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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- अफीम का व्यापार

            कार्ल मार्क्स का प्रसिद्ध निबंध है "अफ़ीम का व्यापार" ,यह न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में 25सितम्बर 1858 को छपा था।इस निबंध में मार्क्स ने भारत-चीन में अफीम के व्यापार के साथ ब्रिटिश शासन के अन्तस्संबंध पर प्रकाश डाला है।

मार्क्स ने लिखा है-" विषय के इस पहलू पर विचार करते हुए हम ईसाई मत तथा सभ्यता की दुहाई देने वाली ब्रिटिश सरकार के एक निन्दनीय आत्मविरोधी स्वरूप का उल्लेख किये बिना नहीं रह सकते।एक साम्राज्य की सरकार होने के नाते वह दिखावा तो यह करती है कि उसे अवैध अफ़ीम व्यापार से कोई सरोकार नहीं,और उसका निषेध करने वाली सन्धियों पर हस्ताक्षर भी कर देती है।परन्तु भारत की सरकार के नाते वह बंगाल में जबरदस्ती अफ़ीम की काश्त करवाती है,जिससे उस देश की उत्पादक शक्तियों को बहुत बड़ा नुकसान पहुँचता है.पोस्त की काश्त करने के लिए वह भारतीय रैयतों के एक भाग को बाध्य करती है,तो दूसरे भाग को पेशगी पैसे देकर उसमें फंसाती है।वह इस विनाशकारी द्रव्य को बड़े पैमाने पर तैयार करने का एकाधिकार अपने हाथ में रखे हुए है।उसने सरकारी गुप्तचरों की फ़ौज इस काम पर लगा रखी है कि वे पोस्त की काश्त करने,उसे निश्चित स्थानों पर पहुँचाने,उसे चीनी उपभोक्ताओं की रूचि के अनुसार गाढ़ा और तैयार करने,उसे पेटियों में बन्द करने,जो लुक-छिपकर आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जायी जा सके,और अन्त में उसे कलकत्ते में पहुंचाने की निगरानी करें जहां सरकारी माल के तौर पर अफीम की नीलामी की जाती है और सरकारी अफ़सर उसे सट्टेबाजों के सुपुर्द कर देते हैं,उनसे यह अवैध व्यापारियों के हाथों पहुँचती है जो उसे चीन ले जाते हैं।"

मार्क्स ने अंत में लिखा" वास्तव में,ब्रिटिश सरकार के भारतीय वित्त न केवल चीन के साथ अफ़ीम व्यापार पर ,बल्कि उस व्यापार के अवैध स्वरूप पर आश्रित बना दिये गये हैं। "


"अफ़ीम का व्यापार "( न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून ,20सितम्बर,1858)नामक एक अन्य निबंध में मार्क्स ने मान्टगोमरी मर्टिन का उद्धरण दिया है,यह बहुत ही महत्व का है।मोन्टगोमरी ने लिखा , "अफ़ीम व्यापार की तुलना में दास व्यापार अधिक दयालु था।हम अफ्रीकियों के शरीर का नाश नहीं करते थे,क्योंकि उन्हें जीवित रखने में हमारा हित था।हम उनके आचार को भ्रष्ट नहीं करते थे,उनके मनों को कलुषित नहीं करते थे।परन्तु अफीम बेचनेवाला उन अभागे पापियों की नैतिकता को भ्रष्ट,दूषित तथा मटियामेट करने के बाद उनके शरीर का भी हनन करता है।हर घड़ी एक ऐसे दैत्य के सामने नये नये लोगो की बलि चढ़ाई जा रही है,जो कभी भी तृप्त नहीं होता,और उसके मन्दिर में भेंट चढ़ाने के लिए हत्यारे अंग्रेज और आत्म-हत्या करनेवाले चीनी एक दूसरे से होड़ कर रहे हैं।"

शनिवार, 20 सितंबर 2014

इमेजों के विभ्रम में कैद मोदी

       नरेन्द्र मोदी के लिए चीन के राष्ट्रपति की यात्रा काफी असुविधाजनक रही है। इस यात्रा के दौरान मोदी इमेज युद्ध में ढ़ीले पड़ गए। पराजित भी हुए। मोदी फोटो सचेत रहे जबकि चीन के राष्ट्रपति ने अपने को स्वाभाविक रखा।मोदी की नजर कैमरे पर थी लेकिन चीन के राष्ट्रपति की नजर मोदी पर थीं।लगता है मोदी के सलाहकारों ने ठीक से कैमरा अभ्यास नहीं कराया या फिर मोदी सही ढ़ंग से सीख नहीं पाए।
फोटोसचेत नेता निष्प्रभावी होता है। इमेज युद्ध में जीनेवाले की इमेजों में ही विदाई होती है। वह आनंदमय क्षण था कि मोदी जब चीन के राष्ट्रपति से मिल रहे थे! साथ ही वे अपना विलोम भी रच रहे थे! लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने इमेजों के जरिए "नायक" को रचा था!लेकिन चीन के राष्ट्रपति से मिलते हुए वे नायक कम फोटो सचेतक ज्यादा नजर आए। उनके कायिक इमेज संसार में सहजता-सरलता और स्वाभाविकता एकसिरे से नदारत थी और इसने मोदी की इमेज को नुकसान पहुँचाया है।इससे भारत की इमेज पर भी बुरा असर पड़ा है। हमें संदेह है कि मोदी के व्यक्तित्व से चीन के राष्ट्रपति प्रभावित हुए होंगे!
नेता कूटनीतिक क्षणों में मुसकराते हैं ,दांत नहीं दिखाते! मोदी भूल ही गए कि दाँत दिखाते हुए हँसना राजनयिक सभ्यता का उल्लंघन है।दूसरी भूल यह हुई कि वे बे-मौसम हँस रहे थे, कूटनीति गंभीर कार्यव्यापार है,यह बच्चों की हँसी -ठिटोली नहीं है!
मोदी को अपनी कायिक भाषा को रुपान्तरित करना होगा। उनका अनौपचारिक भाव इमेजों के जरिए विलोम रच रहा है। राजनयिक भावबोध के समय परंपरा ,सहजता ,नियम और सभ्यता का ख्याल रखा जाना चाहिए। भारत में इमेजों को लोग नहीं पढ़ते लेकिन चीन में पढ़ते हैं, चीन में मोदी का इमेज संदेश अच्छा नहीं गया है।मोदीजी आगे अमेरिका जाने वाले उनको कूटनीति के अनुरुप इमेज बनाने पर ध्यान देना होगा,वरना कैमरा उनको कहीं का नहीं छोड़ेगा।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

चीन में कैमरों में कैद जनता



    एक जमाना था समाजवाद और पूंजीवाद का जनता के प्रति भिन्न रवैय्या होता था। कम्युनिस्टों और बुर्जुआ नेताओं और दलों का जनता के प्रति भिन्न नजरिया होता था। हमने यह भी देखा है कि बुर्जुआ नेता अपने को आम जनता के बीच असुरक्षित महसूस करते थे। मसलन हिटलर कभी युद्ध के मोर्चे पर अकेले नहीं गया वह अपने ही सैनिकों से भयाक्रांत रहता था। वहीं दूसरी ओर एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे की ओर स्टालिन अकेले ही सैनिकों का उत्साह बढ़ाने का काम कर रहे थे।
      हमारे यहां पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की कितनी ही गलतियां रही हों लेकिन यहां पर वीआईपी कहे जाने वाले नेता आराम से बगैर किसी सुरक्षा व्यवस्था के निर्भय होकर घूमते रहते हैं। उनके लिए कहीं पर भी कोई खतरा नहीं है। न नेता जनता पर अविश्वास करता है और न जनता नेता से भयाक्रांत रहती है। किसी भी मंत्री,एमपी,एमएलए के पास कोई सुरक्षा पुलिस नहीं है। सभी साधारण जनता की तरह रहते हैं। इसके विपरीत देश के अन्य राज्यों में वीआईपी नेताओं के लिए असुरक्षा का वातावरण है। वे बिना सुरक्षाकर्मियों के कहीं भी आ जा नहीं सकते। ऐसे में ममता बनर्जी का यह कहना कि माकपा ने मुझे लालगढ़ में मारने की योजना बनाई है, व्यर्थ का आरोप है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा है और इस हिंसा  की बागडोर फिलहाल ममता और माओवादियों के हाथ में है। इससे भिन्न फिनोमिना चीन में देख सकते हैं।
   चीन के उइगूर प्रांत में देख सकते हैं। एक साल पहले इस प्रांत में हन और उइगूर जाति के बीच भयानक दंगे हुए। ऐसे दंगे चीन के इतिहास में कभी नहीं हुए थे। उस समय इन दंगों में 167 लोग मारे गए थे और हजारों लोग घायल हुए थे।
    आज उरूगई इलाकों में चीन सरकार ने 47 हजार से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगा दिए हैं,कोई भी इलाका नहीं छोड़ा है जहां के बारे में रीयल टाइम में खबर प्रशासन के पास न पहुँचे। निकट भविष्य में 60 हजार कैमरे और लगाए जाने हैं। अब  प्रत्येक इलाके, गली, घर, चौराहे पर कैमरा चौकीदारी कर रहा है जिससे कोई आश्चर्यजनक प्रतिवाद की घटना न हो जाए।
     चीन में प्रशासक वैसे ही जनता से डरे हुए  हैं जैसे पश्चिम में शासक डरे रहते हैं। कैमरों के जरिए जनता को नियंत्रित करना पश्चिम में रूटिन चीज है। लेकिन किसी कम्युनिस्ट देश में जनता पर अहर्निश निगरानी निश्चित रूप से चिन्ता की बात है। इससे यह भी पता चलता है कि चीन के कम्युनिस्ट अपने को आम जनता में असुरक्षित महसूस करते हैं। समाजवादी देश में नेता यदि अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं तो यह निश्चित रूप से पतन का लक्षण है।
    समूचे चीन में 70 लाख से ज्यादा कैमरे जनता पर अहर्निश चौकीदारी कर रहे हैं। सन् 2014 तक 15 मिलियन अतिरिक्त कैमरे और लगा दिए जाएंगे। यह ऑरवेलियन नजरदारी और नियंत्रण की धारणा का सामाजिक रूपान्तरण है। यह समाजवाद नहीं वर्चुअल समाजवाद है। इसमें सभी असुरक्षित और बेगाने हैं।                       







