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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

अस्मिता का पुनर्पाठ

          आदमी की निगाह का निर्धारक तत्व है वर्तमान। वह जब भी कोई चीज़,वस्तु,घटना , परंपरा,इतिहास या लिंग को देखता है तो वर्तमान के नज़रिएसे देखता है। सवाल यह है इंटरनेट या सूचना तकनीकी युग में औरत कोकैसे देखें ? इंटरनेट में लिंगबोध या लिंग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लिंगकी पहचान या स्त्री अस्मिता मूलत:प्रेस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित अवधारणा है। प्रेस क्रांति को ज्यों ज्यों अपदस्थ करते जाएँगे लिंगरहित अवस्था से जुड़ी समस्याओं में गुजरते जाएँगे। सवाल उठता है इंटरनेट युग या ऑनलाइन युगमें अस्मिता कैसेनिर्मित होती है ? हमारा आज भी अधिकांश समाज ग़ैर-इंटरनेट अवस्थामें जी रहा है, वहाँ ठीक से प्रेसक्रांति भी नहीं पहुँची है ऐसे में हमारे समाज में एक औरत में कई औरतों की इमेज और भाव-भंगिमाएँ सहज रूप मेंदेखी जा सकती हैं। मसलन्,जो लड़की इंटरनेट यूज़र है वह अतीत के स्त्रीमूल्यों से बुरी तरह बंधी है। जो पश्चिमी मूल्यों की क़ायल है वह दिमाग़ सेदहेज और संपत्ति के मोह में डूबी हुई है।तमाम क़िस्म के सामाजिकपरवर्जन में डूबी है।इसी तरह जो लड़की सूचना तकनीक का जमकरउपयोग कर रही है उनमें से अधिकांश की सामयिक राजनीति औरसमकालीन समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह नए बदलेमाहौल ने एक बड़ा परिवर्तन यह किया है कि उसने शिक्षित -अशिक्षितसभी क़िस्म की महिलाओं को मोबाइल से जोड़ दिया है।कम्युनिकेशन केलिहाज़ से यह लंबी छलाँग है। मोबाइल कम्युनिकेशन ने स्त्रीभेद औरउम्रभेद को एक ही झटके में ख़त्म कर दिया है। इसके कारण स्त्री के निजी और सार्वजनिक रूपों , बातों और संस्कारों में मूलगामी परिवर्तन हुआ है।

पहले स्त्री की कायिक मौजूदगी केन्द्र में थी लेकिन इंटरनेट-मोबाइल-एसएमएस ने स्त्री की भाषिक मौजूदगी को प्रमुख बना दिया है ।अब स्त्रीभाषा में मिलती है।पहले स्त्री के शरीर पर बहुत बातें हुई हैं, समूचाश्रृंगाररस स्त्री शरीर के ऊपर केन्द्रित है। लेकिन स्त्री की कायिक सत्ताका रीतिकाल के समापन के साथ पूँजीवाद ने नवीकरण किया है। पहलेसाहित्य में श्रृंगाररस थी जीवन में नहीं था । पूँजीवाद ने श्रृंगार कोवायवीयता बियावान से निकालकर भौतिक बनाया है ।

रैनेसां में स्त्री शरीर के सवाल केन्द्र में आते हैं।मध्यकाल में कविता में औरत का शरीर है जबकि रैनेसां में गद्य में औरत के शरीर कोरखा गया , कम्युनिकेशन और व्यापार के केन्द्र में स्त्री शरीर को रखा।यानी आधुनिककाल आते ही औरत को घर की चहारदीवारी से बाहरनिकाला गया।पहले की तुलना में औरत ने व्यापक सामाजिक स्थानबनाया । उसका बहुआयामी शोषण हुआ। नए श्रम विभाजन में औरत नेअपनी जगह बनायी। नए कम्युनिकेशन , नए सामाजिक बदलाव में औरतने सक्रिय भूमिका निभायी।ख़ासकर राजनीति और राजनीतिक अर्थशास्त्रके निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दिलचस्प बात यह है श्रृंगारऔरत करती थी लेकिन तय व्यवस्था ने किया। किसी महिला ने श्रृंगाररस पर नहीं लिखा। पुरूषों ने लिखा। इसी तरह सेक्स और उसका संबंधकैसा हो यह भी पुरूषों ने लिखा।कामसूत्र और श्रृंगार रस पर लिखा समूचाशास्त्र पुरूषों ने रचा। पुरूष माने व्यवस्था यह धारणा कई हज़ार सालों मेंनिर्मित हुई है। अब यह आदत बन गयी है। औरतों ने इन विषयों पर क्योंनहीं लिखा यह रहस्य बना हुआ है।जबकि उस ज़माने में औरतें जमकरलिख रही थीं।इसी तरह रैनेसां में स्त्री के सवाल केन्द्र में हैं लेकिन औरतेंचुप हैं ।औरतों की इस चुप्पी को जितना खोला जाएगा भिन्न क़िस्म केसवाल जन्म लेंगे।

मध्यकाल और रैनेसां में स्त्री को बाँधने, नियमित और नियंत्रित करनेके शास्त्र रचे गए।यह काम इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप ढंग से हुआफलत:स्त्री के तन,मन और अनुभूति को समाज सीमित रूप में ही जानपाया।औरत को इस क्रम में वैविध्यपूर्ण और मानवीय बनाने की बजायवायवीय-मिथकीय- रहस्यात्मक बना दिया।सच यह है मध्यकाल में पुरूष,औरत को बहुत कम जानता था।लेकिन आधुनिककाल में स्त्री के शरीर कीबजाय उसके सामाजिक अस्तित्व के सवाल जब उठे तो स्त्रीशरीर औरपुरूष के नज़रिए से मुक्ति का मार्ग निकला। स्त्री के बारे में , उसके मन,तन और सामाजिक कार्य व्यापार के बारे में सामाजिक सचेतनता बढी।कहने का आशय यह है कि तन के परे स्त्री के सामाजिक अस्तित्व केसवाल समाज और मीडिया में जितना स्थान घेरेंगे उतना ही स्त्रीताक़तवर बनेगी। स्त्री देह के सवाल पुरुष वर्चस्व को बनाए रखते हैं।जबकि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व के सवालों पर संवाद और विमर्श सेमहिला सशक्तिकरण में इज़ाफ़ा होता है।

विगत चार दशकों के दौरान स्त्री अस्मिता की राजनीति साहित्यविमर्श के केन्द्र में है। क़ायदे से स्त्री अस्मिता को स्थिर अवधारणा के रूपमें देखने से बचना चाहिए। हिन्दी में अधिकांश लेखन स्त्री अस्मिता केस्थिर रूप से जुड़ा है। जबकि स्त्री अस्मिता को रूपान्तरित अवधारणा केरूप में देखना चाहिए। मसलन् एक स्त्री की अस्मिता सिर्फ़ स्त्री केविभिन्न रूपों में ही रूपान्तरित नहीं होती बल्कि अनेकबार वहलिंगातिक्रमण भी कर जाती है। मसलन् स्त्री अस्मिता या अस्मिता केस्थिर रूप के ज़रिए समलैंगिक या लेस्बियन अस्मिता को समझ ही नहींसकते। इसी तरह यदि मायावती-ममता -जयललिता आदि स्त्रियाँ जब राजनीति करती हैं तो वे मात्र स्त्री नहीं रह जातीं बल्कि उनकी राजनेता कीअस्मिता बन जाती है। यह वस्तुत: स्त्री अस्मिता का रूपान्तरित रूप है जोबेहद महत्वपूर्ण है। इसी तरह स्त्री और उच्च तकनीक के अन्तस्संबंधों सेजिस अस्मिता का निर्माण होता है वह स्त्री अस्मिता से भिन्न है। डोना हर्वेके अनुसार उच्च तकनीक के पैराडाइम में स्त्री या पुरूष का लिंगभेद ग़ायबहो जाता है, ऊँच -नीच, छोटेबडे का भेद ग़ायब हो जाता है। यहाँ पर तोज्ञान और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में पहचान बनती है। हम डोना केनज़रिए से असहमत हैं,अंत: वे सही हैं,यह स्थिति नेट के प्रसंग में कम है, लेकिन कम्प्यूटर के संदर्भ में ज़्यादा है। नेट पर बडे पैमाने परस्त्रीविरोधी सामग्री है, बेवसाइट हैं।अभी तक सोशलमीडिया लेकर बेवसाइट तक स्त्री के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है।वर्चुअल स्त्री के लिए समाज की ज़रूरत नहीं है लेकिन वास्तव औरत की दुनिया को समाज या समुदाय के बिना निर्मित नहीं कर सकते।वर्चुअल स्पेस में औरत नहीं उसकी इमेज मात्र रहती है। यह वास्तव स्त्री नहीं है।

रेमण्ड विलियम्स ने लिखा है मानवीय सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करते समय सबसे बाधा यह है कि हम तात्कालिक और नियमित अनुभवों को निष्पन्न विचारों के साथ जोड़ देते हैं।इस क्रम में सारवान अतीत की ओर जाते हैं साथ ही सामयिक जीवन की ओर भी जाते हैं।इसमें संबंधो,संस्थानों और उन रूपों की ओर जाते हैं जिनमें सक्रिय हैं और रूपान्तरित कर रहे हैं,इस प्रक्रिया को निर्माण प्रक्रिया न कहकर समग्र कहना समीचीन होगा। इस नजरिए से देखें तो रोमांस,नौकरी ,शादी ,शिक्षा आदि कोई भी चीज जो अस्मिता को बनाती है वह तात्कालिक सामाजिक संरचनाओं और रूपों से निर्मित नहीं होती।मनुष्य सिर्फ तात्कालिक चीजों से ही नहीं बनता।बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक अभ्यासों पर निर्भर है।सामाजिक अभ्यासों का निर्माण दीर्घकालिंक प्रक्रिया में होता है।इसलिए अस्मिता पर विचार करते समय इस पर सोचें कि उसके निर्माण के उपकरण कौन से हैं ॽ

सारी दुनिया में अस्मिता की अवधारणा को जनप्रिय बनाने और स्थापित करने में अमेरिकी समाजविज्ञानी-मनोशास्त्री जी.एच.मीड की बहुत बड़ी भूमिका है।भारत में अस्मिता के जिन उपकरणों का जो लोग इस्तेमाल करते हैं उनमें मीड के नजरिए के उपकरण जाने-अनजाने चले आए हैं।मसलन्, अस्मिता को व्यक्ति की सहजजात क्षमताओं को सामाजिक जीवन,आत्म-चेतना और आत्म-अभिव्यंजनाओं के साथ जोड़कर सामाजिक इतिहास का उत्पाद बनाकर पेश किया गया।इस तरह की वस्तुगत प्रस्तुतियों को संवेदनाओं के साथ जोड़कर पेश किया गया और यही अस्मिता का बुनियादी आधार है। सामान्यतौर पर अस्मिता की अवधारणा सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक रूपों के साथ निजी जगत की अभिव्यंजना है। मेरे लेखे अस्मिता निजी जीवन की भूमिकाओं सामाजिक परिणाम है।इसलिए अस्मिता को सामाजिक आचार-व्यवहार और अभ्यासों के जरिए ही समझा जा सकता है।अस्मिता का एक छोर जिस तरह सामाजिक अभ्यासों से जुड़ा है वहीं दूसरा छोर मनोजगत की संरचनाओं से जुड़ा है।मसलन् व्यक्ति अपनी देखभाल कैसे करता है,उसके प्रेरक कौन हैं,उसके इर्द-गिर्द जो घट रहा है उसके प्रति उसका किस तरह का रूख है,वह करीबी यथार्थ की कितनी देखभाल करता है।क्योंकि इन सबसे मिलकर ही मानवीय गतिविधियों का निर्माण होता है।मसलन्, निज के संदर्भ में अस्मिता नजर आती है,उसके हक नजर आते हैं ,जबकि अन्य के प्रति हम बेगाने बने रहते हैं तो इसे अस्मिता की अनुभूति नहीं कहेंगे।अस्मिता बनती है निजी और सामाजिक सरोकारों के साथ जुड़ने से।इसमें निजी जितना महत्वपूर्ण है,सामाजिक भी उतना ही महत्वपूर्ण है।हमें निजी तौर पर प्रभुत्व जितनी पीड़ित करता है सामाजिक तौर पर भी वह उतना ही पीड़ादायक होता है।इसलिए प्रभुत्व के सवाल निजी और सामाजिक दोनों ही धरातल पर हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।अस्मिता सिर्फ निज की मुक्ति का प्रकल्प नहीं है बल्कि सामाजिक मुक्ति का प्रकल्प भी है।अस्मिता बनाम प्रभुत्व का अन्तर्विरोध एकायामी नहीं है बल्कि बहुआयामी है।अमूमन हिन्दी में अस्मिता एकायामी दिशा में गतिशील है इसलिए सामाजिक स्तर पर प्रभावहीन है।अस्मिता के सवाल सुविधा,आरक्षण आदि के ही सवाल नहीं हैं बल्कि अस्मिता के सवाल दीर्घकालिक अभ्यासों और सांस्थानिक रूपों को चुनौती देने के सवाल भी हैं।

सन् 1977 के बाद से अस्मिता विमर्श पर जितना लिखा गया है उतना किसी अन्य विषय पर नहीं लिखा गया है।यह स्थिति भारत की ही नहीं सारी दुनिया की है।भारत के संदर्भ में आपातकाल मूल रूप से पैराडाइम बदलता है। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की रक्षा का सवाल सबसे बड़ा सवाल बन गया,लोकतंत्र हमारे देश की अस्मिता के पहचान का सबसे बड़ा रूप है,बाकी सारी अस्मिताएं इसके अधीन हैं या मातहत हैं। अस्मिता के सवाल लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में उठाए जाने चाहिए। आपातकाल के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन यही आया कि उसने पहले से चले आ रहे बहस के मुद्दों को सामाजिक क्षितिज से ठेलकर हाशिए पर डाल दिया और उन मुद्दों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया जो लोकतंत्र से सीधे जुड़े हुए थे।लोकतंत्र बचेगा तो देश बचेगा,तमाम किस्म की अस्मिताएं भी बचेंगी।यही वह मूल प्रस्थान बिंदु है जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल उठे और उन पर व्यापकतौर पर लिखा गया।हिन्दी में दलित और स्त्री के संदर्भ में अस्मिता के सवाल ज्यादा उठे।

अस्मिता का कोई न मित्र है न शत्रु । अस्मिता की सारी आपत्तियां 'अन्याय' के खिलाफ हैं। 'अन्याय' के खिलाफ सामाजिक लामबंदी का उपकरण है अस्मिता। सवाल यह है अंत में अस्मिता किस बिंदु पर पहुँचती है ? क्या पुन: लौटकर अस्मिता की ओर लौटते हैं अथवा मानवता की ओर पहुँचते हैं।अस्मिता मूलत: राजनीतिक मंशा की देन है। अस्मिता पर राजनीति के बिना चर्चा संभव नहीं है। अस्मिता में निहित व्यक्तिगत और सामाजिक इच्छाओं को अभिव्यक्त किया है।अस्मिता विमर्श का इतिहास से गहरा संबंध है। इतिहास में जाए बिना इसका चित्रण और विवेचन संभव नहीं है।

अस्मिता विकल्प है। वह कभी स्वाभाविक नहीं होती। वह सामाजिक निर्मिति है।अस्मिता की धुरी है मनुष्य और मानवता।वह प्रतिस्पर्धी और बहुरूपी है। उसका दूसरा तत्व है भावुकता और सामाजिक तनाव। तीसरा , आत्महीनता। चौथा ,अस्मिता का सम-सामयिक फ्रेमवर्क । पांचवां , अस्मिता की राजनीति। अस्मिता विमर्श का सत्ता विमर्श के साथ गहरा संबंध है । छठा, अस्मिता विमर्श व्यक्तिवादी विमर्श है।अस्मिता विमर्श का इन दिनों जो रूप देखने में आ रहा है उसके दो प्रमुख आयाम है पहला है 'अन्याय' और दूसरा है ' इच्छापूर्त्ति'। सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में इन दो रूपों में अस्मिता का व्यापक उपभोग हो रहा है। अस्मिता विमर्श मूलत: उत्पादक है। सामाजिक शिरकत को बढ़ावा देती है। ध्यान रहे जाति,लिंग,नस्ल,त्वचा,धर्म आदि पर आधारित अस्मिता की सीमित भूमिका होती है। अस्मिता का मूलाधार है मानवता। मनुष्य ही प्रधान अस्मिता है। बाकी इसके मुखौटे हैं।

