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गुरुवार, 24 मार्च 2011

23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर विशेष- मेरा साथी, मित्र और नेता भगत सिंह-समापन किश्त- शिव वर्मा


   भगत सिंह और दत्त द्वारा असेंबली भवन में फेंके गए पर्चों की पहली पंक्ति थी 'बहरों को सुनाने के लिए जोर की आवाज की जरूरत होती है।' लेकिन सरकार तो जान-बूझ कर बहरी बनी थी। असेंबली में उसका बहुमत था। ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पास हो गया। लेकिन पब्लिक सैफ्टी बिल को पेश करने का उसका साहस नहीं हुआ। वह आर्डिनेन्स के रूप में देश के सर पर थोप दिया गया। पर्चे में फ्रेंच विप्लवी वेलां के कुछ उध्दरण देकर क्रांतिकारी दल के कार्यों का समर्थन किया गया था और कहा गया था कि जनता के प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों के पास लौट जाए और जनता को भावी विप्लव के लिए तैयार करें।
   दिल्ली में अब मैं और जयदेव ही रह गए थे। हमने पहले से ही अलग एक कमरा ले लिया था। उन दोनों साथियों की गिरफ्तारी के साथ-साथ हम पुराना मकान छोड़ कर नए कमरे में आ गए। दिन भर के काम के बाद काफी रात गए जब हम सोये तो हम दोनों के दिल भारी थे। ऐसा लग रहा था मानो हम अभी-अभी अपने दो संबंधियों की बलि चढ़ाकर लौटे हों। एक दूसरे से बिना कुछ बोले ही हमने आखें बंद कर लीं। आंखें बंद करते ही मेरे सामने जेल का नक्शा घूमने लगा। उस समय तक मैंने जेल देखा न था, केवल उसकी दिल दहलाने वाली कहानियां ही सुनी थीं। एक रात पहले हम चारों एक साथ सोए थे। और अब उनमें से दो हमेशा के लिए हमसे छिन चुके थे। जीवन में उनसे अब हम कभी भी न मिल सकेंगे; इस विचार से मुझे रुलाई-सी आने लगी। आंसू बहाना कमजोरी है, अपने पर काबू पाने और अपने भावों को दबाने के विचार से में चुपचाप उठा और रात के सन्नाटे में सुनसान सड़क की ओर खुलती एक खिड़की के पास जाकर बैठ गया।
   जयदेव भी शायद मेरी ही तरह केवल आंख बंद किए पड़ा था। कुछ देर बाद जब उसने आंखें खोली तो देखा शिव अपने बिस्तर पर नहीं है। मुझे ढूंढ़ निकालने में उसे कठिनाई नहीं हुई। मुझे खिड़की पर चुपचाप बैठा देख वह मेरे पास आ गया। पास बैठते हुए उसने पुकारा।
   प्रकृति ने शरीर में दो ऐसे भेदिये लगा दिए हैं जो लाख छिपाने पर भी हृदय का सारा राज दूसरों से कह डालते हैं। बहुत कुछ संभालने पर भी मेरी आंखों से आंसू के दो बूंद लुढ़क ही गए। उसी समय दो और भेदिये भी अपनी कहानी कह डालने के लिए उतावले हो पड़े। जयदेव की आंखें भी नम हो गयीं। जब हमसफर बिछड़ जाते हैं तो शायद सब जगह ऐसा ही होता है। उस रात हम लोग काफ़ी देर तक खिड़की के पास चुपचाप बैठे रहे और भेदिये रुक-रुक कर अपनी-अपनी कहानियां कहते रहे।
      दल ने इन दोनों साथियों को जिस काम के लिए बलिदान किया था, उसे उन्होंने पूरे उत्तारदायित्व के साथ निबाहा। अदालत के सामने भगत सिंह और दत्त ने दल के  समाजवाद उस समय युग की आवाज थी। क्रांतिकारियों में भगत सिंह ने सबसे पहले उस आवाज को सुना और पहचाना। यहीं पर वह अपने दूसरे साथियों से बड़ा था।
      भगत सिंह और दत्ता द्वारा असेंबली भवन में फेंके गए पर्चों की पहली पंक्ति थी 'बहरों को सुनाने के लिए जोर की आवाज की जरूरत होती है।' लेकिन सरकार तो जान-बूझ कर बहरी बनी थी। असेंबली में उसका बहुमत था। ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पास हो गया। लेकिन पब्लिक सैफ्टी बिल को पेश करने का उसका साहस नहीं हुआ। वह आर्डिनेन्स के रूप में देश के सर पर थोप दिया गया। पर्चे में फ्रेंच विप्लवी वेलां के कुछ उध्दरण देकर क्रांतिकारी दल के कार्यों का समर्थन किया गया था और कहा गया था कि जनता के प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों के पास लौट जाए और जनता को भावी विप्लव के लिए तैयार करें।
      दिल्ली में अब मैं और जयदेव ही रह गए थे। हमने पहले से ही अलग एक कमरा ले लिया था। उन दोनों साथियों की गिरफ्तारी के साथ-साथ हम पुराना मकान छोड़ कर नए कमरे में आ गए। दिन भर के काम के बाद काफी रात गए जब हम सोये तो हम दोनों के दिल भारी थे। ऐसा लग रहा था मानो हम अभी-अभी अपने दो संबंधियों की बलि चढ़ाकर लौटे हों। एक दूसरे से बिना कुछ बोले ही हमने आखें बंद कर लीं। आंखें बंद करते ही मेरे सामने जेल का नक्शा घूमने लगा। उस समय तक मैंने जेल देखा न था, केवल उसकी दिल दहलाने वाली कहानियां ही सुनी थीं। एक रात पहले हम चारों एक साथ सोए थे। और अब उनमें से दो हमेशा के लिए हमसे छिन चुके थे। जीवन में उनसे अब हम कभी भी न मिल सकेंगे; इस विचार से मुझे रुलाई-सी आने लगी। आंसू बहाना कमजोरी है, अपने पर काबू पाने और अपने भावों को दबाने के विचार से में चुपचाप उठा और रात के सन्नाटे में सुनसान सड़क की ओर खुलती एक खिड़की के पास जाकर बैठ गया।
      जयदेव भी शायद मेरी ही तरह केवल आंख बंद किए पड़ा था। कुछ देर बाद जब उसने आंखें खोली तो देखा शिव अपने बिस्तर पर नहीं है। मुझे ढूंढ़ निकालने में उसे कठिनाई नहीं हुई। मुझे खिड़की पर चुपचाप बैठा देख वह मेरे पास आ गया। पास बैठते हुए उसने पुकारा।
      प्रकृति ने शरीर में दो ऐसे भेदिये लगा दिए हैं जो लाख छिपाने पर भी हृदय का सारा राज दूसरों से कह डालते हैं। बहुत कुछ संभालने पर भी मेरी आंखों से आंसू के दो बूंद लुढ़क ही गए। उसी समय दो और भेदिये भी अपनी कहानी कह डालने के लिए उतावले हो पड़े। जयदेव की आंखें भी नम हो गयीं। जब हमसफर बिछड़ जाते हैं तो शायद सब जगह ऐसा ही होता है। उस रात हम लोग काफ़ी देर तक खिड़की के पास चुपचाप बैठे रहे और भेदिये रुक-रुक कर अपनी-अपनी कहानियां कहते रहे।
      दल ने इन दोनों साथियों को जिस काम के लिए बलिदान किया था, उसे उन्होंने पूरे उत्तरदायित्व के साथ निबाहा। अदालत के सामने भगत सिंह और दत्ता ने दल के  आदर्श के प्रचार के साधन के रूप में इस्तेमाल करने का पक्षपाती था। साथ ही वह यह भी चाहता था कि हम लोग अदालत में तथा जेलों में राजनैतिक बंदियों के अधिकारों के लिए अनवरत सर्घष करें, सरकार, उसकी अदालत तथा उसकी नीतियों के प्रति अपने घृणा के भाव को अपने कामों द्वारा हर उपयुक्त अवसर पर प्रदर्शित करें, और अंत में यदि वक्तव्य देने का अवसर मिले तो एक राजनैतिक वक्तव्य द्वारा पूरी व्यवस्था पर गहरा प्रहार करें।
      सरदार की इन बातों का सभी साथियों ने समर्थन किया। इस योजना के अनुसार सभी अभियुक्तों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया। पहली श्रेणी उन लोगों की थी जिनका केस वकील द्वारा लड़ा जाना था। इसमें पांच साथी थे- देशराज भारती, प्रेमदत्त, मास्टर आज्ञा राम, अजय घोष और किशोरी लाल। दूसरी श्रेणी थी शत्राु की अदालत को मान्यता न देने वालों की। इनका काम था उपयुक्त अवसर पर अदालती अभिनय के ढकोसले पर सैध्दांतिक प्रहार करना। इन साथियों ने ट्रिब्यूनल के सामने पहले ही दिन जो बयान दिया उसके बारे में अदालत के जजों ने लिखा था कि वह ''ब्रिटिश सरकार पर हिंसात्मक राजनैतिक हमला था। चूंकि खुली अदालत में इस भाषण्ा का, जो कि राजद्रोहात्मक प्रचार के अतिरिक्त और कुछ भी न था। बहुत ही अनुचित था ...इसलिए टिब्यूनल ने उसका पढ़ा जाना रोक दिया।'' बयान के अंत में कहा गया था ''इन कारणों से हम इस हास्यास्पद अभिनय का अंग बनने से इनकार करते हैं और आगे से हम इस अदालत की कार्यवाही में किसी प्रकार का हिस्सा नहीं लेंगे।'' इनमें थे महावीर सिंह, बी.के. दत्ता, डॉ. गयाप्रसाद, कुन्दनलाल और जतींद्रनाथ सान्याल। और तीसरी श्रेणी उन लोगों की थी जो अपना केस स्वयं लड़ रहे थे। इनका काम था सरकारी गवाहों से जिरह करना, मुखबिरों तथा गवाहों के मुंह से अपनी बात कहलवाना। उनकी हर बात का उद्देश्य होता था प्रचार। इस ग्रुप के साथियों के नाम थे- भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, कमलनाथ तिवारी और सुरेंद्रनाथ पांडे।
      अदालत के मंच को प्रचार के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की हमारी यह योजना बहुत सफल रही।
      यह भूख-हड़ताल 63 दिन चली। भगत सिंह और दो ने तीन महीने से ऊपर पार किये। इन तीनों महीनों में भगत सिंह अपना सारा काम-लिखना, पढ़ना, नहाना, अदालत जाना, मसविदे तैयार करना, सरकार से पत्र-व्यवहार करना, अदालत में बयान देना, हंसना, गुनगुनाना-नियमित रूप से करता रहा। केस के दौरान भगत सिंह और दत्ता को लाहौर सेन्ट्रल जेल में रखा गया और शेष अभियुक्तों को बोर्स्टल जेल में। डिफेंस (सफाई) के लिए आपसी परामर्श के बहाने वे दोनों प्रत्येक रविवार के दिन बोर्स्टल जेल आ जाते थे। भगत सिंह कई बार भूख-हड़ताल के बावजूद बोर्स्टल जेल आया।
      जेल में किताबों की सुविधा थी और आरम्भ से ही पढ़ने-लिखने का वातावरण बनगया था। आपस में सैध्दांतिक एवं राजनैतिक समस्याओं पर बहस आदि भी होती थी लेकिन भगत सिंह के आ जाने पर उस सब में एक नयी जान सी आ जाती। उस दिन शायद ही कोई विषय अछूता रहता हो-सप्ताह की पढ़ी हुई पुस्तकें, माक्र्सवाद, सोवियत संघ की उन्नति, अफगानिस्तान के उलट फेर, चीन और जापान की तनातनी, लीग आफ नेशंस का निकम्मापन, मेरठ केस, भारतीय पूंजीपति वर्ग की भूमिका, कांग्रेस की गतिविधि, लाहौर-कांग्रेस में ध्येय परिवर्तन का प्रश्न आदि सभी विषयों पर चर्चा रहती।
      यों हमारे केस के प्राय: सभी साथियों को पढ़ने लिखने में अच्छी रुचि थी, लेकिन भगत सिंह इस क्षेत्रा में सबसे आगे था। उसका प्रिय विषय साम्यवाद होते हुए भी उपन्यासों में उसकी अच्छी रुचि थी, विशेषतया राजनैतिक तथा आर्थिक समस्याओं पर प्रकाश डालने वाले उपन्यास। डिकेन्स, अप्टन सिंक्लेयर, हाल केन, विक्टर ह्यूगो, गोर्की, स्टेपनियेक, आस्कर वाइल्ड, लियांनाइड एन्ड्रीव आदि उसके प्रिय लेखक थे। लियांनाइड एन्ड्रीव की सुप्रसिध्द पुस्तक 'सेवन दैट वेयर हैंग्ड' उसने अदालत में हमें पढ़ कर सुनाई। पुस्तक का एक पात्रा जिसे मौत की सजा हुई थी लगातार यही दोहराता रहता था कि 'मुझे फांसी नहीं लगनी चाहिए'। जब उसे फांसी पर लटकाने के लिए ले जाया जाने लगा तब भी वह बार बार कातर स्वर से यही चिल्लाता रहा, 'मुझे फांसी नहीं लगनी चाहिए'
      भगत सिंह जब कहानी के इस प्रसंग पर पहुंचा तो उसकी आंखों में आंसू छलक आए। उस समय मृत्यु पर विजय पाने वाले अपने साथी को मृत्यु भय से कातर एक औपन्यासिक पात्रा की सहानुभूति में आंसू बहाते देख सब के दिल भर आए थे।
      जिन दिनों हमारा केस चल रहा था उन दिनों प्राय हर दूसरे तीसरे दिन पुलिस वालों से या जेल अधिकारियों से झगड़ा और मारपीट चलती रहती थी। उन झगड़ों में मुझ जैसे दुबले-पतले लोग थोड़ी मार खाकर ही बच जाते थे। लात-घूंसों और डंडों की अधिकांश चोट बेचारे पांच छह व्यक्तियों के हिस्से में ही पड़ती थी। देखने में मोटे तगड़े उन साथियों को जैसे अधिकारियों ने इसी काम के लिए चुन सा लिया था। राजनैतिक समस्याओं पर वाद-विवाद में ही नहीं वरन् मार खाने वाले साथियों की उस लिस्ट (भगत सिंह, जयदेव कपूर, महावीर सिंह, किशोरी लाल, गयाप्रसाद आदि) में भी भगत सिंह सबसे आगे था।
अंत में फैसले का दिन भी आ गया। भगत सिंह को फांसी की सजा होगी इसके लिए हम पहले से तैयार थे। फिर भी उसे सुन कर मेरे सर में चक्कर-सा आ गया। कल तक जो अनुमान था वह अब यथार्थ बन कर सामने आ रहा था।
      सजा के बाद भी बोर्स्टल जेल से हटा कर केंद्रीय कारागार में कर दिया गया। वहां के नये और पुराने दोनों फांसी के हाते एक दूसरे से सटे हुए थे। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु नये हाते में थे और हम लोग पुराने में। एक रात अचानक हमारी कोठरियों के ताले खुले और हम से चलने के लिए कहा गया। हमारे साथियों को फांसी देने से पहलेही सरकार हमें किसी दूसरी जगह भेज देना चाहती थी।
      जेल का बड़ा दरोगा अपने पूरे दलबल के साथ हमें लेकर फाटक की ओर चला। कुछ दूर चलकर उसने पूछा ''अपने साथियों से मिलोगे?'' उदारता के लिए धन्यवाद पा कर उसने नये हाते का फाटक खुलवाया और हमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की कोठरियों के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। प्रश्न सुन कर पहले तो सरदार ठहाका मार कर हंसा फिर गंभीर हो कर बोला, ''क्रांति के मार्ग पर कदम रखते समय मैंने सोचा था कि यदि मैं अपना जीवन देकर देश के कोने-कोने तक इंकलाब जिंदाबाद का नारा पहुंचा सका तो मैं समझूंगा कि मुझे अपने जीवन का मूल्य मिल गया। आज फांसी की इस कोठरी में लोहे के सीखचों के पीछे बैठ कर भी मैं करोड़ों देशवासियों के कंठों से उठती हुई उस नारे की हुंकार सुन सकता हूं। मुझे विश्वास है कि मेरा यह नारा स्वाधीनता संग्राम की चालक शक्ति के रूप में साम्राज्यवादियों पर अंत तक प्रहार करता रहेगा।'' फिर कुछ रुक कर अपनी स्वाभाविक मुस्कराहट के बीच उसने आहिस्ते से कहा, ''और इतनी छोटी जिंदगी का इससे अधिक मूल्य हो भी क्या सकता है?''
      मैं सबसे पीछे था। विदाई लेते समय मेरी आंखाें में आंसू आ गए। मुझे रोते देखकर उसने कहा ''भावुक बनने का समय अभी नहीं आया है प्रभात। मैं तो कुछ ही दिनों में सारे झंझटों से छुटकारा पा जाऊंगा, लेकिन तुम लोगाें को लंबा सफर पार करना पड़ेगा। मुझे विश्वास है उत्तारदायित्व के भारी बोझ के बावजूद इस लंबे अभियान में तुम थकोगे नहीं, पस्त नहीं होगे और हार मान कर रास्ते में बैठ नहीं जाओगे।'' यह कहकर उसने सीखचों के अंदर से हाथ बढ़ा कर मेरा हाथ पकड़ लिया।जेल के दरोगा ने पास आकर आहिस्ते से कहा, ''चलिए''। सरदार से वह हमारी आखिरी मुलाकात थी।और फिर 23 मार्च, 1931 की संध्या समय सरकार ने उनसे सांस लेने का अधिकार छीन कर अपनी प्रतिहिंसा की प्यास भी बुझा ली। अन्याय और शोषण के विरुध्द विद्रोह करने वाले तीन और तरुणों की जिंदगियां जल्लाद के फंदे ने समाप्त कर दीं।
      फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए भगत सिंह ने एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट को संबोधित करते हुए कहा, ''मजिस्ट्रेट महोदय, आप वास्तव में बड़े भाग्यशाली हैं, क्योंकि आप को यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा है कि एक भारतीय क्रांतिकारी अपने महान आदर्श के लिए किस प्रकार हंसते-हंसते मृत्यु का आलिंगन करता है।''
      फांसी से कुछ पहले भाई के नाम अंतिम पत्रा में उसने लिखा था, ''मेरे जीवन का अवसान समीप है। प्रात: कालीन प्रदीप के प्रकाश के समान टिम-टिमाता हुआ मेरा जीवन प्रदीप भोर के प्रकाश में विलीन हो जायेगा। हमारा आदर्श, हमारे विचार बिजली के कौंध के समान सारे संसार में जागृति पैदा कर देंगे। फिर यदि यह मुट्ठी भर राखविनष्ट भी हो जाए तो संसार का इससे क्या बनता बिगड़ता है!''
      जैसे-जैसे भगत सिंह के जीवन का अवसान समीप आता गया, देश तथा मेहनतकश जनता के उज्ज्वल भविष्य में उसकी आस्था गहरी होती गयी। मृत्यु से पहले सरकार के नाम लिखे एक पत्रा में उसने कहा था, ''अति शाीघ्र ही अंतिम संघर्ष के आरंभ की दुंदुभी बजेगी। उसका परिणाम निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद और पूंजीवाद अपनी अंतिम घडियां गिन रहे हैं। हमने उसके विरुध्द युध्द में भाग लिया था। और उसके लिए हमें गर्व है।''
      एक महान एवं पवित्र आर्दश के प्रति अडिग विश्वास ही किसी देश के नवयुवकों को जल्लाद के सामने भी मुस्कराता हुआ खड़ा रख सकता है। भगत सिंह और उसके दोनों साथियों का अपने आदर्श की अंतिम विजय में कितना विश्वास था, वह उनके उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है। और यह विश्वास ही उनके अमरत्व का राज था।
      जिस समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई उस समय मैं आंध्र प्रदेश (उस समय मद्रास प्रांत के अंतर्गत) की राजमहेंद्री जेल में था। मुझे ऐसा लगा कि हम शायद बिछड़ने के लिए ही मिले थे। यतीन्द्रदास, भगवतीचरण और आजाद तो जा ही चुके थे, अब जल्लाद ने मेरे तीन और साथी मुझसे छीन लिए।
      मेरे हमजोलियों की कतार से अलग होकर वे शहीदों में जा मिले। तब से उन पर सारे देश का अधिकार है। उनके नामों के जै-जैकार के बीच जब भी कभी उनके चित्रों पर फूल चढ़ते देखता हूं। या किसी अजनबी को उन पर रचे सैकड़ों गीतों में से किसी एक गीत की पंक्तियां गुनगुनाने सुनता हूं तो गर्व से मस्तक उंचा हो जाता है। फिर भी हमराहियों के बिछुड़ जाने से जीवन में जो एक अभाव सा पैदा हो जाता है, उससे कुछ तकलीफ तो होती ही है। और पुरानी स्मृतियां जब कभी मन को कुरेद देती हैं तो वह कविवर आलम के शब्दों में कह उठता हैं! ''नैनन में जे सदा रहते तिनकी अब कान कहानी सुनो करै'' और तब अंतर के स्वर अधीर होकर पूछने लगते हैं :
                वे सूरतें इलाही किस देश बसतियां हैं?










बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ब्रिटिश शासन और भारत में विद्रोह- कार्ल मार्क्स


वियना से तार द्वारा आने वाले समाचार बताते हैं कि तुर्की, सारडीनिया और स्विट्जरलैंड की समस्याओं का शांतिपूर्ण ढंग से हल हो जाना वहां पर निश्चित समझा जाता है।कल रात कॉमन्स सभा में भारत पर बहस सदा की तरह नीरस ढंग से जारी रही। मि. ब्लैकेट ने आरोप लगाया कि सर चार्ल्स वुड और सर जे. हौग के वक्तव्यों में झूठी आशावादिता की झलक दिखलाई देती है। मंत्रिमंडल और डायरेक्टरों के बहुत से हिमायतियों ने अपनी शक्ति भर इस आरोप का खंडन किया, और फिर अचूक मि. ह्यूम ने बहस का सार पेश करते हुए मंत्रियों से मांग की कि अपना बिल वे वापिस ले लें। बहस स्थगित हो गई।
हिंदुस्तान एशियाई आकार का इटली है : एल्प्स की जगह वहां हिमालय है, लोंबार्डी के मैदान की जगह वहां बंगाल का सम-प्रदेश है, ऐपिनाइन के स्थान पर दकन है, और सिसिली के द्वीप की जगह लंका का द्वीप है। भूमि से उपजने वाली वस्तुओं में वहां भी वैसी ही संपन्नतापूर्ण विविधता है और राजनीतिक व्यवस्था की दृष्टि से वहां भी वैसा ही विभाजन है। समय-समय पर विजेता की तलवार इटली को जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के जातीय समूहों में बांटती रही है, उसी प्रकार हम पाते हैं कि, जब उस पर मुसलमानों, मुगलों, अथवा अंगरेजों का दबाव नहीं होता तो हिंदुस्तान भी उतने ही स्वतंत्र और विरोधी राज्यों में बंट जाता है जितने कि उसमें शहर, या यहां तक कि गांव होते हैं। फिर भी, सामाजिक दृष्टिकोण से, हिंदुस्तान पूर्व का इटली नहीं, बल्कि आयरलैंड है। इटली और आयरलैंड के, विलासिता के संसार और पीडा के संसार के, इस विचित्र सम्मिश्रण का आभास हिंदुस्तान के धर्म की प्राचीन परंपराओं में पहले से मौजूद है। वह धर्म एक ही साथ विपुल वासनाओं का और अपने को यातनाएं देने वाले वैराग्य का धर्म है। उसमें लिंगम भी है, जगन्नाथ का रथ भी। यह योगी और भोगी दोनों ही का धर्म है।
मैं उन लोगों की राय से सहमत नहीं हूं जो हिंदुस्तान के किसी स्वर्ण युग में विश्वास करते हैं; लेकिन, अपने मत की पुष्टि के लिए, सर चार्ल्स वुड की भांति, कुली खां की दुहाई मैं नहीं देता। लेकिन उदाहरण के लिए, औरंगजेब के काल को लीजिए; या उस युग को जिसमें उत्तर में मुगल और दक्षिण में पुर्तगाली प्रकट हुए थे; अथवा मुसलिम आक्रमण और दक्षिण भारत में सप्त राज्यों के काल को लीजिए; अथवा, यदि आप चाहें तो, और भी प्राचीन काल में जाइए स्वयं ब्राह्मण के उस पौराणिक इतिहास को लीजिए जो कहता है कि हिंदुस्तानियों की दु:ख-गाथा उस काल से भी पहले शुरू हो गई थी जिसमें कि, ईसाइयों के विश्वास के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी।
लेकिन, इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि हिंदुस्तान पर जो मुसीबतें अंगरेजों ने ढाई हैं वे हिंदुस्तान ने इससे पहले जितनी मुसीबतें उठाई थीं, उनसे मूलत: भिन्न और अधिक तीव्र किस्म की हैं। मेरा संकेत उस यूरोपीय निरंकुशशाही की ओर नहीं है जिसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया की अपनी निरंकुशशाही के ऊपर लाद दिया है और जिसके मेल से एक ऐसी भयानक वस्तु पैदा हो गई है कि उसके सामने सालसेट के मंदिर के दैवी दैत्य भी फीके पड़ जाते हैं। यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कोई अपनी विशेषता नहीं है, बल्कि डचों की महज नकल है। यहां तक कि यदि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के तौर-तरीकों का हम वर्णन करना चाहें तो उस वक्तव्य को शब्दश: दोहरा देना ही काफी होगा जो जावा के अंगरेज गवर्नर सर स्टैमफोर्ड रैफल्स ने पुरानी डच ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध में दिया था : डच कंपनी का एक मात्र उद्देश्य लूटना था और अपनी प्रजा की परवाह या उसका खयाल वह उससे भी कम करती थी जितनी कि पश्चिमी भारत के बागानों का गोरा मालिक अपनी जागीर में काम करने वाले गुलामों के दल का किया करता था, क्योंकि बागानों के मालिक ने अपनी मानव संपत्ति को पैसे खर्च करके खरीदा था, लेकिन कंपनी ने उसके लिए एक फूटी कौडी तक खर्च नहीं की थी। इसलिए, जनता से उसकी आखिरी कौड़ी तक छीन लेने के लिए, उसकी श्रमशक्ति की अंतिम बूंद तक चूस लेने के लिए कंपनी ने निरंकुशशाही के तमाम मौजूदा यंत्रों का इस्तेमाल किया था; और, इस तरह, राजनीतिज्ञों की पूरी अभ्यस्त चालबाजी और व्यापारियों की सर्व-भक्षी स्वार्थलिप्सा के साथ उसे चला कर स्वेच्छाचारी और अर्ध्द-बर्बर सरकार के दुर्गुणों को उसने पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया था।
हिंदुस्तान में जितने भी गृहयुध्द छिड़े हैं, आक्रमण हुए हैं, क्रातियां हुई हैं, देश को विदेशियों द्वारा जीता गया है, अकाल पड़े हैंवे सब चीजें ऊपर से देखने में चाहे जितनी विचित्र रूप
से जटिल, जल्दी-जल्दी होने वाली और सत्यानाशी मालूम होती हों, लेकिन वे उसकी सतह से नीचे नहीं गई हैं। पर इंगलैंड ने भारतीय समाज के पूरे ढांचे को ही तोड ड़ाला है और उसके पुनर्निर्माण के कोई लक्षण अभी तक दिखलाई नहीं दे रहे हैं। उसके पुराने संसार के इस तरह उससे छिन जाने और किसी नए संसार के प्राप्त न होने से हिंदुस्तानियों के वर्तमान दु:खों में एक विशेष प्रकार की उदासी जुड़ जाती है, और, ब्रिटेन के शासन के नीचे, हिंदुस्तान अपनी समस्त प्राचीन परंपराओं और अपने संपूर्ण पिछले इतिहास से कट जाता है।
एशिया में अनादि काल से आम तौर पर सरकार के केवल तीन विभाग होते आए हैं : वित्त का, अथवा देश के अंदर लूट का विभाग; युध्द का अथवा बाहर की लूट का विभाग; और अंत में सार्वजनिक निर्माण का विभाग। जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विशेषकर इस कारण कि सहारा से लेकर अरब, ईरान, भारत और तार्तारी होते हुए एशिया के सबसे ऊंचे पठारों तक विशाल रेगिस्तानी इलाके फैले हुए हैंपूर्व में खेती का आधार मानव द्वारा निर्मित नहरें और जल संग्रह की व्यवस्था के द्वारा सिंचाई हो रही है। मिस्र और भारत की ही तरह मेसोपोटामिया, ईरान, आदि में भी बाग बनाकर पानी को रोकने और फिर उससे जमीन को उपजाऊ बनाने की प्रथा है; नहरों में पानी पहुंचाते रहने के लिए ऊंचे स्तर से लाभ उठाया जाता है। पानी के मिलजुल कर और किफायत के साथ खर्च करने की इस बुनियादी आवश्यकता ने पश्चिम में निजी उद्योग को स्वेच्छा से सहयोग का रास्ता अपनाने के लिए बाध्य कर दिया था, जैसा कि फ्लैंडर्स और इटली में देखने में आया था। पूर्व में, जहां सभ्यता का स्तर बहुत नीचा और भूमि का विस्तार बहुत विशाल था और इसलिए जहां सहयोगी संगठन का स्वेच्छा से बनना कठिन था, इस काम को पूरा करने के लिए सरकार की केंद्रीय शक्ति के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। इसलिए सभी एशियाई सरकारों पर एक आर्थिक जिम्मेदारी आ पड़ीसार्वजनिक निर्माण कार्य की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी। भूमि को उपजाऊ बनाने की यह कृत्रिम व्यवस्था, जो एक केंद्रीय सरकार पर निर्भर करती थी, और सिंचाई और आबपाशी के काम की उपेक्षा होते ही तुरंत चौपट हो जाती थी, इस विचित्र लगने वाले तथ्य का भी स्पष्टीकरण कर देती है कि पाल्मीरा, पेत्रा, यमन के भग्नावशेषों और मिस्र, ईरान और हिंदुस्तान के बड़े-बड़े सूबे जैसे वे विशाल क्षेत्र, जो कभी खेती से गुलजार रहते थे, आज हमें उजाड़ और रेगिस्तान बन गए क्यों दिखाई देते हैं। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि यदि एक भी विनाशकारी युध्द आ जाता है तो सदियों के लिए देश को वह किस प्रकार जनविहीन बना देता है और उसकी पूरी सभ्यता का अंत कर देता है।
अंग्रेजों ने पूर्वी भारत में अपने पूर्वाधिकारियों से वित्त और युध्द के विभागों को तो ले लिया है, लेकिन सार्वजनिक निर्माण विभाग की ओर उन्होंने पूर्ण उपेक्षा दिखलाई है। फलस्वरूप, एक ऐसी खेती, जिसे स्वतंत्र व्यवसाय और निर्बाध व्यापार के मुक्त व्यापार वाले ब्रिटिश सिध्दांत के आधार पर नहीं चलाया जा सकता था, पतन के गढ़े में पहुंच गई  है। लेकिन एशियाई साम्राज्यों में हम इस बात को देखने के काफी आदी हैं कि एक सरकार के मातहत खेती की हालत बिगडती है और किसी दूसरी सरकार के मातहत वह फिर सुधर जाती है। वहां पर फसलें अच्छी या बुरी सरकारों के अनुसार होती हैं जैसे कि यूरोप में वे अच्छे या बुरे मौसम पर निर्भर करती हैं। इस तरह, उत्पीड़न और खेती की उपेक्षा बुरी बातें होते हुए भी ऐसी नहीं थीं कि उन्हें भारतीय समाज को ब्रिटिश हस्तक्षेपकारियों द्वारा पहुंचाई गई अंतिम चोट मान लिया जातायदि, उनके साथ-साथ, एक और भी बिलकुल ही भिन्न महत्व की बात न जुड़ी होती, एक ऐसी बात जो पूरी एशियाई दुनिया के इतिहास में एक बिलकुल नई चीज थी। लेकिन, भारत के अतीत का राजनीतिक स्वरूप चाहे कितना ही अधिक बदलता हुआ दिखलाई देता हो, प्राचीन से प्राचीन काल से लेकर 19वीं शताब्दी के पहले दशक तक उसकी सामाजिक स्थिति अपरिवर्तित ही बनी रही हैं। नियमित रूप से असंख्य कातने वालों और बुनकरों को पैदा करने वाला करघा और चर्खा ही उस समाज के ढांचे की धुरी थे। अनादि काल से यूरोप भारतीय कारीगरों के हाथ के बनाए हुए बढ़िया कपड़ों को मंगाता था और उनके बदले में अपनी मूल्यवान धातुओं को भेजता था; और, इस प्रकार, वहां के सुनार के लिए वह कच्चा माल जुटा देता था। सुनार भारतीय समाज का एक आवश्यक अंग होता है। बनाव-शृंगार के प्रति भारत का मोह इतना प्रबल है कि उसके निम्नतम वर्ग तक के लोग, वे लोग जो लगभग नंगे बदन घूमते हैं, आम तौर पर कानों में सोने की एक जोडी बालियां और गले में किसी न किसी का सोने का एक जेवर अवश्य पहने रहते हैं। हाथों और पैरों की उंगलियों में छल्ले पहनने का भी आम रिवाज है। औरतें और बच्चे भी अकसर सोने या चांदी के भारी-भारी कड़े हाथों और पैरों में पहनते हैं और घरों में सोने या चांदी की देवमूर्तियां पाई जाती हैं। ब्रिटिश आक्रमणकारी ने आकर भारतीय करघे को तोड़ दिया और चर्खे को नष्ट कर डाला। इंगलैंड ने भारतीय कपड़े को यूरोप के बाजार से खदेड़ना शुरू किया; फिर उसने हिंदुस्तान में सूत भेजना शुरू किया; और अंत में उसने कपड़े की मातृभूमि को ही अपने कपड़ों से पाट दिया। 