स्वाधीनता संग्राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्वाधीनता संग्राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

भारत के मुसलमान दुनिया के मुसलमानों से भिन्न हैं

      


भारत में हिंदुओं और मुसलमानों ने अन्य समुदायों के साथ मिलकर स्वाधीनता संग्राम लड़ा, संसदीय जनतंत्र चुना, भारत के अधिकांश मुसलमानों ने भारत विभाजन को अस्वीकार करके भारत में रहकर लोकतंत्र के विकास में भूमिका निभाने का फैसला किया । लोकतंत्र का मार्ग मुसलमानों का चुना मार्ग है ,यह साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा निर्मित मार्ग नहीं है। बल्कि साम्प्रदायिक ताकतें तो एकजुट भारत के खिलाफ १९४७ के पहले भी थीं और १९४७ के बाद भी रही हैं। 
        भारत के मुसलमानों ने हमेशा भारत के संविधान को माना और संसदीय लोकतंत्र को पुख्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।भारत के मुसलमानों ने कभी साम्प्रदायिकता के आधार पर न तो वोट दिया और न कभी साम्प्रदायिक नेताओं को संसद और विधानसभा में चुनकर भेजा ।इसके बावजूद मुसलमानों के विकास के लिए लोकतंत्र में जिस तरह की सुविधाएँ और समान अवसर होने चाहिए  मनमोहन सरकार के पहले तक किसी सरकार ने उनका ख्याल नहीं किया । 
पहलीबार सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद विस्तार से पता चला कि आजादी के चालीस साल बाद भी मुसलमानों के सामाजिक  -शैक्षणिक-आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। यहां तक कि वामशासन वाले पश्चिम बंगाल में तो सबसे ज्यादा खराब थे।इसलिए यह कहना कि मुसलमानों के लिए कांग्रेस और वाम ने महत्वपूर्ण काम किए हैं यह सही नहीं है। पहलीबार सच्चर कमीशन ने हमारे सिस्टम में निहित मुसलिम विरोधी भावों को उजागर किया।इसके बाद यूपीए सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में १५सूत्री कार्यक्रम लागू किया। आरएसएस के मुसलिम विरोधी प्रचार से अप्रत्यक्षतौर पर कांग्रेस और वाम कहीं न कहीं प्रभावित रहे हैं , मुसलिम तुष्टीकरण का उन पर संघ का आरोप बेबुनियाद है।सच्चाई यह है कि अधिकांश मुसलमान बहुत ही खराब अवस्था में आज भी रह रहे हैं। मुसलिम तुष्टीकरण का नारा लगाकर आरएसएस हमेशा मुसलमानों के हकों पर हमले करने की कोशिश करता रहा है।
       भारत के मुसलमान बाकी दुनिया के मुसलमानों से वैचारिक तौर पर भिन्न रहे हैं, यह वैचारिक भिन्नता आधुनिककाल में ही नहीं दिखती बल्कि मध्यकाल में भी दिखती है। बाकी दुनिया के मुसलिम शासकों और भारत के मध्यकालीन मुसलिम शासकों के विचारों में बुनियादी अंतर है,इसके कारण आधुनिककाल में भी मुसलमानों में अंतर चला आया, बाद में आधुनिककाल के मुसलिम विचारकों और स्वाधीनता सेनानी मुसलमानों में बाकी समाज के साथ मिलकर उदारतावाद को मज़बूत बनाने और देश में उदारतावाद का माहौल बनाने का फैसला किया, यह परंपरा बाकी दुनिया में मुसलिम देशों में नजर नहीं आती। 
    दूसरी बात यह कि मुसलमानों का भारत में एक ही विचारधारा की ओर रूझान कभी नहीं रहा, उनमें उदार,धार्मिक,क्रांतिकारी और अनुदारवादी किस्म के लोग और संगठन  रहे हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को एक ही विचारधारा के दायरे में रखकर नहीं देखना चाहिए।मुसलमानों में भी विचारों की बहुलता है।अफसोस की बात यह है कि हम मुसलमानों को न तो जानना चाहते हैं और न उनके यथार्थ को देखना चाहते हैं।उलटे आरएसएस के प्रचार को सच मानकर चलते हैं। सच यह है मुसलमानों के यथार्थ जीवन को लेकर आरएसएस कुछ नहीं जानता ,वह साम्राज्यवादी ताकतों के मुसलमान विरोधी प्रचार माल को ही हमारे सामने परोसता रहता है।
        आरएसएस और उसके भोंपू मीडिया में चल रहे मुसलिम रूढिबद्ध प्रचार अभियान को एकसिरे से ठुकराने की जरूरत है।मुसलमान भी इस देश के नागरिक हैं, उनके सुख-दुख भी हिंदुओं जैसे होते हैं, वे सतह पर भिन्न हो सकते हैं लेकिन अंदर से तो भारतवासी हैं। सवाल यह है ऊपर की धार्मिक पहचान को हम क्यों अहमियत देते हैं ? मुसलमान तो मनुष्य हैं जैसे हिंदू मनुष्य हैं।हम सभी लोगों को मनुष्य के रुप में देखें। कोई यदि अपने को हिंदू कहे या मुसलमान, हमें उसके प्रति मित्रता और भाईचारे का भाव रखना चाहिए।
         यह सच है देश में इस समय सत्ता का आतंक और भय छाया हुआ है लेकिन इस भय को मित्रता और शिरकत से तोड़ सकते हैं। राजनीतिक खेमेबाज़ी से यह चीज हासिल नहीं हो सकती।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

15अगस्त की आत्मा है लोकतंत्र -

        आज 15अगस्त है और इसे हम स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाते हैं।यह स्वाधीनता बहुत बड़ी कुर्बानियां देकर मिली है,इतिहास के तमाम दुर्गम पहाडों से गुजरकर मिली है,अनेक बुरे फैसले लेने के बाद मिली है।

अधिकांश नेता भारत-विभाजन से दुखी थे,लेकिन वह मजबूरी थी,देश विभाजन न होता तो देश नष्ट होता , आजादी न मिलती।यह भी सच है देश विभाजन की बहुत बड़ी कीमत अदा की है जनता ने।देश की जनता देश विभाजन के पक्ष में नहीं थी,मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच उस समय जो स्थिति थी उसमें देश विभाजन से बेहतर फैसला संभव ही नहीं था,इससे भारत को बड़ी क्षति को बचाने में मदद मिली,इसका अर्थ यह नहीं है कि देश विभाजन से भारत की कोई क्षति नहीं हुई,देश विभाजन से भारत को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ी।विभाजन की पीड़ा को हम आज भी झेल रहे हैं।लेकिन समग्रता में देखें तो विभाजन और सम्पूर्ण देश विनाश में से विभाजन को चुनकर कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने सही फैसला लिय़ा था।

संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है।इसके कारण हम लोकतंत्र ,स्वाधीनता और समानता के सपनों के लिए संघर्ष का बुनियादी आधार बनाने में सफल रहे।आज भी लोकतंत्र,समानता और बंधुत्व हम सबके लिए सपने की तरह है।इनके सपनों में जीना और सपनों को पाने के लिए निरन्तर जद्दोजहद करना हमारी दैनंदिन जिन्दगी है।

लोकतंत्र आज हमारी प्राणवायु है,इसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।लोकतंत्र पर कोई समझौता नहीं कर सकते,क्योंकि भारत विभाजन जैसी बड़ी कीमत अदा करके हमने इसे पाया है।लोकतंत्र हम सबके लिए बेहद कीमती मूल्य है,जीवनशैली है,हमारे समाज की आत्मा है और आत्मा को बेचकर,आत्मा पर हमले करके कोई समाज सुख से नहीं रह सकता।



स्वाधीनता का अर्थ है लोकतंत्र। वह हमारे देश की प्राणवायु है,यह झूठा लोकतंत्र नहीं है अधूरा लोकतंत्र है,इसे संपूर्ण बनाने के लिए निरंतर संघर्ष और लोकतांत्रिक आंदोलनों की जरूरत है।स्वाधीनता आंदोलन की यह महानतम उपलब्धि है।हमें इस पर गर्व है।

विभाजन की पीड़ा और कोलकाता

     कोलकाता कुछ मामले में असामान्य शहर है।इस शहर ने जितनी राजनीतिक उथल-पुथल झेली है वैसी अन्य किसी शहर ने नहीं झेली।यह अकेला शहर है जिसने दो बार भारत विभाजन की पीड़ा को महसूस किया है।यह असामान्य पीड़ा थी।मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं कि बंगाली समाज के मनोविज्ञान पर इन दोनों विभाजन की घटनाओं के किस तरह के असर रहे हैं।मैं स शहर के विभिन्न इलाकों में कईबार घूमा हूँ,अनेक रंगत के लोगों से मिला हूँ,लेकिन कहीं पर भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की अनुभूति नहीं हुई ।दिलचस्प बात यह है पहले भारत विभाजन के समय कई साल आंदोलन चला । यह बंग-भंग के नाम से चला आंदोलन था।यह पहला सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने राष्ट्रवाद की परिकल्पना को सड़कों पर साकार होते देखा।इस दौर के राष्ट्रवाद के हीरो थे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी। सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद हम सब एक हैं का नारा,इसकी धुरी था। इस आंदोलन ने संस्कृति के भेदों और अंतरों को बीच में आने ही नहीं दिया।उल्लेखनीय है उस समय बंगाल समूचा राष्ट्रवादी नेतृत्व उच्च जाति के हिन्दुओं के हाथ में था,लेकिन हम सब एक हैं,का नारा प्रमुख रहा।राष्ट्रवाद के साथ धर्म को किसी ने नहीं जोड़ा।लेकिन दुखद है कि इधर के वर्षों में आरएसएस ने राष्ट्रवाद के साथ धर्म को जोड़ दिया है।कालांतर में चित्तरंजन दास ने सभी धर्मों की एकता को ´जन राष्ट्रवाद´ की शक्ल में रूपान्तरित कर दिया।इसका आधार उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता को बनाया।

बंग-भंग आंदोलन के मुझे दो प्रसंग याद आ रहे हैं जिनसे हम आज भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। 28सितंबर1905 को महालया अर्थात् पितृविसर्जन का दिन था।उस दिन के कलकत्ता के प्रसिद्ध कालीघाट के काली मंदिर में अनोखी विराट पूजा हुई।उसका वर्णन करते हुए अंग्रेजी दैनिक ´अमृत बाजार पत्रिका´ ने 29सितंबर को लिखा , ´सबेरे से ही नंगे पैर लोगों के जुलूस चितपुर रोड़ और कार्नवालिस स्ट्रीट में कालीघाट की तरफ चलने लगे।दोपहर 2बजे तक मंदिर के सामने 50हजार से ज्यादा विशाल जनसमुदाय जमा हो गया।कीर्तन पाटियां राष्ट्रीय गाने गा रही थीं।विराट पूजा के बाद मंदिर के ब्राह्मणों ने संस्कृत में आह्वान कियाः ´सब देवताओं से पहले मातृभूमि की पूजा करो; संकीर्णता,सारे धार्मिक मतभेदों,कटुता और स्वार्थपरता को छोड़ दो,सब लोग मातृभूमि की सेवा करने की सौगंध लो और उसके कष्ट दूर करने में अपना जीवन लगा दो ।´

इसके बाद लोग बड़े बड़े जत्थों में मंदिर के अंदर गए और निम्नलिखित सौगंध लीः

´मां इस पवित्र दिन आपके सामने और इस पवित्र स्थान में खड़े होकर मैं गंभीरता से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं भरसक विदेशी वस्तुओं का कभी इस्तेमाल कभी न करूँगा,कि मैं ऐसी वस्तुओं को विदेशी दुकानों से न खरीदूँगा जो भारतीय दुकानों में मिलती हैं,कि मैं ऐसे काम के लिए विदेशियों को नियुक्त नहीं करूँगा जिसे मेरे देशवासी कर सकते हैं।´

दूसरा वाकया रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ा है।16अक्टूबर 1905 को ,जिस दिन भारत सरकार बंगाल के दो टुकड़े करने जा रही थी उस दिन उन्होंने ´राखी दिवस´मनाने का आह्वान किया और कहा ´यह दिन पूर्व बंगाल के लोगों और पश्चिम बंगाल के लोगों के बीच,धनियों और गरीबों के बीच,इस भूमि में पैदा हुए ईसाइयों,मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच अटूट भातृत्व को सूचित करने के दिवस के रूप में मनाया जाए।´

इन दो घटनाओं ने आम जनता में अटूट एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की।इसके विपरीत इन दिनों जितने भी आंदोलन हो रहे हैं उनमें आरएसएस खुलकर धर्म का राजनीतिक दुरूपयोग करके आम जनता की एकता तोड़ने,मुसलमानों और हिन्दुओं में भाईचारा नष्ट करने का प्रयास करता रहा है।इससे स्वतंत्र भारत, विषाक्त भारत की अनुभूति देने लगा है।बंग-भंग जैसी महान दुर्घटना के बावजूद नेताओं ने जनता की एकता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की।यही वह मुख्य बिन्दु है जहां से हमें अपनी सभी किस्म की राजनीतिक गतिविधियों,लेखन,सांस्कृतिक कार्यों आदि को देखना चाहिए।जनता में एकता रहे,साम्प्रदायिक सद्भाव रहे चाहे जितनी कठिन परिस्थिति हो हम इस मार्ग से विचलित न हों।



बुधवार, 9 मार्च 2016

मकरंद परांजपे सच देखने से क्यों डरते हो ॽ


        प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने जेएनयू में बोलते हुए जेएनयू के वामपंथियों से सारी दुनिया के साम्यवाद की गलतियों का हिसाब मांगा।कमाल की शैली और दृष्टि है परांजपे साहब की ! गलतियां करें स्टालिन लेकिन दण्ड मिलेगा भारत के कम्युनिस्टों को ! यानी नया बुर्जुआशास्त्र है करे कोई और भरे कोई ! , असल में परांजपे सच जानना ही नहीं चाहते।सच जानोगे नहीं तो मानोगे कैसे ! शीतयुद्धीय बौद्धिक तरीका है झूठ बोलो, लांछित करो ! खासकर कम्युनिस्टों के बारे में कभी सच मत बोलो।

परांजपे साहब ने जेएनयू में भाषण देते हुए फरमाया है कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया,जनसत्ता (9मार्च 2016) में छपी रिपोर्ट के अनुसार परांजपे ने कहा ´‘भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अंग्रेजों को लिखा कि वे प्रदर्शन नहीं करेंगे। जब आप लोग लडेंगे तो हम आपका साथ देंगे। जब हम यह कहते हैं कि हमने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी तो मैं सबूत देखना चाहता हूं।’ इसके अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ कहा है।लेकिन हम यहां सिर्फ कम्युनिस्टों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका तक ही सीमित रखना चाहते हैं और कम्युनिस्टों ने क्या कहा उसको प्रमाण के रूप में देना नहीं चाहते बल्कि ब्रिटिश शासक क्या कहते हैं उसका जिक्र करना चाहते हैं।

स्वाधीनता आंदोलन में भारत के कम्युनिस्टों की शानदार भूमिका रही है और वे संघर्ष और कुर्बानी की अग्रणी कतारों में रहे हैं,जबकि उन दिनों सारे देश मे बहुत कम संख्या में कम्युनिस्ट हुआ करते थे।कम्युनिस्ट देशभक्त संग्रामी थे यह बताने के लिए महाकाव्य लिखा जा सकता है,महाख्यान रचा जा सकता है।लेकिन यहां तथ्य ही रखना समीचीन होगा।

