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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल

7

आजाद को अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर साथियों को पढ़ाने का बहुत शौक था परंतु उपन्यास या यौन विषय (सेक्स) संबंधी पुस्तकें देखकर उन्हें बहुत ही चिढ़ उठती थी। ब्रह्मचर्य का एक बहुत रूढ़िवादी आदर्श उस समय तक आजाद के मस्तिष्क में था। उससे पहले दो-एक दफे दल में ऐसे कांड हो चुके थे कि साथियों ने नारी के आकर्षण के कारण अपने कर्तव्य में निर्बलता दिखाई थी। आजाद को नारी, प्रेम और सौंदर्य की चर्चा से ही चिढ़ हो गई थी। कसरत स्वयं करने और दूसरों को कराने का भी शौक था। यदि कोई और काम न हो तो आजाद का मन लगातार बातचीत करने से या हवाई पिस्तौल ले कर किसी बारीक चीज पर निशाने का अभ्यास करते रहने से बहलता था।
      उस समय आजाद और दूसरे साथियों की ब्रह्मचर्य, नारी और सौन्दर्य के बारे में कैसी धारणायें थीं, यह दो-एक बहुत छोटे-छोटे उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में स्त्री का प्रसंग चलते ही आजाद एतराज किये बिना न रह सकते थे- ''फिर 'चुम्बक' की बात। यह साला 'चुम्बक' जिसे लगा ले डूबा। सिपाही को औरत से क्या मतलब '' उस समय ऐसी धारणा केवल आजाद की थी। दूसरे साथियों को स्त्री और प्रेम की चर्चा से कोई परहेज नहीं था। हां, सुखदेव भी इस प्रसंग में कम ही रस लेता था परंतु आदर्श की दृष्टि से कोई विरोध न था। उसका कहना था-'जब औरत है नहीं तो उस की चर्चा से क्या फायदा।'
      आजाद का सब से प्रिय गाना था-'मां हमें विदा दो, जाते हैं हम विजयकेतु फहराने आज।' वे प्राय: ही भगत सिंह या राजगुरु और बाद में बच्चन (वैशम्पायन) से यह गाना सुनाने के लिए अनुरोध करते। राजगुरु यों तो धीर स्वभाव था परंतु चुटकियां लेने में उसे मजा आता। जब आजाद उसे गाने के लिए कहें तो वह जरूर ही कोई इश्किया गजल गुनगुनाने की चेष्टा करने लगता। यह गजलें वह प्राय: भगत सिंह से सुन कर याद कर लेता था। भगत सिंह को शायरी से भी बहुत शौक था। महाराष्ट्रीय होने के कारण राजगुरु का उर्दू उच्चारण बहुत विचित्र था। गजल में वह आशिक और 'माशूक' को प्राय: ही 'आशुक' और 'माशिक' कह जाता और खूब हंसता। यदि आजाद 'विजयकेतु' वाला गाना सुनने पर जिद्द ही करें तो वह हंस कर उत्तर देता-'अभी पुलिस आता है विजयकेतु लेकर।'
      एक रोज राजगुरु कहीं से बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर का एक कैलेण्डर ले आया और लाकर 'नाई की मंडी' आगरा वाले मकान में दीवार पर लटका दिया। आजाद कहीं बाहर से लौटे। बच्चन (वैशम्पायन) ने उस कैलेंडर की और  संकेत किया-''भैया, देखा! यह कौन ले आया है?''
      आजाद ने कैलेंडर की ओर देखा। माथे पर बल पड़ गए। कैलेंडर को कील समेत दीवार से खींच लिया और फाड़ कर फेंक दिया।
      कुछ देर बाद राजगुरु लौटा। दीवार से अपना कैलेंडर गायब देखकर वह ऊंचे स्वर में पुकार उठा-''अरे, हमारे कैलेंडर का क्या हुआ?''
      बच्चन ने ओंठ दबाकर फर्श पर पड़े कैलेंडर के टुकड़ों की ओर देखा। राजगुरु ने झुंझलाहट और क्रोध के स्वर में प्रश्न किया-''यह किस ने किया?''   ''हमने किया।'' आजाद भला किसी से डरते थे।
      आजाद के प्रति आदर से स्वर को कुछ धीमा कर राजगुरु ने विरोध किया-''आपने क्यों फाड़ डाला? हम इतने शौक से तस्वीर लाये थे।''
      ''हमें-तुम्हें ऐसी तस्वीरों से क्या मतलब?'' आजाद ने डपट दिया।
      ''वाह, इतनी खूबसूरत तस्वीर थी।''
      ''हमें-तुम्हें खूबसूरत से मतलब?'' नाराजगी से ऊंचे स्वर में आजाद ने डांटा।
      ''तो जो कुछ खूबसूरत होगा उसे फाड़ डालोगे, तोड़ डालोगे?'' राजगुरु भी अड़ गया।
      ''हां तोड़ डालेंगे?'' आजाद ने सीना तान लिया।
      ''तो जाकर ताजमहल को भी तोड़ डालो'' राजगुरु ने चुनौती दी।
      ''हां तोड़ डालेंगे, जब हमारा बस चलेगा।'' आजाद की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए।
      दूसरे साथियों को होंठ दबाये, आंखें चुराते देख कर राजगुरु की झल्लाहट भी मुस्कराहट में बदल गई।
      ब्रह्मचर्य के विषय में 1929 के आरंभ में आजाद की ऐसी ही धारणा थी परंतु एक ही वर्ष में उन का दृष्टिकोण बहुत ही स्वाभाविक और यथार्थवादी हो गया था। अनाचार और उच्छृंखलता से तो आजाद को सदा ही घृणा रही परंतु 1930 के जाड़ों की बात मुझे याद है कि कानपुर के 'चुन्नीगंज' मुहल्ले में आजाद मुझ से बात किया करते थे कि क्रांति को जीवन भर का काम बना लेने वाले आदमी को क्रांतिकारी स्त्री से विवाह कर लेना चाहिए। कभी मजे में आकर सम्भावित पत्नी का जिक्र करते हुए कल्पना किया करते थे:
      ''...पहाड़-पहाड़ घूम रहे हों, एक राइफल उसके कंधे पर हो और एक हमारे     कंधे पर। दुश्मन से घिर जायें। वह राइफलें भरती जाए और हम दनादन-दनादन गोली चलाते जायें।''(क्रमशः)
                       

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

फै़ज़ अहमद फै़ज़ की जन्मशती के मौके पर विशेष- गुरूरे इश्‍क का बांकपन- मनमोहन

                                  

फैज अहमद फैज और उनकी शायरी की जगह और उसका मूल्य ठीक-ठीक वही बता सकते हैं, जो उर्दू जुबान और अदब के अच्छे जानकार और अधिकारी विद्वान हैं। मेरी समाई तो सिर्फ इतनी है कि अपने कुछ इंप्रेशंस’ (या इस कवि के साथ अपने लगाव की कुछ तफसीलें) रख दूं, सो यहां मैं इन्हीं को रखने की कोशिश करता हूं।

7वीं दहाई के जनवादी उभार के वर्षों में खासतौर पर, और उसके बाद लगातार, हमारी पीढ़ी की हिंदी रचनाशीलता को हमारे जिन बुजुर्ग उस्तादों का खामोश लेकिन मजबूत साथ और सहारा मिला, उनमें जर्मनी के बर्तोल्‍त ब्रेख्त, तुर्की के नाजिम हिकमत और हमारी उर्दू जुबान के फैज अहमद फैज शायद सबसे अहम थे। शायद इस पूरे दौर में नयी रचनाशीलता को ब्रेख्त की कठोर आलोचनाशीलता और द्वंद्वात्मकता ने देखना सिखाया है और फैज या नाजिम हिकमत की खरी क्रांतिकारी रूमानियत ने मौजूदा रणक्षेत्र में अपने पक्ष के साथ खड़े रहने का हौसला दिया है और पराजय और अलगाव के कठिन क्षणों में अपनी स्वप्नशीलता और स्वाभिमान की हिफाजत करना सिखाया है।

यह बात भी गौर करने लायक है कि पुराने प्रगतिशील आंदोलन की अत्यंत संपन्न विरासत में भी क्यों फैज की उपस्थिति हमें सबसे जीवित और दमदार लगती रही है। वे आज भी लगभग हर तरह से हमारे समकालीन हैं। बल्कि मैं सोचता हूं, 1990 के बाद नव-साम्राज्यवादी बर्बरता के नये आलम में फैज की शायरी में हमारे दिलों की धड़कन और ज्यादा साफ सुनाई देने लगी है।

मुझे याद है कि इमरजेंसी के खौफनाक दिनों में जब सव्यसाची द्वारा संपादित उत्तरार्द्धका पहला अंक (वैसे अंक 11) छपा और पत्रिका की पीठ पर फैज की नज्म लहू का सुराग’ (‘कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग’) छपी, तो कितना बुरा-भला सुनना पड़ा। एकाध क्रांतिकारी दोस्तों ने यहां तक कहा कि फैज भुट्टो के एंबेसडरके सिवा क्या हैं। इनकी कविता आपने क्यूं छापी! और दस्ते-नाखुने-कातिलया खूंबहाजैसे लफ्जों को कितने लोग समझते हैं? लेकिन मेरा खयाल है कि यह नज्म और इसके अलावा उन दिनों इसी पत्रिका में छपी बोल के लब आजाद हैं तेरेऔर निसार मैं तेरी गलियों पेजैसी नज्में न सिर्फ समझी गयीं, बल्कि इन्होंने उस कठिन समय में अजीब सी ताकत दी और हमारे नैतिक-भावनात्मक विक्षोभ को स्वर दिया।

