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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

सामूहिक सांस्कृतिक संपदा के निजीकरण के नायक बाबा रामदेव

    बाबा रामदेव को अभिताभ बच्चन के बाद सबसे बड़ा ब्रांड या मॉडल मान सकते हैं। वे योगी हैं और मॉडल भी। वे संत हैं लेकिन व्यापारी भी। वे गेरूआ वस्त्रधारी हैं लेकिन मासकल्चर के प्रभावशाली रत्न भी हैं। बाबा रामदेव ने योग की मार्केटिंग करते हुए जिस चीज पर सबसे ज्यादा जोर दिया है वह है योग का ‘प्रभाव’। वे अपने योग के सभी विवरण और ब्यौरों का प्रचार ‘प्रभाव’ को ध्यान में रखकर करते हैं। योग के ‘प्रभावों’ पर जोर देने का अर्थ है उनके वक्तव्य के विचारों की विदाई। वे बार-बार एक ही तरीके से विभिन्न आसनों को टीवी लाइव शो में प्रस्तुत करते हैं। उन्हें दोहराते हैं।
     बाबा रामदेव ने योग के उपभोक्ताओं को अपने डीवीडी,सीडी आदि की बिक्री करके, लाइव टीवी शो करके योग के साथ आधुनिक तकनीकोन्मुख भी बनाया है। वे योग को व्यक्तिगत उत्पादन के क्षेत्र से निकालकर मासप्रोडक्शन के क्षेत्र में ले गए हैं। पहले योग का लोग अकेले में अभ्यास करते थे,लेकिन बाबा रामदेव ने योग के मासप्रोडक्शन और जनअभ्यास को टेलीविजन के माध्यम से संप्रेषित किया है।
     योग का आज बाबा की वजह से मासप्रोडक्शन हो रहा है। यह वैसे ही मास प्रोडक्शन है जैसे अन्य वस्तुओं का पूंजीवादी बाजार के लिए होता है। मास प्रोडक्शन (जनोत्पादन) और जनोपभोग अन्तर्ग्रथित हैं।
    लोग सही ढ़ंग से योग सीखें ,इसके लिए  जरूरी है सही लोगों से प्रशिक्षण लें। सही लोगों को देशभर में आसानी से पा सकें इसके लिए जरूरी है मासस्केल पर योग शिक्षक तैयार किए जाएं। इसके लिए सभी इलाकों में योग प्रशिक्षण की सुविधाएं जुटायी जाएं और इसी परिप्रेक्ष्य के तहत बाबा ने योग के मासप्रोडक्शन और प्रशिक्षण की राष्ट्रीय स्तर पर शाखाएं बनायी हैं। बाबा के ट्रस्ट द्वारा निर्मित वस्तुओं के वितरण एजेंट हैं।और दुकानदारों की पूरी वितरण प्रणाली है । यह प्रणाली वैसे ही है जैसे कोई कारपोरेट घराना अपनी वस्तु की बिक्री के लिए वितरण और बिक्री केन्द्र बनाता है।
    बाबा रामदेव के प्रचार में व्यक्ति की क्षमता से ज्यादा योग की क्षमता के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया जा रहा है। यह मानकर चला जा रहा है कि योग है तो ऊर्जा है, शक्ति है। इसके आगे वे किसी तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। योग से शरीर प्रभावित होता है लेकिन कितना होता है ? कितने प्रतिशत लोगों को बीमारियों से मुक्त करने में इससे मदद मिली है इसके बारे में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुसंधान अभी तक सामने नहीं आया है। कायदे से बाबा के सदस्यों में यह काम विभिन्न विज्ञान संस्थाओं को करना चाहिए जिससे सत्य को सामने लाने में मदद मिले।
   बाबा रामदेव का टेलीविजन से अहर्निश स्वास्थ्य लाभ का प्रचार अंततः विज्ञानसम्मतचेतना फैला रहा है या अवैज्ञानिक चेतना का निर्माण कर रहा है,इस पर भी गौर करने की जरूरत है। भारत जैसे देश में जहां अवैज्ञानिकचेतना प्रबल है ,वहां पर बाबा रामदेव का प्राचीनकालीन चिकित्साशास्त्र बहुत आसानी से बेचा जा सकता है। बाबा ने चिकित्सा विज्ञान को अस्वीकार करते हुए पुराने चिकित्सा मिथों का अतार्किक ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। इस क्रम में बाबा ने चिकित्सा विज्ञान को ही निशाना बनाया है। उस पर तरह-तरह के हमले किए हैं।
    बाबा रामदेव ने मासकल्चर के फंड़े इस्तेमाल करते हुए योग और प्रणायाम के अंतहीन अभ्यास और इस्तेमाल पर जोर दिया है। योग करना,प्राणायाम करना जिस समय बंद कर देंगे। शारीरिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगेगा। अंतहीन योग-प्राणायाम का वायदा अंततः कहीं नहीं ले जाता।
    बाबा रामदेव का फंडा है योग शिविर में शामिल हो,योग के पीछे चलो ,वरना पिछड़ जाओगे। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं। जो योग के लिए खर्च कर सकते हैं,प्रतिदिन योग कर सकते हैं,उनके लिए शारीरिक उपद्रवों से कुछ हद तक राहत मिलती है। जो खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं,जो रोज योग-प्राणायाम करने की स्थिति में नहीं हैं वे बेचारे देख-देखकर कुण्ठित होते रहते हैं।
