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शनिवार, 9 जुलाई 2016

युवाओं में वैचारिक विभाजन




भारत का मध्यवर्ग आज विचारधारा के आधार पर जितना विभाजित है उतना पहले कभी नहीं था।पहले कुछ मसलों पर मध्यवर्ग में एकता थी,लेकिन इस समय हर विषय पर मोदी समर्थक,संघ समर्थक,कांग्रेस समर्थक,वाम समर्थक आदि के विचारधारात्मक विभाजन को सीधे देखा जा सकता है।मध्यवर्ग में राष्ट्र की अवधारणा और उसकी एकता की धुरी गायब है और उसकी जगह विचारधारा की धुरी आ गयी है।इससे देश के विकास में बाधा पहुँच रही है।विचारधारा के आधार पर समाज का विभाजन काफी पहले शुरू हो गया था,संभवतःआपातकाल के बाद इस तरह की प्रक्रिया के बीज पड़े जिनको 1990-91 के बाद जमकर फलने-फूलने का मौका मिला,इस समय तो विचारधारा के आधार पर सामाजिक विभाजन पूरे चरम पर है।यह सामाजिक कमजोरी का लक्षण है।
       
मजेदार बात यह है कि भारत के युवा जिनकी उम्र17 से 22 साल के बीच है वे सबसे ज्यादा विचारधारात्मक विभाजन के शिकार हैं,इनमें उदार मूल्यों के प्रति एकता कम और अनुदार और प्रतिगामी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ा है।इसकी तुलना में अशिक्षित समुदाय आज भी विचारधारात्मक विभाजन से मुक्त है।

मैंने अपने जीवन में वैचारिक विभाजन छात्रजीवन में नहीं देखा,जबकि जेएनयू में पढ़ता था,व्यापक स्तर पर सघन वैचारिक जंग होती थी लेकिन छात्रों में विचारधारात्मक विभाजन नहीं था,लेकिन मौजूदा दौर बेहद खतरनाक है,इसने युवाओं को बांट दिया है।इस समय पुराने जेएनयू वाले मित्र भी बंटे हैं। युवा आपस में बंटे हैं,युवाओं का अपने से बड़ों यानी अभिभावकों से विचारधारात्मक टकराव है।इस स्थिति में लगातार कंजरवेटिव और आक्रामक विचारों की ओर रूझान बढ़ रहा है।स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि गृहिणी किस्म की महिलाएं बड़ी संख्या में जो पहले उदारमना होती थीं उनमें राष्ट्रवाद,मोदीवाद टाइप संकीर्ण विचारधाराएं आ गयी हैं।वे राजनीति नहीं जानतीं,लेकिन राष्ट्रवाद के पक्ष में हैं।कहने का अर्थ है राजनीतिविहीन लोगों को विचारधारात्मक विभाजन तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है।फलतः पृथकतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें खुलकर घरेलू औरतों का दुरूपयोग कर रही हैं।

विश्वविद्यालयों में उदार मूल्यों को मूलाधार बनाकर जो व्यापक सामाजिक एकता या छात्र एकता विकसित हुई थी आज वह पूरी तरह से गायब है।विश्वविद्यालयों में विचारधारात्मक विभाजन सबसे ज्यादा है और उसमें कंजरवेटिव मूल्यों पर एकता बढी है।मूल्यहीन चीजों पर एकता बढ़ी है,इसने विश्वविद्यालय स्नातकों के सामाजिक स्तर का अवमूल्यन किया है।हमने इन छात्रों के अंदर मूल्यों के विघटन के सवालों पर बातें करना बंद कर दिया है।इन दिनों कैंपस का समूचा परिवेश स्थानीय राजनीति का अखाड़ा मात्र बनकर रह गया है।



शनिवार, 14 मई 2016

औरत के हक में और संशय के प्रतिवाद में


      फ़ेसबुक से लेकर मासमीडिया तक , नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक औरतों के प्रति संशय और संदेह का वातावरण बन रहा है । औरत हो या पुरुष किसी पर भी संदेह या संशय के आधार पर बातचीत नहीं करनी चाहिए ।मानवीय सभ्यता के विकास में मानवीय भरोसे और विश्वास की बड़ी भूमिका रही है। कभी-कभार इन संबंधों में विपर्यय भी देखा गया है।औरतों में बहुत छोटा किंतु नगण्य अंश है जो विश्वासघात भी करता रहा है । यह पहले भी था और आगे भी रहेगा ।

