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शनिवार, 10 जुलाई 2010

स्त्री अस्मिता और पुरबिया संस्कृति के परे है लेखन

     स्त्री अपने शरीर के बारे में समझ बनाने के बाद ही उसे अस्वीकार या खारिज कर सकती है। इसके बाद ही सही रूप में लिख सकती है। पितृसत्ता और लिंगभेदीय संस्कृति की समाप्ति के बारे में लिखकर ही अर्थपूर्ण लेखन कर सकती है। दमन के बिना स्त्री की कल्पनाशीलता कभी खत्म नहीं होती,जैसे संगीत, पेंटिंग,लेखन। उसकी सृजनात्मक क्षमता अनंत है। जहां तक स्त्री के पास अपनी जगह है ,बाहरी जगत उसकी कमरे की जिन्दगी को अस्त-व्यस्त  नहीं करता वह दमन की अवस्था में भी लिख सकती है।
        वर्जीनिया वुल्फ और हेलिनी सिकसाउस दोनों ने इतिहास में स्त्री लेखन के अभाव पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। वुल्फ ने पुरानी लेखिकाओं के लेखन के अभाव की बात करते हुए आज की लेखिका की लेखन शैली के मूल्यांकन का उसे आधार बनाया है। सिकसाउस ने कहा कि हमें समाज की लाखों परतों को उघाडना है। मैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं करना चाहती। ''स्त्री को अपने को पाठ में पेश करना चाहिए। इस संसार और इतिहास में पेश करना चाहिए।''  स्त्री लेखन का लंबे समय से जो अभाव बना रहा है,उस चुप्पी को तोड़ने के लिए स्त्री का लिखना बेहद जरूरी है।
     सिकसाउस ने लिखा '' मैं जानती हूँ कि तुमने अब तक क्यों नहीं लिखा, क्योंकि लेखन को महान कार्य माना जाता था,तुम्हारे लिए तो यह बड़ी बात ही थी। यह कार्य महान लोगों के लिए सुरक्षित रखा गया था,वे थे महान् पुरूष।''
     वुल्फ और हेलिनी दोनों ने ही मर्द द्वारा स्त्री के दमन के बारे में लिखा कि दमन के कारण कैसे औरत नहीं लिख पायी। खासकर हेलिनी ने इस पहलू पर अनेक मर्तबा रोशनी डाली,जबकि वुल्फ ने चलताऊ ढ़ंग से इसकी चर्चा की है। खासकर विश्वविद्यालयों में जहां औरत का लॉन में अकेले चलना मना था,लाइब्रेरी में अकेले जाना मना था, औरत लाइब्रेरी में प्रवेश तब ही कर सकती थी जब उसके साथ कोई मर्द स्कॉलर होता था।
      इसके विपरीत सिकसाउस का मानना था कि '' मेरा संघर्ष अपरिहार्यत: परंपरावादी मर्द के खिलाफ है।'' दोनों का यह मानना था कि औरत को लिखना चाहिए। वुल्फ की नजर में स्त्री को बदलाव के लिए ही नहीं बल्कि अपने निहित स्वार्थी लक्ष्य के लिए भी लिखना चाहिए। वह चाहती थी कि स्त्री का लिखा पढूँ।
      सिकसाउस ने लिखा स्त्री को अपने शरीर को हासिल करने के लिए लिखना चाहिए। शरीर के माध्यम से लिखना चाहिए। '' लेखन तुम्हारे लिए है,तुम स्वयं के लिए हो,तुम्हारा शरीर तुम्हारा है,तुम इसे लो।'' दोनों इस बात पर एकमत थीं कि स्त्री और पुरूष के लेखन की शैली भिन्न होती है। वुल्फ ने लिखा मर्द का लिखा पढ़ने से ताजगी मिलती है,उसमें जो दृश्य निर्मित किया जाता है उसमें 'मैं' अन्तर्निहित होता है।'' सिकसाउस ने लिखा कि '' मैं औरत के लिए लिखती हूँ। औरत औरत के लिए लिखे।मर्द, मर्द के लिए लिखे।''
       सिकसाउस ने लिखा मैं अपने विचारों के बारे में कुल मिलाकर यह कह सकती हूँ कि दैनन्दिन जीवन में 'सच' को पकडे रहना चाहिए । जब कोई लिखता है,तो हमेशा सच का सामना करता है, मैं सच कहती हूँ,मैं ज्ञान की या जानकारी की बात नहीं कहती। उसका अज्ञात सत्य से मतलब होता है। जब आप समूह के लिए लिखते हैं तो अंधेरे में सत्य की तलाश करते हैं। वह नहीं जानता,वह सिर्फ चलता जाता है। मैं ऐसा ही महसूस करती हूँ और अपनी ऑंखें बंद कर लेती हूँ।अनुभूतियों पर विश्वास करती हूँ।
