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शनिवार, 7 नवंबर 2009

प्रभाषजोशी का आधुनि‍क मंत्र :प्रेस का काम है छापना

              
        प्रेस में आजकल इनदि‍नों जि‍स तरह का माहौल है उसे तोड़ने और समझने में प्रभाषजी का नजरि‍या हमारे लि‍ए रोशनी प्रदान कर सकता है। आम तौर पर अखबार के संपादक और उपसंपादक अपने नजरि‍ए के अनुकूल सामग्री छापने की फि‍राक में रहते हैं। अपने वि‍चारों से सहमत लेखक तलाशते रहते हैं। इससे पत्रकारि‍ता में गरीबी बढ़ी है। दूसरी ओर अधि‍कांश संपादकों के लि‍ए पत्रकारि‍ता धन कमाने,वि‍ज्ञापन कमाने और राजनीति‍क लाभ कमाने का जरि‍या हो गयी है। प्रभाष जोशी का मानना था '' पत्रकारि‍ता लोगों को जानकारी देने,मन बनाने में मदद करने,सार्वजनि‍क मामलों में जनता की तरफ से नि‍गरानी करने,शासकों को लोगों के प्रति‍ उत्‍तरदायी बनाने,राज्‍य के तीनों स्‍तम्‍भों पर नजर रखने और 'पार्टीवि‍हीन तटस्‍थ भूमि‍का नि‍भाने के लि‍ए है।'
     इन दि‍नों जि‍स तरह की तथाकथि‍त खोजी पत्रकारि‍ता को हम स्‍टिंग ऑपरेशन के नाम से देख रहे हैं, उसकी तीखी आलोचना करते हुए प्रभाष जी ने लि‍खा '' भारत में प्रेस और टीवी तहलका कि‍स्‍म की खोजी पत्रकारि‍ता करे तो पत्रकारि‍ता बचेगी नहीं। तब अपना लोकतन्‍त्र भी शस्‍त्रों का बाजार हो जाएगा और उसमें कमीशनखोर और दलाल राज चलाएँगे । यह न पत्रकारि‍ता को मंजूर होगा ,न लोकतन्‍त्र को। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि‍ पत्रकारि‍ता हथि‍यार बनाने -बेचने वालों के धन्‍धे की तरह नहीं हो सकती, न वह जासूसी एजेंसि‍यों की तरह चल सकती है। पत्रकारि‍ता एक खुला और जबावदेही वाला अनुष्‍ठान है- वह उस तरह खोजबीन नहीं करता जि‍स तरह राज्‍य या जासूसी या धन्‍धेबाज एजेन्‍सि‍यॉं करती हैं। सच उगलवाने और सबूत जुटाने के लि‍ए आखि‍र पुलि‍सवाले थर्ड डि‍ग्री तरीकों का इस्‍तेमाल करते हैं। वे भी दावा यही करते हैं कि‍ लोकहि‍त और न्‍याय के लि‍ए कर रहे हैं, लेकि‍न क्‍या कि‍सी अखबार, टीवी चैनल या पोर्टेल की टीम पुलि‍स की तरह काम कर सकती है ?''
    प्रभाषजी का मानना है नागरि‍क की मर्यादाऍं और मीडि‍या की मर्यादाऍं अलग -अलग नहीं हैं बल्‍कि‍ एक हैं। वे मीडि‍या को कि‍सी भी कि‍स्‍म के वि‍शेषाधि‍कार दि‍ए जाने के खि‍लाफ हैं। उन्‍होंने लि‍खा '' जो मीडि‍या अपने सारे अधि‍कार एक साधारण नागरि‍क के बुनि‍यादी अधि‍कार से प्राप्‍त करता है वह कि‍सी वि‍शेषाधि‍कार की आड़ नहीं ले सकता। इसलि‍ए भारत में मीडि‍या को वही मर्यादाऍं  और वही सदाचार अपनाने होंगे जो कि‍ एक आम नागरि‍क के हैं और समाज को मान्‍य हैं।'' उन्‍होंने यह भी लि‍खा '' पत्रकारि‍ता अगर सच्‍चाई का अनुष्‍ठान है तो उसे झूठ और धोखाधड़ी से साधा नहीं जा सकता। '' आगे लि‍खा '' भंडाफोड़ करना ही पत्रकारि‍ता का अगर एकमात्र उद्देश्‍य है तो उससे भी सदाचार तभी कायम होगा जब भंडाफोड़ सदाचार से कि‍या गया हो। '' उनका मानना था '' जो सदाचार नहीं है उसे पत्रकारि‍ता अपना नहीं सकती क्‍योंकि‍ पत्रकारि‍ता सदाचार के बि‍ना हो नहीं सकती।'' 
     प्रभाषजी का मानना था '' अखबार के लि‍ए लि‍खने और कि‍ताब के लि‍ए लि‍खने में अपन फ़र्क करते हैं। अखबार में दबाब बाहरी होता है और लि‍खना सम्‍पादन का अनि‍वार्य लेकि‍न एक अंश है। अखबार के लि‍खे की कि‍ताब छपती है है दुनि‍या -भर में और सबकी। अपनी भी छपी है,और भी छपेगी लेकि‍न कि‍ताब के लि‍ए लि‍खना उसी के लि‍ए लि‍खना है। ''
        प्रभाषजी की पत्रकारि‍ता की मूल चि‍न्‍ता लोक को लेकर थी। लोक ही उनके कर्म का नि‍र्धारक तत्‍व था। प्रेस के सम्‍पादकीय कार्यभारों का वि‍वेचन करते हुए प्रभाषजी ने लि‍खा '' 39 साल हो गए पत्रकारि‍ता करते लेकि‍न मेरा झुकाव अब भी छाप देने की तरफ है बजाय न छापने के। जि‍ससे आप असहमत हों और जो आपके खि‍लाफ हो उसे तो और भी तत्‍परता के साथ छापना चाहि‍ए क्‍योंकि‍ ऐसा करके आप लोकतन्‍त्र की पहली शर्त तो पूरी करते ही हैं,पाठकों से सबसे बहुमूल्‍य प्रमाणपत्र भी पाते हैं वि‍श्‍वसनीयता का। पर वि‍श्‍वसनीयता तो फि‍र भी आपके और पाठकों के बीच सम्‍बन्‍धों की एक बात है। मैं तो खुद ही अपनी नजरों में गि‍र जाऊँगा और अपने को डरपोक और छोटा मानूँगा अगर कोई चीज न छापूँ क्‍योंकि‍ मैं उससे सहमत नहीं हूँ। कोई बात अगर सरासर झूठ और सामान्‍य शि‍ष्‍टाचार के वि‍रूद्ध न हो तो सम्‍पादकों और अखबारों को छापने के लि‍ए ज्‍यादा तैयार रहना चाहि‍ए। हमारा धर्म और काम छापना है न छापना नहीं। '' प्रभाषजी मानते थे  '' न छापकर रोने से अच्‍छा है कि‍ छापकर रोया जाए।''
            आम तौर पर हि‍न्‍दी के सम्‍पादक कम से कम पढते हैं,कम से कम लि‍खते हैं। अखबार जब तैयार होता है तो अपने दफ्तर में नहीं कि‍सी और जगह होते हैं। प्रभाषजी इस तरह की संपादकीय मानसि‍कता के खि‍लाफ थे। लि‍खा '' अपन मानते हैं कि‍ शाम /  रात को, जब अखबार बन रहा होता है तब सम्‍पादक को दफ्तर के कमरे में होना चाहि‍ए। अखबार भले ही सहयोगी नि‍काल रहे हों। और सबेरे सम्‍पादक को अपना और दूसरे सभी अखबार पढ़ने चाहि‍ए। ऐसा आप करें तो कम से कम आठ घंटे सुबह  -शाम के गए। फि‍र दि‍न में अखबार का सीधा काम भी करना चाहि‍ए। बड़े और महान सम्‍पादक भले ही रि‍मोट से अखबार चलाते हों अपन गरीबदास के भाग में तो रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना ही बदा है। ''       
















'ई' लेखकों के नाम प्रभाष जोशी का आखि‍री पैगाम

                                                
      
     प्रभाषजी आज हमारे बीच में नहीं है। लेकि‍न वे कुछ मूल्‍य छोड गए हैं। आदमी मरता है तो बहुत कुछ त्‍यागकर ही उसे संसार से प्रयाण करना होता है। प्रभाषजी भी जब हमें छोड़कर गए तो लेखकों और पत्रकारों के लि‍ए कुछ मूल्‍य छोड़ गए हैं। 'ई' लेखकों को प्रभाषजी की कुछ बातें जरूर सीखनी चाहि‍ए। उनका मानना था ‍ '' अंदर जो भी घुमड़ रहा हो,घुमड़े ,मैं अपने को भावनाओं के हवाले नहीं करूँगा।'' इस नि‍यम का उन्‍होंने जिंदगीभर पालन कि‍या।
     प्रभाष जोशी के आकस्‍मि‍क नि‍धन से 'ई' लेखकों ने जि‍तनी तेज गति‍ से श्रद्धांजलि‍यां दी  हैं,वैसी लेखकीय प्रति‍क्रि‍या कि‍सी संपादक के मरने पर नहीं देखी गयी। यह प्रेस के संपादक का 'ई' लेखकों पर असर का संकेत है। लेखक और पत्रकार के नाते प्रभाषजी बहुत कुछ ऐसा लि‍ख गए हैं जो 'ई' लेखकों के भी काम का है।
     जो 'ई' लेखन में आ गए हैं, 'ई' पत्रकारि‍ता कर रहे हैं। उनके लि‍ए प्रभाषजी बड़ी चुनौती छोड़ गए हैं। 'ई' लेखन में अभी चार चीजों की कमी नजर आती है,पहला है सुंदर गद्य का अभाव। दूसरा ,लेखकीय ईमानदारी का अभाव। तीसरा ,लेखन के प्रति‍ पेशेवराना दायि‍त्‍व और परि‍श्रम का अभाव और चौथा है आलोचना और जि‍म्‍मेदारी के बीच संतुलन का अभाव।
        'ई' लेखक का मानकर चलता है कि‍ वह जो लि‍ख रहा है,सही लि‍ख रहा है और उसे लेखनकला के बारे में ,गद्य को और सुंदर बनाने के बारे में अब कि‍सी से सीखने की जरूरत नहीं है। संपादनकला के बारे में उसे कि‍सी से सीखने की जरूरत नहीं है। 'ई' लेखकों को परि‍श्रम करके इंटरनेट पर रीयल टाइम में सुंदर गद्य लि‍खने की कला वि‍कसि‍त करनी होगी। प्रभाषजी इस मामले में आदर्श थे, वे सुंदर गद्य लि‍खते थे, सुंदर गद्य बोलते भी थे। पत्रकारि‍ता में उनके आदर्श थे एस. मुलगांवकर। मुलगांवकर अंग्रेजी प्रेस के आजाद भारत के श्रेष्‍ठतम पत्रकार-संपादक थे। अखबार के मालि‍कों (घनशयम दास बि‍डला से लेकर रामनाथ गोयनका तक ) से लेकर प्रधानमंत्री नेहरू तक सभी उनके पत्रकारीय कौशल और ईमानदारी के कायल थे , उनका सम्‍मान करते थे। उनके व्‍यक्‍ति‍त्‍व का प्रभाष जी पर भी गहरा असर था।
    प्रभाषजी ने मुलगांवकर के बारे में जो बातें कही हैं,उन बातों पर प्रभाषजी ने भी अमल कि‍या था। प्रभाषजी ने उनके बारे में लि‍खा '' संपादकी को कभी नि‍जी या बाहरी तत्‍वों से प्रभावि‍त नहीं होने दि‍या। अपने लि‍ए संपादकी का कोई लाभ नहीं मि‍ला न कि‍सी को लेने दि‍या। संपादकी का इस्‍तेमाल संबंध बढ़ाने ,सत्‍ता में भागीदारी करने,राजनीति‍ करने और घरबार भरने में नहीं कि‍या। अपने संपादकी पव्‍वे और प्रभामंडल का इस्‍तेमाल कि‍सी और क्षेत्र या प्रयोजन में नहीं कि‍या।'' (जनसत्‍ता ,23-03-1993)  मुलगांवकर '' लल्‍लो-चप्‍पो की बजाय धरती की सख्‍त और कटु वास्‍तवि‍कता को पसंद करने वाले आदमी थे।''  
'टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या ' के सफलतम संपादक थे गि‍रि‍लाल जैन। उनकी संपादनकला का मूल्‍यांकन करते हुए जो बातें प्रभाषजी ने लि‍खी हैं वे 'ई' संपादकों से लेकर 'प्रिट' संपादकों तक सबके काम की हैं। प्रभाषजी का मानना था '' अखबार के संपादक को सभी तरह के वि‍चारों और दृष्‍टि‍कोणों को पाठकों के सामने रखना होता है और यह अपनी एक अलग सख्‍त लाइन ले कर अलख नहीं जगा सकता । जगाना नहीं चाहि‍ए। ... पत्रकार को तटस्‍थ आलोचक-समीक्षक होना चाहि‍ए।''
    हम आम तौर पर वि‍चारों में 'समानता' और 'सातत्‍य' खोजते रहते हैं। हि‍न्‍दी के लेखकों में यह बीमारी बहुत है। प्रभाषजी ने लि‍खा '' अंग्रेजी में कहावत है कि‍ आजीवन और नि‍रंतर वैचारि‍क समानता और सातत्‍य सि‍र्फ गधों में होता है और बुद्धि‍मान अक्‍सर सहमत नहीं होते और सि‍र्फ गधे ही हमेशा सहमत होते हैं। गांधीजी से कि‍सी ने पूछा था कि‍ आप कई बार अपने वि‍चार बदल लेते हैं। हम कि‍स पर जाएं और कि‍से आपकी पक्‍की राय मानें। गांधीजी ने कहा था कि‍ आप उसी को मेरी राय मानें जो मैंने बाद में कही है। वि‍चारों में परि‍वर्तन होता हो और वह ठीक नहीं हो तो वि‍चार करने का और लि‍खने पढ़ने का अर्थ और प्रयोजन ही क्‍या रह जाएगा ? अगर आपके वि‍चार बदलें नहीं तो इसका एक ही मतलब है कि‍ आपने  ज्‍यादा वि‍चार कि‍या ही नहीं है। और अगर आप दूसरों के वि‍चार बदल नहीं सकें तो इसका भी यही मतलब है कि‍ आपके वि‍चारों और उन्‍हें लि‍खने -समझाने में दम नहीं है। वि‍चार से ही वि‍चार बदले और बनाए जाते हैं। वि‍चार परि‍वर्तन ही सही  और सच्‍चा और स्‍थायी परि‍वर्तन है।''
    प्रभाषजी ने जो बात प्रेस के बारे में कही थी वह 'ई' लेखन के लि‍ए भी सच है,लि‍खा था, '' अखबार कोई एक गोले की तोप नहीं है और न पत्रकारि‍ता एक राउंड गोली की बंदूक । अगर आप में दम नहीं है तो आपका भंड़ाफोड़ देखते- देखते हो जाएगा। दम प्राप्‍त परि‍स्‍थि‍ति‍ में कि‍सी मान्‍यता पर खडे होकर टि‍के रहने में है। जि‍समें दम नहीं होता वह बि‍खरता है और  जि‍समें होता है वह समय,कसौटि‍यों और अग्‍नि‍ परीक्षाओं में से नि‍खरता जाता है।'' (जनसत्‍ता, 26-12-1993)




 

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

प्रभाष जोशी नहीं रहे : हि‍न्‍दी के प्रतीक पुरूष का अवसान

     हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता के शि‍खर पुरूष प्रभाष जोशी नहीं रहे। कल रात उन्‍हें भारत-आस्‍ट्रेलि‍या मैच देखते हुए हृदय का दौरा पड़ा और उसके बाद उनकी मौत हो गयी। उनकी उम्र 73 साल थी। पांच दशक से भी ज्‍यादा समय से वे हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता में सक्रि‍य थे। प्रभाष जी के जाने से हि‍न्‍दी ने अपना सबसे बड़ा जुनूनी हि‍मायती खो दि‍या है। उनकी मौत के बाद पत्रकारि‍ता में जो शून्‍य पैदा हुआ है उसकी सहज ही भरपाई नहीं हो पाएगी। प्रभाष जी जैसा मेधावी और ईमानदार पत्रकार दसि‍यों सालों में तैयार होता है। प्रभाषजी की मेधा,कलम और ईमानदारी का सभी लोहा मानते थे। कारपोरेट पत्रकारि‍ता में पचास सालों तक काम करने के बाद नि‍ष्‍कलंक पत्रकार का जीवन बि‍ताना और अपनी कलम और ईमानदारी से सबको प्रभावि‍त करना यह सचमुच में वि‍रल बात है। प्रभाषजी के दो प्रधान वि‍षय थे जहां पर उनकी कलम सभी तटबंध तोडती हुई चली जाती थी। एक था क्रि‍केट और दूसरा था राजनीति‍क अनीति‍।
    वे कि‍सी भी क्रि‍केट मैच को देखना नही भूलते थे। वे मैच देखने वि‍देश तक गए और वहां से क्रि‍केट पर लि‍खकर भेजा। राजनीति‍ में अनीति‍ का खेल खेलने वाले कि‍सी भी दल को  उप्‍होंने बख्‍शा नहीं। उन्‍हें राजनीति‍ में जो भी अनीति‍परक लगा उसके खि‍लाफ जमकर बेबाक लि‍खा। हि‍न्‍दी में राजनीति‍ के अनीति‍गत पक्ष पर बेबाक लि‍खने वाले अकेले सबसे तेज पत्रकार थे। उनकी कलम की मार से देश के सभी प्रधानमंत्री कभी न कभी घायल हुए हैं। सभी राजनीति‍क दलों के खि‍लाफ उन्‍होंने अनीति‍ के मामलों पर नि‍र्मम ढ़ंग से लि‍खा है।
   हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता की नयी भाषा तैयार करने में उनके संपादकीय व्‍यक्‍ति‍त्‍व की केन्‍द्रीय भूमि‍का रही है। उनकी छत्रछाया में प्रति‍भाशाली पत्रकारों की एक बडी पीढी तैयार हुई,जो आज फलफूल रही है। पत्रकारि‍ता में ईमानदारी की वे जीती जागती मि‍साल थे।
प्रभाष जोशी का जाना साधारण घटना नहीं है यह असाधारण घटना है। उनके जाने से हि‍न्‍दी प्रेस में भाषा के देशज प्रयोगों का अवसान हो गया है। प्रेस में देशज भाषायी प्रयोगों के वे जनक थे। हि‍न्‍दी में पत्रकारों की कमी नहीं है, संपादकों की भी कमी नहीं है। लेकि‍न हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता के प्रतीक पुरूष के रूप में प्रभाष जी ने ही अपनी इमेज स्‍थापि‍त की थी। उनके जाने से हि‍न्‍दी प्रेस के प्रतीकपुरूष का स्‍थान खाली हुआ हो गया है जि‍से भरना अब कि‍सी भी संपादक या पत्रकार के बूते के बाहर है।  हम सब उनकी असामयि‍क मृत्‍यु से मर्माहत हैं।                  