अस्मिता के फ्रेमवर्क में इन दिनों अनेक लेखक-लेखिकाओं की आत्मकथाएं आई हैं। अतः आत्मकथा के प्रमुख तत्वों को जानना बेहद जरूरी है।आत्मकथा का पहला तत्व है व्यक्तिगत अस्मिता और निर्वैयक्तिकता। आत्मकथा का दूसरा तत्व है उपस्थिति,वर्तमान और प्रस्तुति। रोलां बार्थ के शब्दों में आत्मकथा को उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से व्यक्त होना चाहिए।आत्मकथा लिखते समय चिर-परिचित क्षेत्र हमेशा परेशान करते हैं। चिर-परिचित वातावरण समस्या पैदा करता है।दलितों की आत्मकथा को ही लें।इन आत्मकथाओं में चिर-परिचित यथार्थ है भारत की जाति समस्या। जाति समस्या लेखक को परेशान और उत्तेजित दोनों ही करती है। जातिप्रथा को करीब से जानने के कारण लेखक को इसके बारे में सटीक वर्णन ,विवरण और ब्यौरे तैयार करने में मदद मिली है। लेखक को जातिप्रथा की अनेक 'दरारें' नजर आती हैं। आत्मकथा में 'दरारों' की केन्द्रीय भूमिका होती है। 'दरारें' पुराने व्यक्तित्व की जगह नए व्यक्तित्व को सामने लाने का काम करती हैं। लेखक की जाति उत्पीड़न की पीड़ाएं जितनी बार व्यक्त होती हैं उतनी ही बार उसका नया रूप सामने आता है। पुराना रूप बदल जाता है। लेखक कहीं पर भी पुराने रूप को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता। हमेशा नए रूप को सामने लाता है। पुराने रूप के साथ सामंजस्य बिठाने की बजाय 'दरारों' और 'अंतरालों' के बीच में से नए रूप में लेखक सामने आता है। रोलां बार्थ ने आत्मकथा के बारे में लिखा है आत्मकथा में आप स्वयं को नहीं देखते बल्कि इमेज को देखते हैं। अपनी आंखों को नहीं देखते। आत्मकथा लेखन हमेशा विचलनभरा होता है। विचलन के ऊबड़ खाबड़ पैरामीटर सर्किल बनाते हैं। इन रास्तों से गुजरने के बाद एक ही संदेश संप्रेषित होता है कि जिंदगी अर्थपूर्ण है।

आत्मकथा का केन्द्र बिंदु कौन सा है ? यह खोजने की जरूरत है।आत्मकथा में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। आस्था के साथ लिखी आत्मकथा इमेज बनाती है। आत्मकथा में चित्रण के लिए चित्रण नहीं होता बल्कि प्रस्तुति पर जोर रहता है। आत्मकथा चिर-परिचित यथार्थ की प्रस्तुति होती है। प्रस्तुति में अंतराल ज्यादा साफ नजर आते हैं। क्योंकि आत्मकथा में समग्रता के तत्व का पालन नहीं होता।आत्मकथा में न्यूनतम अनुकरण, उद्धाटन ,विवरण और आख्यान होता है। आत्मकथा में नामों का जिक्र और नामों के साथ जुड़े अनुभवों का वर्णन होता है। फलत: आत्मकथा के दायरे में अनेक मील के पत्थर और पैरामीटर होते है। आत्मकथा भाषा प्रमुख है।वही आत्मकथा है। भाषा का संसार ही है जिसके कारण वह अपील करती है। आत्मकथा की भाषा में प्रस्तुति 'मैं' के अंत की घोषणा है। ''मैं'' संकेत मात्र होकर रह जाता है। भाषा सामूहिक प्रयासों से बनती है। आत्मकथा के 'मैं' का राजनीतिक - दार्शनिक चीजों में लोप हो जाता है। भाषाविज्ञान में लोप हो जाता है। आत्मकथा में '' मैं'' हमेशा घुला मिला होता है। आत्मकथा में जैसे 'तुम','वह','हम' होते हैं वैसे ही 'मैं' भी होता है। आत्मकथा में सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों एक हो जाते हैं। वक्ता और विषय एक हो जाते हैं।आत्मकथा का तीसरा प्रमुख तत्व है सुसंगत अनुभूति। जीवन के तथ्यों को सीधे बगैर किसी लाग-लपेट के अनुभूतियों के साथ पेश करना इसकी खूबी है। यहां तथ्यों को बगैर चासनी के पेश किया जाता है। बगैर किसी कृत्रिमता के पेश किया है। तथ्यों को अकृत्रिम भाव से पेश करना आत्मकथा का उत्तर आधुनिक फिनोमिना है। उत्तर आधुनिक आत्मकथा में अनिश्चितता,विचलन आदि को सहज ही देख सकते हैं। इसमें भाषा और विमर्श प्रभावशाली होते हैं।

आत्मकथा का पांचवां तत्व है छवि,काल्पनिक छवि और कल्पना। वाल्टर वूगीमैन के अनुसार '' वैध ज्ञान की पद्धति, कल्पना का अंत है।'' कहानी में शब्द,भाषा और भाषण चेतना निर्मित करते हैं। यथार्थ परिभाषित करते हैं। कल्पना के जरिए रूढिबद्धता से अपने को मुक्त करते हैं। अन्य किस्म का व्यक्तित्व निर्मित करते हैं। कल्पना के जरिए ही सामाजिक-साहित्यिक रूढियों को खारिज करने में मदद मिलती है। मनुष्य का रूपान्तरण होता है। यह रूपान्तरण सामंजस्य बिठाकर नहीं होता। व्यक्ति क्या है और व्यक्ति की क्या छवि बन रही है इन दोनों पर लेखक की नजर होती है,इसकी प्रस्तुति के दौरान लेखक रूढिबद्धता से बचने की कोशिश करता है। पूर्ण स्वतंत्रता और कल्पना का इस्तेमाल करता है। स्वतंत्रता और कल्पना के प्रयोग के कारण ही आत्मकथा ऊर्जा से भरी होती है। पढ़ने वालों के मन में ऊर्जा का संचार करती है। साहस और आस्था के साथ जोखिम उठाने की प्रेरणा देती है।

आत्मकथा का छठा तत्व है विमर्श,उद्धाटन और समापन। आत्मकथा में आत्म को उद्धाटित करने के लिए साहस की जरूरत होती है। अनेक लेखकों में साहस का अभाव होता है। आत्मविश्वास और साहस के बिना आत्मकथा लिखना संभव नहीं है। जो लेखन में जोखिम उठाते हैं और अपनी बात कहते हैं। वे अपना बोझ हलका करते हैं साथ ही समाज को भी खुली हवा में सांस लेने का मौका देते हैं।आत्म के बहाने लेखक लंबे समय से बंद कमरों को खोलता है। आत्मकथा में उद्धाटित करते समय लेखक डरता है, डरता है कि कहीं पकड़ा न जाऊँ ? अन्य के सामने नंगे खड़े होने का डर रहता है। यह शर्म और डर कहां से आता है ? असल में जो बौनेपन के शिकार होते हैं वे शर्माते हैं, डरते हैं। औसत बुद्धि के लेखक शर्माते और डरते हैं। इनमें से ज्यादातर रूढियों में जीते और तयशुदा मार्ग पर चलते हैं। 'क्लीचे' में जीते और बातें करते हैं।मजेदार बात यह है आत्मकथा में आत्म को बताना तो बहुत दूर की बात है लोग कहां जा रहे हैं यह तक साफतौर पर नहीं बताते। वे सामान्य सी चीज को बताने में डरते हैं, शरमाते हैं। उन्हें डर लगता है यदि अपनी बात बता देंगे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। अमूमन हमें न बताने की आदत है। छिपाने की आदत है। छिपाना हमारी प्रकृत्ति है। जो छिपाया जा रहा है वह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही वह भी महत्वपूर्ण है जो बताया जा रहा है। आत्मकथा को लिखने का मकसद होता है बंद अनुभूतियों को खोलना। छिपे हुए को सामने लाना। आत्मकथा के वातावरण को विभिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना । निष्कर्ष निकालने से बचना।निष्कर्ष आत्मकथा को बंद गली में ले जाते हैं।आत्मकथा का मार्ग खुला होता है उसे निष्कर्ष के बहाने बंद करना आत्मकथा के मानकों की अवहेलना है। लेखन को इस बात से आंकना चाहिए कि आप कितना भूलते हैं और कितना क्षमा करते हैं। लेखन में अनुभवों की संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता।







शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

राधा कहां मिलेगी !

          आज राधा अष्टमी है।मैं संभवतःकिसी चरित्र से इतना प्रभावित नहीं हुआ जितना राधा के चरित्र से प्रभावित हुआ। तकलीफ यह है कि हमने श्रीकृष्ण की बातें कीं,उनकी लीलाओं का आनंद लिया,राम की बातें की,लेकिन राधा के चरित्र पर कभी साहित्यकारों और आलोचकों ने खुलकर बहस नहीं की।

राधा अकेला चरित्र है जो अनुभूति में रूपान्तरित हुआ है। वह मात्र मिथकीय चरित्र नहीं है। बल्कि वह एक भावबोध,संस्कार और उससे भी बढ़कर आदतों में घुल-मिला चरित्र है।संभवतः हिन्दुओं का कोई ऐसा चरित्र नहीं है जो राधा की तरह हम सबकी आदतों-संस्कारों और अनुभूति में घुला मिला हो।कहने के लिए राधा के जन्म की कहानी मिलती है।

लेकिन राधा तो कवि शुद्ध कल्पना की सृष्टि है।जिसने भी राधा को सृजित किया वो बड़े विज़न का लेखक है।लोक साहित्य से लेकर साहित्य तक,संस्कारों –आदतों से लेकर शास्त्र तक राधा का कैनवास फैला हुआ है।संभवतःआभीर जाति में जनप्रियता का जन्मजात गुण है।यही वजह है आभीर जाति के नायक-नायिकाएं जल्द ही जनमानस में अपना स्थान बना लेते हैं।हजारी प्रसाद द्विवेदी-मैनेजर पांडेय ने राधा को प्रेमदेवी बना दिया।लेकिन उसे इस रूप में देखना सही नहीं होगा।जनप्रिय समझ भी यही है कि प्रेमभाव को राधाभाव कहते हैं।

हमारा मानना है राधाभाव मित्र भाव है।प्रेमभाव नहीं है।राधा सहचरी है,प्रेमिका या उपासिका नहीं है।आज के दौर में सहचरी भाव,मित्रभाव बेहद प्रासंगिक है।संस्कृत में हर भाव को कामुकता या श्रृंगार रस में डुबो देने की परंपरा रही है,पंडितों ने यह सब राधा के साथ भी किया उसे श्रृंगार में डुबो दिया,कामुक भाव-भंगिमाओं के साथ जोड़ दिया,इससे राधा को सुख-उपभोग और शरीर में रूपान्तरित करने में मदद मिली।सामंतीभाव बोध में राधा का इससे खराब रूपायन संभव ही नहीं था।हमारे यहां स्त्री चरित्रों के साथ दुर्व्यवहार करने की लंबी परंपरा रही है।हमारे यहां श्रृंगार , शक्ति या संयास में ढ़ालकर औरत को देखने आदत है,यह सामंती विचारधारा है।

राधा का चरित्र न तो श्रृंगारी है और न शक्ति-भक्ति से बना हुआ है।यह मूलतःमित्र चरित्र है।राधाभाव का मतलब है मित्रभाव।समान भाव।यह भाव हमारे संस्कार और आदतों में आना चाहिए।राधा इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि वह हमारे सामंती स्त्रीबोध को चुनौती देती है।राधा इसलिए अच्छी नहीं लगती क्योंकि वो प्रेमिका है,भक्त है,शक्ति है।वह इसलिए अपील करती है क्योंकि वह सहचरी है,मित्र है। पौराणिक आख्यानों से लेकर साहित्य चर्चाओं तक सामंती भावबोध के फ्रेमवर्क में राधा को पेश करने की परंपरा रही है। मुझे राधा कभी सामंती फ्रेमवर्क में अच्छी नहीं लगी।

राधा के सामंती फ्रेमवर्क से पुंसवादी विचारधारा को लाभ मिला,स्त्री को मातहत बनाए रखने में मदद मिली।जबकि राधा का चरित्र तो आत्मनिर्भर चरित्र है।राधा अपने संदर्भ से जानी जाती है,श्रीकृष्ण या पुंस -संदर्भ से नहीं जानी जाती।श्रीकृष्ण के संदर्भ में राधा को देखना वस्तुतःपुंस -संदर्भ में,मातहत भाव में देखना है,यह राधा की वास्तव इमेज का विकृतिकरण है।

राधा स्वयंभू है,मित्र है। वह कुछ नहीं चाहती।न दौलत चाहती है,न शादी चाहती है ,न संतान चाहती है,वह तो बस मित्र भाव चाहती है।मित्र भाव की चरम आकांक्षा यदि किस चरित्र में मिलती है तो राधा है। राधा अपने बनाए संसार में रहती है,वह श्रीकृष्ण या अन्य किसी के बनाए संसार में नहीं रहती।राधा का सबक यह है कि स्त्री अपने संसार को रचे,आत्मनिर्भर संसार को रचे,मित्रभाव में रहे,मातहत भाव में न रहे।यही वजह है कि राधा मुझे हमेशा अपील करती है।



रविवार, 7 अगस्त 2016

पुंसवाद का नया चेहरा और फेसबुक

        भारत में स्त्री पर लिखने वाली लेखिकाएं स्त्री के दुर्गुणों पर कम लिखती हैं,उसके दुखों पर ज्यादा लिखती हैं।यह सच है स्त्री के अनेक दुख हैं लेकिन इस मामले में हमें यूरोप की लेखिकाओं से जरूर सीखना चाहिए,वे स्त्री के दुख और व्यक्तित्व के नकारात्मक आचरण और मूल्यों को भी साथ में रखकर विश्लेषित करती हैं।जबकि हमारे यहां इकहरापन है,सिर्फ दुख है,उत्पीड़न है।हम कभी स्त्री के व्यक्तित्व की नकारात्मक चीजों की खुलकर मित्रवत आलोचना क्यों नहीं करते ?

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पुंसवादी गुलामी के नए स्त्री मंत्र हैं-दक्षता,पहल और समर्पण।

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हमारे देश में कितनी कंपनियां हैं जिनको कंपनी सैक्रेट्री चला रही हैं,कभी आपने कंपनी सचिवों की हड़ताल के बारे में सुना है ?क्या उनके कामकाज में सब कुछ ठीक चल रहा है ?यदि नहीं तो वे कभी सड़कों पर नारे लगाती नजर क्यों नहीं आतीं !!

