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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

पोर्न के दीवाने और निकम्मी मनमोहन सरकार

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में पोर्नयात्रियों की संख्या सबसे ज्यादा पायी गयी है और इस बात को ही ध्यान में ऱखकर केन्द्र ने दफ्तरों में पोर्न वेबसाइट देखने पर पाबंदी लगा दी है। यह आदेश इसी साल फिर से नवम्बर में जारी किया गया। क्या इससे बाबूओं और अफसरों को पोर्न की सैर से रोका जा सकता है ?
      पोर्न विरोधी केन्द्र सरकार के सर्कुलर में बुनियादी तौर पर पोर्न देखने पर आपत्ति नहीं है। आपत्ति इस बात पर है कि हैकर लोग पोर्न साइट के जरिए ही सरकारी फाइलों में सेंध मारते हैं अतः फाइल वाले कम्प्यूटर इंटरनेट से कनेक्ट न रखे जाएं यह हिदायत है। पोर्न देखें, लेकिन सरकारी फाइल को हैकरों से बचाकर। क्या पोर्न ज्यादा हानिकर है या हैकर या दोनों ?
दूसरी ओर इस साल पोर्न विरोधी मुहिम में चीन ने अच्छा काम किया है। तकरीबन 1669 पोर्न से संबंधित केसों की जांच की गई है। पोर्न पब्लिकेशन की लाखों प्रतियां जब्त की गई हैं। पोर्न दिखाने वाली 60 हजार वेबसाइट बंद की गई हैं।नेट पर पोर्न प्रसार करने पर 2157 केस दर्ज किए गए हैं। 37 मिलियन चोरी के पोर्न कैसेट,डीवीडी आदि पकड़े गए हैं और 10हजार लोगों पर इसके कारण केस लगाए गए हैं। और हमारे यहां कुछ भी नहीं हुआ, आप क्या सोचते हैं ?          