यह मेरी खुशनसीबी है कि मुझे फैज साहब को सुनने का और उनसे छोटी सी मुलाकात का मौका मिला। शायद यह 1978-79 के बीच की बात है। एक दिन सुनाई दिया कि फैज हिंदुस्तान ही में हैं और (शायद विजिटिंग प्रोफेसरहो कर?) कुछ दिन के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी में ही चले आये हैं। हम लोग बड़े खुश थे। फिर एक दिन उनका काव्य-पाठ हुआ। शायद उस वक्त के डाउन कैंपसकी क्लब बिल्डिंग के पास की खुली जगह में कुछ कनातें खड़ी की गयीं थीं और मंच भी बांधा गया था। उस धूप वाले दिन का खुला नीला आसमान अभी भी याद है। फैज साहब ने जम कर अपनी ढेर सारी नज्‍में, गजलें कही थीं। जब वे खड़े हुए और उन्हें पहली बार देखा, तो थोड़ा अजीब सा लगा। सिर्फ उन्हें देख कर एक बार उस छवि को कुछ धक्का सा लगता था जो उनका पढ़ते-सुनते हुए मन ही मन बन गयी थी। सफारी सूट पहने (शायद एकाध अंगूठी भी), कुछ भारी-भारी सा डील-डौल लिये यह गंजे से सर वाला लंबा-चौड़ा शख्‍स देखने में कतई स्टेट बैंक या जीवन बीमा निगम का टिपिकलअफसर या मैनेजर लगता था। लेकिन जब फैज साहब ने सुनाना शुरू किया तो उनकी आवाज ने दिल को छू लिया, बल्कि सीधे पकड़ लिया।

हालांकि हमने मुशायरे की परंपरागत धज में तरन्नुम के साथ जलद-मंद्र-स्वरमें किया हुआ मजरूह सुल्तानपुरी का प्रभावशाली पाठ सुना है; धारावाहिक वक्तृता की शैली में कैफी आजमी या सरदार जाफरी का नज्में पढ़ना देखा है; बाबा नागार्जुन की बांध लेने वाली थियेटरीकलप्रस्तुतियां देखी हैं; आलोकधन्वा का अविस्मरणीय काव्य-पाठ सुना है; और तो और जेएनयू के स्पेनिश सेंटरकी मेहरबानी से रिकॉर्डेडआवाज में नेरूदा के स्पेनिश पाठ की एक बानगी देखने और आरोह-अवरोह के साथ उनकी नाद-गुण संपन्न गहिर गंभीर वाग्मिता की स्‍पंदित स्वर लिपि को सुनने का सौभाग्य भी मिला है। लेकिन फैज का अंदाज इन सबसे अलग था। यह किसी भी तरह की परफोरमेंससे कोसों दूर था। फिर भी उनकी आवाज में एक जादुई छुअन थी, जिसमें अपने कमाये हुए गहरे दर्द के एहसास के साथ एक ठहरी थकान और अनमनेपन में लिपटी विलक्षण कोमलता और आत्मीयता का मेल था। यह एक दुख उठाये हुए, अनुभव संपन्न, उम्रजदा शख्‍स की दिलासा और भरोसा दिलाती हुई आवाज थी। ऐसी आवाज शायद अब कुछ पुरानी बूढ़ी, घरेलू स्त्रियों के पास ही बची मिलगी। फैज इतने बेबनाव और सादे तरीके से कविताएं कहते थे कि कोई भी काव्य-रसिक उसे खराब तरीके का काव्य-पाठ भी कह सकता था, लेकिन यह शायद ज्यादा अच्छा तरीका था। उनके अलावा यह चीज रघुवीर सहाय के काव्य-पाठ में भी मिलती थी, बल्कि वे तो इसका उपयोग एक सचेत युक्ति की तरह करते थे। शमशेर का कहने का अंदाज भी गुफ्तगू ही का अंदाज था, जो उनकी कविताओं के मिजाज में ढला हुआ था और गजल तो अपनी परिभाषा में ही दिल से दिल की गुफ्तगू है।

खैर, फैज साहब ने जम कर सुनाया। वह नज्म भी – ‘कुछ इश्‍क किया, कुछ काम किया। फरमाइशें भी खूब हुईं। जो किसी ने कहा, ‘फैज साहब, ‘गुलों में रंग भरेभी सुनाइए’, तो फैज साहब ने हंस कर कहा, ‘कौन सी सुनाऊं, नूरजहां वाली सुनाऊं कि मेहंदी हसन वाली सुनाऊंऔर सब हंस पड़े।

इस बात का कम महत्त्व नहीं है कि फैज की शायरी को नूरजहां, बेगम अख्तर, अमानत अली खां, मलिका पुखराज, इकबाल बानो, अली बख्‍श जहूर, फरीदा खानम, फिरदौसी बेगम, बरकत अली खां, शांति हीरानंद और मेहंदी हसन जैसी अदभुत आवाजें नसीब हुईं। गालिब की शायरी के बाद इतनी तादाद में अव्वल दर्जे के गायकों ने, किसी और शायर की चीजें शायद ही गायी हों। यकीनन इससे फैज की शायरी का दायरा विस्तृत हुआ है। उनकी शायरी के गूढ़ार्थ और अनेक अर्थछटाएं उदघाटित हुए हैं। फैज को पढ़कर हमने जितना जाना है, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के महान गायकों से सुनकर कम नहीं जाना। गायक भी आखि़रकार अपने गाने से टैक्स्टकी अपनी व्याख्या पेश करता है और एक प्रकार से कृति की पुनर्रचना करता है लेकिन शायद इसकी गुंजाइशें टैक्स्टमें पहले से छिपी होती हैं।

एक दिन रूसी भाषा केंद्र के ऑडिटोरियम में फैज ने अल्लामा इकबाल पर अपना पर्चा पढ़ा, शायद अंग्रेजी में। यह विद्वत्तापूर्ण और जानकारी से भरा हुआ पर्चा उनकी शायरी के मिजाज से मेल नहीं खाता था। वैसे अंग्रेजी में उपलब्ध उनके ज्यादातर गद्य में कई बार नवशास्‍त्रीय किस्म की अकादमिकता हावी दिखाई देती है। इकबाल की शख्‍सियत और उनकी शायरी में फैज साहब की कुछ खास और बुनियादी किस्म की दिलचस्पी लगती थी। कुछ-कुछ वैसा ही रिश्‍ता था, जैसा रवींद्रनाथ और निराला का या प्रसाद और मुक्तिबोध का। बाद में यह भी पता चला कि इकबाल भी स्यालकोट के ही थे और इकबाल के प्रभाव की सघन छाया में ही एक नवोदित कवि के रूप में फैज का विकास हुआ था।

1978 में मैं रोहतक आ गया था। लेकिन इसके बाद भी लगभग दो साल तक मेरा रिश्‍ता जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र से बना रहा। रोहतक में डॉ ओमप्रकाश ग्रेवाल अंग्रेजी विभाग में प्रोफेसर थे। उन्होंने और डॉ भीम सिंह दहिया (जो उस वक्त विश्‍वविद्यालय के रजिस्ट्रार भी थे) ने मुझसे कहा कि मैं किसी तरह फैज साहब को रोहतक लाऊं। मैंने डॉ मुहम्मद हसन (जो एमए में मेरे शिक्षक भी रहे थे) से कहा कि फैज साहब को मुझे रोहतक ले जाना है। उन्होंने कहा कि मैं अगले दिन 11 बजे सेंटर में उनके कमरे में आ कर फैज साहब से खुद ही बात कर लूं।

शुरू में मुहम्मद हसन साहब से मेरा रिश्‍ता कतई औपचारिक और नपा-तुला था, लेकिन गहरा था। यों वे बात करने में सख्त, कंजूस और बेहद चौकन्ने शख्‍स लगते थे लेकिन उनके अंदर बंटवारे का सच्चा दर्द और एक तरह का सात्विक विक्षोभ था। नामवर जी और मुहम्मद हसन के जेएनयू में आने के बाद हिंदी-उर्दू के पाठ्यक्रमों को लेकर, खासतौर से हिंदी विद्यार्थियों को उर्दू का क्रेडिट कोर्स करने या पाठ्यक्रम के एक हिस्से को दोनों भाषाओं के लिए समावेशी ढंग से तैयार करने को लेकर पहली स्टूडैंट फैकल्टी कमेटी में जो बहस हुई, उसमें हसन साहब और हमारा एक ही पक्ष था। प्रगतिशील लेखक महासंघ’ (जो उन्हीं दिनों नयी शक्‍ल में खड़ा किया गया संगठन था) के आपातकाल के समर्थन में निकले प्रपत्र पर छपे अपने नाम को लेकर उनके मन में घोर ग्लानि थी। उन्हीं दिनों आपातकाल को लेकर उन्होंने अपना बेहद अच्छा नाटक जेहाकहमें सुनाया था।

खैर, अगले दिन जब मैं 11 बजे मुहम्मद हसन साहब के कमरे में दाखिल हुआ, तो फैज साहब उनकी अध्यक्षीयकुर्सी के सामने की कुर्सी पर बैठे थे। हसन साहब ने मुझे देखते ही उनसे कहा, ‘जनाब यही हैं, जिनका जिक्र मैं कल आपसे कर रहा था। मनमोहन साहब हमारे शागिर्द हैं। इन दिनों रोहतक यूनिवर्सिटी में हैं और आपको रोहतक ले जाना चाहते हैं।फैज साहब ने, जो अब तक खड़े हो गये थे, तपाक से हाथ मिलाया, जैसे गले मिल रहे हों। उनकी आंखें झिलमिला रही थीं, बोले, ‘रोहतक! अरे भाई रोहतक तो हमारा वतन है, जरूर चलेंगे। वैसे मैं अभी कुछ दिन पहले ही चंडीगढ़ (या शायद कुरुक्षेत्र?) हो कर आया हूं, लेकिन रोहतक जरूर चलना है। अभी तो बाहर (विदेश, फ्रांस या शायद सोवियत यूनियन?) जाना है, लौट कर प्रोग्राम बनाते हैं।मैं सोचता रह गया रोहतक और इनका वतन! कुछ दिनों बाद समझ में आया कि उनके दिमाग में संयुक्त पंजाब का पुराना नक्‍शा था, जिसका एक अहम शहरी केंद्र शायद रोहतक भी रहा होगा। जिया उल हक के पतन से पहले दसियों हजार लोगों की रैली में बुलंद आवाज में फैज का वो अविस्मरणीय तराना हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगेकी अदभुत प्रस्तुति करने वाली प्रख्यात पाकिस्तानी गायिका इकबाल बानो मूलतः रोहतक की ही रहने वाली थीं। खैर, हम लोग कुछ देर उनके साथ बैठे और उन्हें बाहर टैक्सी तक छोड़ा। बाहर जो विदेशी मूल की महिला उनका इंतजार कर रही थीं शायद उनकी बीवी एलिस ही रही होंगी। अफसोस है कि फैज साहब से फिर कभी मुलाकात नहीं हो पायी और उन्हें रोहतक लाने का हमारा ख्वाब, जिसमें शायद उनका भी कोई ख्वाब छिपा था, अधूरा ही रह गया।