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भारतीय समाज में नई औरतों में एक बड़ा वर्ग ऐसा सामने आया है जो कुछ इस तरह रहता है जैसे घर में फर्नीचर रहता है,वे घरेलू फर्नीचर की तरह शालीन और जरूरी वस्तु की तरह घर में रहती हैं।स्वामिभक्ति में इस तरह की औरतें बेमिसाल हैं।वे खुश रखने की कला में पारंगत हैं।

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इन दिनों एक ट्रेड चल रहा है सुंदर दिखो लेकिन उत्तेजक नहीं,यह भाव मूलतःकंपनी की निजी सचिव महोदया का है।दूसरा भाव है- दुर्गंधनाशक का प्रयोग करो।यह नए किस्म का पुंसवाद है जो औरतों के जेहन में उतारा जा रहा है।

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भारतीय राष्ट्र जिस तरह स्त्रियों को समान काम के लिए समान वेतन नहीं दे सकता,उसी तरह वह स्त्रियों को वित्तीय सामंतवाद से मुक्त नहीं कर सकता।वित्तीय सामंतवाद से मुक्ति के विकल्प खोजे जाएं। एक सुझाव यह है कि केन्द्र सरकार पतित्यक्ताओं के लिए राष्ट्रीय बीमा योजना शुरू करे।

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आधुनिक औरतों में एक वर्ग ऐसा है जो मर्दों के सभी काम कर लेना चाहता है,मर्दाना भाव धारण कर लेना चाहता है,स्त्री को मर्दाने भाव में ढालने के इस तरह के प्रयास स्त्री को और भी बर्बर और संवेदनहीन बना सकते हैं।समस्या यह नहीं है कि औरत को मर्दाने भाव दिए जाएं।हम तो यही चाहते हैं स्त्री को स्त्री और पुरूष को पुरूष रहने दो,इनकी विशिष्टताओं को बना रहने दो सिर्फ इन दोनों में से पुंसवाद की विदाई कर दो।पुंसवाद वस्तुतःसबसे बर्बर विचारधारा है जो मनुष्य को मनुष्यता को खा रही है।मनुष्य को पशु बना रही है।

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कम्प्यूटर संचालित समाज स्त्री की आक्रामकता बढ़ा देता है,यह पुंसवाद के पीड़ादायक बंधनों को नए सिरे से परिभाषित करता है।यह संभावना है कि जो स्त्री पुंसवाद के खतरों से बेखबर होकर कम्प्यूटर संचालित समाज में दाखिल होती है वह जल्दी ही गुलामी के दूसरे विकल्पों में बंध जाय।

गुलामी का सबसे विकृत रूप है असभ्यता के बंधनों को सहज और स्वाभाविक मान लेना।सवाल उठता है संचार क्रांति ने स्त्री को किस दिशा में ठेला है ,गुलामी की ओर या मुक्ति की ओर,हमारा मानना है इस समय प्रवाह गुलामी की ओर ठेल रहा है,बहुत कम संख्या में औरतें हैं जो पुंसवाद को जानकर सक्रिय हैं,अधिकतर तो तकनीकी प्रवाह में बह रही हैं।

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जर्मेन ग्रीयर ने लिखा है- "आशावाद और रूमानी भावनाओं से ओतप्रोत होकर विवाह और मातृत्व में प्रवेश करने वाली स्त्रियाँ ही अपनी हताशा के बारे में मुखर होती हैं।खुद में अपनी माँ की व्यामोहग्रस्त रूचि से सबसे ज्यादा परेशान उन्हीं के बच्चे होते हैं।"

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दूसरी ओर भारतीय समाज में बड़ी संख्या में ऐसी औरतें भी हैं जो पुरूष की शर्तों पर जी रही हैं,पुरूष के नजरिए से सोचती हैं,पुरूष के अनुकूल आचरण करती हैं,पुंसवाद और पुंसवादी हिंसाचार में हिस्सा लेती हैं,वे पुरूष की अनुगामिनी हैं,खोखली हैं और दासभाव से भरी हैं।

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भारतीय समाज धीरे धीरे बदल रहा है,आज ऐसी औरतों की संख्या बढ़ रही है जो अपनी शर्तों पर जी रही हैं और अपने फैसले स्वयं ले रही हैं और स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचती हैं,यह एकदम भिन्न किस्म की नई औरत है,यह भारतीय पुंस परम्परा से भिन्न स्त्री है।

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सोमवार, 16 मई 2016

धार्मिक फंडामेंटलिज्म का तर्कशास्त्र


धार्मिक फंडामेंटलिज्म किसी एक धर्म के लोगों तक सीमित नहीं है बल्कि वह धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करता है।बुनियादी तौर पर इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।चूंकि ये लोग धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं इसीलिए हिन्दू फंडामेंटलिज्म,इस्लामिक फंडामेंटलिज्म,क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म नाम से इनकी विचारधारा को सम्बोधित किया जाता है। भारत में इनमें से दो किस्म फंडामेंटलिस्ट संगठन सक्रिय हैं ये हैं हिन्दू फंडामेंटलिस्ट और इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट।धर्म इनके लिए मुखौटा मात्र है।असल चीज है धार्मिक फंडामेंटलिज्म।धर्म के आवरण की इनको जरूरत इसलिए पढ़ती है जिससे ये अपने हिंसक कर्मों को वैध बना सकें।खासकर पुरानी मनोदशा के लोगों में अपने कुकर्मों को वैध बना सकें।धार्मिक फंडामेंटलिज्म उन लोगों को जल्दी अपील करता है जो धार्मिक नजरिए से घटनाओं को देखते हैं।फंडामेंटलिस्ट संगठन अपने हिंसक लक्ष्यों के लिए धर्म का राजनीतिक उपयोग करते हैं।

         धार्मिक फंडामेंटलिज्म का लोकतांत्रिक संविधान ,धर्मनिरपेक्षता,न्यायपालिका आदि में कोई विश्वास नहीं है,वे बुनियादी तौर पर हाशिए के लोगों और औरतों के हकों और मानवाधिकारों पर हमले करते हैं। वे आधुनिकता से नफरत करते हैं और उसके विकल्प के रूप में धार्मिक मान्यताओं को थोपते हैं।उनको अन्य धर्म की मान्यताओं और विश्वासों से भी गहरी चिढ़ है,इसलिए वे अन्य धर्म को सहन नहीं कर पाते।वे अपने सामाजिक और वैचारिक आधार के विकास के लिए पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों का जमकर प्रयोग करते हैं।इनके आधार पर समाज को नियमित और नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं,जो व्यक्ति उनके विचारों को नहीं मानता या विरोध करता है उसको हिंसक तरीकों से शांत करने या मार देने की कोशिश करते हैं।धार्मिक फंडामेंटलिस्ट बुनियादी तौरपर हिंसक होते हैं।वे अपने प्रभाव विस्तार के लिए वाचिक-कायिक हिंसा का जमकर प्रयोग करते हैं।इनकी बुनियादी समझ है कि बुनियादी मानवाधिकार तो धार्मिक फंडामेंटलिज्म के खिलाफ हैं।इसलिए हर स्तर पर इनका विरोध करो।

शनिवार, 14 मई 2016

औरत के हक में और संशय के प्रतिवाद में


      फ़ेसबुक से लेकर मासमीडिया तक , नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक औरतों के प्रति संशय और संदेह का वातावरण बन रहा है । औरत हो या पुरुष किसी पर भी संदेह या संशय के आधार पर बातचीत नहीं करनी चाहिए ।मानवीय सभ्यता के विकास में मानवीय भरोसे और विश्वास की बड़ी भूमिका रही है। कभी-कभार इन संबंधों में विपर्यय भी देखा गया है।औरतों में बहुत छोटा किंतु नगण्य अंश है जो विश्वासघात भी करता रहा है । यह पहले भी था और आगे भी रहेगा ।

मानवीय संबंध स्त्री-पुरुष संबंधों के बिना नहीं बनते । नए युग में इन संबंधों का स्वरुप नए ढंग और तरीक़े से बनाना होगा । नए मानवीय मूल्यों को औरतें भी अर्जित कर रही हैं ।वे निडर होकर जीने की कोशिश कर रही हैं ,हमें उनकी इस कोशिश में हर संभव मदद करनी चाहिए ।औरत निडर और आधुनिक बनेगी तो वह हमारी पुरानी आस्थाओं को तोड़ेगी और चुनौती भी देगी ।हम सभी लोग औरत के इस नए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं ।

औरत बदलती है तो सबसे पहले पुरानी आस्थाएँ टूटती हैं , औरत का पुराना स्टीरियोटाइप टूटता है । इस क्रम में अनेक मर्दों और औरतों को त्रासदियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।औरत का बदलना और समाज में निडर होकर घूमना, बातें करना , मिलना -जुलना , मित्रों के साथ शाम गुज़ारना , पुरुष के साथ निडर होकर घुलना-मिलना सामान्य और सही प्रवृत्ति है।औरत जितनी निडर होगी समाज में पोंगापंथ , साम्प्रदायिकता, फंडामेंटलिज्म, लिंगभेद उतना ही कम होगा या इन सबसे लड़ने में मदद मिलेगी ।

औरत के साथ नए युग के अनुसार हमें व्यवहार करना सीखना होगा । औरत के प्रति संशय या संदेह मूलतः पितृसत्तात्मकता की अभिव्यक्ति है । पितृसत्ता की विचारधारा सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है । पितृसत्ता तो समाजवाद, पूँजीवाद की भी अम्मा है ।हिंदी में कहावत है चोर को न मारो चोर की अम्मा को मारो। लिंगभेद या औरत के प्रति अविश्वास की अम्मा है पितृसत्ता । यह बेहद बारीक ढंग से काम करती है और इसके रुपों से लड़ने के लिए बेहद सतर्क प्रयासों की ज़रुरत है ।

पितृसत्ता का महान गुण है कि वह स्वयं पर संदेह करना नहीं सिखाती । हम सब में पितृसत्ताप्रेम वैचारिक तौर पर कूट-कूटकर भरा है । औरत जब घर से निकलती है , अपने दुख सार्वजनिक करती है या सुख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करती है तो पितृसत्ता को धक्का लगता है और यही धक्का हम अपने अंदर महसूस करते हैं और काँपने लगते हैं , औरत पर संदेह करने लगते हैं ।

औरतों की हाल में जितनी भी सही-ग़लत शिकायतें आई हैं वे पितृसत्ता को कमज़ोर कर रही हैं और इस प्रक्रिया को किसी भी क़ीमत पर रुकना नहीं चाहिए । इस प्रक्रिया में अनेक श्रेष्ठ पुरुषों की बलि भी चढ़ेगी और यह अस्वाभाविक नहीं है । जिनको हम महान,निष्कलंक और निर्दोष मान रहे हैं उनके पितृसत्तात्मकता अपराधों को अपराध नहीं मानते उलटे पुण्य कार्य या सही काम मानते हैं । औरत का हर एक्शन पुरुष की महानता का निषेध है । पितृसत्ता को धराशायी करने वाली सबसे बड़ी बाधा यही महान श्रेष्ठ लोग हैं जो विभिन्न रंगतों और विचारधाराओं में हमारे बीच वैचारिक वैधता का आदर्श लिए खड़े हैं ।

औरत का सामान्य जीवन , सामान्य आचरण परिभाषित करने के लिए औरत के नज़रिए से चीज़ों को देखने की आदत विकसित करनी होगी । हमारे मीडिया का वर्चस्वशाली विमर्श ,चैटिंग,फ़ेसबुक कमेंट्स आदि पूरी तरह पितृसत्तात्मकता के आवरण में आ रहे हैं । औरत का हर एक्शन इस आवरण को छिन्न- भिन्न करता है । वह जब भी बोलती है तो पितृसत्ता को कमज़ोर करती है ,वह जब पुरुषों से सार्वजनिक या निजी तौर पर मिलती है तो अपना स्पेस बना रही होती है ।

औरत की समस्या है कि उसके पास भारत में निजी स्पेस और सार्वजनिक स्पेस बहुत कम है।औरत के लिए निजी और सार्वजनिक स्पेस के अभाव को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया । नई सक्रिय औरत अपनी नई दुनिया रच रही है । जिसमें वह क्रमश: वर्जनाओं और सामाजिक बंदिशों से लड़ रही है । इधर दो दशकों में औरतों पर ख़ासकर शिक्षित औरतों पर हमले तेज़ी से बढ़ें हैं । वह जब इनका प्रतिवाद करती है तो तरह तरह के बहाने खोजकर हमलोग औरत को दोषी ठहराने या फिर उदार मूल्यों पर ही हमले करने आरंभ कर देते हैं ।

भारत के विकास के लिए औरत पर अविश्वास करने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर संशय के नज़रिए से सोचने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर अविश्वास करनासामाजिक विकास के चक्र को उलटी दिशा में मोड़ना है ।ठगने ,झूठ बोलने या छल का काम औरत करें या मर्द करें हमें सतर्क रहना चाहिए और प्रतिवाद करना चाहिए । कोई औरत झूठे इल्ज़ाम लगाए तो झूठे इल्ज़ाम का विरोध करो , औरतों के ख़िलाफ़ संशय पैदा मत करो । क़ानून में इस तरह के प्रावधान होने चाहिए जिससे ग़लत इल्ज़ाम लगाने पर औरत को भी दण्डित किया जा सके । मौजूदा दौर में अनेक मामलों में औरतों के द्वारा ग़लत आरोपों के संगीन मामले सामने आए हैं और इस तरह के मामलों में क़ानूनी प्रक्रिया की मदद ली जानी चाहिए ।

औरत की सामाजिक बराबरी की लड़ाई का यह सबसे कठिन दौर है । औरत का आज जितने बडे कैनवास में सामाजिक एक्सपोजर हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ । फलत: हम आए दिन नई स्त्री समस्याओं और चुनौतियों से दो-चार हो रहे हैं । इस प्रक्रिया से किनाराकशी या इसे रोकने के प्रयास निश्चिततौर पर असफल होंगे। औरत घर से निकली है तो वह अपने रास्ते , अपना संसार भी बनाएगी और इस काम में हम सबको औरत पर विश्वास और मित्रता का भाव बनाए रखना होगा । आज औरत को संरक्षक की नहीं मित्र की ज़रुरत है । हमारे मन में बैठा यही संरक्षक भाव औरत की नई हक़ीक़त को समझने में बाधाएँ पैदा कर रहा है । औरत की नई हक़ीक़त को मित्रभाव से ही समझ सकते हैं और यहपरिवर्तन हमें अपने व्यवहार में करना पड़ेगा ।

भारत में स्त्री और सामाजिक समूहों के साथ दो तरह का भेदभाव और शोषण पाया जाता है, पहला ,सामाजिक शोषण और भेदभाव के रुप में है ,और दूसरा ,केजुअल शोषण और भेदभाव है । केजुअल शोषण और भेदभाव भी उतना खराब और निंदनीय है जितना सामाजिक भेदभाव और शोषण। इस केजुअल भेदभाव का एक रुप साम्प्रदायिक-अंधक्षेत्रीयतावादी नजरिए में भी व्यक्त होता रहता है । हम मुसलमानों और अन्य समूहों के प्रति हंसी-मजाक में अपनी भेददृष्टि को व्यक्त करते रहते हैं । खासकर मीडिया में यह रुप व्यापक है। मीडिया ( फिल्म,टीवी और अखबार के कार्टून सीरीज) ने केजुअल भेदभाव को वैध बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। भेदभाव किसी भी रुप में हो केजुअल हो या अन्य रुप में हो वह स्वीकार्य नहीं है । अफसोस यह है कि हम केजुअल भेदभाव के प्रति अभी तक सचेत नहीं हो पाए हैं ।

यह सच है पुराने कानून में अनेक स्त्री विरोधी प्रावधान रहे हैं लेकिन हमारे यहां कानूनी संतुलन को असंतुलन में बदलने की कला में अ-सामाजिक तत्व सफल रहे हैं । कानून जेण्डर संतुलन और संरक्षण के साथ काम करे,इसके लिए कानून के दुरुपयोग को रोकने वाली सामाजिक-राजनीतिक संरचनाएं बनायी जाएं । साथ ही अपराधी बचने न पाएं और जल्दी न्याय हो । सरकार सारे कर्म करने के बावजूद जल्द न्याय की व्यवस्था करने में असफल रही है ।औरतों की राय को परम पवित्र मानने वाले भारतीय फेमिनिस्टों को जरा औरतों के बारे में यूरोप की फेमिनिस्टों की राय पर भी गौर करना चाहिए। औरत के नाम पर अंधा विमर्श या स्त्री फंडामेंटलिज्म वस्तुतः स्त्री विरोधी है । भारत की स्त्री अधिकार रक्षक संस्थाएं और विदुषियां भारतीय औरतों की नकारात्मक और समाज विरोधी धारणाओं की कभी आलोचनाएं नहीं लिखतीं यह त्रासद है।





मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

औरत पर संदेह नहीं विश्वास करो


यूपी में कमाल हो गया,औरतों ने पंचायत चुनावों में झंड़े गाड़ दिए.ग्राम प्रधान की 44प्रतिशत सीटों पर औरतों ने जीत हासिल की है, जबकि उनके लिए आरक्षित सीटें थीं 33फीसदी ।11प्रतिशत सीटें अनारक्षित स्थानों से औरतों ने जीतकर सच में कमाल कर दिया। जब भी पंचायत के चुनाव परिणाम आए हैं, तो औरतों के परिणाम बेहतर ही आए हैं,लेकिन परिणाम आने के साथ ही संदेह वर्षा आरंभ हो जाती है। सवाल यह है पुरुष क्या स्वायत्त ढ़ंग से काम करता है ?हमलोग पुरुष की सैंकड़ों-हजारों सालों की असफलता के बावजूद उस पर संदेह नहीं करते,उसकी क्षमता पर संदेह नहीं करते, लेकिन औरत की क्षमता पर तुरंत संदेह करने लगते हैं।लोकतंत्र हो या जीवन हो,सामाजिक प्रक्रिया विश्वास के आधार पर चलती है,जिनको हम चुनते हैं उन पर विश्वास करें ,यदि वे खरे न उतरें तो उनको बदल दें ,उनकी जगह किसी और का चुनाव करें।लेकिन संदेह न करें।

यूपी में औरतें जीती हैं,देश में हजारों औरतें जनप्रितिनिधि के रुप में काम कर रही हैं,इससे लोकतंत्र में औरतों की शिरकत बढ़ी है।औरत की पहचान बदली है। औरतों पर जिन बातों को लेकर संदेह किया जा रहा है वे बातें पुरुषों पर भी लागू होती हैं। मसलन्, यह कहा जा रहा है कि वे अंगूठा छाप हैं,उनके पास निजी विवेक नहीं है,पति का मोहरा हैं।ये सारी बातें पुरुषों पर भी लागू होती हैं। हमारे पुरुष तुलनात्मक तौर पर ज्यादा ये ही सब काम कर रहे हैं।वे किसी न किसी के मोहरे हैं। विवेकहीनता में भी औरतों से आगे हैं।



कहने का तात्पर्य यह कि औरतें जब लोकतंत्र में फैसलेकुन कमेटियों में चुनी जाती हैं तो हमें संदेह का माहौल बनाने से बचना चाहिए। औरतें क्रमशःघर से बाहर आ रही हैं,राजनीति में दाखिल हो रही हैं,उनमें बदलाब हो रहा है।वे एकदम विपरीत परिस्थितियों में काम कर रही हैं,उनको हर हालत में तब तक मदद और समर्थन की जरुरत है जब तक उनकी स्थिति पूरी तरह बदल नहीं जाती।औरत का सबसे बड़ा शत्रु संदेह है। संदेह न करें,उस पर विश्वास करें,वह न तो माया है,न ठगिनी है,वह भी मनुष्य है,उसे भी सामान्य मनुष्य की तरह जीने और काम करने का मौका दें।

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बलात्कार को भूलो और माफ़ करो के नज़रिए से न देखो !