मंगलवार, 6 जुलाई 2010

साइबरयुग में प्रतिक्रांति के नए रूप

     साइबरयुग में प्रतिक्रांति के तरीके वे ही नहीं हैं जो शीतयुद्ध के जमाने में थे। साइबरयुग की केन्द्रीय उपलब्धि है समाजवाद का अंत। इस अंत को संभव बनाने में समाजवादी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों के आंतरिक कलह ,भ्रष्टाचार,बर्बर व्यवहार की प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन सारी दुनिया में सूचना क्रांति और साइबर संस्कृति के प्रसार ने समाजवाद के खिलाफ नए किस्म की चुनौतियों को प्रस्तुत किया है। इन चुनौतियों का सबसे अच्छा रूप समाजवादी देशों में ही नजर आ रहा है और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूचना के अबाधित प्रवाह में नजर आ रहा है।
   साइबरयुग में अभिव्यक्ति को बाधित करना प्रतिक्रांतिकारी कार्य है। परवर्ती पूंजूवाद के पहले अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना संभव था। इसलिए वह तार्किक भी लगता था। उस जमाने में सेंसरशिप का तर्क पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही संगति में था। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद ने सेंसरशिप को आत्म-सेंसरशिप में बदल दिया है। यही वजह है कि पूंजीवाद बड़े पैमाने पर इन दिनों आत्म-सेंसरशिप पर जोर दे रहा है।
    आत्म-सेंसरशिप कारपोरेट संस्कृति का आज अभिन्न हिस्सा है। मीडिया को भी आत्म-सेंसरशिप अपनाने के लिए कारपोरेट घरानों ने बाध्य कर दिया है। इसके चलते सतह पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महसूस होती है वास्तव में आत्म-सेंसरशिप जारी है। सतह पर हम आजादी महसूस करते हैं लेकिन वास्तव जिंदगी में साइबर निगरानी के दायरे में रहते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि जिस तरह क्रांति का मुहावरा बदला है वैसे ही प्रतिक्रांति का मुहावरा भी बदला है।
      समाजवादी चीन और क्यूबा में ऐसा बहुत कुछ घट रहा है जो प्रतिक्राति की कोटि में आता है। परवर्ती पूंजीवाद के पहले समाजवाद के खिलाफ बाहर से सैन्य और गैर-सैन्य हमले संगठित किए जाते थे। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद के दौर में समाजवाद के अंदर से प्रतिक्रांतिकारी हमले संगठित किए जा रहे हैं। पहले पूंजीपतिवर्ग और अमेरिका आदि साम्राज्यवादी देश इन हमलों को नियोजित करते थे,लेकिन परवर्ती पूंजीवाद में स्वयं साम्यवादी कतारों के अंदर से क्रांति के खिलाफ संगठित हमले हो रहे हैं। सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों में साम्यवादी शासन के पराभव का यह बुनियादी कारण है।
      स्वयं से नफरत करना,अपनी भाषा,अपने विचार.अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता से नफरत करना परवर्ती पूंजीवाद का बुनियादी मंत्र है। एक वाक्य में कहें कि परवर्ती पूंजीवाद स्वयं से नफरत पैदा करने के चक्कर में व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ खड़ा कर देता है और इसके चलते मानव मात्र के प्रति नफरत.बेगानापन,उपेक्षा आदि को एक आमफहम फिनोमिना बना देता है। व्यक्ति का व्यक्ति के ऊपर से विश्वास खत्म हो जाता है। अब एक-दूसरे पर अविश्वास और संदेह करने लगते हैं। यह फिनोमिना समाजवादी देशों में परवर्ती पूंजीवाद की विश्वव्यापी प्रक्रिया के माध्यम से  प्रवेश करता है और समाजवाद धराशायी हो जाता है। लेकिन जिन देशों में अभी साम्यवादी दलों का शासन है ,खासकर चीन और क्यूबा में उन्हें तो कम से कम इन चीजों से बचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि चीन और क्यूबा में परवर्ती पूंजीवाद के प्रतिक्रांतिकारी संस्कार तंजी से फल फूल रहे हैं।
      प्रतिक्रांति का पहला रूप है साइबरयुगीन वास्तविकताओं से इंकार। साइबरयुग की विश्वव्यापी प्रवृत्तियों की अनदेखी से प्रतिक्रांति की प्रबल संभावनाएं हैं। मसलन नागरिकों को रीयल टाइम कनेक्टविटी से वंचित करना प्रतिक्रांति है। साइबर जासूसी प्रतिक्रांति है। सरकारी एक्शन को हमेशा सही ठहराना,टीवी या मीडिया में सरकारी भोंपू के रूप में काम करना, यानी सरकारी प्रचारक के रूप में काम करना प्रतिक्रांति है।
    चीन में नागरिकों को सरकार के पक्ष में लिखने के लिए पैसा दिया जाता है। खासकर इंटरनेट पर लिखने लिए लेखकों को प्रति पोस्ट पचास सेंट दिए जा रहे हैं। इस पद्धति के जरिए आम जनता का मुँह बंद करने वालों का नेटवर्क तैयार किया गया है। उन लोगों को खासकर निशाना बनाया जा रहा है जो कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों से असहमत हैं। साइबरयुग में असहमति को कुचलना प्रतिक्रांति है, व्यर्थ का प्रयास है।
     साइबर संस्कृति का प्रभाव है कि आज चीन में इंटरनेट पर दस लाख से ज्यादा फोरम हैं और 20 करोड़ से ज्यादा ब्लॉग हैं। हजारों चाटरूम हैं। प्रतिदिन हजारों नए ब्लॉग बन रहे हैं। चीन परेशान है इस साइबर संस्कृति के प्रसार से। चीन के बारे में प्रतिदिन सत्य के नए रूप इंटरनेट में सबसे पहले उद्घाटित हो रहे  हैं।
    चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बेवसाइट पर किसी भी किस्म की टिप्पणियां नजर नहीं आतीं अथवा एक-दो टिप्पणियां नजर आती हैं। मसलन् पीपुल्स डेली ऑन लाइन,झिंहुआ ऑनलाइन पर इक्का-दुक्का कमेंट हैं। सीना डॉट कॉम जैसे चीन के सबसे बड़े कॉमर्शियल इंटरनेट पोर्टेल पर 373 कमेंट हैं।
     मजेदार बात यह है कि चीन में यूजर वही राय व्यक्त कर सकते हैं जिसकी कानून इजाजत देता है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में लिखने वालों को प्रति पोस्ट पचास सेंट देने का रिवाज चलाकर अभिन्यक्ति को एक तरह से खरीदा जा रहा है। सवाल यह है कि पैसे के लालच में लिखी बातें क्या सच पर रोशनी डाल पाएंगी ?
     इसी तरह सरकारी प्रयासों से आधिकारिक तौर पर नेट पर राय देने वालों की ऑनलाइन टीमें पार्टी के द्वारा बनाई जा रही हैं। गंगजू प्रदेश में ऐसी ही ऑनलाइन कमेंट लिखने वालों की 650 लोगों की टीम बनाई गई है जिसका वेस्टर्न बिजनेस पोस्ट नामक अखबार ने खुलासा किया है। इन लोगों का काम है नेट पर जाना और विभिन्न स्थानों पर टिप्पणियां लिखना। बेवसाइट,ब्लॉग,बेव बुलेटिन आदि पर कमेंट लिखना। चीन में इंटरनेट और साइबर संस्कृति का इतना व्यापक विस्तार साम्यवाद के कारण नहीं हुआ है बल्कि साइबरसंस्कृति और संचार क्रांति के कारण हुआ है। संचार क्रांति परवर्ती पूंजीवाद की देन है। साम्यवादी क्रांति की नहीं।                    





