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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ग्राम्य -बर्बरता और गाली


फेसबुक पर कुछ लोग गजब तर्क दे रहे हैं,कह रहे हैं गालियों को धर्म के साथ न जोड़ें,हम यही कहेंगे धर्म के साथ जाति,रोटी,बेटी,नौकरी,हैसियत सब जुडी है फिर गाली ने ऐसा खास क्या किया है कि धर्म से काटकर गालियों को देखा जाए !
गाली देने वाले किस धर्म को मानते और जानते हैं,इससे स्वभावतःधर्म के साथ गालियां भी जुड़ेंगी।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीति में गालियों के बिना संप्रेषण संभव है तो गालियां क्यों दी गयीं ?
फेसबुक पर बिना गालियों के बातें कह सकते हैं तो मोदीभक्त गंदी-गंदी गालियां क्यों लिखते हैं ?निश्चित तौर पर उनके संघ प्रतिपादित हिन्दू धर्म में गालियां परिशिष्ट के रूप में सिखाई जाती हों !
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में सबसे पिछड़े इलाके में भी आम लोग अशिक्षित लोग गालियां देकर बातें नहीं करते।गालियां समाज में से कैसे जाएं इस पर हमने सोचा ही नहीं।
हिन्दी के पब्लिक कम्युनिकेशन में गालियां जिस पर तरह प्रचलन में हैं कम से कम बंगला में यह सब नहीं है।बंगाली कभी आपस में बातें करते हुए गालियां नहीं देते,कलकत्ते में बात करते लोग देखें वे आमतौर पर गालियां नहीं बोलते,फिर हिन्दी में ही गालियां क्यों हैं ?
मैं नहीं जानता सच्चाई क्या है लेकिन लगता है हिन्दीभाषी मोदीभक्त फेसबुक पर गालियां ज्यादा देते हैं,उसी तरह आरएसएस से जुड़े संगठनों के हिन्दीभाषी नेता भी सार्वजनिकतौर पर आए दिन गालियां देते रहते हैं।
जंगली बुद्धि में गालियां रहती हैं,बुद्धि का यह रूप कहीं पर भी हो सकता है,लेकिन वहां पर इसका विकास ज्यादा होता है जहां पर ग्राम्य-बर्बरता बची हुई है।हिन्दीभाषी क्षेत्र में ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ हमने कोई जंग नहीं लड़ी,इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ जंग लड़ी और उसे ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी,हिन्दीभाषी क्षेत्र में ऐसा कुछ भी न हो सका।बंगाल गालियों से मुक्त हो गया,लेकिन हिन्दीभाषी मुक्त न हो सके।हिन्दीभाषी क्षेत्र में गाली वाला नायक है,बंगला में एकदम नापसंद किया जाता है,उससे लोग नफरत करते हैं।ममता के खिलाफ माकपा के कई नेताओं ने गंदी गालियों का प्रयोग किया था वे नेता और माकपा आज कूड़े के ढ़ेर पर पड़े हैं।


सोमवार, 11 जुलाई 2016

मध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद और उग्रवाद

         भारतीय मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद इन दिनों चरम पर है। हर रंगत,जातीयता और धर्म के लोगों में इसे सहज ही देख सकते हैं। मध्यवर्ग में यह संकीर्णतावाद सबसे पहले सामाजिक आचार-व्यवहार में दाखिल हुआ,बाद में उसने राजनीति में अपने को अभिव्यक्त किया।मध्यवर्ग के जो लोग सामाजिक संकीर्णतावाद को पालते-पोसते रहे हैं,वे ही राजनीति में साम्प्रदायिक-उग्रवादी-आतंकी-पृथकतावादी भावों –विचारों की ओर मुखातिब हुए। यही वह मध्यवर्ग है जिसने बडे पैमाने पर विभिन्न रंगत के उग्रवादी राजनीतिक रूझानों को सामाजिक आधार प्रदान किया। जो लोग यह सवाल कर रहे हैं कि शिक्षित परिवारों के बच्चे आईएस में कैसे जा रहे हैं ॽ वे जरा गौर करें सभी किस्म के उग्रवादी राजनीतिक विचारों को इसी वर्ग के युवाओं ने अपनाया।उग्रवादी विचारों की ओर मध्यवर्ग के युवाओं का रूझान सामाजिक संकीर्णतावाद की स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया है।इसी वर्ग के युवाओं को हमने देश के विभिन्न पृथकतावादी ,साम्प्रदायिक और आतंकी संगठनों में बड़ी संख्या में उत्तर- पूर्व के राज्यों से लेकर पंजाब तक,कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक देखा है।मिलिटेंसी वस्तुतःमध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद की राजनीतिक अभिव्यक्ति है।आज वही सबसे बड़ा हिन्दुत्ववादी है जो सामाजिक संकीर्णतावादी है।

आजाद भारत में मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद सबसे पहले बंगाली जाति में दाखिल हुआ और यही वजह है कि सबसे पहले नक्सलवाडी आंदोलन में उसने अपने को अभिव्यक्त किया,बंगाली जाति विचारों और सामाजिक संस्कारों में उदार थी,इस उदारता को सबसे गहरी चुनौती नक्सलवाड़ी ने दी,बंगाल के नवोदित आजाद मध्यवर्ग के युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सभी किस्म के उदारतावादी विचारों और राजनीति को ठुकराते हुए नक्सलवाड़ी का रास्ता चुना इसके कारण बड़े पैमाने पर बंगाली युवा तबाह हुआ,सैंकड़ों युवाओं को एनकाउंटर और राजनीतिक मुठभेड़ों के जरिए मौत के घाट उतार दिया गया।अफसोस की बात है कि हमने मध्यवर्ग के अंदर पनप रहे सामाजिक संकीर्णतावाद को कभी प्रमुख मुद्दा ही नहीं बनाया।

      आज स्थिति यह है कि बंगाली मध्यवर्ग पूरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में है।उसने अपराधीदलों के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है।जिन इलाकों में क्रांति थी वहां माफिया वर्चस्व है।नक्सलवाडी तस्करी का केन्द्र है। तमाम किस्म के दो नम्बरी कामों में मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा फंसा पड़ा है। चिटफंड का धंधा,जबरिया पैसा वसूली, राजनीतिक आतंक, बाल विवाह,स्त्री शिक्षा का अभाव,औरतों की बिक्री, मध्यवर्ग का पलायन,सलासी खाप पंचायतों के उत्पीडन, नवोदित मध्यवर्गीय नेपाली जाति में उग्रवादी रूझान,तमाम किस्म अंधविश्वासों और संतों की बाढ़ आदि इसके व्यापक फलक को समेटे हैं। इन सबका ग्राफ क्रमशःबढ़ा है।बंगाली जाति की समूची भद्र अस्मिता का अब लंपट –उग्रवादी अस्मिता में रूपान्तरण हो चुका है।अफसोस की बात है बंगाल में इस सबको कभी चुनौती नहीं दी गयी।इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि बंगाली जाति को आज कोई पहचान ही नहीं सकता।उसकी अस्मिता को संकीर्णतावाद के दुर्गुणों ने हजम कर लिया है। इन दुर्गुणों को बंगाली मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों ने कभी चुनौती नहीं दी,यहां तक कि अखबारों में कभी इन समस्याओं पर गंभीरता से लेख तक नहीं लिखे गए।

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