आज अख़बार से पता चला कि कोलकाता के पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की पीड़िता की मृत्यु हो गयी , अफ़सोस है कि अपराधी मस्त हैं और पीड़िता चल बसी। यह न्याय और राज्य सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि बलात्कार तो बर्बरता है, औरत पर सामाजिक हमला है। वह कोई 
सामान्य घटना नहीं ।यह शारीरिक हिंसा है, बलात्कार इससे भी जघन्य शारीरिक -मानसिक हिंसाचार के साथ सामाजिक हत्या है।  
   सामान्य हिंसाचार जैसे चांटा मारने का प्रतिकार हो सकता है, बदले में चांटा मार सकते हैं,या सहन करके रह सकते हैं। चांटा मारना सामान्य उत्पीड़न है। फिर भी हिंसा है।निंदनीय है।सामान्य हिंसा या अपमान को एक अवधि के बाद औरत भूल सकती है ,लेकिन बलात्कार तो स्त्री की सामाजिक हत्या है। बलात्कार के बाद औरत मर जाती है। उसका मन , तन और सामाजिक परिवेश नष्ट हो जाता है। 
   हम याद करें द्रौपदी के अपमान को जिसके कारण उसने पांडवों से कह दिया था कि जाओ पहले मेरा अपमान करने वालों का वध करके आओ। मैं फिर में केश बाँधूँगी ।स्त्री का अपमान वह छोटे रुप में हो या बलात्कार जैसे बर्बर रुप में हो , उसे"भूलो और माफ़ करो ", के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। 
      बलात्कार बर्बरता है यह सभ्यता के सभी  मानकों का उल्लंघन है। बलात्कार कभी सामान्य रुप में घटित नहीं होता . वह स्त्री की योनि,मन और सामाजिक ज़िंदगी को हमेशा के लिए नष्ट कर देता । बलात्कार पीड़िता स्वयं तो पीडित होती ही है उसका परिवार भी पीडित होता है, यातनाएँ झेलता है। बलात्कारी को कभी न तो लिंग में कष्ट होता है , न मन में तकलीफ़ होती और न सामाजिकतौर पर उसकी कोई क्षति होती है। 
     हमारे समाज का पुंसवादी ढाँचा , नेतागण और मीडिया का पुंसवादी परिवेश हमेशा बलात्कारी के पक्ष में खडा रहता है। मीडिया में आएदिन औरतों पर हमलों को महिमामंडित किया जाता है, बलात्कार को जायज़ ठहराते हुए फ़िल्में और सीरियल बड़ी संख्या में आते रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे तमाम स्वनाम धन्य बडे कलाकार ऐसी फ़िल्मों में अभिनय भी करते हैं। अख़बारों में बलात्कारियों के पक्ष में अनेक पत्रकारगण आएदिन माहौल बनाते रहते हैं। 
               बलात्कार औरत पर बर्बर हमला है,अक्षम्य सामाजिक अपराध है। बलात्कारी का एकमात्र इलाज है कि उसे हमेशा के लिए जेल में बंद रखा जाय और दंड स्वरुप नपुंसक बनाया जाय। बलात्कार सामान्य अपराध नहीं है। बलात्कारी के प्रति कठोर बनें और बलात्कार की पीड़िता के साथ सामाजिक एकजुटता प्रदर्शित करें । 

रविवार, 8 मार्च 2015

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

       औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।
       औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का संकुचन हुआ है।  
    हमारी शिक्षा लड़कियों को सभ्य कम और अनुगामी ज्यादा बनाती है। औरत सभ्य तब बनती है जब वह सचेतन भाव से सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जंग करती है। औरत की जंग तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हम उसे आम औरत के निजी जीवन तक नहीं ले जाते। हमारे सभ्य समाज की आयरनी यह है कि वह सभ्य औरत तो चाहता है लेकिन उसे सभ्य बनाने के लिए आत्मसंघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता। मसलन्,औरतों में दहेज प्रथा के खिलाफ जिस तरह की नफरत होनी चाहिए वह कहीं पर भी नजर नहीं आती।
    औरत सभ्य है या असभ्य है यह इस बात से तय होगा कि वह अपने जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों और समस्याओं पर विवेकवादी नजरिए से क्या फैसला लेती है ? समाज ने स्त्री के लिए अनुकरण और निषेधों की श्रृंखला तैयार की है और उसे वैध बनाने के तर्कशास्त्र, मान्यताएं और संस्कारों को निर्मित किया है। इसके विपरीत यदि कोई औरत अनुकरण और निषेधों का निषेध करे तो सबसे पहले औरतें ही दवाब पैदा करती हैं कि तुम यह मत करो,ऐसा मत करो, परिवार की इज्जत को बट्टा लग जाएगा। औरत को बार-बार परिवार की इज्जत का वास्ता देकर असभ्य कर्मों को करने के लिए कहा जाता है। खासकर युवा लड़कियों के अंदर दहेज प्रथा के खिलाफ जब तक घृणा पैदा नहीं होगी, औरत को सभ्य बनाना संभव नहीं है। औरत सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह उन तमाम चीजों से नफरत करना सीखे जो उसको सभ्य बनने से रोकती हैं। दहेज प्रथा उनमें से एक है।
    औरत के अंदर असभ्यता का आधार है अनुगामी भावबोध ,जब तक औरतें अनुगामी भावबोध को विवेक के जरिए अपदस्थ नहीं करतीं वे सभ्यता को अर्जित नहीं कर पाएंगी। समाज में अनुगामी औरत को आदर्श मानने की मानसिकता को बदलना होगा।
   औरत को असभ्य बनाने में दूसरा बड़ा तत्व है, औरतों और खासकर लड़कियों का सचेतभाव से मूर्खतापूर्ण हरकतें करना, मूर्खता को वे क्रमशः अपने जीवन का आभूषण बना लेतीं हैं। तमाम किस्म के स्त्रीनाटक इस मूर्खतापूर्ण आचरण के गर्भ से निकलते हैं।स्त्री की  मूर्खतापूर्ण हरकतें अधिकांश पुरुषों को अच्छी लगती हैं। फलतः लड़कियां सचेत रुप से मूर्खता को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग बना लेती हैं। इससे स्त्री की छद्म इमेज बनती है। स्त्री सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह छद्म इमेज और छद्म मान्यताओं में जीना बंद करे।
    छद्म इमेज का आदर्श है लड़कियों में फिल्मी नायिकाओं को आदर्श मानने का छद्मभाव। मसलन्, माधुरी दीक्षित ,रेखा,ऐश्वर्या राय में कौन सी चीज है जिससे लड़कियां प्रेरणा लेती हैं ?  क्या सौंदर्य-हाव-भाव आदि आदर्श हैं ? यदि ये आदर्श हैं तो इनसे सभ्यता का विकास नहीं होगा। सौंदर्य के बाजार और प्रसाधन उद्योग का विकास होगा। यदि इन नायिकाओं के कैरियर और उसके लिए इन नायिकाओं द्वारा की गयी कठिन साधना और संघर्ष को लड़कियां अपना लक्ष्य बनाती हैं तो वे सभ्यता का विकास करेंगी और पहले से ज्यादा सुंदर दिखने लगेंगी। ये वे नायिकाएं हैं जिन्होंने अपने कलात्मक जीवन को सफलता की ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए कठिन रास्ता चुना और समाज में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल किया। अपने अभिनय के जरिए लोगों का दिल जीता।

    कहने का अर्थ है कि फिल्मी नायिका से सौंदर्य टिप्स लेने की बजाय,उसके सौंदर्य का अनुकरण करने की बजाय, कलात्मक संघर्ष की भावनाएं और मूल्य यदि ग्रहण किए जाते तो देश में हजारों माधुरी दीक्षित होतीं! दुर्भाग्य की बात है कि हम यह अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि औरत का सौंदर्य उसके शरीर में नहीं उसकी सभ्यता में होता है ! औरत जितनी सभ्य होगी वह उतनी ही सुंदर होगी। सभ्यता के निर्माण के लिए जरुरी है कि औरतें स्वावलंबी बनें। अनुगामी भाव से बचें। 

सोमवार, 17 नवंबर 2014

स्वाधीनता सेनानी कमला नेहरु

                पंडित नेहरु के जीवन पर बातें हों और उनकी पत्नी कमला पर बातें न हों,यह हो नहीं सकता। विचारणीय पहलु यह है कि लेखक के नाते नेहरु को कौन सी चीजें कमला में रेखांकित करने की जरुरत पड़ी ? पहली चीज जिसे नेहरु मूल्यवान मानते हैं वह है इन्सानी रिश्ता। इन्सानी रिश्ते को राजनीति और अर्थशास्त्र की बहसों के बहाने नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर पति-पत्नी के संबंधों के बीच इन्सानी रिश्तों का एहसास रहना चाहिए।नेहरु ने रेखांकित किया है कि भारत और चीन में इन्सानी रिश्तों के एहसास को नजर-अंदाज नहीं किया गया। यह हमारी पुरानी अक्लमंद तहज़ीब की देन है। इंसानी एहसास व्यक्ति में संतुलन और हम-वज़नीपन पैदा करता है। नेहरु लिख रहे हैं कि इन दिनों यह एहसास कम हो गया है। इसी क्रम में नेहरु ने लिखा '' यक़ीनी तौर पर इसे मुमकिन होना चाहिए कि भीतरी संतुलन का बाहरी तरक्की से,पुराने ज़माने के ज्ञान का नये जमाने की शक्ति और विज्ञान से मेल क़ायम हो। सच देखा जाय, तो हम लोग दुनिया के इतिहास की एक सी मंज़िल पर पहुँच गए हैं कि अगर यह मेल न क़ायम हो सका,तो दोनों का ही अंत और नाश रखा हुआ है।'' नेहरु चाहते थे हम मानव-सभ्यता की अबतक की सभी महान उपलब्धियों को आत्मसात करके विकास करें।  कमला के बारे में उनका लेखन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उसे अपनी पत्नी के रुप में नहीं देखते थे,वे उसे भारत की औरतों का प्रतीक मानते थे।
       नेहरु ने लिखा '' मेरे लिए वह हिंदुस्तान की महिलाओं ,बल्कि स्त्री-मात्र,की प्रतीक बन गई। कभी-कभी हिंदुस्तान के बारे में मेरी कल्पना में वह एक अज़ीब तरह से मिल-जुल जाती,उस हिंदुस्तान की कल्पना में ,जो अपनी सब कमजोरियों के बावजूद हमारा प्यारा देश है,और जो इतना रहस्यमय और भेद-भरा है। कमला क्या थी ? क्या मैं उसे जान सका था ,  उसकी असली आत्मा को पहचान सका था ? क्या उसने मुझे पहचाना  और समझा था ? क्योंकि मैं भी अनोखा आदमी रहा हूँ और मुझमें भी ऐसा रहस्य रहा है ,ऐसी गहराईयाँ रही हैं,जिनकी थाह मैं खुद नहीं लगा सका हूँ। कभी-कभी मैंने ख़याल किया है कि वह मुझसे इसीवजह से ज़रा सहमी रहती थी। शादी के मामले में मैं खातिर-ख़ाह आदमी न रहा हूं , न उस वक्त था। कमला और मैं,एक-दूसरे से कुछ बातों में बिलकुल ज़ुदा थे,और फिर भी कुछ बातों में हम एक-जैसे थे।हम एक-दूसरे की कमियों को पूरा नहीं करते थे। हमारी जुदा-जुदा ताकत ही आपस के व्यवहार में कमजोरी बन गई। या तो आपस में पूरा समझौता हो ,विचारों का मेल हो,नहीं तो कठिनाईयां तो होंगी ही।हममें कोई भी साधारण गृहस्थी की ज़िन्दगी गुजारे,उसे कुबूल करते हुए ,नहीं बिता सकते थे।''
    कमला की बीमारी के समय पंडित नेहरु उनके साथ रहे और उनकी देखभाल भी की, यह एकमात्र उनके करीब रहने और एक-दूसरे से शेयर करने का सबसे बेहतरीन समय था। कमला की खूबी थी कि वह निडर और निष्कपट थीं। वे नेहरु के राजनीतिक लक्ष्यों को जानती,मानती और उसमें यथाशक्ति मदद भी करती थी।सन् 1930 में जब कांग्रेस के सभी नेता जेलों में बंद थे उन्होंने राजनीति में जमकर रुचि दिखाई। मजेदार बात यह थी उस समय सारे देश में औरतें सड़कों पर संघर्ष के मैदान में उतर पड़ीं, इन औरतों में कमला भी थी। मैदान में उतरनेवाली औरतों में सभी वर्गों और समुदायों की औरतें थीं। नेहरु ने 'हिंदुस्तान की कहानी' में इसका जिक्र किया है। उस समय मोतीलाल नेहरु ने बीमारी की हालत में कांग्रेस के आंदोलन का नेतृत्व किया और बड़ी संख्या में औरतों ने उस आंदोलन में हिस्सा लिया। यह घटना 26जनवरी1931 की है। इस दिन सारे देश में आजादी की सालगिरह मनाने का फैसला लिया गया। देश में हजारों जलसे हुए उनमें एक ''यादगार प्रस्ताव'' पास किया गया। यह प्रस्ताव हर सूबे की भाषा में था। कमला ने इसके पहले1921के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। कमला दिखने में सामान्य थी, लेकिन कर्मठता के मामले में असाधारण थी।  उनकी क्षयरोग के कारण 28फरवरी 1936 में स्विटजरलैंड में मृत्यु हुई। नेहरु ने अंतिम समय का वर्णन करते हुए लिखा है, '' ज्यों-ज्यों आखिरी दिन बीतने लगे,कमला में अचानक तबदीली आती जान पड़ी। उसके जिस्म की हालत,जहांतक हम देख सकते थे,वैसी ही थी,लेकिन उसका दिमाग अपने इर्द-गिर्द की चीज़ों पर कम ठहरता। वह मुझसे कहती कि कोई उसे बुला रहा है या कि उसने किसी शक़्ल या आदमी को कमरे में आते देखा,जबकि मैं कुछ न देख पाता था।
   28फरवरी को, बहुत सबेरे उसने अपनी आखिरी सांस ली।इंदिरा वहां मौजूद थी,और हमारे सच्चे दोस्त और इन महीनों के निरंतर साथी डाक्टर अटल भी मौजूद थे।
   कुछ और मित्र स्विटजरलैंड के पास के शहरों से आ गए और हम उसे लोज़ान के दाहघर में ले गए।चंद मिनटों में वह सुंदर शरीर और प्यारा मुखड़ा,जिस पर अकसर मुस्कराहट छाई रहती थी,जलकर ख़ाक हो गया। और अब हमारे पास सिर्फ़ एक बरतन रहा,जिसमें उस सतेज,आबदार और जीवन से लहलहाते प्राणों की अस्थियां हमने भर ली थीं।''
नेहरु जब कमला की अस्थियां लेकर लौट रहे थे तो उनका मन एकदम खिन्न और उदास था,उस क्षण को याद करते हुए लिखा है, '' मैंने ऐसा महसूस किया कि मुझमें कुछ नहीं रह गया है और मैं बिना किसी मकसद का हो गया हूं।मैं अपने घर की तरफ़ अकेला लौट रहा था,उस घर की तरफ़ जो अब घर नहीं रह गया था,और मेरे साथ एक टोकरी थी,जिसमें राख़ का एक बरतन था।कमला का जो कुछ बच रहा था,यही था।और हमारे सब सुख सपने मर चुके थे और राख़ हो चुके थे। वह अब नहीं रही,कमला अब नहीं रही-मेरा दिमाग़ यही दुहराता रहा।'' नेहरु ने अपनी आत्मकथा कमला को समर्पित करके बेहतरीन श्रद्धांजलि दी।

