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सोमवार, 25 जनवरी 2016

सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर संघीखेल


हाल ही में सुभाषचन्द्र बोस की 100 गोपनीय फाइल मोदी सरकार ने सार्वजनिक की हैं, इसके पहले कुछ फाइल ममता सरकार ने सार्वजनिक की थीं, मोदी सरकार भी कुछ फाइल पहले सार्वजनिक कर चुकी है।लेकिन इन फाइलों से नया कोई तथ्य सामने नहीं आया, सवाल यह है जब नया कुछ नहीं है तो क्या तालियां सुनने –बजाने के लिए रद्दी गोपनीय फाइल सार्वजनिक की गयी हैं? सुभाषचन्द्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों के गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करने से पहले यदि इन क्रांतिकारियों की समस्त रचनाएं हिन्दी और अंग्रेजी में इंटरनेट पर मुफ्त में केन्द्र सरकार मुहैय्या करा देती तो बड़ा उपकार होता।

पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के सपने के साथ कैसे खिलवाड़ किया है,यह समझने के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। पीएम मोदी ने सरकार बनाते ही योजना आयोग को खत्म कर दिया। यह एक्शन सीधे सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है। उल्लेखनीय है सुभाषचन्द्र बोस ने अगस्त1942 में एक लेख ‘फ्री इण्डिया एण्ड हर प्रॉब्लम्स’ शीर्षक से लिखा जो उनकी रचनावली में संकलित है।इस लेख में उन्होंने विस्तार के साथ आजाद भारत में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डाला है।इस लेख में एक जगह उन्होंने योजना समिति की महत्ता पर रोशनी डालते हुए कहा है कि भारत के निर्माण के लिए यह जरूरी कदम है। उन्होंने लिखा है कि मैं जब कांग्रेस का अध्यक्ष था तब मैंने राष्ट्रीय योजना समिति की बैठक का उद्घाटन किया था।यह भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कमेटी है।

उल्लेखनीय है बाद में इसी कमेटी के आधार पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया और पंचवर्षीय योजना का शुभारंभ किया। लेकिन पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले योजना आयोग को ही खत्म कर दिया।यह प्रकारान्तर से सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है।

इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि सुभाषचन्द्र बोस और हेडगेवार - गोलवलकर-मोहन भागवत के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है।संघ के नेतागण भारत को हिन्दुत्व के नजरिए से और धर्म को आधार बनाकर संगठित करना चाहते हैं,उनके नायक पीएम के मन की बात भी यही है।लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का मकसद इससे भिन्न था,वे न्याय,समानता और बंधुत्व के आधार पर स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे।उनकी इस भावना को संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण का आधार बनाया।इसलिए सुभाष का वैचारिक अपहरण असंभव है।

असल में संघ एक घटिया हरकत कर रहा है ,वह सुभाष के गोपनीय दस्तावेजों के उद्घाटन के बहाने नेहरूविरोधी मुहिम चला रहा है, नेहरूविरोधी मुहिम के जरिए संघ एक तरफ कांग्रेस को नीचा दिखाना चाहता है ,दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम की वैचारिक मदद करना चाहता है,अफसोस की बात है कि संघ के ये दोनों मकसद सफल नहीं हो सकते। क्योंकि यह भारत है,संघियों का धार्मिकदेश नहीं है।

आरएसएस का मानना है स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानों की देशद्रोही की भूमिका रही है,वे आजादी के पक्ष में नहीं थे।यही ब्रिटिश शासकों की भी समझ थी।सुभाष चन्द्र बोस ने इस नजरिए का खंडन करते हुए " फ्री इंडिया एंड हर प्राब्लम्स" लेख में लिखा है " मुसलमान भारत की आजादी के खिलाफ थे,यह प्रचार एकदम गलत है,बल्कि सच यह है कि वे राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ थे।आजकल तो एक मुसलमान कांग्रेस का सदर है।मुसलमानों का व्यापकतम तबका ब्रिटिश गुलामी से भारत को मुक्त कराने के पक्ष में था,वे ब्रिटिशविरोधी थे,सुभाष ने लिखा १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से हिन्दू और मुसलमान एक साथ ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लड़े हैं।मिलकर भारत की स्वाधीनता के लिए काम किया है।मुस्लिम समस्या कृत्रिम गढी गयी है।

