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बुधवार, 24 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सूचना समाज की नयी भाषा को पहचानो

         सोवियत संघ के पराभव के बाद सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया। सूचना समाज में मार्क्सवाद की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने और उनसे संवाद करने और संपर्क करने के तरीके बदल गए। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और मुहावरों की जगह सांस्कृतिक पदबंधों और मुहावरों ने ले ली। अब सारी चीजें वस्तुओं और उपभोक्तावादी तत्वों के जरिए व्याख्यायित होने लगीं। साहित्य से लेकर राजनीति तक सब जगह उपभोक्तावाद की भाषा और मुहावरे चले आए। मसलन पहले नामवर सिंह की तुलना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ की जाती थी नए दौर में उनकी तुलना अमिताभबच्चन से होने लगी। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी ने उन्हें हिन्दी के अमिताभ बच्चन के नाम से पुकारा। कहने का अर्थ यह है कि सूचना समाज अपने साथ नया यथार्थ और नयी भाषा लेकर आया है और इस नए यथार्थ को पढ़ने के लिए नए किस्म की सैद्धांतिकी की भी जरूरत है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवाद की पांचवी थीसिस में लिखा ‘‘राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों क्षेत्रों के लिए संस्कृति का बढ़ता हुआ महत्व इन क्षेत्रों के सोद्देश्यमूलक अलगाव या विभेदीकरण का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं जिन्सीकरण (कोमोडिफिकेशन) की अपेक्षाकृत अधिक विश्वव्यापी संतृप्ति और प्रवेश है। जिन्सीकरण अब उस सांस्कृतिक क्षेत्र के उन विशाल क्षेत्रों को अपना उपनिवेश बनाने में सक्षम हो गया है, जो क्षेत्र अब तक इससे बचे थे और सचमुच इसके विरुध्द या इसके तर्क से असहमत थे। यह तथ्य कि संस्कृति आज अधिकांशतया व्यवसाय में बदल गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश चीजें जो पहले विशिष्ट रूप से आर्थिक और वाणिज्यिक समझी जाती थी, वे भी अब सांस्कृतिक बन गई हैं, यह ऐसी व्याख्या है जिसमें इमेज सोसायटी या उपभोक्तावाद के विभिन्न निदानों को शामिल करने की आवश्यकता है।’’
‘‘इस प्रकार के विश्लेषण, मसलन जिन्सीकरण (कामोडिफिकेशन) की अवधारणा संरचनात्मक और गैर-उपदेशात्मक, में अपेक्षाकृत अधिक सामान्य रूप में मार्क्सवाद को सैध्दांतिक बढ़त हासिल है। नैतिक मनोवेग राजनीतिक कार्रवाई उत्पन्न करता है लेकिन यह बहुत ही क्षणिक होती है जो शीघ्र ही पुनर्समाहित और पुनर्शमित हो जाती है। यह अपने विशिष्ट विषयों को अन्य आंदोलनों के साथ बांटने के लिए शायद ही प्रवृत्त होती है। लेकिन केवल इस प्रकार के संलयन और निर्माण द्वारा ही राजनीतिक आंदोलनों का विकास और विस्तार संभव है। सचमुच मैं इस मुद्दे को दूसरी तरह से कहना चाहूंगा कि उपदेशपरक राजनीति में वहीं विकसित होने की प्रवृत्ति होती है जहां संरचनात्मक संज्ञान और समाज का मानचित्रण (मैपिंग) अवरुध्द होता है। समाजवाद के असफल होने का बोध होने पर उत्पन्न आक्रोश को आज के संजातीय और धार्मिक प्रभुत्व के रूप में, उस शून्य को नए अभिप्रेरकों से भरने के एक हताश अंध प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।’’
‘‘जहां तक उपभोक्तावाद का संबंध है, यह आशा की जा सकती है कि यदि इसके स्थान पर जान बूझकर कुछ और बिलकुल भिन्न चीज चुनना हो तो यह ऐतिहासिक रूप में उतना ही महत्वपूर्ण सिध्द होगा जितना कि मानव समाज को एक जीवन शैली के रूप में उपभोक्तावाद के अनुभवों से गुजरना। लेकिन विश्व के अधिकांश के लिए उपभोक्तावाद के व्यसन वस्तुनिष्ठ रूप में उपलब्ध नहीं होंगे, तब यह संभव प्रतीत होता है कि 1960 के दशक की रैडिकल थ्योरी का दूरदर्शितापूर्ण निदान : कि पूजीवाद स्वयं ठीक उसी रूप में एक क्रांतिकारी शक्ति है जिस रूप में यह नई आवश्यकताओं और इच्छाओं को जन्म देता है लेकिन जिनकी पूर्ति यह नहीं कर सकता है : नई विश्व व्यवस्था के विश्व स्तर पर प्राप्त होगा।’’
‘‘सैध्दांतिक स्तर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में स्थायी संरचनात्मक बेरोजगारी, वित्तीय सट्टेबाजी और अनियंत्रणीय पूंजी संचलन, इमेज सोसाइटी के ज्वलंत मुद्दे व्यापक रूप में उस स्तर पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं जिसे उनकी अंतर्वस्तु, उनके अमूर्तन का अभाव (ठीक उसके विपरीत जिसे किसी अन्य काल में उनका 'आत्मनिर्वासन' (एलीनेशन) कहा जाता) कहा जा सकता है। जब हम विश्वीकरण एवं सूचनाकरण (इनफार्मेटाइजेशन) जैसे मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते हैं तो द्वंद्वात्मकता का और भी विरोधाभासी स्तर मिलता है। जब नए विश्व नेटवर्कों (वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों) की राजनीतिक और विचारधारात्मक संभावनाओं को आज के विश्व तंत्र की स्वायत्तता के लोप तथा किसी राष्ट्र या क्षेत्र की अपनी स्वायत्तता और अस्तित्व प्राप्त करने की असंभावना या स्वयं को विश्व बाजार से अलग करने की असंभावना के साथ जोड़ा जाता है तो प्रतीयमानत: जबरदस्त असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। किसी एक विचार को अपना लेने मात्र से बुध्दिजीवी इस गलियारे से रास्ता नहीं निकाल सकते। वास्तव में संरचनात्मक विरोधाभासों के परिपक्व होने से ही नई संभावनाओं का विहान होता है। पुनश्च: जैसा कि हीगेल ने कहा होता; हम कम से कम इस असमंजस को 'नकारात्मक से चिपके रहकर' बरकरार रख सकते हैं, उस स्थान को जीवित रखकर जहां से नव्य की अप्रत्याशित रूप से उत्पत्ति की आशा की जा सकती है।’’

बुधवार, 21 जनवरी 2015

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न



राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं! 
    भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है। ये लोग बुनियादी तौर पर दलीय डमी नेता हैं। जो पिटते और पीटते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक हैसियत " सेल- सेल" के बैनर से जैसी होती है।  टीवी बहसों में आमतौर पर रीयल दलीयनेता ग़ायब रहता है। क्योंकि वह रीयल है और वह यदि टॉक शो में पिट गया तो बस जनता के हाथों उसके धुने जाने का भी चांस है।
              कल से टीवी पर बहस हो रही है केजरीवाल और किरनबेदी एक ही मंच पर आएँ बहस करें, कांग्रेस के अजय माकन भी साथ में आने को तैयार हैं। क्या इस तरह की बहस लोकतंत्र के लिए शुभ होगी ?रेटिंग और राजनीतिक गर्मी पैदा करने के लिहाज़ से ऐसी बहस उपयोगी होती है। इसकी मुश्किल यही है कि इसमें वक़्ता का अहंकार बहुत जल्दी नष्ट होता है। इस तरह का कम्युनिकेशन  अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग को जल्दी अपील करता है। दुविधाग्रस्त और तटस्थ शिक्षित मतदाताओं को इस तरह की बहस तेज़ी से नेता विशेष के प्रति आकृष्ट करने में सफल रहती है। 
      दिलचस्प बात यह है कि टीवी पर बहस हो रही है लेकिन रीयल मसलों पर नहीं । रीयल मसलों पर बहस करने में न तो टीवीएंकर की और न नेताओं की दिलचस्पी है। बहस में गैर- जरुरी सवाल वर्चस्व बनाए हुए हैं। मसलन् ,भाजपा में बग़ावत, किरनबेदी को क्यों लाया गया, केजरीवाल ने बनिया क्यों कहा?,इसे टिकट मिला और उसका टिकट कटा, इस नेता ने दल बदला, वह नेता छोड़कर गया, इसका रोड शो या उसका रोड शो। यह सच है कि इस तरह की ख़बरों का समाचार मूल्य है लेकिन चुनाव के असली मुद्दों पर भी तो  बातें हों ! 
     मसलन् , दिल्ली में विगत एक साल में क़ानून - व्यवस्था के हालात क्या थे ? , कितने कारख़ाने खुले या बंद हुए ? कितने नए रोज़गारों का जन्म हुआ ? बिजली उत्पादन और सप्लाई में सुधार आया कि गिरावट आई ?दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कितनी नई नियुक्तियाँ हुईं और दाख़िले में कितनी नई सीटें बढी ? दिल्ली में सड़कों की दशा क्या है और कितनी नई सड़कें बनीं ? नए स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल, कॉलेज कितने खुले ? प्रत्येक क्षेत्र के विधायक के विधायक फंड  की क्या स्थिति है ? कहाँ और किन क्षेत्रों में विधायक निधि से धन खर्च किया गया ?महंगाई की अवस्था क्या ? दिल्ली पुलिस में नई भर्तियाँ कितनी हुईं ? दिल्ली के पर्यावरण में गिरावट आई या सुधार हुआ ? बिजली और पानी का बिल तो बहस में है लेकिन विगत एक साल की तथ्यपूर्ण सूचनाएँ और आंकडे कहाँ हैं? उन पर बहस होनी चाहिए। दिल्ली की अदालतों की दशा पर बहस हो, उनके इंफ़्रास्ट्रक्चर की समस्याओं पर बहस हो तब ही दिल्ली का असली चेहरा सामने आएगा। 
           दिल्ली राजधानी है और सारे बडे चैनलों का गढ़ है लेकिन दिल्ली की जनता सबसे ज्यादा सूचना विपन्न है। यह स्थिति कैसे बदले इस दिशा में कौन से कदम जरुरी हैं ? क्या मीडिया घरानों की पेडन्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कोई नीति  है? 
      हम दिल्ली में रहते हैं , नेताओं और मीडिया से घिरे रहते हैं, सचेतनता के विभ्रम में रहते हैं लेकिन न्यूनतम सत्य भी नहीं जानते ऐसे मे हम सोचें हम सूचना विपन्न क्यों हैं ? सूचना विपन्नता टीवी सम्पन्नता से दूर नहीं होगी, सूचना संपन्न हम तब बनेंगे जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता बनाएँगे। परंपरागत कम्युनिकेशन बंद करके हम कभी भी सूचना संपन्न नहीं बन सकते। हम सोचें कि कैसे बिना विज्ञापन के आम लोग लाखों की संख्या में किसी तिथि विशेष पर गंगा स्नान करने चले जाते हैं? करोड़ों लोग कुंभ में चले जाते हैं! लेकिन मतदान केन्द्रों तक हम इतने व्यापक प्रचार के बावजूद कुंभ मेले जैसी लामबंदी नहीं कर पाते ! 
कहने का आशय यह है कि परंपरागत कम्युनिकेशन जितना ज्यादा होगा लोकतंत्र उतना ही सूचना संपन्न होगा। अमेरिका में देखें वहाँ मीडिया कम्युनिकेशन ख़ूब है, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी बहसें करते हैं लेकिन आम जनता में आधी आबादी वोट डालने तक नहीं जाती । आमलोगों को विभिन्न मसलों पर कोई जानकारी नहीं होती। समग्रता मे देखें तो पाएँगे कि मीडिया कम्युनिकेशन तब ही प्रभावशाली होता है जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता हो। परंपरागत कम्युनिकेशन के अभाव में मीडिया कम्युनिकेशन प्रभावहीन होता है। 