मानवीय संबंध स्त्री-पुरुष संबंधों के बिना नहीं बनते । नए युग में इन संबंधों का स्वरुप नए ढंग और तरीक़े से बनाना होगा । नए मानवीय मूल्यों को औरतें भी अर्जित कर रही हैं ।वे निडर होकर जीने की कोशिश कर रही हैं ,हमें उनकी इस कोशिश में हर संभव मदद करनी चाहिए ।औरत निडर और आधुनिक बनेगी तो वह हमारी पुरानी आस्थाओं को तोड़ेगी और चुनौती भी देगी ।हम सभी लोग औरत के इस नए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं ।

औरत बदलती है तो सबसे पहले पुरानी आस्थाएँ टूटती हैं , औरत का पुराना स्टीरियोटाइप टूटता है । इस क्रम में अनेक मर्दों और औरतों को त्रासदियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।औरत का बदलना और समाज में निडर होकर घूमना, बातें करना , मिलना -जुलना , मित्रों के साथ शाम गुज़ारना , पुरुष के साथ निडर होकर घुलना-मिलना सामान्य और सही प्रवृत्ति है।औरत जितनी निडर होगी समाज में पोंगापंथ , साम्प्रदायिकता, फंडामेंटलिज्म, लिंगभेद उतना ही कम होगा या इन सबसे लड़ने में मदद मिलेगी ।

औरत के साथ नए युग के अनुसार हमें व्यवहार करना सीखना होगा । औरत के प्रति संशय या संदेह मूलतः पितृसत्तात्मकता की अभिव्यक्ति है । पितृसत्ता की विचारधारा सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है । पितृसत्ता तो समाजवाद, पूँजीवाद की भी अम्मा है ।हिंदी में कहावत है चोर को न मारो चोर की अम्मा को मारो। लिंगभेद या औरत के प्रति अविश्वास की अम्मा है पितृसत्ता । यह बेहद बारीक ढंग से काम करती है और इसके रुपों से लड़ने के लिए बेहद सतर्क प्रयासों की ज़रुरत है ।

पितृसत्ता का महान गुण है कि वह स्वयं पर संदेह करना नहीं सिखाती । हम सब में पितृसत्ताप्रेम वैचारिक तौर पर कूट-कूटकर भरा है । औरत जब घर से निकलती है , अपने दुख सार्वजनिक करती है या सुख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करती है तो पितृसत्ता को धक्का लगता है और यही धक्का हम अपने अंदर महसूस करते हैं और काँपने लगते हैं , औरत पर संदेह करने लगते हैं ।

औरतों की हाल में जितनी भी सही-ग़लत शिकायतें आई हैं वे पितृसत्ता को कमज़ोर कर रही हैं और इस प्रक्रिया को किसी भी क़ीमत पर रुकना नहीं चाहिए । इस प्रक्रिया में अनेक श्रेष्ठ पुरुषों की बलि भी चढ़ेगी और यह अस्वाभाविक नहीं है । जिनको हम महान,निष्कलंक और निर्दोष मान रहे हैं उनके पितृसत्तात्मकता अपराधों को अपराध नहीं मानते उलटे पुण्य कार्य या सही काम मानते हैं । औरत का हर एक्शन पुरुष की महानता का निषेध है । पितृसत्ता को धराशायी करने वाली सबसे बड़ी बाधा यही महान श्रेष्ठ लोग हैं जो विभिन्न रंगतों और विचारधाराओं में हमारे बीच वैचारिक वैधता का आदर्श लिए खड़े हैं ।

औरत का सामान्य जीवन , सामान्य आचरण परिभाषित करने के लिए औरत के नज़रिए से चीज़ों को देखने की आदत विकसित करनी होगी । हमारे मीडिया का वर्चस्वशाली विमर्श ,चैटिंग,फ़ेसबुक कमेंट्स आदि पूरी तरह पितृसत्तात्मकता के आवरण में आ रहे हैं । औरत का हर एक्शन इस आवरण को छिन्न- भिन्न करता है । वह जब भी बोलती है तो पितृसत्ता को कमज़ोर करती है ,वह जब पुरुषों से सार्वजनिक या निजी तौर पर मिलती है तो अपना स्पेस बना रही होती है ।