इसी तरह स्वतंत्र भारत को लेकर आरएसएस और सुभाषचन्द्र बोस का नजरिया एकदम भिन्न है। सुभाषचन्द्र बोस का मानना था कि स्वतंत्र भारत में राजसत्त्ता की यह जिम्मेदारी है कि सभी नागरिकों को पूर्णत: धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता दी जाय,जबकि संघ इसके एकदम खिलाफ है।सुभाष यह भी मानते थे कि राज्य को पूरी तरह धर्ममुक्त होना चाहिए,संघ यह भी नहीं मानता।सुभाष का यह भी मानना था कि धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों में नागरिकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाय।संघ यह भी नहीं मानता,उसके नेताओं का मानना है कि मुसलमानों को दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखा जाए।

सुभाषचन्द्र बोस के बहाने संघ परिवार कुप्रचार तो कर सकता है, मीडियासंघी और फेसबुकसंघी कुतर्कों का जाल भी बुन सकते हैं,लेकिन सुभाष का सच नहीं बदल सकते।सुभाषचन्द्र बोस का सच यह है कि वह हिन्दुत्ववादी नहीं है,वह प्रतिक्रियावादी नहीं है,वह तो क्रांतिकारी है।वह कॉमरेड है और इसी सम्बोधन से अपने साथियों- सैनिकों को सम्बोधित करता है।संघ से लेकर पीएम मोदी तक किसी की जुबान में कॉमरेड पदबंध बोलने की शक्ति और विवेक नहीं है।संघी ध्यान रखें क्रांतिकारी हमेशा क्रांतिकारी रहता है।क्रांतिकारी पर अन्य कोई रंग नहीं चढ़ता।

आरएसएस मूलत: कारपोरेट घरानों द्वारा वित्तपोषित राजनीतिक संगठन है,इसके लिए राष्ट्रीय नायक (पटेल-सुभाष -आम्बेडकर-मालवीय आदि )पोस्टरबॉय से ज्यादा महत्व नहीं रखते,उसके लिए इनका मात्र विज्ञापन मूल्य है। इस संगठन का मूल मकसद है स्वाधीनता का अवमूल्यन करना,हिन्दुत्व के आधार पर समाज को संगठित करना,सामाजिक विभेद पैदा करना। आरएसएस का गुण है ये लोग पहले मीडिया के जरिए झूठ गढ़ते हैं,फिर कहते हैं यह सच्ची खबर है।फिर उसे सबको मानने के लिए मजबूर करते हैं।

संघ का नया नारा है (शायर इकबाल से क्षमा-याचना के साथ) ‘हो जाएं ख़ून लाखों लेकिन लहू न निकले।’

रविवार, 24 जनवरी 2016

मोहनमंडली का मोहनराग

          