सोमवार, 19 मई 2014

फेसबुक की चुनौतियां

      हिन्दी में फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य,अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं।
फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।
फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम मीडियम है । लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है।
फेसबुक बेहद शक्तिशाली मीडियम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिकयुग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है। ध्यान रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है। जो लोग सिर्फ साहित्य,संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता,कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें ।खोजी खबरें दें। हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश ,राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।
फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुई है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।
हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोडना होगा। राजनीति से जुडने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी,गॉसिप और बाजाऱू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा।
ब्लॉगिंग,फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिए इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा,निजी मन की बातें,निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।
आधुनिककाल की धुरी है राजनीति । आधुनिक साहित्य तब आया जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। प्रेस को पहचान तब मिली जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। कोई भी माध्यम हो या जनमाध्यम हो,संचार हो या जनसंचार हो, साहित्य हो या कलाएं हों वे अपनी आधुनिक पहचान राजनीति से जुड़ने के बाद ही बना पाई हैं। फेसबुक आदि के यूजरों को राजनीति से जुड़ना होगा। इसके बिना यह सामाजिक परिवर्तन का मीडियम नहीं बन सकता।

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

कम्युनिकेशन का बदलता चरित्र

इंटरनेट आने के साथ ही मीडिया और कम्युनिकेशन का समूचा परिवेश बुनियादी रूप से बदल गया है। भारत सरकार तमाम ग्राम पंचायतों, विश्वविद्यालयों,कॉलेजों ,शोध संस्थानों आदि को इंटरनेट से जोड़ने जा रही है। सामान्य तौर पर ई गनर्नेंस की दिशा में हमारा समाज जा रहा है। इससे मानवीय व्यवहार में बुनियादी बदलाव भी आ रहे हैं। पुरानी दूरियां घटी हैं। नई दूरियों ने जन्म लिया है। पुरानी पहचान नष्ट हुई है। नई पहचान सामने आयी है। बातचीत की पुरानी आदतों को नई आदतों ने अपदस्थ करना आरंभ कर दिया है। कहने का अर्थ यह है कि नए संचार माध्यमों ने नए मानवीय व्यवहार,आदतें, संस्कार, एटीट्यूट आदि को जन्म दिया है। इसने संचार के नए असंख्य नए संकेतों को जन्म दिया है। संकेतों के कम्युनिकेशन को नई ऊँचाईयां दी हैं।

कैरोलिन मारविन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, 'इलेक्ट्रॉनिक संचार का इतिहास संचार में तकनीकी क्षमताओं के विकास के बजाए सामाजिक जीवन के व्यवहार संबंधी प्रश्नों पर विचार अधिक करता है। इन प्रश्नों में शामिल हैं कौन बोल सकते हैं और कौन नहीं, किसके पास अधिकार है और किस पर विश्वास करना चाहिए, इत्यादि जैसी समस्याएं।'
 (मार्विन, कैरोलिन, व्हेन ओल्ड, टेक्नोलॉजीज वेयर न्यू : थिंकिंग अबाउट इलेक्ट्रिक कम्यूनिकेशन इन द लेट नाइंटींथ सेंचुरी ,न्यूयॉर्क :ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,1988)
      कैरोलिन दर्शाती हैं कि टेलीफोन के प्रयोग से मात्र दूर-स्थित लोगों के बीच बातचीत ही संभव नहीं हुई : इससे परस्पर बातें करने वालों के बीच की सीमाएं समाप्त होने लगीं अर्थात कौन किससे बातें कर सकता है और किससे नहीं,और इस प्रकार वर्तमान वर्ग-संबंधों पर खतरा पैदा हो गया। इसने प्रेम-संबंध स्थापित एवं विकसित करने के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन ला दिया। इसी प्रकार बिजली के बल्बों ने जन-पैमाने के मनोरंजन के स्वरूपों एवं संस्कृति में बदलाव ला दिए। उदाहरण के लिए, इन बल्बों के कारण रात में खेलों का आयोजन संभव हुआ जिसका जन-संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉनिक संचार महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न खड़े करता है।

मारविन ने लिखा नई इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजियों 'का उद्देश्य हमारी सामान्य सामाजिक गतिविधियां बढाना, उन्हें सरल बनाना और अधिक चुस्त-दुरुस्त करना होता है लेकिन वे उन्हें इस प्रकार पुनर्गठित करते हैं कि वे स्वयं ही नई घटनाएं बन जाते हैं।

मारविन की उपरोक्त धारणाएं महत्वपूर्ण हैं लेकिन संचार माध्यमों के स्वामित्व के सवाल को दरकिनार नहीं किया जा सकता। संकेत,संचार और व्यवहार के अन्तस्संबंध की खोज करते हुए मार्क पोस्टर ने लिखा है '' हर युग में संकेतों के विनिमय के अपने आंतरिक और बाहरी ढांचे होते हैं और संकेतीकरण के माध्यम और संबंध भी। सूचना-पध्दति की निम्नलिखित मंजिलें दरशाई जा सकती हैं आमने-सामने मौखिक विनिमय, छपाई के जरिए लिखित विनिमय और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए विनिमय। पहले वाले में संकेतों का आदान-प्रदान होता है तो दूसरे में संकेतों के प्रतिनिधि का; तीसरे में सूचना का चित्रण होता है। प्रथम, मौखिक, मंजिल में आत्म का निर्माण आमने-सामने के संबंधों की संपूर्णता में उसके स्थान के निर्णय से होता है। दूसरी अर्थात छपाई की मंजिल में आत्म का निर्माण तार्किक काल्पनिक स्वायत्तता के माध्यम के रूप में होता है। लेकिन तीसरी अर्थात इलेक्ट्रॉनिक मंजिल में व्यक्ति का मनोगत अस्तित्व निरंतर अस्थिरता में विकेंद्रित, छितराया हुआ और संख्या में बढ़ता हुआ होता है ।'' ''प्रत्येक मंजिल में भाषा और समाज, विचार और कार्य, आत्म (अस्तित्व) तथा इतर-अस्तित्व के परस्पर संबंध अलग-अलग होते हैं।"

संचार माध्यमों की खूबी है कि इसमें हमेशा वर्तमानकाल में रखकर विचार कर सकते हैं। मसलन आप कितनी ही पुरानी किताब पढ़ें ,पढ़ते समय बार-बार वर्तमान के नजरिए से पढ़ते हैं। यानी कम्युनिकेशन के रूप एक ही साथ ऐतिहासिक और वर्तमान दोनों ही स्थितियों से बंधे होते हैं। संचार के नए और पुराने रूप एक ही साथ वर्तमान में अवस्थित रहते हैं। संचार रूपों पर विचार करते समय यह भी ध्यान रहे कि नया रूप हमेशा पुराने रूप के पूरक के रूम में जन्म लेता है,वह पुराने को अपदस्थ या नष्ट नहीं कर देता। इस तरह संचार रूपों में निरंतरता बनी रहती है। एक-दूसरे के बीच में अन्तर्क्रिया चलती रहती है।

संचार रूपों के बारे में विचार करते समय वर्तमान अपरिहार्य और निर्णायक संदर्भ है। संचार या मीडिया के समस्त विमर्श इसी अर्थ में वर्तमान से जुड़े होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो संचार , अंतर्वस्तु और अवधारणाएं वर्तमान में संचार की अवस्था से पुनर्परिभाषित होती हैं। इसी ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए मार्क्सवादी सूचनाशास्त्री मार्क पोस्टर ने इंटरनेट युग यानी संचार की तीसरी मंजिल के संदर्भ में 'सूचना' की बदली हुई अवधारणा पर विचार करते हुए लिखा ,"तीसरी मंजिल में वह एक विशेष अर्थ (संबंध) धारण करता है। एक अर्थ में अब सारे संकेत सूचना माने जाते हैं, जैसा कि साइबरनेटिक्स में, या आम तौर पर सामान्य अर्थों में भी माना जाता है, जिसमें 'सूचना' को 'शोरगुल' या अर्थहीनता के विपरीत माना जाता है। हमारी संस्कृति में सूचना एक विशेषाधिकार प्राप्त शब्द बन गया है। सूचना सेवाओं संबंधी टी.वी. विज्ञापनों में उपभोक्ताओं और कारपोरेट कर्ता-धर्ताओं को चेतावनी दी जाती है कि यदि वे नवीनतम सूचनाओं से अवगत नहीं होते रहें तो वे और उनके बच्चे सफलता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। सूचना को समकालीन जीवन की सफलता की कुंजी के रूप में पेश किया जाता है। समाज को सूचना में धनी और सूचना में गरीब के बीच विभाजित किया जाता है। अत्याधुनिक सूचनाओं से लैस 'जानकार' व्यक्ति को आज का नया आदर्श बताया जाता है, खासकर मध्यम वर्ग के लिए।"
इसी प्रसंग में सूचना पद्धति के प्रमुख क्षेत्रों के अध्ययन-अध्यापन की ओर भी हमारा समाज मुड़ रहा है।सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है -सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है -

