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शनिवार, 1 मई 2010

फिल्मी गीतों में प्रेम और बांसुरी




    फिल्मी गीतों और फिल्म में प्रेम की संरचना का आधार है राधा-मीरा और कृष्ण की त्रयी। प्रेम का रूप राधा-कृष्ण के मिथ का रूपक की तरह उपयोग मिलता है। जब कृष्ण की बांसुरी बजती थी तब राधा और गोपियों को प्रेम की अनुभूति होती थी। बांसुरी के माध्यम से वे कृष्ण की मौजूदगी महसूस करती थीं। यह कृष्ण और बांसुरी के संवेदनात्मक भटकावों को दर्शाता था। सतह पर यह निर्दोष प्रेम था। यह उनके बीच कामुक एवं अविस्मरणीय रूपांतरण को दर्शाता था। बांसुरी के बगैर कृष्ण और राधा के प्रेम की परिकल्पना असंभव थी। बांसुरी उत्प्रेरक थी।
     बांसुरी हमारे ग्राम्य जीवन के रोमांस का प्रतीक है। यह व्यक्तिगत उपकरण है। यह राधा-कृष्ण के मिथ का महत्वपूर्ण प्रतीक चिद्द भी है। राधा-कृष्ण का प्रेम स्त्री-पुरुष का प्रेम है जबकि मीरा और कृष्ण के प्रेम में भक्ति का तत्व प्रमुख है। 
    मीरा ने कृष्ण को त्याग के माध्यम से अर्जित किया है। यह अकामुक, आध्यात्मिक संबंध है। मीरा के यहां शारीरिक एवं संवेदनात्मक संतुष्टि सैकेंडरी है। प्रेम के इन दो मिथकीय रूपों ने ्रूहदी सिनेमा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मीरा का प्रेम दासी का प्रेम है। राधा का प्रेम संवेदनात्मक है किंतु अतिरंजित नहीं है। प्रेम के ये दो रूप दो तरह की औरत के रूप हैं। 
    हिंदी फिल्मों में औरत को मां, प्रेमिका और पत्नी इन तीन रूपों में रूपायित किया गया है। इन तीन संबंधों में औरत को आदर्शीकृत किया गया है। औरत की त्यागमयी मूर्ति का आदर्श नमूना नरगिस (मदर इंडिया) है। यह ऐसी औरत का चरित्र है जो अपने बेटे के लिए जान तक देने को तैयार है (अच्छी औरत आमतौर पर हीरो की मां होती है)। बेटे के अलावा उसके पास कोई काम नहीं है। वह उसकी शादी की चिंता में मगन है। शादी के बाद वह शांति से मरना चाहती है। 
   दूसरी तरफ हीरो है। वह जिस लड़की के पीछे पड़ा है उसे सेक्स के माल से अधिक कुछ नहीं समझता। प्रेम की अस्पष्ट धारणा के बावजूद हिंदी सिनेमा 'शुद्ध प्रेम' के थोड़े-बहुत प्रयत्न करता रहता है।
 मसलन, बुरे आदमी और बुरी औरत का कभी-कभी अच्छे व्यक्ति के रूप में रूपांतरण दिखाया जाता है। यह तब होता है जब उनमें सच्चा प्यार हो। इस तरह की अस्वाभाविक प्रस्तुति प्रेम की शक्ति को दर्शाती है। यानी प्रेम के कारण बुराइयों से मुक्ति संभव। यह अवस्था प्रेमी की या मां के प्यार की भी हो सकती है।
इस तरह की प्रेम संरचनाओं में राधा-कृष्ण और मीरा-कृष्ण का मिथकीय तत्व प्रत्यक्षत: सक्रिय नजर आता है।