परांजपेजी आपने ´पेशावर षडयंत्र´केस का नाम तो सुना ही होगा।उस केस में अनेक कम्युनिस्टों को ब्रिटिश न्यायपालिका ने दण्डित किया,’ पेशावर षडयंत्र केस ´में 12-13 कम्युनिस्टों को बर्बर यातनाएं दी गयीं। जबकि इन्होंने कोई अपराध नहीं किया था।इनका एकमात्र लक्ष्य था भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त कराना।यह वाकया है 1922 के आसपास का।तकरीबन 40 के आसपास मुहाजिर अफगानिस्तान के रास्ते होते हुए ताशकंद और मास्को गए थे।वहां पर उनमें से 26 लोगों ने सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। ये लोग अक्टूबर1920 से अप्रैल 1921 तक ताशकंद और मास्को में रहे।वहां उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक-सैनिक स्कूल में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इन कॉमरेडों का पहला ग्रुप 3जून1921 को पेशावर लौटा।इस ग्रुप से भारत सरकार के गुप्तचर विभाग के ऑफीसर इंचार्ज मि.इबर्ट ने गहरी पूछताछ की।उस पूछताछ में पता चला कि पेशावर से मास्को 40 या उससे ज्यादा कॉमरेड गए थे।इनको उन दिनों मुहाजिर कहा जाता था।मास्को में इन लोगों ने कम्युनिस्ट वि.वि. में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इस पूछताछ के बाद ब्रिटिश पुलिस की मास्को से आने वालों पर कड़ी नजरदारी आरंभ कर दी और1922 के मध्य में कम्युनिस्टों के खिलाफ ´पेशावर षडयंत्र केस´दायर किया गया जिसमें 12-13 कॉमरेडों को दण्डस्वरूप भयानक यातनाएं दी गयीं।यह समूचा वाकया सन् 1927 में बंगला साप्ताहिक अखबार ´कॉम्पस´में ´पेशावर टु मास्को´शीर्षक से धारावाहिक रूप में छपा,इसको लिखा था शौकत उस्मानी ने। इस प्रसंग में दूसरा विवरण रफीक अहमद ने लिखा जिसका मुजफ्फर अहमद की किताब ´दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया एंड इटस फॉर्मेशन´(1962) में जिक्र है।

मकरंद परांजपे आप प्रोफेसर हैं लेकिन झूठ बोल रहे हैं कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग नहीं लिया,आप जरा समय निकालकर ´पेशावर षडयंत्र केस´के जजमेंट को ही पढ़ लेते तो पता चल जाता कि उस समय कम्युनिस्ट क्या कर रहे थे। ´पेशावर षडयंत्र केस´पराधीन भारत में पहला कम्युनिस्टों के खिलाफ गढ़ा गया एकदम झूठा केस था जिसमें कम्युनिस्टों को सजा सुनाई गयी थी,उन लोगों को सजा सुनाई गई जिन लोगों ने कोई हिंसा नहीं की,किसी की हत्या नहीं की।निर्दोष कम्युनिस्टों को दोषी करार करके देशद्रोह में सजाएं सुनाई गयीं।इन कॉमरेडों ने क्या किया था ॽ ये अफगानिस्तान से सीमा पार करके सोवियत संघ गए थे सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने।जिससे ये लोग आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की मदद कर सकें।इसके लिए इन लोगों ने ताशकंद के सैन्य स्कूल और मास्को स्थित कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।

´पेशावर षडयंत्र केस´के नाम से कम्युनिस्टों के खिलाफ पहला जजमेंट 31मई1922 को घोषित किया गया।इस जजमेंट में कॉमरेड मोहम्मद अकबर को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी।यह सजा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121-ए के तहत सुनाई गयी।इसी धारा में दूसरे कॉमरेड बहादुर को एक साल की सजा सुनाई गयी।जबकि हफीजुल्ला को बरी कर दिया गया। अकबर और बहादुर के खिलाफ ’अपराध´ को किस तरह सिद्ध किया गया ॽ सेशन जज जे.एच.आर. फ्रेशर ने अपने फैसले में संक्षेप में उसके बारे में लिखा ´इस ( मोहम्मद अकबर) को षडयंत्र में गिरफ्तार किया गया,यह षडयंत्र ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ताशकंद,काबुल और समरकंद में रचा गया।´इसके लिए कोई प्रमाण पेश नहीं किए गए,सीधे बिना प्रमाण के षडयंत्र के बहाने सजाएं सुना दी गयीं।जिस धारा (121 ए)में केस लगाए गए उसी धारा में बाद में कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षडयंत्र केस(1924),मेरठ षडयंत्र केस(1929-33) में मुकदमे चलाए गए और उनको दण्डित किया गया ।इसके बावजूद परांजपे आप कह रहे हैं कि प्रमाण दो कि स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टो ने कौन सी लड़ाई लड़ी,किस तरह की कुर्बानी दी।

परांजपेजी आपके लिए हम पेशावर षडयंत्र केस के जजमेंट का अंश उद्धृत कर रहे हैं आप पढें और तय करें कि आपने सच बोला या झूठ बोला,जजमेंट में जज ने लिखा “The attitude of the Bolsheviks towards all settled governments is a matter of common knowledge .so also their hostility and desire to overthrow the governments of all civilized powers as at present constituted. This general knowledge is a matter of which judicial notice can be taken.” इसी जजमेंट में आगे कहा गया कि ताशकंद को भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रचार अभियान का केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया। इनके ग्रुप में अब्दुल रब,राय,मुखर्जी और अन्य शामिल थे,इन लोगों ने मिलकर वहां अस्थायी भारत सरकार बनायी।वहां भारतीयों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए स्कूल खोला।वहां से भारतीय लोग प् प्रशिक्षण लेकर आते थे और फिर भारत में देशद्रोही गतिविधियां संचालित करते थे।यह एक तरह से भारत पर बोल्शेविक हमला है।

परांजपेजी आपने जेएनयू में साम्यवाद के बारे में जो कुछ कहा उसका जेएनयू के मौजूदा आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। भारत में कम्युनिस्ट हमेशा से लोकतंत्र के लिए संघर्ष करते रहे हैं अतः इनके संघर्ष के साथ अन्य देशों के कम्युनिस्टों की तुलना करना गलत है।जेएनयू का मौजूदा आंदोलन छात्रों के जनतांत्रिक हकों की रक्षा के लिए चल रहा है,यह आंदोलन कन्हैया कुमार सहित 5छात्रनेताओं पर चलाए जा रहे राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे को वापस लेने के लिए चल रहा है। इसलिए इस आंदोलन की सोवियत संघ से तुलना करना गलत है।

परांजपे साहब आपकी जानकारी के लिए बता दें जेएनयू में कई छात्रों ने सोवियत संघ में स्टालिन युग में मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ बेहतरीन शोध की है,ये सभी वाम छात्र हैं।जेएनयू के वाम छात्रों ने चीन में माओ के जमाने के मानवाधिकार हनन के खिलाफ भी काम किया है,यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आप जेएनयू की परंपरा से अनभिज्ञ हैं। आप इन दिनों शीतयुद्धीय नजरिए से परिचालित होकर देख रहे हैं।जबकि जेएनयू तो शीतयुद्धीय नजरिए के खिलाफ भी जमकर वैचारिक संघर्ष करता रहा है।

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस , साम्प्रदायिकता और संघी मासूमियत

       इन दिनों वाम राजनीति हाशिए पर है और संघी राजनीति सत्ता,समाज और मीडिया के केन्द्र में है। खासकर मोदी सरकार बनने के बाद से सारा परिदृश्य बदल गया है। अचानक स्वाधीनता सेनानियों को हड़प लेने की कोशिशें हो रही हैं,  मासूम तर्क दिए जा रहे हैं। संघी लोग जानते हैं कि मासूम तर्कों से इतिहास नहीं रचा जाता। मासूम तर्क यह है कि स्वाधीनता सेनानी सबके हैं, इसलिए वे हमारे भी हैं, उनको दलीय राजनीति में बांधकर या किसी विचारधारा विशेष के परिप्रेक्ष्य में मत देखो, खासकर स्वाधीनता सेनानियों पर जब भी बातें करो, फूलमालाएं चढ़ा कर प्रणाम करो, विचार-विनिमय मत करो, आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल मत करो।
   संघ की रणनीति है स्वाधीनता सेनानियों के विचार,राजनीति,संघर्ष आदि में निहित विचारधारा की चर्चा मत करो, उन्हीं पहलुओं की चर्चा करो जो हिन्दुत्व के फ्रेमवर्क में फिट बैठते हैं। इस तरह के तर्कशास्त्र के जरिए संघ और उसके संगठन संगठित ढ़ंग से स्वाधीनता संग्राम की विरासत को विकृत कर रहे हैं। उसे युवाओं में गलत ढ़ंग से पेश कर रहे हैं, साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की परंपरा राष्ट्रवाद की परंपरा है, धर्मनिरपेक्षतारहित हिन्दुत्व की परंपरा है। उनके लिए स्वाधीता सेनानी का बलिदान तो स्वीकार्य है लेकिन बलिदान के साथ जुड़ा विचार स्वीकार्य नहीं,संघ को स्वाधीनता सेनानी की वोट के लिए और अपने कलंकों को छिपाने के लिए इमेज चाहिए,फोटो चाहिए। संघ के लिए स्वाधीनता सेनानी महज फोटोग्राफ है । यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में सुभाषचन्द्र बोस के बारे में चल रही मौजूदा बहस को भी देखें।
    सुभाष चन्द्र बोस महज राजनेता,स्वाधीनता सेनानी नहीं थे, बल्कि उच्चकोटि के विचारक भी थे। वे स्वभाव से आमूल-चूल परिवर्तनकामी थे। उनका साम्प्रदायिकता को लेकर सुनिश्चित नजरिया था ।
     लोकतंत्र में कोई चीज,विचार या संगठन अछूत नहीं हैं और हमें अछूत मनोवृत्ति के प्रचार-प्रसार से बचना चाहिए। साम्प्रदायिक एकता सामाजिक विकास के लिए बेहद जरुरी है। सुभाष चन्द्र बोस ने 4मई1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' के संपादकीय में लिखा  हमें साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति अछूत भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। हमें राजनैतिक अछूतभाव से बचना चाहिए। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को राजनैतिक अछूत मानकर दूर नहीं रखना चाहिए। 
    24फरवरी 1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' में लिखे संपादकीय में सुभाष ने साफ लिखा  आम जनता में स्वाधीनता की भावना पैदा करने के लिए नए नजरिए,नए भावबोध,स्प्रिट,परिप्रेक्ष्य और नए विज़न की जरुरत है।
    सवाल यह है कि संघ ने क्या नया विज़न पैदा किया? लोकतंत्र के अनुरुप नई स्प्रिट पैदा की ? कम्युनिस्टों ,समाजवादियों और कांग्रेसियों पर सुभाष की अपील का असर हुआ लेकिन संघ पर कोई असर नहीं हुआ। संघ के साम्प्रदायिक नजरिए से मुक्त नहीं किया। अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा से मुक्त नहीं किया,दंगे की राजनीति से मुक्त नहीं किया, गपोड़ी इतिहास से मुक्त नहीं किया, ऐसी स्थिति में सुभाष की विरासत के बारिस बनने की उनकी कोशिश हास्यास्पद ही कही जाएगी।
       सुभाष का मानना था  हमें आज अपने चारों ओर फैली साम्प्रदायिकता पर हमला करना चाहिए और आम जनता में राष्ट्रवाद की भावना पैदा करनी चाहिए। इस काम के लिए क्रांतिकारी मनोदशा बनाने की जरुरत है,उससे ही यह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा। साम्प्रदायिकता तब ही खत्म होगी जब साम्प्रदायिक मनोदशा खत्म होगी। अतः सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे साम्प्रदायिकता-मुस्लिम,सिख,हिन्दू,ईसाई - को नष्ट करें।  हमें कोशिश करनी चाहिए कि ये समुदाय साम्प्रदायिकता का अतिक्रमण करके वास्तव अर्थ में राष्ट्रवादी मानसिकता विकसित करें। सेना के अग्रणी दस्तों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करें। (इसके विपरीत संघ हमारे पूर्व सैनिकों में हिन्दुत्व का प्रचार करता रहा है ) ,सेना की यह भी जिम्मेदारी है कि वह सभी सम्प्रदायों के बीच में सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पैदा करे। हिन्दू-मुस्लिम,सिख,ईसाईयों के बीच में एकता पैदा करने का काम करे। साम्प्रदायिक समस्या का समाधान करे। इससे समूचा वातावरण स्वतः बदल जाएगा। साथ ही साम्प्रदायिकता का अंत भी होगा। हमारी सेना के अग्रणी दस्तों को इस मामले में आदर्श भूमिका अदा करनी चाहिए।
            


रविवार, 26 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस और जनसंघर्ष


      सुभाष चन्द्र बोस के बारे में इन दिनों मीडिया में जिस तरह से सनसनी पैदा की जा रही है उससे यह खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनके नजरिए को प्रदूषित न कर दिया जाय। सुभाष के नजरिए की आधारभूमि है भारत की मुक्ति। वे आजीवन वामपंथी रहे और उनकी वामपंथी विचारधारा में गहरी आस्थाएं थीं। हमारे देश में अनेक किस्म के समाजवादी पहले भी थे और आज भी हैं, पहले वाले समाजवादी ऐसे थे जो दक्षिणपंथी राजनेताओं के साथ काम करते थे या फिर किताबी समाजवादी थे। सुभाष का नजरिया इन दोनों से भिन्न था।
     सुभाष आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर थे, वे संविधानवादी और सुधारवादी नजरिए से सामाजिक बदलाव की बहुत कम संभावनाएं देख रहे थे, इसलिए उन्होंने संविधानवाद और सुधारवाद से बचने की सलाह दी थी। कांग्रेस में ये दोनों ही दृष्टियों के मानने वाले लोग बड़ी संख्या में थे।
    सवाल यह है  क्या संविधानवादी और पूंजीवादी सुधारवादी मार्ग के सहारे हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर पाए हैं ? सच यह है कि ये दोनों ही नजरिए 65साल में अभीप्सित परिणाम पैदा करने में असमर्थ रहे हैं। यह तब हुआ है जबकि देश का शासन पांच दशकों तक कांग्रेस के पास रहा बाद में आए शासकों ने मूलतः कांग्रेस की बनायी नीतियों का ही पालन किया। मोदी भी कांग्रेस की बनायी नीतियों पर चल रहे हैं।
      सुभाष ने संविधानवाद और जनसंघर्ष के बीच में अंतर्विरोध की तरफ 19अगस्त सन् 1939 में ध्यान खींचाथा, लेकिन इस अंतर्विरोध की अनदेखी की गयी। आज यही अंतर्विरोध अपने चरम पर है। एक तरह से सभी रंगत की गैर-वाम विचारधाराएं संविधानवाद की आड़ में एकजुट हैं और जनसंघर्षों का खुलकर विरोध कर रही हैं। पहले यही काम कांग्रेस ने किया अब यही काम मोदी सरकार कर रही है। जब हमारे सामने जनसंघर्षों को कुचलने के लिए संविधानवाद का खतरा हो तो हमें गंभीरता से देखना होगा कि आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस की हमारे लिए आज किस रुप में प्रासंगिकता बची है।
   देश के आजाद होने के बाद संविधानवाद पर जोर दिया गया और तमाम किस्म के जनसंघर्षों और आंदोलनों पर संविधान के तहत ही हमले किए गए। यही वह संविधान है जो तमाम किस्म की पवित्र घोषणाओं की जनसंघर्षों के संदर्भ में घनघोर और नंगी अवहेलना करता  है। संविधान के नाम पर आपातकाल आया और संविधान के नाम पर ही अब तक सेज के लिए दस लाख एकड़ जमीन ले ली गयी और अब नग्नतम रुप में भूमि अधिग्रहण बिल पेश है, जिसे हर हालत में संसद से पास कराकर परम पवित्र वाक्य में तब्दील कर दिया जाएगा।
   कायदे से हमें सुभाष चन्द्र बोस को जनसंघर्षों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना चाहिए। लेकिन हो यह रहा है हमारे इतिहासकार बंधु सुभाष को इतिहास की घटना विशेष के संदर्भ में रंग-बिरंगे रुप में पेश कर रहे हैं इससे सुभाष के बारे में विकृत समझ बन रही है।
    'जनसंघर्ष बनाम संविधानवाद' के संदर्भ में यदि सुभाष को देखें तो पाएंगे कि सुभाष जनसंघर्षों के साथ खड़े हैं। सुभाष ने माना कि उन्होंने 'संविधानवाद का विरोध करके 'अपराध' किया है और मैं उसकी कीमत अदा कर रहा हूँ।' वह मानते थे 'संविधानवाद बनाम जनसंघर्ष' का अंतर्विरोध इस दौर का मूल अंतर्विरोध है और इसकी रोशनी में ही राजनीतिक प्रक्रिया का विकास होगा। सुभाष की यह समझ इतिहास के अब तक के अनुभव से सही साबित हुई है।   