"तीसरी मंजिल में वह एक विशेष अर्थ (संबंध) धारण करता है। एक अर्थ में अब सारे संकेत सूचना माने जाते हैं, जैसा कि साइबरनेटिक्स में, या आम तौर पर सामान्य अर्थों में भी माना जाता है, जिसमें 'सूचना' को 'शोरगुल' या अर्थहीनता के विपरीत माना जाता है। हमारी संस्कृति में सूचना एक विशेषाधिकार प्राप्त शब्द बन गया है। सूचना सेवाओं संबंधी टी.वी. विज्ञापनों में उपभोक्ताओं और कारपोरेट कर्ता-धर्ताओं को चेतावनी दी जाती है कि यदि वे नवीनतम सूचनाओं से अवगत नहीं होते रहें तो वे और उनके बच्चे सफलता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। सूचना को समकालीन जीवन की सफलता की कुंजी के रूप में पेश किया जाता है। समाज को सूचना में धनी और सूचना में गरीब के बीच विभाजित किया जाता है। अत्याधुनिक सूचनाओं से लैस 'जानकार' व्यक्ति को आज का नया आदर्श बताया जाता है, खासकर मध्यम वर्ग के लिए।" इसी प्रसंग में सूचना पद्धति के प्रमुख क्षेत्रों के अध्ययन-अध्यापन की ओर भी हमारा समाज मुड़ रहा है।

सवाल यह है इस अध्ययन के दायरे में किसे शामिल करें। इस पर मार्क पोस्टर ने लिखा है ,"इसमें सूचना के भंडारण और उसे हासिल करने के स्वरूपों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इनमें गुफाओं की चित्रकारी और मिट्टी के पकाए टुकड़ों पर दर्ज जानकारी से लेकर कंप्यूटर के डाटाबेस तथा उपग्रह संचार शामिल हैं। सूचना एकत्र तथा प्रेषित करने का प्रत्येक तरीका संबंधों के ताने-बाने के रूप में समाज पर गहरा प्रभाव डालता है।"

सच यह है आधुनिक समाज की परिकल्पना मीडिया के बिना नहीं की जा सकती। खासकर छापे की मशीन आने के बाद ही हमारा समाज आधुनिक सामाजिक निर्माण की दिशा में सक्रिय होता है। पोस्टर के अनुसार " समकालीन व्यापक उत्पादक समाज की कल्पना छपाई के प्रेस के बिना नहीं की जा सकती। राजनीतिक घटनाएं, समुदाय का स्वरूप, आर्थिक संरचना, यह सब संचार मीडिया से संबंधित होता है। यदि पवन-चक्की सामंतवाद से संबंधित है और भाप का इंजन पूंजीवाद से, तो मार्क्स की ही तर्ज पर मैं कहना चाहूंगा कि इलेक्ट्रॉनिक संचार-प्रणाली सूचना-पध्दति से जुड़ी हुई है। समाज का स्वरूप इस बात से तय होता है कि स्थान और काल किस हद तक संचार को सीमित करते हैं। इसमें शक नहीं कि सूचना पध्दति में स्थान और काल संबंधी दूरी का अध्ययन महत्वपूर्ण है, लेकिन मुख्य मुद्दा कुछ और ही है। उपर्युक्त चर्चा में संचार क्षमता का सवाल तो उठाया गया लेकिन सूचना विनिमय की संरचना का मूल प्रश्न नहीं है। मैं इसे भाषा का आवरण कहूंगा। जब तक हम समाज के बारे में परंपरागत मान्यताओं और सिध्दांतों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाएंगे, संचार से संबंधित दूरियों का प्रश्न परंपरागत दृष्टिकोण में ही बंद पड़ा रह जाएगा, भले ही वह कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो। यदि संचार का काम अन्य गतिविधियों को मात्र बढ़ाना-घटाना ही है तो उसका कोई स्वतंत्र महत्व नहीं है। ऐसी स्थिति में उत्पादन-पध्दति सरीखी नई अवधारणाओं का विशेष औचित्य नहीं रह जाता है। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि किसी भी समाज में संचार की संरचना एक अलग स्वायत्त विश्लेषणात्मक क्षेत्र है, जिसका अपने-आप में अध्ययन किया जाना चाहिए। इसके अलावा बीसवीं सदी में नई संचार पध्दतियों का द्रुत गति से फैलाव सैध्दांतिक और विस्तृत परीक्षण का महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है। हमारे अध्ययन का विषय नई भाषा संरचनाएं हैं जो सामाजिक संबंधों के जाल को काफी बदल देती हैं, संबंध की पुनर्रचना करती है और अपने द्वारा रचित मनोगत अस्तित्वों की पुनर्रचना करती हैं।"