    इन दिनों फेसबुक से लेकर मीडिया तक जिस तरह का हंगामा मोहनमंडली मचाए हुए है वह काबिलेगौर है।सारा नाटक सुभाषचन्द्र बोस के गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किए जाने की आड़ में हो रहा है।इस समूचे प्रसंग को मोहनप्रसंग कहें तो अनुचित न होगा।मोहनमंडली जिस भाव और मंशा के साथ इतिहासनिर्माताओं को प्रदूषित करने के काम में लगी है उससे इतिहास में नए तथ्य और सूचनाएं कम जुड़ेंगे, इतिहास का विकृतिकरण ज्यादा होगा।क्योंकि इनकी पूरी मंशा इतिहास को विकृत करने और इतिहास के प्रति नफरत पैदा करने की है।भारत जैसे लोकतंत्र में साम्प्रदायिक ताकतें इतिहास के प्रति नफरत पैदा करके ही जिंदा रह सकती हैं।जबकि तालिबानी इलाके में इस तरह की ताकतें इतिहास का विध्वंस करती हैं।बाबरी मसजिद विध्वंस एक नमूना मात्र है,उनके पास भविष्य में विध्वंस करने वाली ऐतिहासिक इमारतों की लंबी सूची है।वे सिर्फ उचित माहौल की तलाश में हैं ,ज्योंही अनुकूल माहौल देखेंगे फिर से बाबरीयोजना कहीं पर भी लागू कर सकते हैं। इसका प्रधान कारण है उनका इतिहास के प्रति द्वेषभाव।इसलिए मोहनमंडली में इतिहासप्रेम खोजना चील के घोंसले में मांस का टुकड़ा खोजने के बराबर है।
इतिहास में नफरत पैदा करने के लिए जरूरी है कि पहले इतिहास निर्माता को मारो,हत्या करो।यह काम वे महात्मा गांधी की हत्या करके कर चुके हैं।उनके हत्यारे हाथों से जो बच गए हैं उनको ‘वे हमारे हैं वे हमारे हैं’ का राग अलाप करके मारने में लगे हैं।गांधीजी की हत्या के बाद उनको सबसे पहले दो लोग पसंद आए वे थे विवेकानन्द और भगतसिंह । इन दोनों ही विभूतियों के विचारों को लेकर मोडनमंडली ने जिस तरह का जहर युवाओं में भरा है उसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता।
     बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मोहनमंडली के इतिहास विध्वंसक अभियान की राष्ट्रीय योजना में कई नए नाम नाम शिखर पर आए हैं इनमें महामना पंडित ,बल्लभभाई पटेल,मदनमोहन मालवीय,बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस प्रमुख हैं। मोडनमंडली की पूरी योजना यह है कि युवापीढ़ी को इन विभूतियों के सकारात्मक वैचारिक मूल्यों से दूर रखा जाए। इनको डिजिटल इमेज मात्र बनाकर पेश किया जाय।वे इन विभूतियों को अपने साम्प्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों और दैनंदिन घृणित धर्मनिरपेक्षताविरोधी वैचारिक अभियान के पैकेज में पेश कर रहे हैं।
    आज जब हम मोहनमंडली के वैचारिक प्रदूषण पर विचार करें तो यह बात ध्यान रखें कि बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद इस मंडली का बुनियादी लक्ष्य रहा है धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को नष्ट करना।धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ युवाओं में नफरत के बीज बोना।इस काम में उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली है,उनकी सफलता के पीछे कई कारण रहे हैं, पहला बड़ा कारण है भारत के कारपोरेट घरानों का हिन्दुत्वप्रेम। दूसरा बड़ा कारण है धर्मनिरपेक्षदलों,खासकर कांग्रेस  का धर्मनिरपेक्षता को लेकर ढ़ुलमुल रवैय्या।कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को लेकर सख्त वैचारिक रवैय्या अपनाया होता तो आज धर्मनिरपेक्षता इस तरह कलंकित न होती।तीसरा बड़ा कारण मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ,जिनके कारण धर्मनिरपेक्ष माहौल कमजोर हुआ और उपभोक्तावाद पुख्ता बना।इन तीन कारणों ने बुनियादी तौर पर आमलोगों को धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से दूर लेजाने में बड़ी भूमिका अदा की है।मोहनमंडली ने बड़े कौशल के साथ इन तीनों कारणों का लाभ उठाया है।
       मोहनमंडली के टुईंया से लोग आए दिन धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहते हैं,तमाम मीडिया लगातार धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए चलाए आंदोलन के समय से सक्रिय है और उसने जितनी बड़ी कु-सेवा सेवा समाज  की है उसकी लोकतंत्र में मिसाल मिलनी असंभव है। धर्मनिरपेक्षताविरोधी मुहिम के कारण समाज में जहां एक ओर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है वहीं दूसरी ओर वाम ताकतें कमजोर हुई हैं।वाम ताकतों ने कभी सोचा ही नहीं कि सामान्य धर्मनिरपेक्ष माहौल जब नष्ट होगा तो उन पर इसका किस तरह का नकारात्मक असर होगा।
     बाबरी मसजिद विध्वंस के समय वाम विचारधारा ने वैचारिक तौर पर जिस ऊर्जा का प्रदर्शन किया था उसको यदि कांग्रेस ने सही ढ़ंग से समझा होता तो देश का नक्शा कुछ और होता।लेकिन वोटबैंक राजनीति के चलते कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का मार्ग पकड़ा और अंततःवे समूचा मैदान मोहनमंडली को खैरात में सौंपकर मैदान से भाग खड़े हुए।यूपी से कांग्रेस का साफ होना सामान्य घटना नहीं है।बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद कांग्रेस के साफ होने का अर्थ है धर्मनिरपेक्ष माहौल का कमजोर होना। मोहनमंडली के धर्मनिरपेक्षताविरोधी प्रचार अभियान को जब तक एकजुट होकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें वोट से लेकर विचारधारा के विभिन्न क्षेत्रों तक चुनौती नहीं देतीं तब तक धर्मनिरपेक्षताविरोधी माहौल को तोड़ना बहुत मुश्किल है।
     इस प्रसंग में यह भी ध्यान रहे बसपा और सपा सिर्फ वोटबैंक के मामले में भाजपा को यूपी में पीट सकते हैं,वैचारिक प्रचार के मामले में ये दोनों दल बेहद कमजोर हैं,बाबरी विध्वंस के बाद राज्य में भाजपा हारती रही है लेकिन लोकसभा में लगातार अपनी ताकत में इजाफा करती रही है। भाजपा के वोटबैंक में यूपी में स्थानीय स्तर पर इजाफा भले ही नहीं हुआ, लेकिन संसद के वोट में इजाफा हुआ है,इससे भी बड़ी बात यह है आम लोगों के मन में धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जहर भरने में मोहनमंडली सफल रही है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें सुभाषचन्द्र बोस –आम्बेडकर आदि के प्रति मोहनराग के मर्म को उद्घाटित करने का काम करना चाहिए।