1818 और 1836 के बीच ग्रेट ब्रिटेन से भारत आने वाले सूत का परिमाण 5,200 गुना बढ़ गया। 1824 में मुश्किल से 10 लाख गज अंगरेजी मलमल भारत आती थी, लेकिन 1837 में उसकी मात्रा 6 करोड़ 40 लाख गज से भी अधिक पहुंच गई। लेकिन, इसी के साथ-साथ, ढाका की आबादी 1,50,000 से घटकर 20,000 ही रह गई। भारत के जो शहर अपने कपड़ों के लिए प्रसिध्द थे, उनका इस तरह अवनत हो जाना ही इसका सबसे भयानक परिणाम नहीं था। अंगरेजी भाप और विज्ञान ने सारे हिंदुस्तान में खेती और उद्योग की एकता को नष्ट कर दिया।
पूर्व की सभी कौमों की तरह, हिंदुस्तानी एक ओर तो अपने महान सार्वजनिक निर्माण कार्यों को, जो उनकी खेती और व्यापार के मुख्य आधार थे, केंद्रीय सरकार के हाथों में छोड़े रहते थे; दूसरी तरफ, सारे देश में वे उन छोटे-छोटे केंद्रों में बिखरे रहते थे जिन्हें खेती और उद्योग-धंधों की घरेलू एकता ने कायम कर रखा था। इन दो परिस्थितियों ने एक विशेष प्रकार की सामाजिक व्यवस्था को, उस तथाकथित ग्रामीण व्यवस्था को जन्म दिया था जो अनादि काल से चली आ रही है। इस व्यवस्था ने इनमें से प्रत्येक छोटे संघ (केंद्र) को एक स्वतंत्र संगठन और खास तरह का जीवन प्रदान कर रखा था। इस व्यवस्था का अनोखा रूप कैसा था इसे नीचे दिए गए वर्णन से जाना जा सकता है। यह वर्णन भारत के मामलों पर ब्रिटेन की कॉमन्स सभा की एक पुरानी सरकारी रिपोर्ट से लिया गया है : भौगोलिक दृष्टि से, गांव देहात का एक ऐसा हिस्सा होता है जिसमें कुछ सौ या हजार एकड़ उपजाऊ और ऊसर जमीन होती है; राजनीतिक दृष्टि से, वह एक शहर या कसबे के समान होता है। ठीक से व्यवस्थित होने पर उसमें निम्न प्रकार के अफसर और कर्मचारी होते हैं : पटेल, अर्थात मुखिया, जो आम तौर पर गांव के मामलों की देखभाल करता है, उसके निवासियों के आपसी झगड़ों का निपटारा करता है, पुलिस की देख-रेख करता है, और अपने गांव के अंदर मालगुजारी वसूल करने का काम करता है। यह काम ऐसा है जिसके लिए उसका व्यक्तिगत प्रभाव और परिस्थितियों और लोगों की समस्याओं के संबंध में उसकी सूक्ष्म जानकारी उसे खास तौर से सबसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति बना देती है। कातिब (पटवारी) खेती का हिसाब-किताब रखता है और उससे संबंधित हर चीज को अपने कागजों में दर्ज करता है। तालियर (चौकीदार) और तोती (दूसरी तरफ का चौकीदार)इनमें से तालियर का काम अपराधों और जुर्मों का पता लगाना और एक गांव से दूसरे गांव जाने वाले यात्रियों को वहां तक पहुंचाना और उनकी रक्षा करना होता है; तोती का काम गांव के अंदरूनी मामलों से अधिक जुड़ा हुआ मालूम होता है, अन्य कामों के साथ-साथ वह फसलों की चौकीदारी करता है और उन्हें मापने में मदद देता है। सीमा-कर्मचारी, जो गांव की सीमाओं की रक्षा करता है, अथवा कोई विवाद उठने पर उसके संबंध में गवाही देता है। तालाबों और सोतों का सुपरिंटेंडेंट खेती के लिए पानी बांटता है। ब्राह्मण गांव की ओर से पूजा करता है। स्कूल मास्टर रेत के ऊपर गांव के बच्चों को पढ़ना और लिखना सिखाता हुआ दिखलाई देता है। पत्र वाला ब्राह्मण, अथवा ज्योतिषी आदि भी होता है। ये अधिकारी और कर्मचारी ही आम तौर से गांव का प्रबंध करते हैं। लेकिन देश के कुछ भागों में इस प्रबंधव्यवस्था का विस्तार इतना नहीं होता; ऊपर बताए गए कर्तव्यों और कार्यों में से कुछ एक ही व्यक्ति को करने पड़ते हैं। दूसरे भागों में इन अधिकारियों और कर्मचारियों की तादाद ऊपर गिनाए गए व्यक्तियों से भी अधिक होती है। इसी सरल म्युनिसिपल शासन के अंतर्गत इस देश के निवासी न जाने कब से रहते आए हैं। गांवों की सीमाएं शायद ही कभी बदली गई हों; और यद्यपि गांव स्वयं कभी-कभी युध्द, अकाल अथवा महामारी से तबाह और बर्बाद तक हो गए हैं, लेकिन उनके वही नाम, वही सीमाएं, वही हित, और यहां तक कि वही परिवार युगों-
युगों तक कायम रहे हैं। राज्यों के टूटने और छिन्न-विच्छिन्न हो जाने के संबंध में निवासियों ने कभी कोई चिंता नहीं की। जब तक गांव पूरा का पूरा बना रहता है, वे इस बात की परवाह नहीं करते कि वह किस सत्ता के हाथ में चला जाता है, या उस पर किस बादशाह की हुकूमत कायम होती है। गांव की अंदरूनी आर्थिक व्यवस्था अपरिवर्तित ही बनी रहती है। पटेल अब भी गांव का मुखिया बना रहता है, और अब भी वही छोटे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की तरह गांव से मालगुजारी वसूल करने अथवा जमीन को उठाने का काम करता रहता है।
सामाजिक संगठन के ये छोटे-छोटे एक ही तरह के रूप अब अधिकतर मिट गए हैं, और मिटते जा रहे हैं। टैक्स इकट्ठा करने वाले अंगरेज अफसरों और अंगरेज सिपाहियों के पाशविक हस्तक्षेप के कारण वे इतने नहीं मिटे हैं जितने कि अंगरेजी भाप और अंगरेजी मुक्त व्यापार की कारगुजारियों के कारण। गांवों में रहने-सहने वाले उन परिवारों का आधार घरेलू उद्योग थे। हाथ से सूत बुनने, हाथ से सूत कातने और हाथ से ही खेती करने के उस अनोखे संयोग से उन्हें आत्मनिर्भरता की शक्ति प्राप्त होती थी। अंगरेजों के हस्तक्षेप ने सूत कातने वाले को लंकाशायर में और बुनकर को बंगाल में रख कर, या हिंदुस्तानी सूत कातने वाले और बुनकर दोनों का सफाया करकेउनके आर्थिक आधार को नष्ट करकेइन छोटी-छोटी अर्ध्द बर्बर, अर्ध्द सभ्य बस्तियों को छिन्न-विछिन्न कर दिया है और इस तरह उसने एशिया की महानतम और सच कहा जाए तो एकमात्र सामाजिक क्रांति कर डाली है।
यह ठीक है कि उन असंख्य उद्योगशील पितृसत्तात्मक और निरीह सामाजिक संगठनों का इस तरह टूटना और टुकडाें-टुकड़ों में बिखर जाना विपत्तियों के सागर में पड़ जाना, और साथ ही साथ उनके व्यक्तिगत सदस्यों द्वारा अपनी प्राचीन सभ्यता और जीविका कमाने के पुश्तैनी साधनों को खो बैठना निस्संदेह ऐसी चीजें हैं जिनसे मानव-भावना अवसाद में डूब जाती है; लेकिन, हमें यह न भूलना चाहिए कि, ये काव्यमय ग्रामीण बस्तियां ही, ऊपर से वे चाहे कितनी ही निर्दोष दिखलाई देती हों, पूर्व की निरंकुशशाही का सदा ठोस आधार रही हैं, कि मनुष्य के मस्तिष्क को उन्होंने संकुचित से संकुचित सीमाओं में बांधे रखा है जिससे वह अंधविश्वासों का असहाय साधन बन गया है, परंपररागत रूढियों का गुलाम बन गया है और उसकी समस्त गरिमा और ऐतिहासिक ओज उससे छिन गया है। उस बर्बर अहमन्यता को हमें नहीं भूलना चाहिए जो, अपना सारा ध्यान जमीन के किसी छोटे से टुकड़े पर लगाए हुए, साम्राज्यों को टूटते-मिटते, अवर्णनीय अत्याचारों को होते, बड़े-बड़े शहरों की जनसंख्या का कत्लेआम होते चुपचाप देखती रही। इन चीजों की तरफ देखकर उसने ऐसे मुंह फिरा लिया है जैसे कि वे कोई प्राकृतिक घटनाएं हों। वह स्वयं भी हर उस आक्रमणकारी का असहाय शिकार बनती रही है जिसने उसकी तरफ किंचित भी दृष्टिपात करने की परवाह की है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरी तरफ, इसी प्रतिष्ठाहीन, गतिहीन और सर्वथा जड़ जीवन ने, उस तरह के निष्क्रिय अस्तित्व ने, अपने से बिलकुल भिन्न, विनाश की अनियंत्रित, उद्देश्यहीन, असीमित शक्तियों को भी जगा दिया था, और मनुष्य-हत्या तक को हिंदुस्तान की एक धार्मिक प्रथा बना दिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन छोटी-छोटी बस्तियों को जात-पांत के भेदभावों और दासता की प्रथा ने दूषित कर रखा है, कि मनुष्य को परिस्थितियों का सर्वसत्ताशाली स्वामी बनाने के बजाए उन्होंने उसे बाह्य परिस्थितियों का दास बना दिया है, कि अपने आप विकसित होने वाली एक सामाजिक सत्ता को उसने एक कभी न बदलने वाला स्वाभाविक प्रारब्ध का रूप दे दिया है और, इस प्रकार उसने एक ऐसी प्रकृति-पूजा को प्रतिष्ठित कर दिया है जिसमें मनुष्य अपनी मनुष्यता खोता जा रहा है। इस मनुष्य का अध:पतन इस बात से भी स्पष्ट हो रहा था कि प्रकृति का सर्वसत्ताशाली स्वामी मनुष्य घुटने टेककर बानर हनुमान और गऊ शबला की पूजा करने लगा था।
यह सच है कि हिंदुस्तान में इंग्लैंड ने निकृष्टतम उद्देश्यों से प्रेरित होकर सामाजिक क्रांति की थी और उपने उद्देश्यों को साधने का उसका तरीका भी बहुत मूर्खतापूर्ण था। लेकिन सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि क्या एशिया की सामाजिक अवस्था में एक बुनियादी क्रांति के बिना मानव-जाति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है? यदि नहीं, तो मानना पड़ेगा कि इंगलैंड के चाहे जो गुनाह रहे हों, उस क्रांति को लाने में वह इतिहास का एक अचेतन साधन था।
(25 जून 1853 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, संख्या 3804, में प्रकाशित हुआ।)





