हाइपररीयल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हाइपररीयल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

हाइपर टेक्स्ट की समस्याएं -1-


( हाइपर टेक्स्ट के निर्माता टेड नेल्सन)
       टेक्स्ट या पाठ मुद्रण क्रांति की देन है । यह आधुनिकता की धुरी है।हाइपर टेक्स्ट परवर्ती पूंजीवाद की कम्प्यूटर क्रांति की उपज है।उत्तर आधुनिक विमर्श का आधार है।ये दोनों ही हमारे सृजन का हिस्सा हैं। सृजन, समीक्षा और चिन्तन के साथ-साथ अन्य विधाओं में इनके दबावों को साफ तौर पर देखा जा सकता है।जिन विचारकों ने हाइपर टेक्स्ट पर विचार किया है उन्होंने इससे जुड़े राजनीतिक अर्थशास्त्र की उपेक्षा की है। हाइपर टेक्स्ट का कोई विमर्श इस पहलु पर विचार किए बगैर समग्र समझ पैदा नहीं करता।परवर्ती पूजीवाद के सूचना अर्थशास्त्र के साथ इसका गहरा संबंध है।यही इसके विकास की सबसे बड़ी बाधा है।

हाइपर टेक्स्ट से जुड़े समस्त सांगोपांग उपकरणों की कीमत, इनके प्रोग्रामों और अनुसंधान पर बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों का स्वामित्व इस बात का संकेत है कि हाइपर टेक्स्ट वाले स्वतंत्रता और स्वायत्तता का लाख वायदा करें। इसे बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों की कैद से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है।

           कम्प्यूटर युग को जो लोग मुक्ति के युग के रूप में देखते हैं उनसे एक ही सवाल है कि आखिरकार कम्प्यूटर बनाने की कितनी लागत विश्व के नागरिकों से वसूली जाएगी ? कम्प्यूटर से जुड़े अनुसंधान में बहुराष्ट्रीय सूचना कंपनियों का जितना धन लगा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा धन आम जनता से माल की बिक्री के जरिए वसूला जा चुका है। इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने पेटेंट अधिकारों को त्यागने,चीजों को न्यूनतम दामों पर मुहैय्या कराने के लिए तैयार नहीं हैं। स्वामित्व का आलम यह है कि हाइपर टेक्स्ट भी इनकी कैद में है।यानी भाषा के भी अब ये मालिक हैं।

          हाइपर टेक्स्ट में परिवर्तन करने का रचनाकार,यूजर आदि को कोई अधिकार नहीं है। जबकि पाठ के युग में भाषा को तब्दील करने का लेखक और जनता के पास अधिकार था। किंतु कम्प्यूटर भाषा यानी फॉण्ट को लेखक बदल नहीं सकता। वह संचार कंपनी की कैद में है। उसी के पास पेटेण्ट अधिकार हैं। कल तक भाषा पर जनता का अधिकार था। रचनाकारों की वह क्रीडास्थली थी। आज वह सूचना तकनीक उद्योग की कैद में है। हमें सोचना होगा कि हाइपर टेक्स्ट को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलामी से कैसे मुक्त करें। क्या पूंजीवाद में भाषा की मुक्ति का सपना साकार हो सकता है ?क्या पूंजीवाद खासकर परवर्ती पूंजीवाद भाषाओं के प्रति मित्रवत् व्यवहार कर रहा है या शत्रु की तरह व्यवहार कर रहा है।

           जय डेविड बोल्टर ने ''राईटिंग स्पेस: कम्प्यूटर्स, हाइपरटेक्स्ट एंड हिस्ट्री ऑफ राईटिंग'' (1991) में कम्प्यूटर के आने के बाद लेखन और विविध विधाओं के भविष्य के बारे में जो अनुमान लगाए थे।वे सभी सही साबित हुए। खासकर उपन्यास, निबंध, इनसाइक्लोपीडिया, लाइब्रेरी,परंपरागत पाण्डुलिपि आदि के भावी स्वरूप को लेकर जो अनुमान लगाए थे वे सही साबित हुए हैं।इसी पुस्तक में बोल्टर ने लिखा है कि पोटर्ल की कोटियों की प्रकृति संकलनवादी, सर्वसंग्रहवादी है।

आज हमारे इनसाइक्लोपीडिक इम्पल्स को इलैक्ट्रोनिक क्षमताएं निर्देशित कर रही हैं। इसकी खूबी है 'सुनिश्चित मुद्रित रूप' ,जो हमें हाइपर टेक्स्ट के रूप में उपलब्ध है। यही साइबर स्पेस को संगठित करने का आधार बना।यह सामयिक यथार्थ का प्रत्युत्तर है।

       परिभाषा के रूप में वेब अस्थिर,व्यक्तिगत और बौध्दिक गतिशील विजन की शुरूआत करता है। सूचना और ज्ञान का यह अवसरवादी रूप है।हम उम्मीद करते हैं कि सूचना और ज्ञान की संरचना सामयिक और सम्पूरक होगी।

           किंतु इनसाइक्लोपीडिया और पुस्तक में ऐसा नहीं होता।वहां तकनीकी ज्ञान के द्वारा स्थायी संरचना का निर्माण किया जाता है। आज हमारे ज्ञान का अर्थ है विचारों का संकलन। इसे बहुरूपी,क्रमानुवर्ती एवं इसके सहयोगी रूपों मे देख सकते हैं। इसका प्रत्येक पैटर्न एक ही तरह के पाठक की जरूरतों को एक ही समय पर पूरा करता है।वेब में इस तरह की सांस्कृतिक और इनसाइक्लोपीडिया प्रस्तुतियों की निरंतर समीक्षा की जानी चाहिए।