     मसलन, 'स्ट्रीट सिंगर' में 'शुद्ध प्रेम' की धारणा का प्रतिपादन है। समूची कहानी में हीरो प्रत्यक्षत: कोई भी ऐसा हाव-भाव पेश नहीं करता जो प्रेम को व्यक्त करे। इस फिल्म ने प्रेम और संगीत के अंतस्संबंध को स्थापित किया था वह आज भी बरकरार है। मसलन, कोई हीरो हवाई जहाज में गाना गा रहा है जबकि हीरोइन अपने कमरे की खिड़की के सहारे खड़ी गाने की पंक्तियां गुनगुना रही है। इस तरह की अर्थहीनता भारतीय मानस सहज ही हजम कर जाता है क्योंकि संगीत एवं प्रेम के बीच में सक्रिय अर्थहीनता की हमारे साहित्य में सुदीर्घ परंपरा रही है और इस परंपरा के प्रति आस्था भी रही है। यही वजह है कि प्रेम की संरचना पर बनी फिल्में ज्यादा लोकप्रिय और प्रेमगीत ज्यादा हिट हुए। 
     भारतीय सिनेमा ने प्रेम के अनेक कोड बनाए। इनमें सबसे प्रभावी कोड है दो प्रेमियों के प्रेम के बीच में संगीत का संप्रेषण। संगीत के माध्यम से प्रेम का कोड राधा-कृष्ण एवं बांसुरी की रूढ़ि से आया है। हकीकत में राधा-कृष्ण की मिथकीय संरचना पर बनी फिल्मों में वास्तविक जगत से प्रेम के नाम पर पलायन है। यह आंतरिक प्रेम है। यह शारीरिक प्रेम का अतिक्रमण कर जाता है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज का आदर्श प्रेम है।
     सन् 1950 में बनी 'जोगन' फिल्म में मीरा की तरह का भक्ति एवं त्याग है। यहां तक कि मीरा के भजन भी हैं। फिल्म की कमजोरी यह है कि राधा और मीरा में कौन सी इमेज औरत के लिए सही होगी इसे लेकर निर्देशक केदार शर्मा अनिर्णय की स्थिति में हैं।सन् 1977 में बनी 'स्वामी' (बासु चटर्जी) और 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए' (ताराचंद बड़जात्या) में पूर्व-औद्योगिक समाज का प्रेम व्यक्त हुआ है।
     हिंदी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसमें जहां एक ओर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के गर्भ से उपजे मूल्यों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है वहीं दूसरी ओर 'अतीत प्रेम' का महिमामंडन है। 'स्वामी' फिल्म में वस्तुत: देवदास शैली का प्रेम है।
      इसी तरह प्रेम की संरचना के साथ पुनर्जन्म के मूल्य का रूपायन भी मिलता है। इस तरह के रूपायन की आदर्श फिल्म है 'महल'। हिंदी फिल्मों में प्रेम की धारणा में अगर कोई संशोधन आया है तो वह राजकपूर एवं गुरुदत्त की फिल्मों के द्वारा आया। राजकपूर की पचास के दशक की फिल्मों में प्रेम की कामुक अभिव्यक्तियों को सामाजिक मर्यादाएं रोकती हैं। हीरो जानता नहीं है कि हीरोइन उस पर जान देती है।
    हीरोइन का इकतरफा प्यार जब चरम पर पहुंच जाता है और अपरिहार्य हो उठता है तब हीरो को पता चलता है। हीरो सरल एवं सहज है।
   राजकपूर की फिल्मों में प्रेमसंबंध धन- दौलत के प्रति तिरस्कार भाव लेकर आता है। यहां सच्चे प्यार पर बल है और हीरो अपने लक्ष्य के प्रति वफादार है। यहां प्रेम के कामुक पहलू का ज्ञान है पर कभी-कभी उसका अस्वीकार भी है। राजकपूर-नरगिस की प्रेमी-युगल जोड़ी आदर्श मानी गई है। इन दोनों में रोमांस का प्रारंभ आंखों से आंखें मिलने से होता है। वे दोनों इसी के माध्यम से प्यार की अग्नि का अहसास करते हैं। एक-दूसरे के करीब आते हैं। मिलन की बेला आते ही निश्चित 'कोड' का इस्तेमाल कर लिया जाता है।
