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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

पाक अछूत नहीं है मोदीजी

       सार्क देशों के नेपाल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने एकबार भी पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। उन्हें श्रीलंका याद आया,नेपाल याद आया,बंगलादेश और मालदीव को उल्लेख योग्य समझा लेकिन पाकिस्तान का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया। यहां तक कि 26/11की घटना का जिक्र किया, लेकिन न तो आतंकी संगठनों का कोई जिक्र किया और न पाकिस्तान का जिक्र किया। मोदी ने कहा ''आज जब हम 2008 में मुंबई में उस खौफनाक आतंकी घटना को याद करते हैं तो हमें अपने लोगों को खोने का कभी न खत्‍म होने वाला दर्द महसूस होता है। आतंकवाद और अंतर्राष्‍ट्रीय अपराधों से लड़ने के लिए हमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूरा करने के लिए हमें साथ मिलकर काम करना होगा।'' इन पंक्तियों के अलावा पूरे भाषण में आतंकवाद का कहीं कोई जिक्र नहीं है। 

मोदी जानते हैं कि दक्षिण एशिया के देशों में सबसे तनावपूर्ण संबंध भारत-पाक के बीच में हैं। इन तनावपूर्ण संबंधों को 'हठी राजनीति' के आधार पर सामान्य नहीं बनाया जा सकता। खासकर विदेशनीति के मामले में हठ नहीं चल सकता। विदेशनीति के तमाम चैनल और कोशिशें देशज दबावों और तनावों से मुक्त होकर ही सामान्य रुप में काम कर सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मनमोहन सरकार के जमाने में संघ का दबाव काम करता था और मोदी सरकार के जमाने में पाक के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के मामले में संघ का ही दबाव विदेशनीति पर असर डाल रहा है। मोदी सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे संघ के पाकविरोधी हठवाद से विदेशनीति को मुक्त रखे। संघ की मुश्किल है कि वह विदेशनीति के ऊपर दबाव बनाए रखने के चक्कर में देश-विदेश में पाकविरोधी मुहिम में तेजी बनाए रखता है।

यह सच है भारत को पाक प्रशिक्षित –संचालित आतंकी संगठनों से हमेशा खतरा बना रहता है और वे आए दिन जम्मू-कश्मीर में खासतौर पर हिंसक हरकतें करते रहते हैं। लेकिन इस बात को आधार बनाकर पाक से संबंध बिगाड़ना सही नहीं होगा। हमें पाक सरकार और पाक की जनता को आतंकियों से अलग करके देखना चाहिए। संघ की मुश्किल है कि वह पाक शासन,पाक जनता और आतंकी संगठनों एक साथ मिलाकर देखता है। सबके खिलाफ उन्मादी बयानबाजी करता रहता है, इससे भारत-पाक के बीच तनाव बना रहता है, मुसलमानों के प्रति घृणा बनी रहती है। मोदी सरकार ने अब तक पाक से बातचीत न करने का जो बहाना दिया है वह सही नहीं है,मोदी सरकार का कहना है पाक ने हुर्रियत कॉफ्रेस के नेताओं के मुलाकात करके सदभाव का माहौल तोड़ा है इसलिए बातचीत नहीं करेंगे। सच यह है जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों तक संघ, पाकविरोधी गरमी बनाए रखने के लिए विदेशनीति का दुरुपयोग कर रहा है, जिससे जम्मू-कश्मीर में वोटबैंक बनाया जा सके।

उल्लेखनीय है पाक स्थित आतंकी हाफिज सईद से वेदप्रताप वैदिक मिले तो संघ को कोई परेशानी नहीं हुई, पाक ने भी इस मुलाकात पर आपत्ति नहीं की,बल्कि उलटे सईद-वैदिक मुलाकात की पाक सरकार ने ही व्यवस्था करायी, सारा देश जानता है कि मोदी सरकार ने ही वैदिक सरकार को रहस्यमय मिशन के लिए पाक भेजा था। वैदिक के संघ के साथ मित्रतापूर्णसंबंध हैं,वे उनके जलसों में जाते रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव खत्म होते ही भारत-पाक बातचीत के लिए मोदीजी राजी होंगे।

पाकहठ के कारण संघ और उसका भोंपू मीडिया लगातार इस्लाम,पाक और मुसलमान इन तीनों के खिलाफ अहर्निश प्रौपेगैण्डा कर रहा है। इससे समूचा माहौल विषाक्त हो रहा है। विदेशनीति को घरेलू वोटबैंक के लिए और खासकर बहुसंख्यकवाद के आधार पर हिन्दुओं को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। संघ को यदि सच में देशसेवा करनी है तो पाकहठ त्यागना होगा। पाक को स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रुप में सम्मान देकर बात करने की आदत डालनी होगी। पाक हठ से पाक को मदद मिल रही है भारत को नहीं। पाक को विश्व रंगमंच पर हम अलग-थलग नहीं कर पा रहे हैं।



दूसरी बात यह कि भारत के हित में है कि पाक में लोकतंत्र रहे और वहां काम करने वाली लोकतांत्रिक सरकार को हम समर्थन दें। पाक में लोकतंत्र का अभाव हमारे लिए और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए खतरा है। पाक स्थित आतंकी संगठन लगातार पाक में लोकतंत्र के अभाव का दुरुपयोग करते रहे हैं। पाक में इस समय लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गयी सरकार है और पाक में लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया चल रही है जिसमें हमें लोकतांत्रिक शक्तियों का समर्थन करना चाहिए। मोदी सरकार ने पाकहठ के आधार पर पाक की लोकतांत्रिक सरकार से बातचीत बंद करके अप्रत्यक्षतौर पर पाक की अ-लोकतांत्रिक ताकतों का मनोबल ऊँचा उठाने का काम किया है। बेहतर यही होगा कि मोदी सरकार पाठ हठ छोड़े और पाक के प्रति अछूतभाव त्यागे।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