औरत की समस्या है कि उसके पास भारत में निजी स्पेस और सार्वजनिक स्पेस बहुत कम है।औरत के लिए निजी और सार्वजनिक स्पेस के अभाव को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया । नई सक्रिय औरत अपनी नई दुनिया रच रही है । जिसमें वह क्रमश: वर्जनाओं और सामाजिक बंदिशों से लड़ रही है । इधर दो दशकों में औरतों पर ख़ासकर शिक्षित औरतों पर हमले तेज़ी से बढ़ें हैं । वह जब इनका प्रतिवाद करती है तो तरह तरह के बहाने खोजकर हमलोग औरत को दोषी ठहराने या फिर उदार मूल्यों पर ही हमले करने आरंभ कर देते हैं ।

भारत के विकास के लिए औरत पर अविश्वास करने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर संशय के नज़रिए से सोचने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर अविश्वास करनासामाजिक विकास के चक्र को उलटी दिशा में मोड़ना है ।ठगने ,झूठ बोलने या छल का काम औरत करें या मर्द करें हमें सतर्क रहना चाहिए और प्रतिवाद करना चाहिए । कोई औरत झूठे इल्ज़ाम लगाए तो झूठे इल्ज़ाम का विरोध करो , औरतों के ख़िलाफ़ संशय पैदा मत करो । क़ानून में इस तरह के प्रावधान होने चाहिए जिससे ग़लत इल्ज़ाम लगाने पर औरत को भी दण्डित किया जा सके । मौजूदा दौर में अनेक मामलों में औरतों के द्वारा ग़लत आरोपों के संगीन मामले सामने आए हैं और इस तरह के मामलों में क़ानूनी प्रक्रिया की मदद ली जानी चाहिए ।

औरत की सामाजिक बराबरी की लड़ाई का यह सबसे कठिन दौर है । औरत का आज जितने बडे कैनवास में सामाजिक एक्सपोजर हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ । फलत: हम आए दिन नई स्त्री समस्याओं और चुनौतियों से दो-चार हो रहे हैं । इस प्रक्रिया से किनाराकशी या इसे रोकने के प्रयास निश्चिततौर पर असफल होंगे। औरत घर से निकली है तो वह अपने रास्ते , अपना संसार भी बनाएगी और इस काम में हम सबको औरत पर विश्वास और मित्रता का भाव बनाए रखना होगा । आज औरत को संरक्षक की नहीं मित्र की ज़रुरत है । हमारे मन में बैठा यही संरक्षक भाव औरत की नई हक़ीक़त को समझने में बाधाएँ पैदा कर रहा है । औरत की नई हक़ीक़त को मित्रभाव से ही समझ सकते हैं और यहपरिवर्तन हमें अपने व्यवहार में करना पड़ेगा ।

भारत में स्त्री और सामाजिक समूहों के साथ दो तरह का भेदभाव और शोषण पाया जाता है, पहला ,सामाजिक शोषण और भेदभाव के रुप में है ,और दूसरा ,केजुअल शोषण और भेदभाव है । केजुअल शोषण और भेदभाव भी उतना खराब और निंदनीय है जितना सामाजिक भेदभाव और शोषण। इस केजुअल भेदभाव का एक रुप साम्प्रदायिक-अंधक्षेत्रीयतावादी नजरिए में भी व्यक्त होता रहता है । हम मुसलमानों और अन्य समूहों के प्रति हंसी-मजाक में अपनी भेददृष्टि को व्यक्त करते रहते हैं । खासकर मीडिया में यह रुप व्यापक है। मीडिया ( फिल्म,टीवी और अखबार के कार्टून सीरीज) ने केजुअल भेदभाव को वैध बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। भेदभाव किसी भी रुप में हो केजुअल हो या अन्य रुप में हो वह स्वीकार्य नहीं है । अफसोस यह है कि हम केजुअल भेदभाव के प्रति अभी तक सचेत नहीं हो पाए हैं ।

यह सच है पुराने कानून में अनेक स्त्री विरोधी प्रावधान रहे हैं लेकिन हमारे यहां कानूनी संतुलन को असंतुलन में बदलने की कला में अ-सामाजिक तत्व सफल रहे हैं । कानून जेण्डर संतुलन और संरक्षण के साथ काम करे,इसके लिए कानून के दुरुपयोग को रोकने वाली सामाजिक-राजनीतिक संरचनाएं बनायी जाएं । साथ ही अपराधी बचने न पाएं और जल्दी न्याय हो । सरकार सारे कर्म करने के बावजूद जल्द न्याय की व्यवस्था करने में असफल रही है ।औरतों की राय को परम पवित्र मानने वाले भारतीय फेमिनिस्टों को जरा औरतों के बारे में यूरोप की फेमिनिस्टों की राय पर भी गौर करना चाहिए। औरत के नाम पर अंधा विमर्श या स्त्री फंडामेंटलिज्म वस्तुतः स्त्री विरोधी है । भारत की स्त्री अधिकार रक्षक संस्थाएं और विदुषियां भारतीय औरतों की नकारात्मक और समाज विरोधी धारणाओं की कभी आलोचनाएं नहीं लिखतीं यह त्रासद है।