मंगलवार, 6 जुलाई 2010

पोर्नोग्राफी का आधार है रंगभेद,पुंसवाद और मुनाफा

(प्रसिद्ध नारीवादी नेत्री आंद्रिया द्रोकिन)
     संयुक्त राष्ट्र संघ के खोजी-शोधार्थी नजत माज़िद माल्ला के अनुसार इंटरनेट पर 40 लाख से ज्यादा बेवसाइट हैं जहां पर बच्चों पर बनी पोर्नोग्राफी ,सेक्सुअल शोषण,बाल वेश्यावृत्ति आदि की सामग्री और इमेज मिलती हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि पोर्न बेवसाइट की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। एक ब्रिटिश इंटरनेट वाच ग्रुप की रिसर्च के आधार यह तथ्य सामने आया है कि सन् 2003 से 2007 के बीच में जो इमेजें नेट पर दिखाई गयी हैं उनमें बर्बर बलात्कार,बंधक,मुख मैथुन और इसी किस्म के अनाचार को दर्शाया गया। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट पर किसी भी एक समय में साढ़े सात लाख लोग बाल पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट चाटरूम एक बड़ा जरिया है बाल पोर्नोग्राफी का। अमेरिका के नेशनल सेंटर आन मिसिंग एंड एक्स्प्लॉयटेड चिल्ड्रन संगठन के अनुसार 83 प्रतिशत बाल पोर्न रखने वालों के पास 6-12 साल की उम्र के बच्चों पर बनी पोर्न पायी गयी हैं। 39 प्रतिशत के पास 3-5 साल उम्र के बच्चों पर बनी पोर्न मिली हैं।19 प्रतिशत के पास 3 साल से कम उम्र के बच्चों पर बनी बाल पोर्नोग्राफी मिली हैं। माल्ला ने यह भी कहा कि पोर्न उद्योग 3 से 20 बिलियन डॉलर की कमाई कर रहा है। माल्ला ने कहा कि विभिन्न देशों को बाल पोर्न से संबंधित पोर्नोग्राफी बेवसाइट के बारे में तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान करना चाहिए। जिससे उन्हें जल्दी बंद किया जा सके।
    पोर्नोग्राफी को लेकर अमेरिकी मीडिया में खूब हल्ला मचता रहता है। अमेरिका के छह राज्यों में पोर्नोग्राफी दिखाए जाने के खिलाफ कड़े कानून भी हैं इसके बावजूद इंटरनेट से लेकर केबल टेलीविजन पर पोर्नोग्राफी का अबाध प्रदर्शन जारी है। कहीं पर भी अमरीकी प्रशासन और पुलिस सक्रिय नजर नहीं आती। स्थिति इतनी खराब है कि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि हार्डकोर पोर्न न दिखाए जाएं। ऐसे पोर्न न दिखाए जाएं जिनमें सीधे संभोग करते दिखाया जाता है। इस आदेश के बावजूद अमेरिका में पोर्न का धंधा और प्रसारण खुलेआम हो रहा है। आखिर इसका प्रधान कारण क्या है ? अमेरिकी नस्लवाद,पुंसवाद और मुनाफा।  
   अमेरिका की प्रसिद्ध नारीवादी आंद्रिया द्रोकिन ने 'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा है कि
‘‘ मिनीयापोलिस में कुछ बड़े पोर्नोग्राफर है, कुछ भयानक जातिवादी सेंट पॉल में है और दोनों ही शहरों में कुछ गंभीर नागरिक भी हैं जो पोर्नोग्राफी व जातिवाद को समाप्त करना चाहते है। यह अध्यादेश उस राजनीतिक संस्कृति की उपज था जो लोगों के खिलाफ किसी भी प्रकार की क्रूरता के खिलाफ थी।’’
     ‘‘सन्  1983 में कैथरिन और मुझे आसपास के सक्रिय कार्यकर्त्ताओं द्वारा स्थानीय कमिटी मीटिंग की जाँच करने के लिए कहा गया। यह मिनीयापोलिस का गरीब, अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों का छोटा सा क्षेत्र था। नगर परिषद के अंतर्गत पोर्नोग्राफी कई क्षेत्रों में फलफूल रही थी। वे विगत सात वर्षों से इन क्षेत्रों के कानून एवं नीतियों से लड़ रहे हैं। जिनके समर्थन से पोर्नोग्राफी ने आसपास के जीवन को नारकीय बना दिया है। जरूरी है कि आसपास की इन गतिविधियों को खारिज किया जाए इससे पोर्नोग्राफी को झेल रही निर्धन, काली जनता प्रसन्न होगी। क्योंकि अमीर श्वेतों को छोड़कर उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा हैं।’’
  द्रोकिन ने रेखांकित किया कि पोर्न के जरिए औरतों के खिलाफ फैलायी जा रही घृणा को खत्म करने और पोर्न के खिलाफ कड़े कानून बनाने और फिर उसे लागू कराने के लिए स्थानीय जनता को जागृत करना और संगठित करना बेहद जरूरी है।
   द्रोकिन ने आगे लिखा है कि ‘‘ ये कार्यकर्त्ता हमारे पास आए और उन्होंने रेखांकित करते हुए कहा: हम जानते है कि यहाँ का सबसे बड़ा मुद्दा स्त्री के प्रति घृणा है। हम इसके लिए कुछ करना चाहते है, हम क्या कर सकते है ? वे जानते थे उन्हें क्या करना है। उन्होंने मुझे और मैकिनॉन को ही नहीं पूरे शहर को संगठित किया। स्त्री घृणा पर आधारित पोर्नोग्राफी के खिलाफ पूरा शहर एकजुट हो गया। गरीब, हर वर्णं के लोग स्त्री जीवन के पक्ष में खड़े होने लगे। अमेरिका के एक शहर में राजनीतिक नारीवादी कार्यकर्त्ताओं का जन सैलाब तैयार हो गया  जिसमें मजदूर स्त्रियाँ, नई व पुरानी वेश्याएँ, शिक्षाविद्, लेस्बियन, छात्रों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार के पीड़ितों की छोटी सेना भी शामिल थी। इन्होंने नगरपालिका नागरिक अधिकार कानून में पोर्नोग्राफी के विरूद्ध नया प्रावधान लाने की माँग की। पोर्नोग्राफी युक्त लिंग भेद को स्त्री के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन माना गया। कैथरिन और मैंने अध्यादेश में पोर्नोग्राफी पर अलग, स्वायत्त कानून की माँग की।’’
     ‘‘यह अध्यादेश औचित्यपूर्ण, वाजिब था, वंचितों तथा शोषितों के पक्ष में था इसलिए इसे व्यापक समर्थन मिला। उच्च से निम्न और निम्न से उच्च सभी वर्गों के लोग इसके साथ थे। क्योंकि यह पोर्नोग्राफी के नारी केंद्रित घृणा, कट्टरतावाद, स्त्री के प्रति दुश्मनी, क्रोध, शोषण के विरोध में था। ऐसा नारी इच्छा के प्रति हमारे बदलते ज्ञान व अनुभव के कारण हो सका। महिला को जब कानून का साथ, सम्मान, शक्ति, अर्थपूर्ण नागरिकता दी जाती है तो पोर्नोग्राफरों की स्वायत्तता समाप्त होने लगती है, उनपर अंकुश लग जाता है। यदि वह कानून द्वारा संरक्षित है तो कोई फर्क नही पड़ता कि पोर्नोग्राफी या पोर्नोग्राफर या उनके ग्राहक उसका कितना तिरस्कार करते हैं। कानून उसका अधिकार है। इसका इस्तेमाल कर वे दलालों और ग्राहकों से कह सकती है: हम तुम्हारा उपनिवेश नही हैं, तुम हमारे मालिक नहीं, न ही हम तुम्हारे अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा हैं। इस कानूनी प्रावधान द्वारा वह अपनी इच्छा जाहिर कर सकती है: मुझे यह नहीं चाहिए, मुझे यह नही पसंद, यह कष्टप्रद है, यह बल-प्रयोग कामुक नही है, मैं दूसरों की भाषा नही बनना चाहती, मैं मातहत बनने से इंकार करती हूँ, मैं बोलना चाहती हूँ, मैं अपने लिए बोलना चाहती हूँ, मैं अदालत में तुमसे बात करूँगी और तुम मुझे सुनोगे।’’
 पोर्न देखते हुए भूल जाते हैं कि इसमें औरत के प्रति गहरी घृणा और अमानवीयता भरी हुई है। द्रोकिन ने लिखा  ‘‘हम चाहते है कि पोर्नोग्राफी में औरतों के साथ की गयी अमानवीयता प्रतिबंधित की जाए। सामान्यतया पोर्नोग्राफरों में व्याप्त नारी-नफ़रत के भाव का अनुकरण हमारी वैधानिक व्यवस्था भी करती है। यह व्यवस्था गहरे रूप में लिंग भेद एवं नारी देह की घृणा से प्रेरित है। मानो स्त्री का होना ही नफ़रत करने के लिए पर्याप्त है। साथ ही हमसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि हम झूठ बोलें: 'हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया है।' 'मर्सी' में मेरा एक चरित्र है आंद्रिया, जो कहती है कि कानून के सामने जाने से पहले तुम्हें साफ होना होगा, पवित्र होना होगा। इस अर्थ में कोई भी पीड़ित स्त्री न तो साफ़ है, न ही पवित्र। जब भी बलात्कार के अभियोग को लेकर हम अदालत गए हमें सबसे पहले अपवित्र माना गया। निश्चित तौर पर पोर्नोग्राफी के धंधे में जबरन लाई गई औरतें, सड़कों पर नीलाम औरतें, घरों में मारपीट कर कामुक उत्तेजना के लिए इस्तेमाल की गई औरतें पवित्र नहीं हो सकतीं। स्त्री जब कभी अपने कानूनी अधिकार का उपयोग करती है या उसे अवसर प्राप्त होता है तो ऐसे समय में उसे पवित्र होने की कोई ज़रूरत नही है। वह पूरे सम्मान के साथ साधिकार कह सकती है कि मैं भी हूँ और इसीलिए मैं प्रतिरोध व्यक्त करती हूँ।’’
      आंद्रिया द्रोकिन ने 'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा है, ‘‘जब मिनीयापोलिस की नगर समिति ने इस अध्यादेश को पास करते हुए कहा, स्त्रियों का भी अस्तित्व है, उनका महत्व है, वे अपनी लड़ाई लड़ना चाहती हैं। जो उन्हें चाहिए हम देंगे। इस बार कानून नारी-इच्छा के पक्ष में तथा पोर्नोग्राफी के विरोध में खड़ा हुआ। जो औरतें इस विशेषाधिकार का प्रयोग करना चाहती थीं उनसे अनेकानेक नए विचार सामने आए। पोर्नोग्राफी द्वारा प्रताड़ित स्त्रियों की मर्मान्तक तकलीफों के अनुभवों ने इस कानून को अधिक स्पष्ट और  कारगर बनाया। इस अध्यादेश में उनकी प्रतिरोध की इच्छा व्यक्त हुई। सहने की, जीने की विशाल ताकत ने कानूनी अधिकार का रूप ले लिया।’’
     ‘‘इस विशेषाधिकार का उपयोग करती औरतें कहेंगी, मैं वह हूँ जिसने बहुत सहन किया है, मैं जीवित बच गई हूँ, मेरा भी महत्व है, मैं बहुत कुछ जानती हूँ, और जो मैं जानती हूँ उसका बड़ा महत्व है, अर्थवत्ता है, और यह तुम जैसे दलालों को न्यायालय में पता चलेगा। मैं अपनी जानकारियों को तुम्हारे विरूद्ध इस्तेमाल करूँगी। और तुम मेरे ग्राहक, मैं तुम्हारे बारे में भी मेरे पास पक्की जानकारी है जिसका उपयोग मैं करूँगी। मैं तुम्हें तब से जानती हूँ जब तुम मेरे शिक्षक, मेरे पिता, मेरे वकील, मेरे डॉक्टर, मेरे भाई, मेरे पुरोहित थे। अब मैं जो जानती हूँ उसका इस्तेमाल करूँगी।’’
 (आंद्रिया दोर्किन ने शिकागो विश्वविद्यालय लॉ स्कूल में आयोजित सम्मेलन में 6 मार्च,1993 को 'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'  विषय पर व्याख्यान दिया था, इस लेख में उद्धृत अंश इसी व्याख्यान से साभार लिए गए हैं, इस व्याख्यान का अनुवाद विजया सिंह ने उपलब्ध कराया है।)