           आज हम ग्लोबल लाइब्रेरी के युग में हैं।इसमें सामग्री का संगठन इनसाइक्लोपीडिया की तर्ज पर किया जाता है। इसमें पाठ संकलन की प्रवृत्ति है। उसे हम नियंत्रित करते हैं,हजम करते हैं,इसमें पुस्तकालयाध्यक्ष की मानसिकता से मिलती-जुलती प्रवृत्तियां हैं।उल्लेखनीय है कि आज हम जो सार्वभौम लाइब्रेरी बना रहे हैं।उससे जुड़े हैं।हाइपर टेक्स्ट बना रहे हैं। उसका व्यवहार कर रहे हैं।इन सबका आधार है टेड नेल्सन का एक्सनाडु सिस्टम और टुफ्टस नेटवर्क द्वारा तैयार संरचनाएं।नेल्सन का 'यूनीवर्सल डाटा स्ट्रचर'' मौजूदा नेटवर्क से ज्यादा सुसंगत था।उसने जो ढ़ांचा तैयार किया था उसमें एक ही पाठ से किसी भी अन्य पाठ को खोजा जा सकता था।

             हाइपर टेक्स्ट को विभिन्न विद्वानों ने व्याख्यायित करते हुए इसकी जो परिभाषाएं बनायी हैं वे देखने योग्य हैं।हाइपर टेक्स्ट मूलत: संगठित करने का सिद्धान्त है।टेड नेल्सन ने हाइपर टेक्स्ट पदबंध को जन्म दिया।नेल्सन ने 'हाइपर' को 'विस्तारित,साधारणीकृत और बहुआयामी'' माना है। मिशेल हेम ने लिखा है कि ''यह पदबंध मूलत: लैटिन के बीविंग यानी बुनना शब्द की पैदाइश है।यह वर्ण प्रोसेसिंग के लिए सबसे उपयुक्त शब्द है।ज्ञान के बहुआयामी धागे उन तमाम बौद्धिक सूत्रों से जुड़े हैं जो पुस्तकालयाध्यक्ष के लिए चिर- परिचित हैं। यही वजह है कि हाइपर टेक्टस पर बात करते हुए पुस्तकालय की पदावली का ज्यादातर प्रयोग किया जाता है। 
        हाइपर टेक्स्ट का यह सार है कि इसमें गतिशील सम्पर्क संकेत रहते हैं। ये पाठक को बताते हैं कि वह कैसे अनुकरण करे। वहां पर वह स्वत:स्फूर्त्त प्राथमिकता क्रम पाता है। इसे अपने नियंत्रण में पाता है।यहां विषय का दायरा लेखक या संपादक तय नहीं करता।बल्कि पाठक तय करता है।हाइपर टेक्स्ट बहुरूपी होता है। इसे आप इच्छित रूप में रूपान्तरित कर सकते।इसके अक्षरों का आकार छोटा-बड़ा कर सकते हैं। अभी इसमें गैर डाटा जैसे रूप -ग्राफिक्स, एनीमेशंस,डिजिटल साउण्ड आदि को पा सकते हैं।जल्द ही इसमें 'इनटरेक्टिव मीडिया' आ जाएगा।वह हाइपर टेक्स्ट को अपदस्थ कर सकता है। क्योंकि डिजिटल वर्ल्ड,साउण्ड,टेक्स्ट और सभी इमेजों का वायनरी सिगनल और माइक्रो कम्प्यूटर्स में हमारी क्षमताओं का उपयोग होगा।साथ ही सीडी क्वालिटी स्टीरियो साउण्ड और उच्च श्रेणी का हाई रिजोल्युशन वीडियो दिखने लगेगा। कनवर्जन के कारण कम्प्यूटर में ही सभी पूर्ववर्ती माध्यमों को देख,सुन सकेंगे।
       हाइपर टेक्स्ट के बारे में विचार करते समय यह ध्यान रहे कि नोडस में सूचना और लिंक दोनों होते हैं।
      डीमर ने लिखा कि 'हाइपर'-'टेक्स्ट' का अर्थ है 'ऊपर' या 'ज्यादा',बीसवीं शताब्दी में आइंस्टीन ने फिजिक्स में नए किस्म के 'स्पेस' की बात की थी और इसी प्रसंग में 'रिलेटिव हाइपर स्पेस' की सैद्धान्तिकी बनायी। आइंस्टीन ने 'स्पेस' को 'स्पेस' के रूप में व्याख्यायित करते हुए इसे नया रास्ता, मार्ग,नए किस्म का स्पेस कहा था। यही हाइपरस्पेस कालान्तर में टेक्स्ट पर लागू किया गया।टेस्स्ट को भी हाइपर के संदर्भ में देखा गया। कालान्तर में उसी के गर्भ से हाइपर टेक्स्ट के रूप में नए किस्म का पाठ निर्मित करने में मदद मिली।
        राद वंग ने लिखा कि नोडस एवं लिंक का नेटवर्क मानवीय स्मृति का प्रतिनिधित्व करता है।हाइपर टेक्स्ट के प्रसिद्ध आलोचक लनदोव ने लिखा कि ''हाइपर टेक्स्ट का मुख्य जोर संपर्क और संबंध पर है। यह कार्य करते हुए पाठ बदल सकते हैं।हम जैसा पढ़ना चाहते हैं वैसा बना सकते हैं,यह शिक्षक,छात्र, लेखक और पाठक सभी की भूमिका बदल देता है। हाइपर टेक्स्ट गैर-क्रमिक रीडिंग है।गैर-क्रमिक पाठ है।'' यान केलोविच,लनदोव और कोडी ने लिखा कि ''लेखक के उपकरण और पाठक के माध्यम और हाइपर डाकूमेन्ट्स सिस्टम लेखक या लेखकों को सूचनाओं को एक जगह जोड़ने के लिए कहते हैं।आप 'पथ' बना सकते हैं,उसमें उपलब्ध साम्रग्री को शामिल कर सकते हैं,नोट्स तैयार कर सकते हैं।यह व्यापक संदर्भ सामग्री हो सकती है।पाठक इसमें लिंक, अन्तर्सन्दर्भ और संकेतित पाठ में जा सकता है।यह कार्य व्यवस्थित या गैर क्रमिक रूप में कर सकता है। एक अन्य विद्वान् ने लिखा कि नोडस और लिंक के जरिए जब आप खोज करते हैं, वापस लौटते हैं, संदर्भ बताते हैं,तो यह गैर-क्रमिक प्रस्तुति ही होगी।