     जो खर्च करने की स्थिति में हैं वे खाते-पीते घरों के थके-हारे लोग हैं। इन खाए-अघाए लोगों की सामाजिक भूमिका और ,श्रम क्षमता में बढ़ाने में मदद जरूर मिलती है। ये वे लोग हैं जिन्हें भारत की क्रीम कहते हैं। जिनके पास नव्य उदारीकरण के फायदे पहुँचे हैं। इन लोगों में नव धनाढ़यों का बड़ा हिस्ला है। बाबा रामदेव की योग मार्केटिंग में ये सबसे आगे हैं। इन्हें ही बाबा ने निशाना बनाया है।
       बाबा रामदेव ने अप्रत्यक्ष ढ़ंग से कारपोरेट घरानों की सेवा की है यह काम उन्होंने चिकित्सा विज्ञान पर हमला करके किया है। हम सब लोग जानते हैं कि कारपोरेट पूंजीवाद अपने हितों और मुनाफों के विस्तार के लिए मेडीकल साइंस तक को नष्ट करने की हद तक जा सकता है। और यह काम नव्य उदारतावाद के आने के बाद बड़े ही सुनियोजित ढ़ंग से किया जा रहा है। सरकार की तरफ से ऐसी नीतियां अपनायी जा रही हैं जिनके कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सिकुड़ती जा रही हैं। आज भी हिन्दुस्तान की गरीब जनता का एकमात्र सहारा सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं हैं,लेकिन केन्द्र सरकार सुनियोजित ढ़ंग इन्हें बर्बाद करने में लगी है।
      दूसरी ओर फार्मास्युटिकल कंपनियां बीमारियों के उपचार पर जोर दे रही हैं ,वे सरकार पर दबाब ड़ाल रही हैं कि सरकार इस दिशा में प्रयास न करे कि बीमारी क्यों पैदा हुई ? सरकार बीमारियों को जड़ से खत्म करने की दिशा में न तो नीति बनाए और नहीं पैसा खर्च करे।  वे चाहते हैं बीमारी को जड़ से खत्म न किया जाए। वे बार-बार बीमारी की थेरपी पर जोर दे रहे हैं। वे बीमारी को जड़ से खत्म करने पर जोर नहीं दे रहे हैं।
     बाबा रामदेव के योग का भी यही लक्ष्य है उनके पास प्राचीनकालीन थेरपी है जिसे वे जड़ी-बूटियों और प्राणायाम के जरिए देना चाहते हैं। फार्मास्युटिकल कंपनियां यह काम अपने तरीके से कर रही हैं और बाबा रामदेव उसी काम को अपने तरीके से कर रहे हैं। इस क्रम में बाबा रामदेव और फार्मास्युटिकल कंपनियां बड़ी ही चालाकी से एक जैसा प्रचार कर रहे हैं।
    मसलन फार्मास्युटिकल कंपनियां किसी बीमारी की दवा के आश्चर्यजनक परिणामों के बारे में बताती हैं तो बाबा रामदेव भी अपने योग के जादू से ठीक होने वाले व्यक्ति को मीडिया में पेश करते हैं। हमारे देश में अनेक बीमारियां हैं जो आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के कारण पैदा होती हैं। बाबा के योग के पास उनका कोई समाधान नहीं है। मसलन बड़े पैमाने पर प्रदूषित जल के सेवन या स्पर्श के कारण जो बीमारियां पैदा होती हैं उनका योग में कोई समाधान नहीं है। शराब के सेवन या नशीले पदार्थों के सेवन से जो बीमारियां पैदा होती हैं ,उनका कोई समाधान नहीं है। शराब या नशे के कारण पैदा होने वाली समस्याओं को आप नशे की वस्तु की बिक्री बरकरार रखकर दूर नहीं कर सकते।
    थैरेपी के जरिए  सामाजिक क्रांति करने के सारी दुनिया में अन्तर्विरोधी परिणाम आए हैं। योग से संभवतः कुछ बीमारियों का सामान्य उपचार हो जाए। छोटी-मोटी दिक्कत कम भी हो जाए लेकिन इससे बीमारी रहित समाज तैयार नहीं होगा। सबल-स्वस्थ भारत तैयार नहीं होगा।
    बाबा के योग को पाने के लिए व्यक्ति को अपनी गांठ से पैसा देना होगा। आयुर्वेद का इलाज बाबा के अस्पताल में कराने के लिए निजी भुगतान करना होगा। बाबा मुफ्त में उपचार नहीं करते। यही चीज तो कारपोरेट घराने चाहते हैं कि आम आदमी अपनी इलाज पर स्वयं खर्चा करे और स्वास्थ्य लाभ करे,वे अपने तरीके से सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर मीडिया में हमले करते रहते हैं,बाबा रामदेव अपने तरीके से चिकित्सा विज्ञान की निरर्थकता का ढ़ोल बजाते रहते हैं। बाबा और कारपोरेट फार्मस्युटिकल कंपनियां इस मामले में एक हैं ,दोनों ही चिकित्सा को निजी खर्चे पर करने की वकालत कर रहे हैं।
   बाबा और कारपोरेट घरानों की स्वास्थ्य सेवाएं उनके काम की हैं जो इनमें इलाज कराने का पैसा अपनी गांठ से दे सकते हैं। जो नहीं दे सकते वे इस सेवा के दायरे के बाहर हैं। बाबा रामदेव और उनके अंधभक्त जानते हैं कि हिन्दुस्तान की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 20 रूपये पर गुजारा करती है उसके पास डाक्टर को देने के लिए सामान्य फीस तक नहीं होती।ऐसी स्थिति में बाबा का योग उद्योग किसकी सेवा करेगा ?