सोमवार, 7 सितंबर 2009

मीडि‍या मुगलों के खि‍लाफ चुप क्‍यों हैं प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी बडे पत्रकार हैं।मीडि‍या एथि‍क्‍स के आदर्श पुरूष हैं। हमें अभी तक यह बात समझ में नहीं आयी है कि‍ वे मीडि‍या मुगलों के बारे में चुप क्‍यों हैं ? भारत में मीडि‍या मुगल सरेआम कानून की धज्‍जि‍यां उडा रहे हैं। सभी नि‍यमों को ताक पर रख रहे हैं। मीडि‍या का उनके हाथों केन्‍द्रीकरण हो रहा है। जि‍सके पास अखबार है, वही अब टीवी,रेडि‍यो,केबल चैनलों का भी मालि‍क है,जि‍नके पास चैनल हैं वे अब प्रेस के धंधे में भी आ गए हैं। क्‍या मीडि‍या का बढता केन्‍द्रीकरण प्रभाष जोशी को दि‍खता नहीं है ? क्‍या हम यह जान सकते हैं कि‍ खबरों के काले धंधे से बचाने वाला इतना बड़ा पत्रकार मीडि‍या के केन्‍द्रीकरण के सवाल पर चुप क्‍यों है ? क्‍या यह सवाल जाति‍वाद,सतीप्रथा,शीला दीक्षि‍त आदि‍ से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण नहीं है ? क्‍या इस सवाल पर मीडि‍या संगठनों की चुप्‍पी उन्‍हें परेशान नहीं करती ? मीडि‍या की स्‍वतंत्रता के नाम पर मीडि‍या का केन्‍द्रीकरण बढ़ा है। लोकतंत्र और अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की आजादी के लि‍ए यह अशुभ संकेत हैं।
देश अब तक के सबसे गंभीर संकट में है, आर्थि‍क मंदी सामान्‍य चीज नहीं है, लेकि‍न मीडि‍या की सतही रि‍पोर्टिंग क्‍या लि‍खने के लि‍ए बेचैन नहीं करती ? क्‍या अनुयायी लि‍ख रहे हैं ? आखि‍रकार प्रभाष जोशी को इतनी बडी समस्‍याओं को देखकर भी गुस्‍सा क्‍यों नहीं आता। हमेशा मरे हुए मसलों को ही क्‍यों उठाते हैं। क्‍या कभी पाकि‍स्‍तान के परे जाकर अफगानि‍स्‍तान,इराक और फि‍लि‍स्‍तीन की भी याद आती है ? इस तरह वि‍श्‍व हि‍त के सवालों पर कलम पर चुप क्‍यों रहती है ? क्‍या इन देशों की तबाही बेचैन नहीं करती,क्‍या हुआ है आपकी भारतीयचेतना को। क्‍या पुराने पत्रकार ऐसे ही थे ? इराक और फि‍लि‍स्‍तीन के जनसंहार आपको कभी भी वि‍चलि‍त क्‍यों नहीं करते ? बेहतर कारण तो आप ही बता पाएंगे,लेकि‍न हम इतना जानते हैं यह मीडि‍या मुगलों के सामने आत्‍मसमर्पण है। मीडि‍या मुगल नहीं चाहते कि‍ अमरीकी साम्राज्‍यवाद और उसके सहयोगी देशों ने जो तबाही मचायी हुई है उसके खि‍लाफ कोई बोले। आश्‍चर्य की बात है आपको जि‍न्‍ना,मुशर्रफ,जरदारी आदि‍ पर बोलना अच्‍छा लगता है लेकि‍न पास ही में अफगानि‍स्‍तान,इराक और फि‍लि‍स्‍तीन में चल रहे जनसंहारों और गुलामी के तंत्र के खि‍लाफ बोलने की कभी भी इच्‍छा नहीं होती, आपकी आत्‍मा सोई हुई क्‍यों है ? प्रभाष जोशी जि‍स अखबार को आपने पाल पोसकर बडा कि‍या है उसके पन्‍ने भी इन तीन देशों के जनसंहार के बारे में चुप रहते हैं। आपकी आंखों के सामने युद्धापराध हो रहे हैं लेकि‍न आप चुप हैं। आप अपनी 'मैं सही ' की धुन पर कायम हैं। आप लोकतंत्र के भीतर बैठकर तीर चला रहे हैं,लोकतंत्र के बाहर जाकर ही लोकतंत्र की रक्षा संभव है। क्‍या भारत के मीडि‍या मुगलों के द्वारा जि‍स तरह का खबरों के साथ जघन्‍य व्‍यवहार कि‍या जा रहा है उसे देखकर क्‍या इनके खि‍लाफ बोलने की इच्‍छा नहीं करती यदि‍ करती है तो बोलते क्‍यों नहीं ? यह क्‍या बनि‍या-ब्राह्मण लगा रखा है प्रेस में। सीधे सही नाम और सही परि‍भाषाओं में सटीक ढंग से क्‍यों नहीं लि‍खते ?
बीसवीं शताब्‍दी की तीन बडी परि‍घटनाएं हैं लोकतंत्र का वि‍कास, कारपोरेट शक्‍ति‍ का वि‍कास और कारपोरेट प्रौपेगैंडा का वि‍कास। इन तीनों ही क्षेत्रों में अभूतवूर्व वि‍कास हुआ है। कारपोरेट प्रौपेगैण्‍डा का लक्ष्‍य है लोकतंत्र के बरक्‍स कारपोरेट हि‍तों की रक्षा करना। आपकी परंपरा आत्‍म सेंसरशि‍प की परंपरा है। इसके जरि‍ए पावरगेम में शामि‍ल लोगों के हि‍तों की कौशलपूर्ण ढंग से सेवा की जाती है। आप जैसे पत्रकार 'लोकतंत्र के प्रौपेगैण्‍डा प्रबंधक' हैं। इन प्रबंधकों का बुनि‍यादी काम ही यही है प्रेस और मीडि‍या को लक्ष्‍मणरेखा में रखना,कारपोरेट हि‍तों के खि‍लाफ न जाने देना।
प्रभाष जोशी चूंकि‍ प्रौपेगैण्‍डा मॉडल को केन्‍द्र में रखकर लि‍खते हैं फलत: उन्‍हें परंपरागत अभि‍जन परंपरा से खूब समर्थन मि‍लता है। कारपोरेट मीडि‍या उन्‍हें बेहद पसंद करता है। साधारण जनता को वे यह आभास देते रहते हैं कि‍ वे सत्‍ता के साथ नहीं हैं। सत्‍ता के गुलाम नहीं हैं। इस चाल को नंगे रूप में तब देखा जा सकता है जब प्रभाष जोशी चुनावों में लि‍खते हैं। देखें प्रभाष जोशी ने हाल ही में सम्‍पन्‍न चुनावों में कि‍सके पक्ष में लि‍खा है ? कि‍नके लि‍ए प्रचार कि‍या ? मजेदार बात यह है कि‍ जो पत्रकार अभि‍जन के पक्ष में खडा रहता है वह अपने को जनपक्षधर कहता है ? प्रभाष जोशी अपने लेखन के जरि‍ए जो राय,एटीटयूट,पूर्वाग्रह पहले से मौजूद हैं उनको ही पेश करते हैं। अंत में,प्रभाष जोशी कि‍न लोगों में जनप्रि‍य हैं ? बुद्धि‍जीवी और शि‍क्षि‍तों में जनप्रि‍य हैं। यही वह तबका है जो कारपोरेट मीडि‍या प्रौपेगैण्‍डा के सामने सबसे ज्‍यादा असुरक्षि‍त है। यह वह तबका है जो सभी कि‍स्‍म की सूचनाएं हजम कर जाता है।उन्‍हें मजबूर कि‍या जाता है कि‍ राय दें,फलत: वे अन्‍य की राय अथवा प्रौपेगैण्‍डा की चपेट में होते हैं। यह ऐसा तबका है जि‍सकी अपनी स्‍वतंत्र राय नहीं होती,वह कारपोरेट प्रौपेगैण्‍डा से ही अपनी राय बनाता है। इनके ही प्रभाष जोशी देवता भी हैं। हमारे तो 'बडे भाई' हैं।

( देशकाल डाट कॉम पर भी 7सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त)

'सामाजि‍क धर्म' मीडि‍या का महापाप है प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी का अति‍रंजि‍त लेखन साधारण लोगों को भ्रमि‍त करता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो उन्‍हें 'जनसंपादक' और 'जनता का बुद्धि‍जीवी' मानते हैं। वे 'जनसंपादक' नहीं 'कारपोरेट संपादक' थे,वे जनता के बुद्धि‍जीवी नहीं 'पावर' के बुद्धि‍जीवी हैं। 'पावर' का बुद्धि‍जीवी 'वि‍चार नि‍यंत्रक' होता है, जो दायरे के बाहर जाता है उससे कहता है 'टि‍कोगे नहीं', यह मर्द भाषा है,नि‍यंत्रक की भाषा है। अलोकतांत्रि‍क भाषा है।
हिंदी में सही धारणाओं में सोचने की परंपरा वि‍कसि‍त नहीं हुई है अत: ये सब बातें करना बड़ों का अपमान माना जाएगा। यह अपमान नहीं मूल्‍यांकन है। सच यह है प्रभाष जोशी कारपोरेट मीडि‍या में संपादक थे। एक ऐसे अखबार के संपादक थे जि‍सका प्रकाशन हिंदुस्‍तान का प्रमुख कारपोरेट घराना करता है। प्रभाष जोशी ने 'जनसत्‍ता' के 'कारे कागद' स्‍तम्‍भ के ताजा लेख में जो बातें कहीं हैं,वे जनपत्रकारि‍ता के बारे में नहीं हैं,बल्‍कि‍ कारपोरेट पत्रकारि‍ता के बारे में हैं।
जोशी ने लि‍खा ''जनसत्‍ता हिंदी का पहला अखबार है जि‍सका पूरा स्‍टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्‍यादा सख्‍त परीक्षा के बाद लि‍या गया।' जोशी यह भर्ती की कारपोरेट संस्‍कृति‍ है। परीक्षा,क्षमता,योग्‍यता और मेरि‍ट आदि‍ कारपोरेट संस्‍कृति‍ के तत्‍व हैं। 'जनसंपादन कला' के नहीं। नि‍राला,प्रेमचंद,महावीर प्रसादद्वि‍वेदी के यहां भर्ती के कारपोरेट नि‍यम नहीं थे।
प्रभाष जोशी ने अपने समूचे पत्रकार जीवन में 'अवधारणात्‍मक नि‍यंत्रक' का काम कि‍या है। लि‍खा है , '' अखबार मि‍त्र की प्रशंसा और आलोचना के लि‍ए ही नहीं होते। उनका एक व्‍यापक सामाजि‍क धर्म भी होता है।'' यह 'सामाजि‍क धर्म ' क्‍या है ? प्रभाष जोशी इसे कारपोरेट मीडि‍या की भाषा में कहते हैं 'अवधारणात्‍मक नि‍यंत्रण'। हिंदी पाठक कि‍न वि‍षयों पर बहस करे, कि‍स नजरि‍ए से बहस करे,इसका एजेण्‍डा इसी 'सामाजि‍क धर्म' के तहत तय कि‍या गया। इस 'सामाजि‍क धर्म' के बहाने कि‍नका नि‍यंत्रण करना है और कि‍स भाषा में करना है यह भी आपने बताया है ,लि‍खा है '' वह दलि‍तों-पि‍छड़ों की राजनीति‍क ताकतों,वाम आंदोलनों और प्रति‍रोध की शक्‍ति‍यों का भी आकलन मांगता है और जि‍सकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। '' यानी आपने दलि‍त,पि‍छड़े और वाम का मूल्‍यांकन कि‍या। कि‍स तरह के पत्रकारों से कराया मूल्‍यांकन ? कि‍सी प्रति‍क्रि‍यावादी से वाम का मूल्‍यांकन कराइएगा तो कैसा मूल्‍यांकन होगा ? एक दलि‍त का गैर दलि‍त नजरि‍ए से कैसा मूल्‍यांकन होगा ? ,एक मुसलमान की समस्‍या पर गैर मुसलि‍म नजरि‍या कि‍तना हमदर्दी के साथ पेश आएगा ? प्रभाष जी आप जानते हैं अमेरि‍का में काले लोग जब मीडि‍या में काम करने आए तब ही काले लोगों का सही कवरेज हो पाया।
प्रभाष जोशी आप धर्मनि‍रपेक्ष हैं, मुसलमानों के हि‍मायती हैं।कृपया बताएं आपके संपादनकाल में मुसलमानों के कार्यव्‍यापार, जीवनशैली,सामाजि‍क दशा के बारे में कि‍तने लेख छपे थे। आपके यहां पांच अच्‍छे मुस्‍लि‍म पत्रकार नहीं थे, अब यह मत कहना मुसलमानों को लि‍खना पढना नहीं आता। खैर हि‍न्‍दू पत्रकारों को तो आता था उनसे ही मुसलमानों की जीवनदशा पर सकारात्‍मक नजरि‍ए से समूचे संपादनकाल में दस बेहतरीन खोजपरक लेख तैयार करवाए होते। कि‍सने रोका था। कोई चीज थी जो रोक रही थी। अभी भी हालात ज्‍यादा बेहतर नहीं हैं। आप मुसलमानों के बारे में वैसे सोच ही नहीं सकते क्‍योंकि‍ शासकवर्ग नहीं सोचते। आपकी पि‍छड़ों और दलि‍तों के प्रति‍ कि‍तनी और कैसी तटस्‍थ पत्रकारि‍ता रही है उसके बारे में भी वही सवाल उठता है जो मुसलमानों के बारे में उठता है। कारपोरेट पत्रकार -संपादक होने के नाते आपने जनप्रि‍य पदावली में 'शासकवर्गों के लि‍ए 'अवधारणात्‍मक नि‍यंत्रक' की भूमि‍का अदा की। कारपोरेट प्रेस में 'वस्‍तुपरकता' और 'तटस्‍थता' को मीडि‍या की सैद्धान्‍ति‍की में प्रभाष जोशी 'मेनीपुलेशन' कहते हैं। हिंदी के भोले पाठकों को इन पदबंधों से अब भ्रमि‍त करना संभव नहीं है।
आपके लेखन की एक वि‍शेषता है चीजों को व्‍यक्‍ति‍गत बनाने की, व्‍यक्‍ति‍गत चयन के आधार पर संप्रेषि‍त करने की। मीडि‍या थ्‍योरी में इसे बुनि‍यादी चीज से ध्‍यान हटाने की कला कहते हैं। अथवा जब कि‍सी अंतर्वस्‍तु को पतला करना हो तो इस पद्धति‍ का इस्‍तेमाल कि‍या जाता है। सब जानते हैं आप पचास साल से पत्रकारि‍ता कर रहे हैं। आप जि‍स वैचारि‍क संसार में मगन हैं वह 'पावर' का संसार है,कारपोरेट संसार है। उसे जनसंसार समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए। अपने इसी लेख में आपने उन तमाम लोगों, व्‍यक्‍ति‍यों, नेताओं, पत्रकारों आदि‍ का जि‍क्र कि‍या है ,जि‍नसे आपके व्‍यक्‍ति‍गत संबंध रहे हैं, और हैं। यह 'मेनीपुलेशन' की शानदार केटेगरी है। वि‍श्‍वास न हो तो प्रभाष जोशी अपने कि‍ए के बारे में जरा हर्बर्ट शि‍लर और नॉम चोम्‍स्‍की से ही पूछ लो, उनकी कि‍ताबों में आपको अपने द्वारा इस्‍तेमाल कि‍ए जा रहे वैचारि‍क अस्‍त्रों का सही जबाव मि‍ल जाएगा। प्रभाष जोशी जब आप कि‍सी चीज को व्‍यक्‍ति‍गत चयन की केटेगरी में रखकर पेश करते हैं अथवा व्‍यक्‍ति‍गत बनाते हैं तो अति‍रि‍क्‍त असत्‍य से काम लेते हैं। अति‍रि‍क्‍त असत्‍य का सुंदर काल्‍पनि‍क भवि‍ष्‍य के साथ रि‍श्‍ता जोडते हैं। प्रभाष जोशी आप स्‍वयं ही बताएं सरकारी नीति‍यों और कारपोरेट घरानों पर आपने केन्‍द्रि‍त ढंग से कब हमला कि‍या ? मैं सि‍र्फ एक उदाहरण दूंगा। वि‍गत वर्षों में हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ग्रुप ने 130 से ज्‍यादा कर्मचारि‍यों को नौकरी से नि‍काल दि‍या था,लंबे समय तक वे आंदोलन करते रहे, क्‍या आपको कभी अपने समानधर्माओं की याद आयी ? आप शानदार पत्रकार हैं लेकि‍न कारपोरेट घरानों के, जनता के नहीं। क्‍योंकि‍ आपको इस बात से कोई बेचैनी नहीं है कि‍ प्रेस में आखि‍रकार वि‍देशी पूंजी तेजी से क्‍यों आ रही है, आप उसका कहीं पर भी प्रति‍वाद नहीं करते, आप चुप क्‍यों हैं ? आपको रूपक मडरॉक से लेकर गार्जियन के मालि‍क तक सभी देशभक्‍त नजर आते हैं ? प्रभाष जोशी आपके संपादन की सबसे कमजोर कडी है वि‍देश की खबरें। सच सच बताना आपने वि‍देश की खबरें कम से कम क्‍यों छापीं ? जानते हैं संपादकीय मेनीपुलेशन का सबसे नरम स्‍थल है यह। आपने दुनि‍या को बदलने और देखने के बारे में अब तक जि‍तने भी वि‍कल्‍प सुझाएं हैं वे कि‍सी न कि‍सी रूप में सत्‍ताधारी वर्ग के ही वि‍कल्‍प हैं। जि‍से सचमुच में वि‍कल्‍प राजनीति‍ कहते हैं,वह सत्‍ताधारी वि‍चारों के परे होती है। आपने सारे जीवन पत्रकारि‍ता कम प्रौपेगैण्‍डा ज्‍यादा कि‍या है। प्रौपेगैंडि‍‍स्‍ट को ऑरवेल ने 'बडेभाई' कहा था।

