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रविवार, 30 जुलाई 2017

जेएनयू में भाजपा का आतंकराज


           जेएनयू में भाजपा-आरएसएस के आतंक और उत्पीड़न के नए युग की शुरूआत हो चुकी है। मोदी सरकार  आने के साथ यह तय कर लिया गया था कि जेएनयू और खासकर वहाँ के छात्रसंघ को हर हालत में ध्वस्त किया जाएगा,इसके लिए सबसे पहले वामपंथ के साथ जेएनयू को जोड़ा गया, जेएनयू को देशद्रोहियों और आतंकियों के साथ जोड़ा गया,इस लाइन पर सारे देश में आरएसएस ने मीडिया अभियान चलाया, दूसरे चरण के तौर पर फ़रवरी २०१६ की घटना को षड्यंत्र करके बडे इवेंट के रुप में सजाया गया और उसके सारे विस्तृत एक्शन प्लान को बनाकर केन्द्र सरकार,दिल्ली पुलिस ,संघ की साइबर वाहिनी और आरएसएस मुख्यालय के संयुक्त तत्वावधान में चलाया गया,इसके लिए लठैतों के रुप में वकीलों और पूर्व सैनिकों की मदद भी ली गयी।उस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष सहित कई छात्रों पर राष्ट्रद्रोह के झूठे मुक़दमे भी लगाए गए।उसके समानान्तर  विश्वविद्यालय के अंदर छात्रों और शिक्षकों का एक समूह तैयार किया गया जिसका काम है जेएनयू के बारे में अफ़वाहें फैलाना, जेएनयू के अकादमिक चरित्र और कैंपस के परिवेश को प्रदूषित करना,छात्र-छात्राओं को बदनाम करना,जेएनयू की परंपराओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को ध्वस्त करना और उपकुलपति जगदीश कुमार की तानाशाही का समर्थन करना।
         आरएसएस के जेएनयू मॉडल में निशाने पर पहले दिन से जेएनयू छात्रसंघ है।किसी न किसी बहाने से विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ पर रोज हमले कर रहा है, बडी संख्या में आंदोलनकारी छात्रों पर शांतिपूर्ण जुलूस निकालने,धरना देने आदि के लिए बडी मात्रा में जुर्माने लगाए जा रहे हैं , छात्रों के रजिस्ट्रेशन खारिज किए जा रहे हैं,छात्रों को शांतिपूर्ण प्रतिवाद करने से रोका जा रहा है। 

     फ़रवरी २०१६ की घटना के समय कन्हैया कुमार और उनके साथियों को दण्डित करते समय यह कहा गया कि इन लोगों ने देशद्रोही नारे लगाए इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई की गयी, लेकिन आज तक देशद्रोही नारे लगाने से संबंधित प्रमाण जेएनयू प्रशासन ने पेश नहीं किए, दिल्ली पुलिस ने कन्हैया कुमार और दूसरे छात्रनेताओं पर देशद्रोह का झूठा मुक़दमा लगाया था उसके प्रमाण भी आजतक दिल्ली के अदालत में पेश नहीं किए,यहां तक कि आज तक चार्जशीट तक  दाखिल नहीं की ।इस तरह के आतंक के बाद भी पिछले जब छात्रसंघ के चुनाव हुए तो जेएनयू के छात्रों ने वाम संगठनों के नेतृत्व में आस्था व्यक्त की और आरएसएस के अखिल विद्यार्थी परिषद और उनके दुमछल्ले जाति छात्र संगठनों को बुरी तरह परास्त किया।इस पराजय को जेएनयू प्रशासन ने अपनी निजी पराजय समझा और तब से मौजूदा छात्रसंघ पर अकारण हमले तेज कर दिए गए, जेएनयू में एमफिल् पीएचडी के दाख़िले बंद कर दिए गए,यह काम किया गया यूजीसी के सर्कुलर के बहाने, जबकि जेएनयू में एमफिल् पीएचडी दाख़िले के स्वतंत्र नियम हैं जिनके आधार पर वहाँ दाख़िले होते हैं।जेएनयू के इतिहास में यह पहलीबार हुआ कि एमफिल् पीएचडी में अविवेकपूर्ण आधार पर प्रचलित दाख़िला नीति को बदल दिया गया।इससे जेएनयू के अकादमिक चरित्र को भारी नुकसान पहुँचा, सैंकडों प्रतिभाशाली छात्रों को जेएनयू में शोध करने से वंचित कर दिया गया।
             मौजूदा छात्रसंघ के नेताओं पर अकारण मोटा जुर्माना लगाया गया और जुर्माना अदा न करने की अवस्था में उनके नियमित रजिस्ट्रेशन को बाधित करके उनके नियमित छात्र के रुप में पढने के अधिकार को छीन लिया गया।ये वे नेता हैं जिन्होंने न तो वीसी को गाली दी, न कैंपस में हिंसा की और न देशद्रोहियों के पक्ष में नारे लगाए।इनका अपराध यह था कि इन्होंने कैंपस में वीसी ऑफ़िस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। यानी जेएनयू में अब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना भी अपराध है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसके कारण जेएनयू में फिर से अशांति पैदा कर दी गयी है ,छात्रनेताओं के खिलाफ इस तरह की दण्डात्मक कार्रवाई के निशाने पर आने वाले छात्रसंघ चुनाव हैं, प्रशासन चाहता है कि जेएनयू के छात्र वामपंथियों को वोट न दें, आरएसएस का बुनियादी तर्क यही है कि जेएनयू की अशांति की जड़ में वामसंगठन हैं अत:उनको वोट मत दो । यदि वामसंगठनों के नेताओं को जिताओगे तो जेएनयू प्रशासन उनको काम नहीं करने देगा , दाख़िले से वंचित करेगा।ऐसी अवस्था में जेएनयू के छात्रों को तमाम राजनीतिक मतभेद भुलाकर जेएनयू प्रशासन और आरएसएस के खिलाफ एकजुट संघर्ष चलाना चाहिए। इस तरह के दमन और उत्पीड़न का एकमात्र प्रत्युत्तर है शांतिपूर्ण एकजुट संघर्ष।जेएनयूएसयू मार्च ऑन!

शनिवार, 1 जुलाई 2017

ठंडे समाज की सिहरन


       तमाम ठंड़े दिमाग के लोग यही कह रहे हैं मोदीजी उपकार करेंगे!आरएसएस देश का मान-सम्मान ऊँचा करेगा।दुनिया में जहां पर भी आरएसएस जैसे संगठनों के लोग सत्ता में आए हैं सरकार ,समाज और देश का मस्तक गर्व से ऊँचा ही हुआ है ! इसलिए आरएसएस के प्रति शत्रुभाव रखने की जरूरत नहीं है ! दंगों में लोगों का मारे जाना, गऊ रक्षकों के हाथों निर्दोष लोगों की हत्या,कश्मीर में चल रहा उत्पीड़न असल में उत्पीड़न नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक काम है जिसे इस देश को हर हालत में और खुशी खुशी संपन्न करना चाहिए ! हमें ठंड़े रहकर चीजों को देखना चाहिए। ठंड़े रहकर ही समाधान खोजने चाहिए।हमें ठंड़े रहकर जीने की कला हिमालय से सीखनी चाहिए।कितना ठंड़ा है और कितना ऊँचा है ! कितना निर्जन है !ठंड़ा समाज,ठंड़ा दिमाग और निर्जन समाज और हिमालय जैसी शांति और ठंड़क ही है जो भारत को महान बनाती है ! उसके मान-सम्मान में इजाफा करती है।

ठंड़ा रहना,ठंड़ा सोचना और सिहरन में काँपते रहना यही है 21वीं सदी के भारत का सच।आप ठंड़े हैं तो सुरक्षित हैं ! ऐसे बनो कि कभी पिघलो मत।चाहे जितनी चिंताएं दिखाई दें,आदमी तकलीफों में डूब जाए लेकिन ठंड़े रहो! गुलफाम रहो!गुलाम रहो!

कल्पना करो बार-बार उन ऐतिहासिक क्षणों के बारे में मोदी सरकार क्यों याद दिला रही है ॽ उन नेताओं के नामों और कामों का स्मरण क्यों कर रही है जिनके जमाने में समाज गर्म था ॽउन क्षणों में मोदी सरकार क्यों मौजूद दिखना चाहती है जो समाज के गर्म क्षण थे।

सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ तो समाज गर्म था,पटेल ने विभिन्न रियासतों का भारत में विलय कराया था तब भारत गर्म था।आम जनता के मन में आशा और उमंगों की हिलोरें उठ रही थीं ,समाज में गर्म हवाएं चल रही थी, हर आदमी बेचैन था।यानी आज के ठंड़े माहौल से पुराने वाले माहौल की विलोम के रूपमें ही तुलना संभव है।कांग्रेस सत्ता के शिखर पर थी संसद में छाई हुई थी,आरएसएस संसद के बाहर था, लेकिन कल कांग्रेस संसद के बाहर खड़ी थी, कल आरएसएस ने संसद को घेरा हुआ था,सन् 47 में वे मुखबिर थे,आज वे देश के संरक्षक हैं,पहले वे गांधी के परमशत्रु थे ,आज वे गांधी के परमभक्त हैं! सन् 47 में कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन आज वे राजनीतिक प्रक्रिया के बाहर खड़े हैं। सन्47 के समाज में गर्म ऊर्जा थी,सन्2017 के समाज में सारी ऊर्जा ठंड़ी पड़ी है।गर्म समाज और ठंडे समाज में यही अंतर है।गर्म समाज ने सुई से लेकर परमाणु बम तक सब चीजों का निर्माण किया,ठंड़े समाज ने मात्र एप का निर्माण किया।विज्ञापनों का निर्माण किया।गर्म समाज के पास कुर्बानी का जज्बा था,ठंड़े समाज के पास आराम के साथ जीने,परजीवी की तरह रहने की आदत है।गर्म समाज सोचता था ,ठंड़ा समाज भोक्ता है।

ठंड़े समाज की स्प्रिट के साथ सन्47 की स्प्रिट की तुलना करना बेवकूफी है।आप चाहकर भी वह स्प्रिट पैदा नहीं कर सकते।सन्47 में सारा देश संसद में था,सारे मत-मतान्तर संसद में थे,लेकिन सन्17 में तो सिर्फ एक ही मत संसद में था,गैर-मोदी मत-मतान्तरों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया।याद रखो ठंड़े समाज में हरकत नहीं होती।ठंडा शरीर हरकत नहीं करता।जो हरकत नहीं करता वह समाज का निर्माण नहीं करता।हिमालय से भारत नहीं, भारत बनता है हिमालय को तोड़कर ! हिमालय प्रगति का प्रतीक नहीं है बल्कि हिमालय को बदलना ही प्रगति है।अफसोस की बात है हम ठंड़े होते जा रहे हैं!हिमालय होते जा रहे हैं!हिमालय बनने या ठंड़े समाज बनने का अर्थ है सभ्यता को,समाज को,दिमाग को प्रकृति को गिरवी रखना,तय करो किस ओर हो हिमालय की ओर या मनुष्यता की ओर ! मनुष्यता की सारी उपलब्धियां वे हैं जो उसने हिमालय को तोड़कर हासिल की हैं,लेकिन ठंड़े समाज का अंग बनकर आप उपलब्धियां हासिल नहीं कर सकते लेकिन हिटलर हासिल कर सकते हैं !





शुक्रवार, 30 जून 2017

हम कितने असहाय हैं !


          संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुकेहैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।

फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक विचारों,अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।

फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।

´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं,उसके नाम पर किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं।

पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ के विचार को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे।



फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है।मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद इसकी बुनियाद है।अविवेकवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे।

गुरुवार, 29 जून 2017

जुनैद की हिमायत में


               आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस –भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा –आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ

कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´।



-´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

बुधवार, 28 जून 2017

जुनैद के हत्यारों की तलाश में

        जुनैद मारा जाए या अखलाक मारा जाए,एक वर्ग ऐसा है जो इन सब हत्याओं से बेखबर-निश्चिंत है।उनके तर्क सुनेंगे तो गुस्सा आने लगेगा।वहीं दूसरी ओर आरएसएस वालों के तर्क सुनेंगे तो वे पलटकर कहेंगे आप इस समय बोल रहे हैं, मुसलमान मारे जा रहे हैं तब क्यों नहीं बोल रहे थे, फलां-फलां समय फलां –फलां मारा गया तब आप चुप क्यों थे, आपने हल्ला क्यों नहीं किया।आप उनको कहेंगे कि देखिए यह पैटर्न है हत्या का ,और अब तक 22 मुसलमान मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, तो वे कहेंगे हम इसमें क्या करें,हत्या हुई है तो कानून अपना काम करेगा,कानून को काम करने दें।कानूनी तंत्र जो कहे और जो करे उसकी मानें।आप ज्यादा बोलेंगे तो वे एक लंबी फेहरिश्त बताने लगते हैं और कहते हैं सैंकड़ों सालों से मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है उस समय के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते।

कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक हिंसा की जब भी कोई घटना होती है और आप संवाद करना चाहें तो साम्प्रदायिक लोग बहस को अतीत में ले जाते हैं, गैर-जरूरी ,अप्रासंगिक मसलों की ओर ले जाते हैं।इस क्रम में वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं,बार-बार वैज्ञानिक समझ और नजरिए को निशाना बनाते हैं,कम्युनिस्टों पर हमले करते हैं।

असल में साम्प्रदायिकता की बुनियादी लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति की अवधारणा से है। वे प्रगति को सहन नहीं कर पाते। विचारों से लेकर जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति को वे सहन नहीं कर पाते। यह सच है विगत 70साल में देश में प्रगति हुई है। अनेक कमियों के बावजूद प्रगति हुई है और यही प्रगति असल में आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर है।

हममें से अधिकतर लोग हिन्दुत्व की विचारधारा को शाकाहारी विचारधारा के रुप में देखते हैं। लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिकता या हिंदुत्व एकदम नॉनवेज विचारधारा नहीं है,बिना हिंसा के इसे चैन नहीं मिलता।सतह पर हिन्दुत्ववादी विचार बड़ा भोला-सीधा लगता है लेकिन आचरण में पूरी तरह अविवेकवादी है।समाज में अविवेकवादी होना पशुता की निशानी है लेकिन हमने कभी इस रुप में देखने की कोशिश ही नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि कारपोरेट घरानों या बुर्जुआजीके प्रति आम जनता में जितना गुस्सा बढ़ता है ठीक उसके समानांतर आरएसएस जैसे संगठन आक्रामक रुप में खड़े हो जाते हैं।बुर्जुआजी जब बेचैन,निराश और पराजय के दौर से गुजरता है तब ही आरएसएस जैसे संगठन प्रगतिशील विचारों,मजदूरों-किसानों के हितों पर हमला बोलते हैं,इसी अर्थ में मैंने कहा था कि संघ को प्रगति से नफरत है। वे मुसलमान से नफरत नहीं करते वे प्रगति और प्रगतिशील विचारधारा और प्रगतिशील वर्गों से नफरत करते हैं और कारपोरेट घरानों की वैचारिक-राजनीतिक सेवा करते हैं।

नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ सारे देश में जिस समय सबसे ज्यादा गुस्सा था,मनमोहन सिंह के खिलाफ देश में आंधी चल रही थी,कारपोरेट घराने और उनके विचारक जनता में अलग-थलग पड़ चुके थे ठीक उसी समय सांड की तरह आरएसएस सामने आता है और सभी किस्म के प्रगतिशील विचारों को पहला और आखिरी निशाना बनाता है और यही वह चीज है जो गंभीरता से समझने की जरूरत है।सवाल यह है आरएसएस इतना ताकतवर क्यों बना ॽ उसके कामकाज और राजनैतिक एक्शन किसकी वैचारिक मदद करते हैं ॽ



हम सब लगातार समाज में विवेकवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और चाहते हैं कि विवेकवाद को आम जनता के आम-फहम विचार की तरह पेश किया जाए,यह चीज बुर्जुआजी को नापसंद है और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर आरएसएस हमला करता है,आरएसएस के हमलों की धुरी है अविवेकवाद। इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आरएसएस को यदि किसी चीज की जरूरत है तो वह है अविवेकवाद।वे अपनी सांगठनिक और वैचारिक क्षमता के विकास और विस्तार के लिए अविवेकवाद का बहुआयामी इस्तेमाल करते हैं।आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि देश को अविवेकवाद की आंधी से कैसे बचाएं।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

नंगे का अर्थशास्त्र

         मोदीजी ने जब से नोटबंदी लागू की है,उसने हम सबके अंदर के डरपोक और अज्ञानी मनुष्य को एकदम नंगा कर दिया है।कहने के लिए हम सब पढ़-लिखे,शिक्षित लोग हैं लेकिन हम सबमें सच को देखने के साहस का अभाव है।सच कोई आंकड़ा मात्र नहीं होता,सच तो जीवन की वास्तविकता है और जीवन की वास्तविकता या यथार्थ को तब ही समझ सकते हैं जब जनता के जीवन को अपने मन,सुख और वैभव को मोहपाश से मुक्त होकर नंगी आंखों से देखें।

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है।

तकरीबन इसी तरह का नशा एक जमाने में नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय सारे मीडिया ने हम सबके मन में उतारा था,वह नशा कुछ कम हो रहा था कि अचानक मोदी अफीम के नशे में जनता को फिर से डुबो दिया गया है। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं जो नीति जनता के विवेक का अपहरण करके लागू की जाती है वह कभी भी जनहित में नहीं हो सकती। जनता के विवेक को दफ्न करके मोदीजी जिस नीति को लागू कर रहे हैं वह सारे देश के लिए समग्रता में विध्वंसक साबित होगी।

फिदेल कास्त्रो ने ऐसे ही नशीले माहौल को मद्देनजर रखकर कहा था ,´ हममें से जो विद्वान नहीं हैं उनको भी साहस की खुराक चाहिए। दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे अधिकाधिक जान लेने की कोशिश के बावजूद कभी-कभी हमारे पास यह जानने के लिए समय नहीं होता कि हम जिस अद्वितीय इतिहास प्रक्रिया से गुजर रहे हैं उसके बारे में क्या नए तथ्य और विचार उभरकर सामने आ रहे हैं और हमारे सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य कैसा होगा? ´

कालेधन को बाहर निकालने के प्रयास पहले भी विभिन्न सरकारों ने किए हैं,मोदीजी इस मामले में नया कुछ नहीं कर रहे। उन्होंने जो नया काम किया है वह है नोटबंदी।नोटबंदी से कालेधन वालों पर कोई खास असर नहीं होगा।यही वजह है कि उन्होंने नोटबंदी के 20दिन बाद अचानक स्वैच्छिक आय घोषणा योजना-2 की घोषणा की है उसके लिए आयकर कानून में कुछ संशोधन सुझाए हैं। ये संशोधन लागू हो जाने पर भी कालेधन पर कोई अंकुश नहीं लगेगा और कालाधन बाहर नहीं आएगा।

इस प्रसंग मे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था कम से कम कालेधन से नहीं चल रही,कालाधन समानान्तर अर्थव्यवस्था जरूर है लेकिन देश की मूल अर्थव्यवस्था नहीं है।मोदी सरकार आने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह हुई है कि मूल अर्थव्यवस्था पंगु हो गयी है।कहीं पर कोई परिणाम नजर नहीं आ रहे।बेकारी और विकास में कोई परिवर्तन नहीं आया।इससे ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार ने नोट नीति की घोषणा की और 500 और 1000 के नोट अमान्य घोषित कर दिए। अब समस्या यह है वे इस नोटबंदी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही,कालेधन के समर्थक आदि के तमगे लगा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं यह कौन सा अर्थशास्त्र है जिसमें सवाल नहीं खड़े कर सकते ॽ

मोदीजी ने जो नोट नीति बनायी है उस पर समानता के आधार पर विभिन्न मतों के अनुसार सवाल उठाने की इजाजत सरकार दे, नीति पर बहस की बजाय सरकार और मीडिया मिलकर नोट नीति के खिलाफ सवाल खड़े करने वालों को अपमानित कर रहे हैं ,सवाल उठाने को ही देशद्रोह और कालेधन की हिमायत कह रहे हैं।यह तो देश की प्रतिभा और जनतांत्रिक मतभिन्नता का अपमान है,यह तानाशाही है और अल्पविवेक का शासन है।

मोदीजी को मालूम होना चाहिए भारत में अर्थशास्त्र की बड़े पैमाने पर पढायी होती है और हमारे यहां सभी किस्म के मत पढाए जाते हैं,विभिन्न किस्म के मतों का अध्ययन करके आने वाले लोगों की यह पहली जिम्मेदारी बनती है कि वे नोट नीति पर खुलकर बोलें,विभिन्न राजनीतिक दलों की भी यह जिम्मेदारी है वे अपने मतों को खुलकर व्यक्त करें। मीडिया और सरकार दोनों मिलकर मतविभन्नता का गला घोंटकर खत्म कर देना चाहते हैं।यह पारदर्शिता का हनन है।



मोदी-मीडिया मिलकर प्रचार कर रहे हैं कि नीति के मामले में हर हालत में अनुशान पैदा करने की जरूरत है,नीति से विचलन और मत-भिन्नता मोदी के लेखे अनुशासनहीनता है,यह देशद्रोह है,कालेधन की सेवा है।इस तरह के तर्क बुनियादी तौर पर फासिस्ट तर्क हैं।किसी भी नीति पर बहस के लिए अनुशासन की शर्त लगाना गलत ही नहीं अ-लोकतांत्रिक भी है।पारदर्शिता और खुलेपन के लिए अनुशासन की विदाई करना पहली जरूरत है।सरकार ने जो नीति जारी की है तो उससे संबंधित सूचनाएं भी जारी करे,नीति पर विभिन्न दृष्टियों से बहस हो,विभिन्न विचारों की रोशऩी में नीति को परखा जाए,विभिन्न कसौटियों पर कसा जाए,यह किए बिना नोट नीति को सीधे लागू करना तानाशाही है। सब जानते हैं मीडिया पर सरकार का संपूर्ण वर्चस्व है और वह इस वर्चस्व का खुला दुरूपयोग कर रही है।नोट नीति लागू करते समय सरकार की शर्त है हमारी बात मानो,नहीं मानोगे तो देशद्रोही कहलाओगे।यह बुनियादी नजरिया लोकतंत्र विरोधी है।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मोदी सरकार की असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति-

            पीएम नरेन्द्र मोदी डर के मारे संसद में नहीं बोल रहे,डर के मारे बैंक पीड़ितों से नहीं मिल रहे, आत्महत्या कर रहे किसानों से नहीं मिल रहे,उनके अंदर का डर इस कदर हावी है कि रिजर्व बैंक को स्वायत्त ढ़ंग से काम नहीं करने दे रहे।इसके विपरीत राहुल गांधी एकदम निडर और निस्संकोच आम जनता में जाकर मिल रहे हैं,बैंक और एटीएम की लाइन में लगे लोगों से मिल रहे हैं,कर्ज से पीड़ित किसानों से मिल रहे हैं ।आंदोलनकारी पूर्व सैनिकों से मिल रहे हैं।लोकतंत्र में तानाशाह और लोकतांत्रिक नेता का अंतर देखना हो तो डर के पैमाने से देखो,डरा नेता जनता से दूर रहता है, हिटलर की तरह हमेशा सभा मंच पर नजर आता है जनता से दूर रहता है,जबकि लोकतांत्रिक नेता हमेशा जनता में नजर आता है।