इस बात पर जब गौर करते हैं कि क्यों हमारे वक्त में फैज की उपस्थिति दिनोंदिन इतनी प्रबल, इतनी वास्तविक और इतनी अनिवार्य होती चली गयी है, तो सबसे पहले यही खयाल आता है कि उनकी शायरी हमारे इस बैचेनी भरे ऐतिहासिक दौर में न्याय के कठिन संघर्ष में उलझी ताकतों के भावनात्मक और नैतिक उद्वेगों को, उनकी व्याकुलता और आंतरिक विक्षोभ को, अपमान और पराजय के बीच भी उनकी उद्दीप्त आत्मगरिमा, अकूत धैर्य, साहस और सुंदरता को बेमिसाल ढंग से उदघाटित करती है, सचाई और पूरेपन के साथ। यही एक चीज है जो फैज को फैज बनाती है और उन्हें हमारी आत्मा का मित्रबना देती है।

मीर और गालिब के बाद उर्दू जुबान में शायद फैज हमारी स्मृति में सबसे गहरे उतरने वाले शायरों में हैं। पिछली तीन शताब्दी में दूसरी भारतीय भाषाओं की कविता में भी इन तीनों जितनी पुख्तगी कितने कवियों में मिलेगी, कहना कठिन है। इसकी वजह जो समझ में आती है, वो ये कि ये तीनों कवि गहरे अर्थों में अपने-अपने वक्तों की भीषण उथल-पुथल की उपज हैं। यह उथल-पुथल कोरा ऐतिहासिक संदर्भही नहीं है, यह इनके भीतर से, इनके निजी जीवन और दिल-दिमाग के बीचों-बीच से इन्हें चल-विचल करते हुए कुछ इस तरह से गुजरी है कि इनके व्यक्तित्वों की अंदरूनी बनावट में रच-बस गयी है। इससे भी ज्यादा अहम यह है कि तीनों अपने-अपने ढंग से घोर अवमूल्यनकारी, अपमानजनक और हृदयहीन परिस्थितियों में मनुष्य की गरिमा की प्रतिष्ठा करते हैं; भीषण आंतरिक यातना और विक्षोभ से गुजर कर इसकी पूरी कीमत चुकाते हैं, लेकिन इसका पूरा दावा रखते हैं। इस तरह तीनों ही मनुष्य को तुच्छ बनाने वाली और कुचलने वाली परिस्थिति को मानने से इनकार करते हैं। यही इनका प्रतिरोध है। यह प्रतिरोध फकत इनके अपने सचेत चुनाव या पक्षधरता की वजह से पैदा हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। यह इनके लिए लगभग एक बुलफाइटमें उलझे, घिरे और आत्मरक्षा की कोशिश में लगे हुए शख्‍स की मजबूरी की तरह निर्विकल्प और अनिवार्य था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि तीनों गजल के शायर हैं। गजल एक किस्म का लिरिकही मान लिया गया है (हालांकि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है)। लेकिन इन्होंने गजल के आत्मपरक ढांचे में एक क्लासिकीअंदाज पैदा किया। यह क्लासिकी किस्म की महाकाव्यात्मकता फिनोमिनलकोण पैदा करने वाली उस विद्युत्धर्मिता और बुनियादी नजर की मांग करती है, जो महान त्रासदियों में हमें अक्सर दिखाई देती है (मिर्जा गालिब के यहां शायद यह चीज सबसे ज्यादा है)। इस खूबी के बाद गजल सिर्फ एक आत्मपरक उच्छ्वास या कोरा लिरिकनहीं रह जाती। वह चाहे एहसास के पर्दे पर ही सही, अपने युग के महानाटक की अंदरूनी कशमकश के जहां-तहां कौंदने वाले अक्स फेंकती चलती है।

खुद फैज ने गजल के काव्यरूप की इस विलक्षणता और चमत्कारिक लचीलेपन के बारे में कहीं लिखा है कि प्रतीक-व्यवस्था के सीमित प्रारूपों और एक रिवायत में बंधी-बंधायी पदावली और भंगिमाओं के दायरों के अंदर गजल कैसे नये-नये अर्थ और एक साथ अनेकस्तरीय अर्थछटाएं पैदा करती और खोलती है और नये अवकाश रच लेती है। कैसे इसमें अर्थ की नयी अनुगूंजें पैदा होती हैं और सुनाई देती हैं। फैज ने यह भी बताया है कि शायद इसीलिए यह नाजुक काव्यरूप उठाईगीरी, फरेब और तरह-तरह के दुरुपयोग के लिए भी ज्यादा खुला हुआ है। एक जैसी लगने वाली भंगिमाओं और पदावली की वजह से अच्छी गजल और खराब गजल के बीच फर्क की तमीज पैदा करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।

कुल मिलाकर यह कि मीर, गालिब और फैज इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे अपनी शायरी के जरिये न सिर्फ अपने निजी एहसास की बल्कि अपने-अपने बदलते वक्तों की तर्जुमानी करते हैं और उनकी नुमाइंदगी करने वाली प्रामाणिक आवाज बन जाते हैं। मानव स्थितियों की इसी बुनियादी और अस्तित्वमूलक पकड़ की वजह से उनकी अनुगूंजें उनके वक्तों के बाहर भी जब-तब सुनाई देती हैं।

मीर का जमाना एक बस्ती के उखड़ने का जमाना है (कैसी-कैसी सोहबतें उखड़ गयीं!’)। अंतःस्फोटों के बीच अपने ही मलबे में धंसते ह्रासग्रस्त सामंतवाद के उन दिनों में तमाम लूटपाट, अफरा-तफरी और बदहवास आपाधापी के बीच शाही अभिजात वर्ग के एक नुमाइंदे के तौर पर मीर (किसी हद तक अपने उदार सूफियाना मिजाज की वजह से भी) अपने युग की जलालत और क्रूरता के तीखे अहसास से गुजरते हैं। उनकी शोकमग्न आत्मा इस हानि का बोझ उठाती है और इसे बताती है। यह भी एक प्रत्याख्यान ही है। अगली सदी में, औपनिवेशिक विजय के युग में, इसी पिटे पिटाये शाही आभिजात्य के आखि़री अवशेष की तरह मिर्जा गालिब एक ज्यादा विडंबनामय जमीन पर खड़े हुए इसी तरह की आत्मपीड़ा, लांछना, नैतिकत्रास और sense of loss से गुजरते हैं और तुच्छताओं में घिर कर घिसटते अपने अस्तित्व के साथ मनुष्य की उद्दीप्त आत्मगरिमा की लौ को बचाते और प्रतिभासित करते चलते हैं।

फैज का वक्त और फैज का जीवन कतई अलग था। उनका रंगमंच और उस रंगमंच के किरदार अलग थे। कुल मिलाकर फैज का युग इतिहास की ऊर्ध्वगति और भविष्यवादी प्रेरणाओं की क्रियाशीलता का युग है। फिर भी फैज का आयुष्यक्रम कभी-कभी गालिब के विरोधाभासी जीवन की याद दिलाता है।

पैतृक रूप से एक भूमिहीन परिवार में जन्मे फैज के पिता ने भी अपनी जिंदगी की शुरुआत चरवाहे और कुली की तरह की थी, लेकिन किसी संयोग से उनके दिन फिरे और वे नाटकीय ढंग से अफगानिस्तान के बादशाह के यहां ऊंचे नौकरशाह बन गये। फैज के ही लफ्जों में उन्होंने काफी रंगीनजीवन बिताया। फिर एक दिन सांप-सीढी के इस खेल में वापिस अपनी जगह पहुंच गये। मामूली देहाती मां के बेटे फैज के हिस्से में ज्यादा से ज्यादा पिता के रुतबे की जली हुई रस्सीके कुछ बल ही आये होंगे।

प्रथम महायुद्ध के बाद साम्राज्यवाद विरोध की उत्ताल तरंगों से आंदोलित दुनिया में फैज ने होश संभाला। उनका बचपन और किशोरावस्था सोवियत क्रांति की विजय और असहयोग और खिलाफत आंदोलनों की हलचलों के साक्षी बने और राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के लोकव्यापीकरण के गहरे प्रभावों और ऊर्जाओं को जज्ब करते हुए गुजरे। 1930 के ग्रेट डिप्रेशनका अपने संदर्भ में फैज ने खासतौर पर जिक्र किया है। वे तब 20-21 साल के नौजवान थे। इस सर्वग्रासी मंदी ने जहां एक तरफ उनके अपने परिवार को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया और उनके सामने जीवनयापन का प्रश्‍न उपस्थित किया, वहीं दुनिया में इसने फासीवाद के उभार के लिए ईंधन का काम किया। देश में आजादी की दिनों-दिन तेज होती जंग और योरप में युद्ध के खिलाफ और अमन के हक में उठी प्रबल हिलोर के गहरे असर में फैज इन्हीं दिनों आये। इसी बीच कम्युनिस्ट आंदोलन और मार्क्सवाद से भी उनका रिश्‍ता जुड़ा। यह फैज के आत्मनिरूपण के महत्वपूर्ण वर्ष थे। भारत में प्रगतिशील साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन और प्रगतिशील लेखक संघ की प्रतिष्ठा करने वाली अग्रणी शख्‍सियतों में से एक फैज भी थे। इस शुरुआती दौर की प्रेरणा, लक्ष्य और स्वप्न ही फैज के अंतर्व्यक्तित्व की धुरी बन गये। फैज की शायरी इस बात की गवाही देती है कि ये चीजें उनसे कभी दूर नहीं हुईं और उनके लिए कभी झूठी नहीं पडीं। इनके स्रोत उनके यहां कभी सूखे नहीं, कठिन से कठिन वक्त में भी नहीं।