( 'जनसत्‍ता' (6सि‍तम्‍बर 2009 ) में प्रकाशि‍त 'कागद कारे' की प्रति‍क्रि‍या में, 'मोहल्‍ला लाइव' पर 'आपने जीवनभर पत्रकारि‍ता कम और प्रौपेगैण्‍डा ज्‍यादा कि‍या' शीर्षक '7सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

रविवार, 6 सितंबर 2009

धंधा और कारपोरेट प्रेस

प्रभाष जोशी, ‘ईमानदार’ हैं। कारपोरेट घरानों के कलमघि‍स्‍सु हैं। उन्‍होंने ‘सच’ कहा है,उसे गंभीरता से लेना चाहि‍ए। पहला सच ,प्रेस (संपादकों,पत्रकारों और प्रेस मालि‍कों) और राजनेताओं गहरा याराना होता है, उनका भी कि‍तने ही प्रधानमंत्रि‍यों और मुख्‍यमंत्रि‍यों के साथ याराना था। धन्‍य है दोस्‍ती और पेशे की ईमानदारी। कम से कम अखबार वालों के साथ राजनेता कभी ज्ञान,सलाह और समझ पाने के लि‍ए दोस्‍ती नहीं करते, प्रचार पाने के लि‍ए दोस्‍ती करते हैं। स्‍वयं प्रभाष जोशी यह काम करते रहे हैं,यह तथ्‍य भी वे लि‍ख चुके हैं। दि‍क्‍कत यह है कि‍ जोशीजी पेशेवर मीडि‍या वाले नहीं हैं,सामंती मीडि‍या वाले हैं। जोशीजी अपने मालि‍कों को ‘जनसंपर्क’ एजेंसी खोलने का सुझाव दे ही सकते थे,ऐसी ही एजेंसि‍यां वे सब काम करती हैं, जि‍नको वे करते रहे हैं अथवा उनके करीबी दोस्‍त पत्रकार करते रहे हैं। हिंदी प्रेस में यदि‍ इस बार खबरों के लि‍ए लेन-देन हुआ है तो यह कोई नयी बात नहीं है,यह तो बारह महि‍ने चलता रहता है,जोशी जी भी जानते हैं कि‍ कि‍स तरह चलता है यह धंधा। समस्‍या लेन देन में नहीं है। हम निंदा करेंगे,वे तब भी लेंगे। यह निंदा की समस्‍या नहीं है। यह चुनाव की समस्‍या भी नहीं है। यह कारपोरेट प्रेस की दैनन्‍दि‍न समस्‍या है। हमारे सामने प्रभाष जोशी चाहे जि‍तना सौगंध खाएं, कि‍तना ही अपने को सत्‍यवादी बताएं, कौन नहीं जानता कि‍ प्रत्‍येक संपादक अपने मालि‍क के लि‍ए ‘जनसंपर्क’ का काम करता है,पूंजीपति‍यों के लि‍ए ‘जनसंपर्क’ नहीं करेगा,तो उसे कोई नौकरी पर भी रखने वाला नहीं है, रि‍टायर्ड होने के बाद भी जब पगार मि‍लती है तो उसका लक्ष्‍य लेखन नहीं कुछ और है। प्रभाष जोशी की मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ करना चाहते हैं कारपोरेट प्रेस का धंधा, लेकि‍न सामंती खोल और मूल्‍यों के आवरण को बनाए रखकर। वे जानते हैं क्‍या कर रहे हैं लेकि‍न दावा ‘सत्‍य’ की रक्षा का कर रहे हैं,’खबर’ की रक्षा का कर रहे हैं। उन्‍हें इस आवरण को फेंक देना चाहि‍ए। इससे अन्‍य संपादक भी प्रेरणा लेंगे,कारपोरेट प्रेस के पेशेवर नि‍यमों के तहत प्रभाष जोशी को परखना चाहि‍ए, जाति‍वाद इसका एक बडा हि‍स्‍सा है। अब जोशी जी यह न समझाएं कि‍ जाति‍ हि‍स्‍सा नहीं है। सि‍र्फ पेशेवर तरीकों के आधार पर चयन कि‍या था,हम प्रभाष जोशी और उनके भक्‍तों से यही कहना चाहते हैं कि‍ प्रभाष जोशी कारपोरेट घराने का पत्रकार है ,जनता के हि‍तों को लेकर लडने वाला पत्रकार नहीं है। जनता के हि‍तों को लेकर लडने वाले पत्रकार को प्रधानमंत्री,मुख्‍यमंत्री से दोस्‍ती गांठने की जरूरत नहीं पडती। प्रभाष जोशी कम से कम एक भी ऐसा रहस्‍योदघाटन बताएं जो कभी उन्‍होंने अपने दोस्‍त प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री , अथवा अपने कारपोरेट आकाओं (जो उनके दोस्‍त थे या हैं ) के बारे में कि‍या हो, कौन नहीं जानता चन्‍द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने थे तो प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठकर सीधे सौदे पटते थे,प्रधानमंत्री कार्यालय में ही रकम सरेआम ली जाती थी। जोशी जी उन व्‍यक्‍ति‍यों को भी जानते हैं जरा सुवि‍धा के लि‍ए स्‍वयं ही सत्‍य बोल दें तो पता चल जाएगा कि‍ खबर पर्दा कौन डालता रहा है, ,भारत के इति‍हास में प्रधानमंत्री के रूप में चन्‍द्रशेखर सबसे भ्रष्‍ट थे। कि‍सी भी कांग्रेसी नेता से इस तथ्‍य की आसानी से पुष्‍टि‍ हो सकती है। लेकि‍न ‘ईमानदारी’ और ‘सत्‍य’ के लि‍ए आग उगलने वाले प्रभाष जोशी को चन्‍द्रशेखर के कार्यालय का भ्रष्‍टाचार नजर ही नहीं आया। बलि‍हारी गुरू आपने गोवि‍न्‍द दि‍यो मि‍लाय। कारपोरेट घरानों की राजनेताओं के साथ कैसे ढील होती है और वे इसके बारे में कि‍तने तथ्‍य जानते हैं ,यदि‍ उसकी थोडी सी भी झलक वे देते तो देश का बडा भला होता।
( प्रभाष जोशी ने 'जनसत्‍ता' (6सि‍तम्‍बर 2009 )में 'कागद कारे' स्‍तम्‍भ में 'काले धंधे के रक्षक' शीर्षक से एक लेख लि‍खा है,यह लेख मोहल्‍ला लाइव पर उपलब्‍ध है,उसकी प्रति‍क्रि‍या में व्‍यक्‍त वि‍चार)

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

वे गाली क्‍यों देते हैं जि‍नको आती है भाषा

प्रभाष जोशी के साक्षात्‍कार पर चली बहस सामान्‍य बहस नहीं है यह हिंदी के सोए हुए अथवा वि‍कास की दौड में पि‍छड गए लेखकों को सम्‍बोधि‍त बहस है। प्रभाषपंथी इस बहस में गाली के अलावा कुछ नहीं बोल रहे,वे जानते नहीं हैं कि‍ वे साइबर स्‍पेस में हैं और इसमें प्रेस युग की सामंती हेकडी नहीं चलती। साइबर स्‍पेस में चल रही मौजूदा बहस में कुछ यूजर ऐसे हैं जो मुहल्‍ले की भाषा में,तू -तडाक की भाषा में अभि‍व्‍यक्‍त कर रहे हैं, जैसे आलोक तोमर एंड कंपनी।इनके जबाव में भी कुछ लोग हैं जो वैसी भाषा में बोल रहे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो चुपचाप बैठकर पढ रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो अपने चेलों से खबर मंगा रहे हैं,प्रि‍ट मंगा रहे हैं और पढ रहे हैं,जैसे प्रभाष जोशी।
प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव जैसे लोग परंपरावादी हैं,कम्‍प्‍यूटर से अपरि‍चि‍त हैं, वे यह सोचते हैं कि यह उनकी सरस्वती को इंटरनेट भ्रष्ट कर देगा। इंटरनेट पर घूम -घूमकर गाली देने वाले,नेटलेखकों को गरि‍याने वाले जानते नहीं हैं कि‍ नेट लेखन के लि‍ए साहित्यिक अतीत से मुक्त होकर सोचना परमावश्‍यक है। नेट रीडिंग और नेट लेखन में साहित्यिक अतीत की यादें और धारणाएं पग-पग पर बाधाएं खड़ी करती हैं। नेट लेखन शुद्ध लेखन है यह ऐसा लेखन है जि‍सने 'साहि‍त्‍य' परंपरागत धारणाओं,वि‍धाओं की धारणाओं,आलोचना, साहि‍त्‍य के इति‍हास,प्रेस लेखन आदि‍ सबको लेखन में रूपान्‍तरि‍त कर दि‍या है। अब सारी दुनि‍या में सि‍र्फ लेखन है और कुछ नहीं लेखन ही सत्‍य है। लेखक,आलोचना, महानता, वि‍द्वता,वि‍धाएं आदि‍ की स्‍वतंत्र सत्‍ता का अंत हो चुका है। अब सि‍र्फ लेखन बचा है । सब कुछ लेखन में समाहि‍त हो चुका है। नेट का जगत खुला जगत है। साहि‍त्‍य के बंद संसार से यह पूरी तरह भि‍न्‍न है। प्रभाषपंथी गुस्‍सैल दोस्‍त माफ करें उन्‍हें चाहे जि‍तनी तकलीफ हो उन्‍हें नेट के खुलेपन को झेलना पड़ेगा,नेट का खुलापन अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की आजादी का चरर्मोत्‍कर्ष है।नेट में लि‍खे हुए को देखकर लेखक के वि‍जन का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें भागीदारी के लि‍ए उत्‍तेजना और गाली गलौज की भाषा की नहीं गंभीरता, नि‍‍र्भीकता और तत्‍क्षण बुद्धि‍ की जरूरत होती है। नेट लेखन में अपना वि‍जन महसूस करने के साथ अन्‍य के वि‍जन को भी महसूस करते हैं, गंभीरता से लेते हैं। नेट मूलत: प्रदर्शन की जगह है। यह बातचीत का आरामदायक स्‍थान नहीं है। हमारे पाठक तत्‍काल जि‍स स्‍थान पर टि‍प्‍पणी लि‍ख रहे हैं उसे कम्‍प्‍यूटर सि‍द्धान्‍तकारों ने 'हॉस्‍पीटल' की संज्ञा दी है। वेब का पाठक जब भी लौटकर यहां पर आता है तो मूलत: 'हास्‍पीटल' में ही लौटकर आता है। हमें देखना होगा कि‍ वह कि‍तनी बार लौटता है उसका बार-बार लौटना नेट के पाठ की पुष्‍टि‍ है।
वेब का लेखक साधारण लेखक नहीं होता,वह परंपरागत लेखक से बुनि‍यादी तौर पर भि‍न्‍न होता। यह बेहतर, आत्मसजग ,आलोचनात्मक, विचारक लेखक है। इसके पास प्रसि‍द्धि‍ है,सूचनाएं हैं। आत्‍माभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। लेखन के साथ उसका परि‍वार,दोस्‍तों आदि‍ से संबंध भी बना रहता है। वेब लेखक की प्रति‍ष्‍ठा,संपर्क और शि‍रकत में नि‍रंतर वृद्धि‍ होती है। जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं तो उन्हें वेबसाइट बनानी होंगी। वेबसाइट को पढ़ना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते तो सामाजिक परिवर्तन, न्याय, और सामाजिक सुधार आदि संभव नहीं है। इसके लिए हमें राजनीतिक वेबसाइट बनानी होंगी। जो लोग वेब पर मिलेंगे उनके बीच गहरे संबंध होंगे। वे स्वतंत्रचेता विचारक होंगे। उनमें सामुदायिकता की भावना ज्यादा होगी। पुरानी तर्क प्रणाली में तर्क बदलने की गुंजाइश नहीं है। जबकि नेट में तर्क परिवर्तन की पर्याप्त संभावनाएं हैं। यह परंपरागत पाठ से भि‍न्‍न पाठ है। लिंक के कनेक्शन पर आधारित है।इसके कारण उसका सूचना आधार विकासशील है। उसमें निरंतर वृध्दि होती रहती है।वह यूजर के चारों ओर माहौल बनाए रखता है। प्रभाषपंथी इस बात से दुखी हैं कि‍ उनके बारे में अनाप-शनाप लि‍खा जा रहा है। ये नादान दोस्‍त हैं जानते ही नहीं हैं कि‍ इंटरनेट में कोई चौकीदार नहीं होता, कोई छलनी नहीं होती । इंटरनेट छलनी को अपदस्थ कर देता है। चयन में इस्तेमाल होने वाली सेंसरशिप को खत्म कर देता है। वह आधिकारिक तौर पर चीजों की छानबीन नहीं करता। इंटरनेट यह मानकर चलता है कि शिक्षित समाज में छलनी की जरूरत नहीं होती।सामान्य तौर पर लोग इतने जागरूक होते हैं कि वे गुणवत्तामूलक और अन्य सामग्री में फर्क कर लेते हैं। छलनी की जरूरत पूर्व शिक्षित संस्कृति के युग में होती है। प्रभाषपंथी भूल गए हैं कि‍ आज हम मध्यकाल से आगे आ चुके हैं। शिक्षित समाज में अबाधित सूचना प्रसार सामान्य और अनिवार्य जरूरत है। इसमें कुछ खतरे भी हैं। किंतु यदि हम स्व-प्रशासन की दिशा में आगे जाएंगे तो जोखिम तो उठाना होगा। इसके लाभ बहुत हैं। यहीं पर एक पुराना सवाल पैदा होता है कि सेंसरशिप को सेंसर कौन करेगा ? उल्लेखनीय है कि प्रत्येक यूजर अपने तरीके से छानता है।चयन करता है।अत: शुरू से छानकर देना सही नहीं होगा।हम यह कैसे तय करेंगे कि पाठक क्या चाहता है। पाठक क्या चाहता है इसे पाठक ही तय करेगा अन्य कोई तय नहीं कर सकता। आज का दौर समस्या केन्द्रित अध्ययन का दौर है। यह परीक्षा का दौर नहीं है। आज हमारे बच्चों के पास भी आलोचनात्मक विवेक है। यह ऐसा दौर है जिसे मीडिया के संदर्भ केसहारे पढ़ा नहीं जा सकता। इसे वेब के सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए।वेब के जरिए लाखों-करोडों चैनलों ने हमला बोला हुआ है। यह वेब का हमला है। इसकी छानबीन संभव नहीं है। इसकी छानबीन का कोई तरीका भी नहीं है। यह पूर्णत: अराजक अवस्था है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लेखन ,रीडिंग और वाचन की तुलना में टाइपिंग अस्वाभाविक और घातक गतिविधि है। कम्प्यूटर क्रांति ने इसे चरमोत्‍कर्ष पर पहुंचाया है। लिखने से क्या लाभ होता है यह सब जानते हैं।वाचन से इंटरनेट पाठ की ओर संक्रमण मानवीय प्रगति का चरमोत्कर्ष है।यह अभिजात्य संप्रसार से व्यक्तिगत सृजन और स्वायत्तता (इंटरनेट) का विकास है।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

