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रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ज्ञान और विवेक के अनुरागी प्रचारक के रूप में थी नालंदा की प्रतिष्ठा -डा.अमर्त्यसेन

     इस परिचर्चा का विषय है नालंदा और विज्ञान की खोज, लेकिन इस बेशक जटिल विषय की पड़ताल के पहले, मैं नालंदा पर ही कुछ बोलना चाहूंगा, क्योंकि दुनिया भर के लोगों में अभी भी इसका अस्तित्व अज्ञात ही है। फिलहाल, जबकि संयुक्त एशियाई पहलकदमी से इस विश्वविद्यालय की पुर्नस्थापना हो रही है, तो यह तथ्य कि नालंदा एक अत्यंत प्राचीन विश्वविद्यालय है, जग-जाहिर हो रहा है। लेकिन विश्व के प्राचीन विश्वविद्यालयों से यह अद्वितीय कैसे है?

अच्छा, दुनिया का प्राचीनतम विश्वविद्यालय कौन-सा है? इस सवाल के जवाब में हमारा दिमाग घूमता है, 1088 में आरंभ बोलोग्ना की ओर, 1091 में स्थापित पैरिस की ओर और अन्य विद्या-गत्रढों, जिसमें 1167 में स्थापित ऑक्सफोर्ड और 1209 में स्थापित कैम्ब्रिज भी शामिल हैं। इस चित्र में नालंदा की मुनासिब जगह कहाँ है? यदि हम सतत अस्तित्वमय विश्वविद्यालय ढूँत्रढ रहे होंगे तो सबसे छोटा जवाब होगा, 'कहीं नहीं।'

इस्वी सन 1193 में नालंदा अफगानियों के आक्रमण में बलपूर्वक नष्ट कर दिया गया था, जिसका नेतृत्व निर्दयी शासक बख्तियार खिलजी ने किया था। यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के आरंभ होने के कुछ ही समय बाद की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की स्थापना के कुछ ही समय पहले की बात है। नालंदा विश्वविद्यालय, जो भारत में उच्च शिक्षा का विश्वविख्यात केन्द्र था, जिसे पाँचवीं शती के आरंभ में स्थापित किया गया था, सात सौ साल से ज्यादा समय तक अपना वजूद बनाए रखने और यूरोप के प्राचीनतम विश्वविद्यालय बोलोग्ना से तुलना के बावजूद खत्म हो रहा था, ठीक उसी समय, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज अपना वजूद पा रहे थे।

नालंदा छहः सौ साल का हो गया था, जब बोलोग्ना का जन्म हो रहा था। यदि उसे नष्ट नहीं किया गया होता और वह हमारे समय तक अपना वजूद बनाए रख पाता, तो नालंदा विश्वविद्यालय, एक लंबे अंतराल से, दुनिया का प्राचीनतम विश्वविद्यालय होता। एक और विशिष्ट विश्वविद्यालय, जिसका वजूद भी सतत नहीं टिक पाया, वह था कैरो का अल-अजहर विश्वविद्यालय, जिसकी अक्सर नालंदा से तुलना होती थी और जिसे इस्वी सन 970 में बसाया गया था, उस समय नालंदा विश्वविद्यालय की उम्र पाँच सौ साल से ज्यादा हो चुकी थी।

तो उम्र को लेकर काफी शेखी हो गई (जैसा कि आप जानते हैं, हम भारतीय लोग उम्र को काफी गंभीरता से लेते हैं), और मुझे उम्मीद है कि आप समझ ही गए होंगे कि हम लोग उम्र के लिहाजन, बजाय कि वजूद-ए-मुसस्सल् दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय के बारे में बात कर रहे हैं। फिल वक्त इस विश्वविद्यालय को दोबारा शुरु किया जा रहा है और क्योंकि मैं अंतरिम प्रबंध परिषद के अध्यक्षता का दुष्कर दायित्व निभा रहा हूँ, मैं इस निष्कर्ष पर हूँ कि 800 वर्षों की विवृत्ति के पश्चात विश्वविद्यालय की पुर्नस्थापना कितना कठिन कार्य है। लेकिन हम नतीजों के करीब हैं। आज की यह परिचर्चा मुझे एक मौका उपलब्ध कराती है कि मैं प्राचीन नालंदा के विज्ञान की खोज का स्मरण करूँ, जिससे कि हम सभी को प्रेरणा मिले और नए नालंदा के लिए हमारे सुदीर्घ प्रयासों का पथ प्रदर्शन हो। मैं सुदीर्घ शब्द का इस्तेमाल मुख्यतः लागत की वजह से, बल्कि कहें कि सिर्फ लागत की वजह से कर रहा हूँ। हम विज्ञान संकाय तत्काल शुरु नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि भौतिकी एवं जैविक विज्ञान शाखाओं के लिए मानविकी एवं समाज विज्ञान शाखाओं से कहीं-कहीं ज्यादा धन की जरूरत है। प्राचीन नालंदा की वैज्ञानिक परंपराओं का पुर्नस्मरण या कहें कि मूल्यांकन ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण भी, कुछ इसलिए कि हमें सुदीर्घ प्रयास (हालाँकि स्थापना एवं विस्तार के लिए हम धन इकट्ठा करने की कोशिश कर ही रहे हैं।) के बारे में सोचना शुरु करना है और मुख्यतः इसलिए भी कि नए नालंदा की संपूर्ण अवधारणा, जिसमें मानविकी (जैसे इतिहास, भाषा एवं भाषा संबंधी तथा तुलनात्मक धर्म) के तथा सामाजिक विज्ञान एवं व्यवसाय विश्व (जैसे अंतर्राष्ट्रीय संबंध, प्रबंधन एवं विकास तथा सूचना प्रोद्योगिकी) के अध्यापन-अनुसंधान में वैज्ञानिक अभिवृत्ति एवं अनुशासित विचार महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