शनिवार, 3 जुलाई 2010

बौद्धिक संपदा चोरी में चीन सबसे आगे

     हाल ही में अमेरिका के इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन ने कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा के कानूनों के उल्लंघन के मामले में जांच का काम आरंभ किया है। चीन के द्वारा की जा रही बौद्धिक संपदा की चोरियों के कारण अमेरिकी उद्योग जगत को बड़े  पैमाने पर घाटा उठाना पड़ रहा है। इस बौद्धिक संपदा की चोरी के कई आयाम हैं। खासकर संगीत, सिनेमा, सॉफ्टवेयर आदि के क्षेत्र में चीन के द्वारा की जा रही चोरी और नकली मालों की बिक्री से अमेरिकी संस्कृति उद्योग को अरबों डॉलर का चूना लगा है।
   दूसरी बात यह है कि स्वयं अमेरिकी मीडिया कंपनियों के द्वारा नकली सीडी वगैरह बनाकर चीन में बेची जा रही हैं। अमेरिका स्थित बिजनेस सॉफ्टवेयर एलायंस नामक व्यापारिक संस्था ने कहा है कि सन् 2009 में चीन ने 97 प्रतिशत सॉफ्टवेयर जो इस्तेमाल किया उसका सही मूल्य पर भुगतान नहीं किया। इस तरह तकरीबन 7.6बिलियन डॉलर का खुदरा नुकसान दर्ज किया गया।
   अमेरिकी सीमा पर चीन से आए सामान में  79 प्रतिशत चोरी छिपे लाया गया। चीन की स्थिति यह है कि वस्तुओं की बिक्री के मामले में वह किसी भी किस्म के अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून को मानने के लिए तैयार नहीं है। चीन में चोरी और नकली सामान के मामले में किसी भी किस्म के अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू नहीं होते।





चीन के सैनिकों का प्रेम कनेक्शन कटा

  आज ‘वाल स्ट्रीट जरनल’ ने खबर दी है कि चीन के जनमुक्ति सैनिकों पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की कड़ी नजर है। इधर कई सालों से यह देखा गया  कि चीन के सैनिक इंटरनेट के माध्यम से डेटिंग वगैरह कर रहे थे। वे नेट के जरिए प्रेम संदेश भेज रहे थे। चीन प्रशासन के नए आदेश में सैनिकों का डेटिंग करना अपराध घोषित कर दिया गया है। इसके अलावा चीनी सैनिकों को सोशल नेटवर्कों पर भी जाने की मनाही कर दी गयी है।
     उल्लेखनीय है चीन के सैनिक बड़ी संख्या में  Kaixin001 नामक सोशल नेटवर्क पर जाने लगे थे और तरह-तरह से साइबर समाजीकरण कर रहे थे। चीन प्रशासन के आदेश में कहा गया है कि सैनिकों को छद्म नाम से भी इंटरनेट पर संपर्क और संवाद नहीं करना चहिए। क्योंकि इससे उनकी असली पहचान छिपती नहीं है।नेट संवाद में यह संभव नहीं है कि अपने काम-काज और नौकरी के बारे वे सब कुछ छिपा लें। होसकता है सैनिक के लिए कोई सूचना अप्रासंगिक लगे और वह बता दे।
   सवाल यह है कि चीन सरकार ने अपने सैनिकों के लिए आज के इंटरनेट युग में इतना घटिया आदेश जारी कैसे किया । उल्लेखनीय है अमेरिका के सैनिकों को इंटरनेट संवाद की अनुमति है। वे चाहें तो किसी भी सोशलसाइट पर भी जा सकते हैं। भारत में सैनिकों को इंटरनेट संवाद की सुविधा प्राप्त है।
    अमेरिका में तो युद्ध के मैदान में लड़ रहे सैनिकों को भी सोशल नेटवर्क पर जाने की अनुमति है। अमेरिकी सैनिक अपनी असली पहचान के साथ फेसबुक,ट्विटर,सोशल नेटवर्क आदि पर जाते हैं और अपने फोटो भी लगाते हैं। अमेरिकी सेना में भर्ती की सूचनाएं भी नेट पर दी जाती है। भर्ती के विज्ञापन भी रहते हैं। समस्या यह है कि चीन जैसा विशाल देश इस आदेश को लागू कैसे करेगा। चीन में नेट यूजरों की संख्या सबसे ज्यादा है।
   उल्लेखनीय है इंटरनेट का चीन में व्यापक सामाजिक असर हुआ है। खासकर उपभोक्ता के उपभोग पर इसका गहरा असर हुआ है। चीन का उपभोक्ता औसतन 3 घंटा प्रतिदिन ऑनलाइन पर बिताता है। यह अमेरिका और जापान के यूजर के बराबर का समय है। यदि कोई मीडिया वाला यह सोचे कि चीनी लोग घर में हैं और वे टीवी देख रहे होंगे तो यह समझ सही नहीं है।
    चीन के ज्यादातर उपभोक्ता ऑनलाइन पर वस्तुओं का चयन और खरीद करते हैं। इसके लिए वे व्यापक रिसर्च भी करते हैं। चीनी लोगों के लिए मीडिया उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना भारत में है। भारत में किसी भी माल की बिक्री के विज्ञापन का मीडिया ही एकमात्र सहारा है। चीन की अच्छी कंपनियां सोशल नेटवर्क और ब्लॉगरों के माध्यम से प्रचार करती हैं। इनके जरिए उपभोक्ता को प्रभावित करती हैं। ऐसी स्थिति में सैनिकों को नेट से दूर रखना मुश्किल काम है।    
                  






बुधवार, 23 जून 2010

ली पेंग की डायरी ने चीन सरकार की नींद उडायी

(तिएनमैन चौक पर तत्कालीन महासचिव झाओ जियांग छात्रों का समर्थन करते हुए )
      चीन में इन दिनों कम्युनिस्ट नेताओं की नींद उड़ी हुई है। तिएनमैन स्क्वेयर के समय चीन में जो राष्ट्रीय पंगा हुआ था उसे लेकर आम लोग नहीं जानते कि कम्युनिस्ट पार्टी में शीर्ष पर बैठे नेताओं में क्या चल रहा था।
    हाल ही में चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली पेंग की डायरी हांगकांग का एक प्रकाशक चीनी में छापकर बाजार में ला रहा था कि कम्युनिस्ट नेताओ ने उसके वितरण को रोक दिया है।
    इस डायरी की बीस हजार प्रतियां छापी गयी थीं और इसे 22 जून को रिलीज किया जाना था। कहा जा रहा है इसका कॉपीराइट प्रकाशक के पास नहीं था। ‘रायटर’ ने इस डायरी की एक प्रति हासिल कर ली है और इसे खबर बनाया है।
    डायरी में लिखा है कि सुधारवादी नेता देंग का मानना था कि सरकार को 4जून 1989 के आंदोलन को शांत करने के लिए कुछ खून बहाना होगा। सरकारी स्रोत बताते हैं कि ली पेंग ने कभी अपनी डायरी छापने की प्रकाशक न्यू सेंचुरी प्रेस को अनुमति नहीं दी थी।. वह नहीं चाहते थे कि उनकी डायरी छपे।
     चीन का मौजूदा प्रशासन चाहता है कि चीन की जनता के मन से तिएनमैन स्क्वेयर की घटना को धो पोंछकर साफ कर दिया जाए। उस जमाने की सेना और टैंक वाली इमेज को वर्तमान चीनी नेतृत्व लोगों में प्रचारित नहीं होने देना चाहता। इस डायरी में 279 पृष्ठ हैं और इसको 22जून 2010 को रिलीज किया जाना था।
    सवाल उठता है कि आखिरकार यह डायरी प्रकाशक के पास पहुँची कैसे ? डायरी लेखक की अनुमति के बिना प्रकाशक के पास पहुँचना मुश्किल है। दूसरी बात यह कि हांगकांग प्रकाशन में चीन को हस्तक्षेप करने का कानूनी हक नहीं है। हांगकांग समझौते के तहत हांगकांग के प्रकाशनों को चीनी कानून के दायरे के बाहर रखा गया है। ऐसे में सवाल उठता है किस चीनी नेता ने प्रकाशक पर दबाब ड़ालकर किताब को बाजार में आने से रोका है ?
     ‘रायटर’ ने डायरी रूपी संस्मरणों की प्रामाणिकता का सवाल भी उठाया है। चीन प्रशासन ने डायरी के बारे में अभी तक कुछ नहीं कहा है। प्रकाशक का मानना है कि ये संस्मरण स्वयं लेखक के हैं। यही वजह है कि पार्टी के आला नेता इसे बाजार में नहीं आने देना चाहते।
    उल्लेखनीय है कि  इसी प्रकाशक ने 1989 के तिएनमैन स्क्वेयर आंदोलन के समर्थक तत्कालीन पार्टी महासचिव झाओ जियांग के संस्मरण उनके मरने के बाद छापे थे। उस समय ली पेंग प्रधानमंत्री थे और उन्होंने महासचिव का समर्थन किया था। तिएनमैन स्क्वेयर की घटना के बाद झाओ जियांग को महासचिव पद से हटा दिया गया और 15 सालों तक उनके घर में नजरबंद करके रखा गया सन् 2005 में इसी अवस्था में उनकी मृत्यु हुई।
      नजरबंदी की अवस्था में उन्होंने संस्मरण कैसेट स्मगल करके प्रकाशक तक पहुँचवाए।बाद में उन्हें पुस्तक रूप में  प्रकाशित किया गया। उल्लेखनीय है झाओ के करीबी नेता बाओ टांग के बेटे को 1989 के आंदोलन का समर्थन करने के नाते सात साल जेल की हवा खानी पड़ी.बाद में उन पर बीजिंग में पुलिस की कड़ी नजरदारी जारी रही। प्रकाशक ने कहा हे कि पेंग  की डायरी की कुछ प्रतियां 2009 में चीन के बडे नेताओं और अधिकारियों को पढ़ने के लिए दी गयी थीं।