सोमवार, 19 जुलाई 2010

लिंगभेद की ऊहापोह और औरत की अस्मिता



         स्त्री और पुरूष दो लिंग हैं और दोनों को अलग-अलग ही रहना चाहिए,अपने लिंग के प्रति वफादार होना चाहिए। लिंगों की स्वायत्त पहचान को किसी भी बहाने अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहिए। लिंग की स्त्री और पुरूष के रूप में स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि स्त्री और पुरूष के बारे में परंपरागत रूप से वर्गीकृत धारणों को यथावत् मान लिया जाए। अथवा इसमें किसी भी किस्म के लिंग रूपान्तरण के तरीकों को स्वीकार कर लिया जाए।      

      लूस इरीगरी मानती है कि स्त्री और पुरूष दो लिंग हैं और हमारा मुख्य कार्यभार है कि इनका प्रकृति का संस्कृति में लिंग के रूप में ही रूपान्तरण किया जाए। वे स्त्री और पुरूष बने रहें और अपने लिंग  के प्रति वफादार रहें। सवाल उठता है स्वयं के प्रति, अन्य के प्रति,लिंग के प्रति कैसे वफादार रहा जा सकता है।
     इरीगरी के नजरिए की पहली विशेषता यह है कि वह स्त्री और पुरूष दोनों को स्वाभाविक आस्था के आधार पर देखती है। आस्था उसके यहां महत्वपूर्ण है। वह मानती है कि हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि स्त्री और पुरूष दोनों लिंग हैं। प्रकृति ने उन्हें अलग-अलग बनाया है। उन्हें इसी रूप में बने रहना चाहिए। इसी भिन्नता के आधार पर ही हमें कामुक भिन्नता को देखना चाहिए।
     मुश्किल यह है कि इस आधार जब आप देखते हैं तो आपके सामने चुनने के लिए बहुत कम चीजें होती हैं। इरीगरी के शब्दों में इसका अर्थ है कि जेण्डर या लिंग के प्रति वफादार रहें,आस्था रखें। जेण्डर तो प्रकृति में अवस्थित है। जेण्डर तो संस्कृति के आने के पहले से अवस्थित है। हम जब प्रकृति से संस्कृति की ओर प्रयाण करें तो हमें इसके प्रति आस्थावान रहना चाहिए। इरीगरी का मानना है '' कामुक भिन्नता स्वाभाविक और तात्कालिक है,प्रकृति की देन है,यह वास्तविक है,यह सार्वभौम असंकुचित तत्व है।''
          कामुक भिन्नता (सेक्सुअल डिफरेंस)  से पलायन संभव नहीं है। हमारे सार्वभौम जगत में दाखिल होने के पहले हमारी स्त्री और पुरूष की पहचान थी,बाद में भी यह पहचान रहती है,इसे किसी भी रूप में नष्ट नहीं किया जा सकता।   स्त्री के संदर्भ में मानवता की यह शर्त है कि  हम यह मानें कि लिंग के रूप में स्त्री है। सार्वभौम का अर्द्धांश है। उसे एक में संकुचित नहीं किया जा सकता। न तो पुरूष पूर्ण है और न स्त्री पूर्ण है। दोनों लिंग में से किसी एक में समग्रीकरण नहीं किया जा सकता।
   देरिदा ने 'फिलासफी ऑफ वायलेंस'   में अन्य की खोज के क्रम में लिखा कि अन्य, स्व के समान नहीं है। बल्कि अन्य तो अन्य की कामुक भिन्नता की देन है।देरिदा ने लिखा है '' दर्शन ने व्यक्ति और अन्य की महत्ता या अर्थ को कभी स्वीकार नहीं किया। ...  हिंसा के दर्शन के जरिए समग्र दर्शन का दमन ही उसका मूलाधार है, वही सम के सर्वसत्तावादीकरण का कार्य करता रहा है।''
     जो व्यवस्था कामुक भिन्नता को अस्वीकार करती है वह ताकत के जरिए अधिनायकवादी विचारों और पद्धतियों की ओर ले जाती है। स्त्री और पुरूष का अंतर भाषा और विचार के उदय के पहले हुआ था। शरीर को भाषा और विचार के जन्म के पहले रचा गया। स्त्री और पुरूष को समाज निर्मित भूमिकाओं में जब निर्मित किया जा रहा था तब भाषा ने जन्म लिया।
       स्त्री और पुरूष का प्रकृति से संस्कृति की ओर रूपान्तरण वैसे ही है जैसे लड़का धीरे-धीरे मर्द बनता और लड़की धीरे धीरे औरत बनती है। इसी क्रम में उनकी भूमिकाएं निर्धारित कर दी जाती हैं। इसी क्रम में लिंग के संबंध बनते हैं और प्रभुत्व का उदय होता है। इरीगरी ने लिखा है , '' पुंस वर्चस्व वाली संस्कृति के समाज में पैदा होने वाली लड़की जरूरी नहीं है कि जेण्डर की उपयुक्त अनुभूति से लैस हो, इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके पास औरत की मन:स्थिति होती है। किन्तु अस्मिता नहीं होती। उसे बनाना होता है।''