जिस तरह आपातकाल ने उत्तरभारत में कांग्रेस की कमर तोड़ी थी वैसे ही नोटबंदी ने भाजपा की पूरे देश में रीढ़ तोड़ दी है। आपातकाल के लाभ विपक्ष ने उठाए उसी तरह नोटबंदी से पैदा हुई तबाही का लाभ विपक्ष को मिलना तय है। नोटबंदी के मायने हैं " नो अपील नो वकील और नो दलील" । यही आपातकाल का मोटो था।जिसे सुप्रीम कोर्ट में उस जमाने के महान्यायवादी ने व्यक्त किया था।

पी एम नरेन्द्र मोदी लगातार झूठ बोल रहे हैं,वे कह रहे हैं नोट बंदी का कुछ दिन तक ही बुरा असर रहेगा,सच यह है इसका बहुत ज्यादा दिनों, कई महिने और कई साल तक बुरा असर रहेगा।भारत की सारी दुनिया में इससे मट्टी पलीत हुई है।अब विदेशी पूंजी निवेश कम से कम भारत में निकट भविष्य में नहीं आएगा।सारी दुनिया जान गयी है भारत में इस समय ऐसा पीएम है जिसके पास स्नातक स्तर के ज्ञानधारी देशभक्त और नौकरशाह हैं।

सारी दुनिया में जितने पीएम हैं वे बेहतरीन शिक्षितों से विभिन्न पहलुओं पर सलाह करके नीति बनाते हैं लेकिन मोदीजी ज्ञानी और विद्वानों से कोसों दूर रहते हैं ,उनके पास नौकरशाह सलाहकार हैं,ये नौकरशाह सलाहकार अधिक से अधिक स्नातक हैं और इनकी कोई विशेष योग्यता नहीं है।इसके अलावा यह भी पता चला है कि नोट नीति बनाते समय कुछ ही लोगों से सलाह करके फैसला लिया गया,ये कुछ लोग कौन हैं यह भी सामने आना बाकी है,उनके काम करने की पद्धति वही है जो आपातकाल में श्रीमती गांधी की थी,वे चंडाल चौकड़ी से घिरी हुई थीं,सारे फैसले चंडाल चौकड़ी लेती थी, मंत्रीमंडल कागजी था,संविधान फालतू था।मोदीजी भी चंडाल चौकड़ी से घिरे हैं और वही देश को संचालित कर रही है।नोट बंदी का फैसला इसी चंडाल चौकड़ी ने लिया है।अखबारों में अभी जो नाम आ रहे हैं वे सब गलत हैं।असली नाम कुछ और हैं।नोट बंदी का फैसला न तो रिजर्व बैंक ने लिया है और न मंत्रीमंडल ने विस्तार से बहस करके लिया है,यह फैसला मूलतःपीएम का है और उसे सारे देश पर थोप दिया गया है। नियमानुसार यह फैसला संसद और रिजर्व बैंक को लेना था,लेकिन संसद को ठेंगे पर रखा गया है,रिजर्व बैंक को रबड़ स्टैम्प की तरह इस्तेमाल किया गया है।इस सबको नाम दिया गया सीक्रेसी का।

जो नीति सारे देश पर लागू होनी है उस पर सीक्रेसी की क्या जरूरत यह बात हमारी समझ में नहीं आती।यह कैसी नीति है जिस पर रिजर्व बैंक बहस न करे,संसद बहस न करे,मंत्रीमंडल में बहस न हो,देश में बहस न हो और देश से कह दिया जाए कि तुम नीति का पालन करो।यही तो अधिनायकवाद है।



नोट नीति के जरिए पीएम मोदी की जनता में पहलीबार प्रशासनिक दक्षता परीक्षा हुई और वे इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं।जबकि वे प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी के दावे पर वे लोकसभा का चुनाव जीतकर आए थे। इस नीति के पहले उनकी नीतिगत तौर पर जनता में कोई परीक्षा नहीं हुई थी,यहां तक कि जिन जनधन खाता धारकों के करोड़ों खाते खुलवाने का वे दावा करते हैं उसमें बैंक कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी,इसमें मोदीजी की प्रशासनिक क्षमता नजर नहीं आती,जिस तरह वे खाते खुले हैं,सारा देश जानता है, उनकी अक्षमता,मूर्खता और जनविरोधी भावनाओं को आम जनता में नंगा करके रख दिया है।कल राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विमुद्रीकरण की नीति को सटीक आलोचना करते हुए तबाही के जिस मंजर का खाका पेश किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।इसके विपरीत कल वित्तमंत्री अरूण जेटली की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर हमला करने वाली प्रेस कॉंफ़्रेंस देखकर यह विश्वास हो गया है कि मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है और असहिष्णुता के शिखर पर बैठी है। जेटली के बयान का मर्म यह था कि मनमोहन सिंह को बोलने का कोई हक नहीं है।क्योंकि उनके शासन में कालाधन आया , सबसे ज्यादा घोटाले हुए , वे महान पापी हैं! जो महान पापी हैं उनको मोदीजी जैसे चरित्रवान,ईमानदार, बेदाग़ नए कपड़े पहने वाले नेता की नीति की आलोचना करने का कोई हक नहीं है।मोदी जी इतने महान हैं कि विगत सत्तर साल में इस तरह का चरित्रवान और पुण्यात्मा कोई पीएम नहीं बना है! सच तो यह है उनसे बेहतर कोई पीएम न तो सोच सकता है और न बोल ही सकता है!!
मोदीजी महान हैं! क्योंकि वे संविधान के बंधनों से मुक्त हैं! हमेशा १२५ करोड लोगों के बंधन में बँधे रहते हैं। १२५ करोड लोगों की तरह ही सोचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं ,खाते हैं, रोते हैं!!उनके मन और तन में १२५ करोड़ मनुष्य वास करते हैं!करोड़ों जीव-जन्तु-पशु-पक्षी उनके हृदय में निवास करते हैं !
उनका मन मंदिर है और हृदय जंगल है।वे इस जंगल के बेताज बादशाह हैं। वे वैसे ही अक्लमंद हैं जैसे जंगल में पशु -पक्षी अक्लमंद होते हैं।जिस तरह १२५ करोड जनता कभी किसी अर्थशास्त्री से राय नहीं लेती जो मन में आए काम करती है मोदीजी भी ठीक वैसे ही काम करते हैं।यही वजह है मोदीजी महान हैं! मोदीजी की आलोचना वही कर सकता है जो उनके जैसा महान हो ! मनमोहन चूँकि मोदीजैसे महान नहीं हैं इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से दरकिनार करने की जरूरत है।रही बात संसद की तो संसद नक्षत्रों से भरी है उसमें मोदी जैसा सूर्य मिसफ़िट है। यही वजह मोदी जैसा सूर्य हमेशा संसद के बाहर ही चमकता है , कल पंजाब में दिखाई देंगे ।

बुधवार, 23 नवंबर 2016

मोदी एप सर्वे यानी फ़्रॉड का फ़्रॉड -

   

  नोटबंदी पर मोदी एप सर्वे में विपक्ष ने भाग नहीं लिया,सिर्फ भाजपा-आरएसएस ने इसमें भाग लिया, मोदीजी की साइबरमंडली-मीडिया मंडली ने जनमत जुटाने का काम किया और इसके बाद १२५करोड की आबादी में वे मात्र पाँच लाख लोगों की राय ही वे जुटा पाए, इससे एक बात साफ है कि अधिकांश भाजपाईयों ने इस सर्वे का बहिष्कार किया है, भाजपा यदि पूरी तरह दिलचस्पी लेती तो यह सर्वे कबीं ज्यादा बड़ी संख्या में लोगों की पाय जुटा पाता। 
       इस तरह के सर्वे की सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि सर्वे कर्ता मानकर चल रहा है कि सर्वे में जो लोग भाग ले रहे हैं वे कालेधन,भ्रष्टाचार और नोटबंदी के सभी पहलुओं से वाक़िफ़ हैं।जबकि सच इसके एकदम विपरीत है। अधिकतर लोगों की बात छोड़ दें सिर्फ ९नवम्बर से कल तक के अखबार उठाकर देखेंगे तो उपरोक्त विषयों से संबंधित बहुत कम सामग्री इनमें मिलेगी। इतनी कम जानकारी के आधार देश की महत्वपूर्ण नीति के बारे में जन समर्थन का दावा करना गलत है, अवैज्ञानिक है।
     सवाल यह है जिस व्यक्ति को नोट बंदी का बेसिक नहीं मालूम उसकी राय को सही कैसे कहते हैं ? स्वयं पीएम मोदीजी ने आज तक नहीं बताया कि नोटबंदी का फैसला उन्होंने कैसे और किस अधिकार से लिया? जबकि संवैधानिक तौर पर ने यह फैसला वे नहीं ले सकते। नोटबंदी का फैसला लेने का एकमात्र संवैधानिक हक रिजर्व बैंक के पास है और सच यह है कि रिजर्व बैंक ने नोटबंदी का फैसला नहीं लिया बल्कि रिजर्व बैंक पर मोदीजी ने अपना फैसला थोप दिया और आदेश दिया कि इसे लागू करो।यह कदम अपने आपमें असंवैधानिक है।
        मोदीजी अपने असंवैधानिक फैसले को छिपाने के लिए मोदी एप सर्वे का मुखौटे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह भी है मोदीजी ने स्वयं सर्वे क्यों किया ? कभी भी कोई नीति निर्धारक स्वयं सर्वे नहीं करता । तटस्थ संस्थाएँ सर्वे करती हैं ।उससे  जनमत की सही भावनाएँ सामने आती हैं। सर्वे के पहले जनमत को  विवादास्पद मसले पर शिक्षित किया जाता है उसके बाद राय ली जाती है, मोदीजी यह मानकर चल रहे हैं कि नोटबंदी पर जनता सब कुछ जानती है और उससे सीधे सवाल किए जाने चाहिए। हालात यह है कि स्वयं मोदीजी ने आज तक विस्तार से कालेधन और नोट नीति के संवैधानिक पहलुओं पर किसी भी पेशेवर पत्रकार के सवालों के सीधे जवाब नहीं दिए हैं, क्योंकि वे जानते नहीं हैं। सवाल यह है जब पीएम अपनी नीति के बारे में अज्ञानी हो तब आम जनता कैसे ज्ञानी हो सकती है? 