रविवार, 28 फ़रवरी 2010

स्पीड युग का नायक नरेन्द्र मोदी

(मोदी के शासन में साम्प्रदायिक दंगे का दृश्य)

मासमीडिया दुधारी तलवार है। दर्शकों के लिए  बिडम्बनाओं की सृष्टि करता है। मासमीडिया के द्वारा सृजित अर्थ वहीं पर नहीं होता जहां बताया जा रहा है बल्कि अर्थ अन्यत्र होता है। अर्थ वहां होता है जहां विचारधारा होती है और विचारधारा को लागू करने वाले संगठन होते हैं। चूंकि गुजरात में संघ परिवार की सांगठनिक संरचनाएं बेहद पुख्ता हैं अत: टीवी के अर्थ का लाभ उठाने की संभावनाएं भी वहां पर ज्यादा हैं। मासमीडिया अदृश्य हाथों को लाभ पहुँचाता है अत: हमें देखना होगा मोदी के संदर्भ में अदृश्य शक्ति कौन है ? मीडिया जब एक बार किसी चीज को अर्थ प्रदान कर देता है तो उसे अस्वीकार करना बेहद मुश्किल होता है। इसबार मीडिया ने यही किया उसने मोदी को नया अर्थ दिया,मोदी को विकासपुरूष बनाया। विकास को मोदी की इमेज के साथ जबर्दस्ती जोड़ा गया जबकि विकास का मोदी से कोई संबंध नहीं बनता। इसने मोदी का दंगापुरूष का मिथ तोड़ दिया। मोदी का दंगापुरूष का मिथ जब एकबार तोड़ दिया गया तो उसका कोई संदर्भ नहीं बचता था और इसी शून्य को सचेत रूप से विकासपुरूष और गुजरात की अस्मिता के प्रतीक के जरिए भरा गया। विकासपुरूष और गुजराती अस्मिता की धारणा असल में गुजराती जिंदगी के यथार्थ के नकार पर टिकी है। यह ऐसी धारणा है जिसे मीडिया ने पैदा किया है,यह गुजरात की ठोस वास्तविकता के गर्भ से पैदा नहीं हुई है। वरना यह सवाल किया ही जा सकता था कि मोदी ने राज्य में क्या कभी कोई ऐसा कारखाना खुलवाया जिसकी कीमत दस हजार करोड़ रूपसे से ज्यादा हो !
      मोदी की जो छवि मीडिया ने बनायी वह मोदी निर्मित छवि है। असली मोदी छवि नहीं है।  यह छवि कर्ममयता का संदेश नहीं देती। बल्कि भोग का संदेश देने वाला मोदी है। मीडिया निर्मित मोदी को हम असली मोदी मानने लगे हैं। विकास और गुजराती अस्मिता के प्रतीक मोदी को मीडिया ने निर्मित किया। यह आम लोगों को दिखाने के लिए बनाया गया मोदी है। यह दर्शकों के लिए बनाया गया मोदी है। इसमें सक्रियता का भाव है,यह मुखौटा है,बेजान है।यह ऐसा मोदी है जिसका गुजरात की दैनन्दिन जिंदगी के यथार्थ के साथ कोई मेल नही ंहै। यह मीडिया के जरिए  संपर्क बनाता है। मीडिया के जरिए यह संदेश देता है। हम जिस मोदी को जानते हैं वह कोई मनुष्य नहीं है। बल्कि पुतला है। हाइपररीयल पुतला है। जिसके पास न दिल है, न मन है, उसके न दुख हैं और न सुख हैं। उसका न कोई अपना है और न उसके लिए कोई पराया है। वह पांच करोड़ गुजरातियों का था ,उसमें पांच करोड़ गुजराती थे और वह फासिस्ट था। वह कोई मानवीय व्यक्ति नहीं है। अमेरिकी पापुलर कल्चर के फ्रेमवर्क में उसे सजाया गया है।  पापुलरकल्चर में मनुष्य महज एक विषय होता है।   प्रोडक्ट होता है। जिस पर बहस कर सकते हैं, विमर्श किया जा सकता है। मोदी इस अर्थ में मानवीय व्यक्ति नहीं है। वह तो महज एक प्रोडक्ट है। विमर्श की वस्तु है।
मोदी के जिस विजुअल को बार-बार टीवी से प्रक्षेपित किया गया है उसमें हम मोदी के इतिहास को नहीं देख पाते, वैविध्य को नहीं देख पाते। मोदी का सिर्फ सीने से ऊपर का हिस्सा ही बार-बार देखते हैं। इसका ही मुखौटे के तौर पर व्यापक प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। मोदी का प्रत्यक्षत: टीवी में सीने के ऊपर का हिस्सा और मुखौटा एक ही संदेश देते हैं कि मोदी कोई व्यक्ति नहीं है। बल्कि ऐसा व्यक्ति है जिसका इकसार सार्वभौम रूप बना दिया गया है। इकसार सार्वभौमत्व मोदी की इमेज को पापुलरकल्चर,मासकल्चर और मासमीडिया के सहयोग से प्रचारित प्रसारित किया गया। यह एक तरह से मोदी की जीरोक्स प्रतिलिपियों का वितरण है। मुखौटे मूलत: मोदी की जीरोक्स कॉपी का कामकर रहे थे। यह नकल की नकल है। किंतु यह ऐसी नकल है जिसका मूल से अंतर करना मुश्किल है। बल्कि अनेक सभाओं में तो मोदी के डुप्लीकेट का भी प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। संभवत: भारत में पहलीबार ऐसा हुआ है कि किसी राष्ट्रीय दल ने अपने नेता के प्रचार के लिए उसके डुप्लीकेट का इस्तेमाल किया हो साथ ही इतने बड़े पैमाने पर नेता के मुखौटों का इस्तेमाल किया गया हो। इससे यथार्थ और नकली मोदी का अंतर ही धूमिल हो गया।