   मसलन, चुंबन के दृश्य के लिए फूलों का एक-दूसरे से मिलना या दो पक्षियों का चुंबन दिखाया जाता है। राजकपूर ने इस तरह के अनेक 'कोड' लागू किए हैं जो हमारी साहित्यिक परंपरा में हैं। इस तरह के 'कोड' प्रेम की शारीरिक अनिवार्यता को उदघाटित करते हैं, साथ ही, उसे अभिव्यक्त करने की अक्षमता को दर्शाते हैं। 'आग', 'आवारा', 'जागते रहो' आदि फिल्मों में देवदास फिल्म की परंपरा जारी रहती है। किंतु प्रच्छन्नत: उस परंपरा पर प्रश्नचिह्न भी लगाए गए हैं।
        राजकपूर की फिल्मों में परंपरागत मूल्यों एवं उदीयमान औद्योगिक समाज के मूल्यों की टकराहट भी मिलती है। मसलन, 'आग' और 'आवारा' में बेटे ने पिता के खिलाफ विद्रोह किया। बेटा समाजवादी एवं इगेलिटेरियन दार्शनिक भावों को व्यक्त करता है। गुरुदत्त की फिल्मों में सामाजिक विषमता के प्रश्नों को उठाया गया है। इनकी फिल्मों में औद्योगिक समाज के भौतिकवादी दृष्टिकोण के प्रति प्रतिक्रियाएं मिलती हैं।
   वे 'देवदास' के विजन के दायरे में ही सीमित रहते हैं। नए मूल्यों का विरोध करते हैं। प्रेम के आदर्श रूप के तौर पर 'प्यासा' को लिया जा सकता है। फिल्म का हीरो सच्चे प्यार एवं त्याग के लिए प्रतिबध्द है जबकि मीना ऐसे विश्व का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें औद्योगिक समाज के भौतिक मूल्यों का दृष्टिकोण अभिव्यक्त होता है। सन 1956 में गुरुदत्ता की फिल्म 'सीआईडी' में देवानंद की जो इमेज पेश की गई वह राजकपूर, दिलीपकुमार की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है।
   देवानंद ऐसा हीरो है जो इगेलिटेरियन और कामुक संबंधों को स्वीकार करता है। वह कामुक उत्तोजनाओं को पैदा करता है। स्वयं भी कामुक प्रतीक के रूप में उभरकर आता है। यह कामुक हीरो आज तक फिल्मों के केंद्र में है। कामुक उद्दीपन के लिए ऐसी नायिका की जरूरत महसूस की गई जो पुरुष-प्रधान ईगो को उभारे, कामुक उत्तेजना पैदा करे। अब नायिका कामुक प्रतीक बन गई। अब उसे दो तरह की भूमिकाएं अदा करनी थीं, एक ओर आदर्श हीरोइन की भूमिका थी तो दूसरी ओर काम देवी की भूमिका अदा करनी थी। मसलन, 'सीआईडी' में वहीदा रहमान ने पहले 'वेंप' और बाद में अच्छी औरत की भूमिका अदा की। वह दोनों भूमिकाएं बखूबी निभाती है। 
     इसी तरह 'गाइड' में वहीदा रहमान ने अच्छी औरत की भूमिका अदा की जो कामोत्तेजना पैदा करनेवाले नृत्य भी पेश करती है। यह एक नए किस्म की औरत है। उसमें आधुनिकतावाद एवं परंपरा का मिश्रण है। शिक्षा एवं मुक्त प्रेम की हिमायती, प्रेम के साथ शारीरिक लगाव, मानसिक तौर पर कामुक आकांक्षाओं, पहनावे, फैशन आदि में पश्चिमी। यह औरत ऐसे समय में परंपरा की ओर मुड़ती थी जब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु आता था। तब वह अपनी आधुनिकतावादी खूबियों को छिपा लेती है। उस समय वह सदियों पुराने पिता, भाई, पति-भगवान वाले एटीटयूड को व्यक्त करती है। इस तरह का स्टीरियोटाइप दर्शकों में सहज स्वीकार्य रहा है। क्योंकि वह बुनियादी समस्या कामुक असमर्थता का समाधान देता था।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