      सिकसाउस का मानना है मैंने सब कुछ खोया,पिता,देश,मॉ,सब कुछ खोया बची रह गयी तो सिर्फ भाषा और भाषा ही मेरा राष्ट्र है। मैंने भाषा के जरिए ही अपने देश को पाया। प्रेम और मृत्यु में महायुद्ध शुरू हुआ है। जो प्यार करते हैं वे मौत के प्रति वचनबद्ध होते हैं। जो व्यक्ति प्यार करता है,प्यार में 'गिरता' है, प्रेम में मौत को पुकारता है। लेखन नरक से ही शुरू होता है। किसी न किसी रूप में जीवन का इतिहास पहलीबार निजी जीवन के नरक से ही शुरू होता है। लेखन किसी न किसी रूप में हृदय की गहराई से आता है। वह स्वर्ग हो या नरक। लेखन हमेशा, किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहता है। लेखक समृद्ध व्यक्ति है ,मेरे लिए यह लेखक की परीक्षा है। समृद्धि दुविधापूर्ण, खतरनाक और अनिवार्य है। समृद्धि हमेशा गरीबी के खजाने से वंचित करती है। वह खजाना जो गरीबों के पास है,यह वह उन लोगों का खजाना है जिनके पास कुछ भी नहीं है और गरीबी ही संपदा है।यह त्रासद और शानदार इच्छाओं का स्रोत है,ये इच्छाएं हमारे पास नहीं हैं जबकि हम समृद्ध हैं।हमें इस गरीबी का अनुभव हासिल करना चाहिए,वरना हम  सच्ची दरिद्रता को जान नहीं पाएंगे। हम गरीबी को तब जानते हैं जब हमारे पास थोड़ा होता है।गरीबी और अमीरी के परे होते हैं। एक ही समय में प्रत्येक चीज महंगी,अनुपलब्ध , कीमती और हमारी जद के बाहर होती है।
      जो लिखना नहीं जानते उनके बारे में कोई कैसे लिख सकता है ? हमें यह सवाल अपने दिल से पूछना चाहिए। यह तब ही संभव है कि उन्हें बोलने दिया जाए। हमें उन्हें अपनी भाषा देनी चाहिए जिससे वे बोल सकें। मुझे नाटक ने इस मामले में मदद की है कि वे बोलें। हम कैसे सेंटिंग में बदलाव लाएं ? जब व्यक्ति ऐसी अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि वह अन्य के सामने पूरी तरह खुला होता है, तब वह व्यापक अर्थ में कहें तो अन्य की जगह हासिल कर लेता है,खासकर इतिहास में जगह प्राप्त कर लेता है। अन्य के मिलने की हमेशा संभावना रहती है।  मैं हमेशा आशा करती हूँ कि अज्ञात ,खोज के लिए हमारा इंतजार कर रहा है। कोई और भी है जो कहीं स्वयं के बारे में लिख रहा है।अन्य के बारे में लिखने और सोचने के बाद भी अन्य बचे रह जाते हैं। खासकर वे लोग जिन तक पहुँचना मुश्किल था और जो हमारे एकदम पास थे।
     सिकसाउस ने लिखा इतिहास  क्या है ? यह बेहद मुश्किल सवाल है। यह सवाल हमेशा मुझे उद्वेलित करता है। आप ऐसे समय में लिख रहे हैं जब लोग मर रहे हैं,उनके भूत हमारा पीछा कर रहे हैं। वे मेरे पाठ में हैं,पाठ के साथ हैं। कुछ समय मुझे वियतनाम उद्वेलित करता रहा है,उसके बाद ग्रीस उसके बाद ईरान... मेरा पाठ उन लोगों से भरा पड़ा है जो कष्टों से गुजर रहे हैं और उनसे निकलने की कोशिश कर रहे हैं।
     मेरा इतिहास क्या है ? मैं कौन सा इतिहास देख रही हूँ ? इतिहास और पाठ को कैसे जोड़े ? मैं नहीं जानती कि मेरा इतिहास क्या है ? मैं यहूदी हूँ ,तो हो सकता है मेरा यहूदी इतिहास हो,मैं नहीं जानती कि उसमें मेरा इतिहास कौन सा है और कैसे है ? मैं अपनी पहली प्रतिक्रिया समय के बारे में देना चाहूँगी,एक यहूदी औरत के नाते अपने को परिभाषित करना चाहूँगी ,किसी को इस दौर के घोटालों के बारे में भी बोलना चाहिए। किसी को इसके कारण खोजने चाहिए। जब औरत के सवाल उठाए जाएं तो उनका जबाव जरूर दिया जाना चाहिए। खासकर जब औरत पर आरोप लगाए जाएं तो जबाव जरूर दिया जाना चाहिए। मैं हमेशा सोचती रही हूँ कि पाठ में इतिहास की काव्यात्मक प्रस्तुति हो। इतिहास का मानवीय स्वर सामने लाया जाना चाहिए। मनुष्य के भवितव्य को सामने लाना चाहिए।