मोदी को नायक बनाने के लिए जरूरी था कि मोदी के मोनोटोनस अनुभव से दर्शकों को बचाया जाए इसलिए तरह-तरह के रोमांचक,भडकाऊ भाषण भी कराए गए। दर्शकों को जोड़े रखा गया। ध्यान रहेमीडिया कभी भी सारवान अर्थ सृष्टि नहीं करता बल्कि बल्कि हाइपररीयल अर्थ की सृष्टि करता है। वह ऐसी चीजें को उभारता है जिसे दर्शक हजम करें।
मोदी ने जिस तरह की हाइपररीयल राजनीति का इसबार प्रदर्शन किया है उसने समूचे राजनीतिक परिवेश और राजनीतिमात्र के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया है। मोदी की इस तरह की राजनीति का हिन्दुओं की मुक्ति अथवा गुजरात के पांच करोड़ लोगों की अस्मिता की मुक्ति के सपने से कोई लेना-देना नहीं है। हाइपरीयल राजनीति की विशेषता यही है कि किसी को भी नहीं मालूम होता कि सूचनाएं जनता में कैसे जा रही हैं। हम सब जानते हैं कि कोई रिमोट कंट्रोल है जो सूचनाओं और प्रचार को नियंत्रित कर रहा है किंतु कौन है इसका किसी को पता नहीं है। मोदी का नया रूप ट्रांसप्लांटेशन की पध्दति की देन है। अभी तक हम संप्रेषण के जिस रूप के आदी थे वह रूप परिवहन और संचार के जरिए प्राप्त हुआ था। ठोस रूप हुआ करता था। किंतु मोदी हाइपररीयलिटी की देन है। संप्रेषण ट्रांसप्लांटेशन की देन है। मुखौटा संस्कृति की देन है। वह वास्तव समय और स्थान के साथ जल्दीएकीकृत हो जाता है। मोदी अपने विचारों और चरित्र का एक ही साथ ,एक ही क्षेत्र में और एक ही समय में एकीकरण करने में सफल रहा है। इसके साथ उसने परिवहन और संचार के संप्रेषण रूपों का भी उपयोग किया है। इसके कारण वह अपनी वैद्युतकीय चुम्बकीय इमेज बनाने में सफल रहा । इस तरह का मोदी तो सिर्फ निर्मित करके ही उतारा जा सकता है। मोदी का प्रचार अभियान रेसकार में भाग लेने वाली कार की तेज गति से हुआ है। यह कार इतनी तेज गति से दौड़ती है कि इसमें एक्सीडेंट भी उतना ही तेज होता है जितना तेज वह दौड़ती है। यह एक तरह का इनफार्मेशन शॉक पैदा करती है। मोदी ने भी यही किया है। उसने अनेक को इनफार्मेशन शॉक दिया है। मोदी ने जिस गति से गुजरात को चलाया है उसमें काररेस की तरह लगातार तकड़े एक्सीडेंट होते रहे हैं। किंतु एक्सीडेंट की खबरें तो खबरें ही नहीं बन पायीं क्योंकि कार रेस का एक्सीडेंट कोई खबर नहीं होता है। बल्कि उसे सामान्य एक्सीडेंट के रूप में पेश किया जाता है। उसे सामाजिक खतरा नहीं माना जाता। मोदी के शासन में जिस तरह की कार रेस चली है उसने यह बोध भी निर्मित किया है कि मोदी से कोई सामाजिक खतरा नहीं है। क्योंकि मोदी हाइपररीयल है, काररेस का हिस्सा है। काररेस में एक्सीडेंट होना सामान्य बात है, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।
       मोदी ने अपनीहाइपरीयल राजनीति के जरिए व्यक्ति को 'डि-लोकलाइज'किया है। व्यक्ति को जब 'डी-लोकलाइज' कर देते हैं तो वह कहीं पर ही नहीं होता। मोदी ने जब राजनीति को हाइपरीयल बनाया तो राजनीति और समाज के बीच वर्चुअल दूरी बनायी और इस वर्चुअल दूरी में ले जाकर लोगों को कैद कर दिया। वर्चुअल दूरी में आप वास्तव के साथ नहीं होते किंतु मजा ले सकते हैं। यह एकदम वर्चुअल सेक्स की तरह है। इसके गर्भ से एकदम नए किस्म के नजरिए और नैतिक सवाल उठ रहे हैं। आप पूरी तरह वर्चुअल नजरिए से देख रहे होते हैं। मोदी को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि उसने वर्चु अल तकनीक को मनुष्य के अंदर उतार दिया और उसके नजरिए का वर्चुअलाइजेशन कर दिया। नजरिए का वर्चुअलाइजेशन व्यक्ति को समाज से दूर ले जाता है साथ ही नजरिए का भी रूपान्तरण कर देता है। वर्चुअल राजनीति में हमें दूर से देखने में मजा आता है। दूर से ही भूमिका अदा करते हैं। यह बिलकुल साइबरसेक्स की तरह है।