     उल्लेखनीय है मोहनमंडली में राष्ट्रीयनेताओं के प्रति वास्तव अर्थ में कोई श्रद्धा नहीं है। वह सिर्फ श्रद्धा का नाटक कर रहे हैं।मसलन्, सुभाषचन्द्र बोस को ही लें। आरएसएस ने कभी सुभाषचन्द्र बोस के जीते जी उनके विचारों और आदर्शों का समर्थन और स्वागत नहीं किया।यही दशा बाबासाहेब आम्बेडकर की थी। सवाल यह है जब ये दोनों नेता जिंदा थे तब आरएसएस के नेताओं को इनके गुण नजर क्यों नहीं आए ? अचानक बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद ही नजर क्यों आए ?भगतसिंह जब जिंदा थे तब उनके पक्ष में आरएसएस ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया ? क्यों आरएसएस लगातार स्वाधीनता संग्राम से भागता रहा,उसके साथ जुड़े तमाम नेता ब्रिटिश एजेंट का काम करते रहे ? आरएसएस ने ब्रिटिशदौर की भूमिका की आत्मालोचना तक नहीं की है।ऐसी स्थिति में उनके राजनीतिक लक्ष्य को समझने में भूल नहीं करनी चाहिए।

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस , साम्प्रदायिकता और संघी मासूमियत