शनिवार, 3 जुलाई 2010

पोर्नोग्राफी में ’Fuck Me’ का नारा 'Hate Me' का जनक है

इंटरनेट की गतिशीलता और बदले नेट संचार के आंकड़े बड़े ही दिलचस्प हैं। विश्व स्तर पर इंटरनेट के यूजरों की संख्या 1.6 बिलियन है। इसमें एशिया का हिस्सा आधे के करीब है। एशिया में 738 मिलियन इंटरनेट यूजर हैं। इसमें सबसे ज्यादा यूजर चीन के हैं। फेसबुक के 500 मिलियन सक्रिय यूजर हैं। ये लोग संदेश ले रहे हैं और दे रहे हैं। इनके संदेशों की संख्या अरबों-खरबों में है। इसी तरह ट्विटर के यूजरों की संख्या भी करोड़ों में है। ट्विटरों के संदेशों की अब तक की संख्या 10 बिलियन है। यू ट्यूब में दो बिलियन वीडियो रोज देखे जाते हैं।
         इंटरनेट की उपरोक्त गति को ध्यान में रखकर देखें तो पाएंगे कि पोर्नोग्राफी देखने वालों की गति क्या होगी ? पोर्नोग्राफी बेवसाइट पर एक पदबंध है जिसका व्यापक इमाल किया जा रहा है और वह है  ‘‘Fuck Me Look’’ । इस पदबंध को पढ़कर लग सकता है कि इसका पोर्न के संदर्भ में ही प्रथम इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है। औरत का तो विज्ञापन में कार से लेकर ब्लेड तक इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी वस्तुओं के विज्ञापन में औरत रहती है जिसे औरतें इस्तेमाल नहीं करतीं।
       संस्कृति और मासकल्चर की समस्या यह है कि ये दोनों मानकर चलते हैं कि पुरूष हमारी संस्कृति है,पुंसवाद हमारी संस्कृति है। पुरूष ही हमारी संस्कृति का समाजीकरण करता है। इसी पुरूष के ऊपर  ‘Fuck Me’ के नारे के जरिए बमबारी हो रही है। इस नारे के तहत विजुअल इमेजों में  कहा जा रहा है कि तुम मेरे शरीर के मालिक हो, स्त्री शरीर के हकदार हो। 
      पुरूष से कहा जा रहा है कि तुम बलात्कार या स्त्री उत्पीड़न के आरोपों को गंभीरता से न लो क्योंकि मैं तुम्हें अपना शरीर भेंट कर रही हूँ। फ़र्क इतना है कि पोर्न बेवसाइट में ‘Fuck Me’ कहने वाली औरत बाजार या गली में टहलती हुई कहीं पर नहीं मिलती।
     इसी तरह हार्डकोर पोर्नोग्राफी बेवसाइट में गुप्तांगों का वस्तुकरण होता है, वहां पर स्त्री का सेक्सी लुक सभ्यता को नरक के गर्त में ले जाता है। यह संभावना है कि पोर्न के देखने से बलात्कार में बढ़ोतरी हो यह भी संभव है पोर्न का यूजर सीधे बलात्कार न भी करता हो। लेकिन यह सच है कि पोर्न गंदा होता है और यह दर्शक के सास्कृतिक पतन की निशानी है। 
      जब तक कोई युवक पोर्न नहीं देखता उसकी जवानी उसके हाथ में होती है। वह अपनी जवानी का मालिक होता है। अपनी कामुकता का मालिक होता है।  लेकिन ज्योंही वह पोर्नोग्राफी देखना आरंभ करता है उसका अपनी जवानी और कामुकता पर से नियंत्रण खत्म हो जाता है। अब ऐसे युवक की जवानी पोर्नोग्राफी के हवाले होती है। उसकी जवानी की ताकत का स्वामित्व पोर्नोग्राफी के हाथों में आ जाता है और इस तरह एक युवा अपनी जवानी को पोर्नोग्राफी के हवाले कर देता है। वह पोर्न देखता है, खरीदता है।
     पोर्न बदले में उसके सेक्स के बारे में संस्कार,आदत, एटीट्यूट और आस्था बनाती है। युवा लोग नहीं जानते कि वे अपनी जवानी की शक्ति पोर्न के हवाले करके अपनी कितनी बड़ी क्षति कर रहे हैं। जवानी उनकी कामुक भावनाओं का निर्माण करती है। उनकी कामुक पहचान बनाती है।
     जो लोग कहते हैं कि पोर्न के जरिए शिक्षा मिलती है,सूचनाएं मिलती हैं। वे झूठ बोलते हैं। पोर्न के देखने के पहले युवक का दुनिया के बारे में जिस तरह का नजरिया होता है वह पोर्न देखने के बाद पूरी तरह बदल जाता है। पोर्न देखने वाला सिर्फ स्वतः वीर्यपात करता रहता है और उससे ज्यादा सेक्स पाने की उम्मीद लगाए रहता है।
    पोर्न की इमेजों में दुनिया,औरत,मर्द,कामुकता ,आत्मीयता ,शारीरिक लगाव आदि के बारे में कहानी बतायी जाती हैं। लेकिन पोर्न की सारी इमेजों से एक ही संदेश अभिव्यंजित होता है वह है घृणा। यह कहना गलत है पोर्न से प्रेम पैदा होता है। गेल डेनिश ने इसी संदर्भ में लिखा था कि पोर्न से प्रेम नहीं घृणा अभिव्यंजित होती है। पोर्न देखकर औरत के प्रति प्रेम नहीं घृणा पैदा होती है। पुरूष औरत के शरीर से घृणा करने लगता है। उसे  तो वह शरीर चाहिए जो पोर्न स्टार का है।वैसा सेक्स चाहिए जैसा पोर्न में दिखाया जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ’Fuck Me’ का नारा  'Hate Me' की विचारधारा की सृष्टि करता है।
        आंद्रिया द्रोकिन ने इस बात पर लिखा है कि ''जब कोई औरत या लड़की के सामान्य जीवन को देखता है तो वह वस्तुत: उनकी क्रूर स्थितियों को देख रहा होता है। हमें मानना पड़ेगा कि सामान्य जीवन में चोट लगना आम बात है, यह व्यवस्था का हिस्सा है, सत्य है। हमारी संस्कृति ने भी इसे स्वीकार किया है। इसका प्रतिरोध करने पर हमें दंड मिलता है। गौरतलब है कि यह तकलीफ देना, नीचे ढकेलना, लिंगीय क्रूरता आदि दुर्घटनाएँ या गलतियाँ नहीं वरन् इच्छित कार्य व्यापार हैं। हमें अर्थहीन व निर्बल बनाने में पोर्नोग्राफी की बड़ी भूमिका है। यह हमारे दमन, शोषण तथा अपमान को सहज और अनिवार्य बनाती है।’
द्रोकिन ने यह भी लिखा है कि ‘‘पोर्नोग्राफर हमारे शरीर का उपयोग भाषा के रूप में करते हैं। वे कुछ भी कहने या सम्प्रेषित करने के लिए हमारा इस्तेमाल करते हैं। उन्हें इसका अधिकार नहीं है। उन्हें इसका अधिकार नही होना चाहिए। दूसरी बात, संवैधानिक रूप से भाषायी पोर्नोग्राफी की रक्षा करना कानून का निजी हित में उपयोग करना है। इससे उन दलालों को खुली छूट मिल जाएगी जिन्हें कुछ भी कहने के लिए हमारी जरूरत होती है। वे दलाल मनुष्य है, उन्हें मानवाधिकार प्राप्त है, वैधानिक रक्षण का सम्मान प्राप्त है। हम चल संपत्ति है, उनके लिए रद्दी से ज्यादा नहीं।’’


