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सोमवार, 27 अगस्त 2012

अवसरवादी राजनीति के जाल में फंसा बोडो का जातीय संकट

जातीय संघर्ष हो या साम्प्रदायिक दंगे  भारत के अधिकतर नेता जातीय समस्या को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं। भारत में जातीय और साम्प्रदायिक दंगे जब भी होते हैं तो अवसरवादी राजनीति और प्रशासनिक निकम्मापन खुलकर सामने आ जाता है।बोडो इलाके में भी इनदिनों यही हो रहा है।राज्य प्रशासन इसे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में ही देख रहा है ,जो गलत है।

विगत दो माह से बोडोलैंड के इलाके में तनाव है। बोडो समुदाय के अतिवादियों ने गैर बोडो समुदाय के लोगों पर सामूहिक हमले किए हैं। इन हमलों में 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सैंकड़ों लोग घायल हुए हैं और पांच लाख स्थानीय बाशिंदे विस्थापित हुए हैं। हाल ही में बोडो हिंसाचार और विस्थापन के आरोप में बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक प्रदीप कुमार ब्रह्मा को असम पुलिस ने गिरफ्तार किया है। ब्रह्मा की गिरफ्तारी के बाद इस इलाके में तनाव बढ़ गया है। गिरफ्तारी के तत्काल बाद ही उनके समर्थकों ने रेल यातायात ठप्प करके असम को बाकी देश से काट दिया और अंत में मजबूर होकर सेना को स्थिति संभालने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा।

बोडो नेता प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ पुलिस थाने में अनेक केस दर्ज हैं और उनका दल कांग्रेस के साठ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है। विलक्षण बात यह है कि प्रदीप ब्रह्मा का बोडो पीपुल्स फ्रंट एक तरफ कांग्रेस सरकार के सत्तारूढ़ मोर्चे में शामिल है वहीं दूसरी ओर उसे भाजपा का भी समर्थन हासिल है। जिस समय दिसपुर के अधिकारियों ने प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया तो उनसे यही कहा गया कि वे बोडो पीपुल्स फ्रंट के लोगों के प्रति नरमी बरतें क्योंकि कांग्रेस को डर है कि उनकी राज्य सरकार बोडो विधायकों के समर्थन वापस ले लेने से गिर सकती है और यही वह बुनियादी वजह है कि बोडो अतिवादियों ने जब हमले आरंभ किए तो राज्य प्रशासन मूक दर्शक बना रहा और बोडो हिंसाचार की जांच का काम सीबीआई के हवाले कर दिया है। अब प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ जो केस दर्ज हैं उनको भी सीबीआई को सौंपने की तैयारियां चल रही हैं। सीबीआई के हवाले जातीय दंगों की जांच सौंपकर राज्य प्रशासन नेसाफ कर दिया है कि वह इन दंगों की जांच करने की स्थिति में नहीं है। उल्लेखनीय है प्रदीप ब्रह्मा के खिलाफ सात आपराधिक मामले कोकराझार के विभिन्न थानों में दर्ज कराए गए हैं जिनमें चश्मदीद गवाहों ने बयान तक दिए हैं। बोडो अतिवादियों के हिंसाचार और लाखों लोगों के पलायन को लेकर ज्योंही बोडो विधायक प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया गया भाजपा ने तत्काल उसकी गिरफ्तारी की निंदा की। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय ने ब्रह्मा की गिरफ्तारी को लोकतंत्रविरोधी और बदले की कार्रवाई कहा। बोडो इलाके में 80 से ज्यादा निर्दोष लोगों की हत्या करने और पांचलाख से ज्यादा लोगों को शरणार्थी बनाने वाले राजनीतिक संगठन के नेता को भाजपा प्रवक्ता तरुण विजय ने राष्ट्रभक्त भारतीय नागरिक कहा है। भाजपा का मानना है कि प्रदीप ब्रह्मा राष्ट्रभक्त भारतीय है जो एक तरफ बंगलादेशी घुसपैठियों और दूसरी ओर पुलिस के दमनतंत्र का शिकार बना है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार प्रदीप कुमार ब्रह्मा को 22 अगस्त को कोकराझार जिले के फकीरग्राम और दोतमा पुलिस थाने में दरिज केस नं.27/2012U/S ,120(बी)/147/ 148/ 149/ 436/426/379/506 की धाराओं में दर्ज मामलों के संदर्भ में आधी रात को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। कोकराझार के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट सी.चतुर्वेदी के सामने 23अगस्त को जब ब्रह्मा की जमानत याचिका पेश की गई तो चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज करके ब्रह्मा को 14दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