शनिवार, 27 अगस्त 2016

राष्ट्रवाद के अन्तर्विरोधों में फंसा अशांत कश्मीर

         कश्मीर को देखने के लिए राष्ट्रवाद की नहीं लोकतांत्रिक नजरिए की जरूरत है।भाजपा ऊपर से नाम संविधान का ले रही है लेकिन कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवादी नजरिए से हल करना चाहती है। राष्ट्रवाद के पास जातीय समस्या का कोई समाधान नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि भाजपा-आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैमाने से समाधान खोज रहे हैं वहीं आतंकी संगठन कश्मीरी राष्ट्रवाद के जरिए समाधान खोज रहे हैं लेकिन ये दोनों ही नजरिए अंततःहिंसा और अशांति की ओर जाते हैं। सारी दुनिया का अनुभव है कि उत्तर –औपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद आत्मघाती मार्ग है।

कश्मीर की जनता के इस समय दो शत्रु हैं पहला है कश्मीरी राष्ट्रवाद और दूसरा है हिन्दू राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद बुनियादी तौर पर हिंसा और घृणा की विचारधारा है।इसका चाहे जो इस्तेमाल करे उसे अंततःहिंसा की गोद में उसे शरण लेनी पड़ती है। राष्ट्रवाद को उन्मादी नारे और हथियारों के अलावा और कोई चीज नजर नहीं आती।कश्मीर की आजादी के नाम पर जो लोग लड़ रहे हैं वे आजादी के नाम पर कश्मीर को जहन्नुम के हवाले कर देना चाहते हैं।जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर युवाओं को कश्मीरी की आजादी का सही अर्थ तक नहीं मालूम ,यही हाल नेताओं का है।

विगत 70 सालों में हजारों मीटिंगें हुई हैं लेकिन कश्मीर की आजादी का अर्थ समझाते हुए कभी किसी दल ने कोई दस्तावेज आज तक भारत की जनता के सामने,संसद में पेश नहीं किया।कश्मीर की आजादी को कश्मीरी राष्ट्रवाद के हिंसक और अंतर्विरोधी फ्रेमवर्क में रखकर ही हमेशा पेश किया गया, इसके बहाने कश्मीर के अंदर जो धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकते हैं उनके खिलाफ माहौल बनाने की लगातार कोशिशें हुई हैं।दिलचस्प बात यह है कि कश्मीरी राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का संयुक्त मोर्चा मौजूदा राज्य सरकार को संचालित कर रहा है और सारी समस्या की जड़ यही मोर्चा है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के नारे ´जम्हूरियत कश्मीरियत और इंसानियत´में भी कश्मीरी राष्ट्रवाद को कश्मीरियत के नाम पर शामिल कर लिया गया है और मौजूदा प्रधानमंत्री उस नारे को बार-बार दोहरा रहे हैं,जबकि समस्या इसी समझ में है।कश्मीर की समस्या को यदि मोदीजी राष्ट्रवाद के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो समाधान कम और टकराव ज्यादा पैदा होंगे, अटलजी के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो वहां से भी हिंसक रास्ते ही खुलते हैं।इस दौर में जब भी जातीयता और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर राजनीतिक समस्याओं के समाधान खोजे गए हिंसा और टकराव ही पैदा हुआ।खालिस्तान के दौर में ´पंजाबियत´का हश्र हम हिंसा में रूपान्तरित होते देख चुके हैं।

कश्मीर को लोकतंत्र चाहिए ´कश्मीरियत´नहीं।कश्मीर को ´नागरिक´ भावबोध चाहिए ´कश्मीरी´भावबोध नहीं।जो लोग´कश्मीरियत´के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं वे पुराने अ-प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं।कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,इसमें वह इलाका भी आता है जो पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। कश्मीर की स्थानीय राजनीति में धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी कश्मीरियत को भुनाती रही हैं,इससे भी समस्याएं पैदा हुई हैं।

मूल प्रश्न यह है कि कश्मीर को लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य से देखें या राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य से ।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य ,चाहे वह देशभक्त हो या विभाजनकारी,अंततःजनता को अंधी भीड़ में तब्दील करता है। लोकतंत्र का परिप्रेक्ष्य कश्मीरी जनता के स्वायत्त और आत्मनिर्भर संसार को सृजित करता है।कश्मीर की समस्या पर संविधान के दायरे में कोई भी बातचीत होगी तो लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में ही होगी।हमारा संविधान राष्ट्रवाद को मंजूरी नहीं देता।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य अ-संवैधानिक है।

कश्मीर पर जब भी बातें होती हैं तो हिन्दू बनाम मुसलमान,पाक बनाम भारत,आतंकी बनाम राष्ट्रवादी,मुसलिम बहुसंख्यक बनाम हिन्दू अल्पसंख्यक या कश्मीरी पंडित आदि वर्गीकरण में रखकर देखते हैं।फलतः कश्मीर के बाशिंदों को हम नागरिक के रूप में देख ही नहीं पाते।बार-बार यही कहा जाता है कश्मीर में तो बहुसंख्यक मुसलमान हैं ,फलतः वहां आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का राजनीतिक रूतबा है। कायदे से हमें इस तरह के विभाजनकारी वर्गीकरण में रखकर कश्मीर को,वहां की जनता को नहीं देखना चाहिए.कश्मीर में भी भारत के अन्य इलाके की तरह मनुष्य रहते हैं,वे हमारे देश के नागरिक हैं,उनको धर्म ,जातीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर वर्गीकृत करके नहीं देखें।

कश्मीर की जनता को भीड़ में तब्दील करने में राष्ट्रवादी नजरिए की बड़ी भूमिका है।राष्ट्रवादी-आतंकी नजरिए का परिणाम है कि वहां पर आज जनता भीड़ की तरह आगे चल रही है और नेता उसके पीछे चल रहे हैं।लोकतंत्र में नेता जनता का नेतृत्व करते हैं लेकिन राष्ट्रवादी फ्रेमवर्क में भीड़ नेताओं का नेतृत्व करती है।यही वह आयरनी है जिससे निकलने की जरूरत है।



कश्मीर के निवासियों को हम अपने ही देश का नागरिक समझें,उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझें,पराए के रूप में देखना बंद करें।कश्मीर को पराए के रूप में देखने के कारण ही आज हालात यह हैं कि हमारी संसद भी ठीक से नहीं जानती कि कश्मीरियों की फिलहाल असल समस्याएं क्या हैं।हाल ही में संसद में कश्मीर के मौजूदा हालत पर जो बहस हुई उसमें विभिन्न दलों के नेताओं ने भाषण दिए,उन भाषणों में कश्मीरी जनता की अनुभूतियां,दुख-दर्द गायब थे,सिर्फ नारे थे,रेटोरिक था,लेकिन मर्मस्पर्शी भावबोध गायब था।इससे पता चलता है राजनीतिक नेतृत्व कश्मीर की जमीनी हकीकत से एकदम अनभिज्ञ है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

मुस्लिम विद्वेष के खतरे-

मुस्लिम विद्वेष देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है,हमारे देश में मुस्लिम विद्वेष हिन्दुत्ववादियों में रहा है तो मुसलमानों के हितों के पक्षधर मुसलिम लीग-पीडीपी टाइप दलों में भी है।यह विलक्षण संयोग है कि भाजपा-पीडीपी दोनों जम्मू-कश्मीर में संयुक्त सरकार चला रहे हैं,क्योंकि दोनों की विचारधारा है मुस्लिम विद्वेष।भाजपा अपने कारणों से मुसलिम विरोधी आचरण कर रही है, पीडीपी अपने पृथकतावादी-आतंकी प्रेम के कारण मुस्लिम विद्वेष का प्रदर्शन कर रही है।इस मुस्लिम विद्वेष के कारण ही लंबे समय से कश्मीर का मुसलिम समाज तबाह पड़ा हुआ है।
देश के अन्य इलाकों में विभिन्न बहाने बनाकर मुसलमानों पर ही हमले हो रहे हैं और इन हमलों के आयोजक और हमलावर हिन्दुत्व ब्रिगेड है।भारत को एक रखना है तो मुसलिम विद्वेष को खत्म करना जरूरी है।मुसलमानों के प्रति विद्वेष जहां एक ओर हिन्दुत्ववादी नेताओं के जरिए आ रहा है वहीं पर मुसलिम फंडामेंटलिस्ट भी यही काम कर रहे हैं।वे मुसलिमप्रेम की आड़ में मुसलमानों के लोकतांत्रिक हकों पर हमले कर रहे हैं।
देश में अमन-चैन कायम करने लिए मुसलिम विद्वेष को आम जनता के मन में से निकालने की जरूरत है।मुसलमानों को किसी भी तरह की मदद नहीं चाहिए,वे अपना विकास कर लेंगे,लेकिन कम से कम कृपा करके मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष फैलाना बंद करो।
मुसलिम विद्वेष को वैचारिक खाद-पानी हिन्दी का सिनेमा देता है,उसमें मुसलमानों का स्टीरियोटाइप चित्रण सबसे बड़ा वैचारिक शत्रु है । इसने मुसलमानों की सामान्य मनष्य की इमेज को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। हिन्दी फिल्मों ने मुसलमानों की जो इमेज हमारे जे़हन में उतारी है उसके कारण ही हम मुसलमानों से सहज ही नफरत करने लगते हैं,उनसे दूरी रखते हैं,संदेह करते हैं।
हमें मुसलमानों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा,उनको स्टीरियोटाइप ढ़ंग से,मीडियादृष्टि से देखना बंद करना होगा। हम याद रखें मुसलमानों को अशांत रखकर,उत्पीड़िित करके देश को शांत नहीं रखा जा सकता।मुसलमान के दर्द होगा तो सारे देश के दर्द होगा।मुसलमान हमारे देश का अभिन्न अंग हैं।हम उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह देखें और उनके साथ सामान्य आचरण करें।

शनिवार, 6 अगस्त 2016

दिल्ली नकली राज्य है !

      लोकतंत्र अपने विकास को संविधान से शुरू तो करता है लेकिन संविधान और जनता के बीच में द्वंद्वात्मक संबंध बनाते हुए ,इस क्रम में जनता की चेतना के साथ संविधान भी बदलता है,संविधान कोई जड़ या शाश्वत चीज नहीं है,वह भी परिवर्तनीय है,इसीलिए संविधान संशोधन करने पड़ते हैं।दिल्ली की जनता की चेतना आज १९५२जैसी नहीं है,दिल्ली की जनता बदली है, राजनीतिकचेतना बदली है,संविधान में उसकी संगति में आचरण करने के लिए संशोधन करो,दिल्ली को उसके हक दो।किसने कहा कि दिल्ली की जनता को कभी अपने सपने पूरे नहीं करने देंगे।घिन आती है ऐसी राजनीति से जो जनता के हकों पर डाका डाले। शोभा के पद और जनता के नेता के पद में अंतर करने की तमीज पैदा करो।

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संविधान में यदि कुछ ऐसा लिखा है जो जनता और मौजूदा समाज के अनुकूल नहीं है तो उसे बदलो, संविधान में वही प्रासंगिक है जो जनता के हकों में इजाफा करे।संविधान का मतलब सिर्फ सत्ता के हक ही नहीं होते। सत्ता और जनता के हकों में दिल्ली के संदर्भ में असंतुलन है,अनेक जनविरोधी संवैधानिक प्रावधान भी हैं,जिनको बदलना जरूरी है।दिल्ली की जनता इस समय संविधान की आड़ में चल रहे जनविरोधी खेल को समझ रही है,कांग्रेस और भाजपानेता इस खेल में नंगे हो चुके हैं।सारे देश को दिल्ली की अधिकारहीन जनता,अधिकारहीन मुख्यमंत्री के पक्ष में बोलना चाहिए।

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यह आयरनी ही नहीं जनता का अपमान है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री दैनिक मजूरी तक तय नहीं कर सकता!ऐसे संविधान को बदलो,जो अधिकारहीन बनाए! केन्द्रशासित क्षेत्र के नाम पर , संविधान की आड़ लेकर,अदालत की आड़ लेकर लोकतांत्रिक हकों और चुने गए मुख्यमंत्री पर हमले बंद हों,दिल्ली को स्वायत्तता दो,मुख्यमंत्री का मतलब उपराज्यपाल का गुलाम नहीं है,दिल्ली के विधायक गूंगे बहरे गुलाम नहीं हैं।कुछ तो शर्म करो,संविधान की आड में असंवैधानिक खेल बंद होना चाहिए,हमारे संविधान में अनेक चीजें हैं जो जनता के हकों के खिलाफ हैं,उन सभी को संविधान से विदा करो।संविधान पूजा के लिए नहीं जनता की सेवा के लिए है।

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दिल्ली को नकली दिल्ली कहो!जो जनता ने चुना नहीं,वो जनता पर शासन कर रहा है,जागो दिल्ली की जनता जागो!यह जनता का अपमान है कि जनता के चुने प्रतिनिधि अधिकारहीन हों और हम कहें कि ये दिल्ली के विधायक हैं,यह दिल्ली की विधानसभा है,ये दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं!