आंद्रिया द्रोकिन ने लिखा कि पोर्न के लिए औरत महज भाषिक प्रतीक मात्र है। पोर्न की भाषा दलाल की भाषा है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘हम मात्र उनके भाषिक प्रतीक हैं जिन्हें सजाकर वे सम्प्रेषित करते हैं। हमारी पहचान दलालों की भाषा में निर्मित होती है। हमारा संविधान भी हमेशा से उन्हीं के पक्ष में खड़ा है, वही जो लाभ कमानेवाले सम्पत्ति के मालिक हैं। चाहे सम्पत्ति कोई व्यक्ति ही क्यों न हो। इसका कारण कानून और धन, कानून और पॉवर का गुप्त समझौता है। दोनों चुपचाप एक दूसरे के पक्ष में खड़े हैं। कानून तब तक हमारा नही जब तक वह हमारे लिए काम नही करता। जब तक हमारा शोषण नहीं रोकता, हमें मानव होने का सम्मान नही देता।’’
   जैसा कि सभी जानते हैं कि अमेरिका पोर्न का मूल स्रोत है। सारी दुनिया में अमेरिका ने पोर्न संस्कृति का प्रचार-प्रसार करके एक नए किस्म की सांस्कृतिक प्रतिक्रांति की है। द्रोकिन ने लिखा है , ‘‘ अमेरिका में पोर्नोग्राफी उन लोगों का इस्तेमाल करती है जो संविधान के बाहर छिटके हुए हैं। पोर्नोग्राफी श्वेत औरतों का चल सम्पत्ति के रूप में इस्तेमाल करती है। यह अफ्रीकन-अमेरिकन महिलाओं का दास की तरह उपयोग करती है। पोर्नोग्राफी बहिष्कृतत पुरुषों (अफ्रीकन-अमेरिकन दासों) का उपयोग कामुक वस्तुओं की तरह जानवरों द्वारा बलात्कार के लिए करती है। पोर्नोग्राफी वृद्ध श्वेत पुरुषों पर नही बनती। ऐसा नही हैं। कोई उन तक नही पहुँच पाता है। वे हमारे साथ ऐसा कर रहे हैं, या उन लोगों की रक्षा कर रहे है जो हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं। उन्हें इसका फायदा मिलता है। हमें उन्हें रोकना होगा।’’
      समाज में पोर्न तब तक रहेगा जब तक औरत को संपत्ति माना जाएगा और समाज में संपत्ति का महिमागान चलता रहेगा। संपत्ति पर आधारित संबंधों को नियमित करने में धर्म और मीडिया दो बड़े प्रचारक और राय बनाने वाले हैं। इसी संदर्भ में आंद्रिया द्रोकिन ने लिखा- 
‘‘ज़रा सोचें किस तरह विवाह स्त्री को नियमित करता है, किस प्रकार औरतें कानून के अंतर्गत संपत्ति मात्र हैं। बीसवीं शती के आरम्भिक वर्षों के पहले यह स्थिति ऐसे ही बरकरार थी। चर्च महिलाओं को संचालित करता था। जो मर्द स्त्री को अपनी वस्तु समझते थे उनके खिलाफ प्रतिरोध चल रहा था। और अब ज़रा पोर्नोग्राफी द्वारा समाज के स्त्री नियमन की नई व्यवस्था पर गौर करें, यह औरतों के खिलाफ आतंकवाद का लोकतांत्रिक प्रयोग है। रास्ते पर चल रही हर स्त्री को इसके द्वारा यही संदेश दिया जाता है कि उसकी अवस्था नज़रे नीची किए हुए जानवर के समान है। वह जब भी अपनी ओर देखेगी उसे पैर फैलाए लटकी हुई स्त्री दिखेगी। आप भी यही देखेंगे।’’




शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

स्त्रीवाद के परिप्रेक्ष्य में फेमिनिज्म-3- जातिश्रेष्ठत्व,परपीड़क रतिभावना और पोर्नोग्राफी