मैंने वास्तव पुरूष चरित्र रचने की कोशिश नहीं की है। ऐसा क्यों ? क्योंकि मैं शरीर से लिखती हूँ और मर्द तो मर्द है और मैं यह नहीं जानती कि मर्द को आनंद कैसे मिलता है। मैं शरीर और आनंद के बगैर मर्द नहीं रच सकती। फिर रगमंच में मर्द का क्या मतलब है ? रंगमंच कामुक आनंद की जगह नहीं है। रोमियो और जूलियट एक-दूसरे से प्यार करते हैं। किन्तु मंच पर प्यार नहीं करते। वे वहां गाते हैं। वे सीना खोलकर गाते हैं। मनुष्य के हृदय में सेक्स नहीं होता। हृदय किसी न किसी रूप में धड़कता रहता है। मर्द के सीना है तो वह औरत के पास भी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे चरित्र अधूरे प्राणी हैं,वे कमर तक ही हैं। नहीं, हमारे प्राणियों में किसी चीज का अभाव नहीं है ,न तो शिश्न का अभाव है, और न स्तन का अभाव है, न किडनी का, न ही पेट का ही अभाव है।कितु मैं इस सब पर नहीं लिखती। अभिनेता और अभिनेत्रियां मुझे पूरा शरीर देते हैं, जिसे हमें खोजने की जरूरत नहीं हैं। यहां सब कुछ जीवन्त है और सत्य है। यह रंगमंच की लेखक को सौगात है।
सिकसाउस से जब यह सवाल पूछा गया कि आपने औरत पर लिखने की बजाय कम्बोडिया पर नाटक क्यों लिखा ? तो इसके जबाव में कहा कि इस सवाल का मैं सैंकडों मर्तबा जबाव दे चुकी हूँ। इसके बावजूद जब यह सवाल पूछा गया तो मैंने सोचा कि क्या बात है कि बार-बार यह सवाल पूछा जा रहा है,तब मेरे दिमाग में विचार आया कि एक नाम है 'ओरियन' (ओरिएण्ट) या पुरबिया। इसके बाद स्त्री का रहस्य मेरे दिमाग में कोंधा ? यहां में 'और' या 'गोल्ड', 'ओरिण्ट' या पूर्व, कुछ समृद्ध पुरबिया। एशिया क्यो, पूर्व ? क्योंकि मैं वह नहीं हूँ।चूंकि मैं में हूँ।यह पुरबिया जगत मुझसे अलग है ,इसी बात की वह हमें शिक्षा देता है। मेरी भिन्नता ही मुझे भिन्नता की अनुभति देती है , चूंकि एशिया की आत्मा में धर्म है,चूंकि ये लोग दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं, चूंकि यह बचा हुआ है, चूंकि इसकी हत्या की जा रही है,चूंकि यह गरीब है,यही वजह है कि वह समृद्ध है,गोरे रंग के आने के पहले से यह काला रंग है,चूंकि इसका परा-इतिहास है, अपना अतीत और वर्तमान है।चूंकि उनके चेहरों पर मुखौटे हैं,एशिया में ऐसा सोचते हैं कि मुखौटे चेहरे की आत्मा हैं, अन्य शब्दों में एशियाई औरतें लगातार धीरे-धीरे नदी के किनारे चलती  जा रही हैं। यह यथार्थ हजारों लोगों में देखा जा सकता है,चूंकि वहां बड़े पैमाने पर मौत हो रही हैं और बड़े पैमाने पर जीवन भी है। कम्बोडिया पर नाटक लिखने के पहले ,मैं जिस कवि को सबसे ज्यादा पसंद करती हूँ क्लेरीस लिस्पेक्टर उसने कहा था ''लाइफ इज ओरिएंटल'' (पूरबिया जिन्दगी) वह हमेशा कहती थी कि जिन्दगी पुरबिया है।
      यहां जिन्दगी धीमी है , गुलदस्ते में सजे फूलों की तरह है, यह ऐसी कला है जो अनुपयोगी और अनिवार्य है। एशिया के लोगों में भी लोग भूखे हैं, एशिया में सब कुछ फल से शुरू होता है, अन्न को लोग संरक्षित करके रखते हैं, यहां तक कि प्रेम,लेखन और रंगमंच को भी संरक्षित करके,छिपाकर रखते हैं।
कम्बोडिया ही क्यों ? सरोकार के अलावा इसमें और कीमती क्या है ? वह जो कीमती है उसे प्रार्थना के जरिए बचा सकते हैं, हासिल कर सकते हैं ।मैंने इस आखिरी बात पर ध्यान दिया कि कम्बोडिया के कैम्पों में क्या बचा है, वे कीमती हैं, वे जिन्दा हैं जो बांस और कनात में त्रासद रूप में जी रहे हैं, उनमें अपने घर , नाच, भूत के प्रति प्यार है ,वे मौत के सम्मुखीन हैं,कानून के सामने हैं ,वे देश से भागे हुए हैं, वे हल्के वजन के आदर्श नमूने हैं। मैंने अपने विचारों को शरणार्थी शिविरों में रहने वालों को समर्पित कर दिया है। सिकसाउस कहती है आशा का दूसरा नाम ही लेखन है। यही हमें अपने से परे ले जाता है।







शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह - फिलीस्तीन के बिना अधूरा है प्राच्यवाद - सुधा सिंह






आलोचकगण जब 'ओरिएण्टलिज्म' पर विचार करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि आखिरकार सईद को यह किताब लिखने की जरूरत क्यों पड़ी ?