शनिवार, 12 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-2-


     शीतयुद्धोत्तर विचारधारात्मक संघर्ष को विकीलीक ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया है। मजेदार बात यह है कि संचार क्रांति के साथ समाजवाद का अंत आरंभ हुआ था और विकीलीक ने संचार क्रांति के अवसान की घोषणा के साथ अमेरिकी जनतंत्र के मुखौटे को नोंच डाला है। नव्य उदार लोकतंत्र में निहित अधिनायकवादी राजनीति को उजागर किया है। उसका विलोम रचा है। यही वजह है कि विकीलीक के एक्सपोजर के साथ आज रूस के प्रधानमंत्री ब्लादीमीर पुतिन खड़े हैं। रूस का प्रधानमंत्री अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत कर रहा है और ओबामा प्रशासन ने विकीलीक के खिलाफ कड़े कदम उठाने आरंभ कर दिए हैं। अमेरिका में इंटरनेट को नियंत्रित करने के नए उपायों पर विचार चल रहा है जिससे नेट स्वतंत्रता पर बंदिशें थोपी जा सकें।
    समाजवाद को ध्वस्त करने के लिए मीडिया और इंटरनेट से सभी बंदिशें हटाने की मांग की गई थी लेकिन अब बुर्जुआ लोकतंत्र के रौरव नरक के उदघाटन को रोकने के लिए तरह-तरह की बंदिशें लगायी जा रही हैं। विकीलीक ने बुर्जुआ लोकतंत्र और खासकर अमेरिकी लोकतंत्र की जो शक्ल सामने पेश की है वह इतनी कलुषित है कि माफिया गिरोह भी अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे होंगे। खासकर राजनयिकों की भाषा,संवाद और वास्तव जीवन में उनका सार्वजनिक व्यवहार किस तरह पाखंडपूर्ण ,हिंसक,बर्बर होता है यह बात बड़ी ही खूबसूरती के साथ एक्सपोज हुई है।
     उल्लेखनीय है सन् 2006 में विकीलीक ने जब चीन को एक्सपोज करना आरंभ किया था तो पश्चिम का मीडिया और नेतागण उसे सिर पर बिठाए घूम रहे थे। लेकिन ज्योंही विकीलीक ने अमेरिकी बर्बरता, असभ्यता, स्वतंत्रताहरण,दूसरे देशों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप आदि का खुलासा आरंभ किया है चारों ओर मीडिया से लेकर सरकारों तक तहलका मच गया है और अब अमेरिकी साम्राज्यवादी खेमे में एक ही आवाज है असांजे को पकड़ो, मार डालो,वह आतंकी है,जेल में डालो,इंटरनेट पर अबाध स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाओ।
      विकीलीक के एक्सपोजर ने एक बात और सिद्ध की है कि प्रौपेगैण्डा में शीतयुद्ध बरकरार है। शीतयुद्धीय प्रौपेगैण्डा की विशेषता थी सफेद झूठ बोलना। अमेरिकी साम्राज्यवाद ने इराक,अफगानिस्तान,ईरान आदि को लेकर निरंतर सफेद झूठ बोला है। यह बात विकीलीक के खुलासे से सामने आयी है। यह बात भी पुष्ट हुई है कि इराक में अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप के जो बहाने बताए थे वे सब गलत थे। मैनस्ट्रीम मीडिया लगातार यह आभास दे रहा है कि वह सच बोलता है और उसकी नजर सिर्फ खबर पर होती है,खबर की वस्तुगत प्रस्तुति पर होती है। ये सारी दलीलें गलत साबित हुई हैं। खासकर इराक और अफगानिस्तान के बारे में जो कुछ कारपोरेट मीडिया के द्वारा जो बताया जाता रहा है वह गलत साबित किया है विकीलीक ने।
    ग्लोबल मैनस्ट्रीम मीडिया की विशेषता है कि वह शस्त्र उद्योग के इशारों पर चलता रहा है। शस्त्र उद्योग जो कहता है वही बात ये लोग छापते हैं। इसी तरह भारत में मैनस्ट्रीम मीडिया मूलतः वही कवरेज देता है जो यहां के कारपोरेट घरानों के हित में होता है। इसके लिए वे सत्य प्रस्तुति का पाखंड करते हैं। इसके लिए वे ‘कुछ यहां की कुछ वहां की’ पद्धति का इस्तेमाल करते खबरे देते हैं। कभी भाजपा के खिलाफ तो कभी कांग्रेस के खिलाफ,कभी इस कारपोरेट घराने के बारे में तो कभी उस घराने के बारे में,थोड़ी इसकी-थोड़ी उसकी, थोडी घृणा इसके बारे में तो थोड़ा भय उसके बारे में,यही वह बुनियादी मीडिया नीति है जिसके तहत प्रौपेगैण्डा सामग्री परोसी जा रही है।
    विकीलीक के एक्सपोजर ने यह भी धारणा पुष्ट की है कि अमेरिका सीधे हमलावर होकर युद्ध आयोजित करता रहा है। नए दौर में मुख्यधारा के मीडिया का काम सत्य का अनुसंधान करना नहीं है बल्कि सरकार जो कहे,उसका अनुपालन करना है। सरकार जो कहती है उसके बारे में मीडिया सवाल नहीं उठाता। विकीलीक के एक्सपोजर ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि बहुराष्ट्रीय मीडिया अमेरिकी विदेश और गृह नीति का अंधानुकरण करता रहा है।
     अमेरिकी मीडिया की खासतौर पर विशेषता रही है  वह अमेरिकी साम्राज्य विस्तार के लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है। वे देश जो अमेरिका की आलोचना करते हैं मीडिया में उन्हें शत्रु या गैर भरोसेमंद मुल्क के रूप में चित्रित किया जाता है। बहुराष्ट्रीय मीडिया में निगमों का नियंत्रण इतना ताकतवर है कि कोई भी व्यक्ति सामान्य सी प्रतिक्रिया भी शस्त्र उद्योग के खिलाफ नहीं बोलता यदि कोई बोलता है तो उसे प्रकाशित नहीं किया जाता। मीडिया में चीजों को सारहीन और सीमित दायरे में रखकर देखने की बाढ़ आ गयी है। पहले यह बीमारी चंद अखबारों तक सीमित थी,किंतु आज यह मैनस्ट्रीम मीडिया की साझा विशेषता है।
   जूलियन असांजे और दो औरतें-
        विकीलीक के संस्थापक जूलियन असांजे जमानत पर रिहा होकर ब्रिटेन में अपने दोस्त के घर आ गए हैं। लेकिन उन दो औरतों का रहस्य अभी भी पूरी तरह खुला नहीं है। आखिरकार वे दो औरतें कौन थीं ?  उन्होंने असांजे के साथ शारीरिक संबंध क्यों बनाए ? पुलिस को शिकायत क्यों की ? पहली बात तो यह असांजे के साथ कोई स्वतःस्फूर्त्त मुठभेड़ में हुआ प्यार नहीं था। ‘गार्दियन’ (17 दिसम्बर,2010) के अनुसार स्वीडन के सरकारी दस्तावेज बताते हैं असांजे पर इन दोनों औरतों के आरोपों के आधार पर स्वीडन में केस दर्ज है और उसके मुतल्लिक अनेक नए तथ्य भी सामने आए हैं। उल्लेखनीय है असांजे 11अगस्त 2010 को स्टॉकहोम गया था और वहां 10 दिन रूका था। इन 10 दिनों में उसका इन दोनों औरतों के साथ संबंध बना। इनमें से एक औरत ने ,जिसका नाम ‘ए’ है ,उसने पुलिस को बताया कि उसने असांजे की स्वीडन यात्रा की व्यवस्था की थी और उसने ही यह ठीक किया था कि असांजे उसके फ्लैट में रहे क्योंकि वह उस दौरान कुछ दिनों को बाहर जाएगी और फिर जल्दी 13 अगस्त को लौट आएगी। इस महिला के विवरण और ब्यौरे का असांजे ने खंडन किया है।
    असांजे ने स्वीडन की पुलिस को बताया है कि ‘‘he began stroking her leg as they drank tea, before he pulled off her clothes and snapped a necklace that she was wearing. According to her statement she "tried to put on some articles of clothing as it was going too quickly and uncomfortably but Assange ripped them off again". Miss A told police that she didn't want to go any further "but that it was too late to stop Assange as she had gone along with it so far", and so she allowed him to undress her.’’
गार्दियन ने लिखा है श्रीमती ‘ए’ के बयान के अनुसार ‘‘According to the statement, Miss A then realised he was trying to have unprotected sex with her. She told police that she had tried a number of times to reach for a condom but Assange had stopped her by holding her arms and pinning her legs. The statement records Miss A describing how Assange then released her arms and agreed to use a condom, but she told the police that at some stage Assange had "done something" with the condom that resulted in it becoming ripped, and ejaculated without withdrawing.’’
    इस पर असांजे ने बाद में पुलिस के सामने कबूला कि उसने इस महिला के साथ सेक्स किया था लेकिन कंडोम को उसने नहीं फाडा और वह नहीं जानता कि सेक्स करते हुए कंडोम फट गया था। असांजे ने कहा  वह लगातार श्रीमती ‘ए’ के बिस्तर पर बाद के दिनों में सोता रहा ।लेकिन उसने कंडोम फट जाने वाली घटना का कभी जिक्र तक नहीं किया। 14 अगस्त को असांजे ने इस महिला के द्वारा आयोजित एक सेमीनार में भाषण दिया। इसी सेमीनार में दूसरी औरत को भी पहली औरत ने भाग लेने के लिए बुलाया था। बाद में इन दोनों महिलाओं और विकीलीक के कुछ सदस्यों के साथ असांजे ने लंच किया। उसके बाद असांजे दूसरी औरत ( नाम डब्ल्यू) के साथ घूमने निकल गए और उन स्थानों पर गए जहां वह काम करती थी। बाद में उसके साथ सिनेमा देखा। सिनेमा से लौटते समय उस महिला ने असांजे को चूमा और असांजे ने उसके कपड़ों में अंदर हाथ दे दिया। उसी शाम को सुश्री ‘ए’ ने एक पार्टी रखी जिसमें उसने अपनी एक सहेली मोनिका को बताया कि उसने असांजे के साथ बगैर कंडोम के सेक्स किया था ।
    एक अन्य मित्र ने पुलिस को बताया कि सुश्री ‘ए’ उससे कहा था ‘‘she had had "the worst sex ever" with Assange: "Not only had it been the world's worst screw, it had also been violent."। असांजे के मित्रों का मानना है सुश्री ‘ए’ ने सारे समय असांजे को पार्टी में रहने दिया,बाद में उसे अपने फ्लैट में रहने दिया, मिस ‘ए’ का मानना है असांजे ने कंडोम को किसी मकसद से फाड़ा था। उस घटना के बाद उसने असांजे के साथ कभी सेक्स नहीं किया क्योंकि वह हदें पार कर चुका था, जबकि वह उसके घर पर ही रह रहा था।
विकीलीक के एक्सपोजर और जूलियन असांजे के खिलाफ दो औरतों के मुकदमे ने एक साथ दो चीजों को गड्डमड्ड कर दिया है। हमारे सूचना पाने के अधिकार और बलात्कार ये दो चीजें एक साथ गड्डमड्ड हो गयी हैं। असांजे ने दो औरतों के साथ जो भी किया उस पर पर्दादारी और उसकी हिमायत नहीं की जा सकती। उसे यह कहकर भी नहीं टाला जा सकता कि इन दो औरतों में एक औरत सीआईए की एजेंट रही है और क्यूबा विरोधी सीआईए की मुहिम का हिस्सा रही है। असांजे ने कानूनन कामुक अपराध किया है। इसलिए असांजे के विकीलीक एक्सपोजर और कामुक अपराध में अंतर करके चलने की जरूरत है।
असांजे के दल में फूट-
     विकीलीक के संस्थापकों में से एक डेनियल डॉमसिट बर्ग ने कुछ ही अर्सा पहले विकीलीक को तोड़ा है। उन्होंने विकीलीक के विकल्प के रूप में ओपेन लीक नामक वेबसाइट बनाने की घोषणा की है। डेनियल का विकीलीक संस्था में असांजे के बाद दूसरा स्थान था और वे भी ऑइकॉन थे विकीलीक के। डेनियल डॉमसिट बर्ग ने एक साक्षात्कार में कहा है कि आरंभ में विकीलीक के अनुभव की खोजी पत्रकारिता के लिहाज से खूब सराहना की गई। आरंभ में विकीलीक ने छद्म नामों के जरिए एक्सपोजर किए बाद में असली नामों से एक्सपोजर किए।
    बर्ग ने कहा कि 2006 में जब इस प्लेटफॉर्म को आरंभ किया गया था तो इसका लक्ष्य था बुद्धिमान लोगों को सूचनाएं देना। ये सूचनाएं ठोस तथ्यों पर आधारित होती थीं और इनके आधार पर बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। लेकिन कुछ समय के बाद समस्याएं आने लगीं। खासकर अफगान युद्ध के बारे में दस्तावेज लीक होने के साथ विकीलीक में अंदर विवाद उठ खड़ा हुआ।
     अफगान युद्ध का उदघाटन करने के साथ ही विकीलीफ ने अपनी लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन कर दिया। इस रहस्योदघाटन के बाद जिम्मेदारियों और पारदर्शिता के सवालों पर आंतरिक बहस हुई। लेकिन सच यह है हम उतने पारदर्शी नहीं थे। बर्ग ने कहा है  आंतरिक आलोचना और विवादास्पद बातों पर हम ध्यान देने को तैयार नहीं थे।खासकर जो अमेरिका की ओर से सवाल उठाए जा रहे थे उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था।  धीरे धीरे जूलियन असांजे ने आंतरिक आलोचना सुनना बंद कर दिया था और सारी शक्तियां अपने हाथों में एकत्रित कर ली थीं।
     बर्ग के अनुसार अफगान युद्ध के दस्तावेज और वीडियो का उद्घाटन आंतरिक विवादों को सबके सामने ले आया। अमेरिका के आपचे  हेलीकॉप्टर ने कैसे 12 अफगान नागरिकों की हत्या की ,इसके अलावा बगदाद में 2007 के हमले में रायटर के दो पत्रकार भी मारे गए थे उसका वीडियो विकीलीक ने जारी किया था और विवाद चरम पर पहुँच गया था।  इसके साथ अफगानिस्तान के हजारों दस्तावेज भी जारी किए और इस पर हम सबके बीच में विवाद उठ खड़ा हुआ।
    उल्लेखनीय है बर्ग को दुनिया में हैंकिंग का सरगना माना जाता है और वह विश्वप्रसिद्ध जर्मन स्थित हैंकिंग ग्रुप से आए हैं और विकीलीक की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। बर्ग की आलोचनाओं ने असांजे के साथ संबंधों को खट्टा बना दिया और असांजे ने बर्ग को गैर वफादार घोषित करते हुए विकीलीक से सस्पेंड कर दिया। बर्ग ने असांजे के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि उसके ऊपर कामुक दुर्व्यवहार के जो आरोप स्वीडन में लगाए गए हैं उन आरोपों को विकीलीक से अलग रखा जाए और इन आरोपों पर सार्वजनिक हंगामा करने की बजाय शांति से अकेले में ले-देकर मामले को हल कर लिया जाए जिसे असांजे ने नहीं माना और इन दोनों में विवाद हुआ और असांजे ने बर्ग को विकीलीक से निकाल दिया।(क्रमशः)