         इंटरनेट के आने के साथ संचार की गति और दायरे में मूलगामी बदलाव आया है। जो लोग प्रेसचेतना के आधार पर पोर्न के प्रभाव को देख रहे हैं वे भूल कर रहे हैं। पोर्न आज रीयलटाइम गतिविधि है। यूजर कभी भी उसका उपभोग कर सकता है। यूजर को इससे क्या मिलता है यह तो वही जाने लेकिन जिन देशों में पोर्न देखना अपराध है वहां पर पोर्न का सार्वजनिक स्थानों पर रखे कम्प्यूटरों के जरिए सेवन करना अपराध है। दूसरी बात यह है कि पोर्न का सोशल बेवसाइट पर दुरूपयोग होने लगा है। इंटरनेट और मीडिया के जितने रूप हैं उनके विकास की एक गति रही है। इंटरनेट में सोशल नेटवर्क ऐसा विधा रूप है जिसका बहुत तेजी से विकास हुआ है। इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी सबसे तेज गतिविधि रही है . लेकिन सोशल नेटवर्किंग ने पोर्न को भी पछाड़ना शुरू कर दिया है। मात्र चार साल में सोशल नेटवर्किंग ने पोर्न से आगे अपनी जगह बना ली है। सोशल मीडिया के रूप में इसे देखें तो पाएंगे कि रेडियो को 50 मिलियन लोगों तक पहुँचने में 38 साल लगे,टेलीनिजन को 13 साल और इंटरनेट ने मात्र चार साल में ही इतने यूजरों कर अपने को पहुँचा दिया। जबकि फेसबुक 200मिलियन लोगों तक एक साल से भी कम समय में पहुँच गया है। स्थिति यह है कि ब्रिटनी स्पियर के आज ट्विटर पर जितने अनुयायी हैं उतनी इस्राइल,स्विटजरलैंड,नॉर्वे और अनेक देशों की आबादी भी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि सोशल मीडिया के आने के बाद से पोर्न पर जाने वालों की संख्या घट सकती है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पोर्नोग्राफी में पियृसत्तात्मक नजरिया रहता है। योन क्रियाओं में दिखाए जाने वाले दृश्य स्त्री के शारीरिक कष्टों सामने लाते हैं। मैथुन करने का अर्थ उत्पीडित करना या कष्ट देना नहीं है। यौन क्रिया कष्ट देने वाली क्रिया नहीं है बल्कि आनंददायी सृजनात्मक क्रिया है। लेकिन पोर्नोग्राफी में इस पक्ष की उपेक्षा की जाती है और भिन्न किस्म के कष्टमय संसार का रूपायन किया जाता है। इसी संदर्भ में आंद्रिया द्रोकिन ने लिखा-

‘‘पुरुष यौन-क्रिया का उपयोग हमें कष्ट देने के लिए करते है। इस संदर्भ में तर्क दिया जा सकता है कि स्त्री से मैथुनक्रिया करने के लिए पुरुष को उसे तकलीफ देनी पड़ती है, बर्बाद करना पड़ता है, आक्रामक होकर देह की बंदिशों को तोड़ना पड़ता है, धक्का देना पड़ता है, भाषिक और दैहिक लड़ाई में अपनी श्रेष्ठता दिखानी पड़ती है। यह भी कहा जा सकता है कि मर्द को यौन आनंद देने के लिए हमें हीन एवं अमानव बनना पड़ता है। ऐसा करते हुए हम मर्दों द्वारा संचालित किए जाते है, हम पराधीन, कृत्रिम व परजीवी बन जाते हैं।’’

पोर्न की भाषा का फासिज्म की उत्तेजक भाषा से गहरा साम्य है। घृणा की भाषा,साम्प्रदायिक भाषा और जातीय घृणा की भाषा की प्रक्रियाओं से पोर्न का गहरा संबंध है। द्रोकिन ने लिखा -

‘‘मेरे ध्यान में आता है कि कैसे घृणा की भाषा, जातीय घृणा की भाषा स्पष्ट रूप से ज्यादा कामुक होती है। यह जितनी विद्वेषपूर्ण और आक्रामक होगी इसकी कामुक अर्थवत्ता बढ़ती जाएगी मानो सेक्स दुश्मनी तथा युद्ध के विस्तार का पर्याय हो। जर्मन गणराज्य में हिटलर के प्रभुत्व को प्राप्त करने वाले ने सबसे पहले यहूदीवाद के खिलाफ वक्तव्य दिया, जो कि पोर्नोग्राफी की भाषा के समान था। इसे खुलेआम दिखाया गया, प्रकाशित किया गया, बाँटा गया। इस प्रकार की भाषाई उत्तेजना क्या कार्य करती है? यह कहती है, केवल मैं वास्तविक हूँ कोई हीन जीव या वस्तु नहीं और यदि ऐसी वस्तुओं का सर्वनाश कर मुझे सुख मिलता है तो यह प्रक्रिया निरन्तर चलनी चाहिए। इस जातिवादी हाययार्की ने भी विशुद्ध कामुक रूप ले लिया है। इसकी मदद से किसी कमजोर, निर्बल के विरूद्ध उत्पन्न अनादर, अपमान, दुर्व्यवहार को जैविक अनिवार्यता का नाम दे दिया जाता है। शब्दों और कार्यों में किसी एक लिंग या वर्ग की जैविक आक्रामकता, उत्तेजना, क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव को लिंगीय प्रतिक्रिया की जैविक तीव्रता मान लिया जाता है।’’
       ‘‘इस भयानक अज्ञानता पर आश्चर्य होता है कि कैसे लोग पुरुषों की जैविक उच्चता के असामान्य, पारदर्शी झूठ को पहचान नही पाते। जब-जब जातिवादी अवधारणा का कामुकीकरण किया जाता रहेगा इसे प्रभुत्व और दमन का ठोस आधार मिलता रहेगा। क्योंकि कुछ वर्चस्वशाली लोगों ने अपने काम सुख व यौन आनंद के लिए इन अवधारणाओं को जैविक सत्य एवं अनिवार्य बना दिया है। इसे उन्होंने प्राकृतिक बना दिया है जो किसी तर्क से नहीं बदलता। इस कारण ये अवधारणाएँ भी प्राकृतिक लगने लगीं हैं। इन अवधारणाओं की रक्षा करके लोग वस्तुत: अपने सेक्सुअल भावों की रक्षा करते हैं। वे कहते है: मेरी भावनाएँ स्वाभाविक है और मुझे तुम्हें कष्ट देकर संभोग की उच्चावस्था प्राप्त होती है, या तुम्हारे बारे में सोचकर मैं उत्तेजित होता हूँ तो तुम ही मेरी प्राकृतिक संगीनी हो। तुम्हारा स्वाभाविक कार्य है मेरी लिंगीय उत्तेजना को तीव्र करना है जिससे मुझे अपने महत्व एवं पुंसत्व का बोध हो। तुम कुछ नही हो, तुम्हारा कुछ न होना ही मुझे अस्तित्व प्रदान करता है। अपने अधिकार के लिए मैं तुम्हारा इस्तेमाल करता हूँ। मेरा होना मुझे शक्तिशाली बनाता है-सामाजिक शक्ति, आर्थिक शक्ति, साम्राज्य की सर्वोच्च शक्ति बनाता है। मैं तुम्हारे साथ जो चाहे कर सकता हूँ। ’’
        ‘‘उत्कृष्ट होने की यह भावना जातिगत कामुकता से प्रेरित परपीड़क रति भावना है। इसका उद्देश्य ही दूसरों को कष्ट पहुँचाना है। यह क्रूरतापूर्ण रति घृणा की भाषागत अभिव्यक्ति से जुड़कर बहुआयामी हो जाती है। जाति सूचक नामों या गुणों को किसी व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल करना उसे परेशान करने, डराने, अपमानित करने, नीचा दिखाने की इच्छा से प्रेरित होता है। पूर्णत: कामुक घृणा की भाषा पोर्नोग्राफी उद्योग की व्यवस्थित सचाई होती है। जहाँ पूरा एक वर्ग कामुक आनंद देने एवं दूसरा वर्ग उसे लेने के लिए तैयार होता है।’’
     ‘‘मुश्किल यह है कि औरत को चोट लगना सामान्य सी बात है। ऐसा रोज़, हर वक्त, कहीं किसी के साथ, पास-पड़ोस में, रास्ते पर, घनिष्ट संबंधों में, भीड़ में होता रहता है। इस अनादर और दुर्व्यवहार के बाद भी हम स्त्रियाँ खुद को भाग्यशाली मानती हैं। बलात्कार होते-हाते बच जाने पर हम स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं। विवाह के बाद हमें पीटा जाता है और यह भी हमारा भाग्य हैं। हम हमेशा खुश होते है कि हमारे साथ कम बुरा हुआ। और हम स्वयं से कहते है कि अब भी हम नहीं रुके तो बहुत बुरा हो सकता है।’’