विधायक,विधानसभा, मुख्यमंत्री , जनता के हक,वोटर के हकों का अपमान देखना हो तो दिल्ली को देखो!

एक जमाने में ज्योति बसु ने कहा था हमारी विधानसभाओं को नगरपालिका से भी कम अधिकार प्राप्त हैं।दिल्ली सच में उसी अवस्था में है। जनता को अपमानित करना बंद करो।संविधान में दिल्ली को पूरे हक दो,जनता के हकों,विधायक,मुख्यमंत्री के हकों को दिल्ली के संदर्भ में नए सिरे से परिभाषित करो।संविधान की आड़ में जनता पर हमले बंद हों।

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दिल्ली विधानसभा और मुख्यमंत्री का पद अर्थहीन और झूठा पद है,यह जनता को भ्रमित करने के लिए दिये गए खोखले नाम हैं।ये नाम के रीयलसेंस को व्यक्त नहीं करते।मोदी -जंग के संयुक्त हमलों ने इस सत्य को उजागर करके केजरीवाल को रसद दे दी है,दिल्ली विधानसभा या मुख्यमंत्री अधिकारहीन हैं,अधिकार किसी को है तो वो है उपराज्यपाल ।फिर विधानसभा और मुख्यमंत्री नाम खत्म करो।महानगर पालिका घोषित करो दिल्ली को,मुख्यमंत्री को मेयर बनाओ।उपराज्यपाल पद खत्म करो,दिल्ली को सीधे केन्द्र चलाए।


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केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उस के केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।

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केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।जरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।में इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।Like

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नामवरजी के हिमायती राजनाथ सिंह-महेश शर्मा के बयानों पर चुप क्यों हैं ॽ

        नामवरजी की 28जुलाई के फैसले को जायज ठहराना किसी भी तर्क से उचित नहीं है।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में संघियों के जरिए अपना जन्मदिन मनवाकर नामवरजी ने अपने साम्प्रदायिकताविरोधी लेखन को मोदीजी के चरणों में समर्पित कर दिया है।आज ´सत्याग्रह´बेवसाइट पर अपूर्वानंद का लेख पढ़ा।पढ़कर मजा आ गया!!

नामवरजी विद्वान हैं,असाधारण हैं,लेकिन राजनीतिक तौर पर भटक गए हैं।यह बात पहचानने में देरी क्यों हो रही है ॽ नामवरजी की विद्वत्ता कम नहीं हो जाती यदि वे संघियों के साथ जन्मदिन न मनाते ! यह सिर्फ विद्वान का सम्मान नहीं है,यह मोदी सरकार द्वारा अपने लिए कवच-कुण्डल जुटाने की कोशिश है,अफसोस है उनको ये कवच-कुंडल ऐसे व्यक्ति से मिले हैं जो आलोचना में बेमिसाल है, साम्प्रदायिकता विरोध में उसका शानदार रिकॉर्ड रहा है,लेकिन सत्तामोह का भी शानदार रिकॉर्ड रहा है !

मोदीजी की सरकार आज गिर जाए और भविष्य में आने के चांस न हों और केजरीवाल के आने के चांस हों तो नामवरजी उसके हाथों सम्मान लेना पसंद करेंगे! लेकिन अभी उसकी आलोचना करते हैं! लोकसभा चुनाव में उन्होंने केजरीवाल की सीधे आलोचना की थी,यह तय उसी समय हो गया था कि नामवरजी किधर जा रहे हैं !

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कार्यक्रमों में शिरकत का सवाल प्रमुख नहीं है,सवाल है जन्मदिन किसके साथ मनाएं ॽ क्या फासिस्टों के साथ जन्मदिन मनाने की पहले कोई मिसाल नामवरजी ने कायम की है अथवा भारत में किसी मार्क्सवादी ने ॽ नामवरजी को इस रूप में पेश करना कि वे राजनीतिक चूक नहीं करते ,एकदम गलत है,राजनीति में नामवरजी ने साहित्य के बहाने हमेशा गलत दिशा पकड़ी है और वह दिशा तय हुई है सरकार से!

नामवरजी का राजनाथ सिंह और महेश शर्मा ने जिस तरह अ-सम्मान किया वह सम्मान से भी घटिया है जिसे अभी अपूर्वानंद देख नहीं पा रहे हैं।

नामवरजी हमेशा अपने पाले में रहते हैं,वे संघ में नहीं गए,वे कभी कांग्रेस में नहीं गए,वे कभी वीपी सिंह की पार्टी में भी नहीं गए,लेकिन नामवरजी अपने पाले में ही खड़े रहकर उनके साथ गए।इस समय भी नामवरजी अपने पाले में ही खड़े हैं,सवाल यह है नामवरजी के पाले की कोई राजनीति,लेखकीय नैतिकता आदि भी है या नहीं अथवा उसे भी अवसरवाद के हवाले कर दिया गया है ॽ नामवरजी ने विगत दो साल में जिस तरह अपने पाले की राजनीति परिभाषित की है और आचरण किया है वह स्वयं में प्रमाण है कि नामवरजी के पाले में संघ की राजनीति का असर है।राजनाथ सिंह के मंच से हमले ऐसे नहीं थे जिनका उत्तर नामवरजी नहीं दे सकते थे ,लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया।क्योंकि नामवरजी के पाले को आरएसएस ने परिभाषित किया! नामवरजी उस कार्यक्रम (28जुलाई2016)के बाद आज तक नहीं बोले कि राजनाथ सिंह और महेश शर्मा के बयानों पर उनकी क्या राय है,हम जानना चाहते हैं नामवरजी अब तक चुप क्यों हैं ॽ स्वयं अपूर्वानंद भी बताएं कि राजनाथ सिंह और महेश शर्मा के बयान पर उनका मंतव्य क्या है ॽदिलचस्प बात यह है अपूर्वानंदजी को भी इन दोनों मंत्रियों के बयानों में कोई आपत्तिजनक बात नजर नहीं आई ! इसे कहते हैं संघ का अप्रत्यक्ष असर !



मंगलवार, 26 जुलाई 2016

नामवरसिंह राजनाथ सिंह की जुगलबंदी और नामवरराग -

       कल तक कुछ लोग कह रहे थे कि नामवरजी तो इंदिरा गांधी कला केन्द्र सिर्फ भाषण देने जा रहे हैं,हमने कहा था नहीं वे मोदी की गोदी में जा रहे हैं।नामवरजी अकेले ही मोदी की गोदी में नहीं गए अपनी पूरी साहित्य टीम को लेकर गए हैं।यह वही साहित्य टीम है जो कल तक आरएसएस को लेकर सवाल कर रही थी लेकिन अब सारे सवाल गंगा के हवाले कर दिए गए हैं,अब एक ही नारा है नामवरजी महान हैं ! इस एक नारे में समूचा देश सिमट गया है। यह प्रगतिशील साहित्य की उस परंपरा का पतन है जो कल तक साम्प्रदायिकता को गाली देते नहीं थकती थी।
नामवरसिंह और उनकी मंडली के लेखकों का साम्प्रदायिकता विरोध से कोई लेना-देना नहीं था,साम्प्रदायिकता विरोध छलावा मात्र था।मोदीजी को इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने चंद लाख रूपये खर्च करके नामवरसिंह और उनकी साहित्य टीम के साम्प्रदायिकता विरोध के छद्म को नंगा कर दिया।
नामवरजी पर आरएसएसएस वाले जो कार्यक्रम करने जा रहे हैं,उसमें आरएसएस के दो बड़े नेता अतिथि हैं,केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह,मुख्य अतिथि होंगे, एक अन्य केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा विशिष्ट अतिथि होंगे। इस सत्र का विषय है –नामवर सिंह की दूसरी परंपरा,अन्य सत्रों में नामवर की सार्थकता समझाने के लिए नामवरजी की पूरी साहित्य टीम शामिल हो रही है इसमें प्रमुख हैं-काशीनाथ सिंह, निर्मला जैन,विश्वनाथ त्रिपाठी,केदारनाथ सिंह,मैनेजर पांडेय,विभूति नारायण राय,हरिमोहन शर्मा,एस.आर.किदवई आदि के अलावा अन्य भाषाओं के लेखकों को भी बुलाया गया है।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कश्मीर को यहां से देखो-

                  आतंकवादी वहां की जनता की आवाज नहीं हैं, वहां की लोकतांत्रिक ताकतें हैं जो सही आवाज हैं।मुश्किल यह है पीडीपी को महत्ता देकर सिरबिठा दिया है मोदी ने,वे ही उनको महत्व दे रहे हैं।राज्य और केन्द्र सरकार तुरंत निचले स्तर पर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुला रहे,किसने रोका है।पीडीपी चाहती है आतंकी विपक्ष में रहें।जबकि सब जानते हैं नेशनल कांफ्रेस के बिना कश्मीर में लोकतंत्र बचाने वाला और कोई दल नहीं है। उल्लेखनीय है विधानसभा –लोकसभा चुनाव में भाजपा- पीडीपी ने प्रति वोट एक हजार रूपया नीचे सप्लाई देकर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया है,पता करो यह पैसा किसने दिया। करोडों रूपया बांटा गया था,हर वोट पर एक हजार रूपया दिया गया है, लेकिन मीडिया में खबर तक नहीं है।हमारा अनुमान है भाजपा को यह पैसा बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों ने दिया था उसके बाद मोदीजी ने बड़े पैमाने शस्त्र समझौते ही किए हैं।

कश्मीर की जनता आजादी नहीं विकास और शांति चाहती है,आजादी तो आतंकी चाहते हैं।भाजपा वाले उसे हवा दे रहे हैं।मोदीजी के साथ पीडीपी ने विकास पर चुनाव लडा है वे जीते हैं विकास पर,हुर्रियत चुनाव नहीं जीती है।इसलिए हुर्रियत को न उछालें।विधानसभा चुनाव कौन जीता है इस पर सोचो,जीतने वाले ने क्या वायदे किए हैं,हुर्रियत ने चुनाव नहीं लड़ा,इसके अलावा आम जनता और आतंकियों में अंतर करो, जनता का एजेण्डा वह नहीं है जो आतंकियों का है। जनता ने कभी वोट का बहिष्कार नहीं किया,इससे समझ लो कि जनता लोकतंत्र और भारत चाहती है।

पृथकतावाद अपने एक्शन से खुद को तो नंगा करता है अन्य को भी खासकर साम्प्रदायिक ताकतों को भी नंगा कर देता है।कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के दिन से हम भाजपा की आलोचना कर रहे हैं।भाजपा का मानना है कि वे अपनी साम्प्रदायिक नीतियों के प्रभाव से पीडीपी को बदल देंगे, लेकिन हो उलटा रहा है,भाजपा लगातार पीडीपी के प्रभाव में काम कर रही है,उसके इशारों पर मोदी नाच रहे हैं।साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद के इस संयुक्त मोर्चे का कुफल कश्मीर की जनता भोग रही है।36निर्दोष मारे गए हैं,1500से ज्यादा घायल पड़े हैं।150 से ज्यादा की आँखें खतरे में हैं।समूचा पर्यटन का धंधा चौपट हो गया है।