      संघ के हिन्दुत्व को देखना है तो उसे किताबों से नहीं देख और समझ सकते। बल्कि आप गुजरात जाकर ही महसूस कर सकते हैं। हिन्दुत्व ने गुजरात का कायाकल्प किया है। गुजरात को व्याख्या और मिथों (गांधी के मिथ) के जरिए नहीं समझा जा सकता। उसके लिए गुजरात जाना होगा और उसे करीब से महसूस करना होगा तब ही संघ का हिन्दुत्व समझ में आएगा। अब तक गुजरात को हमने कहानियों और व्याख्याओं के जरिए ही देखा है उसके वास्तव संसार को महसूस नहीं किया। वास्तव गुजरात न तो रूपान्तरणकारी है और न कल्याणकारी है। वह जितना ही रंगीन है,दरिद्र है,भोगी है,बर्बर है उतना ही वर्चुअल है असुंदर है। आज गुजरात सांस्कृतिक रेगिस्तान की ओर तेजी से प्रयाण कर रहा है।
      बुध्दिजीवियों-लेखकों-संस्कृतिकर्मियों की इसमें बलि देदी गयी है। बौध्दिकता की अब गुजरात में कोई कदर नहीं है। जनता का बुध्दिजीवियों पर कोई भरोसा नहीं रहा। यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मौलिक विचार ,मौलिक सृजन करने वालों को,सत्ताा का प्रतिवाद करने वालों को रेगिस्तान में गाड़ दिया गया है। अब हमारे पास गुजरात के गरबा और मंदिरों और हीरों के प्रतीक भर रह गए हैं। इन्हें ही हम अपनी समृध्दि का प्रतीक मान रहे हैं। मोदी की आंधी ने सभी रंगों को धो दिया है। सभी इमेजों को साफ कर दिया है। संभवत: ऐसा महात्मा गांधी भी नहीं कर पाए थे। क्योंकि गांधी मनुष्य थे। मोदी वर्चुअल मनुष्य है। मोदी के पास मीडिया और तकनीक का तंत्र है जबकि गांधी के पास न तो मीडिया था और न सूचना तकनीक ही थी अगर कुछ था तो सिर्फ रामनाम और आंदोलनकारी जनता थी। मोदी के पास न तो राम हैं और न आन्दोलनकारी जनता है। बल्कि जनता के ऐसे बर्बर झुंड हैं जिनको जनसंहार करने में कोई परेशानी नहीं होती ,बुध्दिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों पर हमले करने में परेशानी नहीं होती। निन्दा से परेशानी नहीं होती। अपने दुष्कर्मों पर लज्जित नहीं होते। वे  वीडियोगेम के खिलाड़ी की तरह व्यवहार करते हैं। खेलते हैं।
    मोदी ने गुजरात को सांस्कृतिक रेगिस्तान बनाया है। मोदी के लिए हिन्दू संस्कृति ही सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। यह निर्भर करता है कि आप हिन्दू संस्कृति की किस तरह व्याख्या करते हैं। मोदी के राज्य में संस्कृति नहीं है। किसी भी किस्म का सांस्कृतिक विमर्श नहीं है। कोई मंत्रालय नहीं है। सिर्फ एक ही मंत्रालय है और एक ही मंत्री है वह है मुख्यमंत्री। मोदी ने निर्मित संस्कृति का वातावरण तैयार किया है। निर्मित संस्कृति के वातावरण का भारत की सांस्कृतिक परंपरा और उसके वातवरण से कोई लेना-देना नहीं है। गुजरात में अब हर चीज उत्तोजक और उन्मादी है। संस्कृति के रेगिस्तान को उपभोक्ता वस्तुओं से भर दिया गया है। मोदी के लिए संस्कृति का अर्थ है सिनेमा, तकनीक,हिन्दुत्व और तेज भागमभाग वाली औद्योगिक जिंदगी। मोदी के लिए स्पीड महान है। तकनीक महान है। हर चीज इन दो के आधार पर ही तय की जा रही है। मोदी के भाषणों में इसी बात पर जोर था कि उसने वे सारे काम मात्र पांच साल में कर दिखाए जो विगत पचपन वर्षों में कोई नहीं कर पाया। इस दावे के पीछे जो चीज सम्प्रेषित की जा रही है वह है स्पीड। मोदी के काम की स्पीड। मोदी स्पीड का नायक है और स्पीड का अत्याधुनिक वर्चुअल सूचना तकनीक के साथ गहरा रिश्ता है। तकनीक,हिन्दुत्व और स्पीड के त्रिकोण के गर्भ से पैदा हुई संस्कृति है,हाइपररीयल संस्कृति है,इसे हिन्दू संस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। मोदी जैसा सोचता है मीडिया भी वैसा ही सोचता है। इस अर्थ में मोदी हाइपररीयल है।
  मोदी ने गुजरात के यथार्थ पर कब्जा जमा लिया है हम वही यथार्थ देख रहे हैं जिसकी वह अनुमति देता है ऐसी स्थिति में यथार्थ को व्याख्यायित करने वाले मोदी के मानकों को निशाना बनाया जाना चाहिए। मोदी आज जिस हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व कर रहा है। वह 1980 के बाद में पैदा हुआ हिन्दुत्व है इसका संघ परिवार के पुराने हिन्दुत्व से कम से कम संबंध है। भूमंडलीकरण से ज्यादा संबंध है। यह अत्याधुनिक तकनीक और अत्याधुनिक बर्बरता के अस्त्रों से लैस है।