      

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

भारतीय मुसलमानों की बलिदानी परंपरा

मुसलमानों की देशभक्ति की बात उठते ही भारत-पाक मैच का संदर्भ बार-बार संघी लोग उठाते हैं और कहते हैं देखिए मुसलमान भारत की हार पर बल्ले बल्ले कर रहे हैं। इनको शर्म नहीं आती,ये देशद्रोही हैं,आदि किस्म के कुतर्कों की हम फेसबुक से लेकर मासमीडिया में आएदिन प्रतिक्रिया देखते हैं। हम साफ कहना चाहते हैं कि खेल को राष्ट्रवाद के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद कैंसर है इसे जिससे भी जोड़ेंगे वह चीज सड़ जाएगी। खेल से जोड़ेंगे खेल नष्ट हो जाएगा। रही बात पाक की जीत पर खुशी मनाने की तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

खेल के दर्शक को हम दर्शक की तरह देखें हिन्दू-मुसलमान के रुप में न देखें। खेल में धर्म,देश,छोटा-बड़ा नहीं होता। खेल तो सिर्फ खेल है।खेल में कोई जीतेगा और कोई हारेगा,कोई खुशी होगा तो कोई निराश होगा, खेल अंततःसर्जनात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। खेल को यदि राष्ट्रवाद से जोड़ा जाएगा या किसी भी किस्म की राजनीति से जोड़ा जाएगा तो उससे सामाजिक सर्जनात्मकता पर बुरा असर पड़ेगा।खेल का मकसद है जोड़ना।जबकि राष्ट्रवाद का मकसद है तोड़ना।भारत-पाक मैच के साथ संघी लोग राष्ट्रवाद को जोड़कर अपनी फूटसंस्कृति को खेल संस्कृति पर आरोपित करने की हमेशा कोशिश करते हैं और इस लक्ष्य में बुरी तरह पराजित होते हैं।इसका प्रधान कारण है खेल की आंतरिक शक्ति। खेल की आंतरिक शक्ति सर्जनात्मक और जोड़ने वाली है।

हमारे बहुत सारे संघी मित्र आए दिन क्रांतिकारियों को माला पहनाते रहते हैं लेकिन इन क्रांतिकारियों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मुसलमानों को भूल जाते हैं। मसलन् क्रांतिकारी खुदीराम बोस को ही लें।खुदाराम बोस को गिरफ्तारी के पहले एक मुसलिम महिला ने अपने घर में शरण दी थी,यह और कोई नहीं मौलवी अब्दुल वहीद की बहन थी। ये जनाब क्रांतिकारी भूपेन्द्र दत्त के गहरे मित्र थे।यही महिला थी जो फांसी के पहले निडर होकर खुदीराम बोस से मिलने जाया करती थी।जबकि उस समय अंग्रेजी शासन के आतंक के कारण अनेक लोग खुदीराम बोस से मिलने से डरते थे।

मुसलमानों के पक्ष में लिखने का यह मकसद नहीं है कि अन्य तबकों की भूमिका की अनदेखी की जाय,मूल मकसद है मुसलिम विरोधी घृणा से युवाओं को बचाना।एक बार यह घृणा मन में बैठ गयी तो फिर उसे दूर करने में पीढ़ियां गुजर जाएंगी। हमारे कई हिन्दू मित्र मुसलमानों की कुर्बानियों की परंपरा को जानते हुए भी फेसबुक पर आए दिन जहर उगलते रहते हैं,इसलिए भी जरुरी हो गया है कि मुसलमानों के सकारात्मक योगदान के बारे में सही नजरिए से ध्यान खींचा जाय। मुसलमान हमारे समाज का अंतर्ग्रथित हिस्सा हैं। उनकी कुर्बानियों के बिना हम आजाद हिन्दुस्तान की कल्पना नहीं कर सकते।

याद करें रायबरेली के मुसलमान फकीर सैयद अहमद को जिनके नेतृत्व में उत्तर भारत बहावी सम्प्रदाय के अनुयायियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांवों से लेकर शहरों तक पहाडों से मौदानों तक आधी शताब्दी तक संघर्ष चलाया। सन् 1871 में एक अन्य बहावी क्रांतिकारी अब्दुल्ला को जस्टिस नार्मन की हत्या के आरोप में फाँसी पर लटकाया गया। सन् 1872 में अंडमान में लार्ड मेयो की हत्या करने वाला बहावी वीर शेर अली था,वह इस हत्या के लिए फाँसी के फंदे पर झूल गया। सन् 1831 में नीलहे साहबों के विरुद्ध पहले विद्रोह के प्रवर्तक रफीक मंडल को कौन भूल सकता है। मुसलमानों में ऐसे अनेक नेता हुए हैं जिन्होंने अपने समुदाय के साम्प्रदायिक और रुढिवादी आग्रहों को तिलांजलि देकर आजादी की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।सन् 1905 के ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी बंग-भंग आंदोलन के बरीसाल अधिवेशन की अध्यक्षता कलकता के प्रसिद्ध मुसलमान वकील अब्दुल्ला रसूल ने की थी। बंग-भंग के विरुद्ध चले पहले विशाल स्वदेशी आंदोलन में भारी संख्या में मुसलिम बुद्धिजीवियों ने हिन्दुओं के साथ मिलकर संघर्ष किया था।

भारत के मुसलमान देशभक्त होते हैं,यह निर्विवाद सत्य है।इसे जानते हुए भी संघ और उसके लगुए-भगुए संगठन विभ्रम पैदा करते रहते हैं और युवाओं में मुसलिम विरोधी प्रचार करते रहते हैं। मुसलमानों की देशभक्ति की बार-बार स्वाधीनता संग्राम में परीक्षा हुई है और आजादी के बाद बार बार जनांदोलनों के समय परीक्षा हुई है। भारत के मुसलमानों की देशभक्ति ही है कि आज जम्मू-कश्मीर में आतंकी-पृथकतावादी संगठन पाक की अबाध मदद के बावजूद आम मुसलमानों के बीच अलग-थलग पड़े हैं। इस क्षेत्र के आम मुसलमानों का भारत के लोकतंत्र और संविधान मेें अटूट विश्वास है।मुश्किल यह है कि एक तरफ संघ के संगठन मुसलमानों पर देशद्रोही कहकर हमले करते हैं,मुसलमानों के प्रति संशय और संदेह पैदा करते हैं,वहीं दूसरी ओर आतंकी-पृथकतावादी संगठन भी उनको निशाना बनाते हैं। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने संघ और आतंकी-पृथकतावादी दोनों के ही नजरिए के खिलाफ संघर्ष किया है और तमाम तकलीफों के बावजूद उदारतावाद की बेहतरीन मिसाल कायम की है।



शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मुसलमानों की हिमायत में

        आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की कोशिशें की जाती हैं।जबकि सच यह है मुसलमानों या हिन्दुओं को स्टीरियोटाइप के आधार पर समझ ही नहीं सकते। हिन्दू का मतलब संघी नहीं होता।संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा अधिकांश हिन्दू नहीं मानते।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे में रहते हैं और उसके आधार पर दैनंदिन आचरण करते हैं।अधिकांश मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब भारत का संविधान है और उस संविधान में जो हक उनके लिए तय किए गए हैं उनका वे उपयोग करते हैं।हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति नहीं देता। भारत का संविधान मानने के कारण सभी भारतवासियों को उदारतावादी मूल्यों,संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।

समाज में हिन्दू का संसार गीता या मनुस्मृति से संचालित नहीं होता बल्कि भारत के संविधान से संचालित होता है। उसी तरह मुसलमानों के जीवन के निर्धारक तत्व के रुप में भारत के संविधान की निर्णायक भूमिका। भारत में किसी भी विचारधारा की सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती,भारत की प्रकृति तो संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं।संविधान में धार्मिक पहचान गौण है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।इस नजरिए से मुसलमान नागरिक पहले हैं ,धार्मिक बाद में ।आरएसएस देश का ऐसा एकमात्र बड़ा संगठन है जिसकी स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही,यह अकेला ऐसा संगठन है जिसके किसी बड़े नेता को साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी हमले का शिकार नहीं होना पड़ा। उलटे इसकी विचारधारा के भारत की धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक संस्कृति और सभ्यता विमर्र्श पर गहरे नकारात्मक असर देखे गए हैं। इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुसलिम नेताओं ने कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । ब्रिटिशशासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए। मसलन्, रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवालाबाग कांड में 70 से अधिक देशभक्त मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं।आरएसएस के प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनकी देशभक्ति और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं।हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शासद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे।

    आरएसएस के लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनको देश के लिए कुर्बानी देने से किसने रोका था ?स्वाधीनता संग्राम में उनके कितने सदस्य शहीद हुए ? इसकी तुलना में यह भी देखें कितने मुसलमान नेता-कार्यकर्ता शहीद हुए ? देशप्रेम का मतलब हिन्दू-हिन्दू करना नहीं है। हिन्दू इस देश में रहते हैं तो उनकी रक्षा और विकास के लिए अंग्रेजों से मुक्ति और उसके लिए कुर्बानी की भावना आरएसएस के लोगों में क्यों नहीं थी ?जबकि अन्य उदार-क्रांतिकारी लोग जो हिन्दू परिवारों से आते थे, बढ़-चढ़कर कुर्बानियां दे रहे थे, शहीद हो रहे थे।संघ उस दौर में क्या कर रहा था ? यही कहना चाहते हैं संघ कम से कम कुर्बानी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर सन् 1930-32 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में कम से कम 43मुसलमान नेता-कार्यकर्ता विभिन्न इलाकों में संघर्ष के दौरान पुलिस की गोलियों से घायल हुए और बाद में शहीद हुए। सवाल यह है संघ इस दौर में कहां सोया हुआ था ?

     कायदे से भारत के शहीद और क्रांतिकारी मुसलमानों की भूमिका को व्यापक रुप में उभारा गया होता तो आज नौबत ही न आती कि आरएसएस अपने मुस्लिम विरोधी मकसद में सफल हो जाता। मुसलमानों के प्रति वैमनस्य और भेदभावपूर्ण रवैय्ये को बल इसलिए भी मिला कि आजादी के बाद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने मुसलमानों की जमकर उपेक्षा की।इस उपेक्षा को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में साफ देख सकते हैं। संघ के प्रचार का कांग्रेस पर दबाव रहा है और कांग्रेस ने कभी मुसलमानों को लेकर दो-टूक रवैय्या नहीं अपनाया। इसका ही यह परिणाम है कि मुसलमान हाशिए पर हैं। संघ ने मुस्लिम तुष्टीकरण का झूठा हल्ला मचाकर कांग्रेस को मुसलमानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए मजबूर किया और कांग्रेस ने संघ को जबाव देने के चक्कर में नरम हिन्दुत्व की दिशा ग्रहण की और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को उठाना पड़ा।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मैं तो एक मुश्ते गुबार हूं...- बटुकेश्वर दत्त


सरदार की गुनगुनाहट आज भी मेरे कानों से टकरा रही है- मैं तो एक मुश्ते-गुबार हूं... धोकर निचोड़े गए कपड़ों को झटके दे देकर जैसे वह धूप में फैला रहा हो और पूरी तन्मयता के साथ गुनगुना रहा हो।कानपुर स्थित सुरेश दादा के मेस की दूसरी मंजिल की छत पर किशोर सरदार के कपड़े धोने का दृश्य अब भी उसी तरह अम्लान है-कंधे सहित सिर पर लिपटा केश-गुच्छ, कमर में एक कच्छा छोड़कर पूरा नंगा बदन, जल की धार पर वह लगातार कपड़े पटक रहा है। साबुन के शुभ्र फेन उड़-उड़कर इधर-उधर फैल रहे हैं। मैं बगल में बैठा अन्य कपड़ों पर साबुन घिस रहा हूं और सरदार बार-बार वही एक पंक्ति दुहराये जा रहा है-मैं तो...

सन् उन्नीस सौ चौबीस के शुरू का कोई महीना। मैं उन दिनों कानपुर के बंगाली मिडिल स्कूल का विद्यार्थी और पारिवारिक अनुशासन की आंखें बचाकर क्रांतिकारी दल की शाखा का एक सक्रिय कार्यकर्त्ता। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र 'प्रताप' से सम्बध्द, दल के प्रमुख नेता श्री सुरेशचंद्र के निर्देशानुसार एक शाम उनसे मिलने कम्पनी बाग गया। क्यों और किसलिए बुलाया गया था, यह पूछना दलीय अनुशासन के विरुध्द था और आदेश पर आंख मूंदकर चलना ही हमारे विप्लवी जीवन का प्रथम पाठ। इसलिए हर तरह की परिस्थिति के प्रति अपने को तैयार कर समय से वहां पहुंचा। सुरेश दादा नहीं थे। बाग के एक छोर से दूसरे तक मेरी चंचल निगाहें ढूंढ़ गयीं, पर कहीं पर भी वह नजर नहीं आया। मुझे आश्चर्य हुआ क्रांतिकारियों के कार्यक्रम में इस तरह की भूल पहले कभी देखने को नहीं मिली थी। घनघोर अंधेरी रात में भी मूसलाधार वर्षा सिर पर झेलते हुए, सीआईडी की निगाहें बचाता निर्दिष्ट कार्य के लिए ठीक जगह निर्धारित समय पर हाजिरी बजाने में इसके पहले मुझसे कभी भूल नहीं हुई थी। फिर आज प्रमुख क्रांतिकारी नेता के निर्देश और कार्य में यह अंतर क्यों?

इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि मेरी आंखें एक घनी, कांटेदार झाड़ी से जाकर उलझ गयीं। क्या ही अजीब, रोंगटे खड़े कर देने के साथ-साथ हंसाने वाला दृश्य! झाड़ी केऊपर एक सफेद पगड़ी का सिरा लगातार दायें से बायें और बायें से दायें मोर की पखी की तरह डोल रहा था। मैं नजर गड़ाये उसे देखता रहा। बीच-बीच में वह स्थिर हो जाता और फिर घड़ी के पेंडुलम की तरह अपनी चाल पकड़ लेता। बाग के निस्तब्ध वातावरण में, जबकि संध्या का रक्तिम प्रकाश रात के अंधेरे में अपना मुंह छिपाने की तैयारी कर रहा हो, कांटेदार झाड़ी के ऊपर से सफेद पगड़ी का वह हिलता सिरा इशारे से जैसे मुझे अपने पास बुला रहा था। मैं आगे बढ़ा। झाड़ी के समीप पहुंचते ही उस सफेद पगड़ी का अधिकारी साढ़े पांच फुट से भी लंबा एक सिख युवक मेरी आहट पर उछलकर खड़ा हो गया। उसकी काली चमकती आंखों में शंका की भावना और लम्बी लटकती दोनों भुजाओं पर कमीज के चढ़े आस्तीन, दृढ़ मुट्ठियों में बंद लंबी उंगलियां, दोनों गालों पर दाढ़ी की हल्की रेखा, सिर पर पगड़ी में कैद केश-गुच्छ, जिसकी कुछ लटें बाहर झूल रहीं थीं। मेरे सामने वह सिख युवक चैलेंज का भाव चेहरे पर लिए खड़ा था और मैं उसकी तात्कालिक मुद्रा के प्रति उदासीन, कि तभी बगल में निश्चल गिरिराज की भांति बैठे विप्लवी सुरेश दादा पर ध्यान गया। मुझे देखकर उनके चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कराहट खेल गयी और सरदार शांत पड़ा। उसकी दृढ़ मुट्ठियों की उंगलियां सहज और शिथिल हुई। मुझ नवागंतुक को देखते ही जो चमक और खून उसकी आंखों में उतर आया था, सुरेश दादा की मुस्कराहट से जैसे पूरे चेहरे पर लालिमा बन फैल गया और मुझे लगा अपनी अनावश्यक दृढ़ता के लिए वह कुछ झेप-सा रहा है। सुरेश दादा ने हंसते हुए हम दोनों को आमने-सामने बैठाया और उस तरुण सरदार से मेरा परिचय कराया नाम- बलवंत सिंह पंजाब के नेशलनल कालेज में बीए के छात्रा हैं। प्रमुख क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस निकटतम सहयोगी शचींद्रनाथ सान्याल 'बंदी जीवन' के लेखक एवं बाद में काकौरी षड़यंत्रा के प्रमुख अभियुक्त उस समय उत्तरी भारत में क्रांतिकारी दल के प्रमुख संगठनकर्त्ता थे। पंजाब नेशनल कालेज के अध्यापक श्री जयचंद्र विद्यालंकार की मार्फत शचींद्र दादा से उस सिख नवयुवक का परिचय हुआ और वह क्रमश:विप्लवी संगठन में खिंच आया। उसकी क्रांतिकारी विचारधारा देखते हुए परिवार के लोग छात्रावस्था में ही उसका विवाह कर देने का निर्णय कर चुके थे, लेकिन क्रांतिपथ के पथिक उस तरुण को अपने विवाह का प्रस्ताव मंजूर नहीं था और उसी से मुक्ति पाने के लिए तमाम पारिवारिक आत्मीयता एवं परिवार के लोगों से संबंध-विच्छेद कर वह लाहौर से सुरेश दादा के आश्रय में कानपुर भाग आया था। रूसी विप्लवियों का प्रभाव उसकी स्मृतियों में था और उन्हीं की तरह उसने भी शपथ ले रखी थी कि जीवन में न किसी से प्रेम करेगा, न किसी का प्रेम-पात्र बनेगा, न विवाह करेगा, न किसी का विवाह रचायेगा। उससे संबंधित ये तमाम बातें मुझे धीरे-धीरे बाद में मालूम हुईं जब अपने पहले परिचय के बाद प्रत्येक दिन, प्रत्येक घड़ी हम एक-दूसरे के करीब आते गए। और उसी वर्ष यानी 1924 में ही! जीवनदायनी गंगा का प्रलयंकारी प्लावन! दोनों तटों पर बसे कानपुर शहर के साथ-साथ अनगिनत गांव उस प्लावन के शिकार हुए थे। प्लावन के शिकार ग्रामवासियों ने वृक्ष की ऊंची डाल पर आश्रय लिया। बहते हुए लोगों को सहारा देने के लिए गंगा पुल पर मोटी-मोटी रस्सियां बांधकर लटकायी गयीं थीं, ताकि धारा के साथ बहते हुए लोग उन रस्सियों को पकड़कर अपने प्राण बचा सकें। शहर में बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए कैम्प डाले गएं। 'तरुण संघ' नाम की एक संस्था काम कर रही थी और हमें भी सेवा दल में काम करने की पुकार मिली। बाढ़ से क्षतिग्रस्त लोगों की सेवा में मैं जुट गया। बलवंत सिंह साथ था। घर के अनुशासन की उपेक्षा कर किसी सार्वजनिक सेवा कार्य के लिए घर छोड़ दिन-रात काम करने का मेरा वह पहला मौका था। बलवंत का नाता घर से पहले ही टूट चुका था, इसलिए उसे किसी तरह के पारिवारिक अनुशासन की चिंता थी नहीं। सेवा कार्य में जुट जाना उसके लिए अनायास था जबकि उसी काम के लिए मेरे किशोर मन ने घर के विरुध्द पहली दफा विद्रोह का रास्ता अपनाया।

हम दोनों की डयूटी प्राय: एक साथ ही पड़ती। रात में हम दोनों गंगा के अंधेरे तट पर खड़े होकर हाथों में जलती लालटेन लिए शून्य में अविराम हिलाया करते ताकि प्लावन की तीक्ष्ण धारा में बहते हुए मनुष्य-मवेशी अंधेरी रात में किनारे का संकेत पा सकें और जब कभी मवेशियों का कोई झुंड उस रोशनी के सहारे हमारे पैरों के पास पहुंच जाता, हम उसे बाहर निकालते, फिर उसे रखने की व्यवस्था की जाती थी।

दिन के समय हम दोनों मल्लाहों के साथ निकलते और बाढ़ग्रस्त निराश्रित परिवारों को उनकी बची हुई सामग्री के साथ नाव पर लादकर गंगा तट के कैम्पों में पहुंचाते किशोर सरदार का हृदय यह सब देख-देखकर पसीजता रहता और उसकी आंखों में उस वक्त एक अव्यक्त-सी करुणा समायी होती थी। शहर के पास ही कल्याणपुर के बाढ़ पीड़ित कैम्प का वह दृश्य आज भी मेरी आंखो में सुरक्षित है। बाढ़ की प्रलंयकारी लीला में सबकुछ गंवा कर हताश, भूखे-असहाय लोगों का वह हुजूम! उनकी हृदय वेधी चीख पुकार से पूरा इलाका गूंज रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते स्त्री-पुरुष अलग-अलग कतारों में पत्तल के सामने बैठे थे कि तभी गर्म पूड़ियों की टोकरी दोनों हाथों से ऊपर उठाये तरुण सरदार दिखाई पड़ा। सिर पर सफेद रेशमी पगड़ी, बदन में साधारण कपड़े की कमीज जिसकी दोनों आस्तीनें ऊपर चढ़ी थीं। मुझसे आंखें मिलते ही उसके होठों पर स्वत: स्फूर्त मुस्कान एवं आंखों में चमक कौंध उठी, लेकिन बातचीत का समय कहां।वह उत्साह एवं उमंग के साथ भूख से बेचैन लोगों की कतार की तरफ बढ़ गया।

बाढ़ पीड़ितों की सहायता-सेवा के उस दौर ने हम दोनों को एक-दूसरे के करीब लाने में काफी मदद की। उस दिन क्षुधित, सर्वहारा जनों के बीच पूड़ियां बांटने का सरदार का अंदाज, काम के प्रति उसकी लगन एवं निष्ठा आज भी मैं नहीं भूल पा रहा हूं। पूड़ियां परोसने वाले उसके हाथों ने बाद के क्रांतिकारी जीवन में उसी निष्ठा के साथ पिस्तौल या बम भी चलाये। उस रोज किसे मालुम था कि परवर्ती क्रांतिकारी जीवन में हमें अति साधारण भोजन भी नियमित रूप से नसीब न होगा या यह कि पूड़ियां परोसने वाले उन हाथों पर सूखी रोटी और नमक ही शेष जीवन के आधार होगें।

उन दिनों हम दोनों के किशोर जीवन में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण भाव के साथ-साथ जो सबसे बड़ा आकर्षण था, वह शहर (कानपुर) के पास कनालफाल के समीप गंगा के तट पर बैठ उसकी सुषमा को अनवरत निरखते रहना और बीच-बीच में किसी विषय, किसी बात या योजना पर परस्पर विचार-विमर्श करना। इसी सिलसिले में अकसर हम क्रांतिकारी जीवन के आने वाले दिनों की कल्पना में तल्लीन हो जाया करते। प्रसिध्द क्रांतिकारी जीवनियों या क्रांति से संबंधित साहित्य का पाठ हम यहीं बैठकर किया करते। एक ओर गंगा की अश्वेत जलधारा गरज के साथ लगातार आगे की ओर बढ़ती और दूसरी ओर क्रांतिकारी साहित्य का प्रभाव हमारी किशोर रंगों में खून की रफ्तार बढ़ा जाता। पानी का प्रचंड वेग एवं उसकी अथक गतिशीलता की छाप हमारे ऊपर सर्वाधिक पड़ी और शायद इसीलिए गंगा के तट का आकर्षण हम दोनों के मन में सदैव बना रहा।

एक शाम हम गंगा के तट पर बैठे अपनी क्रांति संबंधी कल्पनाओं को अमली जामा पहनाने के तरीकों पर विचार-विमर्श कर रहे थे कि अचानक ही आकाश काले बादलों से पटने लगा। गंगा पार की बस्तियां धुधली पड़ने लगीं, हवा का वेग बढ़ गया और थोड़ी ही देर में बादलों की भीषण गड़गड़ाहट से लगा आसमान फट जायेगा। क्षण भर में ही प्रकृति ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। इससे पहले कि हम उठकर वहां से शहर की ओर चल देते, बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी और शहर के फूलबाग स्थिति 'एडवर्ड मेमोरियल हॉल' पहुंचते-पहुंचते जमकर वर्षा होने लगी थी। यहां आकर हमें मालूम हुआ कि साथ की बहुमूल्य पुस्तक 'हीरो एंड हीरोइन ऑफ रशिया' तो हम जल्दबाजी में गंगा किनारे ही छोड़ आए हैं। रूस पर जारतन्त्र के विरुध्द रूसी युवक-युवतियों के सशस्त्र संग्राम की वह इतिहास-पुस्तक दुर्लभ होने के कारण हमारे लिए बहुत ज्यादा मूल्यवान थी, लेकिन उस घने अंधकार में वर्षा के साथ प्रचंड वायु का वेग सम्भालता हुआ दो मील का रास्ता तय करके उसे लाये कौन। मेरे जाने की बात सरदार को नागवार सी लगी। शरीर में वह मुझसे निश्चित रूप से तगड़ा था और अपने उसी तगड़ेपन की दलील देकर उस वक्त उसने मुझे जाने से रोक दिया और खुद लम्बी डग भरता हुआ अंधेरे में गुम हो गया।उसे जाते हुए कुछ ही क्षण गुजरे होंगे कि मेरी भावुकता ने मुझे झिंझोड़ा और मैं भी उस बीहड़ अंधकार में सरदार के पीछे हो गया। घने अंधकार में बेतहाशा भागते मेरे पैरों को अपने भागने का अहसास तब हुआ जब वे बीच सड़क पर बैठे सरदार से टकराये। सिर की रेशमी पगड़ी आधी खुलकर कीचड़ में सनी थी, एक हाथ से पुस्तक एवं दूसरे से अपने पैर का अंगूठा थामे वह लथपथ पड़ा था। पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था। पगड़ी चीरकर मैंने पट्टी बांधी और उसे सहारा देकर सुरेश दा के मेस भीगते हुए वापस आया। उससे अलग अपने घर लौटकर मेरा मन सरदार के दुख से बेचैन था। मैं वहां से रूई-पट्टी, जैम्बक की डिबिया लेकर उसी मूसलाधार वर्षा में सरदार के पास पहुंचा, उसके अंगूठे का खून साफ कर उस पर मरहम पट्टी की और रात भर उसके पास बैठा रहा। सुबह होते ही घर के अनुशासन की सुधि आयी। उस दिन परिवार से मिलने वाली तमाम यंत्राणाएं मैं धैर्यपूर्वक सह गया सिर्फ इस तसल्ली पर कि अपने प्रिय मित्र के प्रति अपना छोटा-सा कर्त्तव्य निभाया। और सरदार का वह स्नेहयुक्त आवेश- 'पीओ, देर न करो। तुम्हें पीना ही पडेग़ा। दूध वाले की दुकान के सामने गर्म दूध से भरा गिलास लिए वह मुझे आदेश दे रहा है। दूध से उन दिनों अरुचि नहीं थी लेकिन भरपेट भोजन के बाद पक्का आधा सेर दूध चढ़ा जाना मेरे पेट के लिए मुश्किल था। आज भी दिल्ली और आगरा स्थित दूध की दुकानों के दृश्य मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं। उन्हीं दुकानों के मालिक बाद में हमारी उपस्थिति दिल्ली और आगरा में सिध्द करने के लिए हमारे मुकदमों में आए थे।

दरअसल, भोजन के बाद गर्मागर्म दूध का गिलास चढ़ा जाने का पाठ मुझे सरदार ने ही दिया। जब कभी पैसा पास होता वह दूध पीने के विलास से नहीं चूकता था। जहां रोटी का लुकमा भी निश्चित न हो वहां दुग्धपान विलास की ही श्रेणी में आएगा न? और उसे सिर्फ तीन पाव गर्मागर्म दूध से ही संतोष नहीं था बल्कि गिलास के दूध पर कम-से-कम डेढ़ छटांक मोटी मलाई का टुकड़ा भी अलग से पड़ना चाहिए। मलाई न रहने पर घी का तडका (छोंक) वह गर्म दूध में दे लेता था। शरीर में खून बढ़ाने का उसका यही उपयुक्त नुस्खा था। दूध के प्रति एक असीम आसक्ति उसके मन में थी। स्वास्थ्य के प्रति वह कभी उदासीन न रहा, हालांकि बाद के पार्टी जीवन में नियमित रूप से हमें भोजन भी नसीब नहीं हुआ। विप्लवी जीवन की अनिश्चित परिस्थिति एवं जीवन-धारण के लिए सीमित साधन और व्यवस्था के अभाव में भी वह शरीर और स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सचेत रहा। यद्यपि जीवन के प्रति उसके मन में जबरदस्त आसक्ति थी, तथापि उसका कहना था कि जीवन जब अधिक सुंदर और प्रिय मालूम पड़ने लगे, तभी अपने आदर्श के लिए उसे बलिदान करना चाहिए।

संस्मरण की इस कड़ी के रूप में एक और दृश्य मेरी आंखों के सामने अब भी कौंध जाता है...