फैज का खुद का जीवन ज्यादा जटिल था। द्वितीय महायुद्ध के दौरान जब साम्राज्यवादी युद्ध लोक युद्धमें बदला तो फैज कॉलेज की लैक्चररशिप छोड़ कर सेना में भर्ती हो गये। बाहर ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलनतेज हो रहा था और सेना के अंदर फैज एक नाजुक संतुलन साधते हुए सेना को फासीवाद विरोधी युद्ध के लिए तैयार करने की मुश्किल उठा रहे थे। युद्ध के बाद वे सेना से बाहर आ गये और 1947 की जनवरी में ही पाकिस्तान टाइम्सके संपादक हो गये। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान ही में रह गये और दो ही तीन साल की पत्रकारिता और मजदूर आंदोलन के संगठन के बाद राजद्रोह के आरोप के साथ रावलपिंडी षड्यंत्र केसमें धर लिये गये। चार साल तक तन्‍हाईसमेत उन्होंने जेल जीवन की तमाम यंत्रणाएं सहीं। दो-तीन साल बाद कुछ समय के लिए फिर से पाकिस्तान में मार्शल लॉ के बाद की अंधी धर-पकड़ में आ गये। एक जज की मेहरबानी से छूट कर आये तो अखबार जब्त हो चुका था। उसके बाद उन्होंने लाहौर में आर्ट्स कॉउंसिलकी स्थापना की, मास्को और लंदन में कुछ समय रहे और आठ साल दोस्तों की मेहरबानी से कराची में काटे। 71 के बाद के दिनों में जब मिलिट्री शासन कुछ समय के लिए हटा तो (भुट्टो के कार्यकाल में) पुनः उन्हें कला-संस्कृति के कुछ प्रतिष्ठान खड़ा करने का मौका मिला लेकिन कुछ ही दिनों में फिर तख्तापलट हुआ, जिया उल-हक की सैनिक तानाशाही लागू हो गयी। इसके बाद वे चार साल तक अफ्रो-एशियाई राइटर्स एसोसिएशनऔर उसकी पत्रिका लोटसको संभालने बेरूत चले आये।

फैज की शायरी का ग्राफ भी दिलचस्प है। 1941 में जब उनका पहला संकलन नक्‍शे फरियादीप्रकाशित हुआ तो उसमें उनके अंतर्जगत के मानचित्र की शुरुआती निशानदेही हो गयी। इस संग्रह में उनकी 1928 के बाद की प्रारंभिक रचनाओं से लेकर, प्रगतिशील आंदोलन की प्रेरणाओं से उनके रिश्‍ता बनाने तक की विकास यात्रा संचित है। सद्यजात उच्छ्वसित रूमानी संवेगों की शुरुआती बेकली और तीव्रता इनमें से पहले दौर की अनेक रचनाओं की संचालिका शक्ति है, जो ज्यादातर निजी किस्म की है और तेजी से चढ़ती और गिरती है। इनमें लगता है कि कवि की एक उम्र है और बाहरअभी ज्यादातर बाहर ही है, ‘अंदरनहीं आया है। निजी अभी तक निजी ही बना हुआ है। हालांकि अपने दौर की मुख्य दिशा के मुताबिक कवि ने बाहर की दुनिया की कठोर हकीकत और नैतिक तकाजों से अपने भाव-संसार का मेल करना शुरू कर दिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में कवि को खुद को बार-बार समझाना बुझाना पड़ता है मेरा दिल गमगीं है तो क्या, गमगीं ये दुनिया है सारीऔर ये दुख तेरा है न मेरा, हम सब की जागीर है प्यारीइसलिए क्यूं न जहां का गम अपना लें, बाद में सब तदबीरें सोचें। एक तरफ अपनानेकी यह जद्दोजहद चलती है तो दूसरी तरफ एक और ही निजी उधेड़बुन चलती रहती है, जो कभी भी कह उठती है, “हो चुका खत्म अहदे-हिज्रो-विसाल जिंदगी में मजा नहीं बाकीया अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो, अब यहां कोई नहीं, कोई नहीं आएगा

नक्‍शे फरियादीमें ही फैज की बेहद लोकप्रिय नज्म मुझसे पहली सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांगसंकलित है। ये नज्म साहिर की नज्म ताजमहलसे ज्यादा अच्छी है और पंत की बाले तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूं लोचन, भूल अभी से इस जग कोजैसी खराब कविता से ज्यादा सच्ची और प्रामाणिक है। अंततः यह नज्म प्रगतिशील आंदोलन की तत्कालीन मुख्यधारा की उन ढेर सारी रचनाओं के नमूने में ही ढली हुई है, जिनमें कई बार भावनात्मक अनुरोध अपनी जांच किये बगैर अति नाटक की मदद से और नैतिकीकरण की युक्ति का सहारा लेकर सहानुभूति का नया ढांचा खड़ा करना चाहते हैं और न्याय-चेतनाके अनुरूप स्थित होना चाहते हैं। नक्‍शे फरियादीमें ही फैज ने एक नये कवि की इस स्वाभाविक लड़खड़ाहट को पार कर लिया था। बोल के लब आजाद है तेरेजैसे तराने या दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार केजैसी मर्मस्पर्शी गजलें इसी संकलन में शामिल थीं।
नक्‍शे फरियादीकी एक गजल में फैज का यह शेर है

फैज तकमीले गम भी हो न सकी
इश्‍क को आजमा के देख लिया

लेकिन हम जानते हैं कि इश्‍क की मुश्किल आजमाइश अभी शुरू ही हुई थी और ताजिंदगी जारी रही। इसे अभी कई बीहड़ रास्तों से गुजरना था। तकमीले गम भी खूब हुई लेकिन फिर भी कम ही ठहरी।

आजादी के बाद राष्ट्रीय आंदोलन के बिखराव के वर्षों में, खासकर 50 के दशक में प्रगतिशील आंदोलन की स्वतः स्फूर्त ऊर्जा खत्म होने लगी और धीरे-धीरे कम से कम एक बार पूरा आंदोलन ही बिखर कर विसर्जित हो गया। आखिरी शब के हमसफरअपना-अपना सफर खत्म करके सुस्ताने के अपने ठिकाने ढूंढ़ रहे थे। कोई किसी किनारे लगा, कोई किसी और किनारे। धीरे-धीरे अच्छी खासी तादाद में लोग प्रलोभनों या पराये वैचारिक दबावों और प्रभावों में आये और खामोशी से कहीं और चले गये। उर्दू-हिंदी के कितने ही तरक्कीपसंद, ‘इप्टाऔर पृथ्वी थियेटर्सकी कितनी ही प्रतिभाएं जो कभी इस तहरीक का परचम उठाये गांवों-कस्बों की खाक छानते फिरते थे, एक दूसरी ही दुनिया में जा बसे। न जाने कितने कलाकार संस्कृति के व्यावसायिक ढांचों में जज्ब हो गये या फिर फिल्म उद्योग के विषाल उदर में ठीक-ठीक समा गये। क्रांति का खयाल अब कोई खास खलल पैदा न करता था। इन प्रतिभाओं ने इन नयी जगहों को भी कुछ वक्त के लिए अपनी जल्वागरी से रौशन जरूर किया, लेकिन एक आंदोलन जिसकी जड़ें मामूली लोगों की ठोस जिंदगी में, उनके दुखदर्द में, उनके सपनों और दैनिक संघर्षों में थीं, एकबारगी खत्म हो गया।

लेकिन फैज साहब का मामला कुछ अलग था। उनका दर्दभरा लंबा और मुश्किल सफर अभी बचा हुआ था जिसे उन्हें लगभग अकेले ही तय करना था। अलग पाकिस्तान के खयाल को फैज ने कुबूल कर लिया था और जनवरी ’47 में ही पाकिस्तान टाइम्सका संपादन करने लाहौर आ चुके थे। हालांकि अगस्त 1947 में फैज लिख रहे थे, “ये दाग-दाग उजाला ये शबगजीदा सहर, वो इंतिजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं। लेकिन शायद तब उन्हें भी इस बात का इल्म न रहा होगा कि आने वाले दिन इस कदर काले होंगे।
   फैज की जिंदगी का एक बहुत ही अहम और पेचीदा पहलू यह है कि बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान ही में रहे। लिहाजा आजादी की वे खुशफहमियां और झूठी तसल्लियां उनके हिस्से में नहीं आयी थीं, जो प्रगतिशील आंदोलन से निकले उनके किसी जमाने के संगी-साथियों को हिंदुस्तान में आसानी से नसीब थीं। ज्यादातर वक्त उन्होंने पाकिस्तान में जनवाद को कुचल कर रखने वाले अमरीकापरस्त जालिम भूस्वामी-सैनिक गठजोड़ की दमघोंट सुरंगों में घोर आत्मविच्छिन्नता से गुजरते हुए या एक निर्वासित की जिंदगी जीते हुए बिताया। आजादी उनके लिए अभी भी एक सपना थी। सेना में शामिल होकर फासीवाद के खिलाफ लड़ने वाले फैज के लिए फासिज्म लगभग तमाम उम्र एक जिंदा हकीकत रहा, लेकिन बड़ी बात यह थी कि घोर अलगाव और अकेलेपन की इन मुश्किल परिस्थितियों में फैज ने अपने निरूपण काल की लौ की हिफाजत अपनी आबरू की तरह की, उसे न सिर्फ जिलाये रक्खा बल्कि इस पूरे दौर में उनके अंतःकरण में उसकी दीप्ति और भी ज्यादा स्वच्छ, उदग्र और प्राणवंत हो गयी। गुरुरे इश्‍क का बांकपनकम न हुआ, उल्टा बढ़ता गया।
   यह नहीं भूलना चाहिए कि न्याय के लिए लड़ने वाले लोग वर्गारोहण और बुर्ज्वा सुखभ्रांतियों की भूलभुलैयों में ही गुम नहीं होते, दमनकारी परिस्थितियों में नृशंसीकरण और हताशा के सामने भी अलग-थलग और लाचार होकर टूट जाते हैं और समर्पण कर देते हैं। खासकर तब, जबकि परिदृश्‍य में संगठित प्रतिरोध के कोई विश्‍वसनीय लक्षण दिखाई न देते हों। इसलिए फैज को ही इस बात का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे इश्‍क के इस कठिन इम्तहान में सुर्खरू हो कर निकले।