रविवार, 16 नवंबर 2014

नेहरु का पत्नी प्रेम

     व्यक्तित्व मूल्यांकन का आधार नैतिकता नहीं, नजरिया होना चाहिए।व्यक्ति के नजरिए और निजी जीवनशैली को जोड़कर देखना चाहिए। भारतीय परंपरा में नजरिए की उपेक्षा करके नैतिकता के आधार पर हमेशा सामंती और फासिस्ट ताकतें हमले करती रही हैं। ये ताकतें नेहरु को भी ऩिशाना बनाती रही हैं। नेहरु की आलोचना का कोई मुद्दा नहीं मिलता तो ये नैतिकता के ठेकेदार उनके निजी जीवन के मसलों पर हमले आरंभ कर देते हैं। हमारे यहाँ फेसबुक से लेकर तमाम किस्म के किताबी संस्मरणों तक नेहरुजी की निजी जिंदगी के पहलुओं के विकृतिकरण की खूब कोशिशें होती रही हैं। नेहरु जैसे बड़े व्यक्तित्व को देखने –समझने के लिए अभी हमारे देश में खुलकर विमर्श करने की जरुरत है। नेहरु के निजी पहलुओं को नेहरु के नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि नेहरु पर हमले करने वाले, पहलु नेहरु का चुनते हैं, और नजरिया अपना जोड़ देते हैं ,और इस तरह वे नेहरु की 'कलंकगाथा' निर्मित करते हैं। नेहरु के व्यक्तित्व और आचरण से हम आधुनिक मूल्यों और मानवतावादी नजरिए को लेकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस प्रसंग में पहली शर्त है कि व्यक्ति के रुप में नेहरु के निजी विषयों पर लिखे- कहे पर विश्वास करें।

नेहरु का समूचा व्यक्तित्व आधुनिक था,इसकी खूबी थी अन्य के जीवन में हस्तक्षेप न करना, अन्य का सम्मान करना और अन्य को समानता के नजरिए से देखना। आधुनिक होने की ये पूर्व शर्तें हैं। हमालोगों में मुश्किल यह है कि हमने आधुनिकता का अर्थ नए कपड़े,नए हाव-भाव,नए किस्म का घर,नया फर्नीचर,नई गाडी,नया घर मान लिया। आधुनिक होने का ये चीजें प्रमाण नहीं हैं। आधुनिक होने के लिए आधुनिक नजरिए का होना बेहद जरुरी है। नेहरु इस अर्थ में आधुनिक थे कि उनके पास आलोचनात्मक विवेक था,विज्ञान और न्याय की कसौटी या वैज्ञानिक कसौटी पर चीजों,वस्तुओं,विचारों और व्यक्तियों के आचरण को वे परखकर देखते थे। उन्होंने स्वयं को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने की भरसक कोशिश की। आधुनिक होने का अर्थ पुराने का विरोधी नहीं है, आधुनिक होने का अर्थ है विज्ञान और न्यायसम्मत नजरिए से लैस होना। अपने समूचे आचरण को विज्ञान और न्यायसम्मत बनाना। अन्य का सम्मान करना,मानवाधिकारों का सम्मान करना, उनको मानना। इस नजरिए से नेहरु के अपनी पत्नी के साथ संबंधों को ध्यान से देखें तो बेहतर होगा।

पंडित नेहरु अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उस प्यार से उनको शक्ति मिलती थी।हिन्दी में जो लेखक-आलोचक इन दिनों आत्मकथाओं के नाम पर अल्लम-गल्लम लिख रहे हैं वे नेहरु के आत्मकथा लेखन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। नेहरु ने कमला के बारे में लिखा है '' कुछ थोड़ी सी तालीम के अलावा उसे कायदे से शिक्षा नहीं मिली थी। उसका दिमाग शिक्षा की पगडंडियों में से होकर नहीं गुजरा था। हमारे यहां वह एक भोली लड़की तरह आई और जाहिरा उसमें कोई ऐसी जटिलताएं नहीं थीं, जो आजकल आमतौर से मिलती हैं। चेहरा तो उसका लड़कियों –जैसा बराबर बना रहा,लेकिन जब वह सयानी होकर औरत हुई ,तब उसकी आंखों में एक गहराई, एक ज्योति, आ गई और यह इस बात की सूचक थी कि इन शांत सरोवरों के पीछे तूफ़ान चल रहा है। वह नई रोशनी की लड़कियों –जैसी न थी,न तो उसमें वे आदतें थीं, वह चंचल थी। फिर भी नए तरीकों में वह आसानी से घुल-मिल जाती थी। दर-असल वह एक हिंदुस्तानी और खासतौर पर कश्मीरी लड़की थी-चैतन्य और गर्वीली,बच्चों-जैसी और बड़ों –जैसी,बेवकूफ़ और चतुर। अजनबी,लोगों से और उनसे,जिन्हें वह पसंद नहीं करती थी,वह संकोच करती थी;लेकिन जिन्हें वह जानती और पसंद करती थी,उनसे वह जी खोलकर मिलती और उनके सामने उसकी खुशी फूटी पड़ती थी।चाहे जो शख्स हो उसके बारे में झट से अपनी राय कायम कर लेती। यह राय उसकी हमेशा सही न होती,और न इन्साफ़ की नींव पर बनी होती,लेकिन अपनी इस सहज पसंद या विरोध पर वह दृढ़ रहती। उसमें कपट नाम को न था। अगर वह किसी व्यक्ति को नापसंद करती और यह बात जाहिर हो जाती ,तो वह उसे छिपाने की कोशिश न करती। कोशिश भी करती तो शायद वह उसमें कामयाब न होती। मुझे ऐसे इन्सान कम मिले हैं.जिन्होंने मुझ पर अपनी साफ-दिली का वैसा प्रभाव डाला हो,जैसा उसने डाला था।''(हिदुस्तान की कहानी,पृ.49-50)

इस समूचे उद्धरण में जो चीज समझने की है वह ध्यान में रखें तो आत्मकथाओं के बारे में, उनमें आए चरित्रों के बारे में सही नजरिया बना सकते हैं। मसलन् , आत्मकथा में देखें कि चरित्रों की राय ''इन्साफ़ की नींव पर '' आधारित है या नहीं ? व्यक्तित्व की आंतरिक बुनाबट किस तरह की है उसमें छल और निष्कपट भावबोध की क्या भूमिका है ? नेहरु के इस बयान से एक बात और साफ होती है कि कमला को वे बेइंतिहा प्यार करते थे। इस प्यार की अभिव्यक्ति में वे अपने मन की उन तमाम बातों को स्पष्ट ढ़ंग से कहते हैं जो वे कमला के बारे में महसूस करते थे। उन्होंने आत्मालोचना करते हुए लिखा , '' मैंने अपने ब्याह के शुरु के सालों का ख़याल किया,जबकि बावजूद इस बात के कि मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था,मैं करीब-करीब उसे भूल गया था,और उसे उस संग से वंचित रखता था,जिसका उसे हक़ था,क्योंकि उस वक्त उस मक़सद को पूरा करने में लगा रहता था,जिसे मैंने अपनाया था। '' आगे लिखा '' जब-जब और धंधों से निपटकर उसके पास आता,तो मुझे ऐसा अनुभव होता कि किसी सुरक्षित बंदरगाह में पहुँच गया हूँ। अगर घर से कई दिनों के लिए बाहर रहता ,तो उसका ध्यान करके मेरे मन को शांति मिलती और मैं बेचैनी के साथ घर लौटने की राह देखता। अगर वह मुझे ढ़ाढ़स और साहस देने के लिए न होती और मेरे थके मन और शरीर को नया जीवन न देती रहती,तो भला मैं कर ही क्या पाता ? '' नेहरु के इन शब्दों में साफ कहा कि '' मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था''।

कमला के व्यक्तित्व के बारे में नेहरु ने लिखा '' वह जो कुछ मुझे दे सकती थी,उसे मैंने उससे ले लिया था।इसके बदले में इन शुरु के दिनों में मैंने उसे क्या दिया ? जाहिरा तौर पर मैं नाकामयाब रहा,और मुमकिन है कि उन दिनों की गहरी छाप उस पर हमेशा बनी रही हो। वह इतनी गर्वीली और संवेदनशील थी कि मुझसे मदद मांगना नहीं चाहती थी,अगरचे जो मदद मैं उसे दे सकता था , वह दूसरा नहीं दे सकता था।वह राष्ट्रीय लड़ाई में अपना अलग हिस्सा लेना चाहती थी; महज़ दूसरे के आसरे रहकर या अपने पति की परछाईं बनकर वह नहीं रहना चाहती थी। वह चाहती थी कि दुनिया की निगाहों में ही नहीं,बल्कि अपनी निगाहों में वह खरी उतरे।'' नेहरु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक की चित्रा को उद्धृत करते हुए लिखा '' मैं चित्रा हूँ,देवी नहीं हूँ कि मेरी पूजा की जाय। अगर तुम खतरे और साहस के रास्ते में मुझे अपने साथ रखना मंज़ूर करते हो,अगर तुम अपनी जिन्दगी के बड़े कामों में मुझे हिस्सा लेने की इजाजत देते हो,तो तुम मेरी असली आत्मा को पहचानोगे।'' नेहरु जी ने लिखा यह बात कमला ने '' शब्दों में नहीं कही ,धीरे-धीरे यह संदेश मैं उसकी आंखों में पढ़ पाया।''

नेहरुजी का कमला के बारे में मानना था '' मेरे लिए वह हिन्दुस्तान की महिलाओं,बल्कि स्त्री-मात्र ,की प्रतीक बन गयी।''



मंगलवार, 17 जून 2014

औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए


      औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का जो तूफान समाज में चल रहा है उसमें इजाफा ही होगा।

आयरनी यह है कि औरतों के ऊपर हो रहे हिंसाचार के खिलाफ औरतें अभी तक सड़कों पर निकलने को तैयार नहीं हैं। कहीं पर भी हजारों-लाखों औरतों के जुलूस नजर नहीं आ रहे। स्थिति इतनी भयावह है कि पीड़िता को देखकर भी हम अनदेखा कर रहे हैं। पुरुषों के लिए बलात्कार एक खबर होकर रह गयी, वहीं औरतों के लिए जुल्म। हमें इन दोनों के दायरे से निकलकर औरत को संघर्ष की प्रक्रिया में लाना होगा। औरत संघर्ष करेगी तो हिंसाचार थमेगा। हमें औरत को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना होगा। हमें औरतों को सामाजिक हलचलों से दूर रखने की मनोदशा बदलनी होगी। औरतों को भी अ-राजनीतिक होकर जीने की आदत और अभ्यासों को त्यागना होगा। औरत को अ-राजनीतिक बनाने में पुंस समाज को लाभ रहा है।

औरत अ-राजनीतिक न बने हमें उसके उपाय खोजने होंगे। औरतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरुकता पैदा करने के उपायों पर विचार करना होगा और यह काम औरतों के बिना संभव नहीं है। पहली कड़ी के तौर पर औरतों को अखबार पढ़ने, टीवी न्यूज देखने और राजनीतिक खबरों में दिलचस्पी लेने की आदत डालनी होगी।

औरत को सीरियल संस्कृति और मनोरंजन संस्कृति के बंद परकोटे से बाहर निकलना होगा। मनोरंजन की कैद में बंद औरत अपनी रक्षा नहीं कर सकती। यह वह औरत है जो सामाजिक -राजनीतिक भूमिका से संयास ले चुकी है।

यह सच है कि औरतें रुटिन कामों को सालों-साल करती रहती हैं और घरों में बैठे हुए बोर होती रहती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि सीरियल या मनोरंजन प्रोडक्टों का रुटिन आस्वादन और भी ज्यादा बोर करता है। उनका अहर्निश आस्वादन हमें बोर और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय बनाता है।

औरत सामाजिक तौर पर निष्क्रिय न बने इसके लिए औरतों को यह जानना होगा कि वे जिसे आनंद या मनोरंजन समझ रही हैं वह तो उनकी बोरियत बढ़ाने वाला संसाधन है। औरत को मनोरंजन की नकली भूख को खत्म करने के लिए मनोरंजन के असली और कारगर रुपों को अपनाना होगा।

औरतें अ-राजनीति के दायरे के बाहर आएं इसके लिए जरुरी है कि वे अपनी पहल पर लोकतांत्रिक महिला संगठनों की शाखाएं अपने मुहल्ले में खोलें और नए सिरे से सामाजिक सवालों पर मिलने-जुलने और काम करने का सिस्टम तैयार करें। आज स्थिति यह है कि भारत के अघिकांश मुहल्लों में महिला संगठन नहीं हैं। महिला संगठनों के बिना महिलाओं को नहीं बचा सकते।



महिलाओं को हर इलाके में थाने नहीं महिला संगठनों की जरुरत है। महिलाओं के इस तरह के संगठनों की जरुरत है जो निरंतर महिलाओं के सवालों पर सोचें और महिलाओं को सक्रिय-शिक्षित करें। महिलाएं सक्रिय-शिक्षित और संगठित बनेंगी तब ही हिंसाचार रुकेगा।

रविवार, 15 जून 2014

औरत के लिए सुरक्षित जगह की तलाश


औरत के लिए कौन सी जगह सबसे ज्यादा सुरक्षित है ? क्या वह घर में सुरक्षित है ? खेत में सुरक्षित है ? थाने में सुरक्षित है ? सुप्रीमकोर्ट के वकील के साथ सुरक्षित है ? विश्वविद्यालय-कॉलेज में सुरक्षित है ? अस्पताल में सुरक्षित है ? जी,वह इनमें से सब जगह बार –बार हमलों का शिकार हुई है।
    औरत की सुरक्षा का सवाल जब भी उठा है तो हमने कड़े कानून की बातें की, जल्द न्याय की बातें की  ,उसके लिए संसाधनों की बातें की ? लेकिन फिर भी यह पाया कि औरत सबसे ज्यादा असुरक्षित है। अदालतें थक  चुकीहैं ,नेताओं की जुबान थक गयी है, जुलूस निकालने वाले थक गए हैं ,लेकिन औरत के लिए एक सुरक्षित स्थान अभी तक तय नहीं कर पाए हैं। औरत असुरक्षित क्यों है इसके कारणों की बुनियाद को टटोला जाना चाहिए।
     औरत के लिए सुरक्षित जगह फिलहाल तो कहीं पर भी नजर नहीं आती। इसका कारण है कि हम औरत पर बातें नहीं कर रहे ,हम उसकी सुरक्षा पर बातें कर रहे हैं। औरतों के बारे में बातें करते ही फब्तियां कसनी आरंभ हो जाती हैं। औरतों के सवालों और खासकर सुरक्षा के सवाल का संबंध सुरक्षा के अभाव से नहीं औरत के प्रति हमारे नजरिए से जुड़ाहै। हम औरत को किस रुप में देखते हैं और औरत स्वयं को किस रुप में देखती है,ये दोनों सवाल एक-दूसरे के पूरक हैं। औरत के बारे में हमें स्त्री-पुरुष दोनों के नजरिए की छानबीन करनी चाहिए। औरत पर बातें करते समय किसी एक के नजरिए पर ही नजर नहीं रखें बल्कि दोनों ओर नजर रखें।
     औरत के प्रति मन में जो भाव हैं उसी से तय होगा कि औरत के जीवन में किस तरह की सुरक्षा है। खिड़कियां बंद करके औरत को कभी सुरक्षा नहीं मिल सकती। हमें घर और दिमाग की खिड़कियां खोलनी होंगी। औरत के स्टीरियोटाइप सोच से बाहर निकलकर यथार्थ रुप में स्त्री के बारे में सोचना होगा। औरत के बारे में जहां एक ओर कृत्रिम औरत की इमेज से बाहर निकलने की जरुरत है वहीं दूसरी ओर पूर्वाग्रहों के आधार पर औरत को देखने की परंपरा और आदतों को भी त्यागने की जरुरत है। औरत को देखते-देखते हमारे मन में औरत का परंपरागत रुप आदत की तरह घर कर बैठा है । इससे निकलने की जरुरत है।
    औरत पर हमलों की शुरुआत पहले भाषा में होती है। वाचिकतौर पर हम पहले हमले करते हैं और वाचिक हमले बंद हों।ये हमले कायिक हमलों से ज्यादा खतरनाक और पीडादायक होते हैं। चालू जुबान में कहें तो सुनो औरत पर वाचिक हमले बंद करो। ये हमले करते-करते समूचे समाज की मनोदशा ऐसी बना दी है कि औरत पर हमले हमें रुटिन और स्वाभाविक लगने लगे हैं। औरत बदलने के पहले हमें औरत के प्रति अपनी भाषा बदलनी होगी। बोलने का लहजा बदलना होगा। इसके लिए सरकार बदलने की नहीं जुबान बदलने की जरुरत है।

     जो लोग औरत की सुरक्षा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें कहते हैं वे सिर्फ एक बार भाषा बदल दें। स्थितियां तेजी से बदलने लगेंगी। औरत को पाना है उसे सामाजिक सुरक्षा देनी है तो पहले उसे भाषा में पाने की कोशिश करो। दूसरी चीज है जो हमें करनी होगी वह है औरत की निजता या प्राइवेसी की रक्षा। हमारे समाज में हर आदमी औरत की निजता पर हमले कर रहा है। औरत की निजता पर हमले घर में हो रहे हैं और फिर बाहर दूसरे ढ़ंग से औरत को बेइज्जत किया जा रहा है। हम औरतों के दायरों में जाना बंद करें। हमने औरत को इस कदर घेर रखा हैकि उसका कोई निजी दायरा या प्राइवेसी नहीं बची है।       

शनिवार, 14 जून 2014

आँसू क्यों निकलते हैं ?