     यह किताब जब लिखी गयी थी तब सारी दुनिया में नए सिरे से नव्य-औपनिवेशिकता और नव्य-आर्थिक उदारतावाद की मुहिम शुरू हो चुकी थी। इस मुहिम का लक्ष्य नए किस्म की वैचारिक गुलामी था। द्वितीय विश्वयुध्दोत्तार दौर में मध्य-पूर्व से इसका सिलसिला आरंभ हुआ था और आज वह अपनी पकड़ में सारी दुनिया को ले चुका है। यही वह प्रस्थान-बिंदु है जिसके कारण 'ओरिण्टलिज्म' का संदर्भ-सूत्र मध्यपूर्व और साम्राज्यवाद विरोध है। 'ओरिण्टलिज्म' लिखने का मकसद विचार-विमर्श करना मात्र नहीं है बल्कि साम्राज्यवाद के वैचारिक ताने-बाने से कैसे मुक्त हुआ जाए,उसके रास्ते तलाशना भी है। युध्दोत्तार दौर में साम्राज्यवाद के खिलाफ विश्वव्यापी चेतना पैदा करने में इस कृति को केन्द्रीय भूमिका है। यह किताब साम्राज्यवाद निर्मित विचारों ,केटेगरी,संस्थान, प्रक्रिया और प्रभाव का समग्रता में मूल्यांकन पेश करती है। इस किताब का लक्ष्य है साम्राज्यवाद के द्वारा निर्मित केटेगरी ,अवधारणाओं आदि को चुनौती देना और उनके विकल्पों की खोज करना। उल्लेखनीय है कि नई समीक्षा,रूपवादी समीक्षा,संरचनावाद,कांग्रेस फोर कल्चरल फ्रीडम आदि के माध्यम से संस्कृति,साहित्य और कला जगत में जिस तरह का अ-राजनीतिक,जनतंत्र विरोधी और वर्चस्ववादी माहौल बनाया गया था उसे विश्वस्तर पर अपदस्थ करने में इस किताब की केन्द्रीय भूमिका है।
         'ओरिण्टलिज्म' को पढ़ते समय अनेक बार यही लगता है कि 'यह छूट गया' ,मेरी बात भी कह दी जाती अथवा मेरा संदर्भ होता तो अच्छा होता। यह अनुभूति स्वयं इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है। मानविकी और समाजविज्ञान में साम्राज्यवादी विचारों के वर्चस्व को इस अकेली किताब ने जितनी बड़ी चुनौती पेश की,वैसे चुनौती माक्र्स रचित 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'' के बाद अन्य कोई किताब पैदा नहीं कर पायी है। जिस तरह पश्चिम से लेकर पूरब तक सभी विचारधारा के लोगों को 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र '' ने आकर्षित किया, उसे मानव मुक्ति का महापाठ बनाया ठीक वैसे ही 'ओरिण्टलिज्म' को साम्राज्वाद विरोधी मुक्तिकामी ताकतों ने अपना महापाठ बनाया। माक्र्स ने मजदूरों और समूचे समाज की मुक्ति के सपने को केन्द्र में रखकर पूंजीवाद की तीखी आलोचना की और समाजवाद का विकल्प पेश किया। वहीं सईद ने 'ओरिण्टलिज्म' के जरिए साम्राज्यवाद से मुक्ति और समतावादी जनतंत्र का सपना पेश किया। फर्क यह है माक्र्स पूंजीवाद की जगह समाजवाद चाहिए था, जबकि सईद को पूंजीवाद में ही गैर-साम्राजी जनतांत्रिक विकल्प चाहिए। आत्मनिर्भर संप्रभु राष्ट्र और जनतांत्रिक समाज व्यवस्था चाहिए।
   सईद ने जब प्राच्यवाद पर लिखा तो उस पर व्यापक प्रतिक्रिया व्यक्त हुई। सईद ने 'पश्चिम' और 'प्राच्य' की एक ही केटेगरी बनायी, जबकि सच यह है कि 'पश्चिम' एक नहीं अनेक हैं, उसी तरह 'प्राच्य' एक नहीं अनेक हैं। इन दोनों के बीच के अन्तर्विरोधों को सामान्यीकरणों के सहारे नहीं समझा जा सकता। समय-समय पर इनके अंतर्विरोध के मुख्य बिंदु में भी बदलाव होता रहा है। स्वयं सईद ने माना है कि प्राच्यविदों ने काफी काम किया है उन्होंने भाषा के नियम बनाए,डिक्शनरी,मृतयुगों को जिंदा किया, सैंकडों किताबों का अनुवाद किया, सीखने लायक बहुत कुछ निर्मित किया।
      'ओरिएण्टलिज्म'  में शुरू से अंत तक सईद का प्राच्यवादी ज्ञान को लेकर एक तरह संदेह का भाव  है। वे इस ज्ञान को सत्ता के आईने में रखकर देखते हैं। सत्ता के संबंधों के साथ जोड़कर देखते हैं। सवाल यह है क्या यह बात भाषा के नियमों अथवा संहिता पर भी लागू होती है ? क्या यह बात अनुदित पाठ पर भी लागू होती है ? सवाल यह है कि किस तरह का ज्ञान साम्राज्य के संपर्क के कारण दुरंगी भूमिका अदा करता है ? उसे हम स्वीकार करें या न करें ? प्राच्यवाद का आम विमर्श के रूपों और प्रस्तुतियों के साथ किस तरह का संबंध है ? व्यक्तिगत का प्राच्यवाद से क्या संबंध है ? सईद ने जब प्राच्यवाद के बारे में लिखना शुरू किया था तो कहा था कि प्राच्यवाद उन्माद है। प्राच्यवाद एटीट्यूट यानी संस्कार है। यह मूलत:''इम्पीरिकल'' विरोधी है। सवाल यह है ये तीनों बातें सभी प्राच्यविदों पर लागू होती हैं अथवा कुछ पर ही लागू होती हैं।
      'ओरिएण्टलिज्म' के पन्द्रह साल बाद 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म' नामक किताब आयी और इस किताब में सईद ने व्यापक तौर पर यह स्थापित किया कि ज्ञान और सत्ताा का गहरा रिश्ता होता है। इसकी व्याख्या के क्रम में संस्कृति और साम्राज्य के अन्तस्संबंध पर सईद ने नयी धारणाएं पेश कीं, कुछ लोगों को इनमें स्पष्टता का अभाव भी नजर आता है। समग्रता में संस्कृति और साम्राज्य के अन्तस्संबंध की धारणा उलझनें ज्यादा पैदा करती है। इसमें भी सामान्यीकरण्ा के फार्मूलों को सईद ने लागू किया है। सईद के लेखन की विशेषता है कि उन्होंने बार-बार प्राच्यवाद पर ही लिखा है। सवाल यह पैदा होता है कि प्राच्यवाद के विभिन्ना विमर्शों को पेश करते हुए सईद आखिरकार क्या कहना चाहते हैं ? वह किस तरह के विचारों के इतिहास को पेश करना चाहते हैं ?प्राच्यवाद के विमर्श में कौन सा विचारक सबसे ज्यादा प्रभावित करता है और किन लोगों को प्रभावित करता है ? वर्चस्वशाली अभिजन कौन है ?राज्य के संस्थान किस तरह के हैं ? जनता की राय क्या है ? ये सवाल हैं जिन पर सईद के यहां साफ नजरिया दिखाई नहीं देता। यह भी स्पष्ट नहीं होता कि विभिन्ना विधा रूपों का आपस में किस तरह का संबंध था ? अपने युग के साथ किस तरह का संबंध था ? अथवा विभिन्ना युगों के साथ विधा का किस तरह का संबंध था ? विभिन्ना संस्कृतियों और इतिहास के बीच किस तरह का संबंध था ? विभिन्ना साम्राज्यवादी देशों का अपने उपनिवेशों के साथ किस तरह का संबंध था ?