  


गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

गुजरात में मोदी फिनोमिना कैसे जन्मा


        गुजरात में विगत 15 सालों में जो मतदाता बने हैं उनमें से अधिकांश बेरोजगारऔर अर्द्ध रोजगार करते हैं। बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज स्वयं में बड़ी समस्या है। इस वर्ग में ''खाओ कमाओ, मौज करो'' की उपभोक्तावादी विचारधारा प्रबल है और इस समुदाय को सकारात्मक और जिम्मेदार राजनीति से नफरत है। यही वर्ग आज सबसे ज्यादा हिन्दुत्व की विचारधारा के पक्ष में है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। अल्पसंख्यकों के प्रति जिस तरह का अभूतपूर्व हिंसाचार सन् 2002 में हुआ था उसमें युवावर्ग की केन्द्रीय भूमिका थी और यही युवावर्ग आज उन्मादी समूह की तरह गुजरात में सक्रिय है। इसमें शहरी मध्यवर्ग से लेकर दलित- आदिवासी का एक हिस्सा भी शामिल था।
    गुजरात के चुनाव में हिन्दुत्व के सामाजिक एवं धार्मिक श्रेष्ठत्व के सिध्दान्त को केन्द्र में रखा गया। मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए जाति और धर्म के समीकरणों का व्यापकरूप में इस्तेमाल किया गया। दंगों के लिए अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा को बुनियादी आधार बनाया । चुनावों में संघ परिवार का एक ही संदेश था भाजपा को मुसनमानों के वोट नहीं चाहिए। अल्पसंख्यकों की गुजरात में कोई जगह नहीं है। वे गैर-कानूनी हैं। वे राज्य में रहना चाहते हैं तो दोयम-दर्जे के नागरिक होकर रहें अथवा शरणार्थी का जीवन जीने के लिए तैयार रहें।  
      गुजरात में संघ का माहौल अचानक नहीं बना है। इसमें संघ परिवार को वर्षों वैचारिक अभियान चलाना पड़ा है। इसकी विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों ने  जमीन तैयार की है। भाजपा के सत्ता में आने के पहले अनेक वर्षों से नए सम्प्रदायों और आश्रमों की गुजरात में बाढ़ आ गयी। सारा गुजरात हिन्दू धार्मिकता में डुबो दिया गया। उनके अनुयायियों का बहुत बड़ा हिस्सा संघ की राजनीति का सामाजिक आधार है। ये ऐसे हिन्दू सम्प्रदाय हैं जिनका पुराने किस्म के हिन्दूधर्म से कोई संबंध नहीं है। बल्कि ये नए युग के भूमंडलीकरण का वैचारिक हिस्सा हैं। ये सम्प्रदाय अपने हजारों-लाखों शिष्यों की टोलियों में उभरकर आए हैं,ये ग्लोबल संप्रेषक हैं। इन धार्मिक सम्प्रदायों की गतिविधियों को सर्वधर्मसद्भाव के नाम पर कांग्रेस ने भी खूब बढ़ावा दिया।

उल्लेखनीय है कि गुजरात में भाजपा के शासन स्थापित होने के पहले भी दंगे होते थे। साम्प्रदायिक गोलबंदियां थीं। किंतु प्रशासन कमोबेश तटस्थ था। किंतु भाजपा के शासन में आने के बाद प्रशासन का भगवाकरण किया गया। इससे समूचे गुजरात में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को टिकाऊ बनाने में मदद मिली।
    भाजपा के गुजरात में शासन में आने के पहले अल्पसंख्यकों को नागरिक माना जाता था,वे नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे थे। किंतु भाजपा के सत्ता में आने के बाद से स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हुआ और सन् 2002 में यह स्थिति बनी अल्पसंख्यकों पर व्यापक हमले हुए और उनकी समूची अर्थव्यवस्था और बस्तियों को नष्ट कर दिया गया। अल्पसंख्यकों को शरणार्थी बना दिया गया। शत्रु बना दिया गया। घृणा का पात्र बना दिया गया। स्थायीतौर पर हिन्दू-मुसलमान के भेद को आमजीवन का हिस्सा बना दिया गया। इस प्रक्रिया में सबसे खराब भूमिका राज्य प्रशासन की रही। उसने अल्पसंख्यकों के अधिकार और जानोमाल की हिफाजत करने से इंकार कर दिया।

मोदी ने अपनी मीडिया रणनीति के जरिए यह सवाल उठाया आप मोदी के पक्ष में हैं या विपक्ष में । आमतौर पर इस तरह का मुद्दा भारतीय राजनीति में सिर्फ एक बार ही हुआ है और वह है 1971 के लोकसभा चुनाव के समय जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसी आधार पर अपनी इमेज बनायी थी और दो-तिहाई बहुमत से चुनाव जीता था।

व्यक्तित्व को दल से महान् बनाने की कला मोदी ने इंदिरा से सीखी है और इस कला के आधार पर कांग्रेस को पीट दिया। कांग्रेस का प्रचार अभियान काफी देर से शुरू हुआ जबकि मोदी ने अपना चुनाव प्रचार अभियान छह महिने पहले से ही शुरू कर दिया था। मोदी ने अपने पांच साल के शासनकाल में प्रशासन और राजनीति को अपने पर ही केन्द्रित रखा और पार्टी का कद कम किया। इससे लोगों में पहलीबार संघ के नायकानुवर्तित्व की धारणा साकार हुई।

संघ की नीति के अनुरूप भाजपा में जनतंत्र नहीं होता अथवा मंत्रालयों को किसी भी किस्म की स्वायत्तता नहीं होती। मोदी ने संघ की धारणा के अनुरूप इमेज निर्मित की और उसके माफिक परिणाम भी निकले। अन्य भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री अभी तक ऐसा नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस ने मोदी के शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों का पुलिंदा जारी किया था किंतु इसमें से किसी को भी आम जनता में प्रचारित नहीं कर पाए।