      कुछ लोगों के लिए आँसू नाटक हैं तो कुछ लोगों के लिए परम सत्य हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आंसू पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं। असल में आंसू बहुअर्थी होते हैं। वे अन्य चीजों के साथ स्नायविक कमजोरी की अभिव्यक्ति होते हैं। जो लोग स्नायविक तौर पर मजबूत होते हैं वे जल्दी नहीं रोते लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के लक्षणों से ग्रस्त होते हैं उनके जल्द ही किसी भी बात पर आंसू निकल पड़ते हैं। आम धारणा है पुरुष कम आंसू बहाते हैं लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के शिकार हैं वे खूब रोते हैं। लेकिन जिस औरत में स्नायविक नियंत्रण की क्षमता होती है उसका अपने आंसुओं पर भी नियंत्रण होता है। औरत जब आंसुओं से प्रतिवाद नहीं कर पाती तब वह असंगत हिंसा और उन्माद का सहारा लेती है।

औरत या मर्द के आंसू नकली हैं या असली हैं। यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आंसुओं का सागर सदियों से बहता चला आ रहा है,इस सागर में आत्मगतता कम हुई है या बढ़ी है ? औरत पहले की तुलना में आज ज्यादा आंसू बहाती है या पहले ज्यादा बहाती थी ? क्या आंसू सर्जनात्मक क्षमता का अपव्यय हैं ? आंसू जब निकलते हैं तो वे शीतलता देते हैं या और ज्यादा अशांत कर देते हैं ? आंसू औरत को विनम्र बनाते हैं या उग्र बनाते हैं ? आंसू उसके भावों को सीधे सम्प्रेषित करते हैं या उसके विषाद को गहरा बनाते हैं ? आंसुओं में डूब जाने के बाद औरत शिथिल हो जाती है लेकिन कुछसमय बाद फिर से ऊर्जस्वित होकर सहजभाव से सक्रिय हो उठती है। यह भी सोचें कि आंसू उसके सामाजिक अलगाव को कम करते हैं या बढ़ाते हैं ?

आंसुओं पर दयाभाव से नहीं वस्तुगत मानवीय भाव से विवेकवादी नजरिए से सोचना चाहिए। आंसुओं की खूबी है कि वे विवेक को धुंधला बनाते हैं। आत्मगत अनुभूतियों को सघन बनाते हैं। आंसुओं पर अविश्वास नहीं करना चाहिए और नहीं उनको नकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए। बल्कि रेशनल या विवेकवादी नजरिए से देखना चाहिए।

कोई व्यक्ति जब विवेकवादी नजरिए से बोल नहीं पाता या सोच नहीं पाता तो आंसू निकलते हैं। आंसू गम ,खुशी,आनंद,अवसाद सबमें निकल पड़ते हैं, वे रोकने पर भी नहीं रुकते। मुश्किल यह भी है कि हमने आंसुओं को दुख का पर्याय़ बना दिया है।अमूमन आंसुओं का दुख से कम संबंध होता है।अधिकतर मामलों में अभिव्यक्ति की असमर्थता के कारण आंसू निकल पड़ते हैं। मैं निजी तौर पर यह परिस्थिति अनेकबार झेल चुका हूँ। आंसू कोई औरत की खास विशेषता नहीं है। वे पुरुषों के भी निकलते हैं और खूब निकलते हैं।

आंसुओं का नैतिकता,पाप-पुण्य आदि से कोई संबंध नहीं है। आंसू असल में मानवीय अभिव्यक्ति का एक आदिम प्रकार है। मनुष्य जिस तरह अपनी अभिव्यक्ति के लिए भाषा का इस्तेमाल करता है, भाव-भंगिमाओं का इस्तेमाल करता है। वैसे ही वह आंसुओं का भी इस्तेमाल करता है। आंसू वस्तुतः अभिव्यक्ति का एक रुप है। इसका लिंगविशेष से कोई संबंध नहीं है। यह प्राणीमात्र की विशेषता है। मैंने पशुओं को भी आंसू बहाते देखा है।



कहने का तात्पर्य यह है कि आंसू को स्त्री से जोड़कर नहीं देखना चाहिए यह तो सभी प्राणियों की अभिव्यक्ति का एक रुप है। आंसू के पीछे कौन सा भाव काम कर रहा है यह संदर्भ पर निर्भर करता है। अतः आंसुओं का अर्थ आंसू बहाने वाले के जीवन के बाहर सामाजिक संदर्भ पर निर्भर करता है। आंसू बाह्य सामाजिक आचरण या अन्य के आचरण के प्रति मानवीय भाव की अभिव्यक्ति है। इसी अर्थ में आंसू में निजी नहीं सामाजिक सत्य की भूमिका होती है, अन्य के सत्य की भूमिका होती है। आंसुओं में प्राणी की मनोदशा की द्वयर्थकता छिपी रहती है। अन्तर्विरोध छिपे रहते हैं। आंसू मन का ठंडा नमकीन पानी नहीं है बल्कि वह मानसिक द्वंद्व की अभिव्यंजना हैं।

शुक्रवार, 13 जून 2014

घर के बंधनों से मुक्त औरत की तलाश में

        औरतों के पक्ष में फेसबुक पर लिखते ही अनेक मित्र हैं जो यह कहने लगते हैं कि भाई साहब ! शैतान औरतों का भी ख्याल कीजिए। उन मर्दों का भी ख्याल कीजिए जो औरतों के लगाए मिथ्या आरोपों के शिकार होते हैं। सच है कि समाज में ऐसी औरतें भी हैं जो दुष्ट हैं और परेशान करती हैं लेकिन इनसे भी हजारगुना ज्यादा संख्या उन औरतों की है जो सचमुच में पीडित हैं, दमन की शिकार हैं और अधिकारहीन अवस्था में जी रही हैं।

संविधान में समानता के अधिकार के बावजूद वे अधिकारहीन हैं। इन अधिकारहीन औरतों पर ही पुरुषों के हमले सबसे ज्यादा हो रहे हैं। लोग सोचते हैं कि औरतें घर में रहती हैं तो सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं लेकिन सच यह है कि वे घर में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।

अधिकांश औरतें आज भी पुरुष जगत के अंतर्गत ही जिंदगी जी रही है। वे हर समय पुरुष के पूरक की तरह सेवा करती रहती हैं। वे जहां एक ओर पुरुष के पूरक की तरह काम करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे चुनौती भी देती हैं। इस विरोधाभासी स्थिति के कारण ही वे समाज में अपनी जगह बनाती हैं। औरत बचपन से यही सीखकर बड़ी होती है कि औरत को पुरुषों की बातें माननी चाहिए फिर कालान्तर में इसी धारणा से वह मुठभेड़ करती है।

औरत की समूची संरचना इस कदर बनी होती है कि वह आलोचना,जाँच-पड़ताल आदि से बचती है। वह पुरुष के मूल्यांकन और राय की आराधना करती है। वह पुरुष को रहस्यमय मूर्ति की तरह देखती है। स्त्री की दृष्टि में शक्ति ही महान है इसलिए वह पुरुष की शक्तिशाली के रुप में पूजा करती है।

स्त्री में अनुकूलन की प्रबल प्रवृति होती है । सीमोन के शब्दों में कहें तो पुनर्निर्माण और विध्वंस उसका सहज स्वभाव नहीं है। वह विद्रोह की अपेक्षा समझौते पसंद करती है। चूंकि स्त्री को घर-परिवार की चौखट से बाँध दिया गया है फलतः वह उसी में रमण करती रहती हैं ऐसी स्थिति से लोकमंगल और स्वतंत्रता के बारे में उससे सकारात्मक पहल की उम्मीद कम ही करें।घर के बंधनों से उसे मुक्त करो वह स्वतंत्रता और लोकमंगल के सवालों पर सक्रिय मिलेगी।



स्त्री को समर्थ बनाने के लिए उसे घर से बाहर निकालना जरुरी है। उसको सार्वजनिक तौर पर विभिन्न सवालों पर बोलना चाहिए। स्त्री के लिए अस्पृश्यता के सभी दायरों तोड़ने की जरुरत है ।औरत सुरक्षित रहे,आत्मनिर्भर बने और मानवीय जीवन जिए इसके लिए उसके अंदर स्वतंत्रता का बोध पैदा करने की जरुरत है ।

मंगलवार, 3 जून 2014

बलात्कार के प्रतिवाद और नागरिक औरत की तलाश में

    
 
  मीडिया में बलात्कार की ख़बरों का सुर्खियों में आना और नेताओं का बलात्कार को लेकर हाय हाय करना रोज़मर्रा का नाटक है। 
   बलात्कार कोई मीडिया इवेंट नहीं है। बलात्कार के यथार्थ चित्र मीडिया के क़िस्सों और बाइट्स से भी ज़्यादा भयानक हैं। बलात्कार हमारे समाज और लोकतंत्र की प्रकृति को समझने का प्रस्थान बिंदु है। यह हमारे लोकतंत्र के समस्त दावों को खोखला साबित करता है ।
    लेनिन कहा करते थे यदि किसी समाज की हक़ीक़त जानना है तो पता करो औरत की दशा क्या है ? हमलोग जब भी लोकतंत्र की बातें करते हैं तो सतही मसलों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं। औरत को केन्द्र में रखकर बातें नहीं करते। औरत हमारी सृष्टि की धुरी है।
   अभी लोकसभा चुनावों के परिणामों की स्याही सूखी नहीं है । हम अपने अंदर झाँकने के लिए तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में हमने औरतों के सवालों पर बातें तक नहीं कीं।
    मोदी से लेकर शोहदों तक सभी ने जितने भाषण दिए उनमें  औरत का मसला ठीक से उठाया ही नहीं गया। जब भी औरत का मसला उठा तो अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को हेयऔर निकम्मा सिद्ध करने के लिहाज़ से उठाया गया। औरत को भी क़ानून -व्यवस्था का मसला बना दिया गया। सरकार को  निकम्मा घोषित करने का औज़ार बना दिया गया और वोट जुगाड़ करने की मशीन में तब्दील कर दिया गया। कभी किसी भी दल ने औरतों के सवालों पर बुनियादी ढंग से बातें नहीं कीं।
   स्थिति इतनी बदतर है कि आज भी हम बदायूँ की घटना को यूपी सरकार को गिराने या बदनाम करने के लक्ष्य से आगे देखने को तैयार नहीं हैं। हम यह जानने और समझने को तैयार नहीं हैं कि हमारा देश 'बलात्कारियों का देश 'कैसे हो गया? क्यों हमारे देश में औरत को ही पग-पग पर लांछन, उत्पीड़न और बलात्कार का सामना करना पड़ता है? वे कौन सी ताक़तें और जीवन मूल्य हैं जो औरत पर हो रहे अत्याचारों की तह तक हमें जाने नहीं देते ? 
          बलात्कार की जड़ें हमारे समाज में हैं। समाज की मूल्य संरचना में हैं। औरत को मातहत मानने या दोयमदर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता में हैं। वास्तविकता यह है कि हमने अपने देश में लोकतंत्र का कम और वोटतंत्र का ज़्यादा विकास किया है। हमने नागरिकचेतना और आधुनिकभावबोध पैदा करने की बजाय उपभोक्ताबोध पैदा करने पर ज़ोर दिया है। औरत को समाज में नागरिक नहीं माना यहाँ तक कि पुरुष को भी नागरिक नहीं माना। हमारा समाज अभी तक नागरिक समाज बना ही नहीं है। 