नक्‍शे फरियादीके बाद फैज की शायरी को जैसे अपना आपा मिल गया। कवि जैसे अपने असल मैदान में आ पहुंचा हो। जेल की जिंदगी ने मंच को ठीक-ठीक बांध दिया और उन्हें अपने वक्त के नाटक के बीचोंबीच उस केंद्रीय जगह ला खड़ा किया जहां से वे अपने भीषण आंतरिक संघर्ष के जरिये भी बीसवीं सदी के अल्पविकसित नवस्वतंत्र देशों के मुख्य संघर्ष की रूपरेखा को संकेतित कर सकते थे और आजादी और जनवाद के ज्वलंत प्रश्‍न की त्रासद विडंबना को ज्यादा से ज्यादा उदघाटित कर सकते थे।

दस्ते-सबा’ (1952) और जिंदांनामा’ (1956) और उसके बाद दस्त-ए-तह-ए-संग’ (1964) में फैज की शायरी की तमाम खूबियां एक रचनात्मक संश्‍लेषण में ढल कर अपनी मौलिकता और उत्कर्ष के साथ उभर कर आती हैं और अपनी पूरी आजमाइश करते हुए उनके कवि व्यक्तित्व को तमाम पहलुओं को समग्रता में सामने लाती हैं। यह चीज बाद तक आने वाले दूसरे संग्रहों में भी हम देखते हैं।

इस पूरे लंबे दौर को एक साथ देखें तो फैज की ताकत इस बात में छिपी लगती है कि वे न्याय के बीहड़ संघर्ष की सच्चाई, सुंदरता और जटिलता को पूरी गहराई से समझते हैं, उसका सरलीकरण नहीं करते। इस इश्‍क के गुरूर, इसकी आबरू और शान को वे दिल से जानते और समझते हैं, इसके तमाम बोझ और जानलेवा तकाजों के साथ। इस दर्द का सौदा उन्होंने अपनी इन्सानी गरिमा की हिफाजत की ज्यादा गहरी खुशी के लिए किया है, यह जानते हुए कि इस लड़ाई में कामयाबी की या मंजिल पा लेने की कोई गारंटी नहीं। इसमें बार-बार की नाकामी कोई खास मानी नहीं रखती यह मश्‍क ही खुद में कामयाब है। फैज ही कह सकते थे फैज की राह सर-ब-सर मंजिल, हम जहां पहुंचे कामयाब आये। इस कठिन रास्ते का तमाम अधूरापन इसके तमाम पेच-ओ-खम के साथ उन्हें मंजूर है। बेगानगी, उदासी, अकेलेपन, विकलता और बेबसी के भयानक रेगिस्तान को वे जिस बड़प्पन, धीरज और साहस से पार करते हैं और जिस संलग्नता और आत्मगर्व के साथ अपने स्वप्न की स्वच्छता और अपनी आशिकी की उत्कटता को हर कीमत पर बचाना चाहते हैं, वह फैज के कवि व्यक्तित्व की पुख्तगी की ही एक मिसाल है।

अपनी एक नज्म में फैज ने कवि के अंतःकरण को अत्याचार और न्याय का रणक्षेत्र” (‘तबअ-ए-शायर है जंगाह-ए-अद्लोसितम’) कहा है। कहना गैरजरूरी है कि सबसे ज्यादा ये फैज के अपने भावजगत का ही बखान है। प्रामाणिक ढंग से वही कह सकते थे दुख भरी खल्क का दुख भरा दिल हैं हम। हम आगे की उनकी तमाम शायरी में अत्याचारऔर न्यायके इस भीषण संग्राम की बदलती शक्‍लों के साथ कवि की दुर्द्धर्षता की अनेक सुंदर और शानदार छवियां देखते हैं। बार-बार हार कर भी इस बदी हुई बाजीमें कवि हारता नहीं; अपने शोक और एकाकीपन को एक ट्रैजिक हीरोकी शान, आत्मगरिमा और बड़प्पन के साथ धारण करता है, अपनी सजा को कुबूल करता है और समर्पण से इनकार करता है। दरअसल फैज एक ऐसे कवि हैं, जिन्होंने मंसूर और फरहाद की पुरानी परंपराओं से लेकर कुर्बानियों से भरी प्रतिरोध की तमाम साम्राज्यवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी मुक्तिकामी आधुनिक परंपराओं को आत्मसात किया और उनकी कीमत समझते और चुकाते हुए उनके संवाहक बने। हम जानते है कि एशिया, अफ्रीका, लातीनी अमरीका और तमाम दुनिया के मुक्तिकामी जनगण के संघर्षों के साथ कैसे उनके दिल की धड़कनें पैबस्त थीं। वे सबसे अच्छी तरह यह जानते थे कि अंदर से यह एक ही लड़ाई है। यह बात अलग है कि अपने इस सफर में फैज को कभी यह लगा कि उठेगा जब जम्म-ए-सरफरोशां/पड़ेंगे दार-ओ-रसन के लाले/कोई न होगा के जो बचा लेतो कभी ऐसा भी वक्त रहा और ज्यादातर रहा, कि लगा, “न रहा जुनूने-रुखे-वफा/ये रसन ये दार करोगे क्या। लेकिन फैज इन सब स्थितियों के बीच अपनी खुदी को बचाना जानते हैं। उनकी खूबसूरत नज्म आज बाजार में पा-ब-जौलां चलोजालिमों के निजाम में अपने लांछित और अपमानित प्रेम की सुंदरता, शान और आत्मगर्व को जिस तरह पूरे कद में सामने लाती है और उसका जश्‍न मनाती है, उससे फैज की आशिकी की गहराई और नैतिक तड़प का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। यह कविता अत्याचार और न्याय के बीच के रणक्षेत्र को उसी तरह एक ऐतिहासिक थिएटर में बदलती है, जैसे मुक्तिबोध की कविता भूलगलती

फैज सच्चे वतनपरस्त और सच्चे अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे। दुनिया भर के जनसंघर्षों के साथ एकजुटता व्यक्त करके अंतर्राष्ट्रीयतावादी हो जाना आसान है लेकिन अंतर्राष्ट्रीयतावाद की असल परख तब होती है, जब आपका मुल्क एक अविवेकपूर्ण युद्ध में झोंक दिया जाता है।

यह उल्लेखनीय है कि 1965 की भारत के साथ अनावश्‍यक जंग का और 1971 में बांग्लादेश के आधिपत्य के लिए फौजी हुक्मरानों के द्वारा की गयी कत्लोगारत का फैज ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रतिकार किया और अपने मुल्क की अंधराष्ट्रवादी धारा का विरोध मोल लिया जबकि 1962 में चीन के साथ भारत के युद्ध के हक में प्रगतिशील आंदोलन के उनके हिंदुस्तानी दोस्तों का एक अच्छा-खासा तबका अंधराष्ट्रवादी मुहिम का शिकार हुआ।

एक बात जो खासतौर पर समझने की है, वो ये कि फैज का खुद के सरोकारों से रिश्‍ता कोरा वैचारिक, नैतिक या कोई रस्मी रिश्‍ता नहीं है। वे उनके खुद के सरोकार हैं, खु़द कमाये हुए, ‘ऑर्गेनिकऔर अपरिहार्य। इनमें उनके वास्तविक और निजी स्टेक्सथे। सामाजिक सरोकार और निजी सरोकारों में, ऐतिहासिक कार्यसूची और निजी कार्यसूची में उनके लिए कोई अंतर न था। इसीलिए रेहटरिकका सहारा लेने की जरूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई जबकि उनके निरूपण काल में इसका चलन आम था। एक अमूर्त क्रांतिकारी रूमान, अमूर्त देशप्रेम या अमूर्त आवारगी और दीवानगी की अनुष्ठानिक भंगिमाएं उकेरने के लिए यह काफी मुफीद है। रेहटरिककई बार एक कर्मकांड के खोल या परिधान की तरह होता है, जिसे पहन कर दिए हुए पार्टको अदा करने की सहूलियत काफी मिल जाती है लेकिन उस कवि का काम कोरी परफोरमेंससे कैसे चल सकता है, जिसका अपना अनुभव और बोध एक बाध्यकारी और निर्विकल्प अस्तित्वमूलक संघर्ष के जरिये पारिभाषित हो रहा हो और इसी को चलाने के लिए उसे भाषा की जरूरत पड़ती हो। फैज के शब्‍द अगर बजने के बजाय गूंजते हैं, सच्चे लगते हैं और दिल में उतरते हैं तो उसकी बड़ी वजह यही है कि वे असल की ताकत लेकर आते हैं। उनमें वही उत्कटता और मार्मिकता है जो फैज की अपनी जद्दोजहद में थी।