बर्बर पूंजीवाद का मॉडल है रूस- चीन का


         सोवियत संघ और चीन का समाजवाद से पूंजीवाद में रूपान्तरण हो चुका है। आज रूस और चीन बदल गए हैं। वे वैसे नहीं है जैसे समाजवाद के जमाने में थे। सामाजिक जीवन में पहले की तुलना में असुरक्षा बढ़ी है।
      पहले राजसत्ता से मानवाधिकारों को खतरा था आज लुंपनों ,कारपोरेट घरानों और पार्टी तंत्र से खतरा है। दोनों ही देशों में साधारण आदमी के कष्ट बढ़े हैं। चीन में सरकारीतंत्र के अंग के रूप में पार्टी सदस्य उत्पीड़न कर रहे हैं,सोवियत संघ में अपराधी गिरोहों में बड़ी संख्या में पार्टी सदस्यों ने रूपान्तरण कर लिया है।
     रूसी देशों में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों का बड़ा हिस्सा पृथकतावादी, फंडामेंटलिस्ट,फासिस्ट और माफिया कामों में लग गया है। कम्युनिस्ट पार्टी सदस्यों का इस कदर पतन इस बात का संकेत है कि समाजवाद के दौर में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी किस कदर सड़ चुकी थी और उसे दुनिया नहीं जानती थी। इस पहलू की ओर कभी भारत के कम्युनिस्टों ने भी ध्यान नहीं दिया। वे लगातार सोवियत संघ जाते थे लेकिन सोवियत संघ के सच को कभी नहीं बताते थे। वे भोंपू की तरह सोवियत प्रचार करते थे।
         सोवियत संघ में समाजवाद के जमाने में साधारण आदमी भौतिक तौर पर निश्चिंत था लेकिन राजनीतिक तौर पर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र नहीं था। आज कहने को राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र है लेकिन स्वतंत्रता का भोग करने की उसके पास क्षमता नहीं है।
         भू.पू.सोवियत संघ के देशों में भौतिक दुरावस्था ने राजनीतिक स्वतंत्रता को दिवास्वप्न बना दिया है। इसी अर्थ में पूंजीवाद में स्वतंत्रता नहीं होती। पूंजीवाद में स्वतंत्रता का आनंद वे ही ले सकते हैं जो सक्षम हैं। अक्षम लोगों के लिए पूजीवादी स्वतंत्रताओं की कोई प्रासंगिकता नहीं है। आयरनी यह है कि समाजवाद में सोवियत नागरिकों के पास मानवाधिकार नहीं थे ,समाजवाद के पराभव के बाद भी नहीं हैं बल्कि कुछ मामलों में समाजवाद से भी बदतर अवस्था है।
       समाजवाद से पूंजीवाद में रूपान्तरण का एक निष्कर्ष यह है कि जो देश समाजवाद से पूंजीवाद के मार्ग पर आ रहे हैं वे अपने यहां मानवाधिकारों का विकास नहीं कर पाए हैं। यही स्थिति चीन की है। साम्यवादियों के लिए समाजवाद से पूंजीवाद में व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ सिर्फ उत्पादन का स्वामित्व बदलना है । मूल्यबोध और राजनीतिक संरचनाएं बदलना नहीं है।
     साम्यवाद की जगह सिर्फ पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का आना और पूंजीवादी मूल्यों के अनुरूप संरचनात्मक और कानूनी व्यवस्थाओ का न आना बर्बर पूंजीवाद को जन्म दे रहा है। यह ऐसा पूंजीवाद है जिसके पास लूट और अनियंत्रित शोषण का तो अधिकार है लेकिन इसकी किसी के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। रूस और चीन में पूंजीवाद के प्रयोगों की यह धुरी है। राज्य खुलेआम अविवेकपूर्ण ढ़ंग से इन देशों में पूंजीपतिवर्ग के साथ है।
       पूंजीपतिवर्ग का नंगी गुलामी का आदर्श देश हैं चीन और रूस। मसलन् सामान्य तौर पर विकसित पूंजीवादी मुल्कों और अनेक तीसरी दुनिया के देशों में मजदूरों को जितने अधिकार प्राप्त हैं उतने भी अधिकार इन देशों में मजदूरों को प्राप्त नहीं हैं। मजदूर विरोधी ये सारे काम वे लोग कर रहे हैं जो कम्युनिस्ट हैं या थे।
    मजदूर विरोधी मामलों में रूसी भू.पू.कम्युनिस्ट और चीनी मौजूदा कम्युनिस्ट एक ही थाली में मलाई खा रहे हैं। कहने का तात्पर्य कि इन देशों में पूंजीवाद का विकास नहीं हो रहा बल्कि बर्बर पूंजीवाद का विकास हो रहा है। वहां जनता अधिकारहीन है। मानवाधिकारों को लागू नहीं किया गया है और इस हरकत के लिए तरह-तरह के तर्क गढ़ लिए गए हैं। उनमें साझा तर्क यह है कि पश्चिम की तर्ज का लोकतंत्र चीन और रूस के लिए अप्रासंगिक है। मजेदार बात यह है कि पश्चिमी पूंजीवादी उत्पादन, जीवनशैली, खाक-पान,घर-द्वार,मुनाफा,बैंकिंग व्यवस्था,मासकल्चर आदि सब कुछ स्वीकार्य है सिर्फ लोकतंत्र नहीं,लोकतांत्रिक अधिकार नहीं,लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां नहीं।
    समाजवाद से पूंजीवाद में आने का एक परिणाम यह निकला है कि आम जीवन में सामूहिकीकरण और व्यक्तिगत प्रयासों में क्या और कितना अच्छा है इस पर बहस छिड़ गयी है। पहले लोग व्यक्तिगत को बेहतर मानते थे और सामूहिकीकरण का विरोध कर रहे थे। आज 25 साल के व्यक्तिगत तजुर्बों ने सबकी नींद उडा दी है। व्यक्तिगत संपत्ति पाने, पैदा करने और उसके आधार पर तरक्की करने की मानसिकता को गहरा झटका लगा है, इसके बावजूद एक बड़ा समुदाय है जो सामूहिकीकरण का विरोध कर रहा है।
     रूस में पहले अधिकांश जनता राज्य के संरक्षण में आर्थिक तौर पर सुरक्षित थी आज ऐसा नहीं है आज अधिकांश जनता बेहतर अवस्था में नहीं है। एक हिस्सा है जो खुशहाल है। भ्रष्टाचार चारों ओर फैला हुआ है। राज्य की नीतियों में जनता के हितों की रक्षा का जितना दावा किया जाए स्थिति वास्तव में अच्छी नहीं है।
     रूस में अब तक कोई स्पष्ट औद्योगिक नीति नहीं है। इसके चलते पूंजी निवेश के मामले में मनमानापन देखा जा रहा है। रूसी पूंजीपति और राज्य यह जानते ही नहीं हैं कि पूंजीवाद कैसे सामाजिक आर्थिक हितों के विस्तार का काम कर सकता है। नीति के अभाव के कारण ही एल्यूमीनियम टायकून ओलिग देरीपास्का को ऑटोमोबाइल प्लांट लगाने की अनुमति नहीं दी गयी। एक अन्य पूंजीपति ने उल्यानेवस्क का ऑटोमोबाइल प्लांट खरीदा लेकिन वह असफल रहा। ऐसी ही कहानी और भी पूंजीपतियों की है। रूस का पूंजीवाद चंदधनियों को महाधनी बनाने और उनके आर्थिक हितों के विस्तार तक ही सीमित है। अधिसंख्य जनता उसके केन्द्र में नहीं है।
   मास्को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री स्तीनिस्लेव मेनशिकोव ने ‘प्रावदा’ अखबार को दिए साक्षात्कार में रूसी अर्थव्यवस्था और पूंजीपतिवर्ग की प्रकृति को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं । उन्होंने कहा है  रूस में कर वसूली किसी भी पूंजीवादी मुल्क से ज्यादा होती है। जबकि रूस में कामगारों की पगार ऊँची नहीं है। बड़े पूंजीवादी मुल्कों की तुलना में रूस में 60 प्रतिशत ज्यादा कर वसूली होती है। यह तब है जब रूस के पूंजीपति बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी करते हैं।
    रूस में सकल घरेलू उत्पाद का पगार पर 27प्रतिशत खर्च होता है वहीं अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद का पगार पर 60 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया जाता है। अमेरिकी पूंजीपति अपने कामगार के रहन-सहन और जीवनशैली का ख्याल करते हुए पगार देता है इसके विपरीत रूसी पूंजीपतिवर्ग अपने कामगारों की बदहाल जिंदगी को बेहतर बनाने के लिहाज से पगार नहीं देता। जिस तरह गुंडे अपने मातहत गुंडों को जीनेभर लायक पैसा देते हैं वैसे ही रूसी पूंजीपति अपने मजदूरों को जीनेभर लायक पैसा देता है।
    रूस के पूंजीपति को कुछ महत्वपूर्ण संस्कार साम्यवाद से मिले हैं। इनमें झूठ बोलने और अपारदर्शिता का संस्कार उसे साम्यवाद से मिला है। रूसी पूंजीपति और अभिजात्यवर्ग अपनी आय छिपाता है। बेईमान का यह संस्कार उसे पश्चिमी पूंजीपतिवर्ग से मिला है।
    रूसी पूंजीपतिवर्ग का काम करने का तरीका सब कुछ हडपो। वह सारे लाभ स्वयं खा जाना चाहता है वह नहीं चाहता कि अन्य को लाभ मिले। रूसी सरकार की गरीब और अमीर को लेकर अलग नीति और नजरिया नहीं है। सरकार आम जनता के विकास के लिए पूंजीपतिवर्ग से सरप्लस हासिल करने में असफल रही है। इसके कारण सरकार के पास अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए पैसा ही नहीं है। सारा सरप्लस पूंजीपतियों के हाथों में चला गया है। इससे चंद वर्षों में ही अमीर और गरीब का विशाल अंतर पैदा हो गया है।  
      रूस के राष्ट्रपति के आर्थिक सलाहकार अरकादी दरकोविच ने कहा है कि रूस में सबसे बड़ी चुनौती है भ्रष्टाचार ,कारोबार का घटिया वातावरण,नए काम करने वालों के लिए कम से कम मौके और लाभ। ये कुछ चीजें हैं जो हमें नुकसान पहुँचा रहे हैं।
    अगले पांच सालों में सेना,पुलिस और नौकरशाही में आठ लाख से ज्यादा लोगों की छंटनी की जाएगी, यह सब किया जाएगा अर्थव्यवस्था को दुरूस्त बनाने के नाम पर। इसके इलावा पुलिस से तीन लाख लोगों की छंटनी की जाएगी। लगता है इससे रूस में अव्यवस्था फैलेगी। पामाली बढ़ेगी।   