नालंदा में विज्ञान की खोज से तादातम्य रखते कुछ सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ। पहला, क्या नालंदा जिस भी तरह के अनुसंधान का हिमायतगार था, उसके उपादान में उसे यथेष्ट विशालता हासिल थी? क्या वह अंधविश्वास एवं अज्ञान के सागर की महज एक बूँद की तरह तो नहीं था; जिसे कि कुछ लोग प्राचीन भारत की विशेषता के तौर पर देखते थे; यह समझने के लिए कि आधुना भारत को नियंत्रण में रखने के लिए यह अवधारणा कितनी सुदृढ़ और राजनीतिक तौर महत्वपूर्ण थी, आपको सिर्फ जेम्स मिल्स की 'हिस्ट्री ऑफ इंडिया' पढ़ने की जरूरत है, जिसे कि राज चलाने के लिए भेजे जाने वाले ब्रिटिश प्रशासनिक सेवा के नौकरशाहों के लिए पढना अनिवार्य था।

बहरहाल, नालंदा ज्ञान का प्राचीन केन्द्र था, जिसका दुनिया के कई देशों, विशेषतः चीन और तिब्बत, कोरिया और जापान तथा शेष एशिया के साथ सुदूर पश्चिम के तुर्की जैसे देश के विद्यार्थियों में भी आकर्षण था। नालंदा एक आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ 10,000 की चरम सीमा तक विद्यार्थी थे, जो विविध विषयों का अध्ययन कर रहे थे। चीनी विद्यार्थियों ने खास तौर पर नालंदा में जो देखा अथवा जो भी शैक्षिक मानक उन्हें पसंद आए, उस पर विस्तार से लिखा, इनमें सातवीं शताब्दी के चीनी विद्यार्थी जुआनज़ैंग और याइ जिंग के नाम उल्लेखनीय हैं। प्राचीन चीन के इतिहास में संयोगन् नालंदा ही एकमात्र गैर-चीनी संस्थान है, जहाँ चीनी विद्वानों ने ज्ञानार्जन किया था।

यह समझना भी जरूरी है कि नालंदा अतिविशिष्ट था, बावजूद इसके वह उस काल में भारत के विशेषकर बिहार में सुव्यवस्थित उच्च शिक्षा की वृहद परंपरा का एक अंग मात्र था। नालंदा के अलावा समीप ही दूसरे संस्थान भी थे, जैसे विक्रमशिला एवं ओदांतपुरी। वास्तव में जुआंगज़ैंग ने इनके विषय में भी लिखा, हालाँकि वह नालंदा में अध्ययन कर रहा था। नालंदा उस समय की सामाजिक संस्कृति से सम्बद्ध था और नालंदा की परंपरा के बारे में विचार करते समय यह याद रखना जरूरी है।

दूसरा प्रश्न जरा जटिल है क्योंकि यह एक धार्मिक संस्थान में विज्ञान की गुंजाइश के बारे में है। विक्रमशिला एवं ओदांतपुरी की ही तरह नालंदा भी एक बौद्ध संस्थापन था, तो तय है कि इन संस्थानों में बौद्ध दर्शन एवं अभ्यास की ही पढ़ाई होती थी। यहाँ याद रखने की बात यह है कि बुद्ध दर्शन के तत्वों के अनुरूप प्रबोधनात्मक (गौतम को बुद्ध नाम दिया गया था, जिसका अर्थ था जो प्रबुद्ध है।) उपदेश ही केन्द्र-बिंदू थे, फिर भी बौद्धवादी बुद्धिजीवी ज्ञान-मीमांसा एवं नीति-विषयक जिज्ञासा की परंपरा के चलते विविध विषयों में ज्ञानार्जन करते थे। कुछ विषय बौद्ध प्रतिबद्धताओं से सीधे जुड़े हुए थे, जैसे चिकित्सा-शास्त्र एवं स्वास्थ्य रक्षा, दूसरे विषय बौद्ध संस्कृति के विकास एवं प्रसार से जुड़े थे, जैसे वास्तुशिल्प एवं मूर्तिकला; और कुछ, विश्लेषणात्मक विद्याभिमुख बौद्ध बुद्धिजीवियों के प्रश्नों से।

इस अंतिम बात को और स्पष्ट करता हूँ, सिर्फ नालंदा के संदर्भ में ही नहीं, वरन् बौद्ध बुद्धिजीवियों के प्रभाव को समझने के एक प्रयास के तौर पर। भारतीय एवं चीनी बुद्धिजीवियों के परस्पर जुड़ाव और उन पर सामान्यतः बौद्ध प्रभावों के साक्ष्यों की भरमार है, विशेषतः तांत्रिक बौद्धवाद के अनुषंग में, जिसका सातवीं और आठवीं शताब्दी के तांग काल के चीनी गणित एवं खगोल विज्ञान पर खासा प्रभाव था। याइ जिंग, जो नालंदा का विद्यार्थी था और जिसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, तांत्रिक पाठों का संस्कृत से चीनी भाषा के अनुवादकों में से एक था। सातवीं और आठवीं शताब्दी तंत्रवाद चीन की एक मुख्य शक्ति थी और कई विद्वान चीनी बुद्धिजीवी इसके अनुयायी थे। क्योंकि कई तांत्रिक विद्वानों की गणित में गहन रुचि थी (अथवा कहें कि शुरु में अंकों के तांत्रिक आकर्षण में बँधे थे), इसलिए तांत्रिक गणितज्ञों का चीनी गणित पर विशेष प्रभाव था।

जैसा कि जोसेफ नीधम लिखते हैं, 'सबसे महत्वपूर्ण तांत्रिक आइ-हिसिंग (+ 672 से + 717) था, अपने समय का महानतम गणितज्ञ एवं खगोल विज्ञानी।' नीधम टिप्पणी करते हैं, 'यह तथ्य ही हमें विचार का प्रस्ताव देता है, क्योंकि इसी में वह संभावित संकेत है, जो बौद्धवाद के इस स्वरूप के महत्व को सभी प्रकार के अवलोकनीय एवं प्रयोगात्मक विज्ञानों के लिए रेखांकित करता है।' याइ सिंग (अथवा नीधम के शब्दों में कहें तो आइ-हिसिंग), असल में कभी भी नालंदा का विद्यार्थी नहीं था, लेकिन उसी परंपरा से जुड़ा था, जिसके परिणामों में से एक नालंदा थी, वह धाराप्रवाह संस्कृत बोलता था (इस फर्क पर ध्यान देना जरूरी है कि याइ सिंग गणितज्ञ था, जब कि याइ जिंग नालंदा से ज्ञानार्जित बुद्धिजीवी और उसकी अन्य विधाओं के अलावा चिकित्सा शास्त्र में भी रुचि थी।)। एक बौद्ध भिक्षु के रूप में याइ सिंग भारतीय धार्मिक साहित्य से भिज्ञ था ही, उसने गणित और खगोल विज्ञान पर किए गए समस्त भारतीय लेखन में महारत हासिल कर ली थी। उसके तमाम धार्मिक जुत्रडावों के बावजूद यह मानना भूल होगी कि याइ सिंग के गणितीय अथवा वैज्ञानिक कार्य की कोई धार्मिक प्रेरणा थी। एक सामान्य गणितज्ञ जो तांत्रिक भी था, याइ सिंग विविध विश्लेषकीय एवं संगणनकीय समस्याओं से जूझता रहा, जिसमें से कइयों के तंत्रवाद अथवा बौध्दवाद से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था। जिन कुछ संयोजकीय गणना के शास्त्रीय सवालों से याइ सिंग दो-चार होता रहा उनमें से एक था, 'शतरंज में संभावित स्थितियों के कुल अंकों की गणना।' याइ सिंग पंचांगीय गणनाओं में विशेष दिलचस्पी रखता था, उसने चीन के लिए शाही व्यवस्था पर आधारित पंचांग की रचना की थी।