दूसरी ओर ब्रह्मा के समर्थकों ने 4-5 घंटे तक असम के विभिन्न इलाकों का समूचा रेल यातायत ठप्प कर दिया , खासकर कोकराझार में जगह जगह प्रतिवाद किया और सड़कों और रेलमार्ग को ठप्प कर दिया। इससे असम का पूरे देश से संपर्क कटा रहा। विभिन्न स्थानों पर सभी ट्रेन 5-6 घंटे तक फंसी रहीं,बाद में ब्रह्मा के समर्थकों ने कोकराझार इलाके में अनिश्चितकालीन बंद की घोषणा कर दी।इस समय कोकराझार में एक तरफ कर्फ्यू है दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट का अनिश्चितकालीन बंद चल रहा है।

एक अन्य घटनाक्रम में विगत शुक्रवार को गोहाटी में प्रेस को सम्बोधित करते हुए दि नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ने नार्थ ईस्ट के छात्रों और पेशेवर लोगों के देश के बाकी हिस्सों से हाल ही में हुए पलायन के खिलाफ आगामी 6सितम्बर को असम को छोड़कर समूचे नार्थ ईस्ट में एकदिन के बंद का आह्वान किया है। उल्लेखनीय है कि यह संगठन उत्तर-पूर्व के राज्यों में छात्रों का संयुक्त मंच है। इसमें विभिन्न राज्यों में सक्रिय छात्र संगठन शामिल हैं।इनमें अधिकांश अतिवादी राजनीति करने वाले संगठन हैं। इस संगठन ने मांग की है कोकराझार में हाल की हिंसा के शिकार विस्थापितों में सिर्फ उन्हीं विस्थापितों को शरणार्थी शिविरों में मदद दी जाए जो माइग्रेट करके भारत नहीं आए हैं। माइग्रेंट पीडितों को कोई मदद न की जाय। दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट के नेता और बोडो आदिवासी परिषद के अध्यक्ष हग्रामा मोहीलरी ने एक बयान जारी करके सारी स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। उन्होंने मांग की है कि हाल के बोडो हिंसाचार के कारण विस्थापित लोगों में उन्हीं लोगों का पुनर्वास किया जाय जिनके नाम 1971 की मतदाता सूची में हैं और जो इसका प्रमाण दे सकें। जिनके पास प्रमाण नहीं है उनका पुनर्वास न किया जाय। यदि इसके बिना विस्थापितों का पुर्नवास किया जायगा तो बोडो आदिवासी परिषद इसका विरोध करेगी। मोहीलरी ने यह भी कहा कि असम में कांग्रेस-बोडो पीपुल्स फ्रंट का गठबंधन बना रहेगा।मोहीलरी ने मांग की है कि भारत-बंगलादेश सीमा को पूरी तरह सील किया जाय और जो वैध नागरिक हैं सिर्फ उनकी ही पुनर्वास व्यवस्था की जाय।

आगामी 26अगस्त को बोडो पीपुल्स फ्रंट का एक प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मिलने दिल्ली जा रहा है और उनको ज्ञापन देकर बोडो इलाके की ताजा स्थिति से अवगत कराएगा। अब सबकी निगाहें शिंदे और बोडो नेताओं की आगामी सप्ताह होने वाली मीटिंग पर लगी हैं। कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि बोडो इलाके में स्थिति सामान्य बनाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकल आए और विस्थापितों को पुनःउनके घरों में ले जाकर बसा दिया जाय और बोडो नेताओं के आक्रोश को भी ठंड़ा कर दिया जाय।यही वजह है कि राज्य और केन्द्र के किसी भी बड़े कांग्रेसी नेता ने हाल की बोडो पीपुल्स फ्रंट की हिंसात्मक कार्रवाईयों की निंदा में एक शब्द तक नहीं कहा और भाजपा ने तो सीधे इस संगठन को समर्थन दिया है। ऐसी स्थिति में जल्द ही कोई समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