फिल्मी गीत और पैरोडी के विचारधारात्मक खेल


 फिल्मी गीत 'पैरोडी' है। पैरोडी का अर्थ यह नहीं है कि इसे गंभीरता से न लिया जाए। पैरोडी गंभीर विधा है। इसकी साहित्यिक परंपरा है। पैरोडी की विधागत विशेषता है कि वह पराश्रित या परजीवी, व्युत्पन्न, स्वचेतन, प्रबोधात्मक और आत्म-प्रतिबिंबात्मक विधा है। इसमें आलोचनात्मक अंतराल बनाए रखकर पुनरावृत्ति होती है। यह विडंबनापूर्ण है, इससे खेला जा सकता है।

कुछ चिंतक यह भी मानते हैं कि 'पैरोडी' की सृजनात्मक भूमिका होती है। खासकर फिल्मी संगीत की दुनिया में पुराने संगीत रूपों की नकल करके उन्हें नए रूप में पेश करके आधुनिक संगीत चेतना बनाने में इससे मदद मिलती है। पैरोडी के द्वारा ही संगीत चेतना का रूपांतरण, समावेशन और गहराई में प्रवेश संभव हुआ है।

पैरोडी में 'अंतरवर्ती संदर्भगतता' (इंटरटैक्स्चुएलिटी) का प्रयोग होता है। इसी के कारण वह नए को समाहित और पुनरुत्पादित करने में सफल हो जाती है। प्रभावशैली पैरोडी में लेखकीय भावबोध और रूप (फॉर्म) का इच्छित दिशा में पूरी तरह विकृतीकरण कर दिया जाता है। उसमें विशिष्ट क्षण को उभारा जाता है। इसमें परंपरा से विच्छिन्नता होती है। पाठ के मूल संदर्भ और उससे जुड़ी चीजों के संदर्भ से काटकर उसका निर्माण किया जाता है। इसके लिए पाठगत अंतस्संबंधों का विश्लेषण करना चाहिए।

इसमें निष्क्रिय, वैविध्यपूर्ण एवं द्विअर्थी प्रयोग मिलते हैं। 'पैरोडी' को समझने का अर्थ है संप्रेषण की प्रक्रिया को समझना। इसके संदर्भगत उत्पादन, पाठ के साथ युग के संबंध को समझना चाहिए।

'पैरोडी' की खूबी है कि वह वास्तव से सुंदर होती है। इसमें वास्तविक समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों का गंभीर वर्णन मिलता है। उसके पाठ की प्रस्तुति प्रभावशाली होती है, पाठ भी प्रभावशाली होता है। यह पुराने रूप (फॉर्म) के साथ संवाद है।

पैरोडी स्वभावत: वर्णसंकर और द्विअर्थी होती है। वह पुराने रूप के साथ ऐसा संवाद है जो अविस्मरणीय रूप में सामने आता है। वह स्व-संतुष्ट और नाशवादी रूप की अभिव्यक्ति है। पैरोडी की लोकप्रियता का इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि वह आज कल्पनाशीलता और संवेदनात्मकता का निर्माण करने का बड़ा स्रोत है। आमलोगों के दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, मानवीय संबंधों, संस्कारों और मूल्यबोध को निर्मित करने में इसकी गंभीर भूमिका है।

इस परिप्रेक्ष्य में हमें फिल्मी गीत-संगीत या लोकप्रिय गीत-संगीत की सामाजिक भूमिका के बारे में विचार करना चाहिए। हिंदी फिल्मों के गीतों में निम्नलिखित प्रवृत्तियां पाई जाती हैं : (1) उल्लास, (2) प्रेम, (3) एकता, (4) सुंदर अतीत और सुंदर भविष्य की परिकल्पना, (5) प्रकृति वर्णन एवं सामाजिक भावनाएं, (6) अर्थहीनता, (7) स्व-पीड़न और पर-पीड़न, (8) धार्मिक आस्था।

इन आठों प्रवृत्तियों के गीत प्रत्यक्ष या प्रकारांतर से व्यक्ति के सामाजिक अलगाव या जड़ों से दूर चले जाने या जीवन से पृथकता या भावात्मक तौर पर संबंधों में आई दरार या बेगाने भावों के जीवन में जड़ें जमा लेने के भाव को व्यक्त करते हैं। उल्लास की प्रवृत्ति जिन गानों में व्यक्त होती है उनमें यह तथ्य उभारा जाता है कि जीवन में धक्का लगना अनिवार्य है, यह अपरिहार्य किंतु अस्थायी अवस्था है। इन गानों का अंत सुखांत होता है।

इसी तरह एकता की प्रवृत्ति को जिन गानों में अभिव्यक्ति मिलती है, वहां राष्ट्रीय एकता, सामाजिक एकता, बंधुत्व एवं समानता के भावबोध की अभिव्यक्ति मिलती है। उल्लास और एकता की प्रवृत्ति के गीत जनता के मन को उद्वेलित करते हैं, मन को उत्प्रेरित करते हैं। इन दोनों प्रवृत्तियों से मन को हल्का आनंद और आत्मसंतोष मिलता है।