       इन दिनों वाम राजनीति हाशिए पर है और संघी राजनीति सत्ता,समाज और मीडिया के केन्द्र में है। खासकर मोदी सरकार बनने के बाद से सारा परिदृश्य बदल गया है। अचानक स्वाधीनता सेनानियों को हड़प लेने की कोशिशें हो रही हैं,  मासूम तर्क दिए जा रहे हैं। संघी लोग जानते हैं कि मासूम तर्कों से इतिहास नहीं रचा जाता। मासूम तर्क यह है कि स्वाधीनता सेनानी सबके हैं, इसलिए वे हमारे भी हैं, उनको दलीय राजनीति में बांधकर या किसी विचारधारा विशेष के परिप्रेक्ष्य में मत देखो, खासकर स्वाधीनता सेनानियों पर जब भी बातें करो, फूलमालाएं चढ़ा कर प्रणाम करो, विचार-विनिमय मत करो, आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल मत करो।
   संघ की रणनीति है स्वाधीनता सेनानियों के विचार,राजनीति,संघर्ष आदि में निहित विचारधारा की चर्चा मत करो, उन्हीं पहलुओं की चर्चा करो जो हिन्दुत्व के फ्रेमवर्क में फिट बैठते हैं। इस तरह के तर्कशास्त्र के जरिए संघ और उसके संगठन संगठित ढ़ंग से स्वाधीनता संग्राम की विरासत को विकृत कर रहे हैं। उसे युवाओं में गलत ढ़ंग से पेश कर रहे हैं, साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की परंपरा राष्ट्रवाद की परंपरा है, धर्मनिरपेक्षतारहित हिन्दुत्व की परंपरा है। उनके लिए स्वाधीता सेनानी का बलिदान तो स्वीकार्य है लेकिन बलिदान के साथ जुड़ा विचार स्वीकार्य नहीं,संघ को स्वाधीनता सेनानी की वोट के लिए और अपने कलंकों को छिपाने के लिए इमेज चाहिए,फोटो चाहिए। संघ के लिए स्वाधीनता सेनानी महज फोटोग्राफ है । यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में सुभाषचन्द्र बोस के बारे में चल रही मौजूदा बहस को भी देखें।
    सुभाष चन्द्र बोस महज राजनेता,स्वाधीनता सेनानी नहीं थे, बल्कि उच्चकोटि के विचारक भी थे। वे स्वभाव से आमूल-चूल परिवर्तनकामी थे। उनका साम्प्रदायिकता को लेकर सुनिश्चित नजरिया था ।
     लोकतंत्र में कोई चीज,विचार या संगठन अछूत नहीं हैं और हमें अछूत मनोवृत्ति के प्रचार-प्रसार से बचना चाहिए। साम्प्रदायिक एकता सामाजिक विकास के लिए बेहद जरुरी है। सुभाष चन्द्र बोस ने 4मई1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' के संपादकीय में लिखा  हमें साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति अछूत भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। हमें राजनैतिक अछूतभाव से बचना चाहिए। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को राजनैतिक अछूत मानकर दूर नहीं रखना चाहिए। 
    24फरवरी 1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' में लिखे संपादकीय में सुभाष ने साफ लिखा  आम जनता में स्वाधीनता की भावना पैदा करने के लिए नए नजरिए,नए भावबोध,स्प्रिट,परिप्रेक्ष्य और नए विज़न की जरुरत है।
    सवाल यह है कि संघ ने क्या नया विज़न पैदा किया? लोकतंत्र के अनुरुप नई स्प्रिट पैदा की ? कम्युनिस्टों ,समाजवादियों और कांग्रेसियों पर सुभाष की अपील का असर हुआ लेकिन संघ पर कोई असर नहीं हुआ। संघ के साम्प्रदायिक नजरिए से मुक्त नहीं किया। अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा से मुक्त नहीं किया,दंगे की राजनीति से मुक्त नहीं किया, गपोड़ी इतिहास से मुक्त नहीं किया, ऐसी स्थिति में सुभाष की विरासत के बारिस बनने की उनकी कोशिश हास्यास्पद ही कही जाएगी।
       सुभाष का मानना था  हमें आज अपने चारों ओर फैली साम्प्रदायिकता पर हमला करना चाहिए और आम जनता में राष्ट्रवाद की भावना पैदा करनी चाहिए। इस काम के लिए क्रांतिकारी मनोदशा बनाने की जरुरत है,उससे ही यह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा। साम्प्रदायिकता तब ही खत्म होगी जब साम्प्रदायिक मनोदशा खत्म होगी। अतः सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे साम्प्रदायिकता-मुस्लिम,सिख,हिन्दू,ईसाई - को नष्ट करें।  हमें कोशिश करनी चाहिए कि ये समुदाय साम्प्रदायिकता का अतिक्रमण करके वास्तव अर्थ में राष्ट्रवादी मानसिकता विकसित करें। सेना के अग्रणी दस्तों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करें। (इसके विपरीत संघ हमारे पूर्व सैनिकों में हिन्दुत्व का प्रचार करता रहा है ) ,सेना की यह भी जिम्मेदारी है कि वह सभी सम्प्रदायों के बीच में सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पैदा करे। हिन्दू-मुस्लिम,सिख,ईसाईयों के बीच में एकता पैदा करने का काम करे। साम्प्रदायिक समस्या का समाधान करे। इससे समूचा वातावरण स्वतः बदल जाएगा। साथ ही साम्प्रदायिकता का अंत भी होगा। हमारी सेना के अग्रणी दस्तों को इस मामले में आदर्श भूमिका अदा करनी चाहिए।
            