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स्त्रीवाद के परिप्रेक्ष्य में पोर्नोग्राफी- कला नहीं है पोर्नोग्राफी-2-

     सार्वजनिक स्थानों पर लगे कम्प्यूटरों से पोर्नोग्राफी देखना अपराध है। उसी तरह हमारे बीच में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पोर्न के बारे में यह तर्क देते हैं कि .यह तो महज फोटोग्राफी है। पोर्नोग्राफी महज फोटोग्राफी नहीं है। फोटोग्राफर सभ्यता को संरक्षित करता है,मनुष्य और उसके अनुभव संसार को इतिहास का अविस्मरणीय क्षण बनाता है। पोर्नोग्राफर किंतु ऐसा कुछ भी नहीं करता, बल्कि उलटे मनुष्य की असभ्यता का प्रदर्शन करके सामाजिक अपराध करता है। स्वयं तो अपराध करता ही है अन्य को भी पोर्नोग्राफी पेश करके अपराध के लिए प्रेरित करता है। 
     पोर्नोग्राफर और फोटोग्राफर में वही फ़र्क है जो सभ्यता और असभ्यता में फ़र्क है। पोर्नोग्राफर व्यक्ति को नष्ट करता है। उसे महज भोग की वस्तु,संवेदनाहीन वस्तु बना देता है। आंद्रिया द्रोकिन ने 'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा-   
‘‘पोर्नोग्राफर स्त्री की हर विशेषता का इस्तेमाल करते है, उसे कामुक रूप देते है। उसे अमानवीय बनाने का नया रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। यह काफी व्यवस्थित तरीके से किया जाता है। जैसे पोर्नोग्राफी में काली औरतों की त्वचा को उनका जननांग मानकर उन्हें तिरस्कृत किया जाता है, कष्ट दिया जाता है। यहाँ काली त्वचा ही असामान्य यौन उत्तेजना का कारण है जो वाचिक (अपषब्दों) और लिंगीय हमले (मार-पिटाई, कोड़ा मारना,काटना, थूकना, बाँधना, दाँतों से काटना, उत्तेजना, वीर्यपतन) का शिकार होती है।’’
    