सोमवार, 31 जनवरी 2011

1857 में भारत से आने वाले समाचार- कार्ल मार्क्स


     भारत से आने वाली पिछली डाक, जिसमें दिल्ली की 17 जून तक की और बंबई की 1 जुलाई तक की खबरें मौजूद हैं, भविष्य के संबंध में अत्यंत निराशापूर्ण चिंताएं उत्पन्न करती हैं। नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष, मि. वर्नन स्मिथ ने जब भारतीय विद्रोह की पहले-पहल कॉमन्स सभा को सूचना दी थी, तो उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा था कि अगली डाक यह खबर लेती आएगी कि दिल्ली को जमींदोज कर दिया गया है। डाक आई, लेकिन दिल्ली को अभी तक 'इतिहास के पृष्ठों से साफ' नहीं किया जा सका है। उस वक्त कहा गया था कि तोपखाने की गाड़ी 9 जून से पहले नहीं लाई जा सकेगी और इसलिए शहर पर, जिसकी किस्मत का फैसला हो चुका है, उस तारीख तक के लिए हमला रुक जाएगा। पर 9 जून भी बिना किसी उल्लेखनीय घटना के ही गुजर गया। 12 और 15 जून को कुछ घटनाएं हुईं, लेकिन उलटी ही दिशा मेंदिल्ली पर अंगरेजों का धावा नहीं हुआ, बल्कि अंगरेजों के ऊपर विप्लवकारियों ने हमला बोल दिया। लेकिन उनके बारंबार होने वाले इन हमलों को रोक दिया गया है। इस तरह दिल्ली का पतन फिर स्थगित हो गया है। इसका तथाकथित एकमात्र कारण अब घेरे के लिए तोपखाने की कमी नहीं है, बल्कि उसका कारण जनरल बरनार्ड का यह फैसला है कि और फौजों के आने का इंतजार किया जाए; क्योंकि उस प्राचीन राजधानी पर कब्जा करने के लिए, जिसकी 30 हजार देशी सिपाही हिफाजत कर रहे हैं और जिसके अंदर फौजी सामानों के तमाम गोदाम मौजूद हैं, 3 हजार सैनिकों की फौजी शक्ति एकदम नाकाफी थी। विद्रोहियों ने अजमेरी गेट के बाहर भी एक छावनी कायम कर ली थी। अभी तक फौजी विषयों के तमाम लेखक इस बारे में एकमत थे कि 3 हजार सैनिकों की अंगरेजी फौज 30 या 40 हजार सैनिकों की देशी सेनाको कुचलने के लिए बिलकुल काफी थी। और अगर बात ऐसी नहीं होती, तो लंदन टाइम्स के शब्दों में, इंगलैंड भारत को 'फिर से फतह करने' में समर्थ कैसे हो सकेगा?
भारत की सेना में वास्तव में 30 हजार ब्रिटिश सैनिक हैं। अगले छह महीनों में अंगरेज इंगलैंड से जो सैनिक वहां भेज सकते हैं, उनकी संख्या 20 या 25 हजार सैनिकों से अधिक नहीं हो सकती। इसमें से 6 हजार सैनिक ऐसे होंगे जो भारत में यूरोपियनों की खाली हुई जगहों पर काम करेंगे। बाकी बचे 18 या 19 हजार सैनिकों की शक्ति भी कठिन यात्रा की हानियों, प्रतिकूल जलवायु के नुकसानों और अन्य दुर्घटनाओं के कारण कम होकर लगभग 14 हजार सैनिकों की हो जाएगी। वे ही युध्द के मैदान में उतर सकेंगे। ब्रिटिश सेना को फैसला करना होगा कि या तो वह अपेक्षाकृत इतनी कम संख्या के साथ बागियों का सामना करे, या फिर उनका सामना करने का खयाल एकदम छोड़ दे। हम अभी तक इस चीज को नहीं समझ पा रहे हैं कि दिल्ली के इर्द-गिर्द फौजों को जमा करने के काम में वे इतनी ढिलाई क्यों दिखा रहे हैं। अगर इस मौसम में भी गर्मी एक अविजेय बाधा प्रतीत होती है, जो सर चार्ल्स नेपियर के दिनों में सिध्द नहीं हुई थी, तो कुछ महीनों बाद, यूरोपियन फौजों के आने पर, कुछ न करने के लिए बारिश और भी अच्छा बहाना उपस्थित कर देगी। इस चीज को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि वर्तमान बंगावत दरअसल जनवरी के महीने में ही शुरू हो गई थी; और, इस तरह, अपने गोला-बारूद और अपनी फौजों को तैयार रखने के लिए ब्रिटिश सरकार को काफी पहले से चेतावनी मिल चुकी थी।
अंगरेजी फौजों की घेरेबंदी के बाद भी दिल्ली पर देशी सिपाहियों का इतने दिनों तक कब्जा बने रहने का निस्संदेह स्वाभाविक असर हुआ है। बंगावत कलकत्ते के एकदम दरवाजे तक पहुंच गई है, बंगाल की 50 रेजीमेंटों का अस्तित्व मिट गया है, स्वयं बंगाल की सेना अतीत की एक कहानी मात्र रह गई है, और एक विशाल क्षेत्र में विप्लवकारियों ने इधर-उधर बिखरे और अलग-थलग जगहों में फंस गए यूरोपियनों की या तो हत्या कर दी है या वे एकदम हताश होकर अपनी हिफाजत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात का पता लग जाने के बाद कि सरकार के आसन पर अचानक हमला करने का एक षडयंत्र रच लिया गया था जो, कहा जाता है कि, पूर ब्योरे के साथ मुकम्मिल था, स्वयं कलकत्ते के ईसाई बाशिंदों ने एक स्वयंसेक रक्षा-दल तैयार कर लिया है और वहां की देशी फौजों को तोड़ दिया गया है। बनारस में एक देशी रेजीमेंट से हथियार छीनने की कोशिश का सिखों के एक दल और 13वीं अनियमित घुड़सवार सेना ने विरोध किया है। यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह मालूम होता है कि मुसलमानों की ही तरह सिख भी ब्राह्मणों के साथ मिलकर आम मोर्चा बना रहे हैं; और, इस तरह, ब्रिटिश शासन के विरुध्द समस्त भिन्न-भिन्न जातियों की व्यापक एकता तेजी से कायम हो रही है। अंगरेजों का यह दृढ़ विश्वास रहा है कि देशी सिपाहियों की सेना ही भारत में उनकी सारी शक्ति का आधार है।
अब, यकायक, उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि ठीक वही सेना उनके लिए खतरे का एकमात्र कारण बन गई है। भारत के संबंध में हुई पिछली बहसों के दौरान भी, नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष मि. वर्नन स्मिथ ने एलान किया था कि 'इस तथ्य पर कभी भी जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता कि देशी रजवाड़ों और विद्रोह के बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।' दो दिन बाद, वर्नन स्मिथ को एक समाचार प्रकाशित करना पड़ा जिसमें अशुभ सूचक यह परिच्छेद है :
14 जून को अवध के भूतपूर्व बादशाह को, जिनके बारे में पकड़े गए कागजों से पता चला था कि वह षडयंत्र में शामिल थे, फोर्ट विलियम के अंदर कैद कर दिया गया था और उनके अनुयायियों से हथियार छीन लिए गए थे।
धीरे-धीरे और भी ऐसे तथ्य सामने आएंगे जो स्वयं जौन बुल तक को इस बात का विश्वास दिला देंगे कि जिसे वह एक फौजी बंगावत समझता है, वह वास्तव में, एक राष्ट्रीय विद्रोह है।
अंगरेजी अखबार इस विश्वास से बहुत सांत्वना पाते प्रतीत होते हैं कि विद्रोह अभी तक बंगाल प्रेसिडेंसी की सीमाओं से आगे नहीं फैला है और बंबई और मद्रास की फौजों की वफादारी के संबंध में रत्ती भर भी संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन सुखद विचार के इस पहलू को निजाम की घुड़सवार सेना में औरंगाबाद में शुरू हुई बंगावत के संबंध में पिछली डाक से आई खबर बुरी तरह काटती प्रतीत होती है। औरंगाबाद बंबई प्रेसिडेंसी के इसी नाम के एक जिले की राजधानी है। स्पष्ट है कि पिछली डाक ने बंबई की सेना में भी विद्रोह के श्रीगणेश का एलान कर दिया है। वास्तव में, कहा तो यह जाता है कि औरंगाबाद की बंगावत को जनरल वुडबर्न ने फौरन कुचल दिया है, लेकिन, क्या मेरठ की बंगावत को भी फौरन कुचल दिए जाने की बात नहीं कही गई थी? सर एच. लॉरेंस द्वारा कुचल दिए जाने के बाद, लखनऊ की बंगावत भी क्या पखवाड़े भर बाद पुन: और भी अदम्य रूप में नहीं फूट पड़ी थी? क्या यह याद नहीं है कि भारतीय फौज की बंगावत के संबंध में दी गई पहली सूचना के साथ ही साथ इस बात की भी सूचना नहीं दी गई थी कि शांति स्थापित कर दी गई है? बंबई या मद्रास की सेनाओं का अधिकांश यद्यपि नीची जाति के लोगों का बना है, लेकिन प्रत्येक रेजीमेंट में अब भी कुछ सौ राजपूत मिल जाएंगे। बंगाल की सेना के उच्च वर्ण के विद्रोहियों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए यह संख्या पर्याप्त है। पंजाब को शांत घोषित किया गया है, लेकिन इसी के साथ हमें सूचित किया गया है कि 'फिरोजपुर में, 13 जून को, फौजी फांसियां हुई थीं'! और, इसी के साथ बाघन की सेनापंजाब की 5वीं पैदल सेना की '55वीं देशी पैदल सेना का पीछा करने में सराहनीय कार्य करने' के लिए प्रशांसा की गई है। कहना पड़ेगा कि यह बहुत ही विचित्र प्रकार की 'शांति' है!
(14 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5091, में प्रकाशित हुआ।)


सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

भारत में ब्रिटिश शासन के भावी परिणाम- कार्ल मार्क्स- 1-


   भारत के संबंध में अपनी टिप्पणियों को इस पत्र में मैं समाप्त कर देना चाहता हूं।
यह कैसा हुआ कि भारत के ऊपर अंगरेजों का आधिपत्य कायम हो गया? महान मुगल की सर्वोच्च सत्ता को मुगल सूबेदारों ने तोड़ दिया था। सूबेदारों की शक्ति को मराठों ने नष्ट कर दिया था। मराठों की ताकत को अफगानों ने खतम किया, और जब सब एक दूसरे से लड़ने में लगे थे, तब अंगरेज घुस आए और उन सबको कुचल कर खुद स्वामी बन बैठे। एक देश जो न सिर्फ मुसलमानों और हिंदुओं में, बल्कि, कबीले-कबीले और वर्ण-वर्ण में भी बंटा हुआ हो; एक समाज जिसका ढांचा उसके तमाम सदस्यों के पारस्परिक विरोधों और वैधानिक अलगावों के ऊपर आधारित होऐसा देश और ऐसा समाज क्या दूसरों द्वारा फतह किए जाने के लिए ही नहीं बनाया गया था? भारत के पिछले इतिहास के बारे में यदि हमें जरा भी जानकारी न हो, तब भी क्या इस जबरदस्त और निर्विवाद तथ्य से हम इनकार कर सकेंगे कि इस क्षण भी भारत को, भारत के ही खर्च पर पलने वाली एक भारतीय फौज अंगरेजों का गुलाम बनाए हुए है? अत:, भारत दूसरों द्वारा जीते जाने के दुर्भाग्य से बच नहीं सकता, और उसका संपूर्ण पिछला इतिहास अगर कुछ भी हो, तो वह उन लगातार जीतों का इतिहास है जिनका शिकार उसे बनना पड़ा है। भारतीय समाज का कोई इतिहास नहीं है, कम से कम ज्ञात इतिहास तो बिलकुल ही नहीं है। जिसे हम उसका इतिहास कहते हैं, वह वास्तव में उन आक्रमणकारियों का इतिहास है जिन्होंने आकर उसके उस समाज के निष्क्रिय आधार पर अपने साम्राज्य कायम किए थे, जो न विरोध करता था, न कभी बदलता था। इसलिए, प्रश्न यह नहीं है कि अंगरेजों को भारत जीतने का अधिकार था या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या अंगरेजों की जगह तुर्कों, ईरानियों, रूसियों द्वारा भारत का फतह किया जाना हमें ज्यादा पसंद होता।
भारत में इंगलैंड को दोहरा काम करना है : एक ध्वंसात्मक, दूसरा पुनर्रचनात्मक पुराने एशियाई समाज को नष्ट करने का काम और एशिया में पश्चिमी समाज के लिए भौतिक आधार तैयार करने का काम।
अरब, तुर्क, तातार, मुगल, जिन्होंने एक के बाद दूसरे भारत पर चढाई की थी, जल्दी ही खुद हिंदुस्तानी बन गए थे : इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेता अपनी प्रजा की श्रेष्ठतर सभ्यता द्वारा स्वयं जीत लिए गए थे। अंगरेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी, और, इसलिए, हिंदुस्तानी सभ्यता उन्हें अपने अंदर न समेट सकी। देशी बस्तियों को उजाड़ कर, देशी उद्योग-धंधों को तबाह कर और देशी समाज के अंदर जो कुछ भी महान और उदात्त था उस सबको धूल-धूसरित करके उन्होंने भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया। भारत में उनके शासन के इतिहास के पन्नों में इस विनाश की कहानी के अतिरिक्त और लगभग कुछ नहीं है। विध्वंस के खंडहरों में पुनर्रचना के कार्य का मुश्किल से ही कोई चिह्न दिखलाई देता है। फिर भी यह कार्य शुरू हो गया है।
पुनर्रचना की पहली शर्त यह थी कि भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हो और वह महान मुगलों के शासन में स्थापित एकता से अधिक मजबूत और अधिक व्यापक हो। इस एकता को ब्रिटिश तलवार ने स्थापित कर दिया है और अब बिजली का तार उसे और मजबूत बनाएगा और स्थायित्व प्रदान करेगा। भारत अपनी मुक्ति प्राप्त कर सके और हर विदेशी आक्रमणकारी का शिकार होने से वह बच सके, इसके लिए आवश्यक था कि उसकी अपनी एक देशी सेना हो : अंगरेज ड्रिल-सार्जेंट ने ऐसी ही एक सेना संगठित और शिक्षित करके तैयार कर दी है। (एशियाई समाज में पहली बार स्वतंत्र अखबार कायम हो गए हैं।) इन्हें मुख्यतया भारतीयों और यूरोपियनों की मिली-जुली संतानें चलाती है और वे पुनर्निर्माण के एक नए और शाक्तिशाली साधन के रूप में काम कर रहे हैं। जमींदारी और रैयतवारी प्रथाओं के रूप मेंयद्यपि ये अत्यंत घृणित प्रथाएं हैंभूमि पर निजी स्वामित्व के दो अलग रूप कायम हो गए हैं; इससे एशियाई समाज में जिस चीज की (भूमि पर निजी स्वामित्व की प्रथा कीअनु.) अत्यधिक आवश्यकता थी, उसकी स्थापना हो गई है। भारतीयों के अंदर से, जिन्हें अंगरेजों की देख-देख में कलकत्ते में अनिच्छापूर्वक और कम से कम संख्या में शिक्षित किया जा रहा है, और नया वर्ग पैदा हो रहा है जिसे सरकार चलाने के लिए आवश्यक ज्ञान और यूरोपीय विज्ञान की जानकारी प्राप्त हो गई है। भाप ने यूरोप के साथ भारत का नियमित और तेज संबंध कायम कर दिया है, उसने उसके मुख्य बंदरगाहों को पूरे दक्षिण-पूर्वी महासागर के बंदरगाहों से जोड़ दिया है, और उसकी उस अलगाव की स्थिति को खतम कर दिया है जो उसकी प्रगति न करने का मुख्य कारण थी। वह दिन बहुत दूर नहीं है जब रेलगाड़ियों और भाप से चलने वाले समुद्री जहाज इंगलैंड और भारत के बीच के फासले को, समय के माप के अनुसार, केवल आठ दिन का कर देंगे और वह वैभवशाली देश पश्चिमी संसार का सचमुच एक हिस्सा बना जाएगा।
ग्रेट ब्रिटेन के शासक वर्गों की भारत की प्रगति में अभी तक केवल आकस्मिक, क्षणिक और अपवाद रूप में ही दिलचस्पी रही है। अभिजात वर्ग उसे फतह करना चाहता था, थैलीशाहों का वर्ग उसे लूटना चाहता था, और मिलशाहों का वर्ग सस्ते दामों पर अपना माल बेच कर उसे बर्बाद करना चाहता था। लेकिन अब स्थिति एकदम उलटी हो गई है। मिलशाहों के वर्ग को पता लग गया है कि भारत को एक उत्पादन करने वाले देश में बदलना उनके अपने हित के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है, और यह कि, इस काम के लिए, सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि वहां पर सिंचाई के साधनों और आवाजाही के अंदरूनी साधनों की व्यवस्था की जाए। अब वे भारत में रेलों का जाल बिछा देना चाहते हैं। और वे बिछा देंगे। इसका परिणाम क्या होगा, इसका उन्हें कोई अनुमान नहीं है।
यह तो कुख्यात है कि विभिन्न प्रकार की उपजों को लाने-ले जाने और उसकी अदला-बदली करने के साधनों के नितांत अभाव ने भारत की उत्पादक शक्ति को पंगु बना रखा है। अदला-बदली के साधनों के अभाव के कारण, प्राकृतिक प्रचुरता के मध्य ऐसी सामाजिक दरिद्रता हमें भारत से अधिक कहीं और दिखलाई नहीं देती। ब्रिटिश कॉमन्स सभा की एक समिति के सामने, जो 1848 में नियुक्त की गई थी, यह साबित हो गया था कि :
खानदेश में जिस समय अनाज 6 शिलिंग से लेकर 8 शिलिंग फी क्वार्टर के भाव से बिक रहा था, उसी समय पूना में उसका भाव 64 शिलिंग से 70 शिलिंग तक का था, जहां पर अकाल के मारे लोग सड़कों पर दम तोड़ रहे थे, पर खानदेश से अनाज ले आना संभव नहीं था क्योंकि कच्ची सड़कें एकदम बेकार थीं।
रेलों के जारी होने से खेती के कामों में भी आसानी से मदद मिल सकेगी, क्योंकि जहां कहीं बांध बनाने के लिए मिट्टी की जरूरत होगी वहां तालाब बन सकेंगे, और पानी को रेलवे लाइन के सहारे विभिन्न दिशाओं में ले जाया जा सकेगा। इस प्रकार सिंचाई का, जो पूर्व में खेती की बुनियादी शर्त है, बहुत विस्तार होगा और पानी की कमी के कारण बार-बार पड़ने वाले स्थानीय अकालों से निजात मिल सकेगी। इस दृष्टि से देखने पर रेलों का आम महत्व उस समय और भी स्पष्ट हो जाएगा जब हम इस बात को याद करेंगे कि सिंचाई वाली जमीनें, घाट के नजदीक वाले जिलों में भी, बिना सिंचाई वाली जमीनों की तुलना में उतने ही रकबे के ऊपर तीन-गुना अधिक टैक्स देती हैं, दस या बारह गुना अधिक लोगों को काम देती हैं और उनसे बारह या पंद्रह गुना अधिक मुनाफा होता है।
रेलों के बनने से फौजी छावनियों की संख्या और उनके खर्चे में कमी करना भी संभव हो जाएगा। फोर्ट सेंट विलियम के टाउन मेजर, कर्नल वारेन ने कॉमन्स सभा की एक प्रवर समिति के सामने कहा था :
यह संभावना कि जितने दिनों में, यहां तक कि हफ्तों में, देश के दूर-दूर के भागों से आजकल जो सूचनाएं आ पाती हैं, वे आगे से उतने ही में वहां से प्राप्त हो जाया करेंगी और इतने ही संक्षिप्त समय में फौजों और सामान के साथ वहां हिदायतें भेजी जा सकेंगी, यह ऐसी संभावना है जिसका महत्व कभी भी बहुत बढ़ाकर नहीं आंका जा सकता। फौजों को तब और दूर-दूर की, और आज की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्यप्रद, छावनियों में रखा जा सकेगा और बीमारी के कारण जो बहुत सी जानें जाती हैं, उन्हें इस तरह बचा लिया जा सकेगा। तब विभिन्न गोदामों में इतना अधिक सामान रखने की भी जरूरत नहीं होगी और सड़ने-गलने और जलवायु के कारण नष्ट हो जाने से होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा। फौजों की कार्य-क्षमता के प्रत्यक्ष अनुपात में उनकी संख्या में भी कमी की जा सकेगी। (क्रमशः)