बुधवार, 16 जून 2010

मजदूरों का असम्मानजनक जीवन

( प्रोफेसर यू जियान आंग)
        चीन में इन दिनों मजदूरवर्ग हडताल पर है। देश के विभिन्न इलाकों की विभिन्न फैक्ट्रियों से हड़ताल की खबरें आ रही हैं। मजदूरों के हड़ताल पर जाने से सारा देश डरा हुआ है। लोगों का मानना है मजदूरों का इस तरह सड़कों पर आंदोलन करते हुए निकलना सामाजिक अशांति पैदा कर सकता है।
      हाल ही में आल चाईना फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन ने एक बयान में कहा है कि वह मजदूरों के कानूनी अधिकारों के संरक्षण और सदभावपूर्ण संबंधों के निर्माण के लिए प्रयास जारी रखेगा। यूनियन का मानना है कि चीन के मजदूर ज्यादा सम्मानजनक अवस्था में जीते रहे हैं। सामाजिक स्थिरता के लिए मजदूरों के सम्मान की रक्षा करना जरूरी है। यूनियन के इस बयान में पहली बात गलत है कि चीन में मजदूरवर्ग सम्मानजनक ढ़ंग से जीवनयापन करता रहा है। हकीकत यह है कि मजदूरों के पास न्यूनतम सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा नहीं है। जीवनशैली बेहद कष्टमय है। काम के क्षेत्र और रहने के क्षेत्र में अनेक विषमताएं हैं।
     इस बयान में पहलीबार मजदूरों के सम्मान के साथ सामाजिक अस्थिरता को जोड़कर देखा गया है। पहलीबार यह बात चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले संगठन ने मानी है कि मजदूरवर्ग के सम्मान को बढ़ाने का एकमात्र उपाय है उसके राजनीतिक अधिकारों में बढ़ोतरी। मजदूर के सम्मानजनक जीवन के अभाव में सामाजिक शांति बनाए रखना संभव नहीं होगा। चीन की यूनियन के इस बयान को चीन की समाजविज्ञान अकादमी के रूरल डवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर यू जियान आंग ने अपने लेख में उद्धृत किया है।
   यूनियन के बयान में कहा गया है कि चीन में ऐतिहासिक ,सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन घट रहे हैं। सरकारी कारखानों में रिस्ट्रक्चरिंग हो रही है। निजी क्षेत्र विकसित हो रहा है। अनेक स्थानीय सरकारें स्थानीय नीतियां बना रही हैं। इनमें मजदूरों के अधिकारों को पूंजी निवेश के नाम पर तिलांजलि दे दी गयी है। फलतः मजदूरों के अधिकार हाशिए पर चले गए हैं।
     यूनियन के बयान के आधार पर प्रोफेसर साहब ने भी यह माना है कि अनेक कारखाने भाड़े पर चल रहे हैं। ठेके पर ताजिंदगी मजदूरों को बेहद कम मजदूरी पर रख लिया गया है। यह काम सामूहिक हितों की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है। अनेक कारखाने सरकारी कारखानों की री-स्ट्रक्चरिंग से निकले हैं।  इन कारखानों को मजदूरों की लूट दुकान भी कह सकते हैं। इन कारखानों में मजदूरों के पास न्यूनतम अधिकार हैं।
    प्रोफेसर यू जियान आंग ने लिखा है कुछ कारखानों में मजदूर भयानक खराब अवस्था में रह रहे हैं। कमरतोड़ मेहनत के बाद भी उन्हें सही पगार नहीं मिलती। वे इतनी कम मजदूरी में काम करते हैं कि ठीक से गुजारा तक नहीं कर पाते। उत्पादन की जगह मजदूर रोबोट बना दिए गए हैं। इन मजदूरों को किसी भी किस्म का सम्मान प्राप्त नहीं है। यू जियान आंग ने लिखा है मजदूरों को अपने राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक हितों और सम्मान की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करना चाहिए और सभी किस्म के तरीके अपनाने चाहिए।  अनेक सरकारी अधिकारी यह मानते हैं कि मजदूरों के अधिकारों के नाम पर हो रही घटनाओं से सामाजिक अस्थिरता पैदा हो रही है।
     विश्व विख्यात राजनीतिविज्ञानी सेमुअल पी. हंटिंगटन ने ‘पोलिटिकल आर्डर इन चेंजिंग सोसायटी’  में लिखा है कि आरंभिक औद्योगिक समाजों में मजदूरों की हड़ताल और सामाजिक अन्तर्विरोधों का प्रधान कारण था कि जो लोग शक्तिशाली थे,सत्ता में थे,वे मजदूरों के अधिकारों को नहीं मानते थे अथवा कानूनी तौर पर मजदूर यूनियन के अस्तित्व को नहीं मानते थे। ये अधिकार तब ही माने गए जब 19वीं सदी के सामाजिक संघर्षों ने इन्हें स्थापित कर दिया। उस समय अनेक सरकारें मजदूर संघों की वैधता पर ही सवालिया निशान लगाती थीं।  जितना मजदूरों की यूनियनों को अस्वीकार किया गया उतना ही मजदूर संगठन रेडीकल होते चले गए।
    जो लोग सत्ता में थे वे मजदूर संघों को अपने लिए चुनौती मानते थे। यह वह मनोदशा थी जिसके कारण मजदूरों ने मौजूदा व्यवस्था को चुनौती दी। बीसवीं शताब्दी में आकर औद्योगिक समाजों के अन्तर्ग्रथित हिस्से के रूप में मजदूर संघों को इज्जत की नजर से देखा गया। विकसित पूंजीवादी मुल्कों में संगठित मजदूर आन्दोलन है। जबकि अविकसित देशों में मजदूर संघ सीमित संख्या में हैं। आज मजदूरों के राष्ट्रीय फेडरेशन होना सम्मान का बात मानी जाती है। चीन में अशांति को खत्म करना है तो मजदूरों को हक देना होगा।          