    हम लिंग समाज में जी रहे हैं। ' ये औरत है वो मर्द है' की मानसिकता में जी रहे हैं। औरत-मर्द के संबंधों के आधार पर ही एक- दूसरे के बारे में सोचते हैं।हमने अपने संबंधों को नागरिक संबंधों में रुपान्तरित नहीं किया है। आज भी औरतें सबसे ज़्यादा शारीरिक हिंसा की शिकार क्यों हैं? क्योंकि औरत को शरीर या योनि से ज़्यादा हमारा समाज सोचने को तैयार नहीं है। 
    औरत  या योनि देह नहीं नागरिक है। जीवंत मनुष्य है। औरत का समूचा विमर्श अभी भी माँ , बेटी, बहन के सम्बोधनों से बन रहा है। हम औरत को इन सम्बोधनों और इनसे जुड़े सामाजिक संबंधों से परे जाकर देखने को तैयार नहीं हैं। औरत को जब तक हम इन संबंधों में देखेंगे तब तक औरत पर हमले जारी रहेंगे। औरत की अवस्था और भी बदतर होगी। 
     भारत में नया भारत तब बनेगा जब हम नागरिक के रुप में औरत- मर्द को देखेंगे । लिंगाधारित असमान संबंधों को हमने कभी बुनियादी तौर पर बदलने की मुहिम नहीं चलायी। औरत को लिंगाधारित संबंधों के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने से औरत की मातहत की सामाजिक दशा में बदलाव नहीं आएगा। औरत इस परिप्रेक्ष्य में हमेशा पुरुष संदर्भ से ही परिभाषित होती रही है। 
    औरत को माँ,बहन, बेटी के रुप में देखने का अर्थ है उसे पुरुष संदर्भ में देखना। नागरिक के रुप में औरत को देखा जाय इसकी पहली सीढ़ी है कि हम औरत को 'व्यक्ति' के रुप में देना आरंभ करें और क्रमश : 'व्यक्ति'रुप में उसकी सत्ता,महत्ता और अधिकारों को परिभाषित करें। 
        औरत को व्यक्ति के रुप में न देख पाने के कारण ही हम उसे मनुष्य के रुप में भी नहीं देख पाते। वह हमारी चेतना में लिंग होती है या माँ -बहन-बेटी होती है ,इसके अलावा उसकी कोई अवस्था नहीं होती।
      औरतों पर बढ़ रहे शारीरिक हमलों और बलात्कार की घटनाओं का एक अन्य कारण है मर्दानगी का नग्न प्रदर्शन और उसके श्रेष्ठत्व पर ज़ोर। मर्दानगी को हमारे मीडिया से लेकर राजनीति, संस्कृति से लेकर शिक्षा तक, धर्म से लेकर न्याय तक सबने महिमामंडित किया है।मर्दानगी को अपरिहार्य मान लिया गया है। मर्दानगी का हमारे यहाँ जो विकल्प औरतों की महिमा के नाम पर सुझाया जाता है वह भी मर्दानगी के ही लक्षणों को पुष्ट करता है। मर्दानगी का अहर्निश प्रचार- प्रसार हमारे मनोजगत को संचालित करता रहता है। यह हमें स्वाभाविक लगने लगा है।
    सामाजिक विकास के लिए मर्दानगी का महिमामंडन या फिर परंपरागत भावबोध का महिमामंडन इस तरह किया जाता है कि हम स्वतंत्र रुप में औरत की व्यक्ति और नागरिक के रुप में स्थिति को परिभाषित ही नहीं कर पाते। औरत को नागरिक के रुप में हम अभी तक अपने मन में बिठा नहीं पाए हैं। यह हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है।
     हमने लोकतंत्र में नागरिक की पहचान को अर्जित नहीं किया और न उसके लिए कोई आंतरिक और सामाजिक संघर्ष ही चलाया। हमने मान लिया कि हम नागरिक हैं और हमारा समाज लोकतांत्रिक है। 
     लोकतंत्र या नागरिकबोध प्रदत्त नहीं होता, वह संवैधानिक घोषणाओं के साथ ही हमें नहीं मिल जाता बल्कि उसके लिए सचेत रुप में सामाजिकस्तर पर संघर्ष चलाने की ज़रुरत है। इस काम को हमारे यहाँ अभी तक किसी ने नहीं किया। 
      हमने औरत को शिक्षित बनाया, नया उत्पादक बनाया लेकिन औरत और समाज में नागरिकबोध पैदा नहीं किया। औरत के ऊपरी उपकरण बदले लेकिन उसकी आंतरिक संरचनाएँ पुरानी बनी रहीं। हमें कमाऊ औरत चाहिए लेकिन नए मूल्यबोधवाली नागरिकबोध से युक्त औरत नहीं चाहिए । यही वह बिंदु है जहाँ से औरत के हकों और उसके शरीर पर बराबर हमले हो रहे हैं। 
       औरत को हम क़ानून -व्यवस्था का मसला न मानें। औरतें क़ानून भंजक नहीं हैं।लेकिन औरतें हमारे क़ानूनी मशीनरी की शिकार जरुर हैं। हमारी सारी क़ानूनी मशीनरी और समाज पूरी तरह से औरत को शक की नज़र से देखता है।
    औरतें सुरक्षित रहें इसके लिए ज़रुरी है कि हम उन पर विश्वास करना सीखें । औरत पर शक करना उसका अपमान है। औरत पर शक के कारण ही यह मानसिकता बनी है कि औरत तो पापिन होती है। नागिन होती है। औरत को हमने न तो समाज में सम्मान से देखा और नहीं घर में सम्मान और विश्वास की नज़र से देखा। इसके अलावा औरत के अंदर पुंसवादी मूल्यों और विश्वासों को भी बिठाया गया है। आज वास्तविकता यह है कि औरत का साथ देने को औरत ही तैयार नहीं होती। 
     औरत आज जितनी अकेली और असहाय है उतनी असहाय और कमज़ोर वह पहले कभी नहीं थी। हम औरत को पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से परिभाषित करें तो चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आएँगी। 
    औरत के दो शत्रु हैं । पहला शत्रु है पूँजीवाद और दूसरा शत्रु हैं पितृसत्ता। औरत को मुक्ति हासिल करने के लिए पुंसवाद के ख़िलाफ़ समझौताहीन संघर्ष चलाना होगा। औरत इस संघर्ष में सफलता हासिल करें इसके लिए ज़रुरी है पुरुष भी उसका साथ दें। 
   औरत को संरक्षण के लिए क़ानून चाहिए लेकिन पुंसवादी नज़रिए से रहित। भाई ,पिता,बेटा चाहिए लेकिन पुंसवाद के बिना। औरत को हम औरत रहने दें उसे पुंसवादी साँचे में न ढालें। औरत को पुंसवादी साँचे में ढालने और पुंसवादी नज़रिए से देखने के कारण ही औरत आज सबसे ज़्यादा असहाय और हिंसा की शिकार है।
    हम सब एकजुट होकर पुंसवादी विचारधारा और पुंसवादी मूल्यों का हर स्तर पर विरोध करें। पुंसवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष घर के अंदर और हमारे दिलोदिमाग़ के अंदर चलाने की ज़रुरत है। 
      

सोमवार, 19 मई 2014

लोकतंत्र के पुंसवादीतंत्र में औरतें

लोकसभा चुनावों में नेताओं के बंद दिमाग़ से बाहर निकलकर औरतों की ओर भी हमें नज़र डालने की ज़रुरत है। सन् १९५२में संसद में ४९९सीट थीं जिसमें २२महिला सांसद थीं। यानी ४.४फीसदी सीटों पर महिलाएँ क़ाबिज़ थीं। लेकिन २००९ में ५४३सीटों में मात्र ५८महिलाएं सांसद बनीं।
सन् २००४ में छह राष्ट्रीय दलों ने १,३५१उम्मीदवार खड़े किए जिसमें महिला प्रत्याशियों की संख्या ११० थी। इसमें मात्र ३०महिलाएं चुनाव जीत पायीं। कांग्रेस ने ४१७उम्मीदवार खड़े किए जिसमें ४५ महिलाएँ थीं। भाजपा ने ३६४उम्मीदवार खड़े किए जिसमें ३० महिलाएँ थीं।
सन् २००९ में हुए लोकसभा चुनाव में छह राष्ट्रीय दलों ने कुल १,६२३ उम्मीदवार खड़े किए जिनमें मात्र १३४ महिलाएँ थीं। यानी मात्र ८फीसदी महिलाएँ मैदान में थीं। इनमें से मात्र ४३ महिलाएँ ही चुनाव जीत पायीं।
२०१४ के चुनाव में अब तक कांग्रेस की दो लिस्ट आ चुकी हैं जिनमें २६५ के नाम हैं जिनमें ३९महिलाओं को लोकसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। भाजपा की सूची में अब तक मात्र १४ महिलाओं को टिकट मिला है। आम आदमी पार्टी ने मात्र २३ महिलाओं को टिकट दिया है। इस मामले में वामदलों की अवस्था बेहतर नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि मौजूदा चुनाव में औरतों को राष्ट्रीयदलों ने हाशिए के बाहर खदेड़ दिया है और यह इस बात का संकेत भी है कि कुलमिलाकर लोकतंत्र पुंसवादी होता जा रहा है। लोकतंत्र में ऐसी अवस्था में महिलाओं पर अत्याचार रोकना और भी मुश्किल हो जाएगा।
16वीं लोकसभा में 61 महिलाएं सांसद बनकर आई हैं लेकिन एक बड़ा हिस्सा है जहां पर महिलाओं को अभी बंदिशें तोड़नी हैं। 

रविवार, 11 मई 2014

मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं


मोदी पर मुग्ध औरतें फेसबुक में कम हैं लेकिन मतदाताओं में ज्यादा हैं। सवाल यह है कि भाजपा को औरतों के वोट क्यों मिलते हैं,जबकि यह खुला सच है  औरतों के बारे में मोदी के आधुनिक विचार नहीं हैं। फेसबुकपर सक्रिय मोदीभक्त औरतें वैज्ञानिक विवेचना की अपेक्षा आसपास के लोगों की बातों से ज्यादा प्रभावित हैं।
   मोदीभक्त औरतों में बड़ा अंश उन औरतों का है जो अपने लिए रक्षक चाहती हैं। स्त्री की स्वतंत्र,मुक्त और स्वायत्त भूमिका को अस्वीकार करती हैं। ये वे औरते हैं जो आज्ञा-पालन के समय स्वतंत्र रहने का दिखावा करती हैं। अन्य अवसरों पर शांत रहने का दिखावा करती हैं। इनमें एक वर्ग ऐसी औरतों का भी है जो निरंकुशता और अत्याचार को अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर स्वीकार करती हैं। इनमें वे औरतें भी हैं जो कहने को किताबों का सम्मान करती हैं लेकिन शब्दों के अर्थ समझे बिना पन्ने पलटती रहती हैं। वे मोदी पर बोल रही हैं लेकिन मोदी की राजनीति को बिना जाने, मोदी और संघ के स्त्री के प्रति अनुदार नजरिए को बिना जाने। ये असल में मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं हैं।
    जो औरत मोदी के मुखड़े में देश का मुखड़ा देख रही है उनके बारे में यही कहेंगे कि उनको देश की समझ पैदा करनी होगी। देश कोई नेता का मुखड़ा नहीं है। देश कोई दलीय विचारधारा नहीं है। वे मोदीप्रेम में इस कदर मगन हैं कि उनको किसी भी किस्म का मोदी विरोधी विचार पसंद नहीं है। एक नागरिक के नाते, एक स्त्री के नाते उनका मोदीबोध वस्तुतःलोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के निषेध की विचारधारा के बुनियादी आधारों पर टिका है । यह मोदीबोध सुविधाबोध है।


मोदी की हिमायती औरतें


नरेन्द्र मोदी पर हमारी आलोचनाएं राजनीतिक हैं। उन सभी आलोचनाओं का एक आयाम राजनीतिक है तो दूसरा आयाम सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक है। असल में मोदी की आड़ में हम सबके मन में पितृसत्ता विचारधारा फल फूल रही है । यह सबसे घृणित विचारधारा है। यह उस समय और भी खतरनाक होती है जब कोई स्त्री जाने-अनजाने पितृसत्ता की हिमायत करे। मोदी की हिमायत अंततः पितृसत्ता की हिमायत है। 

मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों का साक्षात प्रतिनिधि रुप है। पितृसत्ता के लिबरल रुपों और अनुदार रुपों में इस चुनाव में सीधी टकराहट है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी पितृसत्ता के लिबरल रुपों के प्रतिनिधि हैं। इसके विपरीत मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों के नुमाइंदे हैं। इन दोनों में यह वैचारिक अंतर हमें लिबरल को चुनने की ओर ठेल रहा है। पितृसत्तात्मक लिबरल विचारधारा अंततः संकट की घड़ी में स्त्री विरोधी या स्त्री समर्थक हो सकती है। समस्या यह है कि किस तरह का सामाजिक दबाव पैदा करते हैं। शाहबानो केस के समय कट्टरपंथी मुसलमानों का दबाव था और लिबरल पितृसत्ता को हमने स्त्री विरोधी भूमिका अदा करते देखा। राजीव गांधी ने शाहबानो और मुसलिम औरतों के हकों के खिलाफ कदम उठाए। लेकिन निर्भयाकांड के समय सोनिया गांधी ने स्त्रीहित में कदम उठाए,कड़े कानून बनाने में सक्रिय भूमिका निभायी,क्योंकि जन दबाव था।

इसके विपरीत मोदी का अनुदार पितृसत्तात्मक रुप है और आचरण है जिसको संघ की विचारधारा और उसके सहयोगी संगठनों के जरिए पूरे देश में लागू किया जा रहा है। कांग्रेस और कांग्रेसियों ने कभी अन्तर्जातीय विवाह का विरोध नहीं किया बल्कि उसे बढ़ावा दिया। इसके विपरीत संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने अंतर्जातीय विवाह करने वालों पर खुलेआम हमले किए।लोगों को अंतर्जातीय विवाह करने से रोका । इसके सैंकड़ों उदाहरण हैं।

गुजरात में 2002 के दंगों में सैंकड़ों औरतों के साथ जो हुआ वह भूलने वाली चीज नहीं है। उसी तरह राजीव गांधी के एक वाक्य के कारण सिख औरतों के जो जघन्य हिंसाचार हुआ वह भी भूलने वाली चीज नहीं है, फिर भी एक बड़ा अंतर है जो सोनिया गांधी को राजीव गांधी से अलग करता है। सोनिया गांधी ने कम से कम खुलेआम,उनके पीएम ने संसद में 1984 के जघन्य कांड के लिए संसद और देश से माफी मांगी है। फिर भी 1984 के अपराध भूलना संभव नहीं है।

कांग्रेस के अंदर एक तबका है जिसका अनुदारवादी नजरिया है और यह तबका बीच बीच में चमक मारता है। लेकिन मोदी के साथ तो सरेआम स्त्री हकों पर हमले करने वाले लोग सक्रिय हैं। वे निर्लज्जता के स्त्री विरोधी फैसलों की हिमायत करते हैं।

मैं एक बात अभी तक नहीं समझ पाया कि मोदी यदि मातृभक्त हैं तो अपनी माँ को अपने पास क्यों नहीं रखते ? यह कैसा प्रेम है जिसमें एकल मोदी के पास माँ रहना नहीं चाहती, माँ मोदी से दूर रहना चाहती है। मोदी बार बार माँ की खबर लेने जरुर जाते हैं। माँ अपनी राजी खुशी की खबर भी देती है,माँ उनको आशीर्वाद भी देती है, क्योंकि वह माँ है और स्त्री है। लेकिन मोदी की माँ उनके साथ नहीं रहती। उसका साथ न रहना मोदी के किसी आचार-व्यवहार का प्रतिवाद है। औरतें प्रतिवाद भिन्न तरीके से करती हैं वे मर्दों की तरह प्रतिवाद नहीं करतीं। मोदी की माँ का मोदी से अलग रहना , मोदी का अकारण अपनी पत्नी को छोड़कर रहना,ये दो घटनाएं निजी होते हुए भी सार्वजनिक हैं और आमलोगों का ध्यान खींचती हैं। ये वे घटनाएं हैं जो मोदी के अंदर छिपे अनुदार पितृसत्तात्मक नजरिए की अभिव्यक्ति भी हैं।

हमारे समाज में एक बड़ा तबका है जो अनुदार पितृसत्ता का भक्त है और कठमुल्लों की तरह जीता है। इसमें वे लोग ज्यादा हैं जो पढ़े लिखे हैं, विदेशों में रहते हैं , मध्यवर्ग से आते हैं।

गरीबों में अनुदार पितृसत्ता का आधार बहुत कमजोर है। गरीब औरतें पितृसत्ता से आए दिन मुठभेड़ करती रहती हैं और अपने लिए मार्ग तलाशती रहती हैं। लेकिन अधिकांश शिक्षित औरतों और मर्दों में अनुदार पितृसत्ता हमेशा माँ की आड़ में औरत का शिकार करती है। माँ की आड़ में औरतों के हकों पर हमले करती है।

ये लोग माँ-बेटे के संबंधों को पितृसत्तात्मक संदर्भ के बिना देखना ही नहीं चाहते। माँ को पितृसत्ता के संदर्भ में देखने का अर्थ है औरत को पुरुष के मातहत के रुप में देखना। माँ के शोषण के रुप देखें तो इनलोगों से नफरत होने लगेगी। ये वे लोग हैं जो माँ को स्वायत्त औरत के रुप में नहीं देखते।

माँ एक स्वायत्त सामाजिक स्त्री इकाई है और उसको माँ की बजाय स्त्री के रुप में देखना चाहिए। माँ के पदबंध का प्रयोग करके माँ को तो ये लोग मातहत बनाते ही हैं साथ ही स्त्री को मातहत रखते हैं।

हीगेल ने कहा था 'सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।' इसी तरह माँ के प्रति जिस व्यक्ति में सम्मानभाव है उसके अंदर क्या अपनी पत्नी या स्त्री मात्र के प्रति सम्मानभाव है ? मोदी इस मामले एकसिरे से नकारात्मक स्थान पर खड़े हैं। उनके अंदर माँ के प्रति जो सम्मान भाव है वह सम्मानभाव अपनी पत्नी के प्रति नहीं है। यह खुला सच है।

जो लोग स्त्री में माँ ही माँ देखते हैं वे जान लें कि औरत में यदि माँ ही माँ देखेंगे तो स्त्री कभी स्वायत्त पहचान अर्जित नहीं कर सकती।इसमें मातृत्व पर जोर है इससे स्त्री की स्थिति में बदलाव नहीं आएगा। स्त्री बदले इसके लिए जरुरी है उसे मातृत्व के दायरे के बाहर निकालें।

स्त्री का निरासक्त माँ बने रहना स्त्री को पिछडा बनाए रखता है और उसे आधुनिक आत्मनिर्भर स्त्री के रुप में विकसित नहीं होने देता।