आलोक तोमर के कुतर्की जबाव के प्रत्‍युत्‍तर में

आलोक तोमर जी आपने मूल बातों का जबाव नहीं दि‍या। दें भी क्‍यों आपको मूर्खों से बातें करने में आनंद नहीं आता। वे इस योग्‍य नहीं लगते । आपको अगर 'भले' लोगों से फुरसत मि‍ले तो बातें करें, रही बात समय की तो हमारे पास ईश्‍वर का दि‍या समय,औकात,नौकरी , कुलपति‍यों के साथ बैठने का सुख सब कुछ है, यदि‍ कोई चीज नहीं है तो यह कि‍ गाली देकर तर्क करने का सलीका हमें नहीं आता, मैं हैसि‍यत दि‍खाने के लि‍ए नहीं लि‍ख रहा,मुझे आपसे ईनाम थोडे ही लेना है और नहीं आपसे कि‍सी के पास सि‍फारि‍श लगवानी है, रही बात योग्‍यता और अंकों की तो वह तब ही बताऊंगा जब आप मेरी बातों का तमीज के साथ जबाव देंगे। मैं पढाता कैसा हूं यह भी तब ही पता चलेगा जब पढने आएंगे,घर बैठे पता नहीं चलेगा। मूर्खता आपने की है और बि‍ना पढे की है, जाकर देख लें कि‍ कहां लि‍खा है फि‍र जबाव दें,हठी भाव से जबाव नहीं देना चाहेंगे तो यह भी आपका लोकतांत्रि‍क हक है,मैं आपके साथ सहानुभूति‍ नहीं रख पा रहा हूं क्‍योंकि‍ आपने जि‍स भाषा,असभ्‍यता और दंभ का प्रदर्शन कि‍या है उसे इस संसार में कोई दुरूस्‍त नहीं कर पाया है,मुझे पढने,पढाने और गलत करने वालों को ,दंभि‍यों को सबक सि‍खाने के लि‍ए ही पगार मि‍लती है। इसके लि‍ए वि‍श्‍ववि‍द्यालय की तरफ से पूरा समय दि‍या जाता है। यह काम हमें कक्षाएं समाप्‍त करने के बाद करना होता है, आपकी भाषा में इसे ओवरटाइम कहते हैं। यह हमारी नौकरी की शर्तों में है। दंभ और अहंकार में जीने वालों का क्‍या हुआ है आप अच्‍छी तरह जानते हैं। मेरे पास बंधक छात्र नहीं हैं। आपने पश्‍चि‍म बंगाल और जेएनयू के छात्र नहीं देखे आपने पता नहीं कहां के छात्र देखे हैं ,आप तर्क और संवाद से भागकर शांति‍ चाहते हैं और बगैर पढे शांति‍ चाहते हैं,गुरूजी को बीच मझधार में छोडकर शांति‍ चाहते हैं, चलो शांति‍ दी। लेकि‍न याद रहे असभ्‍यता आप जैसे लोगों के व्‍यक्‍ति‍त्‍व का आईना है। आप चाटुकारि‍ता और स्‍टेनोग्राफी को पत्रकारि‍ता कहते हैं। आप जो कर रहे हैं या लि‍ख रहे हैं वह सरासर बदतमीजी है और यही आपकी महानता का आधार भी है। इस आधार पर आकर आपसे कौन टक्‍कर ले सकता है। आप सारे मसले को व्‍यक्‍ति‍गत बना रहे हैं, मुद्दों का जबाव दो वरना चुप रहो । कि‍सने कहा है हर बात पर बोलो,दोस्‍त थक जाओगे।
(देशकाल डॉट कॉम पर आलोक तोमर ने मेरे लेख पर जबाव दि‍या उसके प्रत्‍युत्‍तर में व्‍यक्‍त प्रति‍क्रि‍या)

प्रभाष जोशी की साम्‍प्रदायि‍क पत्रकारि‍ता के कुछ नमूने

प्रभाष जोशी के संपादकत्‍व में ‘जनसत्‍ता’ में कि‍स तरह की अ-धर्मनि‍रपेक्ष पत्रकारि‍ता हो रही थी,उसके संदर्भ में प्रभाष जोशी के भक्‍तों के लि‍ए यही सुझाव दूंगा कि‍ वे सि‍र्फ राममंदि‍र आंदोलन के दौर के जनसत्‍ता को देखें,कम समय हो तो ‘टाइम्‍स सेंटर ऑफ मीडि‍या स्‍टडीज’ के द्वारा उस दौर के कवरेज के बारे में तैयार की गयी वि‍स्‍तृत सर्वे रि‍पोर्ट ही पढ़ लें, यह रि‍पोर्ट प्रसि‍द्ध पत्रकार मुकुल शर्मा ने तैयार की थी, जो इन दि‍नों अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधि‍कार संगठन की भारत शाखा के प्रधान हैं।’टाइम्‍स सेंटर ऑफ मीडि‍या स्‍टडीज’ की रि‍पोर्ट के अनुसार ‘जनसत्‍ता’ अखबार ने जो उन दि‍नों दस पन्‍ने का नि‍कलता था। लि‍खा है ” दस पेज के इस अखबार में 20 अक्‍टबर से 3 नवंबर तक कोई दि‍न ऐसा नहीं रहा,जि‍स दि‍न रथयात्रा अयोध्‍या प्रकरण पर 15 से कम आइटम प्रकाशि‍त हुए हों। कि‍सी -कि‍सी रोज तो यह संख्‍या 24-25 तक पहुंच गई है। ” इसी प्रसंग में ‘जनसत्‍ता’ की तथाकथि‍त स्‍वस्‍थ और धर्मनि‍रपेक्ष पत्रकारि‍ता की भाषा की एक ही मि‍साल काफी है। ‘जनसत्‍ता’ ने (३ नवंबर 1990 ) प्रथम पृष्‍ठ पर छह कॉलम की रि‍पोर्ट छापी। लि‍खा ” अयोध्‍या की सड़कें,मंदि‍र और छावनि‍यां आज कारसेवकों के खून से रंग गईं।अर्द्धसैनि‍क बलों की फायरिंग से अनगि‍नत लोग मरे और बहुत सारे घायल हुए।” यहां पर जो घायल हुए उनकी संख्‍या बताने की बजाय ‘बहुत सारे’ कहा गया लेकि‍न मरने वाले उनसे भी ज्‍यादा थे। उन्‍हें गि‍ना नहीं जा सकता था। ‘अनगि‍नत’ थे। प्रभाष जोशी के संपादकत्‍व में ‘जनसत्‍ता’ ने संघ की खुलकर सेवा की है,समूचा अखबार यही काम करता था। इसका एक ही उदाहरण काफी है। 27 अक्‍टूबर के जनसत्‍ता में नि‍जी संवाददाता की एक रि‍पोर्ट छपी है।इस रि‍पोर्ट में लि‍खा है ” भारत के प्रति‍नि‍धि‍ राम और हमलावर बाबर के समर्थकों के बीच संघर्ष लंबा चलेगा।” क्‍या यह पंक्‍ति‍यां संघ पक्षधरता के प्रमाण के रूप में काफी नहीं हैं ? संघ के भोंपू की तरह ‘जनसत्‍ता’ उस समय कैसे काम कर रहा था इसके अनगि‍नत उदाहरण उस समय के अखबार में भरे पडे हैं। कहीं पर भी प्रभाष जोशी के धर्मनि‍रपेक्ष वि‍वेक को इस प्रसंग में संपादकीय दायि‍त्‍व का पालन करते नहीं देखा गया, बल्‍कि‍ उनके संपादनकाल में संघ के मुखर प्रचारक के रूप में ‘जनसत्‍ता’ का कवरेज आता रहा। संपादक महोदय ने तथ्‍य ,सत्‍य और झूठ में भी अंतर करने की कोशि‍श नहीं की।
(मोहल्‍ला डाट कॉम पर अवि‍नाश के आलेख पर लि‍खी प्रति‍क्रि‍या )

शनिवार, 29 अगस्त 2009

आलोक तोमर की बेईमान पत्रकारि‍ता

आलोक तोमर जी ,आप 'ईमानदार' हैं,यह बात कम से कम कहनी पड रही है, प्रभाष जोशी पर जि‍तनी भी बहस हुई उसमें सबसे ज्‍यादा गंभीर बहस मैंने चलाई है,मेरा अनुमान सही था कि‍ आपने अपना लेख बि‍ना पढे लि‍ख मारा। यह टि‍प्‍पणी भी बि‍ना पढे ही पचा गए, सचमुच में मजेदार आदमी हैं,गुरू को भी पचा गए और दोस्‍तों के लि‍खें को भी हजम कर गए।
आलोक तोमर जी आपने लि‍खा है ''जगदीश्वर जी का लेख मैंने नहीं पढा है. कहाँ छपा था? '' मैं पता बताने की मूर्खता नहीं करूंगा,आप जानते हैं,नहीं जानते हैं तो जानें और अपने गुरू की रक्षा में जि‍तनी रसद हो खर्च कर दें, कम पडे तो हमसे बोलि‍एगा, प्रभाष जोशी की हजार गलति‍यों के बावजूद हम उनके साथ हैं,लेकि‍न आलोचनात्‍मक वि‍वेक को ताक पर रखकर नहीं। पगार,शि‍क्षा,औकात या सामाजि‍क हैसि‍यत वाली बात इसलि‍ए आयी थी क्‍योंकि‍ आपने पत्रकारि‍ता के उसूलों के बाहर जाकर लि‍खा था,मैंने आपसे आपके अंक नहीं पूछे थे मैंने प्रभाषजोशी के खि‍लाफ लि‍खी गयी अपनी आलोचना पर जबाव मांगा है, मैं जानता हूं आप पढे लि‍खे आदमी हैं किंतु गुरूभक्‍ति‍ में अपने आलोचनात्‍मक वि‍वेक से वि‍श्‍वासघात कर रहे हैं। सत्‍य को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। एक पत्रकार सत्‍य से आंखें नहीं चुराता, सत्‍य को देखे बगैर नहीं लि‍खता,आपने ठीक मेरा लि‍खा देखे बगैर कि‍सी के कहने पर सीधे अपना लेख लि‍ख मारा और आप यह भूल गए कि‍ यह प्रेस का दौर नहीं है,इंटरनेट का दौर है, प्रेस के दौर में अखबार भी आपका था,लेखन भी आपका था,जैसा चाहे लि‍खते रहो कि‍सी का जबाव नहीं छापना था,लेकि‍न इंटरनेट के दौर में प्रेस से लेकर नेट तक पत्रकार जो कुछ भी लि‍ख रहा है,उसकी गहरी छानबीन चल रही है। प्रभाष जोशी के अब दि‍न लद गए हैं,अब उनके लि‍खे पर रोज आलोचनाएं छपेंगी और वे रोज तर्कहीन साबि‍त कि‍ए जाएंगे। आप उनके साक्षात्‍कार पर लि‍खी मेरी टि‍प्‍पणि‍यों पर आप खुलकर लि‍खें,आप बडे पत्रकार हैं, आपको नेट मालि‍क और नेट पत्रकार भी जानते हैं, आप जि‍तना चाहेंगे स्‍पेस मि‍लेगा यदि‍ कोई स्‍पेस नहीं देगा तो मैं दूंगा इस अनपढ का भी नेट पर ब्‍लाग है,वहां जि‍तना चाहेगे आपको लि‍खने दूंगा। कृपया बहस के मैदान में आएं,अपने गुरूदेव से भी कहें कि‍ वे भी अपने समूचे तर्कशास्‍त्र और मीडि‍याशास्‍त्र को लेकर मैदान में आएं हम वादा करते हैं, आप लोगों के प्रति‍ जो सम्‍मान और प्‍यार है,उसे रत्‍तीभर कम नहीं होने देंगे। वैसे ही आप लोगों की खबर लेंगे,जैसे कि‍सी दोस्‍त की खबर ली जाती है। यह भी वायदा करते हैं अपनी बातों की पुष्‍टि‍ के लि‍ए कि‍सी घटि‍या तर्कशास्‍त्र और ग्रंथ का सहारा नहीं लेंगे। हम सि‍र्फ मीडि‍याशास्‍त्र और भारतीय इति‍हास और परंपरा के बारे में प्रभाष जोशी के वि‍वादास्‍पद साक्षात्‍कार के बारे में ही वि‍वाद करेंगे और फि‍र अनुरोध है अब तक जो लि‍खा है, उसे खोजें और पढें,गुरूदेव को भी पढाएं, जरूरी हो तो लाइब्रेरी भी जा सकते हैं, गुरूदेव की मदद के लि‍ए,लेकि‍न लौटकर नेट पर गुरू सहि‍त जरूर आएं, यह नेट है और ज्ञान का सागर है, यह प्रेस का दफतर नहीं है, जि‍समें कोई लाईब्रेरी नहीं होती, आपको हम वे सारे संदर्भ नेट पर ही उपलब्‍ध कराएंगे जो प्रभाष जोशी और आपकी भाषा और मान्‍यताओं के संदर्भ में प्रथम कोटि‍ के वि‍श्‍व वि‍‍ख्‍यात लोगों के हैं। भारत के इति‍हास और परंपरा के बारे में भी हम सि‍र्फ वही सामग्री मुहैयया कराएंगे जो प्रथम कोटि‍ के इति‍हासकारों की है, उसके बाद ही तय करना कि प्रभाष जोशी के लि‍खे को कहां रखें, दोस्‍त वायदा है अपमानजनक नहीं सम्‍मानजनक शास्‍त्रार्थ होगा,ऐसा शास्‍त्रार्थ होगा जि‍से नेट यूजर पढकर स्‍वास्‍थ्‍यलाभ करेंगे। आपको भी अपनी गलती का अहसास कराने के लि‍ए यह बेहद जरूरी है, क्‍योंकि‍ आपने अभी तक अपनी गलती नहीं मानी है, आपने बगैर पढे बगैर नाम के मेरे बारे में जो बातें कही हैं,एक अच्‍छे पत्रकार को उसके लि‍ए माफी मांगनी चाहि‍ए वरना साक्षात्‍कार पर शास्‍त्रार्थ के लि‍ए तैयार रहना चाहि‍ए ,मैं आपका इंतजार कर रहा हूं कि‍ आप अपनी पोजीशन साफ करें माफी मांगे या शास्‍त्रार्थ करें, यह मामला व्‍यक्‍ति‍गत की हदें पार गया है,आप और आप जैसे ही लोग प्रभाष जोशी की छवि‍ को इस हद तक पहुंचाने के लि‍ए जि‍म्‍मेदार हैं, बेहतर यही होता आप हम लोगों की आपत्‍ति‍यों पर उनका एक साक्षात्‍कार लेते और जहां पर आपने अपने गुरूज्ञान का परि‍चय दि‍या है, वहां पर ही छाप देते, प्रभाष जोशी नेट पर नहीं जाते हैं, लेकि‍न आप तो जाते हैं, आप कि‍सी घटि‍या से मसले पर कि‍सी साखरहि‍त नेता के दरवाजे आए दि‍न खबर लेने चले जाते हैं लेकि‍न जब आपके गुरू पर आलोचनाएं लि‍खी जा रही हैं, तो अपने गुरू के दरवाजे जाकर उनकी राय को एकत्रि‍त करके हमें बताने की भी जरूरत नहीं समझी आपको गाली और अपमान की भाषा में लि‍खने के लि‍ए समय मि‍ल गया किंतु हमारे लि‍खे को पढने और उस पर सोचने का समय नहीं मि‍ला, यह कैसे हो सकता है आपको गुस्‍सा बगैर पढे ही आ गया और आपने अनाप शनाप लि‍ख डाला ,क्‍या आपकी पत्रकारि‍ता की इस शैली पर पुलि‍त्‍जर पुरस्‍कार दि‍लवाने की मांग करें ? मैंने अपनी पगार की बात इसलि‍ए उठायी थी क्‍योंकि‍ आपने बडे ही घटि‍या ढंग से बेरोजगार नौजवानों का आपने अपमान कि‍या हमारा भी अपमान कि‍या ,जरा अपना लि‍खा गौर से पढें और सोचें आपको प्रायश्‍चि‍त स्‍वरूप क्‍या करना चाहि‍ए ? आलोक तोमर ने लि‍खा है '' जगदीश्वर जी हिन्दी स्नाकोत्तर परिक्षा में अंक कितने आये थे? मेरे ७० प्रतिशत थे और विश्वविद्यालय में सबसे ज्यादा थे. निरक्षर तो हम भी नहीं हैं.प्रोफेसर पद पर में भी पहुँच जाता...आखिर २१ साल की उम्र में डिग्री कालेज में पढा चूका हूँ. रही जनसत्ता के पतन की दास्तान, तो आपकी चिंता से सहमत हूँ मगर टेंपो और ट्रक टकरा जाएँ तो दोष प्रभाष जी का है? रामनाथ गोयनका जब तक रहे, जनसत्ता शान से चला, पर बाद के लोगों ने उसका राम नाम सत्य कर दिया।'' आलोक तोमर मुश्‍कि‍ल अंकों में है तो यह जान लो प्रभाष जोशी के बारे में जि‍न लोगों ने भी लि‍खा है, उनमें कई के बारे में मैं जानता हूं उनके अंक आपसे ज्‍यादा हैं और तर्क भी वैज्ञानि‍क हैं, आपके अंक भी कम है तर्क भी अवैज्ञानि‍क हैं। अखबार की 'धारण क्षमता' कि‍समें होती है ? अखबार को कौन धारण करता है ?कौन चलाता है ? मालि‍क या संपादक और पत्रकार ? गोयनकाजी कैसे थे क्‍या थे,यह यहां वि‍वेचन का वि‍षय नहीं है। आप स्‍वयं लि‍ख चुके हैं,जनसत्‍ता अखबार में प्रभाष जोशी सर्वाधि‍कार सम्‍पन्‍न थे, सवाल यही है कि‍ सर्वाधि‍कार सम्‍पन्‍न होने बावजूद,प्रभाष जोशी के धांसू लेखन के बावजूद प्रति‍भाशाली पत्रकार उनसे अलग क्‍यों हो गए अथवा नि‍काल दि‍ए गए अथवा अखबार का भटटा क्‍यों बैठ गया ? आलोक तोमर अखबार के बैठ जाने पर मात्र दो पंक्‍ति‍यां और जि‍न शुभ चिंतकों ने आलोचना लि‍खी उन पर पूरा लेख वह भी धमकी और अपमानभरी मर्दवादी मवालि‍यों की भाषा में। बंधु यह संतुलि‍त लेखन नहीं है, कम से जनसत्‍ता के पतन के बारे में और उसमें संपादक और सर्वाधि‍कार सम्‍पन्‍न व्‍यक्‍ति‍ के कार्यकलाप और धारण क्षमता के बारे में आपको मेरे सवालों के जबाव देने ही होंगे। हम चाहते हैं खुलकर बहस हो,दोस्‍ताना वातावरण है स्‍वस्‍थ बहस हो, व्‍यक्‍ति‍गत आपेक्ष कि‍ए बगैर बहस हो, आप कम से कम नेट भोगी पत्रकार हैं आप कि‍नाराकशी नहीं कर सकते, इंतजार है,जबाव दें, और असभ्‍य भाषा के प्रयोग के बारे में प्रायश्‍चि‍त करें।
( देशकाल डॉट कॉम पर आलोक तोमर की लि‍खी टि‍प्‍पणी पर प्रति‍क्रि‍या,वि‍स्‍तार से देशकाल डॉट कॉम और मोहल्‍ला लाइव डॉट काम पर जाकर पढें )