विकीलीक और राजनयिकों का साइबर रोजनामचा


       मजेदार बात है हमारी संसद अपने दोस्त राष्ट्र अमेरिका के राजनयिकों के केबलों पर संसद का बेशकीमती समय बर्बाद कर रही है। हम हर मामले में अमेरिका की नकल करते हैं लेकिन केबल के मामले में हमने अमेरिकी सीनेट की नकल नहीं की , हाँ, अमेरिका के शासकों की नकल करते हुए उसके बारे में मूल्यनिर्णय किया,फतबेबाजी की, यहां तक कि एक मंत्री ने तो विकीलीक को साइबर आतंकवाद तक कह डाला। उल्लेखनीय है अमेरिका में भी कई नेताओं ने जिनमें वहां के उपराष्ट्रपति भी शामिल हैं, उन्होंने जूलियन असांचे को साइबर आतंकवादी और देशद्रोही तक कहा था। उन जनाब की नकल करते हुए भारत की संसद में कांग्रेस के एकमंत्री ने विकीलीक को साइबर आतंकवाद कहा है। प्रधानमंत्री ने विकीलीक से एकदम पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस और उनके सिपहसालार मंत्रियों-वकीलों को विकीलीक में कोई भी सारवान सत्य और तथ्य नजर नहीं आया। यह बात दीगर है कि वे अपनी रक्षा के सभी सूत्र और भाजपा पर हमले करने के सभी औजार विकीलीक के केबलों से ही जुटाकर बोल रहे हैं।
    विकीलीक के भारत संबंधी या अन्य केबलों के बारे में यह कहा जा सकता है कि ये सत्य केबल हैं। इनमें व्यक्त की गई राय भी संबंधित व्यक्ति या राजदूत या राजनयिक की है। ये वैध केबल हैं। लेकिन ये राजनयिकों के केबल हैं। इन्हें राजनयिक साइबर रोजनामचे के रूप में देखा जाना चाहिए। ये न तो नीति हैं,न प्रमाण हैं, और न ये आतंकी संदेश हैं और न इनका प्रसारण या प्रकाशन साइबर आतंकवाद है। ये तो मात्र अमेरिकी राजनयिकों का साइबर रोजनामचा है। ये मात्र साइबर कम्युनिकेशन हैं। राजनयिक जैसा देख-सुन रहे हैं उसकी दैनन्दिन हू-ब-हू रिपोर्टिंग अपने विदेश विभाग को कर रहे है। इसमें राजनयिकों की अपनी राय कम और अन्य घटनाओं के बारे में उनके द्वारा एकत्रित की गई सूचनाएं,जानकारियां और विश्लेषण हैं।
   विकीलीक वास्तव अर्थ में गुप्त राजनयिक कम्युनिकेशन का उदघाटन है। लेकिन अमेरिकी सिस्टम में यह सहज,सामान्य और वैध प्रक्रिया है औऱ विकीलीक के अधिकांश केबल जूलियन असांजे ने वैध तरीकों से हासिल किए हैं। अमेरिका एक अवधि के बाद गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाते हैं ,उन्हें कोई भी व्यक्ति हासिल कर सकता है। इनमें कुछ हैं जो अवैध स्रोतों से हासिल किए हैं। भारत में गोपनीय दस्तावेज सरकार कभी सार्वजनिक नहीं करती ,वे उन्हें जनता को देने की बजाय,लाइब्रेरी को सौंपने की बजाय दीमकों के हवाले करना,आग के हवाले करना पसंद करते हैं।
       अमेरिकी राजनयिक कैसे सूचनाएं एकत्रित करते हैं और वे इन सूचनाओं का क्या करते हैं, क्यों करते हैं आदि चीजों के अलावा राजनयिक की आंखें और मन किन चीजों में उलझा रहता है,इन सबका आईना है विकीलीक केबल। इन लीक में सनसनीखेज कुछ भी नहीं है। आम लोगों को सनसनीखेज इसलिए लग सकता है क्योंकि आम लोग विदेशनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते।आम लोगों की बात छोड़ दें, हमारा राष्ट्रीय मीडिया भी विदेश नीति में खास रूचि नहीं लेता। हमें पता करना चाहिए कि कितने ऐसे अखबार या मीडिया समूह या घराने हैं जिनके दुनिया के सभी बड़े देशों और घटनास्थलों पर नियमित संवाददाता काम कर रहे हैं ? हमें ज्यादातर अखबार विदेशी समाचार एजेंसियों से प्राप्त समाचारों से भरे रहते हैं। विदेश की खबरों को हम भारत की नहीं विदेशी लोगों की आंखों से देखते और पढ़ते रहे हैं। फलतः हमें देशी आंखों से देखा विदेश नहीं विदेशी आंखों से देखा विदेश देखने में सुंदर और लुभावना लगता है। इसीलिए विकीलीक भी अपील कर रहा है।
   हमारे देशी देशभक्त मीडिया में सप्ताह में विदेश नीति पर कितने विवेचनात्मक लेख,खबरें संबंधित पत्रकारों से लिखवाते हैं। सच यह है कि अधिकांश मीडिया घरानों के विदेशों में कोई नियमित संवाददाता नहीं हैं। आमतौर पर वे विदेशनीति के सवालों पर पत्रकारों की बजाय भारत के पूर्व राजनयिकों और सरकारी-अर्द्ध सरकारी थिंकटैंकों में काम करने वाले सरकारी पंडितों से लेख लिखवाते हैं। इन लेखों में अंदर -खाते की पेचीदगियों का जिक्र या रहस्योदघाटन कभी नहीं होता। ऐसी अवस्था में अमेरिकी राजनयिकों की केबलों पर हंगामा और संसद में भीषण चर्चा गले नहीं उतरती, यह संसद का समय बर्बाद करना है। जिन दलों की अमेरिका की राजनीति में रूचि है और अमेरिकी केबलों के आधार जो हंगामा कर रहे हैं ,खासकर भाजपा के सांसद कभी ठंडे दिमाग से सोचें कि वे पार्टी मुखपत्र और संघ परिवार के माध्यमों में विदेश नीति पर कितनी सामग्री नियमित छापते रहे हैं और उसमें भी कितनी रूटिन सामग्री है और कितनी मौलिक,यह भी देखा जाना चाहिए।
    विकीलीक के केबल प्रकाशित करके जूलियन असांजे ने एक बड़ा काम किया है उसने विदेशनीति को विश्वमीडिया का प्रधान एजेण्डा बनाया है। खासकर अमेरिकी विदेश नीति के मूल्यांकन के सवालों को खड़ा कर दिया है। वहीं पर दैनिक हिन्दू ने विकीलीक के केबलों का प्रकाशन करके विदेशनीति की अहमियत की ओर ध्यान खींचा है। उस बड़े सूचना प्रवाह की ओर ध्यान खींचा है जो अमेरिकी दूतावास से अमेरिका की ओर प्रवाहित हो रहा है और फिर पलटकर भारत की राजनीति और राजनीतिज्ञों को अपने घेरे में ले रहा है।
    कायदे से हिन्दू को उन पत्रकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों आदि को भी एक्सपोज करना चाहिए जो अमेरिका के पैरोल पर हैं और भारत में अमेरिकी प्रचारक के रूप में काम कर रहे हैं,कम से कम भारत के नागरिकों को उन महानुभावों की कलम की पोल से वाकिफ कराया जाना चाहिए।
     भारत के अंदर एक अच्छा-खासा तबका है जो अमेरिका के लिए विदेश नीति के मामलों में भारत में पैरोकारी करता रहा है। लिखने से लेकर नेताओं को पटाने तक का काम करता रहा है। इन लोगों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
     काफी अर्सा पहले संभवतः 1981-82 में गिरफ्तार किए डबल-ट्रिपिल जासूस रामस्वरूप के घर से सीबीआई ने एक ट्रक गोपनीय सरकारी दस्तावेज पकड़े थे, ये जनाब बहुत कम पैसे में विदेशी जासूसों और दूतावासों को केन्द्र सरकार की गोपनीय फाइलें मुहैय्या कराने का काम किया करते थे। पता नहीं ये जनाब जेल में हैं बाहर हैं या मर गए ? लेकिन इन जनाब को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इनके यहाँ से जो एकट्रक गोपनीय दस्तावेज मिले थे उनमें जेएनयू के अनेक लब्धप्रतिष्ठित प्रोफेसरों के नाम भीथे जिनको सीआईए से सीधे पैसा मिलता था और इनमें से कई लोग भारत सरकार के गलियारों में नीति निर्धारकों बन गए। राजदूत की कुर्सियों पर विराजमान हो गए। रामस्वरूप के यहां पाए गए दस्तावेजों में पत्रकारों की भी सूची थी। नेताओं,युवानेताओं की भी सूची मिली थी,जिन्हें सीधे सीआईए से पैसा मिलता था और ये बातें सीआईए के वैध कागजों में पाई गई थीं । मैं उन दिनों जेएनयू में पढ़ता था और वहां की सक्रिय छात्र राजनीति का हिस्सा था। हमने सभी छात्रों के सामने उन चेहरों को बेनकाब भी किया था जो सीआईए के लिए काम करते थे। इस बात को रखने का मकसद यह है कि अमेरिका की हमारे देश की राजनीति में आज ही दिलचस्पी नहीं पैदा हुई,यह दिलचस्पी आरंभ से है।शीतयुद्ध के जमाने में तो और भी गहरी दिलचस्पी थी। चूंकि विकीलीक ने 1960 के बाद के अमेरिका के अधिकांश गोपनीय दस्तावेज,केबल आदि हासिल किए हैं अतः कोशिश करके शीतयुद्ध के दौरान और बाद के केबलों को सामने लाया जाना चाहिए। इस तरह के केबलों से वे परतें खुल रही हैं जिन्हें अमेरिकीतंत्र ने हमारे देश में नेताओं,मीडिया और व्यापारियों में बिछा दिया है।
    विकीलीक के केबल अमेरिकी तंत्र की कार्यप्रणाली,खासकर राजनयिकों की दैनंदिन कार्यप्रणाली और विचारधारात्मक मानसिक संरचनाओं को समझने का पुख्ता आधार देते हैं। ये राजनयिक प्रशिक्षणशास्त्र की अनेक नई दिशाओं पर रोशनी डाल रहे हैं। इन केबलों से यह भी पता चल रहा है कि अमेरिकी राजनयिक कूटनीतिज्ञ होने के साथ एक अच्छे जनसंपर्क अधिकारी भी होते हैं। इसलिए वे अमेरिकी विचारों के प्रसारक होते हैं. अन्य को फुसलाने और पटाने की कला में निष्णात होते हैं। 