मीडिया में लंबे समय से सेना को लेकर परम पवित्र भाव की आंधी चलायी जा रही है,यह बेहद खतरनाक चीज है। लोकतंत्र में सेना की भी समीक्षा होती है,आलोचना होती है,सेना को भी दण्डित किया जा सकता है। संघी मीडिया आंधी के बहाने सेना को विचारधारा विशेष की सेवा करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है।

सेना की लोकतंत्र में राजनीतिक भूमिका जीरो होती है।सेना की भूमिका देश की सरहदों पर है या विशेष अशांति की स्थिति में है,लेकिन इन सभी हालातों में सेना को राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।यह दुखद है कि सेना का किसी न किसी रूप में राजनीतिक असफलताओं को छिपाने या राजनीतिक समाधानों को स्थगित करने के लिए सत्ताधारीदलों ने निहित स्वार्थी ढ़ंग से हमेशा इस्तेमाल किया है।

इधर मीडिया में सेना को हिन्दू राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश करने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है।सेना पूर्व अधिकारी और इन दिनों संघ के संघी फाउंडेशन से जुडे बड़े पूर्व सैन्य अधिकारी सबसे घटिया ढ़ंग से राष्ट्रोन्माद पैदा कर रहे हैं,सेना को राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं और यह बेहद खतरनाक काम है,खासकर टीवी टॉक शो में सेना के पूर्व अफसरों के जरिए सेना को वैचारिक कवच पहनाने की ये गंदी हरकतें बंद होनी चाहिए।

सेना के पूर्व अधिकारियों का इराक-अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराने के लिए मीडिया के जरिए अमेरिका-ब्रिटेन और नाटो ने जमकर दुरूपयोग किया,ये पूर्व सैन्य अधिकारी अमूमन सफेद झूठ बोलते रहते हैं जिनको इन सैन्य अधिकारियों में सत्य दिखता है उनको इराक हमले पर हाल ही में आई ब्रिटिश जांच रिपोर्ट को पढ़ना चाहिए।पूर्व संघी सैन्य अधिकारी आमतौर पर मीडिया में उत्तेजक भाषा बोलते हैं,अशांति और झूठ के वक्ता के रूप में पेश आते हैं।इन सबको कायदे से बेनकाब करने की जरूरत है।

कश्मीर के सच को आतंकियों ,संघियों और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों और कारपोरेट मीडिया की नजर से देखना बंद करें।ये चारों तत्व मिलकर इस इलाके में अशांति बनाए रखना चाहते हैं।आतंकियों की सबसे ज्यादा मदद कौन कर रहा है ? पाक तो बहाना है ,असल में शस्त्र निर्माता कंपनियां कश्मीर को सुलगाए रखना चाहती हैं जिससे भारत में हथियारों की अबाध सप्लाई बनी रहे।इन कंपनियों के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों के गहरे संबंध हैं।इन दोनों दलों को इन कंपनियों से गुपचुप पैसा मिलता रहा है।कश्मीर में विगत विधानसभा-लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने वोटरों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था,यह पैसा कंपनियों ने शांति स्थापित करने के लिए नहीं दिया है।कश्मीर पर हो रही सारी बहस शस्त्र निर्माता कंपनियों की भूमिका की अनदेखी करके चल रही है,दिलचस्प बात है इन कंपनियों का पैसा अनेक स्तरों पर बंट रहा है।





शुक्रवार, 6 मई 2016

सोनिया विरोधी उन्माद और आरएसएस का खेल

          आरएसएस-पीएम मोदी एंड कंपनी मिलकर कांग्रेस-सोनिया गांधी-राहुल गांधी आदि के खिलाफ सुनियोजित ढ़ंग से झूठा प्रचार अभियान चलाए हुए हैं।आरएसएस की रणनीति यह है कि नियमित सोनिया गांधी के खिलाफ समाचार,स्कैंडल आदि मीडिया से लेकर संसद तक उछाले जाएं,इस काम में वे पेशेवर प्रचारकों,साइबर प्रचारकों , मीडिया संवाददाताओं और स्तंभलेखकों की मदद ले रहे हैं।इस पूरी षडयंत्रकारी योजना का लक्ष्य है देश की बुनियादी समस्याओं सूखा,कृषि संकट,पानी संकट,स्वास्थ्य,महंगाई,शिक्षा के आदि के बुनियादी सवालों से आम जनता को विमुख करना। इस काम के लिए सरकारी धन का तो दुरूपयोग हो ही रहा है साथ ही कारपोरेट फंड भी इस काम में इस्तेमाल हो रहा है।
संघ संचालित पत्रकार-नेता-चैनल इस तरह पेश आ रहे हैं गोया वे कोई महान चीज खोजकर लाए हैं।इस समूची प्रक्रिया मे सत्य का अनुसंधान करने की मानसिकता का मीडिया से लोप हो गया है।कोई भी संघी नेता कुछ भी बोल देता है और मीडिया उसे बिना किसी छानबीन के सीधे प्रकाशित कर देता है।वहीं आम जनता में इस तरह के कु-लेखन और कु-समाचारों को अनालोचनात्मक ढ़ंग से हजम करने की प्रवृत्ति को बल मिला है,पाठकों के एक बड़े वर्ग ने विवेक,तर्क और प्रमाण के आधार पर सोचना और देखना बंद कर दिया है,अब जो मीडिया में दिख रहा है वही प्रमाण है,इस मनोदशा ने समूचे मीडिया परिदृश्य को सोनिया विरोधी कु-खबरों से भर दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया में सोनिया गांधी के खिलाफ कु-खबरें भरी पड़ी हैं,संघी उछल-उछलकर हंगामे कर रहे हैं लेकिन किसी भी खबर का अनुसरण करके सोनिया गांधी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से मोदी सरकार भागती रही है। इस तरह निराधार खबरों,तथ्यहीन बातों और मीडिया प्रेशर के आधार पर सोनिया गांधी विरोधी उन्माद निर्मित किया जा रहा है।इस तरह के षडयंत्रकारी लेखन और प्रचार का जमकर विरोध किया जाना चाहिए। इस तरह के प्रचार का मूल लक्ष्य है लोकतंत्र को नष्ट करना,आम जनता के मन को अफवाह और तथ्यहीन खबरों से भरकर उन्मादी भीड़ के रूप में आरएसएस की मुहिम में इस्तेमाल करना।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कन्हैया कुमारः विभ्रम और यथार्थ

       कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू अध्यक्ष, काफी लंबे समय से छात्र राजनीति कर रहे हैं,लेकिन 9फरवरी 2016 की घटना ने उनको रातों-रात जेएनयू कैंपस के बाहर बेहद जनप्रिय बना दिया।इस घटना के पहले वह जेएनयू में जनप्रिय थे,लेकिन 9फरवरी की घटना के मीडिया कवरेज ने उनको राष्ट्रीय स्तर पर जनप्रिय बना दिया।इस जनप्रियता का श्रेय मीडिया,साइबर मीडिया और कन्हैया के वाम नजरिए को जाता है।कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वह पहले किसी वाम नेता ने नहीं बोला हो।इसके बावजूद किसी युवा वाम छात्रनेता को उतनी जनप्रियता नहीं मिली,जितनी कन्हैया कुमार को मिली।इस जनप्रियता के कारणों और प्रक्रिया की खोज की जानी चाहिए।

कन्हैया कुमार जो कुछ बोलता है, जिस मुहावरे में बोलता है वह वाम छात्र राजनीति की चिर-परिचित शैली है।इसे जेएनयूएसयू के किसी भी वाम छात्रनेता में सामान्यतौर पर देख सकते हैं।इसमें विलक्षण जैसी कोई चीज नहीं है।कन्हैया कुमार जब बोलता है तो सामान्य,सहज और जोशीली भाषा में बोलता है।यह खूबी वाम छात्रनेताओं की है।

उल्लेखनीय है युवा पीढ़ी नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं के भाषणों से विगत दो सालों से घिरी रही है,इस पीढ़ी ने कन्हैया कुमार में नएपन का अनुभव किया है।मोदी के केन्द्रीय राजनीति में आने के बाद उसके भाषणों का अहर्निश´फ्लो´ मीडिया और साइबर मीडिया के जरिए प्रवाहित हुआ है।यह सुनिश्चित, अनिवार्य और अपरिहार्य ´फ्लो´है जिससे सभी बोर हो चुके हैं,यह ´भाषण फ्लो´थमने का नाम नहीं ले रहा।जेएनयू और 9फरवरी की घटना को लेकर केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के नेताओं, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत आदि के अविवेकपूर्ण बयानों, आरएसएस और उसके प्रवक्ताओं की मीडिया मूर्खताओं ,कुतर्कों, ताबड़तोड़ हमला करके परास्त करने की शैली, कन्हैया कुमार आदि छात्रों को देशद्रोह के झूठे मुकदमे में पकड़वाने के षडयंत्र, और जेएनयू के बारे में जहरीले प्रचार अभियान ने हठात् कन्हैया कुमार की ओर सबका ध्यान खींचा है ।

मीडिया से लेकर साइबरमीडिया तक कन्हैया कुमार के भाषणों को बेहद सराहा गया,बहुत बड़ी संख्या में सुना गया।असल में,कन्हैया कुमार की लोकप्रियता की आग में घी का काम किया पीएम नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की विगत दो सालों की असफलताओं ने।यही वजह है कि कन्हैया कुमार के निशाने पर केन्द्र सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियां हैं।इसके अलावा आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर इसी दौरान जो आंदोलन शुरू किया उसने भी कन्हैया कुमार के लिए पर्याप्त ईंधन जुगाड़ करके दे दिया। आरएसएस और मोदी सरकार ने 9फरवरी की कैंपस स्तर की घटना को स्थानीय घटना की बजाय राष्ट्रीय घटना बना दिया और सारे मामले को जेएनयू कैंपस के बाहर संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद की मुहिम का प्रमुख अंग बनाकर पेश किया और यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी।यही वह मुख्य बिंदु है जहां से कन्हैया कुमार कैंपस के बाहर निकलता है और मीडिया से लेकर साइबर मीडिया तक नए संघ विरोधी-मोदी विरोधी आख्यान का नया नरेटिव बनाता है।

जबकि सच्चाई यह है जेएनयू छात्रसंघ और कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले लगातार अनेक मसलों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।इनमें प्रमुख हैं-पूना के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों के समर्थन में किया गया आंदोलन,यूजीसी के खिलाफ चलाया गया आंदोलन,हैदराबाद वि वि के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ चलाया गया आंदोलन।इन सभी आंदोलनों में जेएनयू के छात्रसंघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।इन सबमें कन्हैया कुमार की भी सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर कोई नहीं जानता था।लेकिन 9फरवरी की घटना और उसे लेकर मीडिया-संघ के हमले ने हठात् कन्हैया कुमार को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाकर खड़ा कर दिया।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले से सक्रिय था,लेकिन कैंपस तक जनप्रिय था। लेकिन 9फरवरी2016 की घटना ने उसे गुणात्मक रूप से भिन्न भूमिका में ले जाकर खड़ा कर दिया।आज कन्हैया कुमार सारे देश के छात्रों में बेहद जनप्रिय है।उसके बारे में आम लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं,उसे राष्ट्रीयनेता बना रहे हैं।लेकिन कन्हैया कुमार राष्ट्रीय नेता नहीं है,वह तो जेएनयूएसयू का अध्यक्ष है,छात्रनेता है,छात्र है।वह छात्र के रूप में ही फिलहाल रहना चाहता है।लेकिन जेएनयू प्रशासन ने संघ के इशारों पर काम करते हुए कन्हैया कुमार सहित 14छात्रों के खिलाफ 9फरवरी की घटना को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करके साफ कर दिया है कि उनका लोकतंत्र,संविधान और न्यायपालिका में कोई विश्वास नहीं है।जेएनयू प्रशासन के इस फैसले का हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।