मंगलवार, 15 जून 2010

प्याज की धुलाई

( प्रसिद्ध चीनी ब्लॉगर हन हन) 
            हाल ही में चीन के महान ब्लॉगर हन हन ने जिआमेन विश्वविद्यालय में भाषण दिया और कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं, हन हन के भाषण से यह साफ है कि चीन में सब कुछ नार्मल नहीं चल रहा है। चीन में अब तक के सांस्कृतिक विकास पर हन हन की बातें काफी महत्वपूर्ण हैं।
   हन हन ने कहा है कि हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि चीन अब तक सांस्कृतिक शक्ति क्यों नहीं बन पाया ? हन हन ने इस सवाल का उत्तर तलाशने की कोशिश की है। कहा है कि चीन सास्कृतिक शक्ति इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि हमारे यहां ‘ नेता’ प्रथम आते हैं और हमारे सभी नेता अशिक्षित हैं।  वे संस्कृति (ज्ञान) से डरते हैं। उनका काम है संस्कृति को सेंसर करना। जिससे वे सस्कृति का नियंत्रण कर सकें। हन हन ने कहा जब ऐसे नेता संस्कृति को नियंत्रित कर रहे हों तो वैसे में चीन कैसे सांस्कृतिक शक्ति बन सकता है ?
   हन हन ने अपनी एक अन्य ब्लॉग पोस्ट में चीन में चल रही आत्म-सेंसरशिप,दिमाग की धुलाई और चीन की उच्च शिक्षा पर लिखा कि संवाददाता सत्य की खोज करता है, इतिहास का शिक्षक इतिहास के बारे में बताता है। लेखक और स्कॉलर थोड़ा बहुत सत्य के बारे में बताते हैं। सिनेमा के निर्देशक फिल्मी यथार्थ को दरशाते हैं। ये लोग ज्यादा से ज्यादा विचारों का प्रतिपादन करते हैं। सबसे बुरा तब होगा जब ये लोग अपराध करने लगें।
       चीन में हालात यह हैं कि एक आदमी ज्योंही अनुमान करना आरंभ करता है उसका अनेक लोग पीछा करने लगते हैं। सरकारी लोग सोचते हैं क्या यह आदमी नशे में है। कुछ समय बाद उस आदमी को गिरफ्तार कर लिया जाता है। चीजें ऐसे ही घटती रहती हैं हम देखते रहते हैं। हम व्यक्ति के साथ घट रही इन बातों को बड़ी घटना नहीं मानते। आज किसी व्यक्ति के बारे में सभी आपराधिक प्रमाण नष्ट कर दिए गए हमें , इसके बावजूद लोग इसे सामान्य रूप में नहीं ले रहे हैं। लोग अपने लिए ज्यादा से  ज्यादा की चाहत में मशगूल हैं।
      हन हन ने लिखा है कि आज चीन में दिमाग की वैसे ही धुलाई की जा रही है जैसे सब्जियों की करते हैं।  सब्जियों की धुलाई के बाद भी कुछ प्याज साफ नहीं हो पाते। वैसे ही चीन में प्रतिवादी जनता है जो दिमागी धुलाई के बाद भी बच गयी है। सरकारी लोग इसी प्याज (प्रतिवादी जनता) को धोकर साफ करना चाहते हैं। प्याज को काटना चाहते हैं।    


शनिवार, 15 मई 2010

आत्मघाती है इंटरनेट सेंसरशिप

      चीन के जो लोग गुण गाते रहते हैं उन्हें देखना चाहिए कि चीन में मानवाधिकारों की दशा क्या है ?  अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों के प्रति चीन प्रशासन का रुख क्या है ?
     खबर आयी है कि चीन के सिनजियांग क्षेत्र में 10 महिने बाद इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गयी हैं। उल्लेखनीय है कि 10 महिना पहले इस इलाके के अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक हिंसाचार हुआ था और उसके बाद इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं। इस क्षेत्र में 10 महिनों से मोबाइल सेवाएं बंद थीं। एसएमएस भेजना बंद था। टेक्स्ट संदेश भेजने पर पाबंदी थी। राज्य प्रशासन ने उपग्रहसंचालित समस्त संचार नेटवर्क को बंद कर दिया था। स्मरणीय है गुजरात और मुंबई के दंगों के समय नेट सेवाएं अथवा किसी भी किस्म का उपग्रह संचार इतने लंबे समय तक कभी बंद नहीं किया गया।
     उल्लेखनीय है चीन की आबादी में 10 में से 6 लोग इस क्षेत्र में रहते हैं। इस इलाके में तुर्की से आयी उइघूर मुस्लिम जाति की आबादी ज्यादा है। लेकिन इस इलाके के समस्त कारोबार और रिहायशी इलाकों में हेन जाति के लोगों को कम्युनिस्ट प्रशासन ने अन्य प्रान्तों से लाकर जबर्दस्ती बसाया है फलतः उइघूर जाति के लोगों को व्यापक स्तर पर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
    सन् 2009 के जुलाई माह में ये लोग हेन जाति का वर्चस्व थोपे जाने का विरोध कर रहे थे और मांग कर रहे थे कि उनके साथ भेदभाव खत्म हो,उस समय उनके प्रदर्शन पर पुलिसबलों का हमला हुआ और 200 लोग मारे गए। सैंकड़ों लोग घायल हुए और इसके बाद इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं।
      प्रशासन के द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है -
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To all netizen friends throughout Xinjiang:

Greetings!

With direct concern from the Party Central Committee and after careful research by the Autonomous Regional Party Committee, it was decided to fully restore Internet service in our region on May 14th.

Since July, as our region began control over Internet communications and implementation of a gradual re-opening, Internet users far and wide have given their complete understanding and immense support, actively contributing to the protection of our region’s social stability and creating favorable conditions for implementing the reinstatement of the Internet throughout the region. For this, we express our heartfelt gratitude to all our netizen friends.

The Internet has become a vital component of the life of modern society. It is the gateway through which the Party committee and the government communicate to the vast multitudes as well as a channel for hearing public opinion and the collective wisdom of the people. Through their active comments and suggestions, netizens have expressed their love of Xinjiang and their boundless enthusiasm for building a better Xinjiang. They have shown to the world that people of every ethnicity in Xinjiang are simple, forgiving, sincere, and optimistic at heart.

The construction of a healthy, wholesome Internet community not only touches open economic and social development, but also concerns the personal interests of Internet users. We must value today’s hard-earned stability, value the completely open environment of the Internet, and use the Internet for the expression of good and in service of what is good.

It is the intense desire of peoples throughout all of Xinjiang to quicken the pace of economic and social development in Xinjiang. Soon, the Central Committee will open the Xinjiang Work Conference, which aims to formulate a strategy for advancing developmental breakthroughs and long-lasting peace in Xinjiang, and so Xinjiang has a historical and an important opportunity for considerable growth, opening, and development. In order to tightly grasp this opportunity, bring maximum benefit to the lives of peoples of all ethnicities, and continue the promotion of social harmony stability, the cooperation of netizens throughout the region, including cadres and peoples of all ethnicities, is necessary.

Xinjiang will appear before the world with an attitude of even greater confidence and openness. There can be no open Xinjiang without an open Internet, which is something we must create, hand in hand, for an even brighter future for the region. We hope that netizens will continue, as before, to be vigilant, to support the development and growth of Xinjiang, and, using the Internet as a platform, continue to offer poignant criticisms and excellent policy ideas for development and stability in Xinjiang; together building and even more prosperous and thriving Xinjiang. Xinjiang looks forward to a brighter tomorrow.

Wishing netizens blessings, happiness, and health,
 Autonomous Regional Party Committee Ministry of Propaganda
14 May 2010    
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    उल्लेखनीय है इंटरनेट सेवाएं बहाल करने के पहले कम्युनिस्ट पार्टी को इस क्षेत्र के पार्टी सचिव वेंग ली क्वान को उनके पद से हटाना पड़ा। पार्टी सचिव के रहते हुए इंटरनेट सेवाएं बहाल करना संभव नहीं था क्योंकि ये जनाब घनघोर मुस्लिम विरोधी हैं।
      इस क्षेत्र में सेंसरशिप लगाने से चीन का ही नुकसान हुआ है। इस इलाके के जिन लोगों को इंटरनेट का इस्तेमाल करना होता था उन्हें पश्चिमी चीन के गंगजू इलाके में जाकर नेट सेवाओं का इस्तेमाल करना होता था। इस दौरान अनेक कम्युनिस्ट विरोधी नेट कार्यकर्ताओं को जेल में ड़ाल दिया गया और नेट के कानूनों में भी एक फरवरी 2010 से परिवर्तन किया गया है। जिस क्षेत्र में इंटरनेट सेंसरशिप लगायी गयी वहां पर दो करोड़ की आबादी रहती है।
    विश्व के इतिहास में इतनी बड़ी आबादी पर नेट सेंसरशिप किसी भी देश ने अभी तक लागू नहीं की गयी थी। जब सारा समाज नेट पर निर्भर हो गया हो ऐसे में नेट पर पाबंदी सारी जनता को अपार कष्ट देने के बराबर है। यह चीन का औद्योगिक उत्पादन में बड़ा सम्पन्न इलाका है।
     यह विलक्षण बात है कि नव्यउदार मुक्त सूचनाप्रवाह का चीन को सबसे ज्यादा लाभ मिला और चीन में ही इंटरनेट सेवाओ पर सबसे बड़ी सेंसरशिप भी लगी। इंटरनेट सेंसरशिप चीन का आत्मघाती कदम था आशा है भविष्य में नेट सेंसरशिप से चीन के कम्युनिस्ट बाज आएंगे।  