     सईद के ओरिएण्टलिज्म में अनेक महत्वपूर्ण चीजें अनुपस्थिति हैं। मसलन् इसमें किपलिंग के मात्र पांच संदर्भ हैं। फ्रांसीसी भाषा विज्ञानियों और ब्रिटिश घुमंतू बौध्दिकों ,जर्मन प्राच्यविदों का कहीं पर भी जिक्र नहीं है। इसके अलावा पापुलर कल्चर के बारे में एकसिरे से मूल्यांकन गायब हैं। 19वीं और बीसवीं सदी के उत्तारार्ध्द के प्रेस को लेकर कोई समझ नजर नहीं आती। सईद के एकांगी नजरिए का ही परिणाम है कि उन्हें पश्चिम की आक्रामकता नजर आती है किंतु पूरब की आक्रामकता नजर नहीं आती। क्या यह संभव है कि मध्ययुग के पूरब के हमलावरों को भूल जाएं ? सईद के अनुसार प्राच्य पीड़ित रहा है पश्चिम के द्वारा। पश्चिम का वर्चस्व रहा है। सवाल यह है कि पश्चिम का जिस जमाने में वर्चस्व था उस समय पश्चिम का प्रतिरोध हो रहा था या नहीं ? उस प्रतिरोध की आवाज को खोजने में सईद असमर्थ रहे हैं। सईद की प्राच्यवाद संबंधी प्रस्तुति यही संदेश देती है गैर पश्चिमी जगत पराजित हो रहा है अथवा चुप है। वे यह बात कहीं पर भी रेखांकित नहीं करते कि गैर पश्चिमी समाज के प्रतिरोध और प्रतिवाद के क्या रूप रहे हैं ? इन समाजों के आंतरिक क्या कारण अथवा अंतर्विरोध रहे हैं ? साम्राज्यवाद का फिनोमिना बहुत बाद के वर्षों में आया है इसे मध्यकाल में अथवा मध्यकालीन मानसिकताओं और मूल्यों की जड़ों में खोजना मूर्खता होगी। यह सच है कि साम्राज्यवाद ने मध्यकालीन रूढ़ियों का अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है। किंतु प्रत्येक देश में उसके आंतरिक ताने-बाने पर नजर डालने की जरूरत है ,आंतरिक अन्तर्विरोधों और पहले से चली आ रही मूल्य-संरचनाओं और संस्कृति के बीच के द्वंद्वात्मक संबंध की जटिलताओं को खोला जाना चाहिए। सईद के नजरिए में असल कमजोरी यहीं पर है। सईद की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उन्होंने सारी बीमारियों की जड़ साम्राज्यवाद को बना दिया है। काले और गोरे के भेद को बना दिया है। आधुनिककाल में सामाजिक,सांस्कृतिक अध्ययन में साम्राज्यवाद समस्या का एक बड़ा बिंदु है किंतु इसे सर्वस्व नहीं समझना चाहिए। आज भी मध्यकालीन प्रेतबाधाएं और मूल्य हैं जो पूरब के देशों में तबाही मचा रहे हैं। कायदे से देशज समस्या की आंतरिक सांस्कृतिक परतों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।  
      'ओरिएण्टलिज्म' में फिलीस्तीन व्यापक संदर्भ में दाखिल होता है। अरब,इस्लाम,पूरब आदि के प्रति साम्राज्यवाद के पूर्वाग्रहों और घृणा के वे अंतिम पीड़ितों में से एक हैं। साम्राज्यवाद के पूर्वाग्रह सिलेसिलेबार,योजनाबध्द और सुसंगत रूप में काम करते हैं। उन्हें ही सईद ने 'ओरिएण्टलिज्म' की संज्ञा दी है। इस किताब का इसलिए भी महत्व है कि इसने प्राच्यवाद की परिभाषा और दायरा भी बदला है। पहले प्राच्य अध्ययन की शाखाएं यूरोपीय परंपरा का अध्ययन करती रही हैं। खासकर यूरोपीय इतिहासकारों और कला संग्रहकत्तर्ााओं का अध्ययन करती रही हैं।
         सईद का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने प्राच्यवाद को 'भेद की विचारधारा' के आधार पर व्याख्यायित किया है। यह ऐसी विचारधारा है जो पूरब पर अपने आधिपत्य को हर तरह से वैध ठहराने की कोशिश करती रही है। प्राच्यवाद एक तरह से प्रच्छन्ना नस्लवाद है जो अपनी प्रतिगामिता और निरंतरता को होमर के समय से लेकर आज तक बनाए हुए है। खासकर इनलाइटेनमेंट से आज तक अपनी निरंतरता बनाए हुए है। सईद के अनुसार 'प्रत्येक यूरोपीय अपने को प्राच्यविद ,नस्लवादी,साम्राज्यवादी और कुल मिलाकर जातीयकेन्द्रिक मानता है।'' अपने तर्क की पुष्टि के लिए सईद ने व्यापक परिप्रेक्ष्य में विभिन्ना विधा रूपों में काम करने वाले बौध्दिकों के संदर्भ का इस्तेमाल किया है। ये सारे संदर्भ और विधा रूप मिलकर एक ही विमर्श तैयार करते हैं जिसे हम प्राच्यवाद के नाम से जानते हैं। ज्ञान की विभिन्ना शाखाओं के पाठ का इस्तेमाल करते हुए सईद ने इन पाठों के बीच के अन्तर्सबंधों का भी खुलासा किया है। विभिन्ना शाखाओं के पाठ मिलकर किस तरह प्राच्यवाद का पाठ तैयार करते हैं और किस तरह यह प्रक्रिया प्रच्छन्ना तरीके से हमारी चेतना में प्रवाहित होती रहती है और किस तरह साम्राज्यवादी पूर्वाग्रह हमारे बौध्दिक चिन्तन और संस्कृति में घुस आए हैं, इन सब पहलुओं पर 'ओण्टिलिज्म' में प्रकाश ड़ाला गया है।