शनिवार, 8 अगस्त 2015

संसद के रक्षक टीवी भांड



   टाइम्स नाउ टीवी चैनल पर वक्ताओं और एंकर अर्णव गोस्वामी की अ-लोकतांत्रिक चाल देखकर यही नज़र आ रहा है कि जनहितों के लिए संघर्ष करने वालों को एकओर मोदी सरकार से लड़ना होगा वहीं दूसरी ओर कारपोरेट न्यूज़ टीवी चैनलों के प्रायोजित टॉक शो और न्यूज़ प्रसारण से भी लड़ना होगा। आज अर्णव गोस्वामी जिस तरह सरकारीभोंपू की तरह बोल रहा था उसने डीडी न्यूज़ को भी लज्जित कर दिया, मज़ेदार बात यह है डीडी न्यूज़ पर मोदीभक्ती कम दिख रही है इसके विपरीत टाइम्स नाउ आदि निजी चैनलों पर सरकारभक्ति का नशा छाया हुआ है । 
  अर्णव गोस्वामी की बातों को सुनकर लग रहा था कि मोदी सरकार ढेर सारे विकासमूलक और भ्रष्टाचारविरोधी काम करना चाहती है लेकिन विपक्ष करने नहीं दे रहा ! यह अपने आप में बेबुनियाद तर्क है । संसद चले या न चले , इसे लेकर मोदी सरकार गंभीर नहीं रहे ।संसदीय गरिमा और संसद के प्रति मोदी सरकार न तो गंभीर है और न ज़िम्मेदार है। महंगाई, ग़रीबी, मिड डे मिल , ग़रीबों के लिए घर बनाने आदि कार्यों को लेकर गंभीर है तो उसे किसने काम करने से रोका है। यह सरकार अध्यादेश के ज़रिए काम करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि लोकतांत्रिक ढंग से शासन और संसद चले। लोकतांत्रिक ढंग से सरकार चल रही होती तो पीएम को सभी मंत्रालयों के फ़ैसले लेने का हक़ नहीं दिया जाता। मोदी की बुनियादी प्रकृति अ-लोकतांत्रिक और सर्वसत्तावादी है ।
      मोदी के सत्ता में आने के बाद से सब फ़ैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में लिए जा रहे हैं। यहाँ तक कि विदेश,गृह और वित्त मंत्रालय के पास भी कोई स्वायत्तता नहीं बची है । ऐसी स्थिति में पीएम मोदी को लोकतंत्र और विकास का पक्षधर बताना और यह कहना कि विपक्ष उसे काम नहीं करने दे रहा है , यह आरोप बेबुनियाद है। सच यह है मोदी किसी भी क़िस्म के लोकतंत्र और स्वायत्तता को अपने मंत्रियों तक को देना नहीं चाहते। हाल ही में नागा समझौते की घोषणा की गयी लेकिन इस काम में विदेश और गृहमंत्री ग़ायब थे, पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोई सलाह-मशविरा करना जरुरी नहीं समझा गया । यह सब ग़लत है ।
           मोदी यदि लोकतांत्रिक होते तो भूमि अधिग्रहण बिल बार बार अध्यादेश के ज़रिए लागू न करते। वे संसदीय समिति को पहले ही दिन अपना प्रस्ताव भेज सकते थे लेकिन उन्होंने यह सामान्य सा काम नहीं किया , ऐसी स्थिति में यह कहना कि मोदी सरकार लोकतांत्रिक ढंग से काम करना चाहती है, पूरी तरह ग़लत है। 
                संसद में विपक्ष ने लगातार प्रतिवाद करके सही क़दम उठाया है, इस तरह के प्रतिवाद संसद के उदय के समय से होते रहेहैं। जिस तरह लोकसभा स्पीकर ने कांग्रेस के सांसदों को थोक में संसद से निष्कासित किया है वह भी संसदीय नीति का अंग है। ऐसे में संसद चलेगी या नहीं यह तो सरकार को ही सुनिश्चित करना होगा। 
                  मोदी सरकार की मुश्किल है हठधर्मिता। सरकार तय कर चुकी है कि वह विपक्षी दलों की कोई माँग नहीं मानेगी, लेकिन इससे गतिरोध बढ़ेगा और हर स्तर पर टकराव भी बढ़ेगा । सरकार ने टकराव और हठधर्मिता के बल पर यदि देश चलाने का मन बना लिया है तो फिर विपक्ष बीच में कहाँ आता है । संसद बीच में कहाँ आती है, दनादन अध्यादेश  निकालकर सरकार काम कर सकती है । 

शनिवार, 30 मई 2015

संघ की खुराफाती हरकतें और राजनीतिक दुष्कर्म


            आरएसएस के संगठन निरंतर आक्रामक होते जा रहे हैं और खुलेआम राजसत्ता का अपने लक्ष्यों के विस्तार के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं। संघ का लक्ष्य है अ-लोकतंत्र की स्थापना करना और कारपोरेट लूट का माहौल बनाना। वह समाज सेवा के नाम पर खुराफाती राजनीति करने वाला संगठन है। सवाल यह है  आम जनता की आंखों में,खासकर मध्यवर्ग की आंखों में धूल झोंकने में यह संगठन कैसे सफल हो जाता है ? आंखों में धूल झोंकना इनकी पुरानी आदत है। इसके लिए वे हर किस्म का हथकंड़ा अपनाते हैं। धूल झोंकने की कला का लक्षण  है  कहो कुछ, करो कुछ,बोलो कुछ और करो कुछ।
      मसलन्, पीएम नरेन्द्र मोदी कहें मैं तो व्यक्ति,धर्म आदि की आजादी का पक्षधर हूँ ,लेकिन जमीनी स्तर पर उनसे जुड़ा संगठन व्यक्ति और धर्म की आजादी पर हमले करे,दंगों में भाग ले,हत्याकांडों में भाग ले, संवैधानिक हकों पर खुलेआम हमले करे तो सच कौन सा मानें ? भाषण वाला या एकेशन वाला ? समाज किससे चलता है भाषण से या एक्शन से ? जाहिर है जीवन में पहचान एक्शन से होती है भाषण और भाषा से नहीं।  मोदी और संघ को एक्शन के आधार पर देखो ,बयानों के आधार पर नहीं। सच भाषा में नहीं, बयान में नहीं.एक्शन में,यथार्थ में होता है। जब हंगामा होता है तो विभ्रम पैदा करने के लिए,आंखों में धूल झोंकने के लिए पुलिस कार्रवाई कर दी जाती है। इसके बावजूद संघियों के एक्शन जारी रहते हैं। जनता के जीवन पर संघियों के हमले जारी रहते हैं। संघी एक्शन में विश्वास करते हैं,भाषण में नहीं।   
     पीएम से लेकर मोहन भागवत तक अम्बेडकर की मूर्तियों पर माला पहना रहे हैं और अम्बेडकर की जय हो -जय हो कर रहे हैं। लेकिन व्यवहार में अम्बेडकर विरोधी कार्य कर रहे हैं,अम्बेडकर विरोधी एक्शन कर रहे हैं, अम्बेडकर के अनुयायियों पर हमले कर रहे हैं।
      सवाल यह है संघ कहां मिलेगा ? मोदी के बयान में या जमीनी संगठनों की हरकतों में ? संघ के जमीनी एक्शन देखें तो नरेन्द्र मोदी बहुत बौने और कमजोर पीएम नजर आते हैं। संघ की विचारधारा बेहद ताकतवर और अ-लोकतांत्रिक नजर आती है। टीवी टॉक शो में अमूमन भाजपा के प्रवक्ता या अन्य लोग पीएम मोदी के तथाकथित सदभाव बनाए रखने वाले बयानों का हवाला देते हैं, लेकिन पीएम मोदी के बयानों का न तो देश पर कोई असर हो रहा है और न संघ के खुराफाती संगठनों पर ही । स्थिति इस कदर बदतर हो चुकी है कि अब तो केन्द्रीय मंत्रालय भी संघ के खुराफाती संगठनों के इशारों पर काम करने लगे हैं। मद्रास आईआईटी के एक छात्रसमूह पर हाल ही में लगाया प्रतिबंध,पाठ्यक्रमों को बदलने की कोशिशें, आईआईटी की कार्यप्रणाली में दखलंदाजी की कोशिशें बता रही हैं कि संघ और मोदी  को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों में देखो, मोदी को काम करते आप पीएम हाउस में नहीं खुराफाती संगठनों में देखें तो बेहतर होगा। क्योंकि संघ के खुराफाती संगठनों का काम ही असल काम है, सरकार तो उनके लिए बहाना है। मोदी को पहचानना है तो मुख्यतौर पर संघ के संगठनों के कामों को देखें । सरकार के काम तो पूरक मात्र हैं।
        मोदी को 'महान' बनाने में गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उनके काम की भूमिका न्यूनतम है,उनकी असली इमेज तो संघ के जमीनी संगठनों की खुराफातों ने बनाई है,मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व का आधार सरकारी या संवैधानिक पद नहीं है,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के निर्माता हैं संघ के संगठन। मोदी को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों के आईने में देखो, वहीं पर रीयल मोदी नजर आएगा। संविधान के आईने में मोदी नजर नहीं आएगा। संविधान तो मोदी के लिए मृग मरीचिका है।    
     उल्लेखनीय है आरएसएस का तथाकथित सामाजिक संगठन का स्वरुप पूरी तरह राजनीतिक है।  यह वैसा ही सामाजिक संगठन है जैसे कि अन्य देशों में साम्प्रदायिक-पृथकतावादी –फंडामेंटलिस्ट संगठन होते हैं। सारी दुनिया का यह अनुभव है कि तमाम किस्म के इस तरह के खुराफाती संगठन खुलकर समाज सेवा करते हैं और उसकी आड़ में जमकर राजनीतिक दुष्कर्म करते हैं, तमाम किस्म का राजनीतिक व्यभिचार करते हैं।
      राजनीतिक व्यभिचार वह है जो इन दिनों कारपोरेट घरानों के पक्ष में संघ कर रहा है। राजनीतिक दुष्कर्म वह है जो इनदिनों आम जनता के जीवन में विभिन्न रुपों में हमले के रुप में सामने आ रहा है। संघ खुलकर किसानों के खिलाफ और कारपोरेट घरानों के पक्ष में मैदान में आ चुका है। सवाल उठता है संघ का लैंडबिल से क्या संबंध है ? वह तो सामाजिक संगठन है ! वह भूमि अधिग्रहण के पक्ष में मैदान में क्यों उतरा ? वह दावा करता है कि उसका काम है सामाजिक सेवा करना। लेकिन लैंड बिल के जरिए वह किसानों की जमीन हथियाने और किसानों को लूट के लिए तैयार करने के अभियान में जुट गया है। इसे समाजसेवा नहीं कहते , यह तो खुली और नंगी किसानविरोधी राजनीति है। यह किसानों के हितों पर संघ का हमला है।
    किसान पर हमले के रुप में ही हमें संघ की गऊवध विरोधी मुहिम को देखना चाहिए। किसान के लिए गाय पशुधन है। वह पुण्य या भगवानसेवा नहीं है। वह पशुधन का अपने कृषिकर्म में उपयोगी पशु और उत्पादन के औजार  के रुप में इस्तेमाल करता है। जिस तरह अनुपयोगी उपकरण को कंपनी या कारखानेदार निकालकर फेंक देता है वैसे ही किसान भी अनुपयोगी पशु को निकालकर फेंक देता है ,बेच देता है, उसका वध करके अन्य कामों में इस्तेमाल कर लेता है। पशुधन किसान के कृषिकर्म का उपकरण है, वह उसका साधन है, वह उसका लक्ष्य नहीं है, लेकिन संघ के लोग इस समूचे प्रसंग में गऊवध रोकने के नाम पर किसान की अर्थव्यवस्था पर ही हमला बोल रहे हैं।

