की शैली बनाई जिसका आंचल बाएं कंधे से होता हुआ चला जाता है। आरंभ में यह टैगोर परिवार की साड़ी की शैली थी, बाद में इसे मध्यवर्ग में स्वीकृति मिली। इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि फैशन का आरंभ हमेशा आभिजात्य के यहां होता है। किंतु आभिजात्य इसे जिंदा नहीं रख पाता। फैशन तब ही फैशन होता है जब यह जनता में लोकप्रिय हो जाए।
    

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