इसके विपरीत मोदी ने आरंभ से ऐसी इमेज बनाई कि वह भ्रष्टनेता नहीं है। मोदी का कोई परिवार  नहीं है और वह अकेला है अत: उसे आमलोगों को इस तथ्य को गले उतारने में सफलता मिल गई कि वह भ्रष्ट नहीं है। मोदी की साम्प्रदायिक इमेज के बारे में गुजरात के बाहर बातें की जा सकती हैं किंतु गुजरात में उसकी साम्प्रदायिक इमेज पर कांग्रेस ने एक भी शब्द नहीं बोला।
   
मोदी का गुजरात के विकास का नारा एकदम खोखला नारा था, किंतु जनता ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वह नेता पर मुग्ध थी,उसके कद से अभिभूत थी। सच यह है कि भारत के जो छह राज्य सबसे ज्यादा कर्ज में डूबे हुए हैं। उनमें गुजरात का नाम भी आता है। इसके अलावा महाराष्ट्र,पश्चिम बंगाल,केरल,पंजाब और राजस्थान हैं। केन्द्रीय वित्तमंत्री के अनुसार ( हिन्दू बिजनेस लाइन,14 दिसम्बर 2007) गुजरात के पास सन् 2001-02 में जो कर्जा था वह सन् 2006-07 में 45,301 करोड़ से बढ़कर 94,009 करोड़ हो गया। इस अवधि में गुजरात में कर वसूली में सुधार नहीं आया बल्कि सारा राज्य रिजर्वबैंक के कर्ज पर चलता रहा हैं। इसके बावजूद जिस चीज ने मोदी की इमेज में इजाफा किया वह था उसके द्वारा पूंजी निवेश में बढ़त हासिल करना 51 सेज प्रकल्पों को बगैर किसी बाधा के लागू करना। लड़कियों की शिक्षा के काम को प्राथमिकता देना। गांवों में बिजली का पहुँचना और बिजली चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना। बिजली चोरों में ज्यादातर पटेल थे उनके खिलाफ बाकायदा मुकदमे ठोके गए। बिजली चोरी पर एक हद तक अंकुश लगा और राज्य में बिजली उत्पादन और वितरण को पेशेवर शक्ल प्रदान की और इसके कारण गांव के किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ा।
मोदी ने जब विकास को मुद्दा बनाया और प्रचार अभियान के दौरान अपनी उपलब्धियों को गिनाना शुरू किया। ऐसे आंकडों का इस्तेमाल किया जो उसके पक्ष को मजबूत बनाते थे और उन आंकड़ों को छोड़ दिया जो उसके पक्ष को कमजोर बनाते थे। अपने आंकड़े पेश करते समय बार-बार गुजरात के शांत वातावरण का जिक्र जरूर किया। साम्प्रदायिक सद्भाव के उपकरण के तौर पर बिजली,पानी आदि का इस्तेमाल किया। मसलन् बिजली  सभी गांवों में पहुँचायी गयी ,सबके घरों में गयी है ,इस अर्थ में  हिन्दू-मुस्लिम भेद नहीं माना । इससे प्रौपेगैण्डा को हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव के आरोपों के दायरे बाहर ले गया। बिजली और पानी के बहाने भेदभावरहित राजनीति की बात करते हुए मोदी ने असल में भेदभावरहित काल्पनिक इमेज की रचना की और मतदाताओं को आकर्षित किया। मतदाताओं की इच्छाओं के साथ नत्थी किया।
      
    मोदी और कांग्रेस में साझा समझ थी कि दंगे के लिए संघ का नाम न लिया जाए। विकास पर बातें की जाएं। विकास का श्रेय यदि मोदी को मिलता है तो केन्द्र में बैठे कांग्रेस नेताओं को भी श्रेय दिया जाए। दोनों ने ही अपने-अपने तरीके से नए सामाजिक ग्रुपों में पैठ बनाने की कोशिश की। कनवर्जंस की राजनीति का ही असर है कि गुजरात में संघ परिवार का  राज्य की स्वायत्त एवं स्वतंत्र प्रशासनिक संरचनाओं के साथ अंतर खत्म हो गया है। सभी संरचनाएं संघ में समाहित हो गयी हैं।यही फिनोमिना पश्चिम बंगाल में भी है,समस्त संरचनाएं माकपा में समाहित हो गयी हैं।

गुजरात में प्रशासनिक और राजनीतिक संरचनाओं कां संघ परिवार के साथ अंतर मिट गया है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं कह सकते। भाजपा खुलकर संघ के लिए काम करने को तैयार है तो दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस ने 2002 के दंगे का अपने घोषणापत्र में जिक्र तक नहीं किया। संघ के खिलाफ मनमोहनसिह,सोनिया गांधी ने अपने भाषणों में एक भी वाक्य नहीं बोला। बल्कि अखबार की रिपोर्ट बताती हैं कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के चयन में विश्वहिन्दू परिषद के प्रवीण तोगड़िया और अनेक बागी नेताओं के सुझावों का पालन किया।     
पहले राजनीतिक समझ वर्गीय और सामाजिक यथार्थ पर आधारित थी। आजकल वर्गीय-सामाजिक यथार्थ की समझ जगह मुद्दों की समझ प्रधान है। वोटबैंक की राजनीति प्रधान है। समझ का स्रोत वोटबैंक है न कि यथार्थ। समस्याओं को स्वायत्त और सीमित परिप्रेक्ष्य में पेश किया जा रहा है।