प्रच्छन्नत: ये दोनों प्रवृत्तियां किसी न किसी तरह के सामाजिक असंतोष को व्यक्त करती हैं। इनमें अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपाने या जो सहमत है उसे ही सहमत करने या संबोधित करने की दृष्टि मिलती है। सामाजिक असंतोष की कारक शक्तियां इसमें शामिल नहीं होतीं। परिणामत: उल्लास और एकता की प्रवृत्तियां सकारात्मक दिशा में ले जाने के बजाय प्रतिगामी दिशा में ले जाती हैं।

जिन गीतों में समूह का आह्नान होता है वहां व्यक्तित्व केंद्रित दृष्टिकोण मिलता है। व्यक्तित्वों में भी अभिजन के व्यक्तित्व को हीरो या त्राणकर्ता के रूप में उभारा जाता है। ये गीत समूह या गिरोह में शामिल होने का भाव पैदा करते हैं। जब तक आप समूह या गिरोह में शामिल हैं तब तक चिंता करने की कुछ भी जरूरत नहीं।

समूह और गिरोह अमूर्त होते हैं। शक्लहीन होते हैं। शक्ल या पहचान के अभाव के कारण ही इनकी फासिज्म की दिशा में विकास की संभावना होती है। इससे समूह के दबाव की चेतना का निर्माण होता है। परिणामत: श्रोताओं में दबाव ग्रुप की राजनीति और अंधसमूहवाद की राजनीति के प्रति रुझान बढ़ता है।

फिल्मी गीतों की शैली में अमूमन 'आंतरिकता' या 'हार्दिकता' का तत्व हावी रहता है जिसके आधार पर सामान्य संवेदना निर्मित की जाती है। यही सामान्य संवेदना करोड़ों श्रोताओं के दृष्टिकोण में गीतों की विचारधारा के प्रति अनुकूल रवैया पैदा करती है।

गीत सुनते हुए यह महसूस होता है कि गायक सिर्फ श्रोता से मिल रहा है, तुमसे मिल रहा है। यह गायक का श्रोता से व्यक्तिगत मिलन है। यह सामुदायिक संवेदना का गंभीर विकृतीकरण है। गीतों में गायन शैली वैयक्तिक होती है। सुनने के क्रम में हमें वैयक्तिकता के बजाय यह महसूस होता है कि यह जीवन से कई गुना ज्यादा बड़ी है। वस्तुत: यह ऐसी शैली है जो अपने सामूहिक दायित्व को भूल चुकी है। यह लोकप्रिय गीतों का वैयक्तिकीकरण है।





बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

वायवीय है हिन्दी फिल्मी संगीत


फिल्मी संगीत की यह विशेषता है कि इसके आस्वादन की जब आदत हो जाती है तब अभिरुचि एवं व्यक्तित्व में कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन सहज नहीं रह जाता। इसका प्रधान कारण है व्यक्ति के अंदर 'मेनीपुलेशन' के प्रति अनुकूल परिवेश का तैयार होना, यह 'व्यक्तित्व' की अवस्था न होकर, दासत्व की अवस्था है। 'दासत्व' में मेनीपुलेशन तेजी से प्रभावी होता है जबकि 'व्यक्तित्व' की अवस्था में मेनीपुलेशन की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं।
औद्योगिकीकरण के कारण शहरी जीवन का नियमन और आत्मसातीकरण के रवैय्ये के विकास के कारण मनुष्य अब जन-मस्तिष्क के आश्रित होता है। इस अवस्था का जनमाध्यमों के द्वारा विस्तार दिया जाता है।

जनमाध्यमों के द्वारा उन सब चीजों को विस्तार दिया जाता है जो 'देखी' और 'सुनी' जा सकती हों। ऐसे रूप को निर्मित किया जाता है जो समग्र को हजम करने पर मजबूर करें। अब व्यक्ति के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता, किसी भी चीज के बारे में निर्णय करने की क्षमता से वह वंचित हो जाता है, अब उसके पास स्वतंत्रता नहीं होती, भरोसे योग्य अभिरुचियां नहीं होतीं, बौध्दिक स्वास्थ्य के लिए कौन सी सामग्री का सेवन करें इसकी जानकारी नहीं होती और न ही उसके पास आपत्ति ही होती है।
 