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-1-


     अंग्रेजी लेखक लेखक जेफ्री आर्चर ने 'टाइम्स ऑफ इण्डिया' को दिए एक साक्षात्कार में कहा है  विकीलीक ने 'समाचार' को नए रूप में जन्म दिया है। यह समाचार के नए रूप की शुरूआत है। इस बयान में एक हद तक सच्चाई है .लेकिन  विकीलीक के बारे में कोई भी समझ ‘नयी विश्व व्यवस्था’ के अमेरिकी फतवे को दरकिनार करके नहीं बनायी जा सकती। शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ अमेरिकी रणनीति क्या रही है और वह किन लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करता रहा है इसे जानने के लिए विकीलीक के दस्तावेज प्रामाणिक सामग्री मुहैय्या कराते हैं। यह समाचार का नया विचारधारात्मक पैराडाइम है।
     अमेरिका ने नयी विश्व व्यवस्था में एकमात्र महाशक्ति के नाम पर किस नरक की सृष्टि की है वह सब विकीलीक ने उदघाटित किया है। अमेरिका का नयी विश्व व्यवस्था के संदर्भ में प्रधान लक्ष्य है यूरोप से लेकर एशिया तक,लैटिन अमेरिका से लेकर पूर्व सोवियत गुट के समाजवादी देशों तक किसी भी क्षेत्र में कोई भी महाशक्ति पैदा नहीं होनी चाहिए। सन् 1992 में कारनेगी इंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के द्वारा जारी एक दस्तावेज में कहा गया है कि मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों को सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिए। इसके लिए सबसे प्रभावी माध्यम है नाटो जिसका हमें इस्तेमाल करना चाहिए। नयी विश्वव्यवस्था का यही वह बुनियादी लक्ष्य है जिसके विध्वंसक स्वरूप का विकीलीक ने रहस्योदघाटन किया है।
        विकीलीक का मामला इंटरनेट और मीडिया में अब ठंडा पड़ गया है। लेकिन उसने जिस तरह अकस्मात सबका ध्यान खींचा और अचानक क्षितिज से गायब हो गया इस पर हमें सोचना चाहिए। हम सब जानते हैं कि यह हाइपर रियलिटी का जमाना है और इसमें सच और झूठ में फर्क करना बेहद मुश्किल होता है। विकीलीक के रहस्योदघाटन ने भी यही स्थिति पैदा की है कि आप तय नहीं कर सकते कि सच क्या है और झूठ क्या है।
     विकीलीक की प्रस्तुतियों का आधार है उपभोक्ता की कम जानकारी और सनसनी की भावना। दूसरी ओर लीक दस्तावेजों में सुसंगत विवेचन का अभाव है। ये दस्तावेज व्याख्या के बिना सीधे परोसे गए हैं। ये लीक मूलतः उत्तर आधुनिक प्रस्तुति हैं। यह हाइपररीयल प्रस्तुति है। इसमें अंशतः सत्य,अंशतः अमेरिकी राष्ट्रवाद,अंशतः अमेरिकी शैतानियां, अंशतःसीआईए की कारस्तानियां,अंशतः भारत की सच्चाई, अंशतः दुनिया के अनेक देशों की सच्चाईयां चली आई हैं। यानी सच्चाई का अंश ही इसकी धुरी है। समग्रता में लीक को पढ़ना संभव नहीं है। अंश में सच को कारपोरेट मीडिया भी पेश करता है और इंटरनेट पर विकीलीक ने भी यही काम किया है फलतः मीडिया फ्लो के उत्तर आधुनिक वातावरण का उसे अधिकांश देशों में सहारा मिला और कारपोरेट मीडिया ने उसे खूब प्रचारित किया।  
   विकीलीक के खुलासे का अमेरिकी साम्राज्यवाद को समझने के लिहाज से महत्व है। अमेरिकी अभिजन,अमीर,कारपोरेट घराने,सीआईए, पेंटागन,विदेश विभाग,राजनेता आदि की मनोदशा और विचारधारा में निहित अलोकतांत्रिक भावबोध को समझने में इससे मदद मिल सकती है। अमेरिकी तंत्र किस तरह के नायकों-खलनायकों और विचारों से चालित है यह भी विकीलीक से पता चलता है।
        29 नवम्बर 2010 को विकीलीक ने 251,287 अमरीकी दस्तावेज और केबल संदेशों को इंटरनेट पर जारी किया। इनमें केबल संदेश 1966 से लेकर फरवरी 2010 तक के हैं। इनमें 274 एम्बेसियों के गुप्त संदेश हैं। इसके अलावा अमरीका के गोपनीय 15,652 केबल संदेश भी हैं। इन संदेशों और दस्तावेजों में एक बात साफ है कि अमरीका विभिन्न देशों में जासूसी करता रहा है। खासकर मित्र देशों के यूएनओ मिशनों की जासूसी करता रहा है। यह कानूनन गलत है। साथ ही इन संदेशों ने अमरीकी लोकतंत्र की नीतियों की पोल खोलकर रख दी है। जो अमरीका को आदर्श लोकतंत्र मानते हैं वे जरा इन दस्तावेजों के आइने में नए सिरे से अमरीका को परिभाषित करें ?
     अमेरिका राजनयिक कामकाज की आड़ में किस तरह दूसरे देशों की संप्रभुता का अपहरण करता रहा है,जासूसी करता रहा है, हस्तक्षेप करता रहा है, और अमेरिकी संविधान में जो वायदे किए गए हैं उनका अमरीकी सत्ता पर बैठे लोग कैसे उल्लंघन करते रहे हैं, यह सब इससे साफ पता चलता है।  यह भी पता चलता है कि अमेरिका दुनिया का भ्रष्टतम देश है।
    तकरीबन 251,287 दस्तावेज जारी किए गए हैं जिनमें 261,276,536 अक्षर हैं। यानी इराक युद्ध के बारे में जितने दस्तावेज जारी किए थे उससे सातगुना ज्यादा । इसमें 274 दूतावासों और कॉसुलेट्स के केबल संदेश हैं। इसमें 15,652 सीक्रेट हैं,101,748 कॉन्फीडेंशियल और 133,887 अनक्लासीफाइड हैं। इनमें सबसे ज्यादा इराक पर चर्चा है। तकरीबन 15,385 केबल संदेशों में 6,677 केबल संदेश इराक के हैं।अंकारा,तुर्की से 7,918 केबल हैं। अमरीका के स्टेट ऑफिस सचिव के 8017 केबल संदेश हैं। अमरीका के वर्गीकरण के अनुसार विदेशी राजनीतिक संबंधों पर 145,451 ,आंतरिक सरकारी कार्यव्यापार पर 122,898,मानवाधिकार पर 55,211, आर्थिकदशा पर 49.044,आतंकवाद और आतंकियों पर 28,801 और सुरक्षा परिषद पर 6,532 दस्तावेज हैं। मोटे तौर पर विकीलीक ने जुलाई 2010 में अफगानिस्तान से भेजी 92,000 सैन्यमोर्चे की लीक प्रकाशित कीं जिनमें बताया गया था कि अफगानिस्तान में 20 हजार निर्दोष नागरिक सैन्य हमलों में मारे गए हैं।
    सन् 2010 के अक्टूबर में इराक के बारे में चार लाख दस्तावेज प्रकाशित किए गए जिनमें बताया गया कि अमेरिका और मित्रदेशों के हमलों में हजारों निर्दोष इराकी नागरिकों की मौत हुई है।साथ ही बड़े पैमाने पर यातनाशिविरों में भी इराकी नागरिकों का उत्पीड़न हो रहा है।
    इस लीक के दो आयाम है पहला आयाम है सूचनाओं का उदघाटन और दूसरा आयाम है इंटरनेट नियंत्रण। पहले का संबंध सत्य की भूख से है ,दूसरे का संबंध सत्य के दमन से है। यह नए युग का बड़ा अन्तर्विरोध है जिसे हम सत्य की चाह और दमन के अन्तर्विरोध के रूप में जानते हैं। यह अमेरिका नियंत्रित नयी विश्व व्यवस्था का प्रधान अन्तर्विरोध है।
      असल में विकीलीक के बहाने से अमरीकी प्रशासन इंटरनेट पर अंकुश लगाना चाहता है। वे इंटरनेट पर उन तमाम राजनीतिक खबरों को सेंसर करना चाहते हैं जो अमेरीकी प्रशासन को नागवार लगती हैं। स्थिति का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि ओबामा प्रशासन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के नेट पर विकीलीक पढ़ने पर पाबंदी लगा दी है। कई कांग्रेस सदस्य और ज्यादा व्यापक पाबंदी की मांग कर रहे हैं,कुछ ने विकीलीक के संस्थापक की गिरफ्तारी की मांग की है। लाइब्रेरी आफ कांग्रेस ने अपने सभी कम्प्यूटरों पर इस लीक को पढ़ने से रोक दिया है। यहां तक कि रीडिंग रूम में नहीं पढ़ सकते। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डिप्लोमेटिक छात्रों को इस लीक को पढ़ने से वंचित कर दिया गया है,उनके पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी है। उन्हें कहा गया है कि इस रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी न करें। कई सीनेटरों ने ऐसे कानून बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है जिसके आधार पर गुप्त दस्तावेज प्रकाशित करना और पढ़ना अपराध घोषित हो जाएगा। अमरीकी कानून संरक्षकों ने कॉपीराइट के उल्लंघन का बहाना करके कुछ इंटरनेट डोमेन को बंद करा दिया है। ये सारी बातें अमरीका में अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे की सूचना दे रही हैं।
विकीलीक के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के लीक अमरीका में होते रहते हैं, खासकर जो व्यक्ति कल तक विदेश विभाग में राजनयिक की नौकरी कर रहा था वह ज्योंही सेवामुक्त होता है अपने साथ ढ़ेर सारे गुप्त दस्तावेज ले जाता है और उनका रहस्योदघाटन करने लगता है। इसी प्रसंग में न्यूयार्क स्थित राजनीतिविज्ञानी प्रोफेसर डेविड मिशेल ने महत्वपूर्ण बात कही है। डेविड ने लिखा है कि इसमें रहस्योदघाटन जैसा कुछ भी नहीं है। विकीलीक के दस्तावेज महत्वपूर्ण है लेकिन उतने नहीं जितने कहे जा रहे हैं। ये पेंटागन के रूटिन दस्तावेज हैं। ये महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि इनमें अमरीकी सरकार की कथनी और करनी के भेद को साफ देखा जा सकता है। इस अंतर को ही ‘आकर्षक अमरीकी‘झूठ’ कहा जा सकता है।