कानपुर स्टेशन का जन-प्लावित प्लेटफार्म, 'जो बोले सो निहाल.... सत्श्री ..अ...का....ल...' के गगनभेदी नारे से दिग-दिगंत गूंज उठा है। गुरु के बाग के सत्याग्रही सिख मोर्चा डालने के लिए पंजाब जा रहे हैं। उन दिनों हर स्टेशन पर, जहां ट्रेन रुकती थी, अधीर जनता सत्याग्रहियों के दर्शनार्थ टूट पड़ती थी। प्रत्येक स्टेशन पर वीर सत्याग्रहियों को भोजन कराने के लिए लंगर खोले गए थे। कानपुर स्टेशन पर भी ऐसी ही व्यवस्था थी और सत्याग्रहियों की एक झलक लेने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। फूलों और फूल-मालाओं की वर्षा! मैं भी स्टेशन गया था। अपार जनसमूह के बेग को ठेलकर सत्याग्रहियों के डिब्बों तक न पहुंच पाने की मजबूरी में ओवर-ब्रिज पर जाकर खड़ा हो गया और असंख्य सिरों से पटे प्लेटफार्म का दृश्य वहीं से देखने में तल्लीन था कि भीड़ को चीरती मेरी दृष्टि अपने सरदार मित्र पर पड़ी वही रेशमी पगड़ी और सफेद कमीज दोनों आस्तीनें बांह पर चढ़ी हुईं । एक हाथ में शरबत की बाल्टी और दूसरे में लंबा-सा गिलास। अपने कंधों से भीड़ को ठेलता हुआ वह सत्याग्रहियों के हाथों में शरबत के गिलास पकड़ा रहा था। भीड़ की खींचातानी में पगड़ी सिर से खिसककर कंधें पर लटक आई है जिसकी चिंता उसे नहीं थी। कम-से-कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा सत्याग्रहियों की प्यास बुझा पाने की व्यग्रता उसके चेहरे, आंख और चाल में स्पष्ट देखी जा सकती थी। ट्रेन के एक सिरे से दूसरे सिरे तक उसकी विश्रामहीन भाग-दौड़! मेरे प्रिय साथी सरदार का यह एक और रूप था।

थोड़ी देर ठहरने के बाद ट्रेन चल पड़ी। फिर एक बार सत्श्री अकाल के नारे से आकाश गूंजा और कोलाहल मुखरित स्टेशन का प्लेटफार्म खाली होना शुरू हो गया। भीड़ पिघलने लगी। जो सत्याग्रहियों को देखने, उनसे मिलने-मिलाने आए थे, बाहर कीओर खिसकने लगे और बच गया हाथों में गिलास-बाल्टी लिए मेरा वह सरदार मित्र! मैं ओवर-ब्रिज से उतर उसकी बगल में खड़ा हुआ पर उसे जैसे किसी बात की सुध नहीं थी। ट्रेन जाने की दिशा में मंत्रमुग्ध आंखों में उदासी लिए अब भी वह खाली पटरी देखे जा रहा था। अपने कंधे पर मेरे हाथ का दबाव महसूस कर मुड़ा और मुस्कराकर एक हाथ से मेरे पंजे को दबाया बोटू ...। उसकी आंखों में कोई अदृश्य निर्णय कौंध उठा था उस घड़ी।

उस दिन लगभग गुमसुम और उदास वह जनशून्य स्टेशन से मेरे साथ बाहर हुआ था और फिर वह दिन भी आया जब दल के आदेशों पर उसे कानपुर, 'प्रताप', सुरेश दादा और मुझे छोड़कर एक छोटे स्कूल का हेडमास्टर बनकर अन्यत्र जाना पड़ा। विप्लव दल के नियमानुसार कुतूहलवश जरूरत से ज्यादा किसी का परिचय प्राप्त करना हमारे लिए मना था और सरदार शायद सब दिन ऐसा अनुभव करता रहा था कि कोई रहस्य वह अपने एकमात्र एवं अनन्य साथी मुझसे छिपाता रहा है, वरना कानपुर से विदाई लेने के दिन ही क्या खुलता। शिक्षक का पद ग्रहण करने जाते वक्त मुझसे मिलने आया था और हमारी आत्मीय घनिष्टता के बावजूद दल की मर्यादा रखने के लिए अब वह जिस रहस्य को छिपाये हुए था, विदाई के क्षण उसे व्यक्त किये बगैर न रह सका। जिस तरुण बलवंत सिंह के स्नेहपाश में मैं अब तक बंधा था, वही सरदार भगत सिंह के रूप में मुझसे विदा ले गया।

यही उसका असली परिचय था लोगों ने उसे बाद में विप्लवी सरदार भगत सिंह के रूप में जाना, लेकिन मेरे लिए तो वह सब दिन मानवीय गुण-सम्पन्न, भाव में गम्भीर भावुकता से ओतप्रोत बलवंत सिंह बना रहा। बाद की हमारी मैत्री परवर्ती क्रांतिकाल में एक-दूसरे के साथ सहयोगी की भूमिका, उसकी फांसी से लेकर मेरे जलावतन तक का प्रसंग इस कड़ी की अगली कहानी है।

सन् उन्नीस सौ सत्ताईस-अट्ठाईस का समय हमारे राष्ट्रीय जीवन में क्रांति के साथ-साथ संकट का काल भी कहा जा सकता है क्योंकि उन्हीं दिनों हमारी आजादी की लड़ाई का स्रोत एक नये रास्ते की ओर प्रवाहित हुआ। उस वक्त तक देशवासी क्रांतिकारी आंदोलन और उसकी विचारधाराओं से ज्यादा परिचित नहीं थे और अंग्रेज सरकार क्रांतिकारियों को साधारण खूनियों तथा डकैतों की श्रेणी में डालकर देश की जनता को सब दिन गुमराह करने का प्रयत्न करती रही थी। ब्रिटिश सरकार का यह कहना था कि विप्लवी देश में संत्रास एवं अराजकता फैलाना चाहते हैं जबकि विप्लवी देश में परिवर्तन के प्रति आग्रही थे। जनसाधारण को विप्लवी के प्रति जागरुक बनाकरआर्थिक परिवर्तनों द्वारा शोषणविहीन समाज की स्थापना ही उनका लक्ष्य था। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए यह जरूरी था कि क्रांतिकारियों की ओर से देशवासियों के सम्मुख एक निश्चित कार्यक्रम पेश किया जाए और देश के नेताओं को असेंबली भवन के भीतर वैधानिक कार्यक्रमों के दांव-पेच से मुक्त कर जनांदोलन के प्रति उत्साहित किया जाए, दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में अंग्रेज सरकार की ओर से भारत के लिए स्वायत्ता शासन की मांग बार-बार ठुकरा दी गयी थी। जन नेताओं के लाख विरोध के बावजूद यहां की जनता के मानवीय अधिकारों को विलुप्त करने के लिए केंद्रीय धारा सभा से टे्रड डिस्प्यूट बिल स्वीकृत करा लिया गया था। कानून स्वीकृत हो जाने के फलस्वरूप देश के करोड़ों भूखे-मेहनतकश लोग अपनी आर्थिक दशा सुधारने के प्रारंभिक स्वत्व एवं एकमात्र उपाय हड़ताल से वंचित कर दिए गए थे। 
     केंद्रीय विधानसभा में हमारे जन-प्रतिनिधियों के उस अपमान और उस अमानुषिक बर्बरतापूर्ण कानून द्वारा देश की करोडों ज़नता पर जो हमला हुआ था उसी के विरोध में भारतीय क्रांतिकारी संस्था 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' द्वारा केंद्रीय असेंबली के सभाकक्ष में बम डालकर गोरी हुकूमत को एक चेतावनी देने के सुझाव पर आगरा हेड क्वार्टर में आलोचना गोष्ठी की बैठक चल रही थी। असेंबली में बम डालकर आत्मसमर्पण करना एवं बाद में मुकदमे के दौरान अभियुक्त के कटघरे में खड़े होकर भारतीय क्रांतिकारी दल की ओर से विप्लवियों के विचारों, आदर्शों एवं उद्देश्यों का दिग्गर्शन कराने के लिए एक विशद राजनीतिक वक्तव्य देने की सूझ सरदार भगत सिंह के मस्तिष्क की ही उपज थी। लेकिन इसे निभाये कौन? यानी केंद्रीय असेंबली में बमफेंकने जैसा जोखिम भरा कार्य कौन करे? इसे पूरा करने का सीधा एवं साफ अर्थ था मृत्यु! लाख सावधानी के बावजूद असेंबली भवन के फर्श पर बम फटने के साथ किसी की मृत्यु की सम्भावना स्पष्ट थी और उसके बाद वहां नियुक्त सुरक्षा पुलिस या सार्जेंट द्वारा बम फेंकने वाले को तुरंत मौत के घाट उतार देना भी लगभग निश्चित ही था। बावजूद इसके कि हम सभी क्रांतिकारी देश को स्वतंत्र कराने की बलिदानी भावना से प्रेरित हो, प्रियजनों से नाता तोड़, किसी भी क्षण मृत्यु का आलिंगन करने का संकल्प ले, सिर पर कफन बांध, गृह-त्यागी बनकर निकल पड़े थे, फिर भी विचार गोष्ठी में बैठकर अपनी-अपनी सुरक्षा पर नजर गड़ाये दूसरे साथी को निश्चित मौत का फरमान सुनाना किसी के लिए भी संभव न था। ऐसा कोई व्यवहार किसी के भी मन को संदिग्ध बना सकता था। सरदार ने सहर्ष आगे बढ़कर निश्चित मौत से खेलने का बीड़ा उठाया, साथ-साथ मैंने भी। वर्षों पहले कानपुर में गंगा के किनारे बैठे-बैठे जिन अनागत दिनों की कल्पनाएं हम बार-बार किया करते थे, कि एक साथ ही दोनों देश की स्वतंत्राता के लिए आत्माहुति देंगे, उसे साकार करने का समय आ गया था...

हम दोनों- सरदार और मैं- बम के साथ आगरे से दिल्ली पहुंचे। लगभग महीने भर तक दिल्ली में ही टिके रहे। मैं हाफ पैंट, कमीज और जूता पहनता था और सरदार फ्लैट हैट लगाने लगे थे। प्रत्येक संध्या बम को अखबार में ढंककर कोट की नीचे वाली जेब में रखे हम साथ-साथ असेंबली भवन जाते, वहां का वातावरण परखते, पहरे पर संतरियों की गतिविधि देखते और अनुमान लगाते-कैसे अपने उद्देश्यों में सफल हो सकेंगें।

इसी बीच एक दिन सरदार ने साथ-साथ फोटो खिंचवाने की बात रखी। कुछ देर तो मैं टालता रहा, लेकिन सरदार जब जिद पर उतर आए तब मुझे भी झुकना पड़ा, और वही एकमात्रा तस्वीर हम दोनों की आखिरी यादगार बनकर रह गयी।

फिर आया वह दिन जिसके लिए हम आगरे से चलकर दिल्ली आए थे और लगातार महीने भर तक बिना नागा असेंबली भवन के अगल-बगल चक्कर लगाते रहे थे। यानी 8 अप्रैल, 1928। दिन के ग्यारह बजे स्थान केंद्रीय असेंबली हॉल जिसे अब संसद कहा जाता है। ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल पर जनमत जानने के लिए प्रस्ताव स्वीकृत हो गया था। अध्यक्ष की कुर्सी पर सरदार बल्लभ भाई पटेल विराजमान थे। ट्रेजरी बेंचों पर सर जेम्स क्रेरर एवं सर जार्ज शुस्टर। विशिष्ट व्यक्ति के रूप में वायसराय की सीट पर, दर्शक दीर्घा में, सर जान साइमन। 
      सरकारी बैंचों के सामने विरोधी सीट पर पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित मदनमोहन मालवीय एवं डा. मुंजे आदि। बम हम दोनों ही की जेब में थे। ऊपर से पीछे की खाली बैंचों को लक्ष्य करके हमने बम फेंके। जोरों का धमाका हुआ, लेकिन चूंकि किसी को मारने का इरादा तो था नहीं, इसीलिए कमजोर बम बनाये गए थे ताकि धमाके पैदा करने के अलावा और किसी तरह का भयंकर, घातक या मारक प्रभाव उससे पैदा न हो सके। 'इंकलाब जिंदाबाद' एवं 'साम्राज्यवादी शासकों के बहरें (राष्ट्रीय मांगों के प्रति) कानों को खोलने के लिए जोरदार आवाज की जरूरत है' के नारों एवं फटे बम के धुएं से हॉल भर गया और भगदड़ मच गयी। डर के मारे सर जेम्स क्रेरर बैंचों के नीचे जा छिपे। बम के साथ फेंके गए लाल रंग के छपे पर्चें धुएं की सतह पर हॉल में इधर-उधर तैर रहे थे। 
        उस पर्चें में गोरी हुकूमत की आंखें खोलने के लिए भारतीय क्रांतिकारी दल के उद्देश्यों का स्पष्ट हवाला दिया गया था-'दो नगण्य इकाइयां (सरदार भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्ता) को कुचलने से राष्ट्र नहीं दबेगा... सरकार इस बात को समझे कि पब्लिक सेफ्टी तथा ट्रेड डिस्प्यूट बिल एवं लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या के विरुध्द जनमानस का विरोध प्रदर्शित करने के अतिरिक्त हम इतिहास को भी यह साक्ष्य देना चाहतेहैं कि व्यक्तियों का दमन करना आसान है, लेकिन विचारधाराओं का दमन नहीं किया जा सकता। विशाल साम्राज्य नष्ट हो जाते हैं लेकिन विचारधारा नष्ट नहीं होतीं। बोरबोन और जार का पतन हो गया, किंतु क्रांतिकारी आगे बढ़ते गए, हमें, जिनको मनुष्य जीवन से प्रेम है और जो एक बड़े ही गौरवमय भविष्य की कल्पना करते हैं, व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्राता के लिए बाध्य होकर मानव-रक्त बहाना पड़ रहा है यह आवश्यक है क्योंकि जो मनुष्यता के लिए शहीद होते हैं, उनके त्याग से क्रांति की वह वेदी बनती है जहां से मानव द्वारा मानव के शोषण का अंत हो सकेगा-इंकलाब जिंदाबाद'।

अपनी पूर्व योजनाओं के अनुसार एवं मार्शल लॉ जारी न हो या बम फेंकने के अपराध में निर्दोष व्यक्ति न पकड़ लिए जायें, हम दोनों ही ने आत्मसमर्पण कर दिया। तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने उस घटना का तात्पर्य अच्छी तरह समझा और बम विस्फोट के बाद ही व्यवस्थापिका सभाओं के संयुक्त अधिवेशन में भाषण के समय चर्चा करते हुए बताया कि बमों का यह प्रकार किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि एक संस्था (अंग्रेजी शासन) पर किया गया है।

हम दोनों को दिल्ली के दो अलग-अलग थाना में रखा गया। मुकदमे शुरू हुए फिर हमारा स्थानान्तरण दिल्ली जेल में हुआ जहां एक साथ सटी दो अलग-अलग कोठरियों में हमें रखा गया। बीच में खड़ी अभेद्य दीवार। नियाज अली हमारा जेल वार्डन था जिसे एक अरसे तक हम हाड़-मांस का न होकर पत्थर का बना समझते रहे। नियाज अली ने कभी मुझे और सरदार को एक साथ न होने दिया। स्पर्शानुभूति की बात तो दूर रही, उसने कभी हम दोनों को एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखने दिया, उन दो-चार दिनों को छोड़कर जबकि इकट्ठे हमें अदालत ले जाया जाता था। दिल्ली की उस विशेष अदालत में न्यायाधीश के सामने प्रविष्ट होते समय अपने-अपने हाथ-पांवों में पड़ी बेड़ियां की झंकार के साथ हम 'क्रांति चिरंजीवी हो' का नारा लगाते। पूरा न्यायालय गूंज उठता था, और तभी से यह नारा राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त हो गया। बम विस्फोट के साथ पहले-पहल सरदार के मुंह से निकली 'इंकलाब जिंदाबाद' की घोषणा जैसे पूरे राष्ट्रीय जनजीवन में व्याप्त हो गयी।

मुकदमे के दौरान न्यायाधीश महोदय ने सरदार से 'क्रांति' शब्द की व्याख्या करने को कहा तो सरदार ने बताया- 'क्रांति या विप्लव खून-खच्चर ही का रास्ता नहीं, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिशोध का कोई स्थान है। बम और पिस्तौल ही क्रांति का धर्म हो, ऐसा भी नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है कि वर्तमान समाज और शासन व्यवस्था जो स्पष्टत: अन्याय एवं अत्याचारों पर आधारित है, परिवर्तित हो। आप पूर्ण परिवर्तन के द्वारा ऐसी व्यवस्था की स्थापना करें जिसमें सर्वसाधारण की सत्ता कायम हो सके।'

आसिफ अली साहब ने हमारी ओर से वकालत की थी और हमारे गवाह बने थे डॉ. मुंजे एवं पंडित मदनमोहन मालवीय। न्यायालय ने हम दोनों को आजीवन काले पानी की सजा दी। 1930 में 'लाहौर षडयंत्र केस' के अंत में जब मैं सदा के लिए सरदार से बिछुड़कर मुलतान जेल भेज दिया गया, तब सरदार ने मेरी बहन को एक पत्र लिखा था जो आज भी मेरे जीवन की अमूल्य निधि है। 17 जुलाई, 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल से लिखा गया वह पत्र सरदार के व्यथातुर हृदय की अभिव्यक्ति हैं-'बटुक की जुदाई आज मेरे लिए असह्य हो रही है। इस बिछोह से मैं एकदम स्तब्ध सा हो गया हूं... एक-एक पल मेरे लिए असह्य भार बन गया है। सचमुच, अपने भाई एवं परिजनों से भी ज्यादा प्रिय उस मित्र से अलग हो जाना आज मेरे लिए अत्यन्त ही कठिन गुजर रहा है...हमें सबकुछ धैर्यपूर्वक सहन करना है और आपसे भी हिम्मत के साथ परिस्थिति का सामना करने का अनुरोध करूंगा ।'