चीन में आठवीं शताब्दी में याइ सिंग के साथ पंचांगीय अध्ययनों में जो भारतीय खगोल विज्ञानी जुटे हुए थे, उन्होंने उस त्रिकोणमितिय प्रगति का बेहतर उपयोग किया था, जो उस समय तक भारत में हो चुकी थी (हालाँकि भारतीय त्रिकोणमितिय की मूल जत्रडें यूनानी हैं।) भारतीय त्रिकोणमितिय का पूर्वी संचलन विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान का हिस्सा था, जो कालांतर में पश्चिम की ओर गया। वास्तव में, यही वह समय था, जब भारतीय त्रिकोणमितिय का अरब विश्व पर भी खासा प्रभाव हो रहा था (आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, ब्रम्हगुप्त एवं अन्य के लेखनकार्यों के अरबी अनुवाद के जरिए), और बाद में अरबों के जरिए यूरोपीय गणित को भी प्रभावित कर पाया (1150 में भारतीय लेखन पर आधारित अरब गणितीय पाठों का प्रथम लातिनी अनुवाद हो रहा था, यह नालंदा के आकस्मिक समापन के थोड़े ही समय पहले की बात है।)

यही वह सामान्य बौद्धिक सजीवता है, इस सजीवता में विश्लेषकीय एवं वैज्ञानिक सवालात भी है, जिनकी, प्राचीन नालंदा की गतिविधियों को समझते समय हमें तारीफ करनी है। मैं संपूर्ण स्वाधीनता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि नालंदा हालाँकि धार्मिक संस्थापन था, लेकिन संस्थापन के धर्म को साझा करने की बजाय जन कल्याण के सामान्य बौद्धिक एवं वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसरण की परंपरा वहाँ विद्यमान थी। आइसैक न्यूटन धार्मिक थे, वास्तव में रहस्ययभिमुखी थे और फिर भी भौतिक विज्ञान, गणित और प्रकाश विज्ञान के स्वाभाव में उन्होंने क्रांति की और उन्हें अपने महाविद्यालय (जो कि मेरा और वेंकी रामाकृष्णन का भी महाविद्यालय है) की (यानी त्रिनिटी की) अतिधर्मिता से किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी, न ही उन्होंने उसकी संगतता को लेकर किसी तरह के सवाल, ताकतवर तर्कों के जरिए उठाए जो कुछ साल बाद हेनरी सिड्गविक जैसे त्रिनिटी के लोगों ने उठाए थे। नालंदा में धर्म और विज्ञान का मेल किसी भी तरह से अनूठा नहीं था और इसे और एक उदाहरण के जरिए समझा जाए; वर्तमान में विश्व के प्राचीन विश्वविद्यालयों में से एक, पैडूआ क्रिश्चियन विश्वविद्यालय, गैलिलियो गैलिली जहाँ की देन हैं। (संयोगन, पैडूआ विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि स्वीकारते समय मैं हँस रहा था, क्योंकि मैंने सुना कि पॉल रिकोएर, जिन्हें भी यह उपाधि दी जानी थी, पैडूआ विश्वविद्यालय को खूब कोस रहे थे कि यह विश्वविद्यालय गैलिलियो के पक्ष में ठीक तरह से खड़ा नहीं था। रिकोएर के तर्क निर्दोष थे, लेकिन पैडूआ के वर्तमान अधिष्ठाता को गैलिलियो के समर्थन में पैडूआ के न खड़े होने के लिए दोष देना जरा अन्यायकारी प्रतीत होता है।) मैं नहीं जानता कि नालंदा में इस तरह के विवाद किस हद तक उभरे, लेकिन जैसे-जैसे दस्तावेज प्रकाश में आ रहे हैं, हम जान पाएंगे कि क्या नालंदा में धर्म और विज्ञान के संबंध में किसी तरह का तनाव था या नहीं। लेकिन जो बात स्पष्ट है वह यह कि बौद्ध संस्थापन ने विश्लेषकीय एवं वैज्ञानिक विषयों की खोज के लिए नालंदा विश्वविद्यालय परिसर में ही जगह उपलब्ध कराई थी।

तीसरा प्रश्न नालंदा में पढ़ाए जाने वाले विषयों से संबंधित है। यहीं पर समस्या हो रही है, क्योंकि नालंदा के दस्तावेज बख्तियार और उसकी विजेता सेना ने अधाधुंध तरीके से जला दिए थे। इसलिए हमें नालंदा के विद्यार्थियों द्वारा लिखे गए ऑंखों देखे नोट्स पर निर्भर करना होगा और क्योंकि भारतीय इतिहास लेखन के प्रति मौन साधे रखते हैं (यही अपने आप में रोचक विषय है) और बाहरी लोग भारतीयों के इस मौन से इत्तेफाक नहीं रखते, जैसे, जुआंगज़ैंग और याइ जिंग। हम वहाँ पढ़ाए जाने वाले विषयों के बारे में और जिन विषयों पर अनुसंधान हुए उनके बारे में जानते हैं, जो कि चिकित्सा शास्त्र, जन स्वास्थ्य, वास्तुशिल्प और खगोल विज्ञान हैं, धर्म, इतिहास, कानून और भाषा संबंधी विषयों के साथ।