विकीलीक की सूचनाएं सामान्य सूचनाएं नहीं है,यह महज गॉसिप नहीं है,यह एक्सपोजर मात्र नहीं है,यह कोई षडयंत्र भी नहीं है,बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत जारी की गयी राजनीतिक सूचनाएं हैं, कूटनीतिक सूचनाएं हैं। इनके गंभीर दूरगामी परिणाम होंगे। इसके बहुस्तरीय और अन्तर्विरोधी अर्थ हैं।
    एक बात सामान्य रूप में कही जा सकती है कि विकीलीक के एक्सपोजर ने इंटरनेट स्वतंत्रता की परतें खोलकर रख दी हैं। इसने अमेरिका के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पाखण्ड को एकसिरे से नंगा कर दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहां तक आप राज्य की सत्ता और संप्रभुता को चुनौती नहीं देते।
   विकीलीक का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है संचार क्रांति ने अपना दायरा सीमित करना आरंभ कर दिया है। तीसरा संदेश यह है  उत्तर आधुनिकतावाद का अंत हो गया है। विकीलीक ने संचार क्रांति के साथ आरंभ हुए उत्तर आधुनिकतावाद को दफन कर दिया है। यह नव्य उदारतावाद के अवसान की सूचना भी है।(क्रमशः)



मंगलवार, 6 जुलाई 2010

साइबरयुग में प्रतिक्रांति के नए रूप

     साइबरयुग में प्रतिक्रांति के तरीके वे ही नहीं हैं जो शीतयुद्ध के जमाने में थे। साइबरयुग की केन्द्रीय उपलब्धि है समाजवाद का अंत। इस अंत को संभव बनाने में समाजवादी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों के आंतरिक कलह ,भ्रष्टाचार,बर्बर व्यवहार की प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन सारी दुनिया में सूचना क्रांति और साइबर संस्कृति के प्रसार ने समाजवाद के खिलाफ नए किस्म की चुनौतियों को प्रस्तुत किया है। इन चुनौतियों का सबसे अच्छा रूप समाजवादी देशों में ही नजर आ रहा है और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूचना के अबाधित प्रवाह में नजर आ रहा है।
   साइबरयुग में अभिव्यक्ति को बाधित करना प्रतिक्रांतिकारी कार्य है। परवर्ती पूंजूवाद के पहले अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना संभव था। इसलिए वह तार्किक भी लगता था। उस जमाने में सेंसरशिप का तर्क पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही संगति में था। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद ने सेंसरशिप को आत्म-सेंसरशिप में बदल दिया है। यही वजह है कि पूंजीवाद बड़े पैमाने पर इन दिनों आत्म-सेंसरशिप पर जोर दे रहा है।
    आत्म-सेंसरशिप कारपोरेट संस्कृति का आज अभिन्न हिस्सा है। मीडिया को भी आत्म-सेंसरशिप अपनाने के लिए कारपोरेट घरानों ने बाध्य कर दिया है। इसके चलते सतह पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महसूस होती है वास्तव में आत्म-सेंसरशिप जारी है। सतह पर हम आजादी महसूस करते हैं लेकिन वास्तव जिंदगी में साइबर निगरानी के दायरे में रहते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि जिस तरह क्रांति का मुहावरा बदला है वैसे ही प्रतिक्रांति का मुहावरा भी बदला है।
      समाजवादी चीन और क्यूबा में ऐसा बहुत कुछ घट रहा है जो प्रतिक्राति की कोटि में आता है। परवर्ती पूंजीवाद के पहले समाजवाद के खिलाफ बाहर से सैन्य और गैर-सैन्य हमले संगठित किए जाते थे। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद के दौर में समाजवाद के अंदर से प्रतिक्रांतिकारी हमले संगठित किए जा रहे हैं। पहले पूंजीपतिवर्ग और अमेरिका आदि साम्राज्यवादी देश इन हमलों को नियोजित करते थे,लेकिन परवर्ती पूंजीवाद में स्वयं साम्यवादी कतारों के अंदर से क्रांति के खिलाफ संगठित हमले हो रहे हैं। सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों में साम्यवादी शासन के पराभव का यह बुनियादी कारण है।
      स्वयं से नफरत करना,अपनी भाषा,अपने विचार.अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता से नफरत करना परवर्ती पूंजीवाद का बुनियादी मंत्र है। एक वाक्य में कहें कि परवर्ती पूंजीवाद स्वयं से नफरत पैदा करने के चक्कर में व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ खड़ा कर देता है और इसके चलते मानव मात्र के प्रति नफरत.बेगानापन,उपेक्षा आदि को एक आमफहम फिनोमिना बना देता है। व्यक्ति का व्यक्ति के ऊपर से विश्वास खत्म हो जाता है। अब एक-दूसरे पर अविश्वास और संदेह करने लगते हैं। यह फिनोमिना समाजवादी देशों में परवर्ती पूंजीवाद की विश्वव्यापी प्रक्रिया के माध्यम से  प्रवेश करता है और समाजवाद धराशायी हो जाता है। लेकिन जिन देशों में अभी साम्यवादी दलों का शासन है ,खासकर चीन और क्यूबा में उन्हें तो कम से कम इन चीजों से बचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि चीन और क्यूबा में परवर्ती पूंजीवाद के प्रतिक्रांतिकारी संस्कार तंजी से फल फूल रहे हैं।
      प्रतिक्रांति का पहला रूप है साइबरयुगीन वास्तविकताओं से इंकार। साइबरयुग की विश्वव्यापी प्रवृत्तियों की अनदेखी से प्रतिक्रांति की प्रबल संभावनाएं हैं। मसलन नागरिकों को रीयल टाइम कनेक्टविटी से वंचित करना प्रतिक्रांति है। साइबर जासूसी प्रतिक्रांति है। सरकारी एक्शन को हमेशा सही ठहराना,टीवी या मीडिया में सरकारी भोंपू के रूप में काम करना, यानी सरकारी प्रचारक के रूप में काम करना प्रतिक्रांति है।
    चीन में नागरिकों को सरकार के पक्ष में लिखने के लिए पैसा दिया जाता है। खासकर इंटरनेट पर लिखने लिए लेखकों को प्रति पोस्ट पचास सेंट दिए जा रहे हैं। इस पद्धति के जरिए आम जनता का मुँह बंद करने वालों का नेटवर्क तैयार किया गया है। उन लोगों को खासकर निशाना बनाया जा रहा है जो कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों से असहमत हैं। साइबरयुग में असहमति को कुचलना प्रतिक्रांति है, व्यर्थ का प्रयास है।
     साइबर संस्कृति का प्रभाव है कि आज चीन में इंटरनेट पर दस लाख से ज्यादा फोरम हैं और 20 करोड़ से ज्यादा ब्लॉग हैं। हजारों चाटरूम हैं। प्रतिदिन हजारों नए ब्लॉग बन रहे हैं। चीन परेशान है इस साइबर संस्कृति के प्रसार से। चीन के बारे में प्रतिदिन सत्य के नए रूप इंटरनेट में सबसे पहले उद्घाटित हो रहे  हैं।
    चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बेवसाइट पर किसी भी किस्म की टिप्पणियां नजर नहीं आतीं अथवा एक-दो टिप्पणियां नजर आती हैं। मसलन् पीपुल्स डेली ऑन लाइन,झिंहुआ ऑनलाइन पर इक्का-दुक्का कमेंट हैं। सीना डॉट कॉम जैसे चीन के सबसे बड़े कॉमर्शियल इंटरनेट पोर्टेल पर 373 कमेंट हैं।
     मजेदार बात यह है कि चीन में यूजर वही राय व्यक्त कर सकते हैं जिसकी कानून इजाजत देता है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में लिखने वालों को प्रति पोस्ट पचास सेंट देने का रिवाज चलाकर अभिन्यक्ति को एक तरह से खरीदा जा रहा है। सवाल यह है कि पैसे के लालच में लिखी बातें क्या सच पर रोशनी डाल पाएंगी ?
     इसी तरह सरकारी प्रयासों से आधिकारिक तौर पर नेट पर राय देने वालों की ऑनलाइन टीमें पार्टी के द्वारा बनाई जा रही हैं। गंगजू प्रदेश में ऐसी ही ऑनलाइन कमेंट लिखने वालों की 650 लोगों की टीम बनाई गई है जिसका वेस्टर्न बिजनेस पोस्ट नामक अखबार ने खुलासा किया है। इन लोगों का काम है नेट पर जाना और विभिन्न स्थानों पर टिप्पणियां लिखना। बेवसाइट,ब्लॉग,बेव बुलेटिन आदि पर कमेंट लिखना। चीन में इंटरनेट और साइबर संस्कृति का इतना व्यापक विस्तार साम्यवाद के कारण नहीं हुआ है बल्कि साइबरसंस्कृति और संचार क्रांति के कारण हुआ है। संचार क्रांति परवर्ती पूंजीवाद की देन है। साम्यवादी क्रांति की नहीं।                    