संस्‍कृति‍हीन गद्य है आलोक तोमर का

मैंने दंभी आलोक तोमर नहीं देखा था,बेहद वि‍नम्र और मि‍लनसार आलोक तोमर देखा है, वह यह आलोक तोमर नहीं है जो मैंने अपने जेएनयू के छात्र जीवन में पढते हुए देखा था, मवालि‍यों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर कहां से आया ? आखि‍र यह पत्रकार दादागि‍री की भाषा क्‍यों बोल रहा है ? मैंने ऐसी भाषा में कभी कि‍सी पत्रकार को लि‍खते नहीं देखा। आलोक तोमर यह भारतेन्‍दु,महावीरप्रसाद द्वि‍वेदी,प्रेमचंद,राजेन्‍द्रयादव,प्रभाष जोशी,राजेन्‍द्र माथुर की परंपरा वाली भाषा नहीं है। आलोक तोमर यह बताओ आखि‍रकार आदमी का इतना तेजी से पतन कैसे होता है कि‍ वह पत्रकारि‍ता की समस्‍त परंपराओं, एथि‍क्‍स, नीति‍यां,मानकों,संपादकीय नीति‍ आदि‍ सबको भूल जाए और गली के दादाओं की भाषा का इस्‍तेमाल करने लगे। आलोक तोमर जानते हैं आप जो कह रहे हैं पूरे होशोहवास में कह रहे हैं। यदि‍ ये बातें बेहोशी मैं भी कही गयी हैं तब भी क्षम्‍य नहीं हैं। खासकर मेरे लेखन के संदर्भ में तो आपने अक्षम्‍य अपराध कि‍या है। आपको लठैती कब से आ गयी ? कलम का सि‍पाही संस्‍कृति‍वि‍हीन लोगों की भाषा में सम्‍बोधन कर रहा है वह भी ऐसे लोगों से जो उससे अनेक गुना ज्‍यादा शि‍क्षि‍त हैं। मैं खास तौर पर अपने संदर्भ में कह रहा हूं, आपने अक्षम्‍य अपराध कि‍या है। यह पत्रकारि‍ता के मानकों का भी अपमान है।
आलोक तोमर ने कहा है ''बात करो मगर औकात में रहकर बात करो। '' अरे भाई आप भडक कि‍स बात पर रहे हैं ? कि‍से यह धमका रहे हैं ? औकात की भाषा कब से सभ्‍यता वि‍मर्श की भाषा हो गई। मैंने सबसे गंभीर ढ़ंग से प्रभाषजोशी की आलोचना लि‍खी है, मैं क्‍या हूं और कहां पढाता हूं और कि‍तना पढा लि‍खा हूं इसके बारे में मुझे आपको कम से कम बताने जरूरत नहीं है। वैसे भी आप भूल चुके हों तो बताना जरूरी है, आप याद करेंगे तो ध्‍यान आ जाएगा और सभ्‍यता बची होगी तो कभी अकेले पश्‍चाताप कर लेना कि‍ जि‍स व्‍यक्‍ति‍ को जेएनयू में छात्रसंघ का अध्‍यक्ष बनने पर हि‍न्‍दी का गौरव कहा था उसी को अब औकात बता रहे हो। आलोक तोमर मैंने गाली गलौज की भाषा में नहीं लि‍खा,मैंने कोई अपशब्‍द अथवा व्‍यक्‍ति‍गत बातें प्रभाष जोशी के बारे में नहीं कहीं, यदि‍ कहीं हों तो बताएं,आपकी औकात कि‍तनी और आपकी बुद्धि‍ कि‍तनी है यह तो इस तथ्‍य से ही पता चल रहा है कि‍ आपने बगैर प्रति‍क्रि‍या पढे ही अपना लेख लि‍ख मारा है। आप नहीं जानते तो जान लें ,हि‍न्‍दुस्‍तान के सबसे बेहतरीन शिक्षकों का छात्र रहा हूं। जेएनयू में मेरा शानदार छात्रजीवन रहा है,आपने मेरी हजारों प्रेस वि‍ज्ञप्‍ति‍यां छापी हैं। फि‍लहाल कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय में प्रोफेसर हूं। मुझे कोई भी चीज गुरूकृपा से नहीं अपने बल से मि‍ली है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि‍ आप जरा गुरूकृपा के बि‍ना अपने पैंरो से चलकर तो दि‍खाते ?
ध्‍यान रहे प्रभाष जोशी के बारे में नहीं उनके लेखन के बारे में बातें हो रही हैं। मैं आलोक तोमर के बारे में व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर जि‍तना जानता हूं वह यह कि‍ वह बहुत अच्‍छा मि‍लनसार पत्रकार था,दंभ और अहंकारहीन व्‍यक्‍ति‍ था, लेकि‍न उपरोक्‍त आलेख में उसकी भाषा और तेवर देखकर मैं दंग रह गया,आखि‍रकार कुछ गडबड हुआ है जो इस तरह की भाषा लि‍खी है। मैं देख रहा हूं हमारा हिंदी प्रेस कैसे दंभी पत्रकार बना रहा है, एक अच्‍छा लोकतांत्रि‍क पत्रकार कैसे 25 सालों में दंभी हो गया, लेखन में अपराधि‍यों की भाषा का इस्‍तेमाल करने लगा है। आलोक तोमर आपने जि‍न शब्‍दों का प्रयोग कि‍या है उनका अमूमन छुटभैये गुंडे इस्‍तेमाल करते हैं, क्‍या यह मानूं कि‍ वि‍गत 25 सालों में बि‍छुडने के बाद आपका भी वही स्‍वरूप बना है जो कि‍सी प्रति‍ष्‍ठानी पत्रकार का होता है। आलोक तोमर यह दंभ आपने कहां से लि‍या है ? कम से शि‍क्षा दंभी नहीं बनाती।
आलोक तोमर को पत्रकारि‍ता के इति‍हास का ज्ञान कराना यहां अभीप्‍सि‍त लक्ष्‍य नहीं है,वे 'ज्ञानी' पत्रकार हैं। वह मानकर चल रहे हैं प्रभाष जोशी को नि‍बटाने के लि‍ए उनकी हमने आलोचना लि‍खी है। उन्‍हें नि‍बटाने के लि‍ए नहीं, उनकी जुबान पर अंकुश लगाने के लि‍ए उनकी आलोचना की जा रही है। एक संपादक की बेलगाम जुबान को साधारण पाठक ही दुरूस्‍त करता है, संपादक कि‍तना ज्ञानी होता है और पाठक कि‍तना अज्ञानी होता है यह बात आलोक तोमर अच्‍छी तरह जानते हैं। इसमें कि‍सकी सत्‍ता महान है यह भी आलोक तोमर जानते हैं। पाठक लि‍खता नहीं है वह सि‍र्फ पढता है,वह उतना भी नहीं लि‍खता जि‍तना नेट के यूजर प्रभाषजोशी पर लि‍ख रहे हैं, इसके बावजूद वह ज्ञानी और महान प्रभाष जोशी को दरवाजा दि‍खा चुका है, आज प्रभाष जोशी हैं, उनकी कलम है, उनका ज्ञान है, उनका अखबार है,उनके भक्‍त हैं, किंतु उनका 'जनसत्‍ता' बैठ गया है, उसे अब कोई नहीं पढता, प्रभाष जोशी को नि‍बटाने के लि‍ए कि‍सी नेता या अभि‍नेता की नहीं साधारण पाठक की जरूरत थी और हिंदी के साधारण पाठक ने आज 'जनसत्‍ता' को जि‍स स्‍थान पर स्‍थापि‍त कर दि‍या है ,वह पर्याप्‍त टि‍प्‍पणी है उनके कर्मशील व्‍यक्‍ति‍त्‍व पर,उनके लेखन के जादू पर। आलोक तोमर जरा गौर करें आपने क्‍या लि‍खा है
'' जिसे इंदिरा गांधी नहीं निपटा पाईं, जिसे राजीव गांधी नहीं निपटा पाए, जिसे लालकृष्ण आडवाणी नहीं निपटा पाए, उसे निपटाने में लगे हैं भाई लोग और जैसे अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू दिखाने से टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ जाती है वैसे ही ये ब्लॉग वाले प्रभाष जी की वजह से लोकप्रिय और हिट हो रहे हैं।''
दोस्‍त हिंदी के जाहि‍ल,असभ्‍य ,बेरोजगार पाठक प्रभाष जोशी की कलम के दम पर चलने वाले अखबार से कोसों दूर जा चुके हैं, यदि‍ औकात हो तो पाठकों को 'जनसत्‍ता' के पास बुलाकर देखो। दोस्‍त एकबार सोचकर देखो क्‍या कह रहे हो ? अगर प्रभाष जोशी के पास आप जैसे वकील होंगे तो जनता की अदालत में वे मुकदमा हार चुके हैं, आपको चुनौती है कि‍ आप आंकडे देकर बताएं कि‍ प्रभाष जोशी के कारण 'जनसत्‍ता' का सर्कुलेशन वि‍गत 20 सालों में क्‍या रहा है ? संपादक की औकात उसका अखबार का पाठक तय करता है,संपादक नहीं। संपादक का रूतबा पाठकों से है, पाठक कभी संपादक की औकात देखकर अखबार नहीं खरीदता बल्‍कि‍ अखबार देखकर पैसा फेंकता है, प्रभाष जोशी पर कभी हिंदी का पाठक पैसा फेंकता था, 'जनसत्‍ता' खरीदता था,उसमें अकेले उनका ही नहीं बाकी लोगों का भी योगदान था,बल्‍कि‍ यह कहें तो ज्‍यादा ठीक होगा कि‍ नौका तो अन्‍य लोग खींच रहे थे। कि‍सी भी पत्रकार की औकात कि‍तनी है यह उसका अखबार,उसका सर्कुलेशन और आमदनी से तय होता है। संपादक कि‍तना पेशेवर है और 'धारण क्षमता' रखता है यह इस बात से तय होता है कि‍ आखि‍रकार अखबार को पेशेवर (तकनीकी,संपादकीय,प्रबंधन, आमदनी आदि‍) रूप देने में संपादक ने कि‍तनी मेहनत की है इससे उसकी संपादकीय औकात का पता चलता है, आलोक तोमर बताएं क्‍या 'जनसत्‍ता' ने समग्रता में पेशेवर तौर पर तरक्‍की की है ? यदि‍ तरक्‍की नहीं की है तो क्‍यों नहीं की है ? क्‍या प्रभाष जोशी इस संदर्भ में जि‍म्‍मेदार हैं या नहीं ? आलोक तोमर नेट बेकार की चीज नहीं है। यह सबसे प्रभावशाली संचार का माध्‍यम है।
आलोक तोमर ने लि‍खा है ''अनपढ़ मित्रों, आपकी समझ में ये नहीं आता।'' काश वे ऐसा न कहते,प्रभाषजी पर बहस करने वाला मैं भी हूं और दोस्‍त कि‍तना पढा हूं,आप अच्‍छी तरह जानते हैं। बाकी लोग भी शि‍क्षि‍त हैं जो बहस में लि‍खते रहे हैं। इसमें अनेक तो आलोक तोमर से हजार गुना ज्‍यादा शि‍क्षि‍त हैं। आलोक तोमर ने लि‍खा है ''ये वे लोग हैं जो लगभग बेरोजगार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं है क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध साक्षरों की संख्या बहुत है।''
दोस्‍त नेट का समाज नि‍रक्षरों का समाज नहीं है बल्‍कि‍ यह कहें तो ज्‍यादा बेहतर होगा नेट पर आज दुनि‍या के अधि‍कांश ज्ञानी और शि‍‍क्षि‍त लोग लि‍‍ख रहे हैं, भारत के सभी श्रेष्‍ठ पत्रकार लि‍ख रहे हैं। दूसरी बात यह कि‍ बेरोजगार होना गाली नहीं है। मैं कम से रोजगार वाला हूं और एक प्रोफेसर की पगार जानते हैं प्रभाष जोशी की पगार से ज्‍यादा होती है। मुझे पगार पढाने ,शोध करने,कराने के साथ बेहूदों पर अंकुश लगाने के लि‍ए,जनता में ज्ञान प्रसार करने के लि‍ए मि‍लती है। मेरे जैसे और भी कई लोग हैं जि‍न्‍होंने प्रभाष जोशी पर लि‍खा है।
आलोक तोमर आपको खुश होना चाहि‍ए कि‍ बेरोजगार लडके बतर्ज आपके पैसा खर्च करके नेट पत्रकारि‍ता कर रहे हैं,बगैर कि‍सी सेठ की गुलामी कि‍ए पत्रकारि‍ता कर रहे हैं, इन बेरोजगार नौजवानों का लेखन कुंठा नहीं है। कुंठा की इन्‍हें जरूरत नहीं है क्‍योंकि‍ ये लोग जैसा सोचते हैं वैसा ही लि‍खते हैं, हमें ऐसे ही न्रि‍र्भय युवाओं की फौज चाहि‍ए। पत्रकारि‍ता अथवा लेखन कि‍सी को खैरात में नहीं मि‍लता। पत्रकारि‍ता कि‍सी प्रति‍ष्‍ठानी प्रेस में काम करने मात्र से नहीं आती यदि‍ ऐसा होता तो हि‍न्‍दी की समूची साहि‍त्‍य परंपरा बेकार हो जाएगी। आलोक तोमर ने लि‍खा है
''आपने पंद्रह सोलह हजार का कंप्यूटर खरीद लिया, आपको हिंदी टाइपिंग आती हैं, आपने पांच सात हजार रुपए खर्च करके एक वेबसाइट भी बना ली मगर इससे आपको यह हक नहीं मिल जाता कि भारतीय पत्रकारिता के सबसे बड़े जीवित गौरव प्रभाष जी पर सवाल उठाए और इतनी पतित भाषा में उठाए।'' अगर इन नौजवानों ने अपनी आजीवि‍का नेट पत्रकारि‍ता के जरि‍ए और अपने ही पैसे से पूरा सि‍स्‍टम बनाकर आरंभ कर दी है तो इसमें बुरा क्‍या है ? जि‍स तरह कि‍सी सेठ की नौकरी करना बुरा नहीं है,वैसे ही नेट पर अपने दम पर पत्रकारि‍ता करना भी बुरा नहीं है। प्रभाष जोशी 'जीवि‍त गौरव' हैं, बने रहें, सि‍र्फ एक ही दि‍क्‍कत है वे अपना गौरव अपने ही हाथों नष्‍ट कर रहे हैं, इतना खराब साक्षात्‍कार देने के लि‍ए उन्‍हें 'बेरोजगार', 'कुण्‍ठि‍त' 'अनपढ' युवाओं ने तो प्रेरि‍त नहीं कि‍या था, 'जनसत्‍ता' यदि‍ पाठक खो चुका है तो उसमें भी इन नौजवानों का कम से कम कोई हाथ नहीं है,आलोक जी सर्वे करा लें आपके 'जीवि‍त गौरव' को प्रति‍ सप्‍ताह कि‍तने पाठक पढते हैं और इन बेरोजगार,अनपढ जाहि‍ल लोगों को कि‍तने नेट पाठक पढते हैं, ध्‍यान रहे ये बेरोजगार युवा और प्रभाष जोशी के बीच की जंग है और इसमें प्रभाष जोशी का भी वही हश्र होगा जो महाभारत में भीष्‍म पि‍तामह का हुआ था, वे अर्जुन के हाथों मारे गए थे और प्रभाष जोशी भी इन बेरोजगार नौजवानों के तर्कों से ही मरेंगे। आलोक तोमर आप अपनी असल भाव भंगि‍मा में मैदान में पूरे गुरूदेव के साथ आएं और जबाव दें कि‍ आखि‍रकार 'जनसत्‍ता' का पतन क्‍यों हुआ ? चाहें तो आप यह काम गाली गलौज की भाषा में भी कर सकते हैं यदि‍ कि‍सी अन्‍य अकादमि‍क मसले पर बहस करने का गुरू सहि‍त मन है तो बंदा अपने को इसके लि‍ए पेश करता है और चाहेगा कि‍ आप वि‍षय चुनें और वही वि‍षय चुनें जो आपके गुरूदेव का सबसे प्रि‍य वि‍षय हो, (कम से कम क्रि‍केट नहीं) जि‍स पर वे जीभर कर लि‍ख सकें, उन्‍हें नेट के पन्‍नों पर जगह का अभाव महसूस नहीं होगा। शर्त्‍त एक ही है आप बहस के नि‍यम नहीं बनाएंगे, बहस स्‍वतंत्र होगी,ये बातें इसलि‍ए लि‍खनी पड़ रही हैं कि‍ एक पत्रकार अपने पाजामे के बाहर चला गया है। उसे पाजामा पहनाना हमारा काम है , आलोक तोमर को खुला नि‍मंत्रण है वे अपने गुरू के साथ नेट पर आएं और सबसे पहले 'जनसत्‍ता' की पतनगाथा के पन्‍ने खोलें,हम देखना चाहते हैं कि‍ दूसरों की औकात बताने वाले की स्‍वयं कि‍तनी औकात है,उनके गुरूदेव का भी 'जनसत्‍ता' के पतन पर पूरा आख्‍यान पढना चाहेंगे। आलोक तोमर यदि‍ 'जनसत्‍ता' का सच्‍चा आख्‍यान बताते हैं तो कम से कम प्रभाष जोशी की एक महान पत्रकार के रूप में क्‍या स्‍थि‍ति‍ रह गयी है,इसका खुलासा जरूर हो जाएगा। आलोक तोमर जी यदि‍ असुवि‍धा न हो तो प्रभाष जी के तथाकथि‍त महान नि‍बंधों पर ही हम लोग गंभीर मंथन कर लें और उनके नजरि‍ए का पोस्‍टमार्टम कर डालें। तय मानो दोस्‍त आपकी श्रद्धा उनकी रक्षा नहीं कर पाएगी, उन्‍हें बेकार नौजवानों के हाथों पराजि‍त होना ही है। अभी भी मौका है दंभ त्‍याग दें, दूसरों का अपमान करना बंद कर दें,अनपढ को अनपढ कहना गाली है , शि‍क्षि‍त आलोक तोमर को यह शोभा नहीं देता। कोई सभ्‍य पत्रकार दंभ,औकात, बेरोजगारों के प्रति‍ घृणा,स्‍वाभि‍मानी युवाओं को प्रताडि‍त करने वाली भाषा नही लि‍ख सकता,यह तो संस्‍कृति‍वि‍हीन होने का संकेत है। यह प्रेस के लि‍ए शर्मिंदगी की बात है कि‍ कि‍सी हि‍न्‍दी पत्रकार ने इतनी घटि‍या भाषा का अपने गुरू की हि‍मायत में इस्‍तेमाल कि‍या है।
आलोक तोमर ने लि‍खा है '' अगर गालियों की भाषा मैंने या मेरे जैसे प्रभाष जी के प्रशंसकों ने लिखनी शुरू कर दी तो भाई साहब आपकी बोलती बंद हो जाएगी और आपका कंप्यूटर जाम हो जाएगा। भाइयो, बात करो मगर औकात में रह कर बात करो। बात करने के लिए जरूरी मुद्दे बहुत हैं।'' इंतजार है आपकी 'शानदार' पत्रकारि‍ता के करतब देखने का। प्‍लीज आप जरूर आएं और कि‍सी मुद्दे के साथ आएं, कि‍सकी कि‍तनी औकात है और कि‍सी कलम में दम है यह तो नेट के पाठक ही तय करेंगे।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