लेकिन गणित के बारे में क्या? नालंदा के चीनी इतिहास लेखक जैसे याइ जिंग और जुआंगज़ैंग गणितीय अध्ययनों में शामिल नहीं थे। भारतीय गणित में गहन रुचि रखने वाले चीन के लोग, जैसे कि याइ सिंग नालंदा के विद्यार्थी नहीं थे। हो सकता है कि कुछ लोग हों जो कि भारत में रहते हों या कि चीन में या फिर दुनिया में और कही, जिन्होंने नालंदा से गणित (उस कालखंड में यह विषय खूब फल-फूल रहा था) की पढ़ाई की हो और उनके दस्तावेज गुम हो गए हों। बहरहाल, भारतीय संदर्भों से हम जानते हैं कि नालंदा में तर्कशास्त्र एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता था और मुझे उम्मीद है कि गणित के नालंदा के पाठयक्रम में होने के बारे में साक्ष्य भविष्य में हमें कभी न कभी जरूर मिलेंगे।

नालंदा के पाठयक्रम में गणित की उपस्थिति की दिशा में अपरोक्ष साक्ष्य यह है कि खगोल विज्ञान नालंदा के पाठयक्रम का हिस्सा था। जुआंगज़ैंग ने इस पर टिप्पणी लिखी है और अवलोकनार्थ बनाए गए मीनार के संदर्भ में लिखा है मानो यह बादलों के बीच ऊपर अवस्थित हो, और जिससे नालंदा के परिसर का विहंगम दृश्य दिखाई देता था। उस कालखंड में भारतीय और चीनी खगोल विज्ञान की प्रगति, गणित के, खासकर त्रिकोणमितिय विकास, से अत्यंत करीब से जुड़ी हुई थी। असल में, चीनी जिन भी भारतीय विद्वानों को खगोल विज्ञान के कार्यों के लिए चीन लेकर गए थे, वे सभी गणितज्ञ थे (उनमें से एक आठवीं शताब्दी के चीन में खगोल विज्ञान के लिए बनी आधिकारिक परिषद के निदेशक भी बने।)। जो भारतीय गणितज्ञ चीन गए उनके वंशक्रम के बारे में हम ज्यादा नहीं जानते कि जिससे उनका नालंदा से संबंध निर्धारित हो सके, लेकिन हम यह तो जानते हैं कि पाँचवीं शताब्दी के आरंभ से ही पाटिलपुत्र (पटना) के समीप कुसुमपुर नामक स्थान पर इस विषय के प्रवर्तक अग्रणी गणितज्ञगण एकत्रित होते थे।

मैं दो अंतिम टिप्पणियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ। पहला नालंदा के बौद्धिक आयाम से संबंधित है, जो नालंदा के विषय में चीनी और भारतीय विद्वानों के वृतांतों में पूरी ताकत से उभरता है। नालंदा के गुरु-शिष्य तर्क-प्रेमी थे और कई बार शास्त्रार्थ का आयोजन करते थे। मैंने कहीं और तर्कशास्त्र के गहन स्वरूप के भारतीय बौद्धिक इतिहास पर चर्चा की है, यहाँ मैं यह जोड़ना चाहता हूँ कि यह वैज्ञानिक परंपरा का भी हिस्सा है, तर्कों की प्रस्तुति और रक्षा, स्थितियों और दावों को अस्वीकारना सिर्फ विश्वास के भरोसे। नालंदा में तर्क-शास्त्रार्थ के खूब मुकाबले आयोजित होते थे और कहा जा सकता है कि अत्यंत सामान्य तरीके से यह नालंदा के वैज्ञानिक संबंधों में फिट भी होते थे।

अंतिम टिप्पणी नालंदा के ज्ञान और विवेक के अनुरागी प्रचारक रूप से संबंधित है। यह भी एक कारण है कि हमेशा वहाँ विदेश के विद्यार्थियों के लिए एक आतुरता होती थी। जुआंगज़ैग आर याइ जिंग ने चीन से नालंदा पहुँचने पर हुए गर्मजोशी भरे स्वागत का जिक्र किया है। जुआंगज़ैंग ने तो वास्तव में नालंदा में शिक्षा पूर्ण करने के बाद एक शिक्षक द्वारा वहीं रुककर शिक्षा देने की पेशकश और दबाव पर तर्क देते हुए वही प्रतिबद्धता जाहिर की। उसने अपनी प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए बुद्ध के ही वचन का सहारा लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सारी दुनिया को प्रबुद्ध बनाओ। उसने भाषणगत सवाल किया, 'कौन यह रहकर अकेले ही आनंदित होना चाहेगा और उन्हें भूल जाएगा जो प्रबुद्ध नहीं हैं?' यदि साक्ष्यों की तलाश एवं आलोच्य तर्कों से उनका रक्षण विज्ञान की परंपरा का एक भाग है, तो ज्ञान और विवेक को स्थानीयता से मुक्त करने की प्रतिबद्धता भी उसी परंपरा का हिस्सा है। विज्ञान को संकीर्णता से जूझना पड़ता है और नालंदा इसके प्रति दृढ़ता से प्रतिबद्ध था।

(चेन्नई में 4 जनवरी को संपन्न 98वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में डॉ. अमर्त्य सेन का मुख्य भाषण, डॉ. अमर्त्य सेन को 1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार मिला और 1999 में भारत रत्न। वह अमेरिका के हावर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं और नालंदा विश्वविद्यालय के अंतरिम प्रशासकीय परिषद के अध्यक्ष हैं।मूल अंग्रेजी से अनुवादः पुष्पेन्द्र फाल्गुन,पुष्पेन्द्र जी के फेसबुक से साभार) 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