शीतयुध्द के बाद मीडिया की भूमिका - 1-

          
शीतयुध्द की समाप्ति के बाद तनाव,युध्द और सामाजिक विपत्ति का रूप बुनियादी तौर पर बदला है। साथ ही सन् 1980 से लेकर 2008 तक के दौर में मीडिया के क्षेत्र में भी अनेक मूलगामी परिवर्तन हुए हैं। नए मीडिया ने नयी संचार संभावनाओं के द्वार खोले हैं। आज जितनी संचार संभावनाएं हैं उतनी पहले कभी नहीं थीं। आज युध्द,तनाव,दंगा,जातीय संघर्ष आदि की परिभाषाएं नए सिरे से तय की जा रही हैं। मीडिया की भूमिका के बारे में पुनर्विचार किया जा रहा है। सामाजिक विपत्ति व्यापक अर्थ में ''तनाव प्रबंधन'' है।
   शीतयुध्दोत्तर दौर में बहुराष्ट्रीय शांति सेनाओं की स्थापना, राजनीतिक हस्तक्षेप और झूठे बहाने से हमले बढ़े हैं। इस कार्य में मीडिया ने सक्रिय मदद की है। कोसोवो से लेकर इराक तक इस फिनोमिना को देखा जा सकता है। द्वितीय विश्वयुध्द की समाप्ति के बाद विभिन्न देशों में आंतरिक तनाव थे। किंतु ये तनाव उस देश विशेष की सीमा तक सीमित थे। किंतु शीतयुध्द के बाद इन तनावों का अंतर्राष्ट्रीय असर देखा गया।
      मसलन् आतंकवाद था और उससे लड़ने के प्रयास आंतरिक स्तर तक सीमित थे। किंतु शीतयुध्द के बाद स्थिति ने पलटा खाया और अब प्रत्येक तनाव अंतर्राष्ट्रीय है। शीतयुध्द के पहले गृहयुध्द में आमतौर राज्य का हाथ होता था,और दूसरी ओर  कम से कम एक गुट गैर-राजकीय शक्तियों का भी सक्रिय रहता था। किंतु शीतयुध्द के बाद बाहरी शक्तियों की भूमिका अचानक बढ़ गयी। अब विपत्ति क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहती बल्कि उसके नाम पर अंतर्राष्ट्रीय धु्रवीकरण और एक्शन भी होने लगे हैं।
    मसलन् भारत के गुजरात राज्य में दंगे हुए ,किंतु गुजरात के दंगों के बहाने अमरीका ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जिस रूख को व्यक्त किया वह किसी भी तर्क के आधार पर स्वीकार्य नहीं है। इराक में सात लाख से ज्यादा निर्दोष लोगों की हत्या में अमरीकी प्रशासन शामिल है किंतु भारत सरकार ने यह नहीं कहा कि हम अमरीका के राष्ट्रपति को भारत नहीं आने देंगे। जबकि नरेन्द्र मोदी को गुजरात के दंगों के आधार पर अमरीका जाने की अनुमति नहीं दी गयी।
    शीतयुध्द के दौर में आंतरिक झगडों का लक्ष्य था स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करना। ऐसे संघर्षों का लक्ष्य लोकतंत्र स्थापित करना नहीं था। (दक्षिण अफ्रीका के स्वाधीनता संग्राम और फिलीस्तीन के मुक्ति संग्राम को छोड़कर) इस तरह के संघर्षों में साधारण जनता को सीधे निशाना बनाया गया और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। यह स्थिति सन् 1971 के भारत-पाक युध्द से लेकर निकारागुआ में सेंदनिस्ता के पराभव के दौर में देख सकते हैं। शीतयुध्द के बाद स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया है।
     शीतयुध्दोत्तर काल में जनता को निरंतर विस्थापन ,उत्पीडन ,अभाव , शारीरिक एवं मानसिक वैचारिक हमलों के बीच रहना होता है। एक ही वाक्य में 'मनोवैज्ञानिक युध्द और हिंसा'' में रहना पड़ता है। इस प्रक्रिया में जनता के एटीट्यूट और नजरिए को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। संकट को बरकरार रखा जाता है। यह जनता के 'हृदय और दिमाग' को सम्मोहित  की कला है। इस कार्य में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