'लाहौर षडयंत्र केस' में जब सरदार को फांसी की सजा का फैसला सुनाया गया तब अपने एक पत्र में उसने मुझे लिखा:

'प्रिय बटुक,

दीर्घकाल तक हम लोगों का विचार-प्रहसन चलने के बाद अब उस पर यवनिका पात हुआ। न्यायाधीशों ने सजाएं घोषित कर दी हैं और उन सजाओं की इत्तला हमें भेज दी गयी है। मुझे फांसी की सजा मिली है।
तुम्हें मालूम है कि मैं लाहौर जेल की उन्हीं फांसी की कोठरियों में हूं, जहां चंद रोज पहले तुम मेरे साथ थे। इन फांसी की कोठरियों में कुल पैंतालीस मृत्यु-दंड प्राप्त बंदी हैं जो प्रतिक्षण अपनी अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे अभागे बन्दी फांसी के फंदे से छूट पाने के लिए दिन-रात भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें से अधिकांश अपने कृत्यकर्म के लिए अत्यंत ही अनुलप्त हैं और इन अभागे बन्दियों के बीच मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं, भगवान के बदले अपने आदर्शों में ही जिसकी अविचल आस्था है, एवं जिस आस्था के लिए मैं मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा हूं, इसके लिए संतुष्ट हूं। तुमसे मेरा बिछोह अत्यंत ही पीड़ादायक है, लेकिन इससे कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति होगी। मैं फांसी के तख्ते पर अपना प्राण विसर्जित कर दुनिया को दिखाऊंगा कि क्रांतिकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खुशी-खुशी आत्म-बलिदान कर सकता है। मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन तुम आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए जीवित रहोगे और मेरा दृढ़विश्वास है कि तुम यह सिध्द कर सकोगे कि विप्लवी अपने उद्देश्यों के लिए आजीवन तिल-तिल कर यंत्राणाएं सहन कर सकता है। मृत्यु दंड पाने से तुम बचे हो और मिलने वाली यंत्राणाओं को सहन करते हुए दिखा सकोगे कि फांसी का फंदा, जिसके आलिंगन के लिए मैं तैयार बैठा हूं, यंत्रणाओं से बच निकलने का एक उपाय नहीं है। जीवित रहकर विप्लवी जीवन भर मुसीबतें झेलने की दृढ़ता रखते हैं। 
                                          तुम्हारा-भगत सिंह'

सरदार अपने विचारों या व्यवहारों में कट्टरपंथी कभी नहीं रहे मस्तक पर सिख धर्म के द्योतक लंबे बाल, कंघा, कच्छा और कड़ा लेकर वह कानपुर आए थे, लेकिन बाद के दिनों में परिस्थिति के अनुसार उन्होंने खुद को दूसरे रूप में ढाल दिया। लंबे-लंबे बाल कटवाकर नीचे से ऊपर तक सूट एवं हैट से लैस उन्होंने अंग्रेज साहबों का रूप धारण किया। हिंसा एवं अहिंसा की उधेड़बुन में उनके विचार उलझे हुए नहीं थे, न ही उनके मन में कभी किसी के प्रति हिंसा या द्वेष पनपा। राजनीतिक बंदियों को युध्दबंदी (प्रिजनर ऑफ बार) की स्वीकृति दिलाने एवं तदनुसार उनके सम्मानपूर्वक व्यवहार की मांग पर बंदियों द्वारा सामूहिक अनशन का संग्राम आरम्भ करना तथा उसी संग्राम के द्वारा देश की मुरझाई हुई चेतना में फिर से स्पंदन जगाने की कल्पना सरदार ने ही की थी और उसी संग्राम के फलस्वरूप पूरे देश में एक अभूतपूर्व परिस्थिति उत्पन्न हुई एवं बाद में 1930 का जनांदोलन जिससे प्रेरित हुआ। खुद सरदार ने जेल के भीतर 14 जून, 1929 से प्रारंभ करके लगातार 127 दिनों तक भूख की अनन्त ज्वाला में घुलते हुए मौत की प्रतीक्षा की थी...

गंभीर मननशीलता, राजनीतिक दूरदर्शिता एवं आत्मबल पर अटूट विश्वास सरदार के अन्य गुण थे। दूसरे देश के क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ पराधीन भारतवर्ष की राजनीतिक परिस्थिति का तुलनात्मक विचार सरदार के चिंतन का एक विशिष्ट पक्ष था। बलिष्ठ हाथों में पिस्तौल लेकर जिस प्रकार लक्ष्य- भेद करने में वह माहिर थे, उसी प्रकार उनकी सुंदर उंगलियां लेखनी चलाने में माहिर थीं।
     'प्रताप' में काम करते समय डैन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फार आइरिश फ्रीडम' का बड़ा ही सुंदर अनुवाद उन्होंने किया था। दिल्ली के साप्ताहिक 'अर्जुन' के सम्पादकीय में भी वह लेखनी चलाते रहे। उन्हीं दिनों पंजाब के विद्रोही किसान आंदोलन, कूका विद्रोह और बब्बर अकाली आंदोलन पर लिखी उनकी पांडुलिपियां मैंने पढ़ी थीं। फांसी के पहले पंजाब के तत्कालीन गवर्नर के पास उन्होंने अपने साथ फांसी की सजा से दंडित अन्य साथियों को फांसी के फंदे से लटकाने के बजाय युध्दबंदियों की भांति गोली से उड़ा दिए जाने के लिए जो आवेदन पत्र भेजा था। उसकी शैली एवं दलील दोनों ही अपने ढंग की अकेली चीज थीं यानी सरदार न सिर्फ एक क्रांतिकारी भर ही थे बल्कि इसके साथ-साथ एक दूरदर्शी राजनेता, सफल अनुवादक, पत्रकार एवं चिंतक का अद्भुत सम्मिश्रण उनके व्यक्तित्व में मौजूद था। 
      अपने ध्येय के लिए जीवन की आहुति चढ़ा देने की प्रबल प्रेरणा एवं आकांक्षा से ही सब दिन प्रेरित हुए और निश्चित मृत्यु की ओर बढ़ते गए। अनासक्त हृदय का कोई व्यक्ति ही इस प्रकार संसार की स्थूल वासनाओं से मुक्त होकर मृत्यु को सहर्ष गले लगा सकता है। स्वामी विवेकानंद की वाणी, सरदार के संदर्भ में, मुझे हमेशा याद आती रहती है-'यदि तुम्हारा मन अनासक्त है। तो तुम्हारी भक्ति भी अपरिसीम है। संसार की कोई भी ताकत तुम्हारी गति का प्रतिरोध नहीं कर सकती'। और इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज शासकों की विशाल राक्षसी शक्ति भी सरदार की जीवन गति का प्रतिरोध कर पाने में सब दिन असमर्थ रही। 7 अक्टूबर, 1930 को फांसी की सजा सुनाई गयी थी और 23 मार्च, 1931 की शाम उन्हें फांसी दे दी गयी। वह सब दिन कहा करते थे मातृभूमि की बलिवेदी पर कौन पहले जायेगा, कौन पीछे, नहीं मालूम लेकिन चाहे जो कोई पहले जाए उसके लिए हम आंसू नहीं बहायेंगे बल्कि उसके अधूरे कार्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे। हमारा बलिदान यों ही नहीं जायेगा बटुक! यह और बात है कि आने वाले परिणामों को देखने के लिए हम संसार में नहीं रहें...

सरदार सचमुच आजादी देखने के लिए नहीं रहे, लेकिन उनका बलिदान भी यों ही नहीं गया। आज सोचता हूं तो लगता है जैसे स्पष्ट दृष्टि में आने वाला समय बिल्कुल ही स्पष्ट और साफ होकर कैद था- शहादत के बाद चाहे जितना समय लगे, देश आजाद होगा और जरूर होगा।





























गुरुवार, 21 जुलाई 2011

लाहौर नेशनल कॉलेज में भगत सिंह -छबीलदास


भगत सिंह जहां एक जोशीला इंकलाबी था वह एक बहुत अच्छा विद्यार्थी भी था। उसके अध्यापक होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि उसे पढ़ाने में बहुत आनन्द आता था। भगत सिंह को पढ़ने का बेहद शौक था। जब किसी भी किताब का नाम उसके सामने लिया गया तो उसने फौरन उसे पढ़ने की फरमाइश की। वैसे तो भगत सिंह ने न जाने इतिहास की कितनी ही किताबें पढ़ डाली होंगी लेकिन मुझे अभी तक याद है कि उसे जो किताब सबसे ज्यादा पसंद थी वह 'क्राइ फॉर जस्टिस' थी। भगत सिंह ने लाल पेंसिल से इस किताब के बहुत हिस्सों पर निशान लगाए थे। इनसे पता चलता था कि उसके हृदय में बेइन्साफी के खिलाफ लड़ने की भावना किस तरह कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह पुस्तक लाजपतराय भवन लाहौर में हमारे घर में वर्षों तक रही। स्वयं मेरे बच्चों विजय, सन्तोष और मनोरमा ने कई बार इस किताब को लेकर मुझसे ढेरों सवाल पूछे। मेरे बच्चे भी यह जानना चाहते थे कि भगत सिंह को कौन-सी किताब पसंद थी और क्यों ? 

भगत सिंह को पढ़ने की आदत तो इतनी प्रबल थी कि जिस दिन उसे फांसी लगाई गई उस दिन भी वह अपने नियमानुसार किताब पढ़ने में मगन था। तो स्वयं उन दिनों जेल में था लेकिन जेल ही से मिलने वाली रिपोर्टों से पता चलता था कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी लगनी थी उस दिन उसके चेहरे पर परेशानी और गम की कोई झलक दिखाई नहीं पड़ती थी। जब वार्डन ने उससे आकर तैयार होने को कहा कि जेल के नियमों के अनुसार हर कैदी को बाकायदा नहा-धोकर कपड़े बदलवाकर और उसकी कोई अंतिम इच्छा हो तो उसे पूरी करके फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है, कहते हैं भगत सिंह ने हंसते-हंसते यही कहा था कि भाई पहले मुझे अपनी किताब तो पूरी कर लेने दो। भगत सिंह उस समय लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। एक नौजवान जो जानता था कि कुछ ही घंटे बाद उसे फांसी के तख्ते पर लटकाया जाना है अगर अपनी कोई प्रिय पुस्तक पढ़ने में मगन रहे तो उससे यही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि वह सचमुच एक अनोखे इरादे का व्यक्ति होगा। 

मैंने नेशनल कॉलेज में और बाहर भी भगत सिंह को हमेशा हंसते हुए देखा। लेकिन उस हंसी के पीछे भी उसका पक्का इरादा और अपने मकसद को पूरा करने की भावना झलकती थी। लगता था कि भगत सिंह को जीवन के सांसारिक बंधनों से गहरी चिढ़ थी इसलिए उसने कभी शादी करवाने की हामी नहीं भरी। बहुत साल बाद भगत सिंह की माताजी उसके विषय में बातचीत करते हुए बताती थीं कि वह हमेशा हंसकर यही कहता था- बेबे तुम परेशान न हुआ करो, तुम्हारे लिए एक अनोखी दुल्हन ब्याह कर लाऊंगा। भगत सिंह का मतलब हिंदुस्तान की आजादी से था। जब भगत सिंह की मां श्रीमती विद्यावती फांसी लगने से कुछ दिन पहले अपने बेटे से मिलने गईं तब भी वह जोरों से हंस रहा था और मां को दिलासा दिलाने के लिए बार-बार यही कहता कि भारत को जल्दी ही आजादी मिलेगी और उसे तो खुशी होनी चाहिए कि उसका बेटा किसी मकसद के लिए मरने जा रहा है। लोग तो बीमारियों से भी मरते हैं। लेकिन कितने खुश किस्मत ऐसे हैं जिन्हें देशभक्ति और वतनपरस्ती के इल्जाम में फांसी का तख्ता नसीब होता है। 

भगत सिंह को विश्वास था कि शादी का बंधन इंकलाब के रास्ते में बहुत भारी रुकावट है। मुझे याद है एक बार लाहौर में दरिया रावी में मैं और भगत सिंह कश्ती की सैर कर रहे थे, मेरी तरह भगत सिंह को भी दरिया में कश्ती की सैर का बहुत शौक था। उस वक्त शाम का अंधेरा होने ही वाला था। भगत सिंह ने हंसते हुए मुझसे पूछा-'गुरुजी सुना है आप शादी कर रहे हैं? क्या यह खबर ठीक है' जब मैंने कहा, 'हां' तो भगत सिंह एकदम से कहने लगा 'फिर इंकलाब कैसे आएगा? आप घर गृहस्थी में पड़ जाएंगे या मुझ जैसे नौजवानों को इंकलाब का सबक पढ़ायेंगे? मैंने महसूस किया भगत सिंह को मेरी शादी करने का फैसला पसंद नहीं आया। 

मैंने भगत सिंह को बताया कि मैं जिस लड़की से शादी कर रहा हूं वह कोई मामूली लड़की नहीं है बल्कि स्वयं एक आदर्शवादी और क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति की बेटी है। मुझे प्रसन्नता है कि स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए मुझे एक सहयोगी और मिल गया है। मेरा वह जवाब सुनकर भगत सिंह हंसने लगा लेकिन मुझे उस समय ही यह एहसास हो गया था कि भगत सिंह को मेरे जवाब से सन्तोष नहीं हुआ था। वह यही सोच रहा था कि उसके गुरुजी ने अपनी जिंदगी का यह गलत फैसला किया था। 

लेकिन मेरी पत्नी सीता देवी ने जिस तरह सक्रियता से स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, बार-बार जेल यात्रा की और आजादी मिल जाने के बाद भी उन्होंने महिलाओं व मजदूरों के अधिकारों के संघर्ष को अपना मकसद बनाये रखा था, उसने हमेशा मुझे यही एहसास दिया कि चाहे भगत सिंह को मेरा फैसला कितना भी नापसंद था लेकिन मेरा फैसला गलत नहीं था।

हमारे सौभाग्य में जिन दिनों देश भर में महात्मा गांधी तथा स्वराज्य आंदोलन की लहर मची हुई थी, उन्हीं दिनों विदेशी विशेषत: आयरलैंड तथा सोवियत रूस से धड़ाधड़ राजनीतिक लिटरेचर, किताबें, टेक्स्ट, अखबारों और मैग्जीनों का आना शुरू हो गया था। आयरिश लिटरेचर तो केवल यही नारा लगाता था कि किसी भी देश अथवा जाति को आजादी प्राप्त करने के लिए बन्दूकों, पिस्तौलों, बमों तथा हवाई जहाजों की भारी जरूरत होती है। भारत में अंग्रेजी शासन अपनी फौजों तथा छावनियों से सशस्त्रा सैनिकों तथा टैंकों द्वारा स्थापित हुआ है और अब तक चल रहा है। बाइबिल में स्पष्ट घोषणा दी गयी है कि 'इफ यू हैव फेथ इन द सोर्ड, बाई द सोर्ड यू शैल बी पनिश्ड' अर्थात् यदि तुम तलवारों और बंदूकों द्वारा किसी को गुलाम बनाते हो तो समय और अवसर आने पर वही लोग तुमसे अधिक तेजतर शस्त्रों व बंदूकों से तुम्हें अपने हाथ से धकेल कर बाहर करेंगे। अत: यदि सचमुच ही भारत की जनता अपनी दासता का जुआ अपनी गरदन से उतार फेंकना चाहती है तो किसी न किसी ढंग से अणु शस्त्र प्राप्त करे। वे साधन बेग-बारो-स्टील अर्थात् कहीं से मांगकर, उधार लेकर अथवा जबर्दस्ती कहीं से चुराकर अथवा लूटकर प्राप्त करे ।