   पोर्नोग्राफी की जो लोग हिमायत कर रहे हैं उनका कहना है कि पोर्न एक कला है। पोर्न एक कला नहीं है बल्कि पोर्न एक व्यवसाय है,सरप्लस कमाने का जरिया है। इसमें कल्पना और सृजनशीलता खोजना गलत है। पोर्नोग्राफी का मास प्रोडक्शन होता है और मास सर्कुलेशन के लिए ही उसका निर्माण किया जाता है। जिससे ज्यादा से ज्यादा धन कमाया जा सके। मुनाफा कमाना इसका प्रधान लक्ष्य है।
     पोर्नोग्राफी को कला कहना सही नहीं होगा। कला के लिए स्वतःस्फूर्त्त अभिव्यक्ति और पुनर्सृजन का होना अनिवार्य शर्त्त है। पोर्नोग्राफी में ये दोनों ही तत्व गायब हैं। आंद्रिया ने लिखा है-
‘‘पोर्नोग्राफी में नारी शरीर असामान्य सेक्स के केन्द्र में होता है, जिसे विशिष्ट और ठोस रूप से अमानवीय और कामुक बनाया जाता है। यह प्रस्तुतिकरण किसी भी प्रकार की भावना व विचार से दूर होता है। यही कारण है कि पोर्नोग्राफी से जुड़े सभी विषयों के वाद-विवाद में अस्वाभाविकता मूलत: बनी रहती है। हममें से वे जो जानते हैं कि पोर्नोग्राफी महिलाओं का शोषण है, वे वास्तविक स्त्री के वास्तविक जीवन के बारे में, उनके अपमान और अवमानना के बारे में बात करते है। इस प्रसंग में दोनों प्रकार की स्त्रियाँ आती है- एक, जिनका पोर्नोग्राफी में इस्तेमाल होता है, दूसरी, जिनपर पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल होता है। पोर्नोग्राफी के पक्षधर इसे भाषा की स्वतंत्रता मानते है। उनके अनुसार पोर्नोग्राफी उपभोक्ता के मस्तिष्क के भीतर के विचार, भाव, सोच तथा कल्पना से संबद्ध है।’’
      ‘‘हमें बार-बार यह कहा जाता है कि पोर्नोग्राफी वैविध्यपूर्ण कल्पना पर आधारित होती है। गौरतलब है कि नारी का मलद्वार, जननांग, मुख कोई कल्पना नहीं हैं। जैसा कि डीप थ्रोट फिल्म, स्त्री के गले में गहरे तक पुरुष लिंग का प्रवेश दिखाया गया है, में भी यह गला किसी  कल्पनाशील मनुष्य का  नही लगता। मैं यहाँ बिना किसी दृश्य या स्पष्ट हिंसा के पोर्नोग्राफी की बात कर रही हूँ। मैं उस क्रूरता की बात कर रही हूँ जो किसी के मानवीय अधिकारों को छीनकर उसे मनुष्य भी नही रहने देती।’’
  पोर्नोग्राफी अर्थहीन नहीं होती। बल्कि उसकी प्रत्येक इमेज और प्रस्तुति के पीछे कोई न कोई अर्थ सक्रिय रहता है। पोर्न इमेजों की अपनी विचारधारा होती है। आंद्रिया द्रोकिन ने इसी संदर्भ में लिखा- 
      ‘‘पोर्नोग्राफी में सब कुछ का कोई न कोई अर्थ होता है। उदाहरणत: काली त्वचा की स्त्री। इसी तरह गोरी त्वचा की नारी का अलग अर्थ होता है। गोरों के समाज में गोरी स्त्री को विशिष्ट माना जाता है। यदि गोरा होना विशेषाधिकार है तो पोर्नोग्राफी में ऐसी महिलाओं का बड़ी तादाद में आने का क्या अर्थ है? समाज में उच्च आसन पर बैठी श्वेत नारी जिसके पास कुछ अधिकार, अवसर एवं स्वाधीनता है, से जब पूछा जाता है कि वह क्या चाहती है? वह कहती है कि वह इस्तेमाल होना चाहती है, शोषित होना चाहती है। तब पुंसवादी समाज हमें बताता है कि यही श्वेतवर्णी स्त्री ही मानक है सौंदर्य की, स्त्रीत्व की। पर सचाई यह है कि वह आज्ञाकारिता, समर्पण और दमन की प्रतीक है। वह बचे और बने रहने के लिए वही करती है जो पुरुष चाहता है, जो उसकी श्वेत त्वचा पर स्खलित होना चाहता है। वह बिकने के लिए है। ऐसे में उसे गोरी चमड़ी का मूल्य थोड़ा अधिक मिलता है। ’’
     अनेक पोर्न हिमायती हैं जो पोर्नोग्राफी को महज आनंद, मनोरंजन और कामोत्तेजना के प्रेरक तत्व की तरह देखते हैं। जबकि वस्तुतः मामला कुछ और है। पोर्नोग्राफी हिंसा है, इमेजों के जरिए की गई हिंसा है। इस हिंसा के केन्द्र में स्त्री है,पूरा समाज है,बच्चे हैं।आंद्रिया ने लिखा-  
‘‘जब हम पोर्नोग्राफी की बात करते है जहाँ औरतें केवल माल है, तब हम अपमान, दमन, शोषण से जुड़ी कामुकता की बात करते हैं। मैं बलपूर्वक कहना चाहूँगी कि हम यहाँ क्रूरता से संबद्ध कामुकता की भी बात कर रहे होते हैं। यही मैं बताना चाहती हूँ कि क्रूरता भले हिंसा की तरह दृश्य न हो पर होती है। मानव रूप में आपका कोई मूल्य नहीं है, यह कहना ही क्रूरता है। आपका अस्तित्व पुरुष के लिंग के घर्षण व वीर्यपतन के लिए है यह कहना क्रूरता है। आप कामुक वस्तु हैं और यही आपका काम है-कहना क्रूरता है। मैं कहना चाहती हूँ कि किसी को अमानव बनाना क्रूरता है जिसके लिए किसी प्रत्यक्ष हिंसा की जरूरत नही होती।
      दैनंदिन जीवन में औरतें पुरुषों के हिंसात्मक अत्याचार को झेलती हैं। उनको धक्का दिया जाता है, गालियाँ दी जाती है, सड़क, कार्यक्षेत्र में मार्ग अवरूद्ध किया जाता है। फिर भी वे आगे बढ़ती हैं। इससे त्रस्त पितृसत्ताक व्यवस्था वास्तविक हिंसा पर उतर जाती है। उदाहरणस्वरूप हत्या, अनजान लोगों द्वारा क्रूरतापूर्ण बलात्कार या सामूहिक बलात्कार, क्रमिक हत्याएँ। महिलाओं को छूना, धक्का देना, शारीरिक अवरोध खड़ा करना पुंस हमला ही है। लेकिन औरतों पर होने के कारण इसे गलत मानकर भी बहुत अनुचित नहीं माना जाता। यहीं पितृसत्ताक व्यवस्था का दोहरापन उजागर होता है। वास्तव में घृणित क्या है? उचित-अनुचित का मानक क्या है?’’
( इस लेख में आंद्रिया के उद्धृत अंश , उनके निबंध  'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) से लिए गए हैं,इस निबंध का अनुवाद विजया सिंह के सौजन्य से प्राप्त हुआ है )



गुरुवार, 1 जुलाई 2010

स्त्रीवाद के परिप्रेक्ष्य में पोर्नोग्राफी- स्त्री की मानवीय पहचान का अस्वीकार है पोर्नोग्राफी-1-