बुधवार, 5 जनवरी 2011

कूपमंडूक विचारक हतप्रभ हैं वैश्वीकरण से

कूपमंडूक विचारकों को वैश्वीकरण अभी तक समझ में नहीं आया है। वे यह देखने में असफल हैं कि भारत का बुनियादी आर्थिक नक्शा बदल चुका है। कूपमंडूक विचारकों में कठमुल्लापन इस कदर हावी है कि उनकी कूपमंडूकता के समाने विनलादेन भी शर्मिंदा महसूस करता है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण को औचक और कूपमंडूक भाव से कभी समझा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विगत एक साल में अर्थव्यवस्था का जो नक्शा तैयार किया है उसको वस्तुगत रूप में देखें तो भारत की तस्वीर आगामी दशक में काफी हद तक बदल जाएगी। इस बदली तस्वीर को हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखना होगा। कॉमनसेंस और कठमुल्लेपन से भूमंडलीकरण और नव्य आर्थिक उदारीकरण समझ में नहीं आएगा। भविष्य में भारत का प्रधानमंत्री कोई भी बने लेकिन देश में बड़े आर्थिक परिवर्तनों का आधार मनमोहन सिंह ने रख दिया है और यह काम बड़े ही कौशल और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए किया है। विगत एक साल में मनमोहन सरकार ने अमेरिका,चीन,रूस, फ्रांस,जापान,दक्षिण कोरिया, मलेशिया,संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के साथ 250 से ज्यादा द्विपक्षीय समझौते किए हैं। इन समझौतों के कारण आगामी दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में जबर्दस्त परिवर्तन होगा। महाशक्तियों और विकसित देशों के साथ परमाणु ऊर्जा,अंतरिक्ष,परिवहन,संचार आदि के क्षेत्रों में किए गए समझौते बेहद महत्वपूर्ण हैं। मसलन अमेरिका,रूस,फ्रांस चीन ,कनाडा के साथ परमाणु ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में किए गए समझौतों का दूरगामी असर होगा। मसलन रूस के साथ हुए समझौते के अनुसार रूस दो नए परमाणु रिएक्टर लगाएगा और लडाकू विमान के डिजायन निर्माण में मदद करेगा। आगामी 5 सालों में 3 स्थानों पर 18 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर लगाए जाने की महत्वाकांक्षी योजना की भी घोषणा की गई है। इसके अलावा 20 बिलियन डॉलर के दुतरफा व्यापारिक समझौते भी हुए हैं। फ्रांस विभिन्न प्रकल्पों में 10 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा। चीन ने आगामी 5 सालों में विभिन्न क्षेत्रों में दुतरफा व्यापार के क्षेत्र में 100 बिलियन डॉलर के निवेश का समझौता किया है। चीन ने ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों 16 बिलियन डॉलर के 48 समझौते किए हैं। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अकेले फ्रांस 9,900 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए संयंत्र मुहैय्या कराएगा।
    इसके अलावा फ्रांस के साथ अन्य क्षेत्रों में 12बिलियन डॉलर का,जापान के साथ 20 बिलियन डॉलर, कनाडा के साथ 15 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ है। विगत वर्ष राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल की यात्रा के समय संयुक्त अरब अमीरात के साथ 100 बिलियन डॉलर के दुतरफा व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। इसमें 43 बिलियन का मौजूदा व्यापार शामिल नहीं है। यह भी अनुमान है कि सन् 2010-11 में कृषि उत्पादन भी बढेगा। सन् 2010-11 में 4.4 फीसदी कृषि उत्पादन का लक्ष्य है। जबकि 2008-09 में 1.2 प्रतिशत ही कृषि उत्पादन हुआ था। इसी तरह चीनी और रूई का उत्पादन भी बढ़ेगा। भारत में जहां एक ओर तेजी से विकास हो रहा है। उत्पादन बढ़ रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश बढ़ रहा है। विश्व बाजार में रूई और चीन के दाम बढ़े हैं मसलन चीनी को ही लें,सन् 2010-11 में चीन का उत्पादन 250 लाख टन होने की संभावना है जबकि 2009-10 में 188 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। चीनी की विश्व बाजार में बड़ी मांग है। उद्योगों में उत्पादन की गति तेज है और औद्योगिक उत्पादन का लक्ष्य 10 प्रतिशत से ऊपर रखा गया है। विगत अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन 10.8 प्रतिशत था और अनुमान है यह आंकड़ा बढ़ेगा। इसी तरह मशीनों के उत्पादन में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता मालों का उत्पादन 31 फीसदी बढ़ा है। खान उत्खनन और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कारपोरेट कंपोजिट इंडेक्स बढ़कर 10.3 प्रतिशत हो गया है। जो कि पहले 6.9 फीसद था। राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद दर 9 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। आयात और निर्यात दोनों में वृद्धि हुई है। निर्यात में 26.7 प्रतिशत और आयात में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अभी निर्यात की तुलना में विदेशों से आयात ज्यादा हो रहा है। यह चिंता का क्षेत्र है।
     दूसरी ओर समानान्तर अर्थव्यवस्था या काले धन की संस्कृति का भी विकास हुआ है। एक अनुमान के अनुसार प्रति 24 घंटे में भारत 240 करोड़ रूपये खोता जा रहा है। सन् 1948-2008 की अवधि के दौरान भारत से लगभग 9.7 लाख करोड़ रूपये अवैध पूंजी के रूप में विदेशी बैंकों में जमा कराए गए हैं। इसमें 5.7 लाख करोड़ रूपये तो 2000-08 की अवधि में जमा कराए गए हैं। ये सारी जानकारी ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी-जीएमआई ’ की एक रिपोर्ट में दी गयी है। रिपोर्ट का शीर्षक है- ‘द ड्राइवर्स एण्ड डायनामिक्स ऑफ इल्लिसिट फाइनेंशियल फ्लोज फ्रॉम इण्डियाः1948-2008’। इस अवैध काले धन पर यदि आयकर आदि करों की राशि जोड़ दी जाए तो यह रकम 21 लाख करोड़ रूपये बैठेगी। यह सारा कालाधन है। यदि इस धन को भारत रोक देता तो 230.6 अरब डॉलर के विदेशी ऋण को चुका पाता। इसमें यदि तमाम किस्म की तस्करी आदि का धन भी जोड़ लिया जाए तो यह पूंजी 500 अरब डॉलर से ऊपर बैठेगी। मूल बात यह है कि आर्थिक उदारीकरण लागू किए जाने के बाद से विकास हुआ है साथ में विकास के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों की लूट भी हुई है। क्योंकि विदेशों में जमा अधिकांश कालाधन 1991 के बाद ही जमा किया गया है। कालेधन के विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों का मानना है भारत की 72 फीसदी काली पूंजी विदेशों में जमा है और भारत में मात्र 28 फीसदी है। अवैध कालेधन का समूचा आकार 640 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आंका गया है। आने वाले दशक में यह आंकड़ा बढ़ेगा। नव्य उदार अर्थशास्त्र में काले धन पर नकेल लगाने का कोई नियम अभी तक सामने नहीं आया है। केन्द्र सरकार विदेशों में भारतीयों के जमा काले धन को वापस लाने के मामले में कोई ठोस कदम उठाती नजर नहीं आ रही है।  