सईद के 'ओरिएण्टलिज्म' संबंधी विवेचन की मूल चिन्ता प्राच्यवाद को समग्रता में उद्धाटित करने की है। वे प्राच्यवाद के संभावित दायरों का भी खुलासा करते हैं। साथ ही प्राच्यवादी कठमुल्लेपन को निशाना बनाते हैं। प्राच्यवादी कठमुल्लापन कविता,कहानी,उपन्यास आदि के जरिए साधारण जनता के बीच प्रवाहित होता रहा है। प्राच्यवादी चिन्तकों ने अपनी एक खास किस्म की पहचान बनायी हुई है। वे अपने को खोजी, सत्यान्वेषक के रूप में पेश करते रहे हैं। सईद उनके इसी पाखण्डी रूप को उद्धाटित करते हैं। सईद ने लिखा है कि प्राच्यविद वे लोग हैं जो पश्चिम के श्रेष्ठत्व को किसी न किसी रूप में पेश करते हैं उसकी वकालत करते हैं। ये साम्राज्यवादी सत्ता के खेल का हिस्सा हैं। इस प्राच्यवादी मानसिकता के लेखक और बुध्दिजीवी अरब और मुस्लिम जगत में साम्राज्यवाद के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जाने-अनजाने मदद करते रहे हैं।  इससे तीसरी दुनिया के देशों के ज्ञान को सत्ता को प्रदूषित करने में सफलता मिली है। सत्ता के प्रदूषण से बचने का क्या उपाय है ? सईद ने सन् 1981 में लिखा '' मैं सोचता हूँ कि ज्ञान को गैर-विशेषज्ञों के लिए खोल देना चाहिए।''

( लेखिका- सुधा सिंह , एसोसिएट प्रोफेसर , हिन्दी  विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली )
  




गुरुवार, 21 जनवरी 2010

फिलिस्तीन मुक्ति सप्ताह- फिलिस्तीन मुक्ति का सपना और एडवर्ड सईद का प्राच्यवाद





एडवर्ड सईद को सन् 1978 के पहले दुनिया में बहुत कम  लोग जानते थे। सन् 1978 में 'ओरिएण्टलिज्म' किताब के प्रकाशन के साथ उनके विचारों और गतिविधियों की ओर सारी दुनिया के बुध्दिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं का ध्यान गया। 'ओरिएण्टलिज्म' किताब को आलोचना में पैराडाइम बदलने वाली किताब के रूप में जाना जाता है। इस किताब ने आलोचना को बदलने के साथ ही सईद को भी बदला, पहले सईद को मध्य-पूर्व अध्ययन के दायर में रखकर विचार किया जाता था। किंतु इस किताब के प्रकाशन के बाद उन्हें एक नए स्कूल के नाम से जाना जाने लगा जिसे आलोचना में 'उत्तर औपनिवेशिक' आलोचना कहते हैं।  यह मूलत: उत्तर आधुनिकता के अनेक लक्षणों से युक्त आलोचना स्कूल है।
सईद का जन्म फिलीस्तीन में हुआ था,किंतु पालन-पोषण और शिक्षा का वातावरण अंग्रेजी-अरबी सांस्कृतिक माहौल में हुआ। मिस्र के अंग्रेजी वातावरण में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बाद में अमेरिका जाकर उन्होंने स्नातक और बाद की उपाधियां हासिल कीं। अण्डर ग्रेजुएट डिग्री प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी से ली, ग्रेजुएट डिग्री हार्वर्ड से ली,और बाद में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अंग्रेजी और तुलनात्मक साहित्य के अध्यापक के तौर पर लंबे समय तक काम किया।
सईद ने स्वयं लिखा है  सन् 1967 तक वह पूरी तरह अंग्रेजी के प्रोफेसर की तरह जीवन व्यतीत करने लगे थे। सन् 1968 में उन्होंने लिखने और पर्यटन के बारे में सोचा। पर्यटन और लेखन का मूल मकसद था  फिलीस्तीन संघर्ष में सक्रिय रूप से भाग लेना,फिलीस्तीन राजनीति का प्रचार करना और फिलीस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में निर्मित करना। इसी क्रम में सईद ने अपनी एक नयी पहचान निर्मित की, स्वयं को फिलीस्तीन की पहचान प्रदान की। सारी दुनिया में फिलीस्तीन अस्मिता को स्थापित करने का काम किया।