रविवार, 26 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस और जनसंघर्ष


      सुभाष चन्द्र बोस के बारे में इन दिनों मीडिया में जिस तरह से सनसनी पैदा की जा रही है उससे यह खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनके नजरिए को प्रदूषित न कर दिया जाय। सुभाष के नजरिए की आधारभूमि है भारत की मुक्ति। वे आजीवन वामपंथी रहे और उनकी वामपंथी विचारधारा में गहरी आस्थाएं थीं। हमारे देश में अनेक किस्म के समाजवादी पहले भी थे और आज भी हैं, पहले वाले समाजवादी ऐसे थे जो दक्षिणपंथी राजनेताओं के साथ काम करते थे या फिर किताबी समाजवादी थे। सुभाष का नजरिया इन दोनों से भिन्न था।
     सुभाष आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर थे, वे संविधानवादी और सुधारवादी नजरिए से सामाजिक बदलाव की बहुत कम संभावनाएं देख रहे थे, इसलिए उन्होंने संविधानवाद और सुधारवाद से बचने की सलाह दी थी। कांग्रेस में ये दोनों ही दृष्टियों के मानने वाले लोग बड़ी संख्या में थे।
    सवाल यह है  क्या संविधानवादी और पूंजीवादी सुधारवादी मार्ग के सहारे हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर पाए हैं ? सच यह है कि ये दोनों ही नजरिए 65साल में अभीप्सित परिणाम पैदा करने में असमर्थ रहे हैं। यह तब हुआ है जबकि देश का शासन पांच दशकों तक कांग्रेस के पास रहा बाद में आए शासकों ने मूलतः कांग्रेस की बनायी नीतियों का ही पालन किया। मोदी भी कांग्रेस की बनायी नीतियों पर चल रहे हैं।
      सुभाष ने संविधानवाद और जनसंघर्ष के बीच में अंतर्विरोध की तरफ 19अगस्त सन् 1939 में ध्यान खींचाथा, लेकिन इस अंतर्विरोध की अनदेखी की गयी। आज यही अंतर्विरोध अपने चरम पर है। एक तरह से सभी रंगत की गैर-वाम विचारधाराएं संविधानवाद की आड़ में एकजुट हैं और जनसंघर्षों का खुलकर विरोध कर रही हैं। पहले यही काम कांग्रेस ने किया अब यही काम मोदी सरकार कर रही है। जब हमारे सामने जनसंघर्षों को कुचलने के लिए संविधानवाद का खतरा हो तो हमें गंभीरता से देखना होगा कि आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस की हमारे लिए आज किस रुप में प्रासंगिकता बची है।
   देश के आजाद होने के बाद संविधानवाद पर जोर दिया गया और तमाम किस्म के जनसंघर्षों और आंदोलनों पर संविधान के तहत ही हमले किए गए। यही वह संविधान है जो तमाम किस्म की पवित्र घोषणाओं की जनसंघर्षों के संदर्भ में घनघोर और नंगी अवहेलना करता  है। संविधान के नाम पर आपातकाल आया और संविधान के नाम पर ही अब तक सेज के लिए दस लाख एकड़ जमीन ले ली गयी और अब नग्नतम रुप में भूमि अधिग्रहण बिल पेश है, जिसे हर हालत में संसद से पास कराकर परम पवित्र वाक्य में तब्दील कर दिया जाएगा।
   कायदे से हमें सुभाष चन्द्र बोस को जनसंघर्षों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना चाहिए। लेकिन हो यह रहा है हमारे इतिहासकार बंधु सुभाष को इतिहास की घटना विशेष के संदर्भ में रंग-बिरंगे रुप में पेश कर रहे हैं इससे सुभाष के बारे में विकृत समझ बन रही है।
    'जनसंघर्ष बनाम संविधानवाद' के संदर्भ में यदि सुभाष को देखें तो पाएंगे कि सुभाष जनसंघर्षों के साथ खड़े हैं। सुभाष ने माना कि उन्होंने 'संविधानवाद का विरोध करके 'अपराध' किया है और मैं उसकी कीमत अदा कर रहा हूँ।' वह मानते थे 'संविधानवाद बनाम जनसंघर्ष' का अंतर्विरोध इस दौर का मूल अंतर्विरोध है और इसकी रोशनी में ही राजनीतिक प्रक्रिया का विकास होगा। सुभाष की यह समझ इतिहास के अब तक के अनुभव से सही साबित हुई है।   