      यूरोपीय चिंतन में लिंग के बिना अस्मिता विमर्श नहीं है। वहां दर्शन और भाषाविज्ञान में औरत नजर नहीं आती,वहां का सारा चिन्तन पुंस निर्मिति है। वहां विषय मर्द है। वही सार्वभौम का पर्याय है। विज्ञान और दर्शन प्रत्यक्षत: पुरूष के सरोकारों की ही खोज करते हैं। वे लिंगभेदीय ज्ञान पेश करते हैं । वे ज्ञान को स्वाभाविक सार्वभौम तत्व के रूप में पेश नहीं करते।
    इरीगरी ने अपनी किताब '' थिंकिग दि डिफरेंस' की प्रस्तावना में स्त्री के अधिकार और समानता की धारणा के पीछे सक्रिय अंधत्व की आलोचना करते हुए लिखा '' स्त्री और पुरूष की भिन्नता को सम के नाम पर अस्वीकार करना, हाइपोथेटिकल सम के नाम पर सामाजिक समानता के रूप में प्रस्तुति विभ्रम पैदा करती है। यह विभाजन के प्रति पूर्वाग्रह है,यह निजी और सार्वजनिक अस्मिता के रूप में असंभव विभाजन है। ... मेरे पास स्त्री अस्मिता की समस्याएं हैं जिन्हें मौजूदा कानून हल नहीं कर सकता। मैं नहीं समझती कि (सार्वभौम मानवाधिकार घोषणापत्र ) में मैं तब तक शामिल नहीं हो सकती जब तक कि मैं अपने सेक्स को अस्वीकार नहीं करती,उसकी प्राथमिकताओं को अस्वीकार नहीं करती।''
      हमारा कानून निजी और सार्वजनिक परिवेश के आधार पर जो वर्गीकरण करता रहा है उसमें इन दोनों के बीच जो एक-दूसरे के ऊपर आरोपणभाव है उसकी अनदेखी की गई है। इरीगरी कहती है असल में यह समस्या अस्वीकार के गर्भ से पैदा हुई है।यह अस्वीकार है स्त्री की पुनर्रूत्पादन क्षमता का ,जो उसे प्रकृति ने दी है,यह क्षमता मर्द ने पास नहीं है। प्रजनन क्षमता को 'माँ' के रूप में वर्णित करना सही नहीं होगा। जन्म देने के बाद पालन-पोषण की बात आती है। जन्म देने का प्रकृति ने सिर्फ औरत को हक दिया है।
     इरीगरी ने विस्तार से इस तथ्य का विवेचन किया है कि किस तरह औरत सामाजिक विकास क्रम में पितृसत्ता के चंगुल में फंस गयी और समाज ने उसे मॉ, पालनकर्त्री और पत्नी के रूप में महिमामंडित किया। औरत को अंदर समाहित करने की प्रवृत्ति के कारण स्त्री अस्मिता से वंचित होना पड़ा है।
     सामाजिक मांगें स्त्री के निजी विकास से अलगाव पैदा करती हैं। उसके स्त्रीत्व से अलगाव पैदा करती हैं। वह अपने को ऐसी वस्तु के रूप में तैयार करती है जिससे वह अन्य के इर्दगिर्द अपनी पहचान बना सके। अन्य की जरूरतें पूरी कर सके। यहां अन्य और कोई नहीं पुरूष ही है। घरेलू भूमिका अदा करते हुए वह मर्द के पक्ष में अपनी भूमिका त्याग देती है,व्यक्तिगत जिन्दगी त्याग देती है। उसे पुरूष के हवाले कर देती है। पुरूष व्यक्तिगत जिन्दगी जीने लगता है। उसकी संतुष्टि ही संभावित की संतुष्टि पर निर्भर होती है। इसके परिणामस्वरूप जो परंपरा जन्म लेती है वह हिंसा और अलगाव के साथ सामने आती है। यह पृथकत्व पैदा करने वाली परंपरा है। जो औरत के प्रति पूरी तरह दगा करती है।
     यदि हम जेण्डर के प्रति वफादार हैं तो परंपरा को चुनौती दी जानी चाहिए। उससे उबरने की कोशिश करनी चाहिए और उसे त्याग देना चाहिए। यह जानते हुए भी कि परंपरागत भूमिका दमनात्मक और सर्वसत्तावादी है इसके बावजूद हमें जेण्डर के प्रति वफादार बने रहना चाहिए। जेण्डर अपनी भूमिका के रूप में दिखाई देता है ,यह भूमिका वह कब त्याग देता है और संस्कृति के क्षेत्र के परे कब चला जाता है,कहना मुश्किल है।   
     इरीगरी जिस भिन्नता या डिफरेंस की बात कर रही हैं,वह भिन्नता स्त्रीवादी विचारकों के यहां भिन्न अर्थ रखती है। यह भिन्नता पूर्वनिर्धारित नियम से भिन्न दिखने वाली भिन्नता नहीं है। बल्कि यह शुद्ध भिन्नता है। यह स्वयं से भिन्नता है, यह ऐसी भिन्नता है जिसकी कोई अस्मिता नहीं है।
     इसका अर्थ यह है कि भिन्नता का भिन्नता से अलग कोई और अर्थ नहीं है। यह कामुक भिन्नता नहीं है। कामुक भिन्नता तो भाषा के परे भी मौजूद रहती है।इसका अर्थ अभी भी पूरी तरह खुल नहीं पाया है,उसे हम पूरी तरह जान नहीं पाए हैं। इसी को हम स्त्री और पुरूष के सारतत्व के रूप में देखते हैं।
     देरिदा का मानना है 'भाषा के पहले विचार नहीं था।' इसका अर्थ है कामुक भिन्नता भाषा के पहले भी मौजूद थी। इसका अर्थ यह भी है कि कामुक भिन्नता भाषा और विचार से परे है। यह बात आज हमारे सोच के बाहर है। 
    