प्रभाष जोशी का कचरा इति‍हास ज्ञान

प्रभाष जोशी के पूरे साक्षात्‍कार पर एक बात रेखांकि‍त करना बेहद जरूरी है इस साक्षात्‍कार में उन्‍होंने अपना जो इति‍हास ज्ञान प्रदर्शित कि‍या है, उसका इति‍हास के तथ्‍यों से कोई लेना देना नहीं है बल्‍कि‍ यह इति‍हास के बारे में गलतबयानी है। इस गलतबयानी की जड़ है इति‍हास की गलत समझ। कुछ नमूने दखें और गंभीरता के साथ वि‍चार करें कि‍ प्रभाष जोशी कि‍तना सच बोल रहे हैं।
प्रभाष जी ने कहा है ''मारिया मिश्रा नाम की एक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की महिला हैं, उन्होंने एक अच्छी किताब लिखी है India since the Rebellion: Vishnu's Crowded Temple. उसमें उन्होने कहा है कि जवाहर लाल नेहरू तो आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल थे. क्योंकि उन्होंने उन्हीं चीजों को कंटिन्यू किया जो कि गवर्नर जनरल करते थे।''
क्‍या यह बयान तथ्‍यों से पुष्‍ट होता है ? क्‍या‍ भारत की आज जो आत्‍मनि‍र्भर देश की छवि‍ है वह क्‍या अंग्रेजों के मार्ग पर चलने के कारण संभव थी ? सार्वजनि‍क क्षेत्र का जो वि‍शाल तंत्र खड़ा कि‍या गया वैसा क्‍या अंग्रेजों की नीति‍यों पर चलते हुए संभव था ? आज स्‍थि‍ति‍ यह है अमेरि‍का को आर्थि‍क मंदी के संकट से नि‍कालने में भारत प्रमुख आर्थि‍क मददगार है। अमरीकी बैंकों के चीन के बाद सबसे ज्‍यादा बॉण्‍ड भारत ने खरीदे हैं । आज ब्रि‍टेन अपनी भी मदद करने की स्‍थि‍ति‍ में नहीं हैं। सार्वजनि‍क क्षेत्र में नेहरू ने ऐसे समय पर नि‍वेश शुरू कि‍या जब भारत में कोई इसके पक्ष में नहीं था,सि‍वाय पूंजीपति‍यों के। नेहरू ने बुनि‍यादी उद्योगों का नि‍र्माण कि‍या और आज हम उसी फि‍क्‍स डि‍पोजि‍ट को बेच बेचकर देश चला रहे हैं। अर्थशास्‍त्र की भाषा में इसे वि‍नि‍वेश कहते हैं। जबकि‍ यह सार्वजनि‍क संपत्‍ति‍ की खुली लूट है। भारत के लोकतंत्र में हजार कमि‍यां नि‍काल सकते हैं किंतु यह अपने आपमें यूनि‍क है, इसका संवि‍धान वि‍शि‍ष्‍ट है। यह ब्रि‍‍टेन के संवि‍धान की नकल नहीं है।
प्रभाष जी ने कहा है ''कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ अंग्रेजों की मुखबिरी की थी।'' यह वक्‍तव्‍य एकसि‍रे से आधारहीन है,प्रभाष जोशी को चुनौती है कि‍ वे उन कम्‍युनि‍स्‍टों के नाम बताएं जो मुखबि‍री करते थे,कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी के सदस्‍य स्‍वाधीनता संग्राम की अग्रणी कतारों में थे, खासकर 1940- 41 के बाद कांग्रेस संघर्ष कर रही थी या कम्‍युनि‍स्‍ट संघर्ष कर रहे थे ? प्रभाष जी चाहें तो अपने प्रि‍य धर्मनि‍रपेक्ष इति‍हासकारों के लेखन पर एक एक नजर डालकर देख लें, ज्‍यादा न सही यशपाल की कि‍ताबें ही पढ़ लें, कम से कम यशपाल उनसे कम देशभक्‍त नहीं थे, लेखक भी उनसे कमजोर नहीं थे,कम से कम जसवंत सिंह की कि‍ताब पढ़ने से ज्‍यादा आनंददायक पाठ है उनका।
प्रभाष जोशी के अनुसार ''जब अंग्रेज यहां आकर औद्योगिकरण कर रहे थे तो मार्क्स ने कहा कि वो भारत की उन्नति कर रहे हैं।'' भारत में अंग्रेजों औद्योगि‍कीकरण नहीं कि‍या बल्‍कि‍ नि‍रूद्योगीकरण कि‍या,भारत के कच्‍चे माल के दोहन से औद्योगि‍क क्रांति‍ ब्रि‍टेन में हो रही थी, भारत के वि‍कास के जो आंकड़े प्रभाष जी ने दि‍ए हैं, वे भी सही नहीं हैं। अंग्रेजों की नीति‍यों के चलते भारत के कि‍सान की कृषि‍दासता बढ़ी, पामाली बढ़ी,अनगि‍नत अकाल पढ़े। इन सभी पहलुओं पर मार्क्‍सवादि‍यों ने ही सबसे पहले रोशनी डाली थी, गांधीजी ने नहीं। प्रभाष जोशी जानते हैं कि‍ दादाभाई नौरोजी पहले बड़े देशभक्‍त थे जि‍न्‍होंने अंग्रेजों की कि‍सान वि‍रोधी नीति‍यों पर जमकर लि‍खा था, उनके लेखन में आए आंकड़े भी प्रभाष जोशी के मत की पुष्‍टि‍ नहीं करते। जोशी जी जान लें अंग्रेजों के आने के बाद सन् 1770 में पहला अकाल पड़ा था जि‍सने लगभग एक करोड लोगों की जान ले ली,तब से अकाल,हैजा,प्‍लेग,संक्रामक बीमारि‍यों के हमले आम बात हो गए। कार्ल मार्क्‍स पहले वि‍चारकों में थे जि‍नके द्वारा पहलीबार ब्रि‍टेन के साम्राज्‍य का भयावह चि‍त्रण सामने आया था, उनके सारे लेख अब हिंदी में भी हैं। मार्क्‍स ही पहले व्‍यक्‍ति‍ थे जि‍न्‍होने यह रेखांकि‍त कि‍या था कि‍ आखि‍रकार भारत में अंग्रेज क्‍यों आने में सफल रहे।
( यह टि‍प्‍पणी 'deshkal.com पर प्रकाशि‍त प्रभाष जोशी के वि‍वादास्‍पद साक्षात्‍कार पर लि‍खी गयी )

सोमवार, 24 अगस्त 2009

प्रभाष जोशी पर बहस व्‍यक्‍ति‍गत नहीं पेशेवर है

सि‍द्धार्थ जी ,लगता है आप समझदार व्‍यक्‍ति‍ हैं,लि‍खा हुआ पढ़ लेते हैं,मेरा सारा लि‍खा आपके सामने है आप कृपया बताएं कि‍ कहां पर गाली-गलौज की भाषा का इस्‍तेमाल कि‍या गया है। क्‍या आलोचना लि‍खना गाली है ? यदि‍ आलोचना लि‍खना गाली है तो फि‍र आलोचना वि‍धा को क्‍या कहेंगे ? लि‍खा हुआ और यथार्थ की कसौटी पर परखा हुआ छद्म नहीं वास्‍तवि‍क होता है,छद्म लेखन के लि‍ए जि‍न उपायो की जरूरत होती है उनमें से एक है रूपकों के जरि‍ए अनेकार्थी बातें करना और यह काम प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्‍कार में खूब कि‍या है ,सती के प्रसंग में।
कि‍सी के लि‍खे पर लि‍खना,आलोचनात्‍मक नजरि‍ए से लि‍खना गाली-गलौज नहीं कहलाता,यह स्‍वस्‍थ समाज का लक्षण है, आंखें बंद करके रखना,जो कहा गया है उसे अनालोचनात्‍मक ढ़ंग से मान लेना आधुनि‍क होना नहीं है, आधुनि‍क व्‍यक्‍ि‍त वह है जो असहमत होता है,आप जब असहमत होने वालों को गलत ढ़ंग से व्‍याख्‍यायि‍त करते हैं तो हमें दि‍क्‍कत होगी ,हम चाहेंगे आप हमसे तर्क के साथ असहमति‍ व्‍यक्‍त करें।नि‍ष्‍कर्ष और जजमेंट सुनाकर फैसला न दें।