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कार्ल मार्क्स की नजर में भारतीय प्रश्न

                                                        लंदन, 28 जुलाई 1857
कल रात 'मृत भवन' में मिस्टर डिजरायली ने तीन घंटे का जो भाषण दिया था, उसे सुनने की जगह पढ़ा जाता तो उसका असर कम होने की जगह और बढ़ जाता। कुछ समय तक मि. डिजरायली ने वक्तृत्व कला का घोर आडंबर प्रदर्शित किया। बनकर बहुत धीरे-धीरे बोलने का और औपचारिकता के एक विकारहीन अनुक्रम का प्रदर्शन किया। ये चीजें एक महत्वाकांक्षी मंत्री की शान से संबंधित उनकी विचित्र धारणाओं के चाहे जितनी भी अनुकूल हों, लेकिन उनके यातनाग्रस्त श्रोताओं के लिए वास्तव में बहुत क्लेशपूर्ण होती हैं! पहले वह एकदम तुच्छ चीजों को भी लघु काव्यों के रूप में प्रस्तुत करने में सफल हो जाते थे। लेकिन अब वह लघु काव्यों तक को प्रतिष्ठा की रूढ़िबध्द नीरसता में डुबो देते हैं। मिस्टर डिजरायली की तरह के एक अच्छे वक्ता को तो, जो तलवार चलाने की जगह कटार भांजने में अधिक निपुण हैं---
बर्लिन की अकादमी के सामने प्रस्तुत कर दिया जा सकता है। देश, काल और अवसर के संबंध में उनके भाषण की विचित्र निष्पक्षता इस बात को अच्छी तरह साबित कर देती है कि वह न देश और काल के अनुरूप था, न अवसर के। रोमन साम्राज्य के पतन से संबंधित कोई अध्याय मांटेस्क्यू अथवा गिवन की पुस्तक में पढ़ने पर बहुत अच्छा लग सकता है; लेकिन उसी को यदि एक रोमन सीनेटर के मुंह में रख दिया जाए, जिसका खास काम ही यह था कि उस पतन को रोके, तो वह बहुत ही मूर्खतापूर्ण लगेगा। यह सही है कि हमारे आधुनिक पार्लियामेंटों में एक ऐसे स्वतंत्रचेता वक्ता की कल्पना की जा सकती है जो वास्तविक विकास-क्रम को प्रभावित करने में अपनी असमर्थता से निराश होकर प्रच्छन्न निंदापूर्ण तटस्थता का रुख अपना लेता है और अपने को इसी से संतुष्ट कर लेता है। यह भी मान लिया जा सकता है कि उसकी इस भूमिका में न शान की कमी होगी, न दिलचस्पी की। स्वर्गीय श्री गार्नियर पेजेज नेलुई फिलिप की प्रतिनिधि सभा (चैंबर ऑफ डिपुटीज) की स्थायी सरकार वाले गार्नियर पेजेज ने नहींकमोबेश सफलता के साथ ऐसी ही भूमिका अदा की थी। लेकिन मि. डिजरायली, जो एक जीर्ण-शीर्ण गुट के जाने-माने नेता हैं, इस तरह की सफलता को भी एक जबरदस्त पराजय मानेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सेना के विद्रोह ने वक्तृत्व कला के प्रदर्शन के लिए एक अत्यंत शानदार अवसर उपस्थित कर दिया था। लेकिन, इस विषय पर एकदम निर्जीव ढंग से विचार करने के अलावा उस प्रस्ताव में क्या सार था जिसको अपने भाषण का उन्होंने निमित्त बनाया? वास्तव में वह कोई प्रस्ताव ही नहीं था। उन्होंने झूठ-मूठ का यह दिखावा किया कि दो सरकारी दस्तावेजों की जानकारी हासिल करने के लिए वह व्यग्र थे : इनमें से एक दस्तावेज तो ऐसा था जिसके बारे में उन्हें यह भी यकीन नहीं था कि वह कहीं है भी, और दूसरा दस्तावेज ऐसा था जिसके बारे में उन्हें पूरा यकीन था कि संबंधित विषय से उसका कोई फौरी ताल्लुक नहीं था। इसलिए उनके भाषण और उनके प्रस्ताव में इसके सिवा और कोई संबंध नहीं था कि प्रस्ताव ने बिना किसी उद्देश्य के ही एक भाषण के लिए जमीन तैयार कर दी थी और उद्देश्य ने स्वयं यह स्वीकार कर लिया था कि वह इस योग्य नहीं था कि उस पर कोई भाषण दिया जाए। मि. डिजरायली सरकारी पद से अलग इंगलैंड के सबसे प्रसिध्द राजनीतिज्ञ हैं और इसलिए उनके द्वारा अत्यंत श्रमपूर्वक और विस्तार से तैयार की गई राय के रूप में उनके भाषण की ओर बाहर के देशों को अवश्य ध्यान देना चाहिए। 'एंग्लो-इंडियन साम्राज्य के पतन के संबंध में' उनके 'विचारों' की एक संक्षिप्त व्याख्या खुद उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत करके मैं अपने को संतुष्ट कर लूंगा :
भारत की उथल-पुथल एक फौजी बगावत है, या वह एक राष्ट्रीय विद्रोह है? फौजों का व्यवहार किसी आकस्मिक उत्तेजना का परिणाम है अथवा वह एक संगठित षडयंत्र का नतीजा है?
मि. डिजरायली फरमाते हैं कि पूरा सवाल इन्हीं नुक्तों पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षों से पहले तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य 'फूट डालो और शासन करो' के पुराने सिध्दांत पर आधारित थालेकिन उस समय तक भारत की विभिन्न जातियों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हुए, उनके धर्म में किसी प्रकार के हस्तक्षेप से बचते हुए, और उनकी भूसंपत्ति की रक्षा करते हुए ही इस सिध्दांत पर अमल किया जाता था। देशी सिपाहियों की फौज देश की अशांत भावनाओं को अपने अंदर समेट कर बचाव के एक साधन का काम करती थी। लेकिन हाल के वर्षों में भारत की सरकारी व्यवस्था में एक नए सिध्दांत कोजातियों को नष्ट करने के सिध्दांत कोशामिल कर लिया गया है। देशी राजे-रजवाड़ों को बलपूर्वक नष्ट करके, संपत्ति की निश्चित व्यवस्था को उलट-पुलट करके और आम लोगों के धर्म में हस्तक्षेप करके इस सिध्दांत को अमल में लाया गया है। 1848 में ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक कठिनाइयां ऐसी जगह पर पहुंच गई थीं जहां उसके लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह अपनी आमदनी को किसी न किसी तरीके से बढ़ाए। तब कौंसिल की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें लगभग बिना किसी छिपाव-दुराव के साफ-साफ यह सिध्दांत तय कर दिया गया कि अधिक आमदनी हासिल करने का एकमात्र तरीका यही हो सकता है कि देशी राजे-रजवाड़ों को मिटा कर ब्रिटिश अमलदारियों का विस्तार किया जाए। इसी के अनुसार, जब सतारा के राजा* की मृत्यु हुई तो उनके गोद लिए हुए वारिस को ईस्ट इंडिया कंपनी ने नहीं माना और उलटे उनके राज्य को हड़प कर उसे अपनी हुकूमत में शामिल कर लिया। उसके बाद से जब भी कोई देशी राजा बिना अपना स्वाभाविक वारिस छोड़े मरा, तो उसके राज्य को हड़प लेने की इसी व्यवस्था पर अमल किया गया। गोद लेने का सिध्दांत भारतीय समाज की आधारशिला है: सरकार ने उसको मानने से व्यवस्थित रूप से इनकार कर दिया। और, इसी तरह, 1848 से 1854 तक, एक दर्जन से अधिक स्वतंत्र राजाओं के राज्यों को बलपूर्वक ब्रिटिश साम्राज्य में मिला गया गया। 1854 में बरार के राज्य पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया गया। बरार का क्षेत्रफल 80 हजार वर्ग मील था, 40 से 50 लाख तक उसकी आबादी थी और उसके पास विशाल संपत्ति थी। इस तरह बलपूर्वक हड़पे गए राज्यों की सूची का अंत मि. डिजरायली ने अवध के नाम के साथ किया। उन्होंने कहा कि अवध को हड़पने की चाल के फलस्वरूप ईस्ट इंडिया सरकार की न केवल हिंदुओं के साथ, बल्कि मुसलमानों के साथ भी टक्कर हो गई। इसके बाद और भी आगे जाकर मि. डिजरायली ने बताया कि भारत की सांपत्तिक व्यवस्था में सरकार की नई व्यवस्था ने पिछले दस वर्षों में किस भांति उलट-फेर किए हैं।
वे कहते हैं, 'गोद लेने के नियम का सिध्दांत केवल भारत के राजाओं और रजवाड़ों के विशेषाधिकार की वस्तु नहीं है, वह हिंदुस्तान के हर उस व्यक्ति पर लागू होता है जिसके पास भूसंपत्ति है और जो हिंदू धर्म को मानता है।'
मैं उनके भाषण के एक स्थल का उध्दरण देता हूं :
वह महान सामंत, अथवा जागीरदार, जो अपने सम्राट की सार्वजनिक सेवा के एवज में अपनी भूमि का स्वामी बना हुआ है, और वह इनामदार जो पूरे भूमि-कर से मुक्त जमीन का स्वामी हैजो, अगर एकदम सही तौर पर नहीं तो, कम से कम, प्रचलित तौर पर हमारे माफीदार के समान हैइन दोनों ही वर्गों के लोगऔर ये वर्ग भारत में बहुत हैंस्वाभाविक वारिसों के न रहने पर अपनी रियासतों के लिए वारिस प्राप्त करने के लिए हमेशा इस सिध्दांत का उपयोग करते हैं। सतारा के हड़प लिए जाने से वे वर्ग एकदम विचलित हो उठे हैं। उन दस छोटे लेकिन स्वतंत्र राजाओं की अमलदारियों के हड़प लिए जाने से भी, जिनका मैंने पहले ही जिक्र किया है, वे विचलित हो उठे थे और जब बरार के राज्य को हड़प लिया गया तब वे केवल विचलित ही नहीं हुए थे, बल्कि अधिकतम मात्रा में भयभीत भी हो उठे थे। अब कौन आदमी सुरक्षित रह गया था? भारत भर में कौन सामंत, कौन माफीदारजिसका खुद का अपना बेटा नहीं थासुरक्षित रह गया था? (बिलकुल ठीक कहते हैं! ठीक कहते हैं!) यह भय अकारण नहीं था। इन चीजों के बारे में बड़े पैमाने पर काम किया गया था और उन्हें अमली रूप दिया गया था। भारत में पहली बार जागीरों और इनामों पर फिर से कब्जा कर लेने का सिलसिला शुरू हुआ। इसमें संदेह नहीं कि ऐसे भी नादानी-भरे अवसर आए थे जब सनदों (अधिकार-पत्रों) की जांच-पड़ताल करने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन गोद लेने के कानून को ही खतम कर दिया जाए, इसका स्वप्न में भी किसी ने कभी खयाल नहीं किया था। इसलिए कोई भी सत्ता, कोई भी सरकार इस स्थिति में कभी नहीं थी कि जो लोग अपने स्वाभाविक वारिस नहीं छोड़ गए थे, उनकी जागीरों और इनामों पर वह फिर से कब्जा कर ले। यह आमदनी का एक नया जरिया था; लेकिन, इन वर्गों के हिंदुओं के दिमागों पर इन तमाम चीजों का जिस समय असर पड़ रहा था, उसी समय सांपत्तिक व्यवस्था में उलट-फेर करने के लिए सरकार ने एक और कदम उठा लिया। सदन का ध्यान अब मैं उसी की ओर दिलाना चाहता हूं। निस्संदेह, 1853 में समिति के सामने ली गई गवाही के पढ़ने से, सदन को इस बात की, जानकारी है कि भारत में जमीन के ऐसे बहुत बड़े-बड़े भाग हैं जो भूमि-कर (मालगुजारी) से मुक्त हैं। भारत में भूमि-कर से मुक्त होना इस देश में भूमि-कर देने से मुक्त होने से कहीं अधिक महत्व रखता है, क्योंकि, आम तौर से, और प्रचलित अर्थ में कहा जाए तो, भारत में भूमि-कर ही राज्य का संपूर्ण कर है।
इन मुआफियों की उत्पत्ति कब हुई थी, इसका पता लगाना कठिन है; लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वे अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। वे भिन्न-भिन्न तरह की हैं। निजी मुआफी की उन जमीनों के अतिरिक्त, जिनकी अत्यंत बहुतायत है, भूमि-कर से मुक्त ऐसी बड़ी-बड़ी जागीरें भी वहां हैं जो मसजिदों और मंदिरों को दे दी गई हैं।
यह बहाना करके कि मुआफी के झूठे दावे बहुत हैं, भारत की जागीरों की सनदों की जांच करने का काम ब्रिटिश गवर्नर जनरल* ने स्वयं अपने कंधे पर ले लिया है। 1848 में स्थापित नई व्यवस्था के अंतर्गत,सनदों की जांच-पड़ताल करने की उस योजना को यह प्रमाणित करने की दृष्टि से फौरन कलेजे से लगा लिया गया कि सरकार शक्तिशाली है, कार्यकारिणी बहुत जोरदार है और वह योजना स्वयं सार्वजनिक आमदनी का एक अत्यंत लाभदायी स्रोत है। अस्तु, बंगाल प्रेसिडेंसी और उसके आसपास के इलाकों की जागीरों की सनदों की जांच करने के लिए कमीशन बैठा दिए गए। बंबई प्रेसिडेंसी में भी वे नियुक्त कर दिए गए और, जिन प्रांतों की नई-नई व्यवस्था की गई थी उनमें पैमाइश करने की आज्ञा जारी कर दी गई, जिससे कि पैमाइशों के पूरे हो जाने पर इन कमीशनों का काम आवश्यक निपुणता के साथ किया जा सके। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पिछले नौ वर्षों में भारत की जागीरों की माफी-प्राप्त संपत्ति की जांच-पड़ताल का काम इन कमीशनों द्वारा बहुत तेज गति से किया गया है और उससे भारी नतीजे भी निकले हैं।
मि. डिजरायली ने हिसाब लगाकर बताया है कि इन जागीरों को उनके मालिकों से वापिस ले लेने के फलस्वरूप जो आमदनी हुई है, वह बंगाल प्रेसिडेंसी में 5 लाख पौंड प्रति वर्ष, बंबई प्रेसिडेंसी में 3 लाख 70 हजार पौंड प्रति वर्ष, और पंजाब में 2 लाख पौंड प्रति वर्ष से कम नहीं है; इत्यादि। भारतवासियों की संपत्ति को हड़पने के केवल इस तरीके से संतुष्ट न होकर, ब्रिटिश सरकार ने उस देशी अमीरों की पेंशनों को भी बंद कर दिया है जिन्हें संधियों के अंतर्गत देने के लिए वह बाध्य थी :
मि. डिजरायली कहते हैं, 'दूसरों की संपत्ति को जब्त करने का यह एक नया साधन है जिसका अत्यंत व्यापक, आश्चर्यजनक और दिल दहलाने वाले पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है।'
इसके बाद मि. डिजरायली भारतवासियों के धर्म में हस्तक्षेप करने की बात को उठाते हैं। उस पर विचार करने की जरूरत हमें नहीं है। अपनी तमाम स्थापनाओं से वह इस परिणाम
पर पहुंचते हैं कि भारत की वर्तमान अशांति एक फौजी बंगावत नहीं है, बल्कि वह एक राष्ट्रीय विद्रोह हैसिपाही उसके केवल सक्रिय साधन हैं। अपने उपदेशात्मक भाषण का अंत उन्होंने सरकार को यह सलाह देकर किया है कि आक्रमण की अपनी वर्तमान नीति पर चलते जाने के बजाए उसे चाहिए कि वह अपना ध्यान भारत के आर्थिक सुधार के काम की ओर दे।