रविवार, 20 जून 2010

पोर्नोग्राफी पर महिला संगठनों की चुप्पी क्यों ?


                हाल ही में दिल्ली में एक महिला ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में जबर्दस्ती ग्रुप सेक्स की शिकायत की और बताया कि उसके साथ यह नारकीय काण्ड 4 साल से चल रहा था। ग्रुप सेक्स का यह पहला सार्वजनिक मामला है। ग्रुप सेक्स की कुसंस्कृति का इंटरनेट पर दिखाए जा रहे ग्रुप सेक्स के चित्रों के साथ गहरा संबंध है। इंटरनेट ऐसी अवांछित आपराधिक क्रीडाओं के लिए प्रेरित कर रहा है। इस घटना ने समाज में आ रहे सेक्स के अस्वाभाविक रूपों के दुष्प्रभाव की ओर ध्यान खींचा है। हमें इस प्रवृत्ति से सावधान होना चाहिए।
     उल्लेखनीय है इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी का धंधा जमकर चल रहा है। लेकिन भारत के महिला और राजनीतिक संगठन सोए हुए हैं। मैं लगातार महिला संगठनों के प्रकाशनों और आंदोलन की खबरों को दैनिक अखबारों में पढ़ता रहता हूँ लेकिन अभी तक कहीं पर भी ऐसी खबर देखने में नहीं आयी है कि महिला संगठनों ने इंटरनेट के जरिए चल रहे पोर्न के धंधे पर कुछ भी बोला हो। इसका यह अर्थ नहीं है कि महिला संगठनों का पोर्नोग्राफी को समर्थन है।
       लेकिन वास्तविकता यह है कि महिला संगठनों को पोर्न के इंटरनेट प्रसारण का विरोध करते सड़कों पर या इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी के दरवाजे पर नहीं देखा गया। पोर्नोग्राफी के मामले पर महिला संगठनों की चुप्पी चिन्ता की चीज है।
           महिला संगठनों को बताना चाहिए कि क्या पोर्न महिलाओं और समाज के लिए घातक है ? क्या पोर्न के प्रसारण से महिलाओं पर हमले बढ़े हैं ? क्या पोर्न से वैवाहिक संबंधों में दरार आती है ? क्या पोर्न के प्रभाववश समाज में अस्वाभाविक सेक्स का रूझान बढ़ा है ? क्या पोर्न का बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है ? क्या पोर्न महज मनोरंजन है ? क्या पोर्न पर भारत में पाबंदी लगाना सही होगा ? क्या भारत सरकार और कारपोरेट घरानों को पोर्न का धंधा करने की इजाजत देनी चाहिए ? महिला और राजनीतिक संगठनों ने पोर्नोग्राफी के खिलाफ चुप्पी क्यों साधी हुई है ? आखिरकार हम क्या करें ? हमें इन सब सवालों पर सोचना चाहिए।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