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

ओबामा की भाषा में छिपी परमाणु सच्चाई

   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के तीन दिन के दौरे का समापन हो चुका है। उन्हें और हमें जो कहना था उसे संयुक्त विज्ञप्ति में कलमबंद किया जा चुका है। सारी बातें कागजों में दर्ज हो चुकी हैं। अब हम अतिथि सत्कार के माहौल से बाहर आकर, जय हो ओबामा जय हो ओबामा के मीडिया निर्मित वातावरण के बाहर आकर उस वास्तविकता को देखें जो ओबामा के मीडिया प्रबंधन के कारण हमें नजर ही नहीं आई।   
      हमारे दर्जनों विशेषज्ञों,कूटनीतिज्ञों और विदेश नीति विशेषज्ञों ने विभिन्न चैनलों पर जमकर इस पक्ष या उस पक्ष के हितों और नीतियों की रंगबिरंगी व्याख्याएं पेश की हैं। हमें इन व्याख्याओं के परे जाकर उस भाषा को सही नजरिए से,यथार्थ की आंखों से पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए जो भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में है। हमें राष्ट्रपति बराक ओबामा के संसद में दिए गए भाषण की भाषा में निहित राजनीतिक समझ पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। यह काम ठंड़े दिलो-दिमाग से करने की जरूरत है।
बराक ओबामा की यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत जैसा चाहता था ओबामा उसी भाषा में बोले। दूसरी ओर अमेरिका की उपलब्धि है कि वह जो चाहता था उसे मनवाने में वह सफल रहा है। हम पसंदीदा भाषा से खुश हैं। ओबामा इच्छित आर्थिक ,सैन्य और कूटनीतिक समझौते करके खुश हैं।
     संयुक्त विज्ञप्ति के अनुसार बराक ओबामा और मनमोहन सिंह व्यापारिक घरानों के हितों की रक्षा और संवर्द्धन के मामले में एक ही धरातल पर खड़े हैं इस दौरे से अमेरिका-भारत के कारपोरेट घरानों को लाभ होगा, अमेरिका में 70 हजार नए रोजगार पैदा होंगे लेकिन भारत के बेकारों,किसानों और साधारण जरूरतमंद लोगों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।
     उलटे भारत के गृहमंत्रालय और अमेरिका के गृहमंत्रालय के बीच में एक नई साँठगाँठ हुई है उससे भारत के नागरिकों की नज़रदारी और जासूसी बढ़ जाएगी। भारत में काउंटर टेररिज्म के नाम पर प्रच्छन्नतः अमेरिकी हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। इस प्रसंग में संयुक्त विज्ञप्ति में जो कहा गया है उसके भारत की जनता की संप्रभुता के लिए घातक परिणाम निकलेंगे। यह सारा खेल काउंटर टेररिज्म के नाम पर होगा।
    विज्ञप्ति में कहा गया है-‘‘Building upon the Counter Terrorism Initiative signed in July 2010, the two leaders announced a new Homeland Security Dialogue between the Ministry of Home Affairs and the Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’’ मजेदार बात यह है कि भारत सरकार ने अभी तक न तो संसद को और न राजनीतिक दलों को बुलाकर यह बताया है कि आखिरकार यह जुलाई 2010 का काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौता क्या है ? ‘Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’ इस पदबंध को गौर से पढ़ें और अमेरिका के द्वारा बंदी बनाकर रखे गए आतंकी अपराधी डेविड हेडली के संदर्भ में अब तक अमेरिका द्वारा भारत के साथ किए गए व्यवहार को देखें तो पता चलेगा कि हम किस मुसीबत में फंसने जा रहे हैं और अमेरिका हमें किस सीमा तक मदद करेगा।
     सब जानते हैं कि 26/11 के मुंबई आतंकी हिंसाकांड में पाक का हाथ था,हेडली भी उस हिंसाचार की योजना में शामिल था ,हमारे यहां उस घटना पर केस चल रहा है, हमें हेडली को अमेरिका को सौंपना चाहिए था लेकिन उसने हमें हेडली नहीं सौंपा। मीडिया में यह भी खबरें हैं कि हेडली अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के लिए काम करता था। हेडली हमारे और अमेरिका के बीच में काउंटर टेररिज्म सहयोग के मामले में आदर्श उदाहरण बन सकता था लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ है।
      असल में अमेरिका काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौते के तहत भारत के नागरिकों को भी अपनी निगरानी के दायरे और छानबीन की परिधि में ले आना चाहता है। अप्रत्यक्ष तौर पर वह यह काम अभी भी कर रहा है। उसने तमाम किस्म की संचार कंपनियों खासकर इंटरनेट सेवाप्रदाता कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट सभी इस मामले में सीआईए से लेकर एफबीआई के सामने समर्पण कर चुके हैं और काउंटर टेररिज्म के तकनीकी मैकेनिज्म को लागू करने के नाम पर अमेरिकी नागरिकों की जिंदगी में सरकारी दखलंदाजी बढ़ गयी है और अब वही फार्मूला भारत में भी लागू होने जा रहा है। अभी आरएसएस से जुड़े संगठनों के व्यक्तियों पर इसके प्रयोग चल रहे हैं और बाद में यह सिलसिला और बढ़ेगा। दैनंदिन जीवन में काउंटर टेररिज्म के नियमों के दबाब बढ़ेंगे। काउंटर टेररिज्म का अमेरिकी नाटक जनविरोधी और मानवाधिकारों का हनन करने वाला है। अमेरिका में विभिन्न किस्म के मानवाधिकार संगठन इसका जमकर विरोध कर रहे हैं।  