    फार्मास्युटिकल कंपनियों ने एंटीबायोटिक दवाओं का प्रचार करके समूचे चिकित्साविज्ञान को ही खतरे में डाल दिया है। दूसरी ओर बाबा रामदेव ने योग के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को निशाना बनाया हुआ है। दोनों का लक्ष्य एक है आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों को नष्ट करो। दोनों का दूसरा लक्ष्य है मुनाफा कमाओ। ये दोनों ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर आए दिन हमले बोलते रहते हैं।
   बाबा रामदेव और फार्मास्युटिकल कंपनियों के चिकित्साविज्ञान पर किए जा रहे हमलों के काऱण स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में असमानता और भी बढ़ेगी । हम पहले से ही आधी-अधूरी स्वास्थ्य सेवाओं के सहारे जी रहे थे लेकिन नव्य उदारतावादी हमलों ने इन सेवाओं को और भी महंगा और दुर्लभ बना दिया है।
    इस युग का महामंत्र है हर चीज को माल बनाओ। बाबा ने योग को भी माल बना दिया। बाबा की चिकित्सासेवाएं कमोडिटी हैं,पैसे दीजिए लाभ लीजिए। पैसा से खरीदने के लिए आपको निजी बाजार में जाना होगा। इसके कारण विगत कई दशकों से स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है।
    मजेदार बात यह है निजी स्वास्थ्य सेवाओं का जनता भुगतान करती है लेकिन फायदा निजी क्षेत्र को होता है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भुगतान जनता करती है तो मुनाफा भी जनता के खाते में जाता है। लेकिन निजी कारपोरेट स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर बाबा रामदेव की योग स्वास्थ्य सेवाओं तक भुगतान जनता करती है मुनाफा निजी कंपनियां और बाबा रामदेव की पॉकेट में जाता है। इस अर्थ में बाबा रामदेव ने योग को कारपोरेट मुनाफाखोरी के धंधे में तब्दील कर दिया है।
   ध्यान रहे नव्य उदारीकरण का यह मूल मंत्र है पैसा जनता का मुनाफा निजी कंपनियों का। सारी नीतियां इसी मंत्र से संचालित हैं और बाबा रामदेव का योग-प्राणायाम का खेल भी इसके सहारे चल रहा है।
   जिस तरह का हमला सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर कारपोरेट घरानों और बाबा रामदेव ने किया है उसका लाभ किसे मिला है ? उसका लाभ निजी कंपनियों और बाबा रामदेव के ट्रस्ट को मिला है। इससे राष्ट्र खोखला हुआ है। बाबा रामदेव के ट्रस्ट और निजी स्वास्थ्य कंपनियों के हाथों अरबों -खरबों की संपदा के जाने का अर्थ यह भी है कि अब हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे नहीं पीछे जा रहे हैं। समाज के अधिकांश समुदायों को बेसहारा छोड़कर जा रहे हैं। इनको मिलने वाले लाभ से राष्ट्र को कोई लाभ नहीं होने वाला,यह पैसा किसी नेक काम में ,विकास के किसी काम में खर्च नहीं होगा। यह स्वास्थ्यसेवाओं का व्यक्तिकरण है ,व्यवसायीकरण है। यह देशभक्ति नहीं है। पूंजी और मुनाफा भक्ति है। यह कारपोरेट संस्कृति है। यह भारतीय संस्कृति नहीं है। यह खुल्लमखुल्ला जनता के हितों के साथ गद्दारी है। यह जनता के साथ एकजुटता नहीं है।   
    स्वास्थ्य और बीमारी माल या वस्तु नहीं हैं। इन्हें पूंजीपतिवर्ग ने अपने मुनाफे के लिए माल या वस्तु में तब्दील किया है। बाबा का समूचा योग -प्राणायाम का कार्य व्यापार मुनाफे और माल की धारणा पर आधारित है। बाजार के  सिद्धांतों पर आधारित है। योग हमारी विरासत का हिस्सा रहा है। यह बाबा रामदेव का बनाया नहीं है। इसे सैंकड़ो-हजारों सालों से भारत में लोग इस्तेमाल करते आ रहे हैं। यह अमूल्य धरोहर है बाबा रामदेव ने इसे अपनी संपदा और मुनाफे की खान बनाकर जनता की धरोहर को लूटा है। बाबा रामदेव को परंपरागत योग को माल बनाकर बेचने और उससे अबाध मुनाफा कमाने का कोई नैतिक हक नहीं है। योग निजी बौद्धिक उत्पादन या सृजन नहीं है। वह भारत की जनता की साझा सांस्कृतिक संपदा है उससे कमायी गयी दौलत को बाबा को निजी ट्रस्ट के हवाले करने की बजाय राष्ट्र के हवाले करना चाहिए। क्योंकि योग पर उनका पेटेंट राइट नहीं बनता। ऐसी अवस्था में वे इससे मुनाफा अपने ट्रस्ट के खाते में कैसे डाल सकते हैं ?          
(उपरोक्त चित्र का योग और बाबा रामदेव के साथ कोई संबंध नहीं है)


मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

कारपोरेट मीडिया का चिली खनिक उद्धार नाटक

    चिली में खान में फंसे 33 खनिकों के उद्धार कार्य के व्यापक कवरेज को देखकर मेरे मन में सवाल उठा कि अहर्निश कारपोरेट घरानों का जयगान करने वाला ग्लोबल मीडिया,खासकर टेलीविजन चैनल अचानक दयालु और मानवीय हितों का कवरेज क्यों देने लगते हैं ? वे इस तरह के कवरेज के जरिए क्या बताना और क्या छिपाना चाहते हैं ? क्या वे यह बताना चाहते हैं कि वे मानवीय हितों के सवालों पर प्रतिबद्ध हैं ?   
       ग्लोबल मीडिया जब भी ऐसी किसी घटना का कवरेज देता है तो किसी बड़े यथार्थ को छिपाने या उस पर से ध्यान हटाने का काम करता है या फिर कारपोरेट घरानों की बर्बर इमेज को मानवीय बनाकर पेश करने की कोशिश करता है और यह उसका कारपोरेट पब्लिक रिलेशन का काम है। पब्लिक रिलेशन के काम के जरिए वह विचारधारात्मक संदेश भी देने का काम करता है। चिली के खान मजदूरों के उद्धार कार्य का कवरेज देकर ग्लोबल मीडिया ने यही काम किया है। यह उद्धार कार्य नहीं है बल्कि कारपोरेट पूंजीवाद को चमकाने और उसकी दयालु छवि पेश करने की कोशिश है। इसका खनिकों के हितों से कोई संबंध नहीं है।
     इस कवरेज के जरिए यह भी संदेश दिया गया कि यह उद्धार कार्य अपने आप में हीरोइज्म है। एक ही वाक्य में कहें तो यह एक नाटक था। बड़ा विश्वव्यापी नाटक था। चिली की खानों में मजदूरों का फंस जाना और वहीं पर दबकर मर जाना कोई नई घटना नहीं है बल्कि यह कारपोरेट पूंजीवादी विकास की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। जिस तरह की भयावह लूट कारपोरेट घरानों ने मचायी हुई है उसका यह अपरिहार्य परिणाम है।
इस प्रसंग में कुछ तथ्यों पर गौर करें,चिली की अर्थव्यवस्था में कॉपर एक तरह से सोना है। आप जितनी खानें खोदेंगे उतना ही मुनाफा कमाएंगे और उसी गति से दुर्घटनाएं भी होंगी। चिली में औसतन 39 खान दुर्घटनाएं प्रति वर्ष होती हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश की कोई रिपोर्टिंग ग्लोबल मीडिया नहीं करता। खान मालिक सभी कानूनों का उल्लंघन करते हैं उसकी भी रिपोर्टिंग नहीं करता। खान मालिकों के प्रति कारपोरेट मीडिया का किस तरह का रवैय्या है इस बात का आप सहज ही भारत के संदर्भ में अनुमान लगा सकते हैं कि वेदान्त के उडीसा स्थित प्रकल्प के पर्यावरण संबंधी कानूनी उल्लंघन की मीडिया ने कभी रिपोर्टिंग ही नहीं की।
     चिली में खानों का मालिकाना हक कारपोरेट घरानों के पास है। यह हक उन्हें तानाशाह पिनोचेट के जमाने में मिला था जो अभी तक बरकरार है। खान उत्खनन के कारण स्थानीय लोगों को बेइंतहा तकलीफें उठानी पड़ रही हैं जिनका मीडिया में कोई कवरेज नहीं है। इन खानों में आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं जिनकी कोई रिपोर्टिंग नहीं होती। लेकिन इसबार खनिकों के अंदर फंसे होने और उनके उद्धारकार्य का लाइव कवरेज जिस तरह दिखाया गया उसने सबका ध्यान खींचा है। वहां पर 33 खनिक खान में फंसे थे वह इलाका राजधानी सांतियागो के पास के ही एक उपनगर विला ग्रिमाल्दी में स्थित है।
      आश्चर्य की बात है इन खानों पर तानाशाह पिनोचेट के जमाने में कारपोरेट घरानों का कब्जा हुआ था जो चिली में वामपंथियों के शासन में आने के बावजूद अभी भी बरकरार है। पिनोचेट के बर्बर अत्याचारों को अभी भी चिली की जनता भूली नहीं है।
    जिस समय टीवी वाले उद्धार कार्य का कवरेज कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर मापुचा जाति के लोग अपने शोषण,उत्पीड़न और राज्य और कारपोरेट आतंक के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। जंगलात और खानों पर जिन कारपोरेट घरानों का पिनोचेट के जमाने में नियंत्रण स्थापित हुआ था उसका प्रतिवाद कर रहे थे। मापुचा जाति के लोगों को भयावह आतंक और शोषण की जिंदगी से गुजरना पड़ रहा है। उनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून का जमकर दुरूपयोग किया जा रहा है और स्टेट मशीनरी की ओर से उन पर हमले किए जा रहे हैं। इन सबके प्रतिवाद में मापुचा जाति के लोग 90 दिन से भूख हड़ताल कर रहे थे लेकिन मीडिया ने उसका कहीं पर भी कवरेज नहीं दिया।
   मापुचा जाति के लोगों पर कारपोरेट और स्टेट के संयुक्त हमले हो रहे हैं। आए दिन उनकी हत्या हो रही है,अपहरण हो रहे हैं और जबरिया दण्डित किया जा रहा है। लेकिन इसका मीडिया में कोई कवरेज नहीं है। हठात खान में फंसे 33 खनिकों का व्यापक कवरेज देकर मीडिया ने यह संदेश दिया है कि चिली के खान मालिक और राज्य का कितना बड़ा दिल है,वे कितने दयालु हैं।
   असल में इस कवरेज के बहाने चिली के कारपोरेट घरानों की अबाधित लूट और चिली के गरीब गांव वालों पर अहर्निश हो रहे अत्याचारों से ध्यान हटाने की कोशिश की गई है। उल्लेखनीय है पिनोचेट के शासन में आतंकवाद विरोधी कानून बनाया गया था वह आज भी लागू है और आम लोग ,खासकर ग्रामीण लोग उस कानून को खत्म करने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।
     यह बात सारी दुनिया जानती है कि चिली में एलेन्दे की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने और तख्तापलट में वहां के कारपोरेट घरानों और पिनोचेट का हाथ था। राष्ट्रपति एलेन्दे उस समय प्रतिक्रांतिकारियों से संघर्ष करते हुए राष्ट्रपति भवन की इमारत में अंतिम दम तक संघर्ष करते रहे और अंत में उन्होंने अपनी ही पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या की थी।
    पिनोचेट के शासनकाल में तानाशाही का जो बर्बर दौर चला उसका यादें आज भी रोएं खड़े कर देती हैं। पिनोचेट के शासन के बाद भी ग्रामीणों पर दमन की चक्की चल रही है और उसकी कोई खबर मीडिया नहीं देता। जिस समय उद्धार कार्य का कवरेज आ रहा था ,उससे कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर चिली के आतंकवादविरोधी कानून को खत्म करने की मांग को लेकर मापुचा जाति का आंदोलन चल रहाथा। वे 90 दिन से भूख हड़ताल पर थे। लेकिन मीडिया ने उसकी रिपोर्टिंग नहीं की।
   समस्या यह है खनिकों के उद्धार कार्य को कवरेज दिया जाए या उन लोगों को कवरेज दिया जाए जो चिली की खानों में अबाधित लूट मचाए हुए हैं और चिली की जनता का शोषण कर रहे हैं।जिसके कारण आए दिन खान दुर्घटनाएं हो रही हैं।
    चिली में किसी चीज से जनता मुक्ति चाहती है तो वह है बड़े कारपोरेट घरानों की लूट से। विश्व मीडिया चिली के कारपोरेट घरानों की लूट और आतंकी व्यवस्था पर चुप है और खनिकों के उद्धार कार्य का व्यापक कवरेज देकर खान मालिकों को दयालु और पुण्यात्मा बनाने में लगा है। यह कवरेज उसी पब्लिक रिलेशन का हिस्सा था। शोषण के लिए पब्लिक रिलेशन बर्बरता है,सभ्यता का अपमान है।यह असली खबर पर पर्दादारी है।