सेक्स और जेण्डर

          जॉन स्कॉट ने रेखांकित किया है कि जेण्डर का अर्थ है सेक्स और सेक्सुअल डिफरेंस में अन्तर्निहित बायोलॉजिकल निर्धारणवाद का अस्वीकार। तिरिसा दे लॉरिटीज ने लिखा सेक्सुअल डिफरेंस पदबंध स्त्रीवादी चिन्तन को सार्वभौम सेक्स विलोम के सीमित अर्थ में बांधता है। इसके कारण स्त्रियों के बीच में जो भिन्नता है उसे देखने में असुविधा होती थी। त्रिन-मिन्ह हा ने लिखा है कि जेण्डर पदबंध साम्राज्यवादी सोच को अस्वीकार करता है। यह भी कहा कि जेण्डर सेक्साधारित व्यवहार को तय करता है। यह असमानता पैदा करता है।
      मोनिका वीटिंग इससे एक कदम आगे जाकर घोषणा करती है कि हमें सेक्स और जेण्डर दोनों ही पदबंधों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मोनिका की राय में जेण्डर ''सेक्स के राजनीतिक विलोम के भाषायी अनुक्रम में स्त्री के वर्चस्व '' की अभिव्यक्ति है। जबकि सेक्स दार्शनिक और राजनीतिक केटेगरी है। जिसमें समाज हेट्रोसेक्सुअल है। यही वजह है कि भाषा में स्त्री को जेण्डर कहते हैं,समाज में सेक्स कहते हैं। चूंकि समाज में वह पितृसत्तात्मक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है अत: मोनिका के नजरिए से स्त्री का भाषा में लेस्बियनाइजेशन किया जाना चाहिए।
     सिकसाउस ने भिन्न नजरिया व्यक्त किया है वह जेण्डर और सेक्सुअल डिफरेंस की बात करते हुए बताती है कि सेक्सुअल डिफरेंस आनंद के रूप में ही सामने आता है। स्त्री की सहजजात अवस्था को मर्द या पुंसवादी व्यवस्था के संदर्भ में परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस समस्या का बेहतर समाधान बायसेक्सुअलिटी की थ्योरी में है। बायसेक्सुअलिटी की बात करते हुए सिकसाउस कोई नयी धारणा नहीं देती।अपितु शिश्नकेन्द्रिकता के सेक्सुअल डिफरेंस वाले वायनरी अपोजिशन में चली जाती है। स्त्री और पुरूष के भेद में चली जाती है। सिकसाउस कहती है कि इसमें अनंत संभावनाएं हैं,व्यापक आनंद है।अनंत इच्छाएं हैं।
        जूडी बटलर की राय है जेण्डर विमर्श की अवधारणा है।जेण्डर संस्कृति नहीं है। बल्कि सेक्स प्रकृति है। जूडी बटलर की नजर में जेण्डर हमारी चेतना में सेक्स के पहले आता है,सेक्स बाद में आता है। यही वजह है कि जेण्डर को उसके सांस्कृतिक-राजनीतिक तत्वों से अलग किया जा सकता है।


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...