      अमेरिकी राष्ट्रपति परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर कितने ईमानदार हैं और सच बोल रहे हैं। इसे जानने के लिए ज्यादा प्रमाणों की जरूरत नहीं है। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सैन्य संगठन ने अपने परमाणु युद्धास्त्रों को बनाए रखने का फैसला किया है। इसके विपरीत भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में संपूर्ण निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करने की प्रतिज्ञा की गयी है। सवाल प्रतिज्ञा का नहीं है ,सवाल एक्शन का है।
    अमेरिका के पास सबसे ज्यादा परमाणु युद्धास्त्र हैं और वह उन्हें खत्म करना नहीं चाहता। बल्कि उन्नत बनाने में लगा है। परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए ओबामा साहब राष्ट्रपति पद संभालने के बाद रूस से भी समझौता कर चुके हैं लेकिन सब कुछ कागजों में है। एक्शन में जाने की अमेरिका की मंशा दूर-दूर तक नजर नहीं आती। हाल ही में नाटो के कमाण्डर ने कहा है कि नाटो अपने परमाणु युद्धास्त्रों को सज्जितभाव से बनाए रखेगा।
    ओबामा साहब परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर यदि ईमानदार हैं तो कम से कम आरंभिक कदम के तौर पर नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया को आरंभ करें।  दुनिया के अनेक देशों में नाटो और अमेरिका ने परमाणु युद्धास्त्र लगाए हुए हैं कम से कम उन्हें हटा लें। इससे अमेरिका या विकसित पूंजीवादी मुल्कों की सुरक्षा पर कोई बुरा असर नहीं होगा। हम उम्मीद कर रहे हैं कि अगले महिने पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो की बैठक में कोई ठोस परिणाम आएगा।
    नाटो के मुखिया की बात मानें तो परमाणु अस्त्रों को अमेरिका न तो कम करने जा रहा है और न हटाने जा रहा है। उल्लेखनीय है कि नाटो के परमाणु युद्धास्त्रों को लेकर नाटो सदस्यों के द्वारा नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की जा रही है। उस मांग को भी अमेरिका और फ्रांस मानने को तैयार नहीं हैं।
अमेरिका के हाल के चुनावों में ओबामा की पार्टी की जो पराजय हुई है उसमें सैन्य उद्योग ओर उससे जुड़े मीडिया घरानों की बड़ी भूमिका रही है। सैन्य उद्योग दुनिया में स्थायी तौर युद्ध का माहौल बनाए रखना चाहता है और ओबामा इस मामले में निरस्त्र हैं। ओबामा परमाणु निरस्त्रीकरण के नाम पर ईरान के खिलाफ नए किस्म की युद्धोन्मादी तैयारियां कर रहे हैं। वे परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए यदि सचमुच में ईमानदार हैं तो उन्हें सबसे पहले नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण के एजेण्डे को हाथ में लेना चाहिए।
     उल्लेखनीय है नाटो सदस्यों जर्मनी,पोलैण्ड,बेलजियम और स्वीडन ने नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की है लेकिन अमेरिका और फ्रांस इसे मानने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर नाटो की परमाणु नाकेबंदियों का बहाना बनाकर रूस भी अपने परमाणु ज़खीरे को कम नहीं करना चाहता। ऐसी अवस्था में परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर किए गए वायदों का कागज पर लिखे शब्दों से ज्यादा कोई मूल्य नहीं है। ओबामा सचमुच में परमाणु निरस्त्रीकरण चाहते हैं तो उन्हें यूरोप से परमाणु युद्धास्त्र हटा लेने चाहिए,नाटो को परमाणुरहित बनाना चाहिए और भारत के लिए खतरनाक बने हुए दियागो गार्सिया सैन्य अड्डे से परमाणु अस्त्र हटा लेने चाहिए। हम देखना चाहते हैं कि वे परमाणु निरस्त्रीकरण के मामले पर कितने ईमानदार हैं !   