शनिवार, 4 सितंबर 2010

आर्थिकमंदी और लूट की राजनीति

      आर्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे हैं। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन आने वाले सुनहरे समय का सपना देख रहे हैं और आश्वासन पर आश्वासन देते रहे हैं लेकिन मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद ने भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की है। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जनत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
   मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का हाइपर नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्त व्यापार, मुक्त बाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके। 

रविवार, 4 जुलाई 2010

क्या भारत बंद के साथ मीडिया खड़ा होगा ?

भारत के कारपोरेट मीडिया और केन्द्र सरकार में एक समानता है कि ये दोनों झूठ बोल रहे हैं और एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं। मीडिया का सरकार का पूरक बन जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मौत है। सत्य के सार्वजनिक परिदृश्य से गायब हो जाने की शुरूआत है। कायदे से मीडिया को सत्य के साथ होना चाहिए। 
     एनडीए और वाममोर्चे ने 5 जुलाई का भारत बंद जिस सवाल को केन्द्र में रखकर बुलाया है वह आम जनता के हित का बड़ा सवाल है और केन्द्र सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़ाते समय सफेद झूठ कहा है। यह बंद केन्द्र के झूठ का प्रतिवाद है साथ ही जनता के हितों की हिमायत है। हमें इसे सफल करना चाहिए। सभी ब्लॉगरों को इस विषय पर लिखना चाहिए।
       इंटरनेट पर बैठे हुए आज अखबार देख रहा था और आश्चर्य हो रहा था कि भारत के अखबार भारत बंद जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक एक्शन पर चुप हैं। साधारण सी घटना पर हंगामा करने वाला मीडिया भारत बंद जैसी बड़ी घटना पर चुप रहे यह बात समझ में नहीं आती। 
     मीडिया की जन समर्थक भूमिका होनी चाहिए। टेलीविजन चैनलों से लेकर अखबारों तक सभी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे बताएं कि भारतबंद क्यों हो रहा है, किस मसले पर हो रहा है, उसके आधिकारिक तथ्य क्या हैं,जनता के हितों के साथ बंद का क्या संबंध है और इस बंद का राजनीतिक महत्व क्या है ,इत्यादि सवालों पर विभिन्न जनहित की दृष्टियों से विचार करें।
      भारत में कारपोरेट मीडिया को अपना मौजूदा जनविरोधी रवैय्या बदलना पड़ेगा। मीडिया की आदत है कि ज्यों ही कोई राजनीतिक पार्टी आंदोलन का रास्ता पकड़ती है वह आंदोलन पर हमले आरंभ कर देता है. आंदोलन का उपहास उड़ाना आरंभ कर देता है अथवा आंदोलन और जनता के बीच पैदा हुए कष्ट ,परेशानियों और मुसीबतों के बाइटस दिखाना आरंभ कर देता है। मीडिया को अपना यह नजरिया बदलने की जरूरत है। जनता के प्रतिवाद को कलंकित करना मानवाधिकारों का हनन है।
      आज हिंदुस्तान की जनता बेहद तकलीफ में है। पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़ाकर और उसे बाजार के हवाले करके मनमोहन सिंह सरकार ने सीधे आम आदमी के ऊपर हमला बोला है और इसके लिए झूठे तर्कों का सहारा लिया है।
   पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने के पीछे तर्क दिया गया है कि विश्व बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े हैं। यहां भी बढ़ेंगे। सरकार सब्सीडी देने की स्थिति में नहीं है। तेल कंपनियां बोझा उठाने की स्थिति में नहीं हैं। सरकार को भी अपना बजट घाटा कम करना है इसीलिए पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में बढ़ोतरी की गई है। यह भी कहा कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं अतः मूल्य वृद्धि जरूरी है। केन्द्र सरकार के ये सारे झूठे बहाने हैं।  
     पेट्रोलियम पदार्थों में जो बढ़ोतरी की गई है उसका भारत की सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। नए आदेश के तहत पेट्रोलियम पदार्थों को विनियमन करके बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया गया है। पेट्रोलियम पदार्थों पर से सरकारी नियंत्रण हटने गरीबों की तकलीफें और बढ़ेंगी। साथ ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को खुली लूट का मौका मिलेगा।