माँ तो औरत के व्यक्तित्व का एक अंश है ,समग्र नहीं है। हमें स्त्री को उन कार्यों के बाहर निकालने के बारे में सोचना चाहिए जिनको वह सदियों से करती आ रही है। मसलन् माँ का बच्चे पालना, केयर करना,आशीर्वाद देना, प्यार करना,घर की देखभाल करना। माँ ये सारे काम हजारों सालों से करती रही है और ये काम उसकी गुलामी की अवस्था के प्रतीक हैं। औरत को इन कामों के दायरे बाहर निकलना होगा। मोदी की मुश्किलें यहीं पर हैं।

जो मोदी और उनकी मां के बीच के संबंध को लेकर भावविह्वल हैं वे भी अंततः अपनी भावविह्वलता में औरत को गुलाम बनाए रखने का शास्त्र रच रहे हैं। माँ को हमने पालन-पोषण करने वाली मशीन बनाया है उसे साक्षात जीवन का आनंद लेने वाली स्वायत्त औरत नहीं बनाया है। हम माँ-बेटे के प्यार के महिमामंडन में जाने-अनजाने पुराने अनुदार माँ-बेटे के संबंध की हिमायत कर रहे हैं। यह हिमायत मूलतः हिटलर के विचारों की हिमायत है।

हिटलर मानता था स्त्री का काम है बच्चे पैदा करना और परिवारीजनों की घर के अंदर रहकर सेवा करना। अनुदार पितृसत्ता के संघी हिमायतियों और उनके फेसबुक अनुयायियों को माँ-बेटे का वह रुप पसंद है जो मोदी और उनकी माँ के बीच में है।यह रुप वैचारिक तौर पर हिटलर के द्वारा तय की गयी लक्ष्मण-रेखा के बाहर नहीं जाने देता।

मेरे लिए चिन्ता तब और होती है जब कोई आधुनिक पढ़ी-लिखी औरत अपने भावों-विचारों में मोदीभक्त हो और उसके अनुदार पितृसत्तात्मक विचारों की भी भक्त हो।यह कम्प्लीट पुंसवादी गुलामी है।

स्त्री के अंदर अनुदार पितृसत्तात्मक विचारधारा बेहद खतरनाक होती है यह विचारधारा स्त्री के आधुनिकीकरण की विरोधी है। यह औरत की स्वायत्तत और लोकतांत्रिक पहचान का निषेध करती है।

संघ ने दुर्गावाहिनी और इस तरह के संगठनों के जरिए औरतों में अनुदार पितृसत्ता का जमकर प्रचार किया है। ये वे औरतें हैं जो अनुदार पितृसत्ता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाकर स्त्री अधिकारों का हनन कर सकती हैं।ये ही औरतें वैचारिक तौर पर मोदी भक्ति में फेसबुक से लेकर राजनीति तक सक्रिय हैं।











सोमवार, 31 दिसंबर 2012

फेसबुक और स्त्रीमुक्ति

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स्त्री अपनी पहचान अर्जित करे इसके लिए जरूरी है कि झूठी भावनाओं और लालसाओं से मुक्त होकर स्वयं को देखे। विभ्रमों से दूर रहे।

-2-

स्त्री की मुक्ति का अर्थ है -स्त्रियों को आत्म-निर्णय का अधिकार होना चाहिए।

-3-

औरत की स्वायत्तता की रक्षा के लिए उससे बात बात पर स्पष्टीकरण मांगना बंद करें।

-4-

स्त्री की मुक्ति का मार्ग आरंभ होता है उसकी स्वायत्तता मानने से । हम उसे अपने अनुकूल ढालना बंद करें। स्त्री को अनुकूल ढालने का अर्थ है उसे मातहत बनाना।

-5-

टीवी चैनल लगे हुए हैं कि समाज को बदलने के लिए क्या करें और पंडितलोग बता रहे हैं यह करो, यह न करो। समाज बदले इसके लिए पहली शर्त्त है कि औरत के जीवन में हस्तक्षेप बंद हो।

हर स्तर पर स्त्री पर समाज और परिवार का हस्तक्षेप सबसे बड़ी बाधा है। हमें स्त्री पर विश्वास करना चाहिए। उस पर संदेह करना छोडें। स्त्री को निषेध और हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

-6-

कथाकार रमेश उपाध्याय का सुझाव है कि- सबसे पहले हिंदी की स्त्री और स्त्री अंगों से सम्बंधित गालियों के खिलाफ जंग ज़रूरी है.

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भारतीय मनोदशा में जड़ जमाए हुए स्त्री के रूढ़बद्ध रूपों के खिलाफ जंग करने जरूरत है। इसमें सबसे जनप्रिय है रमणी , काली औरत, गोरी औरत,सुंदरी आदि।

-8-

भारतीय मध्यकालीनबोध का आदर्शरूप है बातूनीपन। भारतीयलोग बात करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे खूब बोलते हैं। तर्क करते हैं। लेकिन अधिकांश बातों को ठंड़े बस्ते में बंद कर देते हैं। हमें बातूनी भारतीय की जगह एक्शन वाले भारतीय की जरूरत है ,जो बात करें उसका पालन करें।

-9-

ग्राम्य संस्कृति में अनेक स्त्रीविरोधी बातें हैं जो हमें संस्कारों में मिली हैं। उनमें से एक है कुलच्छनी लड़की की धारणा। उसे तरह तरह के तर्कों से शुचिता से जोड़ा गया। साथ ही अनेक किस्म की नैतिकता संबंधी मान्यताएं इस कुलच्छनी लड़की की धारणा में आरोपित करके लड़की के ऊपर थोप दी गयी हैं। जो ग्राम्यसमाज हमें कुलच्छनी लड़की की धारणा में बांधता है उसके क्षय की हम कामना करते हैं। लडकी कुलच्छनी नहीं होती।

-10-

फेसबुक पर जो लोग आएदिन ग्राम्यसंस्कृति का महिमामंडन करते रहते हैं वे ग्राम्य संस्कृति में निहित कुसंस्कृति की हमेशा अनदेखी करते हैं। ग्राम्य संस्कृति की बल्गर कल्चर का आदर्श रूप है हलकट जवानी ,जलेबीबाई, चिकनी चमेली आदि के रूप में प्रचलित आइटम फिल्मी गाने। भोजपुरी आदि के लोकगीतों में कालांतर में आई वल्गर कल्चर को हिन्दी और भोजपुरी सिनेमा ने खूब भुनाया है। ये सारे हमारे ग्राम्यजीवन के पतन के सांस्कृतिक साक्ष्य भी हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों ने स्त्री के भोग्यारूप को प्रतिष्ठा दिलायी है। स्त्री की वल्गर कल्चर का उपभोग अंततः मर्दानगी का नया पाठ रच रहा है।

लोककला के एक नहीं अनेकस्तर हैं। जैसे लोग होगें ,वैसे ही लोककला के स्तर भी होंगे। लोककला में इकसार जैसी चीज नहीं होती।इसलिए वह बदलती रही है। समाज में जितने सांस्कृतिक स्तर होगे के उतने ही लोककलाओं में भी स्तर होंगे। लोककला वल्गर संस्कृति का शिकार कब और किन सामाजिक समूहों के संपर्क और प्रभाव से हुआ है इसके अलग-अलग स्थानों के लिए अलग कारण हैं। लोकगीत किसी न किसी व्यक्ति की ही देन है। लोकसर्जक की प्रतिभा व्यक्तिगत होती है। उसमें समूह की भूमिका देखना सही नहीं होगा। जितने भी कला इतिहासकार हैं उन्होंने इस तथ्य को समानरूप से रेखांकित किया है। फलतः इसमें सर्जक व्यक्ति अनुभतियां और विचारधारा भी अभिव्यक्त हुई है।



हाउजर ने लोककला को कृषककला से अलगाया है। लिखा है- लेोककला जैसे कृषक कला के समरूप नहीं होती उसी तरह कस्बाई कला के भी समरूप नहीं होती। लोककला के सर्वाधिक उल्लेखनीय लक्षणों में एक शहरों और सांस्कृतिक केन्द्रों की कला से इसका वैपरीत्य है,यद्यपि सारतः यह गैर-शहरी कला है, लेकिन वह ऐसी कला नहीं जो शहरी होना चाहती है मगर हो नहीं सकती।... लोक कला हालांकि अपने आप शहरों,दरबारों और मठों में उत्पादित कला पर निर्भर करती है,पर कभी सचेतन रूप से, उद्देश्यपूर्वक या गुलाम ढ़ंग से उससे होड़ नहीं करती।हालांकि यह दोयमदर्जे की कला होती है।( कला का इतिहास दर्शन,पृ.258)



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भारतीय ग्राम्य मानसिकता है कि अपराध करो और भूल जाओ। मर्द अपराध करता है और समाज-परिवार लड़की से कहता है चुप रह,किसी से मत कहना,छोड़ जाने दे,भूल जा। दूसरी ओर अपराधी हाथ-पैर जोड़ने लगता है।रोने-बिसूरने लगता है। माफी चाहता है और कहता है भूल जाओ-माफ करो। इस मानसिकता ने अपराध की मानसिकता को सामाजिक समर्थन दिलाया है। अपराध की अनदेखी करने की आदत पैदा की है।

अपराध की अनदेखी अंततःअपराधी को अपराधी मनोदशा में बांधे रखती है। वह अपराध करना नहीं छोड़ता। स्त्री-संबंधी अपराधों को इसी कारण हल्के ढ़ंग से लिया जाता है।

आधुनिककाल आने के बाद स्त्री ने ज्योंही निर्ममता से पेश आना आरंभ किया और प्रतिवाद किया तो स्त्रीरक्षा के विभिन्न कानूनों का जन्म हुआ।

यह अचानक नहीं है कि पुराने जमाने में स्त्री हिंसा के खिलाफ कभी भी न तो कड़े कानून बने और न कभी हिंसकों को दण्डित किया गया। बल्कि स्त्री अपहरण को वीरता से विभूषित किया गया।

स्त्री को मर्द की जिन हरकतों से परेशानी होती है उनको सहन करने की शिक्षा हमारा समाज सदियों से देता रहा है और यह ग्रामीण समाज था ।अतःग्रामीण समाज में चली आ रही स्त्रीविरोधी मानसिकता को निशाना बनाने की जरूरत है।

नए मध्यवर्ग में मर्द की अनेक सामंतीदौर की कुप्रथाएं चली आई हैं। उनमें से एक है अपराध करो और भूल जाओ। औरत से कहा जाता है सहन करो और सो जाओ।

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स्त्री की सामाजिक और आर्थिक परनिर्भरता ने मर्दों के आतंक के खिलाफ स्त्री की लडाई को कमजोर किया है। इसके कारण औरत बेबस हुई है। औरत की बेबसी का आलम यह है कि यदि किसी लड़की के साथ किसी परिवारीजन के द्वारा बदतमीजी की हरकत की जाती है तो लड़की अपनी माँ से कहती है, पिता से नहीं। माँ कहती है तू चुप रह,वेबजह कलह होगी,सिर फूटेंगे,गोली चलेंगी,तेरी शादी-ब्याह का मसला भी उलझन में फंस जाएगा। यानी औरत को हमेशा अन्य की इज्जत की रक्षा दुहाई देकर अपनी इज्जत लुटने देने के लिए कहा जाता है। स्त्री के प्रति समाज का ग्राम्यबोध ही है जो औरत की इज्जत को इज्जत नहीं मानता ,मर्दों की इज्जत को इज्जत मानता है. परिवार,पंचायत,जाति,धर्म आदि सबकी इज्जत की रक्षा करने के नाम पर स्त्री की इज्जत को लूटा गया है।

स्त्री की इज्जत के सवाल हमें इसीलिए कभी उद्वेलित नहीं करते हम उनको बड़े बारीक -बारीक बहानों के जरिए टालते रहे हैं। स्त्री की इज्जत समाज की इज्जत है। समाज की इज्जत, स्त्री की इज्जत नहीं है। हमें ऐसे समाज से घिन आती है जो बहानों के जरिए स्त्री की इज्जत को हाशिए पर डालता रहा है। स्त्री की पूजा करने से हम बाज आएं ,उसकी इज्जत करना सीखें। स्त्री के प्रति पूजाभाव ग्राम्यबोध की देन है। स्त्री को इज्जत देना आधुनिकभावबोध से जुड़ा है।हम चाहते हैं स्त्री के प्रति चले आरहे ग्राम्यभावबोध का अंत हो।

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भारत में स्त्रियों पर बढ़ते हुए हमलों का एक वैचारिक पहलू धर्मनिरपेक्षता (कांग्रेस मार्का) और छद्म धर्मनिरपेक्षता (संघ परिवार-भाजपा मार्का) दो छोरों में बंधा हुआ है। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हमने देश में कभी भी पितृसत्ता के बारे में सवाल ही खड़े नहीं किए। आज भी हम पुलिस,कानून,सरकार आदि की बातें कर रहे हैं पितृसत्ता की परतों को खोलने के लिए तैयार नहीं हैं। धर्मनिरपेक्षता के बारे में राजा राममोहन राय की धारणा असल में पितृसत्ता को बरकरार रखती है। उससे मुक्ति के बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं। कम से कम स्त्री के नजरिए से हमने धर्मनिरपेक्षता पर कभी पुनर्विचार नहीं किया। यहांतक कि कम्युनिस्ट चिंतकों ने भी इस पहलू की उपेक्षा की है। क्योंकि मार्क्सवाद की आड़ में भी पितृसत्ता बनी रहती है। यही हाल संघ परिवार की विचारधारा का है वे तो पितृसत्ता के घृणिततम रूपों की भी हिमायत करते रहे हैं और औरत के बारे में हिटलर के विचारों का प्रचार करते रहे हैं। स्त्री पर हमले न हों इसके लिए जरूरी है पितृसत्ता का क्षय हो।उसके सभी रूपों के खिलाफ समझौताहीन दीर्घकालिक संघर्ष चलाया जाय।

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शहरों में गैर कानूनी गुजर बसर के वे इलाके भी देखे जाने चाहिए जिनको हम झुग्गी-झोंपडी के इलाके कहते हैं। ये समानान्तर इलाके हैं इनमें कानून का शासन नहीं चलता,यहां पर सामान्य नागरिक सुविधाएं भी नहीं हैं और ये समानान्तर अर्थव्यवस्था के बड़े क्षेत्र हैं। स्त्री पर शहरों में बढ़ते हमलों से लेकर तमाम किस्म के अवैध-धंधों के ये इलाके हैं,इन इलाकों में रहने वालों को दबंग किस्म के नेता-माफिया नियंत्रित करते हैं और ये वोटबैंक भी हैं। स्त्रियों पर हमले की घटनाएं इन इलाकों में रहने वाले मर्दों ने ज्यादा की हैं।



इसके अलावा शहरी मध्यवर्ग में जिनलोगों ने स्त्री को संपत्ति मानकर संबंध बनाए हैं वहां पर स्त्री पर हमले बढ़े हैं। स्त्री को निजी संपत्ति के रूप में देखने वालों में अच्छा-खासा तबका खाते-पीते मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग से आता है और स्त्री उत्पीडन का यह बड़ा सामाजिक क्षेत्र है। स्त्री स्वस्थ और सुखी रहे इसके लिए जरूरी है स्त्री को संपदा न समझा जाय और शादी-ब्याह में संपदा की मांग न की जाय।

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दिल्ली में आए दिन होने वाली बलात्कार की घटनाओं में जिन सामाजिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है उन पर कोई बात नहीं कर रहा।

दिल्ली में बड़े पैमाने पर माइग्रेटेड लोग गांवों से आ गए हैं और बड़े पैमाने पर गांवों को भी एनसीआर के दायरे में समेट लिया गया है। इसके कारण बडी मात्रा में गैर-शहरी जनता का एक अच्छा खासा असभ्य तबका शहरी संरचना में आ मिला है उसे महानगर की रौनक,उदारता,मूल्यबोध और आदतों का ज्ञान नहीं है और वह अपने पिछड़े भावबोध के साथ शहरी लोगों को खासतौर पर औरतों को औचक और असभ्यभाव से देखता है। इसी वर्ग में नशा करके चलने और शारीरिक हमले करने वालों की बड़ी संख्या पायी गयी है।

इसमें एकवर्ग वह भी है जो संपदा के लिहाज से मध्यवर्ग में आ गया है लेकिन सामाजिक चरित्र उसका ग्रामीण है और सामंती मूल्यों को जीता है। सामंती मूल्यबोध का घृणिततम रूप है स्त्री पर हमला।

सामंतों के लिए स्त्रियां कभी मनुष्य नहीं रही हैं। वे उनको मसलने की चीज समझते रहे हैं यही वजह है कि औरतों पर इन असभ्यों के हमले बढे हैं।

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