      शीतयुध्द के दौरान विवादित क्षेत्र में दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच युध्द होता था। मालूम था शत्रु कौन है ? युध्द कैसे लड़ा जाना है। मसलन् नागालैंड में लालडेंगा का गुट था, जो हथियारबंद जंग चला रहा था। असम गण संग्राम परिषद नामक संगठन असम में अकेला पृथकतावादी संगठन जंग चला रहा था। यही स्थिति आरंभ में पंजाब में थी।  किंतु कालान्तर में इन सभी इलाकों में अनेक पृथकतावादी संगठन पैदा हो गए। असम और कश्मीर आदर्श उदाहरण हैं वहां एकाधिक संगठन पृथकतावादी और आतंकवादी संघर्ष चला रहे हैं।
       शीतयुध्दोत्तर दौर में राज्य के खिलाफ जंग करने वाले विकेन्द्रित रूप में संघर्ष करते नजर आते हैं, अनेक गुट संघर्ष करते नजर आते हैं। तनाव क्षेत्रों में राज्य और गैर-राज्य की शक्तियों के बीच तनाव में गैर राज्य की शक्तियां ज्यादा ताकतवर नजर आती हैं। सैन्य शक्ति के लिहाज से वे राज्य के सामने बौनी होती हैं। आकस्मिक हिंसाचार के जरिए आतंकी और पृथकतावादी संगठन आम जीवन में वर्चस्व कायम करने में सफल हो जाते हैं और राज्य की संरचनाओं को पंगु बनाती हैं। फलत: तनाव के क्षेत्रों में गैर राज्य की शक्तियों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है। कोई भी व्यक्ति सुरक्षा और जानमाल की क्षति के भय के कारण उनके खिलाफ एकशब्द तक नहीं बोलता।
    गैर राज्य की शक्तियां रंग-बिरंगे मुखौटे लगाकर अपने प्रभाव का विस्तार करती हैं। निरंतर आतंकी कार्रवाईयों के जरिए स्थानीय पुलिस और सैन्यबलों में अपने घुसपैठिए तैयार करते हैं। स्थानीय अपराधी गिरोह,भाड़े के सैनिकों और निजी सेनाओं आदि की मदद लेते हैं। इस समूची राजनीतिक प्रक्रिया को कहीं 'अस्मिता राजनीति', 'स्वतंत्र राष्ट्र' , 'जनतंत्र की स्थापना' आदि नाम से चलाया जाता है। इन  विवादों के  अंतर्राष्ट्रीय आयाम हैं।  ये संघर्ष कभी स्थानीय रसद की मदद के आधार पर नहीं लड़े जाते। पहले इन संघर्षों में मीडिया की न्यूनतम भूमिका थी,किंतु शीतयुध्दोत्तार दौर में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।
    पहले राजनीतिक जंग ज्यादा होती थी । कालान्तर में हथियारों,गोलाबारूद,बंदूक आदि का प्रयोग बढ़ा। पहले राजनीतिक कार्यकर्त्ता थे, राजनीतिक आंदोलन होते थे किंतु धीरे धीरे राजनीतिक आंदोलन में हथियारों और भाड़े के सैनिकों की भूमिका बढ़ी। इन सबके लिए बड़े पैमाने पर रसद जुटाने का काम अमरीका ने किया, तो कहीं पर फ्रांस ,जर्मनी,ब्रिटेन आदि ने किया।
     आज सारी दुनिया में अमरीका ने विकास और लोकतंत्र के नाम पर हंगामा किया हुआ है। इस हंगामे की ओट में वह सक्रिय तौर पर अरबों डालर पृथक्तावादी ताकतों को संसाधन मुहैयया कराने पर खर्च कर रहा है। अमरीका के द्वारा घोषित और अघोषित तौर पर सैन्य और आर्थिक मदद मुहैयया कराने के लिए सीआईए से लेकर लोकतंत्र स्थापना करने वाली कमेटियां सारी दुनिया में सदल-बल काम कर रही हैं।आधिकारिक तौर पर अमरीकी बजट प्रस्तावों में इस तरह के खर्चे के प्रावधान रहते हैं।
        

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