     यदि ऊर्जा और पेट्रोलियम पदार्थों पर से सबसीडी हटा दी जाएगी तो सारे देश में अराजकता फैल सकती है । आज स्थिति यह है कि पेट्रोल,डीजल,एलपीजी गैस और केरोसीन पर से सब्सीडी हटाने या कम करने का अर्थ है गरीब को और गरीब बनाना। उसे बर्बाद करना।
     भारत में इस समय 50 करोड़ लोग बिना बिजली के रहते हैं। साठ साल के विकास के दावों का यह ध्रुव सत्य है। 70 करोड़ लोग लकडी-कोयला आदि के चूल्हों पर निर्भर हैं। उसी पर खाना बनाते हैं। यही उनकी प्राइमरी ऊर्जा का आधार है। चालीस करोड़ लोग ऐसे हैं जो गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। यह वह आबादी है जिसके पास पेट्रोलियम पदार्थों को खरीदने की क्षमता ही नहीं है। कायदे से इन लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए लेकिन केन्द्र सरकार की नीतियों का रूख दूसरी ओर है।
      केन्द्र सरकार का तर्क है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर जितना खर्च हो रहा उतने की वसूली नहीं हो पा रही है। वे यह भी कह रहे हैं पेट्रोल,डीजल,गैस और केरोसिन को बड़ी मात्रा में सब्सिडाइज करना पड़ रहा है।
     केन्द्र सरकार के आंकडों के अनुसार सरकारी राशन की दुकानों से वितरित किए जाने वाले केरोसीन तेल पर 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 970,978 और 924 करोड़ रूपये की सब्सीडी दी गयी। इसके बदले में केन्द्र सरकार ने इन्हीं सालों में क्रमशः 17883, 19,102 और 28225 करोड़ रूपये बदले में सरकारी राशन की दुकानों के जरिए हासिल किए।
       इसी तरह एलपीजी गैस पर केन्द्र सरकार ने 2006-07, 2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 1554, 1663 और 1714 करोड़ रूपयों की सब्सीडी दी और बदले में इन्हीं वर्षों में उसने क्रमशः 10701, 15523 और 17600 करोड़ रूपये वसूल किए हैं। यानी केरोसीन और गैस पर कुल मिलाकर 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 2524, 2641 और 2688 करोड़ रूपये दिए गए और 2006-07,2007-08 और 2008-09 में मूल्य वृद्धि करके क्रमशः 28584,34625 और 45825 करोड़ रूपये वसूले गए।
     इसी तरह डीजल के क्षेत्र में 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 18776, 35166 और 52286 करोड़ रूपये , पेट्रोल में 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 2027, 7332 और 5181 करोड़ रूपये वसूले गए।
     संक्षेप में कहें तो समग्र सबसीडी और वसूले गए धन की राशि 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 51911, 79764 और 105980 करोड़ रूपये आंकी गयी है। ये आंकड़े पेट्रोलियम मंत्रालय के द्वारा तैयार किए गए हैं। इन आंकडों से सरकार के इस दावे का खंडन होता है कि पेट्रोलियम पदार्थों की सबसीडी के कारण दाम बढ़ाए गए हैं। केन्द्र सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के बताए तथ्य यह बताते हैं कि कोई भी सरकारी तेल कंपनी घाटे में नहीं चल रही है। 
     मीडिया के जरिए एक मिथ यह भी गढ़ा गया है कि भारतीय लोग पेट्रोल डीजल के कम दाम देते हैं और ज्यादा दामों पर सरकार के उन्हें विदेशों से मंगाना होता है। इस प्रसंग में दिए गए सारे तर्क गलत और झूठ पर आधारित हैं।
     केन्द्र सरकार का तर्क है कि वह गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों को सबसीडी देगी लेकिन जो गरीब हैं या अतिगरीबी की रेखा के ऊपर रहते हैं उन्हें सब्सीडी नहीं देगी। सवाल यह है कि बीपीएल या अतिगरीबी के तहत आने वाले कितने लोग हैं जो एलपीजी गैस का प्रयोग करते हैं ? इसी तरह किसानों को सब्सीडी कम करने की बात भी कही जा रही है और कहा जा रहा है कि किसानों को ज्यादा कृषि उपज मूल्य देकर उनकी लागत की भरपाई की जाएगी। लेकिन मझोले और हाशिए के किसानों का क्या होगा ? सच यह है 44 प्रतिशत लोगों के पास बिजली अभी तक नहीं पहुँची है इस वर्ग के लोगों को सब्सीडी बंद कर देने से गरीब और गरीब हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में जो बढ़ोतरी की गई है उसका आधार है कीर्ति पारिख कमेटी की सिफारिशें और ये सिफारिशें गरीबों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। हम सभी को भारत बंद को सफल बनाना चाहिए और विपक्षी दलों को टिकाऊ ढ़ंग से दीर्घकालिक आंदोलन का कार्यक्रम बनाकर मैदान में आना चाहिए। भारत बंद केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन का आरंभ है अंत नहीं है।  