मंगलवार, 4 मई 2010

मानव सभ्यता का महासमुद्र है डिजिटल संस्कृति

      मानव सभ्यता का चरमोत्कर्ष है डिजिटल संस्कृति। संस्कृति के नए सोपानों और नई ऊँचाईयों को डिजिटल संस्कृति का स्पर्श करते सहज ही देखा जा सकता है। डिजिटल संस्कृति हमारी संस्कृति का महासमुद्र है। मानव सभ्यता का सबसे बड़ा खजाना है।
        इंटरनेट का आनंद लेते हुए हम भूल गए कि इंटरनेट का पैराडाइम ही बदल गया है। ब्लॉगिंग, सोशल नेटवर्किंग, ईमेल,चैट,बेवसंचार, फेसबुक,ट्विटर ,डिजिटल फिल्म, डिजिटल संचार, डिजिटल रेडियो, डिजिटलजनित वर्चुअल रिश्ते ,वर्चुअल खबर आदि की आनंद यात्रा में पता नहीं कब पैराडाइम ही बदल गया।
     हमारा समाज धीरे-धीरे डिजिटल संस्कृति और सभ्यता में दाखिल होता चला जा रहा है। चारों ओर इंटरनेट ने सूचनाओं और संवाद का विस्फोट पैदा कर दिया है। भूमंडल में ग्लोबल-लोकल डिजिटल मंडल का नया संसार बन गया है। इस डिजिटल संसार ने हमारी वास्तव जिंदगी पर गहरा असर डाला है।
  डिजिटल संस्कृति ने ज्यादा से ज्यादा डिजिटल संचय करने की आदत पैदा की है। आज प्रत्येक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा डिजिटल सामग्री का संचय करना चाहता है। हाल ही में एक रिसर्च सामने आई है जिससे पता चला है कि हम जैटाबाइट के युग में दाखिल हो चुके हैं। रिसर्च से पता चला है कि सन् 2009 में डिजिटल संसार में बासठ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यानी पिछले साल आठ लाख पेटाबाइटस की वृद्धि हुई। एक पेटाबाइटस में दस लाख गीगाबाइटस या 0.8 जेटाबाइटस होते हैं। ये सूचनाएं कुल मिलाकर 75 बिलियन आईपेड में स्टोर हो सकने वाली सामग्री के बराबर है।
     डिजिटल संस्कृति के आने के पहले और बाद में मनुष्य की ज्ञान संपदा और उसके संचय की प्रवृत्ति में मूलगामी बदलाव आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल संस्कृति के आने के पहले समस्त मानव जाति के द्वारा जितनी भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता था और उसके पास जितनी ज्ञानराशि थी उसको डिजिटल रुप में मात्र पांच हजार पेटाबाइटस में संचित किया जा सकता है। यह डिजिटल संस्कृति के युग के आने बाद जितना कंटेंट पैदा हुआ है उसके एक प्रतिशत अंश से भी कम है। सन् 2010 की 1 जनवरी को जब कम्प्यूटर खोले गए तो देखा गया कि डिजिटल संस्कृति आने के बाद सारी दुनिया की मानव जाति के पास 1.2 जेटाबाइटस सामग्री संचित हुई है।           
  बिट्स और बाइटस के बारे में हाल ही में प्रकाशित चौथे विश्व सर्वेक्षण से पता चला है कि हम अब जेटाबाइटस के युग में पहुँच गए हैं। यह सर्वेक्षण आईडीसी ने किया और इसे ईएमसी फर्म ने प्रायोजित किया है। यह सर्वेक्षण बताता है कि विश्व तेजी से डिजिटल संस्कृति में शामिल हो रहा है। समस्त पुराना मीडिया अपने को डिजिटल में रुपान्तरित कर रहा है। लाइब्रेरी भी डिजिटल में जा रही हैं। इसका अर्थ है कि डिजिटल में कंटेंट संचय की अनंत संभावनाएं हैं। हम धीरे -धीरे डिजिटल संस्कृति के आदि हो जाएंगे। खासकर मोबाइल फोन,डिजिटल कैमरा आदि आने के बाद डिजिटल संचय में जबर्दस्त उछाल आया है। पहले जो व्यक्ति एक फोटो खींचकर काम चलाता था अब 20 फोटो खींचता हैं उन्हें डिजिटल रुप में संचित और प्रचारित भी करता है। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका में डिजिटल संस्कृति पैदा हुई लेकिन चीन ने डिजिटल संस्कृति के मामले में अमेरिका को काफी पीछे छोड़ दिया है। आज चीन में अमेरिका से ज्यादा साधारण लोग डिजिटल उपकरणों का आम जीवन में ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।
   डिजिटल संस्कृति का 70 प्रतिशत कंटेंट निजी तौर पर व्यक्तियों के द्वारा पैदा किया जाता है लेकिन इसके संचय और संरक्षण का दायित्व कारपोरेट कंपनियों के ऊपर है। इसके कारण सूचना का वस्तुकरण और लोकतांत्रिकीकरण हुआ है। डिजिटल संस्कृति की अधिकांश सामग्री अनिर्देशित ढ़ंग से तैयार की गई है,अतः उसकी आसानी से इंडेक्सिंग,छटाई,वर्गीकरण आदि करना संभव नहीं है।
      संक्षेप में जान लें कि ये बिटस और बाइटस क्या हैं- कम्प्यूटर में शून्य और एक का बायनरी सिस्टम है, जैसे ऑफ /ऑन स्विच होता है। एक बिट सिर्फ शून्य होगा या एक होगा। एक बाइटस में आठ बिटस होते हैं। ये दोनों पदबंध को सबसे पहले 1950 के दशक में आईबीएम के वार्नर बुचोल्ज ने ईजाद किया।
     कम्प्यूटर के द्वारा जो भी काम किया जाता है उसका गणित बिठाया जाता है उसमें सबसे छोटी ईकाई है बिट्स।बिटस को जब हजार गुना कर दें तो किलोबाइटस हो जाता है। मसलन् 1,000 बाइट्स एक किलोबाइट्स (केबी) के बराबर है। 2 केबी में टाइप किए एक पन्ने के बराबर सामग्री आती है। 1,000 केबी एक मेगाबाइटस (एमबी) के बराबर है। इसी तरह 1,000 मेगाबाइटस (एमबी) एक गीगाबाइटस (जीबी) के बराबर , एक जीवी आईपोड में 240 गाने भरे जा सकते हैं। 
    1,000 जीबी एक टेराबाइटस (टीबी) के बराबर  और 1,000 टीबी एक पेटाबाइटस ( पीबी) के बराबर ,1,000 पीबी एक इक्साबाइटस (इबी) के बराबर होता है।
     आज तक मनुष्य जाति के द्वारा जितने शब्द बोले गए हैं वे 5 इक्साबाइटस के डाटा के बराबर हैं। 1,000 इबी एक जेटाबाइटस के बराबर है। एक जेटाबाइटस में  1,000,000,000, 000,000,000,000 बाइटस होते हैं। डाटा की भाषा में यह अमेरिका के अकादमिक पुस्तकालयों में संचित सामग्री से 5 लाख गुना ज्यादा है। अभी तक कोई कम्प्यूटर नहीं आया है जो इतना डाटा एक साथ संचित कर सके।         
                 