सोमवार, 8 नवंबर 2010

अरूण जेटली की अमरीकाभक्ति

        भाजपा नेता अरूण जेटली का आज के अखबारों में एक बड़ा ही अच्छा बयान छपा है। यह बयान इस संदर्भ में अच्छा है कि इसमें उन्होंने ईमानदारी के साथ अपनी बात कही है। उन्होंने कहा है भाजपा कभी अमेरिका विरोधी मुहिम का हिस्सा नहीं रही है। हमें जेटली की इस साफ़गोई की प्रशंसा करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा भाजपा ने तो शीतयुद्ध के जमाने में भी अमेरिका का विरोध नहीं किया था।
     हम कहना चाहते हैं अरूण जेटली साहब यह तो संभव ही नहीं था। शीतयुद्ध का बड़ा निशाना मुसलमान थे और अमेरिका ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और घृणा में शीतयुद्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के यहूदीविरोधी घृणा के मानदण्डों का भी अतिक्रमण कर दिया था।  
     अमेरिका के मजबूत दबंग के नातेदार इस्राइल ने मध्यपूर्व में मुसलमानों पर जुल्म ढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और आपका दल भारत में उस दौर में मुस्लिम विरोधी भावनाएं राममंदिर के नाम पर भड़का रहा था। याद करें वैसी घृणा आजाद भारत में भारत विभाजन के बाद पहलीबार देखी गयी थी।  इस अर्थ में आपका दल भी शीतयुद्ध की अमेरिका की विशाल मुस्लिम विरोधी रणनीति का हिस्सा बना हुआ था।संभवतः ओबामा इस बात को जानते हैं।   
     उल्लेखनीय है मुंबई में राष्ट्रपति ओबामा ने 6 नबम्बर 2010 को ताजहोटल में 26/11 की घटना की स्मृति में इस हमले के संदर्भ में अपने भाषण में पाक का जिक्र नहीं किया था। इस पर भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढ़ी ने ओबामा के बयान में पाक के जिक्र न होने पर तेज प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उसी संदर्भ में भाजपा के नीतिगत मत को स्पष्ट करते हुए जेटली ने कहा है कि हम कभी भी अमेरिका विरोधी नहीं रहे।
      अरूण जेटली की यह ईमानदार अमेरिकाभक्ति है। उन्होंने अपनी अमेरिकाभक्ति के रूपों का बखान करते हुए यह भी कहा एनडीए सरकार के शासन के समय में कई महत्वपूर्ण अमेरिकापरस्त रणनीतिक फैसले भी लिए गए। बेहतर तो यही होता कि अरूण जेटली उन फैसलों के बारे में स्वयं बताते। फिर भी एक-दो बातें तो हम भी जानते हैं कि भारत के द्वारा इस्राइल से अस्त्र-शस्त्र खरीदने के सबसे बड़े सौदे उसी दौर में किए गए। फिलीस्तीनियों से दूरी और इस्राइल से मित्रता उसी दौर में आरंभ हुई। एनडीए के दौर में ही अमेरिका की विदेशनीति की सेवा में भारत की विदेश नीति को लगा दिया गया था।
    अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमेरिकी दादागिरी की भाजपा ने उस दौरान और बाद में कभी आलोचना नहीं की। हम समझते हैं कि राष्ट्रपति बराक ओबामा अरूण जेटली की भावनाओं को समझेंगे और राजीव प्रताप रूढ़ी की आलोचना को गंभीरता से नहीं लेंगे। भाजपा पहले से ही अमेरिकाभक्त पार्टी है और वह आगे भी अपनी अमेरिका भक्ति को बरकरार रखेंगे। ऐसा सभी भारतवासी उम्मीद करते हैं।  
      


