रविवार, 14 मार्च 2010

चीन के साइबर जासूसों के निशाने पर राष्ट्रपति हू जिन ताओ

चीन की भारत में जो लोग झूठी प्रशंसा करते हुए नहीं थकते वे जान लें कि चीन में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। मैं गूगल के सर्च में गया और जानना चाहता था कि चीन के राष्ट्रपति हू जिन ताओ आखिर किस हाईस्कूल में पढ़े थे , गूगल वालों के सर्च में सूचना आई कि आप जिस शब्द को खोज रहे हैं वह कानूनन वैध नियमों,कानून और नीतियों की सूची में नहीं आता। किंतु चीन के ब्लॉगर जाल में हू जिन ताओ जिस हाईस्कूल में पढ़े थे उसके निम्न फोटो मिले हैं-

(हू जिन ताओ हाईस्कूल का दृश्य)
(हू जिन ताओ स्कूल में जहां बैठकर पढ़ते थे )
(अपनी कक्षा में दूसरी पंक्ति में दाँए से प्रथम हू जिन ताओ) 



  

चीन में बच्चों का रौरव नरक

एक जमाना था समाजवाद में बच्चों की पूरी देखभाल राज्य करता था इन दिनों ऐसा नहीं है। इन दिनों चीन ने कारपोरेट पूंजीवाद की ओर जो छलांग लगाई है उसने चीनी आबादी के एक हिस्से को गरीबी में ठेल दिया है। गरीबी और भुखमरी का ही आलम यह है कि 5-6 साल के लाखों बच्चे चीन की सड़कों पर अखबार बेच रहे हैं। यह फोटो हमें चीनी ब्लॉग पर मिले हैं।   







बुधवार, 5 अगस्त 2009

अमीरों की टैक्‍स चोरी और असहाय सरकार

केन्‍द्रीय वि‍त्‍त राज्‍यमंत्री एस.एस. पलानीमनि‍कम ने कल राज्‍यसभा में कहा है कि‍ 100 बड़े उद्योग घराने और कंपनि‍यां हैं जि‍न्‍होंने अपना टैक्‍स अदा नहीं कि‍या है। टैक्‍स का पैसा इन घरानों और कंपनि‍यों से कैसे वसूल कि‍या जाए, इसके बारे में संबंधि‍त वि‍भागों से जल्‍दी कार्रवाई करने को कहा गया है। जि‍न कंपनि‍यों ने टैक्‍स अदा नहीं कि‍या है वे वस्‍तुत: कर चोरी के ही दायरे में आती हैं। इसके बावजूद उनके प्रति‍ केन्‍द्र सरकार का अब तक रूख सहानुभूति‍पूर्ण रहा है।

मंत्री महोदय के बयान में बताया गया है कि‍ देश की सौ कंपनि‍यों के पास 1.41 लाख करोड़ का टैक्‍स बकाया है। यह साधारण राशि‍ नहीं है। बल्‍कि‍ यह असाधारण राशि‍ है। यह राशि‍ ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा)के लि‍ए सालाना आवंटि‍त राशि‍ से तीन गुना ज्‍यादा है। इससे एक तथ्‍य तो यह साफ होता है कि‍ जो कंपनि‍यां और अमीर लोग अथवा कारपोरेट दि‍ग्‍गज हमारे समाज में हैं वे सबसे बड़े टैक्‍स चोर हैं। ईमानदारी और पारदर्शि‍ता के साथ उनका कोई संबंध नहीं है। दूसरा संदेश यह नि‍कलता है कि‍ कारपोरेट संस्‍कृति‍ के नाम पर जो संपत्‍ति‍शाली लोग दि‍ख रहे हैं उनके पास अपनी ईमानदारी की कमाई का पैसा बहुत कम है। उनके पास संपत्‍ति‍ का जो वैभव संसार नजर आता है उसमें सार्वजनि‍क संपत्‍ति‍ की लूट और टैक्‍स चोरी से हासि‍ल कि‍या गया धन ज्‍यादा है।

राज्‍य मंत्री ने राज्‍यसभा में जि‍न कंपनि‍यों और कारपोरेट अमीरों के नाम संसद में बताए हैं ,वे इस प्रकार हैं, अकेले हसन अली पर पचास हजार करोड़ का टैक्‍स बाकी है। टैक्‍स चोरों की सूची में टाटा,सहारा ग्रुप की कंपनि‍यां,सहारा एयरलाइन ग्रुप (अब जेट एयर लाइन), कोकाकोला, बेरो इंटरनेशनल,ऑरकेल कारपोरेशन,रॉलेक्‍स होल्‍डिंग ,आदि‍त्‍य लग्‍जरी होटल्‍स,रि‍लाएंस एनर्जी, बीएसएनएल,एनटीपीसी,एसबीआई, नॉकि‍या,देबू मोटर्स, बुंगी लि‍मि‍टेड,टाटा इंडस्‍ट्रीज,सत्‍यम कम्‍प्‍यूटर्स,आईबीएम आदि‍ कंपनि‍यों के नाम प्रमुख हैं।

कारपोरेट घरानों का टैक्‍स चोरी का रि‍कॉर्ड और केन्‍द्र सरकार का उनके प्रति‍ नपुंसक रूख इस बात पर यकीन नहीं दि‍लाता कि‍ इन कंपनि‍यों से टैक्‍स वसूली हो पाएगी। आम जनता में इन टैक्‍स चोर कंपनि‍यों के बारे में व्‍यापक जनजागरण अभि‍यान चलाकर केन्‍द्र सरकार और उसके अधीन कर वसूलने वाले वि‍भागों के अधि‍कारि‍यों को दबाव में लाना चाहि‍ए।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