तथ्य से भागे हुए लोग

       आमतौर पर यह देखा गया है कि साधारण आदमी विज्ञानसम्मत बातों को मानने की बजाय कॉमनसेंस ,पुरानी धारणाओं और विश्वासों पर सहज विश्वास कर लेता है। आप उसे कितना ही विज्ञानसम्त बातें कहें, व्यक्ति की यह सामान्यप्रकृति है कि पुरानी मान्यताओं पर विश्वास ज्यादा करता है और विज्ञानसम्मत बातों को कम मानता है। विज्ञानसम्मत बातें सत्य होती हैं लेकिन पुरानी मान्यताओं के आधार पर सोचने वाले लोग सत्य को जानना और सुनना आम तौर पर पसंद नहीं करते। इस धारणा को हाल ही में बाबरी मस्जिद पर आए अदालत के फैसले के संदर्भ में और कुछ अर्सा पहले क्लाईमेट चेंज की बहस के संदर्भ में देखा गया। आम लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं बल्कि वे अपनी अवैज्ञानिक मान्यताओं पर अगाध आस्था बनाए रखते हैं। हाल ही में जरनल ऑफ रिस्क रिसर्च में एक रिसर्च प्रकाशित हुई है जिसमें इस बात की ओर ध्यान खींचा गया है। रिपोर्ट पढ़ें-

People Are Allergic to the Facts
By Tom Jacobs, Miller-McCune.com
Posted on October 8, 2010, Printed on October 9, 2010
http://www.alternet.org/story/148318/

A clear consensus of opinion emerges within the scientific community on an important issue, such as climate change. But the public, and its elected leaders, remains unconvinced and unreceptive to well-founded warnings.

With this phenomenon growing frustratingly familiar, researchers can be forgiven if they begin to feel like Rodney Dangerfields in lab coats. From their perspective, they don’t get no respect.

Newly published research suggests that’s not entirely true: Americans do believe and trust researchers. But we focus our attention on those experts whose ideas conform with our preconceived notions. The others tend to get discounted or ignored.

“Scientific opinion fails to quiet societal disputes on such issues (as climate change) not because members of the public are unwilling to defer to experts, but because culturally diverse persons tend to form opposing perceptions of what experts believe,” a team of scholars writes in the Journal of Risk Research. “Individuals systematically overestimate the degree of scientific support for positions they are culturally predisposed to accept.”

The research team, led by Dan Kahan of Yale Law School, studied “a broadly representative sample” of 1,500 Americans in 2009. Through a series of questions, their cultural beliefs were measured on what can be called a left-right scale (although the researchers do not use the terms “liberal” and “conservative” in their paper). Those strongly holding egalitarian and communitarian outlooks were on one end of the spectrum, while those with hierarchical and individualistic views were on the other.

Participants were then presented with a series of statements and asked whether in their view most experts concurred with them. Three of the statements represented the consensus of scientific opinion: “Global temperatures are increasing,” “Human activity is causing global warming,” and “Radioactive wastes from nuclear power can be safely disposed of in deep underground storage facilities.”

Finally, the participants were introduced to a fictional expert on one of those subjects, who either agreed or disagreed with their position. After reviewing the researcher’s credentials and reading a bit of their writing, each participant rated the degree to which they found the expert knowledgeable and trustworthy.

On the first question, participants were predisposed to believe that a majority of experts agreed with their personal point of view. Among those with an egalitarian/communitarian mindset (i.e., liberals), 78 percent reported (correctly) that there is a scientific consensus that climate change is occurring.

But among those with a hierarchical/individualistic attitude (i.e., conservatives), only 19 percent said there was a scientific consensus that climate change is real. Fifty-six percent reported the scientific community is divided on the issue, and another 25 percent insisted that most scientists agree with them that climate change is not real.

Before you start cursing close-minded conservatives, consider this: When it came to the issue of safely storing nuclear waste, the opposite effect was found (although the differences between the two groups were not as large). Thirty-seven percent of those on the right reported, correctly, that the scientific consensus supported their view. In contrast, 35 percent of those on the left inaccurately believe the scientific consensus reflects their opinion.

When it came to assessing the imaginary expert, the attitude he purportedly held “dramatically affected the responses” of the participants, Kahan and his colleagues report. If his writing sample reflected the belief the planet is at high risk from global warming, 87 percent of those on the left agreed he was trustworthy and knowledgeable, compared to 23 percent of those on the right. The numbers reversed when the expert, with the exact same credentials, stated that climate-change risks are low: 86 percent of conservatives called him knowledgeable and trustworthy, compared to 47 percent of liberals.

The bottom line: We seek out, and find comforting confirmation from, experts who agree with our pre-existing beliefs. The researchers call this a matter of “cultural cognition.” As Kahan put it in a recent editorial in the journal Nature:

“People find it disconcerting to believe that behavior that they find noble is nevertheless detrimental to society, and behavior that they find base is beneficial to it. Because accepting such a claim could drive a wedge between them and their peers, they have a strong emotional predisposition to reject it.”

Whether that intense inclination is exclusively peer-based or due in part to internal factors, such as a genetic predisposition to a particular ideological outlook, remains an open question. But either way, scientists and policymakers who base their decisions on science have a problem. Kahan and his colleagues offer some possible ways around this dilemma, but they’re admittedly sketchy and tentative.

“To overcome this effect,” they write, “communicators must attend to the cultural meaning as well as the scientific content of information.” The researches recommend “crafting messages to evoke narrative templates that are culturally congenial to target audiences.”

Kahan gives a couple of examples in his Nature editorial, suggesting that people with individualistic values might be more receptive to climate change arguments “if made aware that the possible responses to climate change include nuclear power and geoengineering, enterprises that to them symbolize human resourcefulness.

“Similarly, people with an egalitarian outlook are less likely to reflexively dismiss evidence of the safety of nanotechnology if they are made aware of the part that nanotechnology might play in environmental protection, and not just its usefulness in the manufacture of consumer goods,” he adds.

In other words, scientists need to do some radical reframing if they hope to get through to people whose world view is threatened by their results. While there’s no guarantee that effort will succeed, Kahan and his colleagues convincingly argue that the effort is “critical to enlightened democratic policymaking.” Otherwise, our gut instincts will remain the experts we rely upon the most.

Tom Jacobs is a veteran journalist with more than 20 years experience at daily newspapers. He has served as a staff writer for the Los Angeles Daily News and the Santa Barbara News-Press. His work has also appeared in the Los Angeles Times, Chicago Tribune and Ventura County Star.

© 2010 Miller-McCune.com All rights reserved.