बुधवार, 3 नवंबर 2010

ओबामा यात्रा पर विशेष- गुलामों की टोली के लालच

   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आ रहे हैं और हमारे देश की पूरी मशीनरी उनकी खिदमत के लिए तैयार की जा रही है। ओबामा की खूबी है उनका बड़बोलापन। उनके बड़बोलेपन से एक खास किस्म का विभ्रम पैदा होता है। टीवी भाषणकला में वे परम दक्ष हैं।
    हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले में एकदम फिसड्डी हैं। वे नीति और दफ्तर के आदमी हैं,फाइलों का काम बढ़िया कर लेते हैं। पुराने प्रोफेसर हैं अच्छा सोच लेते हैं,समझाने और नीति बनाने में कुशल हैं, लेकिन वक्तृता में एकदम फिसड्डी हैं। सोनिया गांधी सोचने और बोलने दोनों में फिसड्डी हैं।
   काश, ओबामा के आगमन के समय अटलबिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री होते। फिर हम देखते बोलने में कौन बाजी मारता है। वक्तृत्वकला में बाजपेयी के सामने ओबामा दुधमुँहे बच्चे हैं।
     ओबामा से सार्वजनिक तौर पर बातों में कोई नहीं जीत सकता,वे अपनी बातों से भ्रमित और चकित करते हैं। वे अपना जादुई प्रभाव छोड़ते हैं। वे बोलकर ठगते हैं। वे नीति निपुण नहीं हैं। मनमोहन सिंह नीति निपुण हैं। हमें गर्व है हमारे पास मनमोहन सिंह हैं,लेकिन दुख है कि वे ओबामा की भाषणकला के कायल हैं।
   मनमोहन सिंह और पूरी कांग्रेस पर खासकर राहुल गांधी पर ओबामा का जादू सवार है । वे नहीं जानते कि ओबामा को वकृत्व कला विकसित करने में उनके वकालत के पेशे ने मदद की है। वकालत की कला झूठ की कला है। सच को झूठ में और झूठ को अति वास्तविकता में बदलना इस पेशे की खूबी है। ओबामा को इस पेशे ने माहिर बनाया है,इस काम में उनकी मीडिया उस्तादों ने मदद की है।
  इसे ओबामा का जादू ही कहा जाएगा कि वे सारी दुनिया को सादगी और खर्चे कम करने का वे उपदेश देते रहे हैं और अब जब भारत आ रहे हैं तो उनके ऊपर भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया जा रहा है। भारत आने वाले पहले के किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर इतना पैसा खर्च नहीं किया गया।
    अमेरिका इन दिनों जिस बदहाल अवस्था में है वैसी अवस्था उसकी कभी रही। लाखों बेकार युवक सड़कों पर आवारागर्दी कर रहे हैं। हजारों लोग मकानों की बैंक किश्तें न चुकाए जाने के कारण बेघर हो चुके हैं। अमेरिका की आबादी में सामान्य जीवन बसर करने लायक आम आदमी के पास सुविधाएं नहीं हैं। इसके बाबजूद ओबामा अपनी यात्रा पर बेशुमार दौलत खर्च कर रहे हैं। उनकी इस खर्चीली मानसिकता का अमेरिका की उपभोक्तावादी संस्कृति से गहरा संबंध है।
   आज की खबर है कि ओबामा जितने दिन भारत में रहेगे उनके ऊपर अमेरिकी प्रशासन 900 करोड़ रूपये प्रतिदिन खर्चा आएगा।  इसके अलावा भारत सरकार का कितना खर्चा होगा इसे आसानी से जोड़ा जा सकता है। मौटे तौर पर ओबामा की यात्रा पर प्रतिदिन 1500-2000 करोड़ रूपये प्रतिदिन का खर्चा आएगा। क्या इतने बड़े खर्चे को आर्थिकमंदी के दौर में जायज ठहराया जा सकता है ? जब हम ओबामा की यात्रा पर इतने बड़े पैमाने पर अतार्किक ढ़ंग से खर्चा कर रहे हैं तो समझौते किस तरह के तर्क से भरे होंगे ?
   ओबामा की यात्रा और अमेरिकी नव्य उदारतावाद ने भारत के अंदर अमीर देश होने की हसरत पैदा की है और इस हसरत का ही दुष्परिणाम है कि कांग्रेस का  नेतृत्व यह मोटी बात अभी समझने के लिए तैयार नहीं है कि अमेरिकी नव्य उदारतावाद और उससे जुड़ी सुरक्षा नीतियां अमेरिका को इराक-अफगानिस्तान युद्ध के मुँह में ले जा चुकी हैं। समूची अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूट गयी है। भारत को नव्य उदार सुरक्षा नीतियों के कारण ही कश्मीर में आतंकी मार झेलनी पड़ रही है। बेशुमार पैसा खर्च करना पड़ रहा है।
   नव्य उदार सुरक्षा पहलकदमी के गर्भ से ही अलकायदा,आईएसआई ,हिजबुल मुजाहिदीन आदि जैसे आतंकी तंत्रों का जन्म हुआ था और इसके निर्माण में अमेरिका का सीधा पैसा लगा और दिमाग लगा है।
    ओबामा को चुनाव जीतकर आए दो साल होने को आए किसी भी किस्म की राहत आम जनता के जीवन में नहीं आयी है। बेकारी, गरीबी,निरूद्योगीकरण की भयावह प्रक्रिया थमी नहीं है। 3 ट्रिलियन ड़ालर से ज्यादा के कारपोरेट घरानों को आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद अमेरिका में जनता का हाहाकार थमा नहीं  है।
   उल्लेखनीय है कारपोरेट घरानों ने अमेरिकी में विगत 10 सालों में जितनी मोटी कमाई की है उतनी विगत 50 सालों में नहीं की थी। दूसरी ओर जिस तरह की गरीबी, बेकारी और आर्थिक विपन्नता अमेरिका ने विगत तीन सालों में देखी है,वैसी पहले कभी नहीं देखी थी।
    मनमोहन सिंह को पटाने के चक्कर में कई मर्तबा ओबामा विश्वमंचों पर कह चुके हैं कि मनमोहन सिंह इस युग के सबसे सुलझे अर्थशास्त्री हैं। वे उनकी तारीफों के कई बार पुल बांध चुके हैं और उन तारीफों के पुल के पीछे छिपी मंशा को कांग्रेस और उसके नेतृत्व को भांपने की कोशिश करनी चाहिए।
    हमें भारत की संप्रभुता के साथ प्रशंसा और सुरक्षा के मुहावरे और जादुई संसार में सौदा करने की मनमोहन सिंह को अनुमति नहीं देनी चाहिए। ओबामा चाहते हैं  जिस तरह सोवियत रूस टूटा और वैसे ही भारत भी टूटे और उनकी नजर कश्मीर पर है। वे अफगानिस्तान में रहकर जो कर रहे हैं उससे इस इलाके में आतंकी और पृथकतावादी ताकतों को बल मिला है। ओबामा के सारे प्रयास भारतीय उपमहाद्वीप को अस्थिर करने वाले हैं,वे अमेरिका के सैन्यहितों का इस इलाके में स्थायी बंदोबस्त करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं इस काम में भारत उनकी मदद करे।
    आने वाले दिनों में ओबामा के भाषणों को देरिदियन ढ़ंग से विखंडित करके देखा जाना चाहिए। वे चाहते हैं कि भारत ,अफगानिस्तान में उनका जूनियर पार्टनर बनकर काम करे,वे उस्ताद बने रहेंगे और भारत पट्ठे की तरह काम करे।
    वे जानते हैं कि अफगानिस्तान की जनता में अमेरिका और उनके नाटो समूह के देशों की कोई साख नहीं है,वे यह भी जानते हैं कि नाटो की विशाल सेना के रहते हुए आज तक अफगानिस्तान के काबुल शहर के बाहर नाटो की सेनाएं निकल नहीं पायी हैं। नाटो की सेनाएं काबुल एयरपोर्ट से लेकर सैन्यशिविरों के आने-जाने वाले मार्ग तक ही सुरक्षित हैं,बाकी काबुल में तो उन पर अलकायदा के लोग कभी भी हमला कर जाते हैं औऱ नाटो की सेनाएं उनका बाल बांका नहीं कर पाती हैं।
    अफगानिस्तान में नाटो की सेनाओं का आलम यह है कि वे अलकायदा को घूस दिए बिना अपने रसद से लदे ट्रकों को सुरक्षित सैन्य कैंपों तक नहीं ले जा सकते। प्रति ट्रक उन्हें 1500 ड़ालर से ज्यादा की अलकायदा के सैनिकों को घूस देनी पड़ती है। यह अमेरिकी सीनेट की आधिकारिक रिपोर्ट में वर्णित सत्य है।
    अनेकों मर्तबा अलकायदा के सैनिक नाटो की सेनाओं की रसद लूट चुके हैं। ऐसी अवस्था में अमेरिका का जूनियर बनने का सपना भारत के लिए विपत्ति ला सकता है। अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों में स्थानीय दादाओं का कब्जा बरकरार है ।
   ओबामा यह भी जानते हैं कि भारत की अफगानिस्तान की जनता में साख है और भारत पर अफगानिस्तान की जनता भरोसा करती है। ओबामा की मंशा है अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के लिए भारत की इसी छवि को भुनाया जाए और वे मूल रूप से इसी काम से आ रहे हैं।  
अमेरिका इस इलाके में दोहरा गेम खेल रहा है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ खोखला हल्ला कर रहा है,दूसरी ओर आतंकियों को शह और पाक को हथियारबंद कर रहा है। वह आतंकियों को परास्त करने के नाम पर पाक को अमेरिका खोखला कर चुका है।
  अमेरिका का आतंकविरोधी विश्व अभियान राष्ट्रों को नष्ट करने वाला,खोखला करने वाला,संप्रभुता छीनने वाला अभियान है। इराक,अफगानिस्तान और पाकिस्तान उसके आतंकविरोधी अभियान में छिपी बर्बरता ,साम्राज्यवादी लूट और वर्चस्व का आदर्श उदाहरण हैं। भारत को कभी भी अमेरिका के सैन्य और रणनीतिक सहयोगी की टोली में शामिल नहीं होना चाहिए। इस टोली का सदस्य बनने के बाद से ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी हमारे सामने है।
   ओबामा साहब समानता और विशाल लोकतांत्रिक देश के नाम पर हमें कितना ही भ्रमित करने की कोशिश करें हमें अमेरिका की सैन्य-रणनीतिक टोली का हिस्सा नहीं बनना है। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्राध्यक्ष ,अफगानिस्तान को सोवियत सेनाओं से मुक्ति दिलाने के नाम पर अफगानिस्तान को बर्बाद कर चुके हैं। सोवियत संघ को सही विकास के मार्ग पर लाने के नाम पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष कंगाली के रास्ते पर फेंक चुके हैं।
   अमेरिका के सैन्य-रणनीतिक खेल में शामिल होने के बाद सोवियत संघ जैसा शक्तिशाली देश टूट चुका है। मनमोहन सिंह सरकार ने यदि ओबामा की सैन्य-रणनीतिक टोली का सदस्य बनने के लिए समझौते किए तो भारत की जनता और राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ उनकी यह सबसे बड़ी गद्दारी होगी और इसके लिए भारत की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।
   हम मनमोहन सिंह और उनके सहयोगी नीति निर्माताओं को इस मौके पर बताना चाहते हैं अमेरिका की टोली में शामिल होकर कुछ लोग अमीर बन सकते हैं देश अमीर नहीं बन सकता। अमेरिका की टोली लुटेरों की टोली है। गुलामों की टोली है। नव्य उदारतावाद की तबाही से संभवतः हमारे शासक यह बात आसानी से समझ सकते हैं।    




गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

मनमोहन-सोनिया की अमेरिकी गुलामी

     ग्लोबल मीडिया यह प्रचार कर रहा है कि ईरान खतरनाक देश है और वह परमाणु अस्त्रों के मामले में अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यह मिथ्या प्रचार है। परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में जब परमाणु सुरक्षा धुन का पाठ राष्ट्रपति ओबामा ने किया तो कम से कम भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इसका विरोध करना चाहिए था लेकिन वे गुलामों की तरह इस मसले पर चुप रहे। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासन के दौरान ही भारत के प्रतिनिधि ने यूएनओ में ईरान के खिलाफ आर्थिक पाबंदी के प्रस्ताव का समर्थन किया। भारत का ईरान के प्रति यह शत्रुभाव उस बुनियादी समझ का उल्लंघन है जिसके आधार पर ईरान-भारत में मैत्री बनी थी। भारत ने इस मित्रता को तोड़ा है। इसका श्रेय मनमोहन-सोनिया को जाता है। ईरान हमारे देश का कठिन समय में भी मददगार दोस्त रहा है। कम से कम कांग्रेस को श्रीमती इन्दिरा गांधी की मौत के बाद से अमेरिकी अंधभक्ति के लिए याद किया जाएगा।
    लेकिन असल खेल कुछ और है,ईरान के खिलाफ परमाणु अस्त्रों की असुरक्षा का नारा देकर अमेरिका के द्वारा ईरान के तेल और गैस भंडारों को अपने कब्जे में लेने की तैयारियां चल रही हैं और इसके लिए स्थानीय स्तर पर चीन ने तकरीबन सहयोगी की भूमिका निभाने का मन बना लिया है। जिस तरह ईरान के खिलाफ पाबंदी के मसले पर रुस और चीन ने अमेरिका के सामने समर्पण किया है उससे यही लगता है कि आर्थिकमंदी ने अमेरिका की हेकड़ी को कम नहीं किया है बल्कि मंदी के बाद अमेरिका की दादागिरी और  बढ़ गयी है।
    अमेरिका ने ईरान के सवाल पर रुस और चीन को जिस तरह झुकाया है उससे यह भी पता चलता है कि ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की विदेशनीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।
   मध्यपूर्व में अमेरिका की नीति इस्राइल के विस्तारवादी मंसूबों के साथ बंधी है। अफगानिस्तान के मुक्ति अभियान  और सोवियत सेना को अफगानिस्तान से बाहर निकाल देने के साथ जिस विदेश नीति को  अमेरिकी प्रशासन ने लागू किया था उसकी धुरी है मध्य-पूर्व में अमेरिकी-इस्राइली सैन्यविस्तार और मध्यपूर्व में हथियारों  की अबाधित दौड़ पैदा करना।
   उल्लेखनीय है अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को बाहर निकालने के लिए अमेरिका ने कठमुल्लाओं की सेना का निर्माण किया और इसमें पाक प्रशासन की मदद ली, पहलीबार समाजवाद से अफगानिस्तान को बचाने के नाम पर फंडामेंटलिस्टों की सेना बनाई गयी इसके लिए बिन लादेन और दूसरे फंडामेंटलिस्टों को आधिकारिक तौर पर अरबों-खरबों डॉलर की आर्थिक मदद दी गयी,पाकसेना -सीआईए- पेंटागन के अधिकारियों और सैन्यविशेषज्ञों ने अफगान फंड़ामेंटलिस्टों को प्रशिक्षित किया है। अलकायदा के नेटवर्क को विश्वव्यापी शक्ल प्रदान की गयी। अमेरिकी प्रशासन की इस विश्वव्यापी फंडामेंटलिस्ट मुहिम की ओर आरंभ में किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन फंडामेंटलिस्टों के विश्वव्यापी नेटवर्क को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर सऊदी अरब के शासन,ब्रिटेन के शासकों से लेकर अमेरिकी राजनीतिक दलों का खुला अंध समर्थन था और आज भी है।
    फंड़ामेंटलिस्टों के इस विश्वव्यापी उभार का लक्ष्य है सारी दुनिया में अमेरिका निर्देशित और नियंत्रित नई विश्व व्यवस्था लागू करना, साथ ही आतंकवाद के नाम पर विश्वव्यापी भय और ध्रुवीकरण बनाना। इस प्रक्रिया में अमेरिकी शस्त्र उद्योग की चांदी हुई है।
    अमेरिका की मौजूदा परमाणु सुरक्षा मुहिम शस्त्र उद्योग के हितों से जुड़ी है। दुर्भाग्य से भारत भी अमेरिकी रणनीति का मोहरा बन गया है। सामान्य आर्थिक लाभों को पाने के चक्कर में कांग्रेस पार्टी ने गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को तिलांजलि देकर सबसे पहले अफगानिस्तान के नवनिर्माण के गोरखधंधे में हाथ बंटाने का फैसला किया और इस तरह अमेरिका और नाटो देशों के द्वारा अफगानिस्तान पर किए अबैध कब्जे को स्वीकार कर लिया।
     भारत का अफगानिस्तान के नवनिर्माण के काम में हाथ बंटाना मूलतः अमेरिकी सैन्यविस्तार और नई विश्व व्यवस्था के प्रयासों के सामने खुला समर्पण है। दुर्भाग्य से भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने भारत की विदेशनीति में अफगानिस्तान के संदर्भ में आए बदलाव की खुलकर आलोचना तक नहीं की। कांग्रेस पार्टी और मनमोहन-सोनिया का नेतृत्व अमेरिकी हितों के पोषक और अंधभक्तों के रुप में इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।




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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...