कारपोरेट लूट के नए मसीहा

पहले झूठ बोलो। अति‍रंजि‍त सपने पैदा करो। अति‍रंजि‍त सपनों के बहाने सस्‍ते श्रम का दोहन करो। बाजार,बैंक,राज्‍य,संस्‍कृति‍,राजनीति‍,मीडि‍या आदि‍ का अति‍रंजि‍त सपने को वैध बनाने के लि‍ए इस्‍तेमाल करो और फि‍र कुछ समय बाद फि‍र संकट पैदा होने पर बचाओ बचाओ की दुहाई दो और फि‍र आर्थि‍क मदद और आर्थि‍क सहूलि‍यतों की मांग करो। इस तरह की पद्धति‍ के जरि‍ए कारपोरेट घरानों ने भूमंडलीकरण की सामयि‍क प्रक्रि‍या के दौरान सभी देशों में जबर्दस्‍त लूट मचायी है। भारत में नि‍जी एयर लाइंस कंपनि‍यों के द्वारा आर्थि‍क पैकेज की मांग भी उसी बृहत्‍तर प्रक्रि‍या का हि‍स्‍सा है।

कारपोरेट घरानों ने एक नया पैंतरा चला है अब वे आर्थि‍कमंदी के बहाने उद्योगों के लि‍ए आर्थि‍क पैकेज की मांग करने लगे हैं और सरकार ने अपनी दरि‍यादि‍ली का परि‍चय देते हुए लोकसभा चुनाव के ठीक पहले तकरीबन दो लाख करोड रूपये के दो आर्थि‍क सहायता पैकेजों की घोषणा भी की थी। अब वि‍भि‍न्‍न नि‍जी एयर लाइंस कंपनि‍यां अपने लि‍ए आर्थि‍क पैकेज की मांग कर रही हैं उन्‍होंने धमकी दी है अगर ऐसा नहीं होता तो वे आगामी 18 अगस्‍त को अनि‍श्‍चि‍तकालीन हडताल पर चले जाएंगे।

केन्‍द्र सरकार ने आर्थि‍क मंदी का बहाना लेकर पहले ही कारपोरेट घरानों को दो लाख करोड रूपये से ज्‍यादा की आर्थि‍क मदद का पैकेज दि‍या हुआ है । इस पैकेज का नि‍चले स्‍तर तक जनता कोई लाभ नहीं मि‍ला है। कारपोरेट घरानों के प्रति‍ केन्‍द्र सरकार की दरि‍यादि‍ली का ही आलम है कि‍ लोकसभा चुनाव के परि‍णाम आने के बाद से मंहगाई सातवें आसमान पर पहुंच चुकी है,कालाबाजारी करने वालों के खि‍लाफ कोई भी एक्‍शन नहीं लि‍या गया है और सारा देश एकसि‍रे से कालाबाजारि‍यों के रहमोकरम पर जिंदा है।

नि‍जी एयर लाइंस कंपनि‍यों का दावा है कि‍ उन्‍हें सन् 2009 में दस हजार करोड रूपये का घाटा उठाना पडा है। इस प्रसंग में पहली बात यह है कि‍ अगर कोई कंपनी व्‍यापार करती है तो जि‍स तरह उसका मुनाफे होता है ,वैसे ही उसका घाटा भी होता है। जो मुनाफा कमाएगा वह घाटा भी उठाएगा। इन कंपनि‍यों की सबसे बुरी बात यह है कि‍ ये कंपनि‍यां केन्‍द्र सरकार के द्वारा जब भी हवाई ईंधन के दाम घटाए गए तो उन्‍होंने उसका लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया। दूसरी सबसे बडी समस्‍या यह है कि‍ केन्‍द्र सरकार यदि‍ कारपोरेट घरानों को घाटे के कारण यदि‍ आर्थि‍क पैकेज देती है तो उसे आम नागरि‍कों को भी राहत देने के बारे में सोचना चाहि‍ए। मसलन् छठे वेतन आयोग की सि‍फारि‍शों के आधार पर नए वेतनमान लागू हो रहे हैं किंतु इनकम टैक्‍स वसूली का पुराना पैटर्न और नि‍यम बरकरार है जि‍सके चलते कर्मचारि‍यों के लि‍ए नया वेतनमान बेमानी होकर रह गया है। वास्‍तव अर्थों में कर्मचारि‍यों की आय में कोई वृद्धि‍ नहीं हुई है। कारपोरेट लूट के इस दौर में यह सवाल भी कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ यदि‍ ये कंपनि‍यां बेशुमार घाटे में चल रही थीं तो इनके मालि‍कों की पूंजी में बेतहाशा वृद्धि‍ कैसे होती रही है।

नि‍जी एयरलाइन कंपनि‍यों के बारे में दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि‍ केन्‍द्र सरकार ने समस्‍त आलोचनाओं को दरकि‍नार करके वायु सेवाओं का नि‍जीकरण करके अंतत: सरकारी वायुयान कंपनि‍यों को पूरी तरह बर्बाद कर दि‍या और आज स्‍थि‍ति‍ यह है कि‍ सरकारी वायुयान कंपनि‍यां बंद होने के कगार पर हैं, सवाल यह है कि‍ यदि‍ आर्थि‍क उदारीकरण इतना ही अच्‍छा था तो हवाई सेवा के क्षेत्र में इतनी तबाही क्‍यों मची हुई है। कारपोरेट घराने पहले बेहतर सेवा के नाम पर समस्‍त सरकारी सुवि‍धाओं का कौडी के भाव पर लाभ उठाते रहे और अब यह मांग कर रहे हैं कि‍ उन्‍हें और भी सुवि‍धाएं दी जाएं यह एक तरह से सरकारी संपत्‍ति‍ को लूटने का मामला है और इसके खि‍लाफ जमकर प्रति‍वाद कि‍या जाना चाहि‍ए।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...