ऐसी परिस्थितियों में लोकवादी संस्कृति माल के माध्यम से जनता की अभिरुचियों को नष्ट करने की कोशिश करती है, अभिरुचियों का वैशिष्टय खत्म करके इकसार अभिरुचियों को निर्मित करती है, साथ ही, निज के बारे में सोचने में अक्षम बना देती है, वह व्यक्ति को अनुरूपता के अनुकूल प्रेरित करती है।

इसी बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में लोकप्रिय गीत-संगीत अपनी भूमिका अदा करता है। सकारात्मक के बजाय नकारात्मक सिध्दांतों का तेजी से प्रसार करता है। चंद विषयों को ही उठाता है, अन्य की उपेक्षा करता है। ऐसा करके वह लोगों को संतुष्ट नहीं करता अपितु उनका दोहन करता है।

अब समस्या यह हो जाती है कि दोहन से लड़ें या सांस्कृतिक स्वास्थ्य लाभ करें ? या फिर कोई और रास्ता अपनाएं? पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा और प्रविधि के विकास के गर्भ से जो लोकतांत्रिाक प्रक्रिया नि:सृत होती है उसको सही दिशा में कैसे ले जाया जाए इस पर विचार करें। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए फिल्म संगीत एवं गीत कहां तक मददगार हो सकते हैं, यह विचारणीय प्रश्न है।

हिंदी फिल्मी गीतों का इतिहास 'आलम आरा' (1927) फिल्म से शुरू होता है। यह पहली बोलती फिल्म थी। आरंभ की फिल्मों के फिल्मी गीतों में उदासी और दिल का दर्द छाया हुआ था। ये नायक-नायिका के प्रेम पर लिखे गीत हैं। ये लयात्मक और पदात्मक गीत हैं। जबकि आज के पॉप संगीत की धुनों के लिए लिखे जा रहे गीतों में खंडित गद्य है, गीतात्मकता का अभाव है। पुराने गीत भावप्रधान थे, संगीत उनका अनुगामी था। गीतकार गीत लिखते समय देशी वाद्ययंत्राों को ध्यान में रखता था। यह एक तरह से

फिल्मी संगीत साधना का दौर था। किंतु नए इलैक्ट्रोनिक वाद्ययंत्रों और 'सिंथेसाइजर' के आगमन ने 'संगीत साधना' और संगीतकार की समग्र भूमिका को बदल दिया। अब संगीत सृजन की नहीं, संयोजन की चीज बन गया। संगीतकार सर्जक के बजाय संयोजक हो गया। अब सृजन के बजाय निर्मिति पर बल दिया जाने लगा। अब संगीत साधना के बजाय बाजार का माल बन गया। इस प्रक्रिया ने संगीतकार, संगीत, संगीतवाद्य और गीत सबका संहार किया।


आरंभिक दौर के फिल्मी संगीत में 'रियाज' पर जोर था, आजकल 'नकल' या 'पैरोडी' पर जोर है। यह ऐसा संगीत है जो खिचड़ी संगीत है। इसकी न तो परंपरा है और न भविष्य। यह अल्पायु संगीत है। इसी अर्थ में यह उत्तर-आधुनिक संगीत है। परिश्रम, पहचान, मौलिकता से रहित खंडित पद्य को उभारना इसका लक्ष्य है और
वैविध्यपूर्ण, विसंदर्भीकृत संगीत रूपों का सम्मिश्रण इसकी विशेषता है।

फिल्मी संगीत में जिस तरह 'पैरोडी' का वर्चस्व है, गीत में भी 'पैरोडी' का वर्चस्व है। पुनरावृत्ति और उत्तेजना इसकी विशेषता है। गायक को गायकी, लय और तानों की आज जरूरत नहीं है। फिल्मी संगीत के क्षेत्र में धीमी, व्यक्तिगत संवाद बनानेवाली धुनों का अब लोप हो चुका है।

जीवन की गति के साथ आरंभिक दौर में संगीत का रोमानियत भरा जो रिश्ता था वह अब खत्म हो चुका है। रोमानी शैली की जगह उत्तेजनात्मक शैली ने ले ली है। धुन की जगह बेसुरेपन और बेतालेपन ने ले ली है। यह संगीत एवं गीत की जीवन से विदाई की बेला है। अब नकल ही असल और असल ही नकल है।