सन् 1969 और 1970 में सईद ने अम्मान की यात्रा की, जोर्डन की राजधानी होने केकारण और फिलीस्तीन के हथियारबंद ग्रुपों का केन्द्र होने के कारण यह शहर चर्चा के केन्द्र में था। उस समय फिलीस्तीनी लोग यह सोचते थे कि हथियारबंद संघर्ष के जरिए वे इजरायल को परास्त कर देंगे। उस समय जोर्डन और लेबनान में बड़ी तादाद में फिलीस्तीनी शरणार्थी रह रहे थे। ये वे लोग थे जो पहले फिलस्तीनी इलाकों में रहते थे किंतु मध्यपूर्व युध्द (1967) के दौरान इन्हें अपने घर-द्वार छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। कालान्तर में लेबनान में फिलीस्तीनियों पर हमले हुए लेबनान के प्रशासन ने अमरीका के दबाब में आकर उन्हें खदेड़ना शुरू कर दिया। यही वह बिंदु है जहां से सईद के व्यक्तित्व और लेखन में मूलगामी परिवर्तन आता है।

पहले वह एक अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में जाने जाते थे और अब उन्होंने फिलीस्तीन के अधिकारों के प्रचार प्रसार का काम अपने जिम्मे ले लिया और अनेक मर्तबा बेरूत और फिलीस्तीनी इलाकों की यात्रा की। बेरूत ने सईद को इतना आकर्षित किया कि सन् 1972-73 में वह अपनी एक वर्ष की अकादमिक अवकाश की छुट्टियां लेकर वहां चले गए और वहां रहकर गंभीरता के साथ अरबी का अध्ययन किया। कालान्तर में अमरीका और सारी दुनिया में उन्होंने फिलीस्तीन के लक्ष्य के प्रचार के अगणी सिध्दान्तकार,चिन्तक और आन्दोलनकारी के रूप में काम किया।
       सईद के चिन्तन के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं पहला है मध्यपूर्व और फिलीस्तीन, दूसरा है साहित्य और आलोचना और तीसरा है मीडिया। इन तीन क्षेत्रों में सईद के नजरिए को व्यवहारिक तौर पर लागू करने की कोशिश की जाएगी। प्रस्तुत आलेख में मध्यपूर्व संबंधी नजरिए और तत्संबंधित मीडिया कवरेज के उन पक्षों की मीमांसा कीएगी जो स्वयं सईद ने रेखांकित किए हैं, यहां उनके मीडिया परिप्रेक्ष्य के बुनियादी सूत्रों के सहारे मध्यपूर्व के कवरेज को विश्लेषित करने की कोशिश की गई है। चूंकि उनके मूल्यांकन में सबसे पहले जिन देशों की संस्कृति की अभिव्यंजना मिलती है उनमें लेबनान का जिक्र खूब आता है इसमें भी बेरूत का सबसे ज्यादा जिक्र आता है। बेरूत का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें बार-बार खींचता है साथ बेरूत में रहने वाले फिलीस्तीनी भी खींचते हैं।
     सईद ने फिलीस्तीन के बारे में जब लिखना और बोलना शुरू किया तो वे फिलीस्तीन से बहुत दूर थे। वे अमरीका में रहते थे। फिलीस्तीन के बारे में कम जानते थे। सारी दुनिया में फिलीस्तीन के बारे में अमरीका-इस्राइल का प्रौपेगैण्डा फैला हुआ था। इस्राइल के नजरिए कर ही सारी दुनिया में वर्चस्व था। सारे मीडिया अमरीका-इस्राइल के नजरिए का एकतरफा प्रचार करते रहते थे। सईद ने एकदम विपरीत माहौल में रहते हुए सारी दुनिया में और खासकर अमरीका में फिलीस्तीन राष्ट्रवाद को प्रमुख एजेण्डा बनाया। फिलीस्तीन की आजादी के लक्ष्य को प्रमुख मुद्दा बनाया। इस्राइल के मीडिया वर्चस्व को अकेले प्रचार के द्वारा अमरीका में ध्वस्त करने का काम किया। फिलीस्तीन जनता के संघर्ष को सारी दुनिया तक पहुँचाने में सईद की बहुत बड़ी भूमिका रही है। आज इस्राइल के साथ सिर्फ अमरीका है।
फिलीस्तीन राष्ट्र की जमीन पर इस्राइल ने सन् 1948 से कब्जा किया हुआ है। वह समस्त अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और मंचों के आदेशों और प्रस्तावों की अवहेलना कर रहा है। फिलीस्तीनियों को उनके संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार से किसी न किसी बहाने से वंचित किए हुए है।
सईद के चिन्तन की केन्द्रीय विशेषता है स्वतंत्रता के प्रति दुस्साहसी वीरता। आलोचना में साम्राज्यवाद के प्रति दो-टूक रवैयया।