      

बुधवार, 23 मार्च 2011

भगतसिंह -सुखदेव-राजगुरू की शहादत पर पं. मदनमोहन मालवीय, पटेल, नेहरू,सुभाषचन्द्र बोस की श्रृद्धांजलियां


पंडित मदनमोहन मालवीय

फांसी रुकवाने के लिए सभी तरफ से, सभी तबकों के लोगों की अपीलें आ रहीं थीं, ज्यादातर वायसराय के नाम थीं।
   मदनमोहन मालवीय ने वायसराय को एक तार भेजा, जिसमें लिखा था: ''क्या मैं आप से दरख्वास्त कर सकता हूं  कि आप अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की सजा को आजीवन काला पानी कर दें।... इन नौजवानों का कोई निजी स्वार्थ नहीं था, बल्कि देशभक्त से प्रेरित था। यह देश के लोगों को एक गहरा झटका देगा।... इस समय आपकी तरफ से की गयी दया हिंदुस्तानी जनता की राय में एक फायदेमंद असर पैदा करेगी।''
   कराची सम्मेलन में प्रस्थान करने से पहले मालवीयजी ने प्रेस वार्ता में कहा था : ''इस फांसी से मुझे इतना दु:ख हुआ है कि मेरे मुंह से शब्द नहीं निकलते।''

सरदार वल्लभ भाई पटेल

अंग्रेजी कानून इस बात पर अभिमान से झूमता था कि वह गवाही में जिरह के द्वारा प्रमाणित किए बिना किसी अभियुक्त को सजा नहीं देता, परंतु उसी कानून ने ऐसी गवाही के विश्वास पर, जो घटना के बहुत देर बाद प्राप्त हुई थी और जिसमें जिरह का नाम न था- भारत के एक श्रेष्ठ युवक की हत्या कर डाली। किसी व्यक्ति को ढीठता और उच्छृंखलता के अपराध में सजा दी जा सकती है, परंतु उसे फांसी पर लटका देना कहां का न्याय है।

जवाहरलाल नेहरू

मैंने इन देश भक्तों के अंतिम दिनों में अपनी जबान पर लगाम लगा रखी थी, क्योंकि मुझे संदेह था, कि मेरे जबान खोलते ही कहीं फांसी की सजा रद्द होने में बाधा न पहुंचे। यद्यपि मेरा हृदय बिल्कुल पक गया था और खून अंदर से उबाल खा रहा था, परंतु तिस पर भी मैं मौन था। परंतु अब, फैसला हो गया। इस देश भर के लोग मिलकर भी भारत के ऐसे

युवक की रक्षा न कर सके, जो हमारा प्यारा रत्न था और जिसका अदम्य उत्साह, त्याग और विकट साहस भारत के युवकों को उत्साहित करता था। भारत आज अपने प्यारे बच्चों को फांसी से छुड़ाने में असमर्थ है। इस फांसी के विरोध में देश भर में हडतालें होंगी और जुलूस निकलेंगे। हमारी इस परतंत्राता और असहायता के कारण देश के कोन-कोने में शोक का अंधकार छा जायेगा। परंतु उनके ऊपर हमें अभिमान भी होगा और जब इंग्लैंड हम से     संधि का प्रस्ताव करेगा, उस समय उसके और हमारे बीच में भगत सिंह का मृत शरीर उस समय तक रहेगा, जब तक हम उसे विस्मृत न कर दें।



सुभाषचंद्र बोस

मार्च 1931 का महीना क्रांतिकारियों के नाम रहा। भगत सिंह अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे। गांधी की छवि मलिन पड़ गई थी। जब भगत सिंह को फांसी दिए जाने की बात सामने आई तो दो लाख से भी ज्यादा लोगों ने उन्हें फांसी न देने के लिए अंग्रेज सरकार से अपील की।