रविवार, 4 जुलाई 2010

दस साल बाद जेनोम की दुनिया -अरूण माहेश्वरी


(आधुनिक विज्ञान के दादागुरू डार्विन)
               पूरे दस साल पहले की बात है। 26 जून 2000 के दिन जीव विज्ञान के क्षेत्र में खुशियों की एक लहर दौड़ गयी थी जब यह पता चला था कि मानव जेनोम के पूरे नक्शे को तैयार कर लिया गया है। जेनोम के तीन अरब अक्षरों को क्रमवार सजा कर यह दावा किया गया था कि अब आदमी के जीवन की किताब को पढ़ा जा सकेगा। हालांकि तब इसे किताब का एक मसौदा ही कहा गया था, क्योंकि अभी आगे और बहुत कुछ सामने आना बाकी था। तथापि, सरकारी, गैर–सरकारी – सभी स्तरों पर इस दिशा में वर्षों से चल रहा शोध तब एक मुकाम पर पहुंचा था और अमेरिका में सार्वजनिक क्षेत्र के फ्रांसिस कौलिन्स और निजी क्षेत्र के क्रैग वेंटर, दोनों ने एक साथ ही अपने इस अभूतपूर्व काम के एक बड़े पड़ाव तक पहुंच जाने की घोषणा की थी।

           जिनोम का मतलब है आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका के अंदर की जेनेटिक सामग्री का समग्र रूप। आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका में 23 डीएनए मोलिक्यूल अर्थात क्रोमोजोम्स होते हैं जिनमें वे दो क्रोमोजोम्स भी शामिल हैं, जो उसे उसके माता–पिता से मिलते हैं। ऐसे प्रत्येक क्रोमाजोम में तीन अरब रासायनिक इकाइयां (बेस पेयर) होती है। इन रासायनिक इकाइयों के क्रमवार नक्शे को ही जेनोम कहते है। आदमी के शरीर में हर प्रकार का परिवर्तन निश्चित तौर पर इस नक्शे में हेर–फेर का कारण बनता है, इसीलिये मानव जेनोम के पूरे होजाने को मानव जिंदगी के रहस्य तक पहुंचने और इस प्रकार शरीर में हर प्रकार के विकार से निपटने की कुंजी के तौर पर देखा जारहा है। जाहिर है कि इससे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तो एक प्रकार का आमूल परिवर्तन आजाने की बात तक की जाती है। 

      बहरहाल, दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा पूरा हुआ, उस समय नयी–नयी दवाओं, व्यक्ति–व्यक्ति पर लागू होने वाली खास जेनेटिक दवाओं के क्रांतिकारी उद्भव की जो सारी बातें कही गयी थी और ढेर सारी दवा कंपनियों ने इससे अपने लिये बेशुमार मुनाफे का पहाड़ तैयार करने के जो सपने देखने शुरू किये थे, दस वर्ष बीतते न बीतते बहती गंगा में हाथ धोने की ललक से इस दिशा में कूद पड़ने वाली कई निजी कंपनियां अब तक उसमें डूब कर शांत हो चुकी है। 
             सेलेरा कंपनी ने बड़ी भारी उम्मीदों से डा. वेंटर के जिनोम कार्य के लिये धन जुटा कर दिया था, उसने दो साल बाद, 2002 में डा.वेंटर को ही एक भारी घाटे का सौदा मान कर अपनी कंपनी से निकाल बाहर किया। सेलेरा से निकलने के बाद डा.वेंटर अपनी एक नौका में सारी दुनिया की समूद्री यात्रा पर निकल पड़े थे और ‘विश्व समुद्री नमूना संग्रह अभियान’ के अंतर्गत जगह–जगह के समुद्रों से बैक्टेरिया के नमूने इके करने के अलावा उन्होंने एक शोध संस्थान की स्थापना की, जिस संस्थान में एक महीने पहले ही पहली बार पूरी तरह से कृत्रिम जेनोम के जरिये जीव की रचना संभव हुई है।
        मानव जिनोम का पूरा नक्शा तैयार कर लिये जाने के एक दशक बाद, कृत्रिम जिनोम (सिंथेटिक जिनोम) के जरिये जीव की उत्पत्ति को जेनेटिक शोध के क्षेत्र की एक ऐसी असाधारण उपलब्धि कहा जा रहा है, जिसे जीव विज्ञान में गुणात्मक रूप से एक बिल्कुल नये दौर का प्रारंभ–बिंदु, बल्कि जीव विज्ञान मात्र का दूसरा चरण कहां जा सकता है। 
       दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा तैयार हुआ उसके साथ मनुष्य के बारे में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई जिन्होंने सिर्फ‍ जीव विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज विज्ञान, नृतत्वशास्त्र और राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में भी कई प्रकार की प्रचलित अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों को उलट–पुलट कर रख दिया था। 
      मसलन्, समाज विज्ञान के क्षेत्र में मानवीय जेनोम से यह बात निर्विवाद तौर पर साबित होगयी कि पूरी मानव जाति जिसमें गोरे, काले, भूरे सब रंग के लोग शामिल हैं, जीव विज्ञान की दृष्टि से बिल्कुल एक, और समान है। मनुष्य की अलग–अलग नस्लों की बातें कह कर आदमी आदमी में भेद करने के नस्लवाद के अब तक जो तमाम सिद्धांत गढ़े जाते रहे हैं, वे शैतान दिमागों की कपोल कल्पनाओं से अधिक और कुछ नहीं रहे हैं। मानवीय जिनोम की पहचान के बाद आगे के शोध के ताजा नतीजों से यह बात और भी पुष्ट हुई है कि मनुष्यों में रंग और व्यवहार संबंधी सारी विविधताओं से उनकी जेनेटिक संरचना का कोई संबंध नहीं है। इन विविधताओं का गहरा और बुनियादी संबंध आदमी के परिवेश, मौसम, प्राग–ऐतिहासिक बैक्टीरिया और संस्कृति आदि से है। 
         इस शोध से दूसरी, और भी महत्वपूर्ण बात यह साबित हुई है कि जीव विज्ञान के पूरे मामले में किसी बाहरी, सर्वशक्तिमान के लिये कोई जगह नहीं है। जीव के प्राणों को लेकर भौतिकी और रसायनशास्त्र से इतर, ईश्वरीय शक्ति को लेकर जितने प्रकार की दार्शनिक अटकलपच्चियां की जाती रही है, जेनोम प्रकल्प ने उन्हें पूरी तरह से निराधार और बेतुका साबित कर दिया है। 
         जिस प्रकार टेलिस्कोप ने नक्षत्र विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति की, माइक्रोस्कोप ने जीव विज्ञान में तथा स्पेक्ट्रोस्कोप ने रसायन शास्त्र में उसी प्रकार यह जिनोमिक क्रांति कमप्यूटर की ताकत पर निर्भर है। कमप्यूटर भी तो उसके अंदर की लगातार बदलती भौतिक स्थितियों के कुल योग के अलावा कुछ नहीं है, जिन स्थितियों को कम्प्यूटर के प्रोसेसर के अंदर विद्युत आवेगों की तेजी से बदलती आकृतियों से स्वतंत्र रूप में सूचना विज्ञान नामक ज्ञान की एक शाखा के जरिये प्रत्ययों में कल्पित और प्रसंस्करित किया जा सकता है। 
          नये जीव विज्ञान में किसी भी कोशिका के अंदर के रसायन को हार्डवेयर माना जा रहा है। डीएनए में निहित सूचना उसमें पहले से उपस्थित(प्रीलोडेड) साफ्टवेयर की तरह है। कोशिकाओं के अंदर रसायनों की अंतक्र्रिया प्रोसेसिंग और मेमोरी चिप्स की लगातार परिवर्तनशील स्थितियां है। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि जेनोम के बारे में पूरी समझ का विकास आशा से कहीं ज्यादा जटिल और पेचीदा साबित हुआ है। यद्यपि अब तक की किसी भी खोज ने इसके अलावा और कुछ नहीं बताया है कि किसी भी कोशिका को बनाने के लिये जरूरी सारी सूचनाएं डीएनए में निहित होती है। लेकिन इन सबका योगफल दो और दो चार की तरह सीधा और सरल नहीं है। अलग–अलग हिस्सों के कुल योग की तुलना में उनका इका और समग्र रूप कहीं ज्यादा बड़ा होता है। 
        मसलन्, आदमी की तरह के सबसे उन्नत और जटिल समझे जाने वाले प्राणी की कोशिकाओं में जीन्स की संख्या अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं है। सबसे तुच्छ प्राणी मानी जाने वाली एक किरमी में 18हजार जीन्स पाये जाते हैं जबकि सबसे उन्नत प्राणी मनुष्य में इनकी संख्या 31 हजार के करीब है। संख्या के लिहाज से किरमी की तुलना में बहुत अधिक जीन्स न होने पर भी मानवीय जेनोम के चमत्कारी कार्य की वजह यह है कि ये जीन्स अलग–अलग नहीं बल्कि आपस में मिल कर एक नेटवर्क के रूप में काम करते हैं। अरबों रासायनिक इकाइयों की तरह ही जीन्स की आपसी नेटवर्किंग के अरबों रूप हो सकते हैं। यही वजह है कि जल्दबाजी में इनसे कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना विवेकसंगत नहीं है, जो चट मंगनी पट ब्याह की मानसिकता से रातो–रात दवाओं की नयी पौद तैयार करके जेनेटिक विज्ञान को अपने मुनाफे के लिये तत्काल दुह लेने को आकुल लोगों के रास्ते की बाधा बन गया है। 