चीन और पश्चिम बंगाल में भाषायी अंधलोकवाद

( कॉमरेड वेंग लीक्वान) 
      चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अंततः पश्चिमी सिनजियांग क्षेत्र के पार्टी सचिव वेंग लिक्वान को सचिव पद से हटा दिया है और उनकी पदावनति कर दी गयी है। उल्लेखनीय है जुलाई 2009 में सिनजियांग उईघूर क्षेत्र में भयानक दंगे हुए थे जिनमें चीनी मुसलमानों की बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई थी और 200 से ज्यादा निर्दोष नागरिक मारे गए थे। सचिव साहब दंगे और मुसलमानों के खिलाफ हमले रोकने में पूरी तरह असफल रहे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने इस क्षेत्र के सचिव को हटाकर दंगे रोकने में पार्टी की असफलता को एकतरह से मान लिया है। वेंग की जगह झांग चुन सियान को इस क्षेत्र का पार्टी सचिव बनाया गया है। यह खबर चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिंहुआ ने आज दी है।  
   उल्लेखनीय है वेंग लीक्वान 1994 - 2010 तक इस क्षेत्र में पार्टी सचिव और केन्द्रीय समिति के सदस्य रहे हैं। सन् 1966 से पार्टी सदस्य हैं। ये जनाब अल्पसंख्यकों के प्रति कड़े रवैय्ये के लिए जाने जाते हैं। इनका स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति पूर्वाग्रह रहा है। वेंग ने अल्पसंख्यकों के इलाके में उनकी  उईघूर भाषा के बदले मेनडेरियन भाषा को प्राइमरी स्कूलों में लागू किया और अल्पसंख्यकों की भाषा को सरकारी ऑफिसों और स्कूलों में प्रतिबंधित कर दिया।
     अल्पसंख्यकों के प्रति इस तरह के सख्त रुख के कारण जिस तरह भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को लौहपुरुष कहा जाता है उसी तरह वेंग को भी लौहपुरुष कहा जाता है।
     पश्चिम बंगाल में भी अल्पसंख्यकों की भाषा हिन्दी के प्रति माकपा के नेताओं का एक वर्ग भेदभावपूर्ण बर्ताव करता रहा है। हिन्दी की अल्पसंख्यकों की भाषा के रुप में संवैधानिक तौर पर जो व्यवस्था होनी चाहिए वह 34 साल के वाम शासन में नहीं हो पायी है।
      पश्चिम बंगाल सरकार के तहत चलने वाली पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का 8 साल से गठन नहीं हुआ है। 15 सालों से लेखकों को पुरस्कार नहीं दिए गए हैं। 6-7 साल से एक भी मीटिंग नहीं हुई है। अकादमी के पास कोई स्थायी कर्मचारी नहीं है। राज्य सरकार ने कई वर्षों से अकादमी के किसी भी आयोजन के लिए एक भी पैसा नहीं दिया है।
     जनवादी लेखक संघ और अन्य प्रगतिशील संगठन और उनसे जुड़े लेखक जो आए दिन दिल्ली हिन्दी अकादमी और दूसरी हिन्दी संस्थाओं को लेकर बयान देते रहते हैं पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के बारे में एक शब्द नहीं बोल रहे हैं।    
      हिन्दीभाषी लोगों के प्रति माकपा का रवैय्या किस तरह सौतेलेपन का शिकार है इसे एक ही उदाहरण से सहज ही समझा जा सकता है निकट भविष्य में राज्य में 80 नगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं। माकपा के उम्मीदवारों की सूची में 50 उम्मीदवार भी हिन्दीभाषी नहीं हैं, हां, उर्दूभाषी मुस्लिम प्रत्याशियों को कुछ सीटों पर ममता बनर्जी के मुसलमान कार्ड को काटने के लिए जरुर खड़ा किया गया है। जबकि अकेले कोलकाता में 30 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी रहते हैं उनमें गिनती के 1-2 उम्मीदवार हिन्दीभाषी खड़े किए गए हैं।
     जिस तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी हेन जाति के वर्चस्व को अन्य जातियों के खिलाफ इस्तेमाल करती रही है ठीक वैसे ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टीँ पश्चिम बंगाल में बंगाली अंधलोकवाद का भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति औजार की तरह चालाकी के साथ इस्तेमाल करती रही है।
    भारत में भाजपा में हिन्दू और हिन्दी वर्चस्व को लेकर अंधलोकवादी ऱुझान है जिनके आधार पर वह भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ आए दिन आक्रामक व्यवहार और हमले करती रही है।
       भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति पश्चिम बंगाल में सामान्यतौर पर दोयम दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार होता है। उल्लेखनीय है भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैय्या सोवियत संघ से लेकर यूगोस्लाविया तक, चैकोस्लोवाकिया से चीन तक समाजवाद का साझा फिनोमिना है। यह फिनोमिना पश्चिम बंगाल में भी खूब फलफूल रहा है। बांग्ला अंधलोकवाद के कारण आज बंगाली जाति और बांग्ला भाषा के प्रति असम,उड़ीसा, झारखण्ड में उग्र प्रतिक्रियाओ का चक्र चल रहा है। भाषायी अंधलोकवाद अंततः राष्ट्रीयस्तर पर राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक बनाता है और सामाजिक विभाजन पैदा करता है काश हमारे यहां यह बीमारी न आयी होती ?    






शुक्रवार, 14 मई 2010

नव्य उदार मार्ग का कुपरिणाम हैं चीनी बच्चों पर हमले

(चीन में हाल के कातिलाना हमलों में घायल 2 साल का बच्चा अस्पताल में)
       चीन में विगत दो महीनों से बच्चों पर जिस तरह के कातिलाना हमले हो रहे हैं इससे समूचे चीन में हंगामा उठ खड़ा हुआ है। चीन के विशेषज्ञों ने इस पर अपनी राय जाहिर करते हुए कहा है कि ये हमले अंधाधुंध नव्य पूंजीवादी आर्थिक विकास का परिणाम है। विगत दस सप्ताह में 8 हमले हुए हैं।
     विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास के चक्कर में विकास का मानसिक स्वास्थय पर क्या असर हो रहा है इसकी अनदेखी हुई है। सारे देश में अंधाधुंध आर्थिक विकास हुआ है उसका देश के नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर हो रहा है इसके बारे कभी सोचा ही नहीं गया।
      Agence France-Presse, Associated Press समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में बीजिंग स्थित चीनी विश्वविद्यालय के राजनीति और कानून विभाग के प्रो.मा अइ का मानना है कि हमने आर्थिक तरक्की पर ध्यान केन्द्रित किया और लेकिन मानसिक दशा को उन्नत बनाने पर ध्यान नहीं दे पाए। विगत 30 सालों के परिवर्तन की गति बेहद तेज रही है। हाल के हमलों में कुल मिलाकर 17 छोटे बच्चे मारे गए हैं और 50 बच्चे घायल हुए हैं। हमलावरों में से एक ने आत्महत्या कर ली जबकि एक हमलावर को पुलिस के हवाले कर दिया गया है। हमलावर समाज में इस तरह के हमले करके बदला लेना चाहते हैं और आम जनता को शॉक देना चाहते हैं। ये हमले व्यापक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक बीमारी की अभिव्यक्ति हैं।
     विगत 30 सालों में चीन के समाज में खुलापन आया है अनेक किस्म की सुविधाओं और स्वतंत्रताओं को आम जनता भोग रही है। आज चीनी नागरिक का नव्यउदार पूंजीवादी आर्थिक सुधारों के बुनियादी लक्षणों से मुकाबला हो रहा है। पूंजीवादी समाज का लक्षण है कुत्ता कुत्ते को खाता है। यह लक्षण विकासशील चीनी समाज को खा रहा है।
     शंघाई स्थित तोंगजी विश्वविद्यालय के मानसिकरोग विशेषज्ञ मिशेल फिलिप का कहना है कि चान के महानगरों के बाहर छोटे शहरों और कस्बों में डाक्टर यह नहीं जानते कि मनोरोग क्या है ? अनेक मनोरोगी अपना इलाज सामाजिक कलंक होने के कारण नहीं करा पाते। डा. फिलिप ने चीन में पिछले साल सर्वे करके पाया कि देश में सत्रह करोड़ तीस लाख मनोरोगी हैं। इनमें सिजोफ्रेनिया से लेकर शराब की लत से पैदा हुई मानसिक बीमारियों के शिकार लोग भी शामिल हैं। इनमें से 91 प्रतिशत लोगों का कभी इलाज ही नहीं हुआ है।    
                   