असली गायक की जगह अब नकली गायक का वर्चस्व है। नए फिल्मी गीत का अपने मूल संदर्भ, फिल्म के संदर्भ, संगीत संदर्भ से कोई संबंध नहीं है। अब कथा, मार्मिक प्रसंग, नृत्य-संगीत के दृश्य फिल्मों से विदाई ले चुके हैं।

इस समूची प्रक्रिया पर माध्यम विशेषज्ञ सुधीश पचौरी का मूल्यांकन गौरतलब है। उनका कहना है : 'अब नायक है, सिर्फ लड़-लड़कर थका हुआ खलनायक है, जो पुराना सभ्य नहीं रह गया, दरअसल रस और कण के सारे नियम खत्म किए जा चुके हैं जिनमें बंधकर एक परिपाक होता था, गाने उसके लिए न केवल सामग्री की तरह थे, अपितु राहत पहुंचाने के नुस्खे भी थे। किंतु अब नायक को न कोठे पर जाने की जरूरत है, न गांव छोड़कर रोने-कलपने की, न परिवार के टूटने की चिंता है और न बच्चा पालने की। गीत स्थितियां, पॉप संगीत स्पर्धाओं (जैसे कर्ज, डिस्को डांसर) में सीमित है या फिर लघु-लघु हो उठे प्रेम प्रसंगों में जो सेक्स प्रसंग अधिक रह गए हैं, प्रेम की जगह सेक्स ने जब से ली, तब से गीत विदा हुए कहे जा सकते हैं, अब नायक-नायिका सिर्फ शरीर हैं, उनके मन नहीं है, आत्मा नहीं है तो आत्मिक आनंद की जरूरत क्यों होने लगी।'
... 'अब गीत मन को संबोधित नहीं होते बल्कि अर्द्ध संभोगाशय को उभारते हैं।'
... 'नया बेहद पापुलर है तो इसलिए क्योंकि वह भड़काऊ है, हिंसक है और विस्फोटक है, थका देनेवाला है और नए युवा के भीतर सहज लब्ध सुख संग्रह और उत्तेजना,सामग्री संचय का जो नया सांस्कृतिक मूल्य मौजूद है उससे नई धुनें, नए गाने, नया गायक मेल खाता है ... जो नया है वह धुन नहीं है, वह गीत नहीं है, वह अधिक-से-
अधिक इंद्रियों पर हिंसा करनेवाला व्यवस्थित शोर है, जो एक दिन हमारे मन के कोमल संस्कार के कोमल भावजगत को नष्ट कर हमें सिर्फ ऐंद्रिक-प्राणी बनाने पर तुला है।'

पचौरी के शब्दों में, 'एशियाई समाजों में संगीत जीवन की संगति में रहा है, नया संगीत विसंगति से खेलता है, संगीत पैदा नहीं करता, आप उसे आसानी से गा नहीं सकते, गुनगुना नहीं सकते। जो गीत गुनगुनाए नहीं जा सकते, वे गीत अमर नहीं हो सकते ... दरअसल नई फिल्मों को गीतकार नहीं फाइटमास्टर चाहिए।'

इस सबके बावजूद हिंदी फिल्म और संगीत इतना लोकप्रिय क्यों है? सत्यजित राय के शब्दों में इसका प्रधान कारण है, 'सार्वभौम हाव-भाव, सार्वभौम संवेदनाएं, किसी खास समाज के साथ पहचान का अभाव, कृत्रिम और वायवीय समाज का रूपायन। इन्हीं कारणों से हिंदी सिनेमा लोकप्रिय है।'
सत्यजित राय ने हिंदी फिल्मी गीतों की लोकप्रियता के एक अन्य पहलू पर भी प्रकाश डाला है। उनका मानना है कि 'भारतीय समाज में पश्चिमी समाजों की तरह मनोरंजन के साधनों का जबर्दस्त अभाव है। परिणामत: सिनेमा के नृत्य एवं गायन के अभाव की पूर्ति न करें तो अन्य किसी माध्यम से इसकी पूर्ति संभव नहीं है।'
सत्यजित इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि 'भारतीय समाज गीतों से ज्यादा प्यार करता है।' उनका मानना है कि 'अच्छे गीत को महान कविता नहीं होना चाहिए। क्योंकि उसका अपना संगीत होता है, उसे गीत के रूप में ढालना मुश्किल होता है।'

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