(14 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5091, में प्रकाशित )












बुधवार, 29 सितंबर 2010

सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कार्ल मार्क्स के नजरिए से देखें- भारतीय विद्रोह की स्थिति

      भारत से आने वाली पिछली डाक के साथ-साथ जो भारी-भरकम रिपोर्ट लंदन पहुंची थी, उससे दिल्ली पर कब्जा किए जाने की अफवाह इतनी तेजी से फैल गई थी और उसने इतनी अधिक मान्यता प्राप्त कर ली थी कि सट्टा बाजार के कारोबार पर भी उसका असर पड़ा था। इस खबरों की हलकी-फुलकी सूचना तारों के जरिए पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। सेवास्तोपोल पर कब्जा करने के झांसे का, छोटे पैमाने पर, यह दूसरा संस्करण था! अगर मद्रास से आने वाले उन अखबारों की, जिनमें अनुकूल खबर आई बताई गई थी, तारीखों और उनके मजमूनों की जरा भी जांच कर ली जाती, तो यह भ्रम दूर हो जाता। कहा जाता है कि मद्रास संबंधी सूचना आगरा से 17 जून को भेजे गए निजी पत्रों के ऊपर आधारित है, लेकिन 17 जून को ही लाहौर से जारी की गई एक आधिकारिक विज्ञप्ति बताती है कि 16 तारीख के तीसरे पहर के चार बजे तक दिल्ली के आसपास सब कुछ शांत था। और 1 जुलाई की तारीख को बंबई टाइम्स लिखता है कि 'कई हमलों को रोक देने के बाद, 17 तारीख की सुबह को जनरल बरनार्ड सहायता के लिए आने वाले और सैनिकों का इंतजार कर रहे थे।' मद्रास से आई सूचना की तारीख के बारे में इतना ही काफी है। जहां तक इस सूचना के मजमून का ताल्लुक है, तो स्पष्ट है कि दिल्ली की कुछ ऊंची जगहों पर बलपूर्वक अधिकार कर लेने के संबंध में 8 जून को जारी की गई जनरल बरनार्ड की विज्ञप्ति और घेरेबंदी में पड़े लोगों द्वारा 12 और 14 जून को किए गए अचानक हमलों के संबंध में प्राप्त कुछ निजी रिपोर्टें ही उसका आधार हैं।
आखिरकार, ईस्ट इंडिया कंपनी की अप्रकाशित योजनाओं के आधार पर दिल्ली और उसकी छावनियों का एक फौजी नक्शा कैप्टन लॉरेंस ने तैयार कर दिया है। इससे हम देख सकते हैं कि दिल्ली की मोर्चेबंदी इतनी कमजोर नहीं है जितनी वह पहले बताई गई थी, और न वह इतनी मजबूत ही है जितनी इस समय जतलाई जा रही है। उसके अंदर एक किला है जिस पर यह तो अचानक धावे के जरिए फांदकर या सीधे रास्तों से अंदर जाकर कब्जा किया जा सकता है। उसकी दीवारें, जो सात मील से भी अधिक लंबी हैं, पक्के ईंट-चूने की बनी हुई हैं; लेकिन उसकी ऊंचाई बहुत नहीं है। खाई संकरी है और बहुत गहरी नहीं है, और बाजू की मोर्चेबंदियां फसील से कायदे से नहीं जुड़ी हुई हैं। बीच-बीच में कोटे (ऊंचे रक्षा-स्तंभ) हैं। वे अर्ध-गोलाकार हैं और बंदूकें रखने के लिए उनमें जगह-जगह छेद बने हुए हैं। फसील के ऊपर से कोटों के अंदर होती हुई, नीचे के उन कमरों तक चक्करदार सीढ़ियां जाती हैं जो खाई के धरातल पर बनी हुई हैं और इनमें पैदल सैनिकों के लिए गोली चलाने के छेद बने हुए हैं। इनमें से की जाने वाली गोली-वर्षा खंदक को पार कर फसील कर चढ़ने वाली टुकड़ी के लिए बहुत परेशानी का कारण बन सकती है। फसील की रक्षा करने वाले बुर्जों के अंदर राइफलमैनों के बैठने के लिए सुरक्षित स्थान भी बने हुए हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को तोपों के जरिए रोका जा सकता है। विप्लव जिस समय शुरू हुआ था, उस समय शहर के अंदर के शस्त्रागार में 9,00,000 कारतूस, घेरा डालने की तोपखाने वाली दो पूरी ट्रेनें, बहुत सी तोपें और 10,000 देशी बंदूकें थीं। बारूदखाने को, वहां के बाशिंदों की इच्छा के अनुसार, दिल्ली से बाहर की छावनियों में पहुंचा दिया गया था। उसमें बारूद के 10,000 से कम पीपे नहीं थे। फौजी महत्व की जिन ऊंचाइयों पर 8 जून को जनरल बरनार्ड ने कब्जा किया था, वे दिल्ली से उत्तर-पश्चिम की दिशा में उसी स्थान पर स्थित हैं जहां दीवारों के बाहर की छावनियां भी कायम की गई थीं।
प्रामाणिक योजनाओं पर आधारित जो ब्योरा प्राप्त हुआ है, उससे यह बात अच्छी तरह समझ में आ जाएगी कि जो ब्रिटिश सेना आज दिल्ली के सामने पड़ी हुई है, यदि वह 26 मई को वहां पर होती तो उसके एक ही जोरदार हमले से विद्रोह का गढ़ धराशाई हो जाताऔर यह सेना उस वक्त वहां पहुंच सकती थी यदि वहां जाने के लिए पर्याप्त साधन उसे मुहैया कर दिए जाते। जून के अंत तक विद्रोह करने वाली रेजीमेंटों की संख्या बंबई टाइम्स में छपी और लंदन के अखबारों में पुनर्मुद्रित सूची और उनके विद्रोह की तारीखों को देखने से स्पष्ट रूप में यह सिध्द हो जाता है कि 26 मई को दिल्ली पर केवल 4 से 5 हजार सैनिकों का कब्जा था। इतनी सेना सात मील लंबी फसील की हिफाजत करने की बात क्षण भर के लिए भी नहीं सोच सकती थी। दिल्ली से मेरठ केवल चालीस मील के फासले पर स्थित है। 1853 के आरंभ से ही, हमेशा उसने बंगाल के तोपखाने के सदर मुकाम की तरह काम किया है, इसलिए वहां फौजी वैज्ञानिक कामों की प्रमुख प्रयोगशाला मौजूद थी और  मोर्चे पर लड़ने और घेरा डालने के पैंतरों का अभ्यास करने के लिए वहां परेड का भी एक मैदान था। इस वजह से इस बात को समझना और भी मुश्किल हो जाता है कि वहां के ब्रिटिश कमांडर के पास उन साधनों की कमी क्योंकर हो गई थी जिनके जरिए एक जोरदार अचानक हमला करके नगर पर वह कब्जा कर लेताउसी तरह का अचानक हमला जिस तरह के हमलों से भारत की अंगरेजी फौजें देशी लोगों के ऊपर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने में हमेशा सफल हो जाती हैं। पहले हमें सूचित किया गया था कि घेरा डालने की तोपखाने वाली ट्रेन का* इंतजार था; फिर कहा गया कि सहायता के लिए और सैनिकों की जरूरत थी; अब दि प्रेस, लंदन के सबसे अधिक जानकार पत्रों में से है, वह हमें बताता है कि हमारी सरकार को इस तथ्य का पता है कि जनरल बरनार्ड के पास सामानों और गोले-बारूद की कमी है, कि उनके पास गोला-बारूद की सप्लाई केवल 24 राउंड फी सैनिक के हिसाब से है।
दिल्ली की ऊंची जगहों पर कब्जा करने के बाद जनरल बरनार्ड ने 8 जून को जो विज्ञप्ति निकाली थी, उससे हम देखते हैं कि शुरू में खुद उसका इरादा दिल्ली पर अगले दिन हमला करने का था। इस योजना पर वह अमल नहीं कर सका और इसके बजाए, किसी न किसी दुर्घटना के कारण, घिरे हुए लोगों के साथ वह केवल सुरक्षात्मक लड़ाई ही लड़ता रहा।
दोनों तरफ कितनी शक्तियां हैं, इसका हिसाब लगाना इस समय बहुत कठिन है। भारतीय अखबारों के वक्तव्य एकदम परस्पर-विरोधी हैं: लेकिन, हमारा खयाल है कि बोनापार्टवादी पेज के एक भारतीय संवाददाता द्वारा भेजी गई खबरों पर कुछ भरोसा किया जा सकता है जो कलकत्ता स्थित फ्रांसीसी कौंसल से प्रसारित मालूम होती हैं। उक्त संवाददाता के बयान के अनुसार 14 जून को जनरल बरनार्ड की सेना में लगभग 5,700 सैनिक थे, जिनकी संख्या उसी महीने की 20 तारीख को अपेक्षित सैनिक कुमुक पहुंचने के कारण दुगुनी हो जाने की आशा थी। उसकी ट्रेन में घेरा डालने की 30 भारी तोपें थीं। इसके विपरीत, विप्लवकारियों की फौज में लगभग 40,000 सैनिक होने का अनुमान था, जिनका संगठन तो काफी बुरा था पर वे आक्रमण और बचाव के सभी साधनों से अच्छी तरह लैस थे।
चलते-चलते हम यहां इस बात का भी उल्लेख कर दें कि अजमेरी गेट के बाहर, शायद गाजी खां के मकबरे में, जो 3,000 विद्रोही सैनिक कैंपों में थे, वे अंगरेजी फौज के आमने-सामने नहीं थे जैसा कि लंदन के कुछ अखबार कल्पना करते हैं; बल्कि इसके विपरीत उन दोनों के बीच दिल्ली की पूरी चौड़ाई जितनी दूरी थी, क्योंकि अजमेरी गेट आधुनिक दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी भाग के एक छोर पर, प्राचीन दिल्ली के खंडहरों के उत्तर में स्थित है। नगर के उस भाग में विद्रोहियों के इसी तरह के कुछ और कैंप कायम किए जाने में कोई चीज बाधक नहीं बन सकती है। नगर के उत्तर-पूरब या नदी की दिशा में नावों का पुल उनके अधिकार में है जिससे अपने देशवासियों के साथ उनका संपर्क निरंतर बना हुआ है और वे बिना किसी रोक-टोक के सैनिकों और सामानों की सप्लाई प्राप्त करते रहते हैं। छोटे पैमाने पर दिल्ली एक किला जैसा प्रतीत होती है जिसका अपने देश के अंदरूनी भाग के साथ संचार का मार्ग (सेवास्तोपोल की भांति ही) खुला हुआ है।
अंगरेजी फौज की कार्रवाइयों में हुई देरी की वजह से न केवल घेरे में बंद लोगों को अपनी रक्षा के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों को जुटाने का अवसर मिल गया है, बल्कि कई हफ्तों तक दिल्ली पर कब्जा किए रहने और बार-बार हमले करके यूरोपियन फौजों को परेशान करते रहने की अनुभूति ने और इसी के साथ-साथ पूरी सेना में हो रहे नए विद्रोहों की रोजाना आने वाली खबरों ने सिपाहियों के मनोबल को निस्संदेह मजबूत कर दिया है। अंगरेज अपनी छोटी फौजों से शहर को घेरने की बात हर्गिज नहीं सोच सकते, वे तो अचानक हल्ला बोल कर ही उस पर कब्जा कर सकते हैं। लेकिन, अगली साधारण डाक से दिल्ली पर अधिकार कर लिए जाने की खबर यदि नहीं आती है, तो इस बात को हम लगभग पक्का मान सकते हैं कि अंगरेजों की तरफ से की जाने वाली तमाम गंभीर कार्रवाइयों को कुछ महीनों के लिए स्थगित कर देना पड़ेगा। वर्षा ऋतु जोरों से शुरू हो जाएगी और 'जमुना की गहरी और तेज धार' नगर के उत्तर-पूर्वी भाग को सुरक्षित बना देगी। दूसरी तरफ, 75 डिग्री से लेकर 102 डिग्री तक की गर्मी पड़ेगी और उसके साथ औसतन नौ इंच तक की बारिश जुड़ी रहेगीइससे यूरोपियनों को असली एशियाई हैजे का शिकार बनना पड़ेगा। तब फिर लार्ड एलेनबरो के ये शब्द सच चरितार्थ हो जाएंगे :
मेरी राय है कि सर एच. बरनार्ड जहां पर हैं, वहीं बने नहीं रह सकतेजलवायु ऐसा नहीं होने देगी। वर्षा जब जोरों से शुरू हो जाएगी, तब मेरठ, अंबाला और पंजाब से उनका संबंध कट जाएगा; भूमि की एक बहुत संकरी पट्टी में वे कैद हो जाएंगे, और, तब खतरे की तो मैं नहीं कहूंगा, लेकिन ऐसी स्थिति में वह जरूर पहुंच जाएंगे जिसका अंत केवल विनाश और विध्वंस में ही हो सकता है। मेरा विश्वास है कि वह समय रहते ही वहां से हट जाएंगे।
तब फिर, जहां तक दिल्ली का संबंध है, हर चीज इस प्रश्न पर निर्भर करती है कि जनरल बरनार्ड के पास इतनी काफी सेना और गोला-बारूद इकट्ठे हो जाते हैं कि नहीं कि जून के अंतिम सप्ताह में वह दिल्ली पर हमला कर सकें। दूसरी तरफ, उनके वहां से पीछे हट जाने से विद्रोह की नैतिक शक्ति अत्यधिक मजबूत हो जाएगी और, इससे संभवत:, बंबई और मद्रास की फौजों के भी खुले तौर से विद्रोह में शामिल होने का फैसला हो जाएगा।
(18 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5094, में प्रकाशित )