जिस चुनौती से फैज का सामना था, वह आज और भी विकराल हो कर सामने है। उनका सपना चाहे ऊपर-ऊपर टूट गया लगता हो, इतिहास के गर्भ में फिर से स्पंदित और जीवित है। इस समय का संघर्ष ज्यादा भीषण और जटिल है, लेकिन उसी अनुपात में प्रतिरोध की संभावनाएं ज्यादा सघन, व्यापक और मूलगामी हुई हैं। इस लज्जित और पराजित युग में भी तमाम थकन, उदासी, विछोह और व्यथापूर्ण अकेलेपन के बीच फैज का अंतःसंघर्ष, उनका जीवट, धैर्य, उनकी हठी पक्षधरता और उनका अप्रतिहत प्रतिरोध हमारी स्मृति में अपनी सच्चाई और प्राणमयता के साथ तब तक जीवित है, जब तक यह लड़ाई जारी है। कठिन आशिकी की फैज की यह परंपरा आने वाले लंबे दौर में हमारे साथ चलेगी।

(  यह लेख हाल ही में जनवादी लेखक सेघ की पत्रिका 'नयापथ 'के फैज अहमद फैज विशेषांक में छपा है, इसे यहां मोहल्ला लाइव डॉट कॉम से साभार दे रहे हैं।नयापथ का पता है - 42 अशोका रोड,नयी दिल्ली-110001,    लेखक परिचय- मनमोहन। हिन्दी क्षेत्र में नवजागरण की जो जरूरत है, उसको शिद्दत से महसूस करने वाले विचारकों में मनमोहन का नाम बहुत ऊपर है। 1975 की इमरजेंसी के दौर में बहुत सारे साहित्यकार, लेखक और पत्रकार इंदिरा गांधी और संजय गांधी की जय जयकार में लगे थे लेकिन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तानाशाही के खिलाफ लामबंद था। मनमोहन उन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एमए के छात्र थे। उनकी गिनती उस दौर के जनवादी कवियों में होती थी। उस काले दौर में भी जिन बुद्धिजीवियों ने हर मोड़ पर इंदिरा गांधी के चापलूसों को चुनौती दी थी, मनमोहन और उनके साथी उस वर्ग के अगले दस्ते में शामिल थे। मनमोहन की कविताएं राजा का बाजा”, “जिल्लत की रोटीऔर चतुर लाल का हुक्काहिंदी साहित्य में ऊंचे मुकाम पर मानी जाती हैं। आजकल रोहतक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में काम करते हैं और बायें बाजू की हर तहरीक में शामिल होते हैं। उनसे manmohanshubha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


शनिवार, 6 नवंबर 2010

7 नबम्वर महान अक्टूबर क्रांति पर विशेष- क्रांतियां व्यर्थ नहीं जातीं

            पूंजीवाद स्वभावतः कृतघ्न है और समाजवाद स्वभावतः कृतज्ञ है। समाजवाद ने हमेशा पूंजीवाद की सकारात्मक बातों को माना है। लेकिन पूंजीवादी विचारक और पूंजीपतिवर्ग समाजवाद की सकारात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
   पूंजीवादी विचारक यह अच्छी तरह जानते हैं कि सन् 1917 की सोवियत अक्टूबर क्रांति की पहली महान उपलब्धि है गरीबों का सत्ता में आना । और सारी दुनिया को यह दिखाना कि मजदूर वर्ग भी शासन संभाल सकता है। फ्रांस की राज्य क्रांति के समय किसी के दिमाग में यह सपना नही आया था कि भविष्य में कभी मजदूरों की सरकार भी आ सकती है।
   अक्टूबर क्रांति के पहले तक इतिहास में राजसत्ता को चलाने और संभालने का अनुभव अभिजात्यवर्ग को ही था। पहलीबार गैर अभिजात्य वर्गों ने बोल्शेविक पार्टी के झंड़े तले एकत्रित होकर क्रांति की ,और सोवियत सत्ता को संभाला। मजदूर और किसान सरकार चला सकते हैं यह बात सिद्ध की । इस धारणा को खंडित किया कि शासन चलाने की शक्ति सिर्फ अभिजनों में होती है।
     सामंतों और बुर्जुआजी को सरकार चलाने का अनुभव था। लेकिन कम्युनिस्टों को 1917 की क्रांति के पहले सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। वे सरकार चलाने के मामले में अनुभवहीन थे ,नीति बनाने के मामले में अनुभवहीन थे। उन्होंने प्रशासन प्रबंधन को पूंजीवाद से ग्रहण किया और संगठन बनाने की अपनी क्षमता के साथ उसका शानदार रसायन तैयार किया।
       अक्टूबर क्रांति की दूसरी महान उपलब्धि है कि उसने मजदूरवर्ग को समाज का नायक बनाया। फ्रांस की राज्य क्रांति ने आधुनिक समाज के मुखिया के रूप में बुर्जुआजी को प्रतिष्ठित किया । लेकिन अक्टूबर क्रांति ने बुर्जुआजी को अपदस्थ करके मजदूरवर्ग को आधुनिकयुग के नायक के पद पर स्थापित किया।
   अक्टूबर क्रांति की तीसरी महान उपलब्धि है फ्रांस की राज्य क्रांति के बाद बुर्जुआजी ने जो वादे किए थे वह उन्हें पूरा करने में असफल रहा। उसकी इसी असफलता के रूप में नये पूंजीवादी राज्य का साम्राज्यवाद,बड़ी इजारेदारियों ,उपनिवेशवाद आदि में रूपान्तरण हुआ और प्रथम विश्वयुद्ध हुआ जिससे यह सिद्ध हो गया था कि बुर्जुआजी समाज को संतुष्ट रखने, खुशहाल रखने,आजादी देने आदि के मामले में बुरी तरह असफल है।
      जबकि अक्टूबर क्रांति ने यह मिथ तोड़ा कि पावर का केन्द्र बुर्जुआजी है। उसने यह मिथ भी तोड़ा कि मजदूर सिर्फ कामगार है,नौकर है। अक्टूबर क्रांति का यह महान योगदान है कि उसने मजदूरवर्ग को पावर के केन्द्र में स्थापित किया। अब मजदूरवर्ग सिर्फ वस्तु बनाने वाला कारीगर मात्र नहीं था । बल्कि उसे पावर के रूप में,सत्ता संघर्ष की सबसे मजबूत कड़ी के रूप में कम्युनिस्टों ने प्रतिष्ठा दिलायी।
   आज सारी दुनिया में मजदूरवर्ग ही अकेला ऐसा वर्ग है जो बुर्जुआजी को सीधे चुनौती दे रहा है। बुर्जुआजी को समाज के किसी भी वर्ग से भय नहीं लगता उसे भय लगता है तो एकमात्र मजदूरवर्ग से।
     मजदूरवर्ग की शक्तिशाली इमेज बनाने में कम्युनिस्ट आंदोलन और विश्वव्यापी मजदूर आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज सारी दुनिया में कोई भी सरकार मजदूरवर्ग के हितों की अनदेखी करके टिक नहीं सकती। यह अक्टूबर क्रांति की महान उपलब्धि है।
    सन् 1917 की अक्टूबर क्रांति का सबसे बड़ा योगदान है इसने विषमता के मिथ को तोड़ा है। यह माना जाता था विषमता तो प्रकृति की देन है,ईश्वरकृत है और पूर्वजन्म के कर्मों का फल है। कम्युनिस्टों ने इन सब बातों को वास्तव जीवन में खारिज करके दिखाया है। इससे यह चेतना पैदा करने में मदद मिली है कि विषमता प्राकृतिक ,ईश्वरकृत या पूर्वजन्म के कर्मों का फल नहीं होती बल्कि वर्गीय शोषण के गर्भ से विषमता का जन्म होता है। विषमता के भौतिक कारण होते हैं।