       संघ की यदि जनांदोलनों में दिलचस्पी है तो उसे खुलकर अपना स्वरुप बदलकर मैदान में आना चाहिए। वे हर चीज को धर्म से जोड़कर पेश कर रहे हैं। गऊ को भी उन्होंने धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़ दिया है फलतः समाज में धार्मिक घृणा का भी विभिन्न रुपों में प्रचार होने लगा है। हर चीज को धर्म से जोड़ना खासकर हिन्दूधर्म से जोड़ना एकसिरे से अनैतिक और अनैतिहासिक है। गाय तो गाय के मालिक की संपत्ति है वह उसे पाले या खाए, यह फैसला करने वाला कानून कौन होता है और यह कौन सा शास्त्र है कि व्यक्ति की निजी संपत्ति पर संघ राजनीति करे , संघ को कोई हक नहीं है कि वह बोले कि गाय का मालिक गाय को पाले या मारे या बिक्री करे। गाय यदि निजी संपत्ति है तो उसके मालिक को हक होगा कि वह गाय का क्या करे,इसके बारे में अन्य किसी को कोई हक नहीं है कि वह तय करे कि गाय का क्या होगा। संघ के जो लोग गाय पालते हैं वे संघ की विचारधारा के अनुसार गाय पालें इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी ,लेकिन जो संघ की विचारधारा को नहीं मानते और नहीं जानते,वे किसान गाय के बारे में निजी तौर पर फैसला करें कि उनको गाय के साथ क्या करना है ।   

रविवार, 8 मार्च 2015

किसान के हक में

       किसान का नाम आते ही राजनीति का रोमांस गायब हो जाता है। किसान के सवाल आते ही राजनीति की वर्गीयबुनाबट खुलने लगती है। लोकतंत्र के विभ्रम टूटने लगते हैं। किसानों का नंदीग्रामप्रतिवाद हाल के वर्षों का ऐसा आंदोलन रहा है जिसने मनमोहन सरकार को पुराना भूमिअधिग्रहण कानून बदलने के लिए मजबूर किया था। जबकि पुराने कानून के तहत सारे देशमें तकरीबन दस लाख एकड़ जमीन विभिन्न सरकारें किसानों से छीनकर कारपोरेट घरानों कोसौंप चुकी थीं। नंदीग्राम आंदोलन ने वाम राजनीति को शिखर से लेकर नीचे तक बुरी तरहक्षतिग्रस्त किया। उस आंदोलन के बाद मनमोहन सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण कानूनबनाया था,जिसे पिछली संसद पास कर चुकी थी, नई मोदी सरकार को उसे लागू करना थालेकिन मोदी सरकार ने उसे लागू करने के पहले ही खत्म कर दिया और नया भूमि अधिग्रहणअध्यादेश जारी कर दिया,यह अध्यादेश क्या है इसके परिणाम क्या होंगे इस पर मीडियामें बहुत सार्थक और सटीक सामग्री और सूचनाएं आ रही हैं,यह किसानों के  पक्ष में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को सामनेलाता है। इस कानून के खिलाफ बृहत्तर राष्ट्रीय एकता भी बनती नजर आ रही है। जरुरतहै इस कानून के खिलाफ जनांदोलन तेज करने की । भाजपा के दुरंगेपन को नंगा करने की ।

     उल्लेखनीय है कि मनमोहनसरकार में निर्मित भूमि अधिग्रहण कानून को भाजपा ने पूर्ण समर्थन दिया था,यहां तककि संपूर्ण विपक्ष ने समर्थन दिया था, वह कानून संसद की आम सहमति से बना था, मोदीसरकार ने बिना किसी कारण के उस कानून को लागू करने के पहले ही खत्म करके नयाअध्यादेश जारी करके संसद का अपमान किय़ा है, राजनीतिक सहमति को तोड़ा है और इससे भीबड़ी बात यह है कि यह मसला भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में नहीं था। जो मसला चुनावघोषणापत्र में नहीं है उसे मोदी सरकार जोर-जबर्दस्ती से पास करना चाहती है । यदियह कानून इतना ही जरुरी था तो भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसका जिक्र क्यों नहींकिया ? मोदी ने अपने भाषणों में इस तरह का कानूनलाने की मंशा जाहिर क्यों नहीं की ?
        सवाल यह है मोदी सरकारइतने उतावलेपन से कानून क्यों बदलना चाहती है ? क्यादेश के कारपोरेट घराने देश में पैसा निवेश करने के लिए इतने बेचैन हैं कि उनकोरातों-रात देश की जमीन कौडियों के भाव पर सब कानून तोड़कर दे दी जाय ? हम जानना चाहते हैं कि भारत के कारपोरेट घरानों को विगत मनमोहन सरकारने जो जमीन आवंटित की थी क्या उस पर कारखाने लगाए गए हैं ? क्याजो जमीन भारत सरकार ने विकास के नाम पर किसानों से ली है उस पर काम हो रहा है ? यदि पुरानी जमीन खाली पड़ी है और कारपोरेट घराने वायदा नहीं निभा पाएहैं तो फिर नई जमीन हासिल करने के लिए वे बैचैन क्यों हैं ? हमारे देश में लाखों बीमार-बंद कारखाने हैं पहले उनको चंगा करने की ओरकारपोरेट घराने ध्यान क्यों नहीं देते ? वे नई जमीनें क्यों हड़पना चाहते हैं ?क्या जमीनें खरीद लेनेभर से विकास होता है ? क्या हाउसिंग सोसायटियों के बनाने सेदेश का विकास होगा ? क्या इससे देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी ? क्या किसान औरमजदूरों की उत्पादकता में बढोतरी होगी ?
    अब तक का अनुभव बताता है कि किसानों से विगत सरकारों के जरिए हथियाई गई दसलाख एकड़ से ज्यादा जमीन के बावजूद देश की उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं हुआ है।नए कारखाने बहुत कम इलाको में खुले हैं, अधिकतर सेज के इलाके सूने पड़े हैं । मोदीसरकार कम से कम सीएजी की रिपोर्ट को ही गंभीरता से देख लेती तो उसे सेज प्रकल्पोंकी दशा का अंदाजा लग जाता। लेकिन मोदी सरकार ने तो तय कर लिया है हर हालत में राष्ट्रीयसंपदा और संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंप देना है। इससे आरएसएस काहिन्दूमार्ग भी आसानी से समझ में आ सकता है। आरएसएस कहने के लिए राष्ट्रवादी होनेका दावा करता है लेकिन उनका हिन्दू नायक जब पीएम बनता है तो खुलकर किसानों औरगरीबों की संपदा पर डाकेजनी का कानून बनाकर पेश करता है। यह मजेदार तथ्य है किआरएसएस के नियंत्रण में केन्द्र सरकार के आने के बाद से सबसे खुशहाल हैं कारपोरेटघराने। कारपोरेट घरानों को जितना फायदा मिला है और उनकी संपदा में जिस तेज गति सेइजाफा हुआ है उसने संघ को कारपोरेट संघ में रुपान्तरित कर दिया है।
    हमें किसानों के पक्ष में बिना किसी संशय के सोचना चाहिए। किसान के मसलोंके लिए जो भी संगठन संघर्ष करें, जो भी नेता लड़े , हमें उससे सहयोग करना चाहिए।किसान के सवाल और खासकर किसान की जमीन को विकास के नाम पर हथियाने के सभी प्रयासोंको हर स्तर पर विफल करने की जरुरत है । मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेशवस्तुतः किसान और विकास विरोधी है। यह देश के साथ भाजपा की गद्दारी का आदर्शप्रमाण है। यह आरएसएस के दुरंगेपन का भी आदर्श प्रमाण है ।     

        

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

लोकतंत्र ,कुर्सी संघ और रसमलाई !



        लोकतंत्र में कुर्सीसंघ का जन्म हुआ है। कुर्सीसंघ का नया नारा है डिलीवरी और डिलीवरी ! कुर्सीसंघ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 11 केन्द्रीय मंत्री, 70 सांसद, प्रधानमंत्री, 1 सुपरकॉप, डेढ़ लाख संघ के तोते मैदान में उतारे हैं। कमाल का सीन बन रहा है ! दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में तोते और  बिल्लियां कभी मैदान में नहीं उतरी थीं। जहाँ देखो तोता जहाँ देखो बिल्ली ! तोते बोलते कम हैं और बिल्लियों का स्वभाव है डिलीवरी ! तोते कह रहे हैं हम न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं ! चमार हैं न कुम्हार हैं! हम तो बस तोते हैं! तोते आठ महिने में ख़ूब मोटे हुए हैं! उडते हैं तो सुंदर लगते हैं! बोलते हैं तो ध्यान खींचते हैं! वे कह रहे हैं कलरव ही जीवन है! 
       कुर्सीसंघ के सर्जक ने कहा है लोकतंत्र  के लिए तोते- बिल्लियाँ सबसे उपयुक्त पात्र हैं! लोकतंत्र लाना है तो तोते और बिल्लियों की मानो और मजे में रहो ! कुर्सी संघ का नारा है  डिलीवरी -डिलीवरी - डिलीवरी! टीवी टॉकशो -टॉक शो ! 
     दिल्ली में तोते - बिल्लियाँ और टीवीवाले समझा रहे हैं लोकतंत्र लाना है तो धरना मत दो, आंदोलन मत करो, नारे मत लगाओ,हडताल मत करो,  इंक़लाब की बातें मत करो, संविधान की बातें मत करो, संविधान में जो लिखा है वो रद्दी है !  दूध पियो और अमरूद खाओ!  महँगाई, ग़रीबी,बेकारी , कुपोषण, अज्ञानता, बलात्कार ,लोकतंत्र और संविधान की चेतना ये सब फ़ालतू चीज़ें हैं, असल चीज है टीवी टॉक शो  और रसमलाई !
          तोते कह रहे हैं बड़ी गद्दी परम सत्य! बड़ा तोता परम सत्य!  कुर्सी ही सत्य है !कुर्सी ही शिव है ! कुर्सी ही सुंदर है! कुर्सी ही सडक है! कुर्सी ही जीवन है! कुर्सी ही जलेबी है! कुर्सी ही रसमलाई है! कुर्सी पर बैठना है तो रसमलाई की चेतना पैदा करो! आंदोलन, धरना,माँगें, हडताल, कामगारों के हक, झुग्गी-झोंपड़ी वालों के हक , छात्रों के हक, औरतों के हक , ये सब बेमानी हैं !रसमलाई खाओ संघ के गुन गाओ!लोकतंत्र को समृद्ध बनाओ! बड़े तोते ने कहा लोकतंत्र में कुर्सी हो, तोते हों और बिल्लियाँ हों और रसमलाई हो! रसमलाई  बनानेवाले हों ! रसमलाई खानेवाले हों! लोकतंत्र में रसमलाई का ही तो कमाल है कि टाटा पैदा हुआ, अम्बानी पैदा हुआ, अदानी पैदा हुआ! रसमलाई की ही महिमा है कि ओबामा अमेरिका से दौडा चला आया और कहने लगा रसमलाई दो रसमलाई दो! सारी दुनिया मुग्ध है कुर्सीसंघ के इस कौशल पर कि उसने रसमलाई को राष्ट्रीय माल बना दिया! कल तक रसमलाई दुकान तक ही सीमित थी अब रसमलाई चुनाव मेनीफेस्टो तक फैल गयी है। रसमलाई का यह विस्तृत कैनवास एक ही माँग पैदा कर रहा है रसमलाई - रसमलाई! 




विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...