हमारा दूसरा पड़ोसी देश जो हमें धड़ाधड़ अपना साहित्य भेज रहा था वह था सोवियत रूस जिसने 1917 में देश के किसानों तथा मजदूरों के बलबूते पर अपने देश में किसानों और मजदूरों का शासन स्थापित कर लिया था और सदियों की तानाशाही के जुए को अपनी गर्दन से उतार फेंका। नौजवान भारत सभा के एक दल ने आयरिश ढंग को अपनाकर और अस्त्र जमा करके अपना काम शुरू कर दिया। भारत की सेंट्रल असेंबली के अधिवेशन में बम फेंककर बहरे कान को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है वाले पोस्टर भी फेंके थे। फिर उन्होंने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप ही मद्रास से लौटते हुए वायसराय की ट्रेन पर बम चलाने का प्रोग्राम भी पूरा किया। फिर पंजाब के बड़े-बड़े शहरों जैसे लाहौर, अमृतसर, गुंजरांवाला, लायलपुर और रावलपिंडी आदि में एक ही दिन एक ही समय में बम चलाने का कार्य पूरा किया। राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में लार्ड हार्डिंग वायसराय के जलूस वाले हाथी पर भी बम चला दिया जिसमें हाथी का महावत तथा उसका लड़का तत्काल ही दम तोड़ गए। लेडी हार्डिंग की गर्दन पर छह इंच गहरा जख्म लगा और लार्ड हार्डिगं स्वयं बेहोश हो गए। बंगला में कुछ पोस्टर भी फेंके जिसमें लिखा था कि हम अंग्रेज हुकूमत को सचेत करना चाहते हैं कि अंग्रेजी शासन के विरोधी तथा शत्रु केवल बंगाल एवं कलकत्ता में ही नहीं बसते। अब वे भारत में जिस भाग में भी कदम रखेंगे वहीं अपने शत्रु तथा जानलेवा मौजूद पायेंगे। 

आजादी का साहित्य तैयार करने वालों तथा नौजवान भारत सभा में कांगड़े वाले लेखक रामचंद्र और मिंटगुमरी के मेहता सत्यपाल इत्यादि सम्मिलित थे। जिन्होंने दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट उर्दू भाषा में हजारों की संख्या में छापकर पंजाब के गांव-गांव व कोने-कोने में बांटना और बेचना शुरू कर दिया। हमारा सबसे प्रथम टैक्स्ट भारतमाता के दर्शन अर्थात् हम स्वराज्य क्यों चाहते हैं था। टैक्स्टों के प्रकाशन का प्रोत्साहन फ्रांस की राज्य क्रांति के जन्मदाता वाल्टेयर से लिया गया था। मैंने अपने टैक्स्ट के दूसरे पृष्ठ पर प्रकाशन के शीर्षक में वाल्टेयर का वह ऐतिहासिक वाक्य लिखा कि दस-दस, बीस-बीस जिल्दों वाली हजारों पृष्ठों की मोटी-मोटी किताबों को भला कौन खरीद सकता है और उसे पढ़ और समझ भी कौन सकता है। सच्ची बात तो यह है कि यह गरीब से गरीब किसान और मजदूरों की झोंपडियों तक पहुंच सकने वाले पैसे दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट ही होते हैं जिनसे सल्तनतों के तख्ते उलट जाया करते हैं। प्रेस का मालिक मेरा एक मुसलमान दोस्त था। यह वाक्य पढ़कर वह मुझसे पूछने लगे कि आप भी अंग्रेजी राज्य का तख्ता उलटना चाहते हैं? 

मैंने जवाब दिया जनाब यह वाक्य मेरा नहीं है बल्कि एक फ्रेंच विद्वान तथा फिलॉसफर वाल्टेयर का है। आप तो मुसलमान हैं और आपने फारसी की वह मिसाल नहीं सुनी है कि नकले कुफ्र-कफ्र न बासद अर्थात् कुफ्र के शब्दों को दोहराना कुफ्र नहीं होता। हमारी कचहरियों में ऐसे भी मुकदमे पेश होते हैं जहां एक आदमी जज के सामने पेश होकर कहता है कि अमुख आदमी ने मुझे बहुत ही गंदी गाली दी है और जज के सामने वह आदमी उस गंदी गाली के शब्दों को दोहरा देता है तो वह उसे अपराध नहीं समझता। प्रेस का वह मालिक मेरी बात सुनकर हंस पड़ा और मेरे टैक्स्ट की पांडुलिपि अपने हाथ मैं लेकर बोला जनाब में इसे अवश्य ही छाप दूंगा। इसके बाद तो वह टैक्स्ट तथा मेरे लिखे हुए दर्जनों टैक्स्ट हजारों की संख्या में छपते रहे और चलते रहे।

जब ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी लगाने का फैसला किया तो उस वक्त मैं मुल्तान जेल में था। लेकिन जिस दिन यानी 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी लगाई गई तो जेल से रिहा होकर देहरादून अपनी पत्नी और बच्ची विजय को मिलने गया हुआ था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए बेहद दुख का समाचार था। सारे पंजाब में सनसनी और दुख की लहर फैल गई थी। उस दिन शायद कुछ टोडियों को छोड़कर किसी घर में चूल्हा नहीं जला था। सारा पंजाब मातम में डूबा हुआ था। औरतें सिसक-सिसक कर रो रहीं थीं। अंग्रेज सरकार ने इस भय से कि अगर उन्होंने इन तीनों शहीदों की लाशें उनके रिश्तेदारों के हवाले कर दीं तो कहीं पंजाब में और उसके साथ ही सारे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा हो जाए, इन तीनों की लाशों को रात के अंधेरे में सतलुज नदी के किनारे फिरोजपुर के नजदीक एक स्थान पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। जो क्रांतिकारी जीते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए भारी आतंक और चुनौती बने हुए थे उनकी लाशों से जैसे पूरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद भयभीत था।
   यह प्रश्न भी वाद-विवाद का रहा है कि गांधीजी की अहिंसा और असहयोग आंदोलनों में लाहौर तथा पंजाब के लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रही ? पंजाब मुस्लिम, हिंदू और सिख संप्रदायों में विभाजित था। मुसलमान पचास प्रतिशत से ज्यादा थे। उनका कांग्रेस और कांग्रेसियों के साथ कोई नाता नहीं था। हिंदू संप्रदाय सनातन धर्म और आर्यसमाजियों में बंटा हुआ था। आर्यसमाज भी गुरुकुल पार्टी और कॉलिज पार्टी में बंटी हुई थी। हर संस्था की अपनी-अपनी समस्याएं थीं। इसलिए कोई भी पूरी तरह से आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुआ। सिखों में भी एक वफादार ग्रुप था जो हमेशा ब्रिटिश सेना को जवान सप्लाई करने में गर्व अनुभव करता था। बंगाल, यू.पी. और दक्षिणी भारत के मुकाबले में पंजाब में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की प्रतिक्रिया बहुत कम और कमजोर रही। पंजाब सांप्रदायिक रूप से विभाजित था। और लोग आपस में खींचातानी करते रहते हैं।
   पंजाब में कांग्रेस शक्तिशाली नहीं थी। विशेष रूप से शहरी इलाकों में कांग्रेस का प्रभाव कम था। गांवों में सिखों की एक संख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसकाकारण उनमें राजनैतिक चेतना उत्पंन होना नहीं बल्कि गुरुद्वारों में सुधार लाने की इच्छा थी। शहरी इलाकों में नाम की कांग्रेस कमेटियां तो बनी थीं लेकिन गांवों में वह भी नहीं थीं। पंजाब में लोग सार्वजनिक मीटिंगों में शामिल होते थे जब कोई बड़े लीडर किसी अन्य राज्य से लाहौर तथा पंजाब के किसी शहर में आते थे। लेकिन उनकी हिदायतों की कोई व्यावहारिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी।
   'क्राई फॉर जस्टिस' के अलावा भगत सिंह की प्रिय पुस्तकें थीं डॉन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम' और 'हीरोस और हीरोइन्स आफ रशिया'। भगत सिंह ने मुझे भी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल होने के लिए कहा। मैंने उसे कहा 'मैंने सर्वेंट्स आफ पीपुल्स सोसायटी के आजीवन सदस्य बनते हुए जो प्रतिज्ञा की है उसके अंतर्गत मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल नहीं हो सकता।' मैंने उससे कहा कि मैंने आपकी संस्था के और नियम पढ़े हैं। मैं जानता हूं कि आपके तीन नियम हैं, शस्त्रा और असलह को जमा करना, उसका उचित अवसर पर इस्तेमाल करना और सारे देश में साम्राज्यवाद विरोधी प्रोपेगैंडा करना। मैंने भगत सिंह से पूछा था कि क्या तुम जानते हो कि मैं आजकल क्या काम कर रहा हूं? मैं आजकल किताबें और पैम्पलेट लिख रहा हूं और जगह-जगह लेक्चर दे रहा हूं।
   यह सुनकर भगत सिंह ने कहा, 'गुरुजी मैं संतुष्ट हूं।' मैंने भगत सिंह से कहा। 'मैं तुम्हें आश्वासन दिलाता हूं कि तुम्हारी हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में औपचारिक रूप से प्रवेश किए बिना भी मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूध्द अपने प्रोपेगैंडा को दुगना कर दूंगा ताकि लोग तुम्हारी संस्था और तुम्हारी कार्रवाही को सही मानें।'
   नेहरू म्यूजियम नई दिल्ली के लिए ली गई एक इन्टरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरे यह छात्रा जिनमें भगत सिंह भी शामिल था मुझसे एक अध्यापक होने के नाते प्रेरणा लेते होंगे?
   मैंने तब भी अपने उत्तर में कहा था कि हर अध्यापक अपने शिष्यों को किसी न किसी तरह से प्रेरणा जरूर देता है और प्रभावित करता है। लेकिन विद्यार्थी भी अपने अध्यापकों को प्रभावित करते हैं और प्रेरणा देते हैं। मैं यह बात बहुत प्रसन्नता और दावे के साथ कहता हूं कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण तथा नेशनल कॉलेज में मेरे अन्य विद्यार्थियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
   जहां तक भगत सिंह का स्वभाव है उसकी प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत स्वयं उसका अपना परिवार था। उसके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह महान देशभक्त थे जिन्होंने अपना सारा जीवन भारत की स्वतंत्राता के लिए अर्पण कर दिया और बहुत मुसीबतें उठायीं। भगत सिंह अपने चाचा सरदार अजीत सिंह के बहुत भारी प्रशंसक थे और औरसंख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसका उन्हें अपना आदर्श मानकर उनकी इज्जत करते थे।

क्रांतिकारी भगत सिंह को तो बस देश की आजादी की ही लग्न थी। क्रांति ही उसका धर्म था और वह किसी और देवी देवता में विश्वास नहीं रखता था। भगत सिंह मुझसे हर राजनैतिक विषय पर बातचीत करता था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की गतिविधियों की बातें वह मुझसे नहीं करता था। क्योंकि वह सभी गुप्त कार्रवाहियां थीं। जो आर्मीयों के सदस्यों के बीच की बातें थीं। मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सदस्य नहीं था। जब भी हम असहयोग आंदोलन की प्रगति और गांधी के विषय में बातचीत करते तो भगत सिंह उत्तेजित होकर गांधीजी की आलोचना करता। गांधीजी के प्रति भगत सिंह का रवैय्या सुभाषचंद्र बोस की तरह था। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी जी से कहा था-''बापू, आइये हम वही भाषा सीखें जो अंग्रेज समझते हैं। अहिंसा और जुर्म सहने की फिलोस्फी अंग्रेजों की समझ में नहीं आ सकती। उनका साम्राज्य ताकत के सहारे टिका हुआ है। हमारे पास भी अगर वैसे ही हथियार हों तो नि:सन्देह हमारी विजय होगी। अंग्रेज चार करोड़ हैं और हम चालीस करोड़ हैं।'' भगत सिंह भी इसी तरह का दृष्टिकोण रखता था।
भगत सिंह के साथ मेरी अंतिम भेंट जनवरी के प्रथम सप्ताह 1929 में कलकत्ता में हुई। वह अप्रैल 1929 को गिरफ्तार कर लिया गया था। भगत सिंह ने अपने केश कटवा दिए थे। वह कोट-पैंट और हैट पहनता था। मैं भी कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गया हुआ था। भगत सिंह से मेरी मुलाकात कांग्रेस अधिवेशन में नहीं बल्कि एक दोस्त के घर हुई थी। उनका नाम सेठ छज्जूराम था। सेठ छज्जूराम एक बिजनेस मैन थे। उनके घर पंजाब के बहुत लोग आकर ठहरते भी थे। भगत सिंह वहीं ठहरा हुआ था। मैं पोर्टिको में खड़ा था। भगत सिंह तेजी से आया और सीढ़ियों के रास्ते ऊपर चला गया।
   उस समय मेरी भगत सिंह से बातचीत नहीं हुई। हमने एक दूसरे की ओर देखा। उसने मुझे नमस्ते की और वह गायब हो गया।
   उसके बाद भगवतीचरण मेरे पास आए और कहने लगे 'गुरुजी, आपने भगत सिंह को देख लिया है। कृपया यह रहस्य किसी को न बतायें कि आपने उसे कलकत्ता में देखा था।' मुझे समझ में आ गया कि क्या बात थी। भगवतीचरण, भगत सिंह से पढ़ाई में एक साल सीनियर था।
   लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण अक्सर मेरे कमरे में आया करते थे। साथ ही गुसलखाना था जिसमें वे नहाते थे। वे अपने कोट-और दूसरे कपड़े गुसलखाने के बाहर ही टांग देते थे। मैंने अक्सर उनकी कपड़ों की जेबों में पिस्तौलों को रखे देखा था। मुझे बहुत से लोगों से पता चला कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की शाखाएं बंगाल,बिहार और उत्तरप्रदेश में थीं। दिल्ली और महाराष्ट्र में भी उनका प्रभाव था ।राजगुरू तो महाराष्ट्र के रहने वाले थे।








गुरुवार, 19 मई 2011

1857 के एलाननामे और हुक्मनामे -इंकबाल हुसैन



1857 की जंगे-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे। यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खवास विभिन्न कारणों से सभी शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे। अफसोस है कि एलाननामों की मूल कापियां नहीं के बराबर मिलती हैं। 1858 तक ये मौजूद थीं जिन्हें अंगरेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंगरेजी में अनुवाद करवा कर पेश किया था जो राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं। मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल कापियां प्राप्त की हैं। इनमें अधिकतर उर्दू में हैंतीन एलाननामे उर्दू और हिंदी और कई फारसी में हैं। इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं। पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया गया है, अंगरेजों की बुराइयां बताई गई हैं और हिंदू-मुसलिम एकता का महत्व बताया गया है। दूसरे दौर के एलाननामों में हिंदू-मुसलिम की एकता पर जोर, एक दूसरे के धर्म की रक्षा, अंगरेजों का पूर्ण सफाया, नई हुकूमत के बनने के बाद अच्छी व्यवस्था, धर्म की आजादी, बेहतर खेती-बाड़ी और आर्थिक बंदोबस्त आदि के वादे हैं। तीसरे दौर के एलाननामों से मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी बचाव के लिए जंग लड़ रहे थे। इनमें अवाम-खवास सबसे अपील की गई है कि वह दिलोजान से अंगरेजों के विरोध में एकजुट हों। जंग में विशेष सफलता पाने वालों को पुरस्कार देने के वादे भी किए गए हैं। भारतीयों को इस बात से भी खबरदार कराया गया है कि अगर अंगरेज दोबारा सत्ता में आ गए तो भारतीयों का क्या हाल होगा। 