शनिवार, 18 सितंबर 2010

ईस्ट इंडिया कंपनी, उसका इतिहास और परिणाम- कार्ल मार्क्स

     लॉर्ड स्टैनली के इस प्रस्ताव पर कि भारत के लिए कानून बनाने की बात को स्थगित कर दिया जाए, शाम तक के लिए बहस टाल दी गई है। 1783 के बाद से पहली बार भारतीय प्रश्न इंगलैंड में मंत्रिमंडल के जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। ऐसा क्यों हुआ?
ईस्ट इंडिया कंपनी की वास्तविक शुरुआत को 1702 के उस वर्ष से पीछे के किसी और युग में नहीं माना जा सकता जिसमें पूर्वी भारत के व्यापार के इजारे का दावा करने वाले विभिन्न संघों ने मिलकर अपनी एक कंपनी बना ली थी। उस समय तक असली ईस्ट इंडिया कंपनी का अस्तित्व तक बार-बार संकट में पड़ जाता था। एक बार, क्रोमवेल के संरक्षण काल में, वर्षों के लिए उसे स्थगित कर दिया गया था; और, एक बार, विलियम तृतीय के शासनकाल में, पार्लियामेंट के हस्तक्षेप के द्वारा उसे बिलकुल ही खतम कर दिए जाने का खतरा पैदा हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को पार्लियामेंट ने उस डच राजकुमार के उत्थान काल में तब स्वीकार किया था जब ह्विग लोग ब्रिटिश साम्राज्य की आमदनियों के अहलकार बन गए थे, बैंक ऑफ इंगलैंड का जन्म हो चुका था, इंगलैंड में संरक्षण की व्यवस्था दृढ़ता से स्थापित हो गई थी और यूरोप में शक्ति का संतुलन निश्चित रूप से निर्धारित हो गया था। ऊपर से दिखने वाली स्वतंत्रता का वह युग वास्तव में इजारेदारियों का युग था। एलिजाबेथ और चार्ल्स प्रथम के कालों की तरह, इन इजारेदारियों की सृष्टि शाही स्वीकृतियों के द्वारा नहीं हुई थी, बल्कि उन्हें पार्लियामेंट ने अधिकार प्रदान किया था और उनका राष्ट्रीकरण किया था। इंगलैंड के इतिहास का यह युग वास्तव में फ्रांस के लुई फिलिप के युग से अत्यधिक मिलता-जुलता हैभूस्वामियों का पुराना अभिजात वर्ग पराजित हो गया है और पूंजीपति वर्ग 'वित्तीय प्रभुत्ता' का झंडा उठाए बिना और किसी तरह से उसका स्थान लेने में असमर्थ है। ईस्ट इंडिया कंपनी आम लोगों को भारत के साथ व्यापार करने से वंचित रखती थी, उसी तरह जिस तरह कि कॉमन्स सभा पार्लियामेंट में प्रतिनिधित्व पाने से उन्हें वंचित रखती थी। इस और दूसरे उदाहरणों से हम देखते हैं कि सामंती अभिजात वर्ग के ऊपर पूंजीपति वर्ग की प्रथम निर्णायक विजय के साथ ही साथ जनता के विरुध्द जबरदस्त आक्रमण भी शुरू हो जाता है। इस चीज की वजह से कोबेट जैसे एक से अधिक जन-प्रेमी लेखक जनता की आजादी के लिए भविष्य की ओर देखने के बजाए वर्तमान की ओर देखने को बाध्य हो गए थे।
वैधानिक राजतंत्र और इजारेदार पैसे वाले वर्ग के बीच, ईस्ट इंडिया की कंपनी और  1688 की 'गौरवशाली' क्रांति के बीच एकता उसी शक्ति ने कायम की थी जिसके कारण तमाम कालों और तमाम देशों में उदारपंथी वर्ग और उदार राजवंश मिले और एकताबध्द हुए हैं। यह शक्ति भ्रष्टाचार की शक्ति है जो वैधानिक राजतंत्र को चलाने वाली प्रथम और
अंतिम शक्ति है। विलियम तृतीय की यही रक्षक देवता थी और यही लुई फिलिप का जानलेवा दैत्य था। पार्लियामेंटरी जांचों से यह बात 1693 में ही सामने आ गई थी कि सत्ताशाली व्यक्तियों को दी जाने वाली 'भेंटों' की मद में होने वाला ईस्ट इंडिया कंपनी का सालाना खर्च, जो क्रांति से पहले शायद ही कभी 1,200 पौंड से अधिक हुआ था, अब 90,000 पौंड प्रति वर्ष तक पहुंच गया था। लीड्स के डयूक पर इस बात के लिए मुकदमा चलाया गया था कि उसने 5,000 पौंड की रिश्वत ली थी, और स्वयं धर्मात्मास्वरूप राजा को 10,000 पौंड लेने का अपराधी घोषित किया गया था। इन सीधी रिश्वतों के अलावा, विरोधी कंपनियों को हराने के लिए सरकार को सूद की नीची से नीची दर पर विशाल रकमों के ऋण देने का लालच दिया जाता था और विरोधी डायरेक्टरों को खरीद लिया जाता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने सरकार को रिश्वत देकर सत्ता हासिल की थी। उसे कायम रखने के लिए वह फिर रिश्वत देने के लिए मजबूर थी। बैंक ऑफ इंगलैंड ने भी इसी प्रकार सत्ता प्राप्त की थी और अपने को बनाए रखने के लिए वह फिर रिश्वत देने के लिए बाध्य थी। हर बार जब कंपनी की इजारेदारी खतम होने लगती थी तब वह सरकार को नए कर्जे और नई भेंटें देकर ही अपनी सनद को फिर से बढ़वा पाती थी।
सात-वर्षीय युध्द ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यावसायिक शक्ति से बदल कर एक सैनिक और प्रदेशीय शक्ति बना दिया था। पूर्व में वर्तमान ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उसी वक्त पड़ी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ कर तब 263 पौंड हो गई और डिवीडेंड (शेयर पर मुनाफे) 12.5 प्रतिशत की दर से दिए जाने लगे। लेकिन तभी कंपनी का एक नया दुश्मन पैदा हो गया। इस बार वह प्रतिद्वंद्वी संघों के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी मंत्रियों और एक प्रतिद्वंद्वी प्रजा के रूप में पैदा हुआ था। कहा जाने लगा कि कंपनी के राज्य को ब्रिटिश जहाजी बेड़ों और ब्रिटिश फौजों की मदद से जीतकर कायम किया गया है और ब्रिटिश प्रजा के किन्हीं भी व्यक्तियों को इस बात का अधिकार नहीं है कि वे ताज (बादशाह) से अलग कोई स्वतंत्र राज्य रख सकें। पिछली जीतों के द्वारा जिन 'आश्चर्यजनक खजानों' को हासिल किया गया था उनमें उस समय के मंत्री और उस समय के लोग भी अपने हिस्से का दावा करने लगे। कंपनी अपने अस्तित्व को 1767 में यह समझौता करके ही बचा सकी कि राष्ट्रीय कोष को प्रति वर्ष वह 4,00,000 पौंड दिया करेगी।
लेकिन, इस समझौते को पूरा करने के बजाए ईस्ट इंडिया कंपनी स्वयं आर्थिक कठिनाइयों में फंस गई और अंगरेजी प्रजा को नजराना देने की जगह, आर्थिक सहायता के लिए पार्लियामेंट को उसने अर्जी दी। इस कदम का फल यह हुआ कि कंपनी की सनद में गंभीर परिवर्तन कर दिए गए। लेकिन नई शर्तों के बावजूद कंपनी के मामलों में सुधार न हुआ, और लगभग इसी समय, अंगरेजी राष्ट्र के उत्तरी अमरीका वाले उपनिवेशों के हाथ से निकल जाने के कारण, अन्य किसी स्थान पर किसी विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य को हासिल करने की आवश्यकता को सब लोगों द्वारा अधिकाधिक महसूस किया जाने लगा।
1783 में नामी मि. फॉक्स ने सोचा कि अपने प्रसिध्द भारतीय बिल को पार्लियामेंट में ले आने का अब उपयुक्त अवसर आ गया है। इस बिल में प्रस्ताव किया गया था कि डायरेक्टरों और मालिकों के कोर्टों (संचालक समितियों) को खतम कर दिया जाए और संपूर्ण भारतीय सरकार की जिम्मेदारी पार्लियामेंट द्वारा नियुक्त किए गए सात कमिश्नरों के हाथों में सौंप दी जाए। लाड्र्स सभा के ऊपर उस समय के दुर्बल राजा* के निजी प्रभाव के कारण मि. फॉक्स का बिल गिर गया; और उसी को आधार बनाकर फॉक्स और लार्ड नौर्थ की तत्कालीन मिली-जुली सरकार को भंग कर दिया गया और प्रसिध्द पिट को सरकार का मुखिया बना दिया गया। पिट ने 1784 में दोनों सदनों से एक बिल पास कराया जिसमें आदेश दिया गया था कि प्रिवी कौंसिल के 6 सदस्यों का एक नियंत्रण बोर्ड स्थापित किया जाए जिसका काम होगा :
ईस्ट इंडिया कंपनी की अमलदारियों और मिल्कियतों के नागरिक और फौजी शासन, अथवा आमदनियों से किसी भी प्रकार से संबंधित उसके तमाम कार्यों, कार्रवाइयों और मामलों पर नजर रखना, उनकी देखभाल करना और उन पर नियंत्रण रखना।
इस विषय में इतिहासकार मिल कहते हैं :
उक्त कानून को पास करते समय दो उद्देश्य सामने रखे गए थे। उस अभियोग से बचने के लिए जिसे मि. फॉक्स के बिल का घृणित लक्ष्य बताया गया था। आवश्यक था कि ऊपर से ऐसा लगे कि सत्ता का मुख्यांश डायरेक्टरों के ही हाथ में है। लेकिन, मंत्रियों के लाभ के लिए आवश्यक था कि वास्तव में सारी सत्ता डायरेक्टरों के हाथ से छीन ली जाए। अपने प्रतिद्वंद्वी के बिल से मिस्टर पिट का बिल अपने को मुख्यतया इसी बात में भिन्न बताता था कि जहां उसमें डायरेक्टरों की सत्ता को खतम कर दिया गया था, इसमें उसे लगभग पूरा का पूरा बनाए रखा गया था। मि. फॉक्स के कानून के अंतर्गत एलानिया तौर से मंत्रियों की सत्ता कायम हो जाती। मि. फिट के कानून के मातहत उसे छिपाकर और छल-कपट से हाथ में ले लिया गया था। फॉक्स का बिल कंपनी की सत्ता को पार्लियामेंट के द्वारा नियुक्त किए गए कमिश्नरों के हाथ में सौंप देता। मि. पिट के बिल ने उसे राजा द्वारा नियुक्त कमिश्नरों के हाथ में सौंप दिया।
इस प्रकार 1783-84 के वर्ष ही प्रथम, और अब तक, एकमात्र, ऐसे वर्ष रहे हैं जिनमें भारत का सवाल मंत्रिमंडल के स्वयं के अस्तित्व का सवाल बन गया है। मि. पिट के बिल के पास हो जाने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की सनद को फिर जारी कर दिया गया और भारतीय सवाल को 20 साल तक के लिए खतम कर दिया गया। लेकिन, 1813 में शुरू हुए
जैकोबिन-विरोधी युध्द और 1833 में नए-नए पेश किए जाने वाले सुधार बिल ने अन्य तमाम राजनीतिक प्रश्नों को गौण बना दिया।
तब फिर, 1784 से पहले और उसके बाद से भारत का सवाल एक बड़ा राजनीतिक सवाल क्यों नहीं बन सका, इसका प्रथम कारण यही है कि उससे पहले आवश्यक था कि ईस्ट इंडिया कंपनी अपने अस्तित्व और महत्व को हासिल करे। इसके हो जाने के बाद कंपनी की उस तमाम सत्ता को, जिसे जिम्मेदारी अपने ऊपर लिए बिना वह अपने हाथों में ले सकता था, शासक गुट ने अपने पास समेट लिया था। और, इसके बाद, सनद के फिर जारी किए जाने के जब अवसर आए, 1813 और 1833 में, तब आम अंगरेज लोग सर्वाधिक हित के दूसरे सवालों में बुरी तरह उलझे हुए थे।
अब हम एक दूसरे पहलू से विचार करेंगे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने काम की शुरुआत केवल इस बात की कोशिश से की थी कि अपने एजेटों के लिए फैक्टरियां और अपने मालों को रखने के लिए जगहों की वह स्थापना करे। इनकी हिफाजत के लिए कंपनी वालों ने कई किले बना लिए। भारत में राज्य कायम करने और जमीन की मालगुजारी को अपनी आमदनी का एक जरिया बनाने की बात की कल्पना ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों ने यद्यपि बहुत पहले, 1689 में ही, की थी; लेकिन 1744 तक, बंबई, मद्रास और कलकत्ता के आसपास केवल कुछ महत्वहीन जिले ही वे हासिल कर पाए थे। इसके बाद कर्नाटक में जो युध्द छिड़ गया था, उसके परिणामस्वरूप, विभिन्न लड़ाइयों के बाद, भारत के उस भाग के भी वे लगभग एकछत्र स्वामी बन गए थे। बंगाल के युध्द और क्लाइव की जीतों से उन्हें और भी अधिक लाभ हुए। बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर उनका वास्तविक कब्जा हो गया। 18वीं शताब्दी के अंत में और वर्तमान शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में टीपू सुलतान के साथ होने वाले युध्द आए। इनके परिणामस्वरूप सत्ता और नायवी की व्यवस्था का बहुत व्यापक विस्तार हुआ। 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक में सीमांत के प्रथम सुविधाजनक प्रदेश को, रेगिस्तान के अंदर भारत के सीमांत को आखिरकार जीत लिया गया। इससे पहले पूर्व में एशिया के उन भागों तक ब्रिटिश साम्राज्य नहीं पहुंचा था जो तमाम कालों में भारत की प्रत्येक महान केंद्रीय सत्ता की राजधानी रहे थे। लेकिन साम्राज्य के सबसे भेद्य स्थल के, उस स्थल के जहां से उसके ऊपर उतनी ही बार हमले हुए थे जितनी बार पुराने विजेताओं को नए विजेताओं ने निकाल बाहर किया था, यानी देश की पश्चिमी सरहद के नाके अंगरेजों के हाथों में नहीं थे। 1838 से 1849 के काल में, सिख और अफगान युध्दों के द्वारा, पंजाब और सिंध पर जबरदस्ती कब्जा करके, ब्रिटिश शासन ने पूर्वी भारत के महाद्वीप की जातीय, राजनीतिक, और सैनिक सरहदों को भी निश्चित रूप से अपने अधीन कर लिया। मध्य एशिया से आने वाली किसी भी ताकत को खदेड़ने के लिए और फारस (ईरान) की सरहदों की ओर बढ़ते हुए रूस को रोकने के लिए ये अधिकार नितांत आवश्यक थे। इस पिछले दशक के दौरान ब्रिटेन के भारतीय प्रदेश में 1, 67,000 वर्ग मील का रकबा, जिसमें
85,72,630 लोग रहते हैं, और जुड़ गया है। जहां तक देश के अंदर की बात है, तो तमाम देशी रियासतें अब ब्रिटिश अमलदारियों से घिर गई हैं; किसी न किसी रूप में वे ब्रिटेन की सत्ता के मातहत हो गई हैं; और, केवल गुजरात और सिंध को छोड़कर वे समुद्र तट से काट दी गई हैं। जहां तक बाहर का सवाल है, भारत अब खतम हो गया है। 1849 के बाद से केवल एक महान एंग्लो-इंडियन साम्राज्य का अस्तित्व ही वहां रह गया है।