चीन में मुसलमान विरोधी आंधी

(प्रसिद्ध चीनी अर्थशास्त्री लाहम तोहती)                   
      चीन में मुसलमानों की खैर नहीं है। चीन के जिन इलाकों में मुस्लिम आबादी है वहां जबर्दस्त दमन चल रहा है,भारत में जो लोग मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते हैं चीन में चल रही मुस्लिम विरोधी आंधी पर चुप क्यों हैं ?
    पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के साथ जिस तरह का सौतेला व्यवहार राज्य प्रशासन ने किया और मुसलमानों की घनघोर उपेक्षा की है उसके तथ्य और सत्य को सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में बताया गया है। वाम में मुस्लिम विरोधीभाव चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुस्लिमविरोधी रुझान से काफी मिलता -जुलता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यप्रणाली के साथ पश्चिम बंगाल माकपा की कार्यप्रणाली और राज्य प्रशासन के अनेक लक्षण मिलते हैं। इस संदर्भ में चीन में मुसलमानों के साथ किए जा रहे बर्बर व्यवहार को जानना बेहद जरुरी है।
         खबर आयी है कि चीन के Uyghur  अल्पसंख्यक जाति के अनाथ बच्चों के साथ चीनी प्रशासन सबसे खराब अमानवीय व्यवहार कर रहा है। इस जाति के अनाथ बच्चों को एक अनाथाश्रम में नहीं रखा जा रहा है बल्कि कुछ अवधि के बाद उन्हें दूसरे शहर में स्थानांतरित कर दिया जाता है। अनाथ Uyghur बच्चों को कुत्ते और पोर्क का मांस खाने के लिए दिया जाता है और हेन जाति के लोगों के साथ रखा जाता है,उल्लेखनीय है पोर्क और कुत्ते का मांस मुसलमानों में वर्जिंत है। लेकिन इन अनाथ बच्चों को इसे जबर्दस्ती खिलाया जा रहा है। जो बच्चे प्रतिवाद करते हैं उनकी जमकर पिटाई की जाती है। यह खबर रेडियो फ्री एशिया ने प्रसारित की है।
     चीन में मुसलमानों के साथ किए जा रहे अमानवीय बर्ताव की सिर्फ मुसलमानों के द्वारा आलोचना नहीं हो रही है बल्कि अनेक कॉमरेड भी मुसलमानों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार से परेशान हैं। झिनजियांग के 40 वर्षीय अर्थशास्त्री और शानदार शिक्षक लाहम तोहती ने भी मुसलमानों के साथ किए जा रहे बर्बर बर्ताव की तीखी आलोचना की है। ये जनाव कम्युनिस्ट पार्टी के बागी सदस्य हैं और कईबार अपनी साफगोई के लिए चीनी पुलिस ने उन्हें घर में नजरबंद करके भी रखा है। ये साहब चीन की श्रेष्ठतम यूनीवर्सिटी मिनज़ु यूनीवर्सिटी में बेहतरीन शिक्षक हैं और इनकी चीन में साख भी है।
     लाहम को चीन सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करने के कारण ङाल ही में देश के बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गयी। लाहम एक सेमीनार में भाग लेने के लिए तुर्की जाना चाहते थे। लाहम साहब को चीन प्रशासन ने जिस काली सूची में शामिल किया है उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लाहम ने जो लेख लिखा है उसका यहां अंग्रेजी अनुवाद दे रहे हैं  इससे चीन के दमनकारी वातावरण पर व्यापक रोशनी पड़ती है। लाहम तोहती ने लिखा है-

These blacklists are always being used as weapons to trample the law for the sake of protecting “social order,” and so the law itself may as well be “illegal,” but of course the law can’t be illegal, therefore what’s illegal is the legitimacy of the government’s authority. Fairness and justice get flouted and eroded, and that’s a significantly harmful thing.
My name is Ilham Tohti, I am a Uyghur, and a legitimate citizen in possession of a valid People’s Republic of China ID who has for a long period of time conducted research on the “Xinjiang Problem.” At the end of March I received an invitation to the 2nd Turkic Culture Academic Conference  to be held in Izmir, Turkey from April 18th to the 24th. I knew from my current situation and past experiences that I had to inform the relevant “harmony” agencies that I was preparing to attend an academic conference. Through unceasing effort and multiple explanations they finally agreed to let me go abroad and attend the 2nd Turkic Culture Academic Conference. They seemed to believe I would not accept any interviews from the media or stay in Turkey… in the remaining time and with the help of a colleague, I sought out the school’s relevant departments, such as the Security Department, the Educational Administration Office, the Human Resources Office, the Organization Department, the Education Office, the college heads and classes at my institution, etc., etc., taking up a whole week’s time. When all was said and done I got them to put 13 red seals on my exit application. I started to worry that perhaps after leaving the country they wouldn’t let me back in. But when I expressed my concerns, they always responded: “How’s that possible? China is a country ruled by law.”
Though at that point all my concerns had not been addressed, I nevertheless went to the Turkish embassy to apply for a visa. At the Turkish embassy’s visa office I met with several other Uyghurs who were also planning to attend the 2nd Turkic Culture Academic Conference. The person in charge of visa applications at the Turkish embassy is Han Chinese, and I unfortunately already had the delight of experiencing his “attitude.” However, this time he appeared to be completely different person from when he completely refused, without reason, to accept my visa application materials back in November of 2009; his attitude was abnormally kind. Perhaps his attitude had something to do with the Turkish Ministry of Foreign Affairs understanding my concerns.
Getting the visa turned out to go quite smoothly. The day I received my visa, someone told me that the secretary of the Central Minzu Preparatory College, Arzigul, was informed that due to work requirements I was unable to leave the country. Learning this made me quite worried, as before I had gotten wind that certain relevant authorities were thinking of not letting me leave. That evening I was speaking with an Asia Weekly [亚洲周刊] reporter about the “Xinjiang Problem” when Domestic Security [国保]1 gave me a call and came over. Could it be that they weren’t letting me leave the country?  Two Domestic Security officers spoke with me the whole evening, exhausting me completely! They said I couldn’t go abroad and attend the academic research conference but didn’t show any sort of paperwork, relying just on spoken orders which is an even more preposterous violation of a legal citizen’s right to go abroad. I asked: which ministry is responsible for this? Which article of the PRC Law on Managing Entry and Exit of Citizens is being implemented here? These Domestic Security officers just offered excuses, saying they were informed by their superiors and were not privy to the exact particulars. One of them told me that his higher-ups decreed that I couldn’t leave the country but didn’t explain the reasons, and further suggested that I accept the “vacation” they had arranged for me,  to “another place” [in China] until the end of the conference in Turkey (and so two days later I took a plane to the South [of China] and there was “vacationed”2). I asked again: “Did you check and see which ministry this information was approved by?” They answered: “This is how the workflow is within the ministry, this is what the boss ordered, and even he’s not clear on what the relevant situation is, there’s no way to tell you.” When I tried to get him to show some documents and asked about compensation for the financial losses due to not being able to leave the country, I was met only with refusals. To all the relevant parties I express befuddlement at this reckless deprival of a citizen’s fundamental right to leave the country as well as deeply felt helplessness and regret. Analyzing the refusal to let me leave the country, perhaps it has something to do with being scared of someone “speaking the truth.” How is it that “Law Unsurpassed by None” can’t even protect one citizens most basic personal legal right?  The last half of last year I received invitations from Norway, Turkey, Sweden and several other countries, and each time I was prevented by the authorities from leaving the country. Perhaps I, Ilham Tohti, have been placed on a no-exit government blacklist? Are the authorities limiting one’s right to exit or enter the country to punish dissenting voices, or isolate them from the outside world?
I’ve thought about all these problems. Ilham Tohti, a citizen with a proper ID, apparently does not meet whatever standards there are in the “Exit and Entry Law” that exists only in the mouths of the authorities; it’s plain that this is an extremely outrageous affront against a citizen’s right to leave the country.
What legal basis is there to prevent me from leaving the country?
1. Section 1, Article 15 of the “Regulations for the Implementation of the Law on the Entry and Exit of Citizens of the People’s Republic of China” states, “Under the following conditions, Frontier Inspection officials at the customs checkpoint have the right to prevent exit or entry from the country: 1) one does not possess a PRC passport or other exit document; 2) one possesses an invalid PRC passport or invalid exit documents; 3) one possesses a forged or altered passport or documents, or is using the passport or documents of another person; 4) one refuses to offer documents for inspection.” This is for verifying the identity of those entering or exiting the country. Ilham Tohti has a valid ID and a valid passport, therefore, this regulation cannot be cited as the legal basis for preventing Ilham Tohti from leaving the country.
Section 1, Article 37 of the Constitution of the People’s Republic of China states that, “The freedom of person of citizens of the People’s Republic of China is inviolable,” while Section 3 states, “unlawful deprivation or restriction of citizens’ freedom of person by detention or other means is prohibited; and unlawful search of the person of citizens is prohibited.” As a citizen of the People’s Republic of China, leaving and entering the country is one of the legal personal freedoms of the complainant, and no work unit or individual may illegally deprive or limit this right.
Preventing Ilham Tohti, an ID carrying citizen, from leaving the country without any factual or legal basis is clearly illegal.
2. Section 1, Article 8 of the “Regulations of the People’s Republic of China on Frontier Inspection of Exit from or Entry Into the Country” states that “Under the following conditions, Frontier Inspection officials at the customs checkpoint have the right to prevent an individual from exiting or entering the country: 1) one does not possess exit or entry documents; 2) one possesses invalid exit or entry documents; 3) one possesses another person’s exit or entry documents; 4) one possesses forged or altered exit or entry documents; 5) one refuses to submit documents for inspection; 6) one enters or exits outside designated transit points; 7) the State Council or Ministry of State Security issues a notice prohibiting an one’s entry or exit; 8) Law or administrative rules and regulations prohibits exit or entry.” Because Ilham Tohti has a valid passport, was leaving through a legal transit point, has not been prohibited to leave by the State Council or the Ministry of State Security, and is not prohibited to leave by any law or administrative rule or regulation, this regulation cannot be cited as the legal basis for preventing Ilham Tohti from leaving the country.
3. When the authorities so brazenly deprive a citizen of his right to leave or enter the country, they seriously violate the 13th article of the Universal Declaration of Human Rights: 1) Everyone has the right to freedom of movement and residence within the borders of each state. 2) Everyone has the right to leave any country, including their own, and to return to their country.
Everything I’ve done is what any other reasonable citizen would do, and also is what any citizen with a sense of social responsibility ought to do. I believe that I will spare no effort in advocating my principles, I will continue laboring and appealing for fair, equitable treatment of the Uyghurs.  I call on friends who are Uyghur, Han, and of all other ethnicities to respect rule of law and human rights, to respect one’s own personal dignity and the dignity of others!!! Let us strive to become a people with dignity!














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