   इतना ही नहीं सुभाषचंद्र बोस ने तो इसके खिलाफ 20 मार्च, 1931 को दिल्ली के आजाद मैदान में धरना दिया। धरना और आम सभा को रोकने के लिए वायसराय इर्विन ने गांधी के प्रभाव का प्रयोग किया। गांधी ने सुभाषचंद्र बोस से ऐसा न करने का  अनुरोध भी किया। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी के सरकार परस्त आदेश को खुले आम ठोकर मारी और आम सभा को संबोधित करते हुए कहा :
   ''आज सारा हिंदुस्तान जानता है कि भगत सिंह और उनके साथियों-राजगुरु और सुखदेव को किसी भी वक्त फांसी दी जा सकती है। मुझे यह जरूर कहना चाहिए कि कल दोपहर जब मैं दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो एक भयानक थक्के की शक्ल में यह खबर मुझे मिली।... हम सब एक जुट होकर और एक आवाज में यह कहते हैं कि भगत सिंह और उनके साथियों की यह सजा तुरंत बदल दी जाए। भगत सिंह आज एक आदमी नहीं है बल्कि तरुण भारत की एक पहचान हैं, भारतीय क्रांति के एक संस्थान हैं। वे विद्रोह की भावना के प्रतीक हैं जो कि आज पूरे भारत में फैली हुई है। हम उनके तरीकों से असहमत हो सकते हैं, मगर उनके नि:स्वार्थ देश प्रेम, त्याग और बलिदान की पवित्रा भावना को अनदेखा नहीं कर सकते। वे हमारे गर्व और गौरव के प्रतीक हैं। भारत माता की श्रेष्ठतम संतान हैं।
   ''जिस ढंग से उनके मृत शरीरों को दफनाया गया, उसके विषय में भी तरह-तरह की खबरें सारे पंजाब में फैल गईं। आज इतने दिनों बाद उस गहन शोक की कल्पना करना असंभव है जो सारे देश में एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गया। विभिन्नदेश भर के लोग मिलकर भी भारत के ऐसे कारणों से भगत सिंह नौजवानों में नई जागृति का प्रतीक बन गया था। जनता की उत्सुकता यह जानकर ही शांत नहीं हुई कि वास्तव में उन पर लगाए गए कत्ल के इल्जाम के दोषी थे या नहीं, उनके लिए यह जानना काफी था कि वह पंजाब में नौजवान भारत सभा (युवा आंदोलन) का जनक था। उनके एक साथी जतीन दास शहीद की मौत मरे और वह और उनके साथी फांसी के तख्ते पर भी निडर रहे।
   ''सभी ने यह सोचा कि कांग्रेस की बैठक एक शोक की छाया में हो रही है। नव निर्वाचित अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सम्मेलन के पहले दिन के आमोद-प्रमोद को रद्द करने का आदेश दिया। यहां तक कि जब महात्मा कराची के निकट उतरे तो वहीं क्रुध्द प्रदर्शन किया गया और कई नौजवानों ने काले फूलों और काली मालाओं से उनकी अगवानी की। नौजवानों के एक काफी बड़े हिस्से की भावना यह थी कि महात्मा ने भगत सिंह तथा उनके साथियों के ध्येय के साथ विश्वासघात किया है।
   ''सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों में एक प्रस्ताव भगत सिंह और उनके साथियों के साहस तथा आत्मबलिदान की प्रशंसा करते हुए, हालांकि सभी हिंसा की कार्रवाहियों की भर्त्सना करते हुए पारित किया गया। यह प्रस्ताव बंगाल प्रदेश कांग्रेस द्वारा 1924 में पारित किए गए, 'गोपीनाथ साहा प्रस्ताव' से मिलता-जुलता था जिसे महात्मा ने कठोरता से अस्वीकार किया था। कराची में परिस्थितियां इस प्रकार बन गई कि यह प्रस्ताव ऐसे लोगों को रखना पड़ा जो सामान्य परिस्थितियों में इससे मीलों दूर रहते। जहां तक महात्मा का प्रश्न था, उन्हें अपनी आत्मचेतना को लचीला बनाना पड़ा। लेकिन यह काफी नहीं था। स्टेज की व्यवस्था को पूरी तरह व्यवस्थित करने के लिए सरदार भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह को मंच पर बुलाया गया और कांग्रेस नेताओं के समर्थन में उनसे बुलवाया गया।''

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