भाई रणवीर जी, इंटरनेट पर जाओगे तो कुछ भी हो सकता है,मैं बहुत ही भरोसे कह रहा हूं, ‘मोहल्‍ला लाइव’ पर आयी प्रति‍क्रि‍याओं को महज प्रति‍क्रि‍या के रूप में लें,संपादकों के नाम पत्र तो इससे भी खराब भाषा में आते हैं और संपादकजी उन्‍हें पढते भी हैं,यह बात दीगर है कि‍ छापते नहीं हैं।
‘नि‍र्मम कुटाई’ को शाब्‍दि‍क अर्थ में ग्रहण न करें ,उसकी मूल भावना को पकडने की कोशि‍श करें ,जैसे प्रभाष जी से सती के ‘सत्‍व’ और ‘नि‍जत्‍व’ की मौलि‍क खोज की है, वे जरा प्रमाण दें सती के ‘सत्‍व’ के ? उनकी सती का ‘सत्‍व’ सावि‍त्री तक ही क्‍यों रूका हुआ है ? वह वर्तमान काल में क्‍यों नहीं आता ? मैं दावे के साथ कह सकता हूं यदि‍ वे यही बात हाल के दि‍नों में हुई कि‍सी सती के बारे में बताएं तो उनकी सारी पोल स्‍वत: खुल जाएगी। कृपया रूपकंवर के ‘सत्‍व’ का रहस्‍य बताएं ? क्‍या राजस्‍थान में सती के मंदि‍र स्‍त्री के ‘सत्‍व’ और ‘नि‍जत्‍व’ के प्रदर्शन के लि‍ए बने हैं ? बलि‍हारी है,कृपया सतीमंदि‍रों के सती को ‘सत्‍व’ में रूपान्‍तरि‍त करके देखें क्‍या अर्थ नि‍कलता है ? जरा उस बेलगाम गद्य की बानगी ‘नेट’ पाठक भी देखें और ‘सत्‍व’ का आनंद लें ? दूसरी बात यह कि‍ मेरा परि‍चय और पता जान लें ,वेब पर नाम के साथ आसानी से मि‍ल जाएगा।
चार्वाक सत्‍य जी, आप काहे को नाराज हो रहे हैं, आलोक तोमर के गद्य में व्‍यंग्‍य होता है और सत्‍य भी। आलोक जी का यह कथन प्रभाष जोशी के लि‍ए काफी है,आलोक तोमर ने लि‍खा है ”लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए।” इससे बेहतर प्रशंसा नेट लेखकों की नहीं हो सकती,रही बात प्रभाषजी के ‘महानायक’ होने की तो वे ‘महानायक’ रहेंगे, उस पद का फि‍लहाल दूर-दूर तक हिंदी में कोई संपादक दावेदार नहीं है। वे अपने चर्चित साक्षात्‍कार में व्‍यक्‍त कि‍ए गए प्रति‍गामी वि‍चारों के बावजूद ‘महानायक’ रहेंगे।वे प्रेस संपादकों की परंपरा के अंति‍म ‘महानायक’ हैं, क्‍योंकि‍ यह युग ‘नायक’ और ‘महानायक’ के अंत के साथ ही शुरू हुआ है।
आलोक तोमर ने लि‍खा है ”प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को लेकर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई।” यहां ‘ झाड़’ शब्‍द पर ध्‍यान दें। प्रभाष जोशी अपने सबसे प्रि‍य पत्रकार को क्‍या लगा रहे हैं ? ‘झाड़’, हम लोगों से संवाद नहीं करने का मूल सूत्र यहां मि‍ल गया है,काश हम भी उनके चेले होते अथवा सहकर्मी होते तो कम से कम जो सौभाग्‍य बंधुवर आलोक तोमर को मि‍ला है वह हमें भी नसीब होता। आलोक तोमर की बाकी बातों पर कुछ नहीं कहना है क्‍योंकि‍ उन्‍हें अपनी बात अपने लहजे में कहने का उन्‍हें पूरा हक है ,और ‘अल्‍लू पल्‍लू’ कोई गाली नहीं है,वैसे ही बेकार का शब्‍द है। दोस्‍त अगर गाली भी दे तो हंसकर सुन लेना चाहि‍ए ,आलोक तोमर हमारे अजीज दोस्‍त रहे हैं और आज भी हैं।
चार्वाक सत्‍य जी,’जनसत्‍ता’ को बर्बाद करने में मालि‍कों की बड़ी भूमि‍का है,संपादक तो नि‍मि‍त्‍त मात्र है। आप प्रभाष जी को कहां रखते हैं यह समस्‍या नहीं है, वे जहां हैं वहीं रहेंगे। कि‍सी पत्रकार को प्रबंधन क्षमता के आधार पर नहीं संपादकीय क्षमता के आधार पर देखना चाहि‍ए। प्रभाष जोशी नि‍श्‍चि‍त रूप से अद्वि‍तीय संपादक थे। यह स्‍थान उन्‍होंने लेखन के बल पर बनाया है,भूल और गलति‍यों के आधार पर नहीं,प्रत्‍येक लेखक से भूलें होती हैं,दृष्‍टि‍कोणगत भूलें भी होती हैं,’परफेक्‍शन’ की कसौटी पर प्रभाषजी को परखने की जरूरत नहीं है,वे उन बीमारि‍यों के भी शि‍कार रहे हैं जो प्रति‍ष्‍ठानी प्रेस के संपादक में होती हैं। ये बीमारि‍यां प्रति‍ष्‍ठानी प्रेस के संपादक में कहीं पर भी हो सकती हैं। ‘एक्‍सप्रेस ग्रुप’ की हालत को समग्रता में देखें, कि‍स तरह वह धीरे धीरे मार्केट में कमजोर होता चला गया है,’जनसत्‍ता’ इस प्रक्रि‍या में तुलनात्‍मक तौर पर ज्‍यादा बर्बाद हुआ है,यह दुख की बात नहीं है, आप अखबार को यदि‍ ‘वि‍चार’ साहि‍त्‍य का पर्याय बना देंगे तो यह दुर्गत कि‍सी के भी साथ हो सकती है, खबरों के युग में,नई तकनीक और नई प्रबंधन कला के युग में ‘एक्‍सप्रेस’ ग्रुप के मालि‍क अपने को समय के अनुरूप तेज गति‍ से बदल ही नहीं पाए और एक्‍सप्रेस ग्रुप को समग्रता में संकट से गुजरना पड़ रहा है। ‘जनसत्‍ता’ अखबार बेखबर लोगों का अखबार जब से बनना शुरू हुआ तब से उसका प्रेस जगत में दीपक लुप लुप करने लगा। यह दुर्दशा प्रभाषजी के संपादनकाल से ही आरंभ हो गयी थी। एक जमाना ‘जनसत्‍ता’ हि‍न्‍दी के जागरूक पाठकों का ही नहीं हि‍न्‍दी अनि‍वार्य अखबार था,बाद में कि‍सी को पता ही नहीं है कि‍ वह कहां है, क्‍या छाप रहा है,पाठकों से जनसत्‍ता का अलगाव पैदा क्‍यों हुआ यह अलग बहस का वि‍षय है।
चार्वाक सत्‍य जी, मुश्‍कि‍ल यह है प्रभाष जी सोचते हैं वे ‘महान’ कार्य कर रहे थे , ‘महान’ लेखन कर रहे थे , वे जो भी कुछ लि‍खते हैं ‘महान’ लि‍खते हैं ,और इस ‘महानता’ के बोझ ने ही ‘जनसत्‍ता’ अखबार के बारह बजा दि‍ए। संपादक के नाते और सलाहकार संपादक के नाते प्रभाष जोशी अपनी भूमि‍का नि‍भाने में एकदम असफल रहे हैं, ‘जनसत्‍ता’ की दुर्दशा के कारणों में से उनका संपादकीय रवैयाया गैर पेशेवर था, वे प्रधान कारण थे। वे यह मानते ही नहीं थे, कि‍ अखबार के लि‍ए नयी तकनीक,नयी प्रबंधन शैली,नयी मार्केटिंग आदि‍ की जरूरत होती है, वे तो सि‍र्फ ‘वि‍चार’ और ‘अपने नाम’ पर अखबार बेचना चाहते थे और परि‍णाम सामने हैं। उनके नाम से अखबार पसर चुका है, कोई उसे खरीदने को तैयार नहीं है। आज ‘जनसत्‍ता’ को कम से कम छापा जाता है और उससे भी कम बि‍क्री होती है।अधि‍कांश शहरों में तो वह स्‍टाल पर भी नजर नहीं आता,यह स्‍थि‍ति‍ दि‍ल्‍ली की भी है। ‘जनसत्‍ता’ का पराभव ठोस सच्‍चाई है आभासी अगर कुछ है तो प्रभाष जोशी का लेखन। आलोक तोमर ने सही बात कही है उसे गंभीरता से लेना चाहि‍ए,आलोक तोमर ने प्रभाष जी के बारे में सही लि‍खा है वह,’ एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं ।’ एक संपादक के ‘आत्‍मघाती सरोकार’ उसके व्‍यक्‍ि‍तत्‍व,पेशे और पाठक सबको नष्‍ट करते हैं। ‘जनसत्‍ता’ कमाए यह चि‍न्‍ता प्रभाषजी की कभी नहीं थी,यह बात दीगर थी कि‍ जनसत्‍ता के बहाने उन्‍होंने अपना हि‍साब-कि‍ताब ठीक जरूर रखा। उनके गैर पेशेवर रवैयये के कारण ही बेहतरीन पत्रकारों को जनसत्‍ता से अलग होना पड़ा।
चार्वाक सत्‍य जी,थोड़ा गंभीरता के साथ इस ‘डि‍स इनफारर्मेशन’ अभि‍यान यानी ‘सत्‍य का अपहरण कांड’ पर भी ध्‍यान दें,
प्रभाष जोशी के अभी पुराने साक्षात्‍कार की स्‍याही सूखी भी नहीं थी कि‍ उन्‍होंने अपने ‘ज्ञान’ और ‘सत्‍यप्रेम’ का परि‍चय फि‍र से दे दि‍या है। जो लोग उनके प्रति‍ श्रद्धा में बि‍छे हुए हैं उन्‍हें गंभीरता के साथ ‘जनसत्‍ता’ (23 अगस्‍त 2009) के ‘कागद कारे’ स्‍तम्‍भ में प्रकाशि‍त ‘सड़ी गॉठ का खुलना’ शीर्षक टि‍प्‍पणी पर सोचना चाहि‍ए। यह टि‍प्‍पणी एक महान सम्‍पादक के सत्‍य- अपहरण की शानदार मि‍साल है।
प्रभाष जोशी ने अपने मि‍जाज और नजरि‍ए के अनुसार चाटुकारि‍ता की शैली में जसवंत सिंह प्रकरण पर जसवंत सिंह के बारे में लि‍खा है ,” अपने काम,अपनी नि‍ष्‍ठा और अपनी राय पर इस तरह टि‍के रहकर जसवंत सिंह ने अपनी चारि‍त्रि‍क शक्‍ति‍ और प्रमाणि‍कता को ही सि‍द्ध नहीं कि‍या है, अपने संवि‍धान में से दि‍ए गए अभि‍व्‍यक्‍ति‍ के मौलि‍क अधि‍कार को भी बेहद पुष्‍ट कि‍या है।” आश्‍चर्यजनक बात यह है कि‍ प्रभाषजी एक ऐसे व्‍यक्‍ति‍ के बारे में यह सब लि‍ख रहे हैं जो खुल्‍लमखुल्‍ला भारत के संवि‍धान और संप्रभुता को गि‍रवी रखकर कंधहार कांड का मुखि‍या था,इस व्‍यक्‍ति‍ को मौलि‍क अधि‍कार का इस्‍तेमाल करने का अधि‍कार देने का अर्थ है हि‍टलर की टीम के गोयबल्‍स को बोलने का अधि‍कार देना , सवाल यह है गोयबल्‍स यदि‍ हि‍टलर से अपने को अलग कर लेगा तो क्‍या उसके इति‍हास में दर्ज अपराध खत्‍म हो जाएंगे ? प्रभाषजी जब जसवंत सिंह की पीठ थपथपा रहे हैं तो प्रकारान्‍तर से जसवंत सिंह के ठोस राजनीति‍क कुकर्मों ,राष्ट्रद्रोह और सत्‍य को भी छि‍पा रहे हैं, क्‍या भाजपा और शि‍वसैनि‍कों के द्वारा कि‍ए गए सांस्‍कृति‍क हमले और अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की आजादी पर किए गए हमलों का जसवंत सिंह द्वारा कि‍या गया समर्थन हम भूल सकते हैं ? क्‍या बाबरी मस्‍जि‍द वि‍ध्‍वंस और दंगों में संघ और उनके संगठनों की भूमि‍का और उसके प्रति‍ जसवंत सिंह का समर्थन भूल सकते हैं ? प्रभाषजी जब संघ के बारे में,कांग्रेस के बारे में लि‍खते हैं उन्‍हें अतीत की तमाम सूचनाएं याद आती हैं,घटनाएं याद आती हैं,लेकि‍न जसवंत सिंह प्रकरण में उन्‍हें जसवंत सिंह की कोई भी पि‍छली घटना याद नहीं आयी, इसी को कहते हैं सत्‍य का अपहरण और ‘डि‍स- इनफॉरर्मेशन’ .
दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि‍ प्रभाष जी को इति‍हास और राजनीति‍क दलों के अन्‍तस्‍संबंध पर वि‍चार करते समय यह भी धन रखना होगा कि‍ कांग्रेस,कम्‍युनि‍स्‍ट, सोशलि‍स्‍ट आदि‍ सभी दलों के मानने वाले इति‍हासकारों में अपनी ही वि‍चारधारा और नजरि‍ए के लोगों के बीच मतभेद रहे हैं, इति‍हास को लेकर मतभि‍न्‍नता के आधार पर कभी कांग्रेस और कम्‍युनि‍स्‍टों ने अपने सदस्‍य इति‍हासकारों के खि‍लाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की।
प्रभाष जी यदि‍ जसवंत सिंह को अपनी एक सडी गॉठ खोलने के लि‍ए यदि‍ साढे छह सौ पेज चाहि‍ए तो आपको जसवंत सिंह के राजनीति‍क सत्‍य का उजागर करने के अभी कि‍तने पन्‍ने और चाहि‍ए ? प्रभाषजी जैसा महान पत्रकार यह वि‍श्‍वास कर रहा है कि‍ जसवंत सिंह को कि‍ताब लि‍खने के कारण नि‍काला गया,सच यह है कि‍ राजस्‍थान के अधि‍कांश भाजपा वि‍धायक और उनकर नेत्री चाहती थीं कि‍ पहले अनुशासनहीनता के लि‍ए जसवंत सिंह को पार्टी से नि‍कालो, वरना वे सब चले जाते,भाजपा ने हानि‍ लाभ का गणि‍त बि‍ठाते हुए जसवंत सिंह को नि‍कालने में पार्टी का कम नुकसान देखा, उनके नि‍ष्‍कासन में अन्‍य कि‍सी कारक की खोज करना मूर्खता ही है। इससे भी बड़ी बात यह है कि‍ इति‍हास के प्रति‍ प्रभाषजी का कि‍स्‍सा गो का रवैयया रहा है। भक्‍तों से जबाव की अपेक्षा है।
शंबूक जी, बहस को हल्‍का बनाने से क्‍या होगा ? आप उन्‍हें नायक,महानायक नहीं मानते ठीक है, आपका लोकतांत्रि‍क हक है और लोकतांत्रि‍क वि‍वेक है कि‍ आप उन्‍हें ही क्‍यों कि‍सी को कुछ भी मानें,आप धन्‍य हैं,हमें धि‍क्‍कार है, आपका मूल्‍यांकन सही ,मामला अगर इतने से ही शांत हो जाए और जोशी जी बोलें तो समझें ठीक है, वरना तो वि‍भारानी की बात ही ठीक है ‘हम सब रहम करें’,
अव्‍छी नेट पत्रकारि‍ता को खराब करने से क्‍या लाभ ? आप जि‍स तरह के उदाहरण दे रहे हैं और हल्‍की बातें कहकर सारे मामले को दूसरी दि‍शा देना चाहते हैं वह तो प्रभाष जोशी के लि‍ए अच्‍छा होगा और उनके भक्‍तों की इस बहस में व्‍यक्‍त धारणाओं की पुष्‍टि‍ ही होगी।आप कम से कम अपना नहीं तो अपने कहे के प्रभाव का तो ख्‍याल रखें,ऐसा करते रहेंगे तो इससे साख नहीं बनेगी, इसे उपदेश न समझें,यह सुझाव भी नहीं है, यह महज एक राय है। इसे मानें या न मानें आपके ऊपर है। सबसे अच्‍छा तो यही होता कि‍ आपको लोग वास्‍तव में नामों से सामने अपनी बातें रखते, खुलकर प्‍यार से बातें करते, नाम बदलकर लि‍खने से बात का वजन खत्‍म हो जाता है,मुखौटों पर लोग वैसे भी वि‍श्‍वास नहीं करते। आप अच्‍छे लोग हैं और लोकतांत्रि‍क लय में रहते हैं, हमारे लि‍ए तो यही काफी है अब यह आपके ऊपर है अपना गांव कि‍से सौंपें ,अपना काम कैसे करें,कैसे व्‍यक्‍त करें,सही नाम से या छद्म नाम से ,यह तो आपके ऊपर है। आप अपने दोस्‍त और दुश्‍मन को नहीं पहचानेंगे तो फि‍र हम बहस क्‍यों कर रहे हैं ?मैं फि‍र दोहरा रहा हूं, प्रभाष जोशी हमारे वर्ग शत्रु नहीं हैं। हम लोग लि‍खते हैं,घृणा का व्‍यापार नहीं करते। जो लेखक,पाठक, यूजर, राजनीति‍ज्ञ,संस्‍कृति‍कर्मी घृणा का व्‍यापार करता है उसका समाज में कोई स्‍थान नहीं है।हमें अभी तक यही लगा है आप अच्‍छे लोग हैं,लोकतंत्र में वि‍श्‍वास करते हैं,घृणा तंत्र में नहीं। हमारे मतभेद,वि‍रोध,असहमति‍ आप जो भी कुछ कहें वह प्रभाष जोशी के लि‍खे के साथ हैं, उनके व्‍यक्‍ति‍गत जीवन से हमें क्‍या लेना-देना जब तक वह सामाजि‍क नहीं होता.
( mohalla Live पर वि‍भारानी की टि‍प्‍पणी 'प्रभाष जी की मति भ्रष्‍ट हो गयी है, आप सब रहम करें' को वि‍स्‍तृत अध्‍ययन के लि‍ए देखें ,उपरोक्‍त वि‍चार वहां पर ही व्‍यक्‍त कि‍ए गए थे )

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

प्रभाष जोशी: हम सम्‍मान सहि‍त अपमानि‍त हैं

प्रभाष जी, काश आपने यह सब न कहा होता, तो हिंदी प्रेस और पत्रकार जगत का बड़ा उपकार करते। आपका उपरोक्‍त वि‍वेचन पुराने कि‍स्‍म के अप्रासंगि‍क पंडि‍तों की तरह है। वि‍चार, नज़रि‍या और तथ्‍य इन तीनों दृष्‍टियों से आपने ग़लत कहा है। क्‍या इस साक्षात्‍कार को प्रभाष जोशी के असली वि‍चार मानें? अथवा तरन्‍नुम में कहे वि‍चार मानें? मज़े के लि‍ए कहे वि‍चार मानें?

प्रभाष जी आप व्‍यक्‍ि‍त की पहचान को जाति‍, धर्म, कौशल आदि‍ से क्‍यों जोड़ कर देख रहे हैं? क्‍या आपको मनुष्‍य की पहचान दि‍खाई नहीं देती? देती है तो फि‍र बोलते समय या लि‍खते समय उसे भूल क्‍यों जाते हैं? कठोरतम भाषा में कहूं तो आपके वि‍चार एकसि‍रे से प्रति‍क्रि‍यावादी ही नहीं बल्‍कि‍ मानवतावि‍रोधी भी हैं। चीज़ों, लोगों को देखने की जो पद्धति‍ आपने अपनायी वह प्रति‍गामी है। आपके साक्षात्‍कार पर मुझे एक चुटकुला याद आ रहा है। हरि‍याणा के जाट के बारे में। अब तो यह आप पर भी लागू होता है। चुटकुला कुछ इस प्रकार है – एक बार एक जाट से एक व्‍यक्‍ि‍त ने पूछा, तू पहले जाट है या आदमी है? जाट बोला जाट हूं।