        बहरहाल, इतना तो साफ है कि लगातार बढ़ रही कम्प्यूटरों की ताकत के चलते वह दिन दूर नहीं, जब व्यक्ति–व्यक्ति के जिनोम को तैयार करके उसके हर क्रोमोजोम की तीन अरब रसायनिक इकाइयों का तुलनात्मक अध्ययन करना पूरी तरह से संभव होगा और इससे चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में संभावनाओं के अकल्पनीय दरवाजे खुलेंगे। पिछले सिर्फ एक दशक के काल में कमप्यूटर की ताकत 30 गुना से ज्यादा बढ़ी है। इसके चलते अब आगे के जिनोम प्रकल्पों पर तुलनात्मक रूप में बेहद कम खर्च पड़ रहा है। अमेरिका में डीएनए का नक्शा तैयार करने में लगे सबसे बड़े केंद्र ब्रोड इंस्टीट्यूट, कैम्ब्रिज, मैस्चुशेट्स के प्रमुख एरिक लेंडर के अनुसार उनके संस्थान में डीएनए को क्रमवार सजाने का खर्च एक दशक पहले के खर्च की तुलना में लाख हिस्से के बराबर रह गया है। आज यह अनुमान किया जाता है कि आने वाले तीन वर्षों में सिर्फ हजार डालर की लागत पर पंद्रह मिनट में एक मानव जिनोम तैयार हो जायेगा। 
         यह जीव विज्ञान के इस दूसरे चरण की शक्ति का ही परिचय है जिसके चलते मनुष्य से सबसे निकटवर्ती माने जाने वाली प्रजाति, नियेनडर्टल मैन के चालीस हजार साल पुराने डीएनए के लगभग एक अरब तीस लाख हिस्सों को सजा कर उनका नक्शा तैयार कर लिया गया है। जिस दिन लिपजिग के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के स्वाते पाबो ने अमेरिकन एशोसियेशन फार द एडवांस साइंस की एक सभा में यह घोषणा की थी कि नियेनडर्टल मैन का जेनोम तैयार होगया है, यह संयोग की बात है कि 12 फरवरी 2009 का वह दिन युगांतकारी प्राणीविज्ञानी चाल्र्स डार्विन का 200वां जन्मदिन था। नियेनडर्टल मैन से आज के मनुष्य के जेनोम का तुलनात्मक अध्ययन कितना महत्वपूर्ण होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे एक प्रकार से मनुष्य के जेनेटिक विकास के पूरे इतिहास की रचना संभव हो पायेगी। डार्विन के निरीक्षणों, संग्रह, अनुशीलन और सैद्धांतिक परिकल्पनाओं में उनकी समूद्री यात्राओं का बड़ा योगदान माना जाता है। अपनी इन यात्राओं के जरिये ही वे जीवित और लुप्त जातियों के संबंधों, उनके भौगोलिक वितरण आदि के बारे में इतना कुछ जान पाये थे जो विकासवाद के उनके सिद्धांत का कारक बना। इसीप्रकार, आज दुनिया की नजर डा.वेंटर द्वारा तैयार किये गये कृत्रिम जिनोम और इसके साथ ही जगह–जगह से संग्रहीत बैक्टीरिया के नमूनों को लेकर किये जाने वाले परीक्षणों पर है। इन सबसे सिफ‍र् चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में नहीं, पूरे मानव समाज के विकास के बारे में ऐसे चौंकाने वाले नतीजे सामने आयेंगे, जिनकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मानव समाज की गति–प्रकृति पर नजर रखने के लिये ज्ञान–विज्ञान के क्षेत्र की ऐसी सभी युगांतकारी खोजों के बारे में जागरूक रहना जरूरी है। 
      इस बात का भी ख्याल रखने की जरूरत है कि विश्व–पूंजीवाद के चलते विज्ञान की यह महान उपलब्धि दुनिया में विषमता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने का सबब न बने। जिस प्रकार आज की दुनिया में डिजिटल डिवाइड की बात की जाती है, उसी प्रकार आगे किसी जेनोमिक डिवाइड का खतरा पैदा न होने पायें। 