इस भांति, कंपनी के नाम के नीचे ब्रिटिश सरकार दो शताब्दियों से तब तक लड़ती आई है जब तक कि आखिरकार भारत की प्राकृतिक सरहदें खतम नहीं हो गईं। अब हम समझ सकते हैं कि इस पूरे काल में इंगलैंड की तमाम पार्टियां खामोशी से नजर नीची किए क्यों बैठी हैंवे भी जिन्होंने संकल्प कर रखा था कि भारतीय साम्राज्य की स्थापना का कार्य पूरा हो जाने के बाद कपटी शांति की बनावटी बातें बनाकर वे खूब हल्ला मचाएंगी। अपनी उदार परोपकारिता दिखलाने के लिए आवश्यक था कि पहले वे उसे किसी तरह हथिया तो लें! इस नजरिए से देखने पर हम समझ सकते हैं कि इस वर्ष, 1853 में, सनद के दोबारा जारी किए जाने के पुराने जमानों की तुलना में, भारतीय सवाल की स्थिति क्यों बदल गई है।
फिर, हम एक और पहलू पर विचार करें। भारत के साथ ब्रिटेन के व्यापारिक संबंधों के विकास की विभिन्न मंजिलों के सिंहावलोकन से उससे संबंधित कानून के अनोखे संकट को हम और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे।
एलिजाबेथ के शासनकाल में, ईस्ट इंडिया कंपनी की कार्रवाइयों के प्रारंभ में, भारत के साथ लाभदायक ढंग से व्यापार चलाने के लिए कंपनी को इस बात की इजाजत दे दी गई थी कि चांदी, सोने और विदेशी मुद्रा के रूप में 30,000 पौंड तक के मूल्य की वस्तुओं का वार्षिक निर्यात वह कर ले। यह चीज उस युग के तमाम पूर्वग्रहों के विरुध्द जाती थी और इसीलिए टॉमस मुन इस बात के लिए मजबूर हो गया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ इंगलैंड के व्यापार का एक विवेचन पेश कर वह 'व्यापारिक व्यवस्था' के आधारों को निर्धारित कर दे। इसमें उसने स्वीकार किया था कि बहुमूल्य धातुएं ही किसी देश की सच्ची संपदा होती हैं; लेकिन, इसके बावजूद, साथ ही साथ उसने कहा था कि बिना किसी नुकसान के उनका निर्यात होने दिया जा सकता है बशर्ते कि बाकी अदायगी निर्यात करने वाले राष्ट्र के अनुकूल हो। इस दृष्टि से, उसका कहना था कि ईस्ट इंडिया से जो माल आयात किए जाते थे, उन्हें मुख्यतया दूसरे देशों को फिर से निर्यात कर दिया जाता था जिससे भारत में उनका मूल्य चुकाने के लिए जितने सोने की जरूरत पड़ती थी उससे कहीं अधिक सोना प्राप्त हो जाता था। इसी भावना के अनुरूप सर जोशिया चाइल्ड ने भी एक पुस्तक लिखी जिसमें सिध्द किया गया है कि ईस्ट इंडिया के साथ किया जाने वाला व्यापार तमाम विदेशी व्यापारों में सबसे अधिक राष्ट्रीय है। धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी के समर्थक अधिक उध्दत होते गए और, भारत के इस विचित्र इतिहास के दौर में एक अचंभे
के रूप में देखा जा सकता है कि इंगलैंड में सबसे पहले मुक्त व्यापार के जो उपदेशक थे, वही अब भारतीय व्यापार के इजारेदार बन गए थे।
सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम और अठारहवीं शताब्दी के अधिकांश भाग में, जिस समय यह कहा जा रहा है कि ईस्ट इंडिया से मंगाए जाने वाले सूती और सिल्क के सामानों के कारण ब्रिटेन के गरीब कारखानेदार तबाह हुए जा रहे हैं, उसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध में पार्लियामेंट से हस्तक्षेप करने की फिर मांग की जा रही थी। और यह मांग की जा रही थी व्यापारी वर्ग की ओर से नहीं, बल्कि स्वयं औद्योगिक वर्ग की ओर से। जॉन पोलैक्सफेन की रचना, इंगलैंड और ईस्ट इंडिया के असंगत विनिर्माण, लंदन, 1697, में यही राय दी गई थी। इस रचना का शीर्षक डेढ़ शताब्दी बाद विचित्र रूप से सही सिध्द हुआ थालेकिन एक बिलकुल ही दूसरे अर्थ में। इसके बाद पार्लियामेंट ने जरूर हस्तक्षेप किया। विलियम तृतीय के शासनकाल में 10वें अध्याय के ग्यारहवें और बारहवें कानूनों द्वारा यह तय कर दिया गया कि हिंदुस्तान, ईरान और चीन की कृत्रिम सिल्कों और छपी या रंगी छीटों के पहनने पर रोक लगा दी जाए और उन तमाम लोगों पर जो इन चीजों को रखते या बेचते हैं, 200 पौंड का जुर्माना किया जाए। बाद में इतने 'ज्ञानी' बनने वाले ब्रिटिश कारखानेदारों के बार-बार रोने-धोने के परिणामस्वरूप इसी तरह के कानून जॉर्ज प्रथम, द्वितीय और तृतीय के शासनकाल में भी बना दिए गए थे और, इस भांति, अठारहवीं शताब्दी के अधिकांश में, भारत का बना माल इंगलैंड में आम तौर से इसलिए मंगाया जाता था कि उसे यूरोप में बेचा जा सके। पर इंगलैंड के बाजार से उसे दूर ही रखा जाता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों में इस पार्लियामेंटरी दखलंदाजी के अलावाजो देश के लालची कारखानेदारों ने करवाईउसकी सनद के दोबारा जारी किए जाने के हर अवसर पर लंदन, लिवरपूल और ब्रिस्टल के व्यापारियों द्वारा यह कोशिश भी की जाती थी कि कंपनी की व्यापारिक इजारेदारी को खतम कर दिया जाए और उस व्यापार में, जिसमें सोना बरसता दिखाई देता था, हिस्सा बंटा लिया जाए। इन कोशिशों के फलस्वरूप, 1773 के उस कानून में, जिसके द्वारा कंपनी की सनद को 1 मार्च 1814 तक के लिए फिर बढ़ा दिया गया था, एक धारा ऐसी भी जोड़ दी गई थी जिसके अंतर्गत ब्रिटेन के गैर-सरकारी लोगों को इंगलैंड से लगभग सभी प्रकार के मालों का निर्यात करने और कंपनी के भारतीय नौकरों को इंगलैंड में उनका निर्यात करने की अनुमति मिल गई थी। लेकिन इस छूट को देने के साथ-साथ, निजी व्यापार करने वाले व्यापारियों द्वारा ब्रिटिश भारत में माल भेजे जाने के संबंध में ऐसी शतर्ें लगा दी गई थीं जिनसे कि इस छूट से होने वाले फायदे एकदम खतम हो जाते थे। 1813 में कंपनी आम व्यापारियों के दबाव का और अधिक सामना कर सकने में असमर्थ हो गई; और चीनी व्यापार की इजारेदारी तो बनी रही, लेकिन भारत के साथ व्यापार करने की छूट कुछ शर्तों के साथ निजी व्यापारियों को मिल गई। 1833 में जब फिर सनद जारी की जाने लगी तो ये अंतिम प्रतिबंध भी आखिरकार खतम कर दिए गए। कंपनी
को किसी भी तरह का व्यापार करने से रोक दिया गया। उसके व्यापारिक रूप का अंत कर दिया गया, और भारतीय प्रदेश से ब्रिटिश प्रजाजनों को दूर रखने के उसके विशेषाधिकार को उससे छीन लिया गया।
इसी बीच ईस्ट इंडिया के साथ होने वाले व्यापार में अत्यंत क्रांतिकारी परिवर्तन हो गए थे जिनसे कि इंगलैंड के विभिन्न वर्गों की स्थिति उसके संबंध में एकदम बदल गई थी। पूरी अठारहवीं शताब्दी के दौर में जो विशाल धनराशि भारत से इंगलैंड लाई गई थी, उसका बहुत ही थोड़ा भाग व्यापार के द्वारा प्राप्त हुआ था, क्योंकि तब व्यापार अपेक्षाकृत महत्वहीन था। उसका अधिकतर उस देश के प्रत्यक्ष शोषण के द्वारा और उन विशाल व्यक्तिगत संपत्तियों के रूप में हासिल हुआ था जिन्हें जोर जबरदस्ती से इकट्ठा करके इंगलैंड भेज दिया गया था। 1813 में व्यापार का मार्ग खुल जाने के बाद बहुत ही थोड़े समय के अंदर भारत के साथ होने वाला व्यवसाय तीन गुने से भी अधिक बढ़ गया। लेकिन बात इतनी ही नहीं थी। व्यापार का पूरा चरित्र ही बदल गया था। 1813 तक भारत मुख्यतया निर्यात करने वाला देश था, पर अब वह आयात करने वाला देश बन गया था। यह परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ था कि 1823 में ही विनिमय की दर, जो आम तौर से 2 शिलिंग 6 पेंस फी रुपया थी, गिर कर 2 शिलिंग फी रुपया हो गई। भारत कोजो अनादि काल से सूती कपड़े के उत्पादन के संबंध में संसार की महान उद्योगशाला बना हुआ थाअब अंगरेजी सूत और सूती कपड़ों से पाट दिया गया। उसके अपने उत्पादन के इंगलैंड में प्रवेश पर रोक लगा दी गई या अगर उसे वहां आने भी दिया गया तो बहुत ही कठिन शर्तों पर। और इसके बाद, स्वयं उसे थोड़ी सी और नाममात्र की चुंगी लगाकर ब्रिटेन के बने माल से पाट दिया गया। इसके फलस्वरूप उस देश में उन सूती कपड़ों का बनना, जो कभी इतने प्रसिध्द थे, खतम हो गया। 1780 में ब्रिटेन के तमाम उत्पादन का मूल्य केवल 3,86,152 पौंड था; उसी साल जो सोना वहां से निर्यात किया गया था उसका मूल्य 15,041 पौंड था और 1780 में जो निर्यात हुआ था उसका कुल मूल्य 1,26,48,616 पौंड था। इस तरह भारत के साथ होने वाला व्यापार ब्रिटेन के कुल विदेशी व्यापार के केवल 132 के बराबर था। 1850 में ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड से भारत को निर्यात किए जाने वाले कुल माल की कीमत 80,24,000 पौंड हो गई थी। इसमें केवल सूती कपड़े की कीमत 52,20,000 पौंड थी। इस तरह भारत को भेजा जाने वाला माल उसके कुल निर्यात के 18 भाग से अधिक हो गया था और उसके सूती कपड़े के विदेशी व्यापार के 14 भाग से अधिक। लेकिन कपड़े का उद्योग अब ब्रिटेन की 18 आबादी को अपना रोजगार मुहैया कर रहा था और संपूर्ण राष्ट्रीय आय का 112 हिस्सा केवल उसी से प्राप्त होता था। प्रत्येक व्यापारिक संकट के बाद, भारत के साथ होने वाला व्यापार ब्रिटेन के सूती कपड़े के उद्योगपतियों के लिए अधिकाधिक महत्व की वस्तु बनता गया और पूरब का भारतीय महाद्वीप उनका सबसे अच्छा बाजार बन गया।
जिस रफ्तार से ग्रेट ब्रिटेन के संपूर्ण सामाजिक ढांचे के लिए सूती कपड़े का निर्माण बुनियादी महत्व की चीज बन गया था, उसी रफ्तार से ब्रिटेन के सूती कपड़े के उद्योग के लिए पूर्वी दुनिया में भारत भी बुनियादी महत्व का केंद्र बन गया।
उस समय तक उन थैलीशाहों के स्वार्थ, जिन्होंने भारत को उस शासक गुट की जागीर बना लिया था जिसने अपनी फौजों के द्वारा उसको फतह किया था, उन मिल-मालिकों के स्वार्थों के साथ-साथ चलते आए थे जिन्होंने उसे अपने कपड़ों से पाट दिया था। लेकिन औद्योगिक स्वार्थ भारत के बाजार के ऊपर जितने ही अधिक निर्भर होते गए, वे उतने ही अधिक इस बात की आवश्यकता अनुभव करते गए कि भारत के राष्ट्रीय उद्योग को तबाह कर चुकने के बाद अब उन्हें भारत में नई उत्पादक शक्तियों की सृष्टि करनी चाहिए। किसी देश को अपने माल से आप बराबर पाटते नहीं जा सकते जब तक कि उसे भी आप बदले में कोई उपज देने योग्य न बना दें। औद्योगिक मालिकों को लगा कि उनका व्यापार बढ़ने की जगह घट गया था। 1846 से पहले के चार वर्षों में ग्रेट ब्रिटेन से जो माल भारत भेजा गया था, उसका मूल्य 26 करोड़ 10 लाख रुपया था; 1850 से पहले के चार वर्षों में केवल 25 करोड़ 30 लाख रुपयों का माल वहां भेजा गया था; और भारत से ब्रिटेन में जो माल आया था उसका मूल्य पहले वाले काल में 27 करोड़ 40 लाख रुपए के बराबर और बाद के काल में 25 करोड़ 40 लाख रुपए के बराबर था। उन्होंने देखा कि भारत में उनके माल की खपत की ताकत निम्नतम स्तर पर पहुंच गई थी। ब्रिटिश वेस्ट इंडीज में उनके मालों की खपत का मूल्य जनसंख्या के प्रति व्यक्ति पर प्रति वर्ष लगभग 14 शिलिंग था। चिली में 9 शिलिंग 3 पेंस, ब्राजील में 6 शिलिंग 5 पेंस, क्यूबा में 6 शिलिंग 2 पेंस, पेरू में 5 शिलिंग 7 पेंस, मध्य अमरीका में 10 पेंस और भारत में उसका मूल्य मुश्किल से लगभग 9 पेंस था। उसके बाद अमरीका में कपास की फसल का अकाल आया जिससे 1850 में उन्हें 1 करोड़ 10 लाख पौंड का नुकसान हुआ। ईस्ट इंडीज से कच्ची कपास मंगाकर अपनी जरूरत को पूरा करने के बजाए अमरीका पर निर्भर रहने की अपनी नीति से वे ऊब उठे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी देखा कि भारत में पूंजी लगाने की उनकी कोशिशों के मार्ग में भारतीय अधिकारी रुकावटें पैदा करते थे और छल-कपट से काम लेते थे। इस भांति, भारत एक रक्षण-क्षेत्र बन गया जिसमें एक तरफ औद्योगिक स्वार्थ थे और दूसरी तरफ थैलीशाह और शासक गुट के लोग। उद्योगपति, जिन्हें इंगलैंड में अपनी बढ़ती हुई शक्ति का पूरा एहसास है, अब मांग कर रहे हैं कि भारत की इन विरोधी ताकतों का एकदम खातमा कर दिया जाए, भारतीय सरकार प्राचीन अपने अधिकारी तंत्र के ताने-बाने को पूर्णतया नष्ट कर दे और ईस्ट इंडिया कंपनी की अंतिम क्रिया कर दी जाए।
और अब हम उस चौथे और अंतिम पहलू को लें जिससे भारतीय सवाल को देखा जाना चाहिए। 1784 से भारत की वित्तीय व्यवस्था कठिनाई के दलदल में अधिकाधिक गहरे फंसती गई है। अब वहां 5 करोड़ पौंड का राष्ट्रीय कर्जा हो गया है, आमदनी के साधन

लगातार घटते जा रहे हैं, और खर्चा उसी गति से बढ़ता जा रहा है। अफीम कर की अनिश्चित आय के द्वारा इस खर्च को संदिग्ध रूप से पूरा करने की कोशिश की जा रही है। पर अब यह अफीम कर की आमदनी भी खतरे में है, क्योंकि चीनियों ने स्वयं पोस्त (अफीम) की खेती शुरू कर दी है। दूसरी तरफ निरर्थक बर्मी युध्द में जो खर्च होगा, उससे यह संकट और भी गहरा हो जाएगा।
मि. डिकिंसन कहते हैं : परिस्थिति यह है कि जिस तरह भारत में अपने साम्राज्य को खो देने पर इंगलैंड तबाह हो जाएगा, उसी तरह उसे अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए वह स्वयं हमारी वित्तीय व्यवस्था को तबाही की ओर लिए जा रहा है।
इस तरह मैंने दिखला दिया है कि 1783 के बाद पहली बार भारत का सवाल किस तरह इंगलैंड का और मंत्रिमंडल का सवाल बन गया है।
कार्ल मार्क्स द्वारा 24 जून 1853    
को लिखा गया।      
11 जुलाई 1853 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 3816, में प्रकाशित हुआ।



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