पहले यथार्थ में जीते थे अब अतिशयोक्ति में जीते हैं। हाइपररीयल का युग अतिशयोक्ति का युग है।'हाइपर' का अर्थ है 'इससे ज्यादा'। यह ऐसा प्रयोग है जो हमें 'भौतिकवाद-आदर्शवाद', 'व्यक्ति-समग्र', 'धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता', 'हम और तुम' की बिडम्बनाओं के परे ले जाता है। इसका प्रधान लक्ष्य है सामाजिक और कायिक संदर्भ के फ्रेम को एकीकृत करना। इसे एकीकरण की भाषा के जरिए अर्जित किया जाता है। फलत: एकीकृत यथार्थ वैधता अर्जित कर लेता है।
     सच यह है एकीकृत यथार्थ जैसी कोई चीज नहीं होती यथार्थ अपने तरीके से भिन्न दिशा में सक्रिय रहता है। यथार्थ के भिन्न धरातल होते हैं। मसलन्! भौतिकवादियों और भाववादियों , धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता, हम और तुम का धरातल और यथार्थ एक नहीं हो सकता। हाइपररीयल इन सब पर पर्दा डालता है, अन्तर्विरोधों को छिपाता है। यही मोदी का सर्जक है।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

हिंसक फैंटेसी और मोदी का आनंद






    गुजरात में मोदी की सन् 2002 में जब जीत हुई तो सारा देश स्तब्ध रह गया था और जब पांच साल बाद पुन: मोदी जीता तो धर्मनिरपेक्ष लोग विश्वास नहीं कर पा रहे थे और अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। मोदी की जीत के पीछे एक खास किस्म की फैंटेसी काम रही है। जिसे हम हिंसक या हत्यारी फैंटेसी कहते हैं। यह ऐसे लोगों की फैंटेसी है जो संख्या में ज्यादा हो गए हैं कल तक इनकी संख्या कम थी किंतु विगत पन्द्रह सालों में इनकी संख्या बढ़ी है। हत्यारी फैंटेसी के बारे में सामान्यतौर पर एक ही बात जेहन में आती है कि उसे दबाया जाए। किंतु हम अच्छी तरह जानते हैं कि उसे दबाया नहीं जा सकता।

     साम्प्रदायिकता शैतान है। उसका लक्ष्य है भारत पर एकच्छत्र शासन स्थापित करना। इस लक्ष्य को हासिल करने में साम्प्रदायिकता ने कभी आलस्य नहीं दिखाया। साम्प्रदायिक ताकतें जानती हैं कि वे प्रतीकात्मक रणनीति के तहत सक्रिय हैं, प्रतीकों के जरिए ही हमला करती हैं और आमलोगों के आलस्य का दुरूपयोग करती हैं।

 अमूमन साम्प्रदायिक संगठन के प्रतीक हमलों के प्रति हम आलस्य और उपेक्षा का भाव दिखाते हैं। इसके विपरीत संघ परिवार कभी भी अपने प्रतीकात्मक हमलों को लेकर आलस्य अथवा उपेक्षाभाव नहीं दिखाता। काफी लंबे समय से संघ परिवार के एजेण्डे पर मुसलमान और ईसाई हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म है। अब ये हमले वाचिक हमले की शक्ल से आगे जा चुके हैं।

भूमंडलीकरण और नव्य-उदारतावाद के दौर में संघ के प्रतीकात्मक हमले तेज हुए हैं। मोदी इन्हीं हमलों की पैदाइश है। संघ की प्रतीकात्मक जंग का महानायक है मोदी। संघ के प्रतीकात्मक हमलों के निशाने पर जहां एक ओर अल्पसंख्यक हैं वहीं दूसरी ओर ग्लोबलपंथी ताकतें और ग्लोबल प्रतीक और ग्लोबल उत्सव भी हैं।

 हमारे दैनन्दिन जीवन में जिस तरह विध्वंस की इमेजों की फिल्मों के जरिए खपत बढ़ी है ,विध्वंस हमें अच्छा लगने लगा है और उसमें मजा आता है। हमारे इसी विध्वंस और हिंसा प्रेम को हिन्दुत्व ने अपने विध्वंसात्मक कर्मों की वैधता का  विचारधारात्मक अस्त्र बनाया है।

हिन्दुत्ववादी संगठनों के विध्वंसात्मक कर्मों को देखकर अब हमें गुस्सा नहीं आता बल्कि मजा आता है,रोमांचित होते है और ऐसे ही घटनाक्रमों की और भी ज्यादा मांग करने लगे हैं ।यह वैसे ही है जैसे हम हिंसक फिल्में देखते हुए और भी ज्यादा हिंसक फिल्मों की मांग करते हैं। यह वैसे ही है जैसे पोर्नोग्राफी देखकर आप और पोर्नोग्राफी की मांग करते हैं।
      हमने अपने को सहजजात संवृत्तियों के हवाले कर दिया है। सहजजात संवृत्तियों के प्रति हमारे आकर्षण ने संघ के हमलों के प्रति सहिष्णु,उदार और अनुयायी बना दिया है।

जब मुस्लिम बस्तियों पर हमले किए गए और मुसलमानों को जिंदा जलाया गया तो हम भूल ही गए कि ऐसा करके संघ परिवार ने देश की आम जनता को संकेतों के जरिए समझा दिया है कि तुम्हारा हिंसक आनंद का सारा सामान हमारे पास है। अब वे हिंसा के नए खेल के नियम तय कर रहे हैं। नए नियम के मुताबिक संघ परिवार अब ज्यादा उन्मादी,बेलगाम और हिंसक हो गया है। साम्प्रदायिक ताकतें आज इतनी ताकतवर हैं कि वे कहीं पर भी हमला करती हैं और उनके संगठन के मुखिया अथवा हत्यारे लोग खुलेआम घूमते रहते हैं। पहले की तुलना में वे अब ज्यादा असहिष्णु ,आक्रामक और बर्बर हो गए हैं। आज उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं है। उनकी किसी के प्रति जबावदेही नहीं है।
    

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...