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर एलाननामे उर्दू में हैं। अगर हम उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रकाशित होने वाले अखबारों का जायजा लें तो मालूम होगा कि उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तानी भाषा और फारसी लिपि में छप रहे थे। अब उसे उर्दू जबान के नाम से जानी-पहचानी जाती है। ये उर्दू के अखबारों के मालिक ज्यादातर हिंदू थे, वही उनके संपादक और प्रकाशक थे। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस वक्त उर्दू भाषा एक मिली-जुली राष्ट्रीय भाषा की हैसियत से अपनी जगह बना चुकी थी जिसकी उन्नति में हिंदू और मुसलमान बराबर के भागीदार थे। 1857-58 के स्वतंत्रता सेनानियों के द्वारा जारी किए गए एलाननामों से इसकी और जानकारी मिलती है। पहली जंगे-आजादी के एलाननामों से न केवल स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं का पता लगता है बल्कि हमें समस्याओं का भी पता चलता है कि वे इतनी बड़ी जंग में क्यों कूद पड़े थे, उन्होंने जनता से क्या-क्या वादे किए थे और वे अंगरेजों के चंगुल से आजाद कराने के बाद देश को किस प्रकार चलाना चाहते थे। एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी जिनमें अंगरेजी फौज के बागी सिपाही थे, अंगरेजों के आर्थिक शोषण, रंग-भेद, असामान्य टैक्स, खेती-बाड़ी पॉलिसी, बेरोजगारी और भारतीय कल-कारखानों के सर्वग्रासी विनाश को पिछली एक सदी से बर्दाश्त करते चले आ रहे थे। इस गरीबी के बावजूद वे शांत थे और सब्र कर रहे थे। लेकिन उनके सब्र का पैमाना उस वक्त टूट गया जब अंगरेजी शासन के प्रोत्साहन में ईसाई मिशनरीज द्वारा धर्मांतरण का प्रयास किया गया। यह एक ऐसा कारण था जिसने उन वफादार फौजियों को भी अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया, जो भारत में अंगरेजी शासन के उद्भव और विकास में एक सदी से लगे हुए थे। 10 मई 1857 को मेरठ में बंगावत का आरंभ करके फौजियों की टोली दिल्ली पहुंची और 11 मई 1857 को उनका पहला एलाननामा पेश किया गया, 'सब हिंदू-मुसलमान, रिआया और मुलाजिम हिंदुस्तानियों को अफसरान फौजें-अंगरेजी मुकीम दिल्ली और मेरठ की तरफ दरयाफ्त होवें कि अब सब फिरंगियों (अंगरेज) ने ऐसा किया है कि अव्वल सब फौज हिंदुस्तानी को बेधर्म करके फिर सब रिआया को बजोरे-तदब्बुर क्रिस्टान (ईसाई) कर लें चुनांचे हम सबने फकत दीन (धर्म) के वास्ते मय-रिआया के इत्तिफाक करके एक-एक काफिर (अंगरेजों) को जिंदा न छोड़ा और बादशाहते-दिल्ली इस अहद पर कायम है कि फौज कंपनी के फिरंगियों को कत्ल करे।

ये एलाननामा बंगाल आर्मी के फौजियों ने जारी किया था जिसमें अधिकतम ऊंची जाति के हिंदू थे। इसमें यह भी कहा गया था, 'अब लाजिम यह है कि जिसको क्रिस्टान होना दुश्वार होवे, रिआया और फौज हर मकाम की एकदम होकर हिम्मत करे और तुख्म इन काफिरों (अंगरेजों) का बाकी न रखें।'

एलाननामे में हिंदू और मुसलमानों के मजहब की रक्षा और अंगरेजों के खिलाफ नफरत और गुस्सा यूं ही नहीं था। उस समय के एक पादरी शेयरिंग के खयाल देखें, 'तमाम मुल्क मिशनरीज की सरगर्मियों से सख्त खौफजदा हो चुका था। हिंदू अपने धर्म और मुसलमान अपने मजहब के लिए परेशान थे।'

यहां यह बात गौर करने की है कि एलाननामे में अंगरेजों को काफिर बताया गया है। महाराजा पेशवा नाना साहब, रानी झांसी, खान बहादुर खान, बिरजिस कदर, बहादुरशाह, शाहजादा फिरोज शाह और मौलवी लियाकत अली के एलाननामों में सभी अंगरेजों को नसारा (ईसाई) और काफिर ही कहा गया है। नाना साहब ने ये भी लिखा है, 'काफिर अंगरेजों ने इस हद तक मजलिम, बदमाशियां, नाइनसाफियां की हैं जिनकी वजह से ईश्वर ने इन काफिरों को सजा देने और उखाड़ फेंकने और हिंदू-मुसलमान शासन को दोबारा कायम करने के लिए, मुल्क के तहफ्फज (रक्षा) के लिए मुझे मुअय्यन (तय) किया है।'

एलाननामों के अंदाज से यह समझा जा सकता है कि सेनानी हिंदू धर्म और इसलाम की रक्षा को बहुत आवश्यक समझ रहे थे। इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए उन्होंने धर्मयुध्द छेड़ दिया था। और उस वक्त एक आम राय यह भी थी कि धर्म तो सिर्फ दो ही हैं, 'धर्म तो दूई हैं, हिंदू का धर्म और मुसलमान का ईमान।'|

स्वतंत्रता सेनानी हिंदू धर्मों के बारे में जो भावना रखते थे वह उनके इस नारे से भी समझा जा सकता है, 'एक पिता के दुई पुत्र, एक हिंदू एक तुर्कउनका चोली-दामन का साथ।' दुर्गा दास बंदोपाध्याय अंगरेजी फौज में मुलाजिम थे। वह एक नारे का वर्णन करते हैं जिसे सेनानियों ने बरेली में लगाया था, 'हिंदू-मुसलमान एक, राम-रहीम एक, श्रीकृष्ण-अल्लाह एक।'~ यह धर्मिक एकता एक दिन की पैदावार या 1857 के हालात के कारण नहीं थी, बल्कि यह हिंदू और मुसलमानों के हिंदुस्तान में सदियों की एकता और एक दूसरे की विचारधाराओं को समझ लेने के बाद पैदा हुई थी। रामबख्श (जनरल ऑफ डिवीजन) मंशा राम, ब्रिगेड मेजर ने स्वतंत्रता सेनानियों के कैंप से महाराजा जंग बहादुर नेपाल के नाम अपनी अर्जी में लिखा था कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने एक सदी तक अंगरेजों की मुलाजमत ईमानदारी के साथ की थी जिसके कारण वह इस देश के मालिक बन गए, लेकिन उन्होंने हमारी धार्मिक भावनाओं का खयाल न करते हुए ऐसे कारतूस बनाए जिनमें सूअर और गाय की चर्बी की मिलावट थी जिससे वह हमारा धर्म खराब करना चाहते थे, 'इससे पहले कभी हिंदुस्तान में बहुत से बादशाह गुजरे हैं लेकिन किसी ने कभी हमारा धर्म और ईमान खराब करने की कोशिश नहीं की। अगर किसी हिंदू या मुसलमान का मजहब ही खतम हो जाए तो फिर दुनिया में क्या रह जाएगा।' यही वे भावनाएं थीं जिनके कारण बागी फौजी बिना किसी भेदभाव के अपने-अपने धर्म की रक्षा के लिए अंगरेजों के आमने-सामने हुए थे। वे यह मानते थे कि अंगरेज जिस मजहब को मानते हैं वह झूठा है। वह तीन ईश्वरों में विश्वास करने वाले थे जबकि हिंदू और मुसलिम एक-एक ईश्वर के मानने वाले थे। इसीलिए हिंदुस्तान में हिंदू, मुसलमान, आतिश-परस्त और यहूदी उनके मजहब को सच मजहब नहीं मानते थे। स्वतंत्रता सेनानियों ने पहली जंगे-आजादी के दौरान इसी पर कायम रहते हुए हुकूमत से जंग किया। 

1857 के एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि बागी फौजियों को जनता का समर्थन प्राप्त था। जनता को विश्वास था कि अंगरेजों के शासन में हिंदुस्तानियों की जान, माल और आबरू सुरक्षित नहीं थी। वह अंगरेजों की धोखेबाजी और शातिराना चालों को खूब समझ रहे थे।

एलाननामों के द्वारा स्वतंत्रता के सिपाहियों ने जनता को यकीन दिलाया था कि हिंदुस्तानियों की हुकूमत में पूरी धार्मिक आजादी होगी जैसे कि पहले थी। हर आदमी अपने दीन-धर्म पर कायम रहेगा, हर किसी की इज्जत-आबरू कायम रहेगी और किसी बेगुनाह का कत्ल नहीं किया जाएगा। किसी का माल जोर-जबरदस्ती से हासिल नहीं किया जाएगा। शाहजादा फिरोज शाह ने अपने एलाननामे में यह विश्वास दिलाया था कि बादशाही के बाद देश के हर वर्ग को व्यवसाय, नौकरी में आसानी होगी और जमींदारों को भी अंगरेजों के अत्याचार से राहत मिलेगी।
कुछ एलाननामे, जैसे मौलवी लियाकत अली का एलाननामा फारसी शब्दों और कुरआन की आयतों से भरा हुआ है। इस एलाननामा का आरंभ खुदा के नाम से और पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा से होता है।

एक विशेष एलाननामा पत्रिका फतहुल-इसलाम 1857 की जंगे-आजादी का एक अमूल्य दस्तावेज है। इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम नहीं मिलता लेकिन पत्रिका के विषय और दूसरे विवरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने जो 'फैजाबाद के मौलवी' के नाम से भी प्रसिध्द थे, निकाला था। इस पत्रिका में अंगरेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने की अपील की गई है। इस पत्रिका की भाषा सामान्य है। इसमें अरबी और फारसी के शब्द कम हैं। पत्रिका में सेनानियों को युध्द के तरीके सिखाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा इस एलाननामे में नेतृत्व के बारे में समझाया गया है जो दिलचस्प है, 'अक्ल और दीन (धर्म) की शर्म भी यही कहती है कि मलेका विक्टोरिया काफिरा और दीन की दुश्मन, अंगरेजों की ताबेदारी से मुसलमान अमीर (बादशाह) की ताबेदारी और बादशाह के ताबेदार राजा की ताबेदारी करोड़ों दर्ज अफ्जल (उत्तम) है... और सब हिंदू दिलो-जान से इसलाम और बादशाह के खैर-खाह थे। तो अब भी वही हिंदू और वही मुसलमान हैं और वही किताब है। अपने दीन पर वह रहें और अपने दीन पर हम रहेंगे। हम उनकी मुहाफिजत (सुरक्षा) करेंगे वो हमारी मदद और मुहाफिजत करेंगे। ईसाइयों ने हिंदू और मुसलमान दोनों को ईसाई करना चाहा था, अल्लाह ने बचा लिया। उल्टे वो आप ही खराब हो गए।'

इस पत्रिका के अंत में अंगरेजों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने को कहा गया है और यह निवेदन किया गया है, 'सारे हिंदू और मुसलमान उनकी किसी किस्म की नौकरी न करें।'

1857 में दिल्ली से बहुत से फरमाननामे, एलाननामे और हुक्मनामे जारी हुए थे जो अधिकतर उर्दू ही में थे और कुछ फारसी में। ये दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखगार नई दिल्ली में सुरक्षित हैं। इस लेख में कुछ दस्तावेजों को बतौर हवाला पेश किया जा रहा है। 1857 में दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों के काबिज होने के बाद नई आजाद हुकूमत विभिन्न समस्याओं से दो-चार हुई थी। अमनो-अमान खतम हो चुका था। दिल्ली और उसके आसपास के थानों से रिपोर्ट आनी बंद हो चुकी थी। बहादुरशाह ने अपने हुक्मनामा (19 मई 1857) के द्वारा थानेदारों को रोज रिपोर्ट भेजने की ताकीद की, कि वो अपने-अपने थानों पर मौजूद रहें और शहर में अमनो-अमान बहाल करें। रोजाना गश्त लगाएं और शहर में होने वाली सारी घटनाओं की रिपोर्ट कोतवाल को भेजते रहें। हुक्म की खिलाफवर्जी पर सख्त सजा देने का इशारा किया गया था।
बहादुरशाह के सतर्क रहने के बावजूद भी दिल्ली की जनता और विशेष रूप से व्यापारी वर्ग लूटमार की घटनाओं से परेशान थे। 13 मई को बहादुरशाह ने चांदनी चौक का दौरा करके लोगों की हिम्मत बढ़ाई थी जिसकी वजह से दुकानें खुलनी शुरू हुई थीं लेकिन दुकानदारों ने जल्द ही दुकानें बंद कर दीं। बहादुरशाह ने 11 जून के फरमान में शहर के कोतवाल को हिदायत दी थी कि वो एलान कर दें कि दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें खोल लें। उनकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए, चौकीदारों के द्वारा दिन-रात अवाम की खबरगीरी की जाए। बहादुरशाह के प्रयास और हुक्म के बावजूद शहर के हालात में कोई बेहतरी नहीं हुई। दुकानदार डरे-सहमे रहे। उन्होंने बादशाह से इसकी शिकायत की। बहादुरशाह ने 9 अगस्त 1857 को फौज के तीनों विभागों के अफसरों के नाम यह जारी करवाया कि अगर यही स्थिति रही तो शहर कैसे खुशहाल रह सकेगा, लोग भी तकलीफ उठाएंगे।
स्वतंत्रता सेनानियों ने अंगरेजों को दिल्ली से बाहर कर दिया था लेकिन वे दिल्ली से दूर भी नहीं थे। उनको यह आशा थी कि आने वाली बकरीद के अवसर पर वह दिल्ली के हिंदू-मुसलमानों के बीच गौकुशी की समस्या पर फूट डालने और शांति भंग कराने में सफल हो जाएंगे। बहादुरशाह ने हालात की नजाकत को समझते हुए जनरल बख्त खां को हुक्म दिया था कि गौकुशी पर पाबंदी का हुक्म जारी करें। बख्त खां ने 28 जुलाई से 31 जुलाई 1857 तक कई एलाननामे और हुक्मनामे जारी किए जिनमें गौकुशी, गाय की खरीदो-फरोख्त और उसके गोश्त को दिल्ली लाने पर पूर्ण पाबंदी के हुक्म थे। हुक्म की खिलाफवर्जी करने वालों को मौत की सजा तजबीज की गई थी। सख्त एहतिहयात और निगरानी के कारण बकरीद का त्योहार ठीक से गुजर गया। लेकिन अंगरेजों का खतरा बना रहा। उन्होंने दिल्ली के पास पहाड़ी पर अपनी फौजी चौकी कायम कर ली थी। बहादुरशाह जफर ने उस पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए कई हुक्मनामे जारी किए थे। 10 दिसंबर 1857 के हुक्मनामे में फौज के अफसरों को लिखा था, 'हिंदू को गाय और मुसलमान को सूअर का लिहाज करके और दीन-धर्म को समझकर चलना चाहिए। मेरी मर्जी और जिंदगी तुमको मंजूर हो तो देखते ही देखते पलटनें और तोपखाना तैयार करके ऊपर कश्मीरी दरवाजे पर हाजिर होकर इन बदमाश अंगरेजों पर धावा बोलो। इसमें एक लम्हे का भी तामुल और तगाफुल (लापरवाही, देरी) न करो.... तुम इस तख्त की शर्म रखो और जो दीन और इमान पर आए हो तो इसका लिहाज करो।'
1857 के उर्दू एलाननामों का एक विशेष बिंदु यह भी है कि उनमें हिंदी शब्द लगातार प्रयोग में लाए गए हैं, जैसेशरीर, रीत, रांड, धर्मसती, पवित्र, देश, मानुस, मास, लुका-छिपा धावा और दाता इत्यादि। इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि 1857 तक उर्दू-हिंदी जबान का कोई झगड़ा नहीं था लेकिन 1857 की पहली जंगे-आजादी ने अंगरेजों को चौंका जरूर दिया था। उन्होंने देखा कि किस तरह हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के धर्म की रक्षा के लिए एक हो गए थे और दुनिया की बड़ी शक्ति को अपनी बेमिसाल एकता से करारा जवाब दिया था। अंगरेजी राज के भविष्य की हिफाजत के लिहाज से उनके लिए हिंदू-मुसलिम एकता बहुत खतरनाक थी। इसलिए उसे तोड़ने के लिए उन्होंने मिलजुल कर प्रयास शुरू कर दिया।

उर्दू से अनुवाद : इंजहार अहम नदीम



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...