सोमवार, 14 जून 2010

‘लाइव इंडिया टीवी ’ पर ‘वैज्ञानिक सनसनी’ का खेल

कल दोपहर टीवी चैनलों में अंधविश्वास की दोपहर थी। सभी चैनलों में सेक्स स्कैण्डल में फंसे स्वामी नित्यानंद की तथाकथित अग्नि परीक्षा का कवरेज प्रधान खबरों में था।  दूसरी ओर ‘लाइव इंडिया’ टीवी चैनल ने कल अचानक दोपहर में एक कार्यक्रम के जरिए अंधविश्वास पर धावा बोल दिया।
       टीवी चैनलों पर अंधविश्वास का बढ़ता हुआ ‘फ्लो’ इस बात का प्रमाण है कि समाज में अंधविश्वास अब स्वैच्छिक कुटीर उद्योग नहीं रहा बल्कि संगठित कारपोरेट उद्योग की शक्ल ले चुका है। मनोरंजन उद्योग या संस्कृति उद्योग ने उसे अपने सांस्कृतिक ‘फ्लो’ और विज्ञापन के जरिए मुनाफा कमाने का जरिया बना लिया है।   
      ‘लाइव इंडिया’ के द्वारा 13 जून 2010 को विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार-प्रसार के नाम पर जो कार्यक्रम पेश किया उसमें बार-बार बाबाओ के द्वारा जनता को गुमराह करने और ठगने वाली चमत्कारिक घटनाओं को निशाना बनाया गया और सही ढ़ंग से कई चमत्कारों की पोल खोली गयी। समूचे कार्यक्रम का ढ़ांचा अंधविश्वासों पर प्रश्न चिन्ह लगाता था। इस तरह के कार्यक्रम की सीमित उपयोगिता है। यह कार्यक्रम ऐसे समय में आया था जब स्टार न्यूज वाले एक दिन पहले शनि पर केन्द्रित कार्यक्रम पेश कर चुके थे। दूसरी ओर स्वामी नित्यानंद की अग्निपरीक्षा का कवरेज विभिन्न चैनलों में दिखाया जा रहा था।
       ‘लाइव इंडिया’ टीवी चैनल के इस चमत्कार-अंधविश्वास विरोधी कार्यक्रम को चैनल के एक कार्यक्रम के रूप में देखने से चीजें समझने में असुविधा हो सकती है। टीवी पर अंधविश्वासों की प्रस्तुति के बारे में यह ध्यान रहे कि चैनल के कार्यक्रमों के समग्र ‘फ्लो’ के संदर्भ में किसी कार्यक्रम के प्रभाव को देखा जाना चाहिए। ‘लाइव इंडिया’ की मुश्किलों का सिलसिला यहीं से शुरू होता है।
    मजेदार बात यह है कि ज्योंही इस चैनल ने चमत्कारों के खिलाफ कार्यक्रम खत्म किया उसके तत्काल बाद ज्योतिष फलादेश का कार्यक्रम दिखाना आरंभ कर दिया और अपने कार्यक्रम की महत्ता और प्रभाव को नष्ट कर दिया।
     अंधविश्वास और चमत्कार हजारों सालों से चले आ रहे हैं और इनका विशाल सामाजिक-वैचारिक आधार है। आम लोग चमत्कारों-अंधविश्वासों को लेकर भरोसे में जी रहे हैं। आम लोग के भरोसे को सनसनी फैलाकर या वैचारिक घालमेल करके या तदर्थ उपायों से जीतना संभव नहीं है। इस तरह के सभी हथकंड़े अंधविश्वासों को मानने वाले लोगों का दिल जीतने में मदद नहीं करते।
     ‘लाइव इंडिया’ टीवी का पूरा फॉरमेट सनसनी वाला है। सनसनी के जरिए विवेक पैदा नहीं होता ,इससे सिर्फ ध्यानाकर्षित करने में मदद मिलती है। ध्यानाकर्षित करने की कला रेटिंग बढ़ाने की कला है। ज्ञान की रेटिंग सनसनीखेज प्रस्तुति से नहीं बढ़ती । सनसनीखेज प्रस्तुति से मनोरंजन होता है। वैज्ञानिकचेतना पैदा नहीं होती। सनसनी की कला ‘सेल’ की कला है।      
    इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक अमिताभ ने सही कहा कि हम वैज्ञानिक अज्ञात को ज्ञात से जानते हैं। व्याख्यायित करते हैं। ये बाबा लोग ज्ञात को अज्ञात के जरिए व्याख्यायित करते हैं। डा़ नायर ने कहा चैनलों के जरिए अंधविश्वास फैलाना सामाजिक अपराध है और संविधान के अनुच्छेद 51 की भावनाओं का उल्लंघन है। हमारे समाज की मुश्किल यह है कि 16वीं सदी की मानसिकता का 21वीं सदी की तकनीक के साथ घालमेल हो रहा है।
        चैनलों पर अंधविश्वास-चमत्कार विरोधी कार्यक्रमों के सकारात्मक प्रभाव के लिए जरूरी है चैनल का विवेकसम्मत फॉरमेट हो। चैनल की दबे-कुचले लोगों के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में साख हो। खासकर कमजोर मन के लोगों,बच्चों और औरतों के प्रति प्रतिबद्धता हो। क्योंकि इन समूहों को अंधविश्वास जल्दी निशाना बनाते हैं।   

   



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...