प्रभाषजी वही दशा आपकी भी हुई है। आपके अंदर का बुद्धि‍जीवी मनुष्‍य अचानक ब्राह्मण में बदल जाएगा, यह तो कायाकल्‍प ही कहा जाएगा। गद्य अच्‍छा लि‍खते हैं, अच्‍छा बोलते हैं, नाम भी है, किंतु इससे कोई महान नहीं बनता, महान बनता है नज़रि‍ये के कारण। आपने जि‍स नज़रिये की वकालत की है, उसे रेनेसां के बुद्धि‍जीवी 19वीं सदी में दफन कर चुके हैं। हिंदी में प्रत्‍येक बूढ़े को अंत में अतीत ही शांति‍ देता है और वह जब अतीत में जाता है तो धुर अतीत में जाकर ही पूर्ण शांति‍ पाता है। काश, हम बूढ़े न होते!
प्रभाष जी के साक्षात्‍कार के अंश छापकर जो तीखी प्रति‍क्रि‍या आई है उसे थोड़ा और गंभीर दायरों में ले जाने की जरूरत है। प्रभाष जोशी के वि‍चार एक व्‍यक्‍ति‍ के वि‍चार के साथ समाज में अनेक लोगों में भी मि‍लते हैं, इस समस्‍या को हम एक फि‍नोमि‍ना के रूप में देखें और सती और जाति‍वाद के फि‍नोमि‍ना को थोड़ा व्‍यापक फलक पर रखकर देखें तो ज्‍यादा सार्थक इस्‍तक्षेप कर पाएंगे।
जाति‍वाद कैंसर है। कैंसर की प्रशंसा नहीं की जाती उससे मुक्‍ति‍ का मार्ग खोजा जाता है, वरना वह जीवन से मुक्‍त कर देता है। आप लोग प्रभाषजी पर व्‍यक्‍ति‍गत हमले करेंगे और उनकी नि‍जी जिंदगी की भूलों का पुलिंदा दि‍खाने की कोशि‍श करेंगे तो मामला फि‍र हाथ से नि‍कल जाएगा।
हि‍न्‍दी में कहावत है ‘चोर को न मारो चोर की अम्‍मा को मारो’, हमें प्रभाषजी के वि‍चारों की अम्‍मा को मारना होगा जहां से ऐसे वि‍चार अभी भी आ रहे हैं, हमें उन वैचारि‍क, दार्शनि‍क,सामाजि‍क और आर्थिक स्रोतों,उन वि‍चारधारात्‍मक आधारों को खोलना होगा जहां से सती,जाति‍प्रथा आदि‍ के समर्थन की बात कही जा रही है।
इटली के प्रसि‍द्ध मार्क्‍सवादी अन्‍तोनि‍यो ग्राम्‍शी का कहना था युद्ध के मैदान में शत्रु के कमजोर ठि‍काने पर हमला करो और वि‍चारधारात्‍मक युद्ध में शत्रु के मजबूत कि‍ले पर हमला करो। प्रभाष जोशी का मजबूत वि‍चारधारात्‍मक कि‍ला है है ‘आब्‍शेसन’।
हमें रहस्‍य खोलना चाहि‍ए कि‍ आखि‍रकार जाति‍प्रथा,सती प्रथा,स्‍त्री वि‍रोधी रूझान आते कहां से हैं ? वे कि‍स तरह के वातावरण में फलते फूलते हैं ? प्रभाषजी से भी अपील है वे इस बहस में उठे सवालों पर कि‍नाराकशी न करें। मीडि‍या का लेखक जबावदेही और सामाजि‍क जि‍म्‍मेदारी से अपना पल्‍ला नहीं झाड़ सकता।
प्रभाष जोशी का सती प्रथा का महि‍मामंडन और उसे परंपरा कहना मूलत: इन दि‍नों व्‍यापक स्‍तर पर पनप रही स्‍त्री वि‍रोधी मानसि‍कता और स्‍त्री को एक बेजान इंसान समझने वाली वि‍चारधारा की देन है। देखि‍ए यह संभव नहीं है आप सचि‍न का समर्थन करें,क्रि‍केट का समर्थन करें और वि‍ज्ञापन संस्‍कृति‍ पर कुछ न बोलें। अपना सचि‍न महान है,लाजबाव है,लेकि‍न अंतत: है तो वि‍ज्ञापन संस्‍कृति‍ का खि‍लौना,सचि‍न के लि‍ए खेल ही सब कुछ है बाजार के लि‍ए सचि‍न का ब्रॉण्‍ड ही सब कुछ है,सचि‍न को ब्रॉण्‍ड बनाने में कई फायदे हैं,क्रि‍केट चंगा,वर्चस्‍वशाली जाति‍यां और वि‍चारधारा भी खुश। साथ ही प्रभाष जोशी जैसे दि‍ग्‍गज भी मस्‍त।
अब हम क्रि‍केट नहीं देखते,बल्‍कि‍ उसका उपभोग करते हैं, क्रि‍केट देखते तो मैदान में जाते टि‍कट खरीदते, मुहल्‍ले में मैदान बनाने के लि‍ए संघर्ष करते,स्‍कूल,कॉलेजों में टीम बनवाने के लि‍ए प्रयास करते,खेल का मैदान बनाने की जद्दोजहद करते लकि‍न यह सब करते नहीं हैं। सि‍र्फ टीवी पर क्रि‍केट देखते हैं। यही हमारा खेल ‘प्रेम’ है।
इसी तरह प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार की सारी चि‍न्‍ताएं मायावती,लालूयादव,मुलायमसिंह, दि‍ग्‍वि‍जय सिंह आदि‍ के इर्दगि‍र्द घूमती हैं ,थोडा जोर लगाया तो साम्‍प्रदायि‍कता,धर्मनि‍रपेक्षता,आतंकवाद आदि‍ पर जमकर बरस पड़े। दोस्‍तो ये सारे एजेण्‍डा जनता के नहीं वर्चस्‍वशाली ताकतों के हैं, हमें लेखक के नाते अंतर करना होगा हमारी जनता का एजेण्‍डा क्‍या है ? सवाल कि‍या जाना चाहि‍ए प्रभाष जोशी ने जनता के एजेण्‍डे पर कि‍तना लि‍खा और सरकारी एजेण्‍डे पर कि‍तना लि‍खा ?
प्रभाष जोशी के लेखन की वि‍शेषता है ‘आब्‍शेसन’, ‘आब्‍शेसन’ शासकीय वि‍चारधारा का ईंधन है। प्रभाष जोशी कुछ वि‍षयों के प्रति‍ अपने ‘आब्‍शेसन’ को छि‍पाते ही नहीं बल्‍कि‍ महि‍मामंडि‍त करते हैं, उनके लेखन के ‘आब्‍शेसन’ हैं क्रि‍केट,साम्‍प्रदायि‍कता,धर्मनि‍रपेक्षता,कांग्रेस ,आरएसएस आदि‍।
लेखन में ‘आब्‍शेसन’ वर्चस्‍वशाली ताकतों का कलमघि‍स्‍सु बनाता है,रूढि‍वादी बनाता है। लकीर का फकीर बनाता है। ‘आबशेसन’ में आकर जब लेखन कि‍या जाएगा तो वह छदम गति‍वि‍धि‍ कहलाता है।इसे परि‍वर्तनकामी लेखन अथवा परि‍वर्तनकामी पत्रकारि‍ता समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए।
लेखन में सत्‍य गति‍वि‍धि‍ का जन्‍म तब होता है जब आप शासकवर्गों के एजेण्‍डे के बाहर आकर वैकल्‍पि‍क एजेण्‍डा बनाते हैं,वैकल्‍पि‍क एजेण्‍डे पर लि‍खते हैं।
भूमंडलीकरण, समलैंगि‍कता ,अपराधीकरण,साम्‍प्रदायि‍कता, भ्रष्‍टाचार,ओबीसी आरक्षण,अयोध्‍या में राममंदि‍र आदि‍ शासकवर्ग का एजेण्‍डा हैं, इन्‍हें जनता का एजेण्‍डा समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए, हमारे प्रभाषजी की कलम की सारी स्‍याही इसी शासकीय एजेण्‍डे पर खर्च हुई है। उन्‍होंने वि‍कल्‍प के एजेण्‍डे पर न्‍यूनतम लि‍खा है।
‘आब्‍शेसन’ में लि‍खे को पढने में मजा आता है और वह चटपटा भी होता है,उसकी भाषा हमेशा पैनी होती है, और ये सभी तत्‍व संयोग से प्रभाष जोशी के यहां भी हैं,’आब्‍शेसन’ में लि‍खा लेख अपील करता है और आपका तर्क छीन लेता है,आलोचनात्‍मक बुद्धि‍ छीन लेता है।
‘आबशेसन’ में लि‍खे को जब एकबार पढना शुरू करते हैं तो धीरे धीरे लत लग जाती है और यही ‘लत’ प्रभाष जोशी के पाठकों को भी लगी हुई है,वे हमेशा मुग्‍धभाव से उन्‍हें पढते हैं और जरूर पढते हैं, वे नहीं जानते कि‍ आब्‍शेसन में लि‍खे वि‍चार इल्‍लत होते हैं।
‘आब्‍शेसन’ में लि‍खे को पढकर आप सोचना और बोलना बंद करके अनुकरण करने लगते हैं, हॉं में हॉ मि‍लाना शुरू कर देते हैं,वाह वाह करने लगते हैं, बुद्धि‍ खर्च करना बंद कर देते हैं,इस तरह आप दरबारी भी बना लेते हैं, आज की भाषा में कहें तो प्रशंसक भी बना लेते हैं।
‘आबशेसन’ में लि‍खने के कारण अपना लि‍खा सत्‍य नजर आने लगता है, आपकी बातें ‘वास्‍तवि‍क’ एजेण्‍डा नजर आने लगती हैं, हकीकत में ऐसा होता नहीं है, हकीकत में ‘आब्‍शेसन’ में लि‍खने के कारण प्रभाष जोशी कोल्‍हू के बैल की तरह एक ही वि‍चार और भाव के इर्दगि‍र्द चक्‍कर लगाते रहे हैं, यही ‘आब्‍शेसन’ का दार्शनि‍क खेल है। इस परि‍पेक्ष्‍य में देखें तो प्रभाष जोशी का सती प्रेम ‘आब्‍शेसन’ है,नकली वैचारि‍क गति‍वि‍धि‍ है, इस गति‍वि‍धि‍ का हि‍न्‍दी भाषी यथार्थ और हि‍न्‍दुस्‍तान के यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है।
सुनंदा सिंह जी,
आपने सही सवाल उठाया है कम से कम प्रभाष जोशी ने जो लि‍खा है,उस पर बातें करो,मैं कहना चाहता हूं कि‍ ब्‍लाग लि‍खने वाले पढ़ लेते हैं और पढकर ही लि‍खते हैं। आप यह क्‍यों मानकर चल रही हैं कि‍ बगैर पढे लि‍खा जा रहा है। वेब के पाठकों पर हमें भरोसा रखना होगा,रही बात प्रभाष जी के लि‍खे की तो वह इतना बुरा है कि‍ पढकर और उनके मर्दवादी कुतर्क देखकर शर्म आती है । गंभीरता से सोच रहा हूं कि‍ इतना बड़ा पत्रकार इतनी बड़ी मूर्खतापूर्ण बातें क्‍यों लि‍ख रहा है ? यदि‍ प्रभाषजी अमेरि‍की पत्रकार होते और इसी भाव से वहां पर ब्‍लाग या प्रेस में लि‍खते तो कोई उन्‍हें छापता तक नहीं। उनके ज्ञान की कुछ झलकि‍यां देखें तो शायद मन ‘गदगद’ हो जाए,
प्रभाष जोशी ने लि‍खा है ”जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता। दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है। क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है। क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है। तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं। यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं। सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते। ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं। इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ। आईटी में वो इतने सफल हुए।”
अब गंभीरता से इस मूर्खता पर वि‍चार कीजि‍ए कि‍ दक्षि‍ण भारत में सि‍लीकॉन वैली इसलि‍ए नहीं बना क्‍योंकि‍ दक्षि‍ण भारत में आरक्षण था। गोया आरक्षण न होता तो कम्‍प्‍यूटर की दुनि‍या में हमने छलांग लगा दी होती, प्रभाषजी जानते ही नहीं हैं कि‍ भारत सरकार की तरफ से वि‍ज्ञान और खासकर सूचना तकनीकी से संबंधि‍त बुनि‍यादी शोध पर आज भी एक फूटी कौड़ी खर्च नहीं की जाती।
सूचना तकनीक के कि‍सी भी बुनि‍यादी अनुसंधान के क्षेत्र में भारत से लेकर अमेरि‍का तक कि‍सी भी ब्राह्मण का कोई पेटेंट नहीं है। आज तक कि‍सी भी भारतीय को सूचना तकनीक के कि‍सी भी बुनि‍यादी अनुसंधान का मुखि‍या पद अमेरि‍की की सि‍लीकॉन बैली में नहीं दि‍या गया है, सि‍लीकॉन बैली में बुनि‍यादी अनुसंधान में आज भी गोरों और अमेरि‍की मूल के गोरों का पेटेण्‍ट है। आज इस संबंध में सारे आंकड़े आसानी से वेब पर उपलब्‍ध हैं, प्रभाष जी को चुनौती है कि‍ वे ऐसे पांच ब्राह्मणों के नाम बताएं जि‍न्‍होने सूचना तकनीक के क्षेत्र में बुनि‍यादी अनुसंधान का काम कि‍या हो, वे पता करें कि‍ भारत के आईआईटी में कहां सूचना तंत्र से जुड़ी समस्‍याओं पर बुनि‍यादी अनुसंधान हो रहा है ?
एक और दि‍लचस्‍प बात बताऊं, हम जि‍स यूनीकोड मंगल हि‍न्‍दी फाण्‍ट में काम कर रहे हैं, उसका नि‍र्माण भी कि‍सी ब्राह्मण ने नहीं माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के गोरे वैज्ञानि‍कों ने कि‍या है,इसके लि‍ए भारत सरकार ने उन्‍हें 11 हजार करोड़ रूपये दि‍ए,काश यह काम कोई ब्राह्मण भारत में कर देता, आईआईटी वाले कर देते ? प्रभाष जी जानते ही नहीं हैं कि‍ दुनि‍या ‘धारण’ करने वाले ब्राह्मण नहीं गोरे जाति‍ के लोग हैं,दूसरी बात यह कि‍ कि‍तने ब्राह्मण हैं जो सि‍लि‍कॉन बैली में हैं ?
प्रभाष जी कहीं से जल्‍दी से आंकड़ा दें और उसका स्रोत बताएं वरना जाकर देखें कि‍ हैदराबाद और बैंगलौर में सूचना कंपनि‍यों में काम करने वाले ब्राह्मण क्‍या काम कर रहे हैं, सबसे बड़ा ब्राह्मण तो सत्‍यम कंपनी का मालि‍क था ,कहने की जरूरत नहीं है कि‍तना ईमानदार और देशभक्‍त था ?
भारत की सूचना कंपनि‍यां क्‍या काम कर रही हैं ,कम से कम वे सूचना के क्षेत्र में बुनि‍यादी शोध का काम तो नहीं कर रही हैं। हमें शर्म भी नहीं आती कि‍ अरबों डालर कमाने वाला भारत का सूचनाउद्योग सूचना के क्षेत्र में बुनि‍यादी शोध पर फूटी कौड़ी खर्च नहीं कर रहा,वे आउटसोर्सिंग कर रहे हैं,बुनि‍यादी रि‍सर्च नहीं।जबकि‍ यह सच है भारत के सूचना उद्योग में सवर्णों की संख्‍या ज्‍यादा है।

प्रभाष जोशी ने लि‍खा है ” मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे हैं। अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा। क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है। वो कुछ करके दिखा देने का है। जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला।”
प्रभाषजी से सवाल कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ उनकी ब्राह्मण मंत्रमाला इतनी छोटी क्‍यों है जि‍समें 11 ब्राह्मण खि‍लाड़ि‍यों की वि‍श्‍व टीम तक नहीं बन पा रही है, हम एक प्रस्‍ताव देते हैं कि‍ प्रत्‍येक राज्‍यऔर भारत के लि‍ए कम से कम 11-11 ब्राह्मण खि‍लाड़ि‍यों के नाम क्रि‍केट टीम के रूप में प्रभाषजी घोषि‍त करें,इसके बाद महि‍ला टीम के लि‍ए भी इतनी ही महि‍ला ब्राह्मणि‍यों के नाम सुझाएं, ज्‍यादा नहीं ऐसी टीमें वे फुटबाल और हॉकी के लि‍ए कम से कम सुझाएं और यह भी बताएं कि‍ आखि‍रकार कि‍तने ब्राह्मण खि‍लाडी अब तक अर्जुन पुरस्‍कार ले चुके हैं, खेल रत्‍न ले चुके है, ओलम्‍पि‍क और एशि‍याई खेलों में कि‍तने ब्राह्मण बटुक पदक प्राप्‍त कर चुके हैं। थोड़ा दूर जाएं तो मामला एकदम गडबडा जाएगा प्रभाषजी का। वेस्‍ट इंडीज,दक्षि‍ण अफ्रीका का क्‍या करें वहां कोई ब्राह्मण नहीं इसके बावजूद लंबे समय से वेस्‍टइंडीज की टीम शानदार खेलती रही है, काश वेस्‍टइंडीज वाले ब्राह्मण होते और वहां भी जाति‍प्रथा होती तो कि‍तना अच्‍छा होता। प्रभाषजी को ब्राह्मणों का जयगान करने में सहूलि‍यत होती।
प्रभाष जी ने लि‍खा है “अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है। अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में। अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण। क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है। बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा।”
प्रभाषजी राजनीति‍ की इतनी घटि‍या तुलनाएं हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता में खूब बि‍कती हैं, राजनीति‍ और राजनीति‍ वि‍ज्ञान में नहीं। यह पत्रकारि‍ता नहीं सस्‍ती चाटुकारि‍ता है। राजनीति‍ की वि‍कृत प्रस्‍तुति‍ है।प्रेस या मीडि‍या की भाषा में ‘डि‍स -इनफॉरर्मेशन’ है। दूसरी बात यह कि‍ राजनीति‍ का इतना सतही और वि‍कृत तुलनात्‍मक रूप सि‍र्फ हि‍न्‍दी का ही कोई चुका हुआ पत्रकार दे सकता है।
प्रभाषजी ने अपनी तुलनात्‍मक प्रस्‍तुति‍ में प्रकारान्‍तर से जनता के वि‍वेक का भी अपमान कि‍या है। जनता ने उनके बताए नेताओं को ब्राह्मण होने के कारण वोट नहीं दि‍ए,देश की जनता ने समग्रता में जाति‍ के नाम पर कभी भी वोट नहीं दि‍या है,वोट राजनीति‍ के आधार पर पड़ते रहे हैं,नेता लोग अपनी राजनीति‍ का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करते थे,जाति‍ का नहीं। प्रभाषजी ने जि‍न नेताओं के नाम गि‍नाए हैं कम से कम उनमें से कि‍सी भी नेता ने कभी चुनाव में अपने लि‍ए और अपनी पार्टी के लि‍ए जाति‍ के नाम पर सार्वजनि‍क तौर पर वोट नहीं मांगा। यह बात कहने का अर्थ यह नहीं है कि‍ राजनीति‍ में जाति‍वाद नहीं चलता,चलता है ,किंतु नि‍र्णायक भूमि‍का जाति‍ की नहीं राजनीति‍ की है। हाल के लोकसभा चुनाव परि‍णाम इसके साक्षी हैं।
प्रभाषजी ने लि‍खा है ”जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं।”
सवाल यह है हमारे समाज में सदि‍यों कि‍से काम करने की ट्रेनिंग मि‍ली है ? ब्राह्मण कब से कारगरी का काम करने लगे ? कारीगरी और मेहनती हुनर वाले कि‍सी भी काम को ब्राह्मणों ने अतीत में सीखने से इंकार कि‍या।
प्रभाष जोशी ने लि‍खा है ”मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है। अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया। सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां? सीता। सीता आदमी के लिए मरी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां? पार्वती। वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए। उसके लिए। सावित्री। सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है। सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया। सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है। मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं। अब वो अगर पतित होकर… बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई। इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में। इसलिए वह घर में रहे। जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते। अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं। आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है। मेरा मूल झगड़ा ये है।”
प्रभाषजी ने सही फरमाया है हमें अपनी परंपरा को अंग्रेजों की नजर से नहीं भारतीय नजर से देखना चाहि‍ए,समस्‍या यह है कि‍ क्‍या हमारी कोई भारतीय नजर भी है ? कि‍स भारतीय नजर की बात कर रहे हैं प्रभाषजी ,हम सि‍र्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि‍ सतीप्रथा पर पुरातनपंथि‍यों और राममोहनराय के समर्थकों के बीच में जो बहस चली उसके अलावा भी सतीप्रथा को देखने का क्‍या कोई स्‍त्रीवादी भारतीय नजरि‍या भी हो सकता है या नहीं ? कि‍सने कहा है कि‍ स्‍त्री समस्‍या को मर्द की ही आंखों से ही देखो, सती समस्‍या स्‍त्री समस्‍या है और इसके बारे में सबसे उपयुक्‍त भारतीय नजरि‍या स्‍त्रीवादी नजरि‍या ही हो सकता है,प्रभाषजी जि‍स नजरि‍ए से सती प्रथा को देख रहे हैं,वैसे न तो ईश्‍वरचन्‍द्र वि‍द्यासागर ने देखा था और नहीं आज के स्‍त्रीवादी ही रैनेसां के नजरि‍ए से देखते हैं । ऐसे भारतीय नजरि‍या क्‍या होगा,यह वि‍वाद की चीज है और प्रभाषजी का नजरि‍या मूलत: स्‍त्रीवि‍रोधी है,क्‍योंकि‍ वे सतीप्रथा को ही नहीं स्‍त्री को भी मर्दवादी नजरि‍ए से देख रहे हैं। प्रभाषजी का मूल झगड़ा क्‍या है ? मूल लक्ष्‍य क्‍या रहा है ? मर्दवाद की प्रति‍ष्‍ठा करना और स्‍त्री को वायवीय बनाना,प्रभाषजी स्‍त्री ठोस हाड़मांस का मानवीय सार है, वह ‘सत्‍व’ नहीं है सार है,वह स्‍त्री है। आपके मुंह से एक पत्रकार नहीं एक मर्दवादी बोल रहा है जि‍सका हमारे समाज में ,मीडि‍या में आज भी स्‍वाभावि‍क स्‍वराज्‍ा है,आपकी भाषा स्‍वाभावि‍क मर्दवादी भाषा है और मर्दवाद प्रेस में ही नहीं मीडि‍या में सबसे बि‍काऊ माल है । आप महान हैं और आपके वि‍चार महान हैं, दुख के साथ कहना पड़ रहा है, हम सम्‍मान सहि‍त अपमानि‍त हैं।
( प्रभाष जी के साक्षात्‍कार चली बहस को वि‍स्‍तार के साथ देखने के लि‍ए ' mohalla Live' पर पढ़ें )

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