  विषमता पैदा करने में पूंजीपतिवर्ग की निर्णायक भूमिका होती है। पूंजीपतिवर्ग समाज का उद्धारकवर्ग नहीं बल्कि शोषकवर्ग है। यह बात सारी दुनिया के ज़ेहन में उतारने में अक्टूबर क्रांति ने मील के पत्थर का काम किया है। अक्टूबर क्रांति के बाद पूंजीपतिवर्ग ने धीरे-धीरे पूंजीपति के नाम से अपने को सम्बोधित करना ही बंद कर दिया,सारी दुनिया में पूंजीपति वर्ग के प्रति घृणा की लहर पैदा हुई जिसका असर आज भी बाकी है। आज भी सारी दुनिया के लोगों में अधिकांश लोग पूंजीपतिवर्ग से नफ़रत करते हैं। और मजदूरों के प्रति प्रेम बढ़ा है।  
      अक्टूबर क्रांति के पहले मजदूरों-किसानों, वंचितों और हाशिए के लोगों में स्वतंत्रता की धारणा उतनी प्रबल नहीं थी जितनी प्रबल अक्टूबर क्रांति के बाद हुई। स्वतंत्रता और समानता की बुर्जुआ अवधारणा के विकल्प के रूप में नयी स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा का उदय हुआ। अक्टूबर क्रांति के पहले स्वतंत्रता का अर्थ वही था जो फ्रांस की राज्य क्रांति ने निर्मित किया था। तब स्वतंत्रता का अर्थ था व्यापार और बाजार की स्वतंत्रता। सामाजिक समूहों की स्वतंत्रता के रूप में,हाशिए के लोगों की स्वतंत्रता के रूप में साधारणतौर पर अक्टूबर क्रांति के बाद ही सोचना आरंभ हुआ।
    साधारण लोगों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ महज बोलने की आजादी नहीं है। यह स्वतंत्रता का सीमित दायरा है। मनुष्य के बोलने का उसके सामाजिक अस्तित्व के साथ संबंध होता है। मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व के सवालों को स्वतंत्रता के साथ जोड़ने कारण ही कालांतर में सारी दुनिया में विभिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों ने अपने अस्तित्व रक्षा के सवालों को अभिव्यक्ति दी। आजादी और स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखा । बुर्जुआजी ने स्वतंत्रता के जिस पैराडाइम का निर्माण किया था उसे पूरी तरह बदला।
    मजदूरवर्ग ने श्रम को पूंजी के जुए से मुक्त करने के महान लक्ष्य के साथ स्वतंत्रता को जोड़ा था। बुर्जुआ स्वतंत्रता श्रम को वह पूंजी के जुए से मुक्त नहीं कर पाती इसके कारण बहुसंख्यक समाज के लिए स्वतंत्रता निरर्थक बनकर रह जाती है। पूंजी के जुए में बंधे रहकर जहां तक जा सकते हो वहां तक स्वतंत्रता है।
     बुर्जुआजी के लिए स्वतंत्रता सिर्फ़ व्यापार तक सीमित थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वह बहुत ही सीमित अर्थ में ,अपने हितों के संरक्षण के संदर्भ में इस्तेमाल करता था।
    अक्टूबर क्रांति ने आम लोगों को चीजों को एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखने की आदत पैदा की। स्टीरियोटाइप सरलीकरणों से राजनीति को मुक्त किया। बुर्जुआजी ने स्वतंत्रता के पास मनुष्य को खड़ा रखने की बजाय निजी संपत्ति को खड़ा किया और इस तरह उसने निजी संपत्ति और स्वतंत्रता में साँठगाँठ पैदा कर दी। अक्टूबर क्रांति ने स्वतंत्रता के साथ निजी संपत्ति की जगह मनुष्य को खड़ा कर दिया,मजदूरवर्ग को खड़ा कर दिया। उसने स्वतंत्रता की अंतर्वस्तु में से निजी संपत्ति को निकाल दिया।  
     अक्टूबर क्रांति ने हमारे सामने यह सवाल खड़ा किया कि हम स्वतंत्रता सहित मनुष्य चाहते हैं ? या मनुष्यरहित और संपत्तिसहित स्वतंत्रता चाहते हैं ? संपत्तिसहित स्वतंत्रता का अर्थ है अमीरों के वर्चस्व का बना रहना। शोषकों के वर्चस्व का बने रहना। बोल्शेविकों ने इस वर्चस्व को चुनौती दी और सारी दुनिया को स्वतंत्रता के नए मार्ग पर चलने की सीख दी है और आज सारी दुनिया इस सीख से लाभ उठा रही हैं। विभिन्न गैर -बुर्जुआ समुदाय अपने लिए स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक अस्तित्व के सवालों को सारी दुनिया ने अन्तर्ग्रथित मान लिया है और आज ये विश्व मानवाधिकारों के चार्टर का हिस्सा हैं। दुनिया के अधिकांश देश इसे मान्यता देने को बाध्य हुए हैं।  
         सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी व्यवस्था के पराभव के बाद सारी दुनिया में पूंजीवादी प्रचारकों ने हल्ला मचाना आरंभ कर दिया कि क्रांति हार गयी है। समाजवाद खत्म हो गया है। साम्यवाद की मौत हो गयी है। मार्क्सवाद का अंत हो गया है। लेकिन यह सच नहीं है। इस बात को समझने के लिए हम फ्रांस की राज्य क्रांति का उदाहरण सामने रखकर विचार करें तो शायद ठीक से समाजवाद के विश्वव्यापी असर के बारे में सही ढ़ंग से अनुमान लगा सकें।
       फ्रांस की राज्य क्रांति ने लोकतंत्र,समानता और बंधुत्व की महान धारणा दी। फ्रांस की राज्य क्रांति कितने दिन तक बनी रह पायी ? बमुश्किल दो साल टिके रह पायी। इन दो सालों में उन्होंने जो काम किया उसकी सारी दुनिया आज भी ऋणी है। इसकी तुलना में सोवियत समाजवादी अक्टूबर क्रांति 60 साल तक रही और उसने जो काम किए उनका असर कुछ देशों में समाजवादी व्यवस्था के पराभव के बाबजूद सारी दुनिया में ज्यों का त्यों बना हुआ है। समाजवादी क्रांति ने जो अधिकार आदमी को दिए,जो शक्ति और संपदा दी वह अक्षुण्ण है। सिर्फ शक्ति संतुलन बदला है।
     क्रांतियां व्यर्थ नहीं जातीं। वे समाज में गहरे परिवर्तन के निशान छोड़ जाती हैं। समस्या यह है कि हम उन परिवर्तनों को सही परिप्रेक्ष्य में समझें ।  मजदूरवर्ग और सारी दुनिया का वंचित समाज अक्टूबर क्रांति के प्रति कृतज्ञ है उसने वंचितों और हाशिए के लोगों को जीने का नया मंत्र दिया। सामाजिक संघर्ष का नया विवेक दिया है और सबसे बड़ा विवेक यह दिया है कि पूंजीपतिवर्ग को पछाड़ना चाहते हो,पूंजीवादी समाज में सुखी रहना चाहते हो तो अपना संगठन बनाओ,संगठनबद्ध होकर जीना सीखो। मजदूरवर्ग और श्रम का सम्मान करना सीखो,मजदूरवर्ग कमजोर वर्ग नहीं है बल्कि सामाजिक परिवर्तन की धुरी है।     
   


















शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

सन् 1917 की अक्टूबर क्रांति के मौके पर - साधारण मनुष्य की महानता का महाख्यान

मैं निजी तौर पर जिस उमंग,उत्साह और वैचारिक गर्मजोशी के साथ दीपावली मनाता हूँ, दुर्गापूजा के सार्वजनिक समारोहों में शामिल होता हूँ। ठीक उसी उत्साह और उमंग के साथ मार्क्सवादियों और उदारमना लोगों के राजनीतिक -साहित्यिक जलसों में भी शामिल होता हूँ। मेरे अंदर जितना उत्साह होली को लेकर रहता है वही उत्साह 7 नबम्वर 1917 की अक्टूबर क्रांति को लेकर भी है।
     आनंद और क्रांति के बीच,मनोरंजन और क्रांति के बीच,जीवंतता और क्रांति के बीच गहरा संबंध है। आप जितने जीवंत होंगे।बृहत्तर सामाजिक सरोकारों में जितना व्यापक शिरकत करेंगे। उतना ही ज्यादा क्रांतिकारी परिवर्तनों को मदद करेंगे। जीवन में जितना रस लेंगे,आनंद लेंगे,आराम करेंगे उतने ही क्रांति के करीब होंगे।
     समाजवादी विचारों और सामाजिक क्रांति से हमारी दूरी बढ़ने का प्रधान कारण है सामाजिक जीवन और निजी जीवन से आनंद और सामाजिकता का उठ जाना। हम अब प्रायोजित आनंद में घिर गए हैं। स्वाभाविक आनंद को हम भूल ही गए हैं कि कैसे स्वाभाविक ढ़ंग से आनंद और रस की सृष्टि की जाए। जीवन का नशा गायब हो गया है। जीवन में जो स्वाभाविक नशा है उसकी जगह हर मेले ठेले में दारू की बोतल आ गयी है। बिना बोतल के हमारे समाज में लोगों को नशा ही नहीं आता,आनंद के लिए उन्हें नशे की बोतल की जरूरत पड़ती है।
    आनंद ,उत्सव, उमंग और जीवतंता के लिए दारू की बोतल का आना इस बात का संकेत है कि हमने प्रायोजित आनंद के सामने घुटने टेक दिए हैं। हमें देखना चाहिए विगत 60 सालों में भारत में दारू की खपत बढ़ी है या घटी है ? आंकड़े यही बताते हैं कि दारू की खपत बढ़ी है। इसका अर्थ है जीवन में स्वाभाविक आनंद घटा है। स्वाभाविक आनंद की बजाय प्रायोजित आनंद के सामने हमारा समर्पण इस बात का भी संकेत है कि हमें जश्न मनाने की तरकीब नहीं आती।
     हमने जन्म तो लिया लेकिन खुशी और आनंद का पाठ नहीं पढ़ा। आनंद से कैसे रहे हैं। इसके लिए वैद्य,हकीम,योगी,बाबा,नेता आदि के उपदेशों या उसके योग शिविरों में जाने की जरूरत नहीं है। हमारी आसपास की जिन्दगी और बृहत्तर सामाजिक दुनिया के प्यार में आनंद छिपा है।
    जीवन में आनंद का ह्रास तब होता है जब स्वयं से प्यार करना बंद कर देते हैं,दूसरों से प्यार करना बंद कर देते,स्वार्थवश प्यार करने  लगते हैं। मुझे सोवियत क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि उसने पहलीबार सारी दुनिया को वास्तव अर्थों में प्यार करने का पाठ पढ़ाया। सोवियतों के साथ प्यार करना सिखाया। मजदूरों -किसानों को महान बनाया ।शासक बनाया।
    सोवियत अक्टूबर क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि मानव सभ्यता के इतिहास में पहलीबार शासन अपने सिंहासन से उतरकर गरीब के घर पहुँचा था। गरीबों को उसने जीवन की वे तमाम चीजें दीं जिनका मानव सभ्यता सैंकड़ों सालों से इतजार कर रही थी।
   सारी दुनिया में एक से बढ़कर एक शासक हुए हैं। बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा हुए हैं, बड़े दानी राजा हुए हैं। लेकिन सोवियत क्रांति के बाद जिस तरह की शासन व्यवस्था का उदय हुआ और सोवियतों के काम ने सोवियत संघ और सारी दुनिया को बगैर किसी युद्ध,दबाब और दहशत के जिस तरह प्रभावित किया वैसा इतिहास में देखने को नहीं मिलता।
    आज हमारे पास इंटरनेट है, सैटेलाइट टीवी है, रेडियो है, प्रेस है, हवाई जहाज हैं, दुनिया की शानदार उपभोक्ता वस्तुओं का संसार है। खाते पीते घरों में वस्तुओं का ढ़ेर लगा है। हम किसी भी चीज को आसानी से पा सकते हैं। बैंकों का समूह कर्ज देने के लिए हमारे दरवाजे पर खड़ा है। विचारों,सामाजिक सरोकारों और सामाजिक जिम्मेदारी के पैराडाइम से निकलकर हम वस्तुओं और भोग के महासमुद्र में डूबते-उतराते रहते हैं। आए दिन नामी-गिरामी लोगों को टीवी और मीडिया में देखते रहते हैं,उनके विचार सुनते रहते हैं, लेकिन हमें याद नहीं है कि इन नामी-गिरामी लोगों के विचारों का सारी दुनिया या भारतवर्ष पर कितना असर हो रहा है। आज मीडिया है उनके जयकारे हैं, वे मीडिया के भोंपू हैं ,और सुंदर-सुंदर एंकर से लेकर हीरोइनें हैं जिनके पासएक भी सहेजने लायक विचार नहीं है। ये लोग सबके मिलकर उपभोग का वातावरण बना रहे हैं। जिस व्यक्ति को हम मीडिया में रोज देखते और सुनते हैं उसके विचारों का कोई असर नहीं हो रहा।
   इसके विपरीत अक्टूबर क्रांति के समय न तो टीवी था, न रेडियो था, और न कोई खास प्रचार सामग्री थी वितरित करने लिए। इसके बावजूद सोवियत संघ और उसके बाहर सारी दुनिया में क्रांति के विचार की चिंगारी कैसे फैल गयी ?
     आज जो लोग हिन्दुत्व की हिमायत कर रहे हैं और मार्क्सवाद पर हमले कर रहे हैं, वे जरा जबाब दें कि हिन्दुत्व का विचार आधुनिक प्रचार माध्यमों के जोर जोर से नगाड़े बजाने के बाबजूद भारत में मात्र 20-22 प्रतिशत लोगों को प्रभावित कर पाया है। भारत में कम्युनिस्ट संख्या में कम हैं,उनके पास बड़े संसाधन नहीं हैं। मैनस्ट्रीम मीडिया आए दिन उन पर हमले करता रहता है। इसके बाबजूद सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कम्युनिस्टों का प्रभाव बहुत ज्यादा है। कम्युनिस्टों की राजनीतिक साख है। समाजवाद की प्रतिष्ठा है। उनका दल छोटा है। महत्व बड़ा है।
      अक्टूबर क्रांति ने समाजवाद के विचार को महान बनाया। बगैर मीडिया समर्थन के समाजवाद के विचार को एकही झटके में सारी दुनिया में संप्रेषित कर दिया। दूसरा महान कार्य यह किया कि पहलीबार सारी दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि वंचित लोग,शोषित लोग शासन में आ सकते हैं। 
   सोवियत क्रांति के पहले यही मिथ था कि सत्ता हमेशा ताकतवर लोगों के हाथ में रहेगी चाहे जैसी भी शासन व्यवस्था आए। तीसरा संदेश यह था शासकों और जनता में बगैर किसी भेदभाव और असमानता के जी सकते हैं। शासकों और जनता के बीच के महा-अंतराल को अक्टूबर क्रांति ने धराशायी कर दिया था।
       सात नबम्बर 1917 को सोवियत संघ में दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति हुई। यह सामान्य सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह महज एक देश का राजनीतिक मसला भी नहीं था। लेनिन,स्टालिन आदि मात्र एक देश के नेताभर नहीं थे। आज जिस तरह का घटिया प्रचार क्रांतिविरोधी ,समाजवाद विरोधी ताकतें और कारपोरेट मीडिया कर रहा है उसे देखकर यही लगता है कि अक्टूबर क्रांति कोई खूंखार और बर्बर सत्ता परिवर्तन था। एक शासक की जगह दूसरे शासक का सत्ता संभालना था। जी नहीं।
    अक्टूबर क्रांति विश्व मानवता के इतिहास की विरल और मूलगामी सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को जन्म देनी वाली विश्व की महान घटना थी। कहने के लिए अक्टूबर क्रांति सोवियत संघ में हुई थी लेकिन इसने सारी दुनिया को प्रभावित किया था। हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ इस क्रांति के साथ जिसने सारी दुनिया का राजनीतिक पैराडाइम ही बदल दिया।
   सारी दुनिया में सत्ताओं का परिवर्तन अमीरों के लिए खुशहाली लेकर आता रहा है,खजानों से शासकों के ऐशो आराम की चीजें खरीदी गयी हैं। लेकिन सोवियत संघ में एकदम विलक्षण मिसाल कायम की गई। ऐसी मिसाल मानव सभ्यता के इतिहास में नहीं मिलती। सोवियत खजाने से पहला भुगतान एक सामान्य घोड़े वाले को किया गया। 
संक्षेप में वाकया कुछ इस प्रकार है- फरवरी क्रांति के ठीक पहले 1917 में जार के जमाने में एक बूढ़े घोडेवाले के घोड़ों को युद्ध के कामों के लिए जारशासन ने जबर्दस्ती ले लिया था। उसे घोड़ों की अच्छी कीमत का वायदा किया गया था ,लेकिन समय बीतता गया और उस बूढ़े को अपने घोड़ों के पैसों का भुगतान नहीं हुआ। वह बूढ़ा पैत्रोग्राद आया और उसने अस्थायी सरकार के सभी दफ्तरों में चक्कर काटे। दफ्तर के बाबू उसे एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस में टरकाते रहे , वह बेहद परेशान हो गया था। उसका सारा पैसा और धैर्य खत्म हो गया था। जार का शासन धराशायी हो गया लेकिन उसका कोई पैसा देने वाला नहीं था। इसी भागदौड़ में उस बूढ़े को किसी ने बताया कि तुम बोल्शेविकों से मिलो वे मजदूरों और किसानों की वे सारी चीजें लौटा रहे हैं जो जार के जमाने में जमीदारों और जार शासन ने छीन ली थीं। किसी ने यह भी कहा कि उसके लिए उसे सिर्फ लेनिन की एक चिट्ठी की जरूरत है। वह बूढ़ा किसी तरह लेनिन के पास पहुँच गया और सुबह होने के पहले ही उसने लेनिन को जगा दिया और उनसे चिट्ठी लेने में सफल हो गया। और सीधे वह चिट्ठी लेकर अलेक्सान्द्रा कोल्लोन्ताई के घर पर जा पहुँचा। दरवाजे पर पहुँचते ही उसने घंटी बजायी। कोल्लोन्ताई ने दरवाजा खोला और पूछा किससे मिलना है तो उसने कहा मुझे कोल्लोन्ताई से मिलना है, मैं उनके सबसे बड़े बोल्शेविक लेनिन की चिट्ठी देना चाहता हूँ। कोल्लान्ताई ने उसके हाथ चिट्टी लेकर देखी तो पाया कि वह सचमुच में लेनिन का पत्र था।  लिखा था- ‘‘ उसके घोड़े की कीमत का भुगतान सामाजिक सुरक्षा कोष से कर दीजिए।’’ कोल्लान्ताई ने उस बूढ़े से कहा चिट्ठी दे दो। उसने कहा ‘‘ पैसा मिल जाने पर ही मैं आपको यह चिट्टी दूंगा। तब तक मैं इसे अपने पास ही रखूंगा।’‘
   उल्लेखनीय है यह लेनिन की पहला सरकारी आदेश था। लेकिन उस समय मंत्रालयों में भयानक अराजकता छायी हुई थी,नौकरशाही असहयोग कर रही थी। खजाने में हंगामा और अराजकता का माहौल था। बोल्शेविकों का अभी तक सभी मंत्रालयों पर कब्जा हुआ नहीं हुआ था। उस समय कम्युनिस्टों के सामने समस्या थी कि मंत्रालयों पर जोर-जबर्दस्ती कब्जा करें या प्यार से ? नौकरशाही परेशान थी कि कम्युनिस्टों के शासन में उन सबकी नौकरियां चली जाएंगी। लेकिन लेनिन ने आदेश निकाला कि जो जहां जिस पद पर काम कर रहा है वह वहीं पर काम करता रहेगा। इससे मामला थोड़ा शांत हुआ लेकिन खजाने में अभी भी अशांति और अराजकता बनी हुई थी। खजाने के कर्मचारी, टाइपिस्ट, क्लर्क आदि खजाने का सामान लेकर भागे जा रहे थे,कोल्लान्ताई अपने साथ कुछ मजदूरों और तकनीकी जानकारों की एक टोली लेकर खजाने पर पहुँची और देखा कि लोग सामान लेकर भाग रहे हैं। खजाने की चाभियां नहीं मिल नहीं थीं, वे कहीं छिपा दी गयी थीं अथवा कोई उन्हें लेकर चला गया था,कुछ भी पता नहीं चल रहा था। अराजकता का आलम यह था कि बैंक के सारे कागज कर्मचारियों ने नष्ट कर दिए थे, बैंक के बाहर भीड़ लगी थी। यह भी परेशानी थी कि खजाने के ताले लगे रहेंगे तो अन्य विभागों का पैसे के बिना काम कैसे चलेगा। वह घोड़े वाला किसान कई दिन से लेनिन की चिट्ठी लिए घूम रहा था अपना भुगतान पाने के लिए वह रोज सुबह ही आ जाया करता था कि मेरा भुगतान कब होगा। दो दिनबाद तिजोरियों की कुंजियां हाथ लगीं और जब खजाना खुला तो उससे समाजवादी क्रांतिकारी शासन के द्वारा पहला भुगतान उस घोड़ों के मालिक बूढ़े किसान को किया गया। इस पहले भुगतान ने मानव सभ्यता के नए इतिहास का आरंभ किया। साधारण आदमी को महान बनाया और  सत्ता को उसका सच्चे अर्थ में सेवक बनाया।
           

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