सईद की कैंसर के कारण मौत हुई,जब उनकी मौत हुई तब वह 62 साल के थे। उन्होंने 15 किताबें लिखीं, इसके अलावा सैंकडों आलेख लिखे, संगीत के बारे में उनकी गहरी समझ थी, संगीत की आलोचना और साहित्यालोचना में गहरा साम्य है। सन् 1978 में 'ओरिएण्टलिज्म' के आने के बाद सबसे बड़ा काम यह हुआ कि मध्यपूर्व की ओर सारी दुनिया के बुध्दिजीवियों का ध्यान गया। बौध्दिक जगत में मध्यपूर्व में चल रही साम्राज्वादी साजिशों और हिंसाचार को उद्धाटित करने में यह किताब मील का पत्थर साबित हुई। फिलीस्तीन के प्रति गहरी प्रतिबध्दता के कारण ही उन्हें फिलीस्तीन राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनाया गया जिसके वह 1991 तक सदस्य रहे।
सईद ने अमरीका की मध्यपूर्व विदेशनीति की तीखी आलोचना की है साथ ही यासिर अराफात के द्वारा जिस तरह अपने जीवन के अंतिम दिनों में समझौते किए उनकी भी आलोचना पेश की। खासकर ओसलो समझौते को उन्होंने फिलीस्तीन के समर्पण की संज्ञा दी। सईद के रवैयये और नजरिए को देखकर उन्हें तार्किक,अतिवादी,षडयंत्रकारी,गैर-जिम्मेदार,अमरीका विरोधी तक कहते थे। कुछ लोग उन्हें '' आतंक के प्रोफेसर' के नाम से भी पुकाते थे। ये सब वे लोग हैं जो उनके आलोचक हैं। संभवत: ये सारी बातें सईद में न हों। किंतु एक बात उनके व्यक्तित्व में थी, वह गैर परंपरागत बुध्दिजीवी थे। उनका समूचा बौध्दिक कर्म इसकी पुष्टि करता है।वह दुस्साहसी बुध्दिजीवी थे।

सईद ने अपने बचपन के आरम्भिक बारह साल फिलीस्तीन में बिताए, उनके पिता व्यापारी थे। ईसाईयत में आस्था थी। सन् 1947 के अंत में उनका परिवार कैरो अर्थात् काहिरा चला आया। इसके पास महीने बाद इस इलाके में युध्द शुरू हो गया। यह युध्द फिलीस्तीन अरब और यहूदियों के बीच शुरू हुआ, इसके बाद ही फिलीस्तीन का विभाजन हुआ। सईद की समूची शिक्षा अभिजन अंग्रेजी स्कूलों में हुई। मैसाचुसेट्स के बोर्डिंग स्कूल में अनेक साल बिताए। सन् 1957 में प्रिंस्टन से उन्होंने ग्रेजुएट किया।सन् 1964 में हार्वर्ड से पीएचडी डिग्री हासिल की।सन् 1963 में कोलम्बिया ने उन्हें इंग्लिश इंस्ट्रक्टर के रूप में नौकरी दी। उसके बाद उन्हें लगातार तरक्की दी गई। सन् 1967 के युध्द के बाद से उन्होंने फिलीस्तीन संघर्ष में दिलचस्पी लेनी शुरू की और फिर उसका हिस्सा बन गए। इस क्रम में उनकी पहचान भी बदल गयी, अब वे अमरीकी-अरब और फिलीस्तीन इन तीनों ही पहचान के रूपों को एक साथ जीने लगे।

इस्राइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डामायर ने सन् 1969 में एक भाषण में कहा था कि ' कोई फिलीस्तीन नहीं है।' यही वह बयान था जिसने सईद के नजरिए को बदल दिया।  न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी के लिए दिए गए व्याख्यान में इसका उन्होंने जिक्र करते हुए लिखा है कि ''अपरिहार्यत: इसने मुझे अपनी भाषा में लेखन के लिए मजबूर किया।' इसके बाद 'मुझे एहसास हुआ कि कैसे व्यक्ति बनता है भाषा कैसे बनती है,लेखन तो यथार्थ की निर्मिति है यह उपकरण की तरह यह काम करता है।'' आगे लिखा लेखन '' शब्दों की शक्ति और उसकी प्रस्तुति को सामने लाता है। ये शब्द लेखक ,राजनीतिक,दार्शनिकों के यथार्थ को सिलसिलेबार ढंग से पेश करते हैं कभी-कभी अन्य के लिए पेश करते हैं।

सईद का पहला निबंध था '' दि अरब पोट्रेड''' यह निबंध 1968 में छपा था। इस निबंध में बताया गया था कि कैसे प्रेस में और कुछ विद्वानों के यहां इमेज का मेनीपुलेशन चल रहा है। जिस समय यह निबंध लिखा था  उस समय अमरीका के बौध्दिक जगत में इस तरह के लेख को दुस्साहस ही कहा जाएगा। यह निबंध कालान्तर में दस साल बाद उनकी विश्व विख्यात किताब 'ओरिएण्टलिज्म' का आधार बना। इस किताब के मूल  सूत्र सबसे पहले इसी निबंध में पेश किए गए थे।
       (सुधा सिंह,एसोसिएट प्रोफेसर,दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली )



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