रविवार, 20 सितंबर 2009

इंटरनेट ,जनान्दोलन और भारतीयता

इंटरनेट के प्रसार ने एकदम नए किस्म के सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक जन-जागरण की शुरूआत की है।ग्लोबल स्तर पर विचारों के आदान-प्रदान के साथ ग्लोबल स्तर के नए सामाजिक आंदोलनों के लिए जनता की शिरकत की अपार संभावनाओं को खोला है। ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ विश्वस्तर पर जनता और स्वैच्छिक संगठनों की लामबंदी को एकदम नई ऊँचाईयों पर पहुँचाया है।जनतंत्र के एकदम नए अध्याय की शुरूआत की है।
ग्लोबलाइजेशन वि‍रोधी,युध्द विरोधी,पर्यावरणवादी,स्त्रीवादी और जनतंत्रवादी संघर्षों के पक्ष में विश्वस्तर पर जनता और संगठनों को गोलबंद करने और जागृति पैदा करने में इंटरनेट सबसे आगे है। इंटरनेट उस अमूर्त्त जनता को जगाता है जिसे अभी तक देखा नहीं है।उन्हें एकजुट करता है जो हाशिए पर थे।सामाजिक,राजनीतिक,पर्यावरण,शांति आदि के सवालों पर साधारण जनता को अपने विचार व्यक्त करने और चेतना विकसित करने का मौका देता है।आम जनता को ज्वलंत सवालों पर विवादों में शामिल करता है।यह असल में डिजिटल नागरि‍कता है। यह राष्ट्र-राज्य के दायरे को तोड़ती है।
राष्ट्र-राज्य ने नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को सीमाबध्द किया।जबकि डिजिटल जनतंत्र इन सीमाओं को तोड़ता है।वह ग्लोबल नागरिकता,ग्लोबल अस्मिता,ग्लोबल राज्य,ग्लोबल प्रशासन और ग्लोबल ध्रुवीकरण और लामबंदी को संभव बनाता है।इस पहलू का आदर्श नमूना है पर्यावरणवादी ग्रीन मूवमेंट।
आज समस्त दुनिया गंभीर प्रशासनिक एवं राजनीतिक संकट से गुजर रही है। कामकाज,प्रशासन के पुराने तरीके और कानून पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए हैं।इस स्थिति का बहुराष्ट्रीय कंपनियां तेजी से लाभ उठा रही हैं।सरकारों को कमजोर बनाया जा रहा है।आंतरिक तनावों को हवा दी जा रही है।राष्ट्र-राज्य के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का संकट पैदा हो गया है।ऐसी अवस्था में इंटरनेट ने सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी की अनंत संभावनाओं को पैदा किया है।सोई हुई जनता की आशाओं को जागृत किया है।राष्ट्र-राज्य के अप्रासंगिक होने के क्रम में कम्युनिकेशन के क्षेत्र में गहरी अनास्था पैदा हुई।साधारण लोगों का विश्वास डिगा।किंतु इंटरनेट ने इस कमजोर स्थिति में प्रभावी हस्तक्षेप की संभावनाओं को पैदा करके हमें नए सिरे से संप्रेषित करने,अपने विचारों के आदान-प्रदान को प्रेरित किया है।पुस्तक और पढ़ने की आदत को संजीवनी दी है।जनतंत्र के संबंध में कमजोर पड़ती जा रही धारणा को खत्म किया है।
आज जितने भी नए आंदोलन उठकर सामने आ रहे हैं वे सब राष्ट्र-राज्य की सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं।आज ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक दल और स्वैच्छिक संगठन इंटरनेट और कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इंटरनेट के आने के बाद इ-मीडिया के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसारण की संभावनाएं बढ़ गई हैं।आज हमें स्थानीय रेडियो स्टेशनों के माध्यम से इंटरनेट पर उपलब्ध माध्यम सामग्री के ज्यादा से ज्यादा उपयोग की संभावनाओं पर सोचना होगा।
इंटरनेट पर काम करने के लिए साइबर पध्दतियों के बारे में हमें अपनी समझ साफ रखनी होगी।इंटरनेट के चार काम हैं। 1.अभिव्यक्त करना,2.संरक्षण करना,3.सूचना संकलन और 4.हस्तक्षेप करना।अभिव्यक्त करने के कामों में ई मेल,चाट,वेबसाइड अपलोडिंग,फाइल शेयरिंग।संरक्षण कार्यों में प्रमाणीकरण,फिल्टरिंग,इन्क्रिपटिंग, रीमेलिंग। सूचना संग्रह में वब ब्राउजिंग,वेब डाटा संकलन, हेकिंग पर नजर रखना,जासूसी।हस्तक्षेप करने के क्षेत्र में हासिल न करने देना,सेवा देने से इंकार,वेबसाइड को हटाना,विकृत कोड भेजना,डोमेन को कब्जे में लेना,तोड़फोड़ करना।
आज इंटरनेट ग्लोबल फिनोमिना है।जनतांत्रिक सोच,जनतांत्रिक प्रक्रिया और अधिकारबोध को पैदा करने और सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ाने में सबसे आगे है।यह भी संभव है कि इंटरनेट के जरिए जनता को गकया जाए।जातीय और जनजातीय सामाजिक समूहों में चेतना का विस्तार करने ,उनके अतीत का ज्ञान कराने का महत्वपूर्ण उपकरण है।ग्लोबलाइजेशन ने समुदाय और अस्मिता के सवालों को हमारे घरों तक पहुँचा दिया है।पहले ये दोनों राष्ट्र-राज्य के परिप्रेक्ष्य से बंधे थे।किंतु ग्लोबलाइजेशन के कारण राष्ट्र-राज्य अपनी सीमाओं को तोड़ने को मजबूर हुआ।आज वह ग्लोबल अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।आज उसे ग्लोबल अर्थव्यवस्था के विश्वासों पर खरा उतरना है।ग्लोबल अर्थव्यवस्था के रास्ते पर चलने के कारण पूंजी ,जनता की सीमापार यात्राएं,शरणार्थी सवस्या,देश की सीमा का अतिक्रमण आदि मसले प्रमुख हो उठे हैं।
दूसरी ओर ग्लोबल पूंजी अपने प्रतिस्पर्धीभाव में तेजी से इजाफा कर रही है।पुराने राष्ट्र-राज्य ने एक खास तरह के कामकाज का अंदाज,आदतें,संस्कार बनाया था।संचार और संप्रेषण के तौर-तरीके विकसित किए थे।किंतु नई परिस्थितियों ने इन सब क्षेत्रों में तब्दीलियां कर दी हैं।यही वजह है कि नई संचार तकनीकी के प्रति जगह-जगह प्रतिरोध भी व्यक्त हो रहा है।किंतु इस तरह के प्रतिरोध के ज्यादा समय तक टिके रहने की संभावनाएं नहीं है।समाज के उत्पादक वर्गों में बदलती हुई सच्चाईयों ने तेजी से असर छोड़ा है।आज मजदूरवर्ग तेजी से नई तकनीकी के अनुरूप अपने को ढ़ाल रहा है।नई तकनीकी के आने के कारण वह अपने पुराने परिवेश की यादों,पुराने राष्ट्र-राज्य के गौरवपूर्ण अतीत की स्मृतियों को नए जगत में किसी न किसी रूप में संजोए रखना चाहता है।
आज बड़े पैमाने पर लोगों को अपने स्थान से बेदखल होकर जाना पड़ रहा है।जो लोग अपनी जमीन से उखड़ चुके हैं।हटाए जा चुके हैं।वे अपनी छोटी सी नई दुनिया में अतीत की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।यह नये युग के परिवर्तनों का आम लक्षण है।इसे अनेक उत्तर औपनिवेशिक लेखकों ने महिमा मंडित किया है।उनका मानना है कि नया अंतर्राष्ट्रीयतावाद भूगोल और जनसंख्या की रिहाइश में मूलगामी परिवर्तन पैदा कर रहा है।यह मूलत: उत्तर औपनिवेशिक माईग्रेशन है।इसमें अस्मिता के जो रूप निर्मित हो रहे हैं उन्हें आप राष्ट्र-राज्य के दायरे में बांध नहीं सकते।
आज भारतीय और भारतीयता के सवाल केन्द्र में आ गए हैं।एक तरफ उनकी समस्याएं हैं जो यहां रहते हैं।दूसरी तरफ उनकी समस्याएं हैं जो भारत के बाहर रहते हैं।एनआरआई हैं।उन्हें अपनी भारतीयता के बोध ने सताया हुआ है।अस्मिता की पहचान के इन दोनों रूपों के बीच संवाद,संघर्ष और विरेचन की प्रक्रिया एक साथ चल रही है।इससे यह भी पता चलता है कि अस्मिता कोई बनी-बनायी चीज नहीं है।बल्कि निरंतर निर्मित होनेवाली चीज है।यह बहुस्तरीय है।हमें यह भी देखना होगा कि भारत में एनआरआई का पूंजी निवेश,रूचि आदि‍ इंटरनेट और ग्लोबल अर्थव्यवस्था आने के बाद किस तरह बढ़े हैं।खासकर 1985-86 के बाद से इनके रूझान बदले हैं।इसमें इंटरनेट की बड़ी भूमिका है।उसने राष्ट्रवाद को नई अंतर्वस्तु दी है।पहले राष्ट्रवाद का झंड़ा उठाने वाले देसी लोग ही होते थे।आज राष्ट्रवाद का झंड़ा अप्रवासी भारतीयों ने उठाया हुआ है।उनके अंदर हिन्दुत्व की तेज लहर चल रही है।ज्यादातर आप्रवासियों का हिन्दुत्ववादी संगठनों से गहरा संबंध है।वे आज उनके सबसे बड़े वित्तीय समर्थक भी हैं।आप्रवासियों में राष्ट्रवाद की लहर ने भारतीय और भारतीयता के सवालों को केन्द्रीय स्थान दिला दिया है।सोनिया के देसी-विदेशी के विवाद में भारतीय और भारतीयता के सवाल छिपे हैं।
भारतीय और भारतीयता में भारतीयता पाखंड है।छद्म है।इसका कहीं अस्तित्व नहीं है।भारतीय का आधार है।जबकि भारतीयता परिस्थितियों पर निर्भर है।इसकी परिभाषाएं बदलती रही हैं। भारतीयता को विखंडित करके पढें तो शायद उसके अंदर छिपे खोखलेपन को समझ सकते हैं। भारतीयता की पहचान की उन्हें जरूरत है जो भारतीय नहीं हैं।जो भारतीयता की हिमायत में खड़े हैं वे शायद नहीं जानते कि अस्मिता के निर्माण के कुछ ऐतिहासिक और भौतिक आधार होते हैं।जबकि भारतीयता का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।इसके विपरीत भारतीय का ऐतिहासिक और भौतिक आधार है।इसे कानून और संविधान ने परिभाषित किया है।भारतीयता को इनमें से किसी ने भी परिभाषित नहीं किया।प्रवासी भारतीयों या 'एनआरआई' पदबंध में तात्पर्य उन लोगों से है जो अपनी इच्छा से देश छोड़कर चले गए अथवा बल प्रयोग के कारण देश छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुए।गुलाम बनाकर इन्हें भारत से बाहर ले जाया गया।किंतु किसी न किसी रूप में देश से जुड़े रहे।
आज जो भारतीय विदेशों में हैं उनकी कई किस्म की पहचान है।वे अपने-अपने देश में अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान कर रहे हैं।इनमें कुछ लोग हैं जिन्हें अतीत याद आता है।भारतीय संस्कार याद आते हैं।कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें जाति संस्कार याद आते हैं।कुछ ऐसे हैं जो पश्चिमी संस्कृति में पूरी तरह रंग चुके हैं।इन्हें न अपनी संस्कृति याद आती है और न देश याद आता है।किंतु इनकी पहचान के इन सब रूपों को राष्ट्र अपने अंदर समाहित कर सकता है।वे जिस देश में रह रहे हैं वहां पर इन सब चीजों के लिए खूब जगह है।
ध्यान रहे अस्मिता भाषा से बनती है।आप्रवासी भारतीयों की मुश्किल यह है कि वे अपनी जातीयभाषा,जातीय संस्कारों से घृणा करते हैं या ये दोनों तत्व उनके लिए गैर-जरूरी हैं।आज भारतीयता के नाम पर अस्मिता की राजनीति का जो खेल चल रहा है।उसने जातीयभाषा के तौर पर हिन्दी के सामने विभाजन का खतरा पैदा कर दिया है।उत्तरांचल और झारखण्ड के गठन से इन राज्यों में हिन्दी की बजाय स्थानीय बोलियों को राज की भाषा बनाने की मांग तेजी से जोर पकड़ती जा रही है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीयता के नाम पर जो विदेशी पूंजी आ रही है वह यहां निवेश के लिए कम और मुनाफे और ज्यादा ब्याज दर के कारण ज्यादा आ रही है।इसका राष्ट्र प्रेम से कोई संबंध नहीं है।आप्रवासी भारतीयों के बारे में एक बात ध्यान में रखनी होगी।कि उनके लिए देश सिर्फ कल्पना की चीज है।वास्तविकता तो यह है कि वे जहां रह रहे हैं।वही उनका देश है।देश का संबंध रहने से है।देश का संबंध्र कल्पना से कम है।कल्पना का देश अवास्तविक होता है।कहानी-कविता-उपन्यास में अच्छा लगता है।किंतु वास्तव जीवन में काल्पनिक देश के प्रति प्रेम खोखला प्रेम है।आप्रवासी भारतीय किसी एक जातीय समूह के लोग नहीं हैं।बल्कि भिन्न जातीय समूहों के लोग हैं।इनकी जातीय संस्कृति,जातीय भाषा,जातीय संस्कार आदि सब कुछ अलग-अलग हैं।यह भिन्नता ही इनकी विशेषता है।भारतीयता के नाम पर इस भिन्नता को हम अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहते।बल्कि 'भिन्नता' ही आप्रवासी और भारतीय की धुरी है।भारतीयता इस भिन्नता को छिपाती है,अस्वीकार करती है,इसके लिए हिन्दुत्व की तर्कप्रणाली और विचारधारा का इस्तेमाल करती है।

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