              
     पोर्नोग्राफी के विरोध में सशक्त आवाज के तौर पर आंद्रिया द्रोकिन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। पोर्नोग्राफी की जो लोग आए दिन हिमायत करते रहते हैं वे उसमें निहित भेदभाव,नस्लीयचेतना और स्त्रीविरोधी नजरिए की उपेक्षा करते हैं।  उनके लिए आंद्रिया के विचार आंखे खोलने वाले हैं। आंद्रिया ने अपने निबंध  'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) में लिखा-
 ‘‘बीस वर्षों से स्त्री आंदोलन की जड़ों एवं उसकी शक्ति से जुड़े व्यक्ति, जिनमें कुछ को आप जानते होंगे कुछ को नहीं, यही बताने की चेष्टा कर रहे हैं कि पोर्नोग्राफी होती है। वकीलों की माने तो भाषा, व्यवहार, क्रियाकलापों में (के द्वारा)।’’
आंद्रिया और कैथरीन ए मैकिनॉन ने इसे  ‘‘अभ्यास कहा था जो घटित होता है, अनवरत हो रहा है। यह नारी जीवन का यथार्थ बन गया है। स्त्रियों का जीवन दोहरा और मृतप्राय बना दिया गया है। सभी माध्यमों में हमें ही दिखाया जाता है। हमारे जननांग को बैगनी रंग से रंग कर उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित किया जाता है। हमारी गुदा, मुख व गले को कामुक क्रियाओं के लिए पेश किया जाता है, जिनका गहरे भेदन किया जा सकता है।’’ 
     पोर्नोग्राफी के कामुक सुख वाले पक्ष पर बहुत लिखा गया है लेकिन पोर्न के द्वारा अमानवीय वातावरण और मनोदशा तैयार होती है उसकी ओर सबसे पहले स्त्रीवादी विचारकों ने ही ध्यान खींचा था। पोर्न उद्योग ने स्त्री को वस्तु बना दिया है। आंद्रिया ने लिखा-
    ‘‘यहाँ मैं अमानवीकरण की प्रक्रिया का वर्णन कर रही हूँ जो कि व्यक्ति को वस्तु में बदलने का ठोस कारण रही है। जबकि अभी तक हमने हिंसा की बात ही नहीं की है। अमानवीयकरण एक सच्चाई है। यह दैनंदिन जीवन का सच है। यह कष्ट और लांछन का साधन है। यह हमारे साथ, हम स्त्रियों के साथ घटित होता है। हम कहते है कि स्त्रियों का वस्तुकरण हो रहा है। इस बड़े शब्द को कहते हुए हमें लगता है कि लोग हमें बुद्धिमान समझ रहे होंगे। लेकिन वस्तु में बदलना एक महत्वपूर्ण घटना है, विशेषकर पोर्नोग्राफी की वस्तु में बदलना। यह एक लक्ष्य है। आप एक लक्ष्य या टारगेट में बदल दिए गए हैं। और शरीर पर लगे लाल, बैंगनी निशान यह चिह्नित करते है कि पुरुष आपसे क्या चाहता है। वस्तु बनी स्त्री इच्छित स्वर में कहती है, मेरा शोषण करो। एक गाड़ी कभी नहीं कहती कि मुझे तोड़ दो। पर स्त्री, अमानवीय वस्तु, कहती है- मुझे तकलीफ दो। और जितनी तुम मुझे तकलीफ दोगे मैं तुम्हें उतना ही प्यार करूँगी।’’
    पोर्न की सारी क्रियाएं इमेजों की भाषा में चलती हैं। वर्चुअल कामुक पोर्न छवियों में हम जिस औरत को देखते हैं वह कोई वस्तु नहीं,खिलौना नहीं बल्कि एक औरत है। यह कल्पित औरत है। यहां पर जो सेक्स है वह वर्चुअल है। आंद्रिया ने लिखा है कि
     ‘‘बैंगनी रंग की चीज़ को जब हम देखते हैं, जब उसके जननांग, मलाशय, मुख, गले को देखते है तो हममें से उसे कई जानने वाले, उसके अपने भी यह भूल जाते है कि वह एक मनुष्य है। पोर्नोग्राफी में हम पाते है कि पुरुषों की कामुक परितुष्टि को नारी-इच्छा के रूप में पेश किया जाता है। स्त्री शरीर की विभिन्न अवस्थितियों, उपयोग के साकार दृश्यों द्वारा यही मंशा ज़ाहिर होती है। तात्कालिक रूप से लगता है कि वस्तु अपना भेदन स्वयं चाहती है, वह आसानी से भेद्य है। इस प्रकार स्व-भेदन (सेल्फ पेनिट्रेशन) ही पोर्नोग्राफी का मुख्य भाव बन जाता है।’’
    पोर्नजनित तथाकथित आनंद और खासकर शारीरिक अंगों का प्रदर्शन और यातनामय सेक्स की इमेजों के माध्यम से दर्शक की स्त्री विरोधी मनोदशा तैयार करने में मदद मिलती है। यातनामय सेक्स को किसी भी रूप में आनंददायी नहीं कहा जा सकता। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि देह की इमेजों के माध्यम से किया गया प्रदर्शन स्त्री को कामुक ऑब्जेक्ट बना देता है। इस प्रक्रिया में स्त्री की अस्मिता का लोप हो जाता है। स्त्री अस्मिता के लोप का अर्थ है मनुष्य के रूप में स्त्री की पहचान का लोप। इसी संदर्भ में आंद्रिया ने कहा-   
‘‘पोर्नोग्राफी में औरतें, गर्भवती औरतें भी कई प्रकार की वस्तुओं को देह से चिपका कर कामुक प्रदर्शन करती हैं। ऐसा करते हुए वह मनुष्य ही नहीं रह जाती। कोई भी व्यक्ति ऐसी महिला की तस्वीर देख कर नहीं कह सकता कि वह मानव है, उसके अधिकार हैं, उसकी स्वाधीनता, उसका सम्मान है या वह कोई है भी। पोर्नोग्राफी में यही दुरावस्था औरतों की होती है। 
      अस्वाभाविक मैथुन क्रिया के बारे में मनोविश्लेषकों का कहना है कि यह अस्वाभाविक वीर्य-पतन से जुड़ी हुई है। जैसे कामुक रूप से उत्तेजित पुरुष किसी वस्तु मसलन जूते पर लिंग रगड़ता है, उससे यौन क्रिया करता है, उस पर वीर्यपतन करता है। पोर्नोग्राफी में स्त्री के शरीर का यही हाल होता है। वह एक अस्वाभाविक लैंगिक वस्तु में बदल जाती है, उसका प्रेमी या ग्राहक उस पर वीर्यपतन करता है। यह व्यवहार ही पोर्नोग्राफी की खूबी है जिसमें स्खलन स्त्री में नहीं बल्कि स्त्री पर होता है। इससे मानो पुरुष यह सिद्ध करता है कि उसके स्वामित्व में क्या-क्या है और उसने इसे कैसे प्राप्त किया है। स्त्री पर वीर्यपतन के द्वारा वह दिखाता है कि स्त्री दूषित हो गई है, वह गंदी हो गई है। यह मेरी नही पोर्नोग्राफर पुरुष की भाषा है। मार्क्विस दे सादे ने हमेशा वीर्यपतन को प्रदूषण कहा।’’

( इस लेख में आंद्रिया के उद्धृत अंश , उनके निबंध  'भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार'(1993) से लिए गए हैं,इस निबंध का अनुवाद विजया सिंह के सौजन्य से प्राप्त हुआ है )




    




रविवार, 27 जून 2010

पोर्नोग्राफी सिद्धांत है बलात्कार उसका अभ्यास है

     सन् 1970 के कमीशन के निष्कर्ष और उसके बाद के 1990 के पोर्नोग्राफी अनुसंधान के बीच में बहुत कुछ नया घटा है। खासकर पोर्नोग्राफी के सामाजिक प्रभाव के विभिन्न आयामों के बारे में बारीकी से शोध कार्य हुए हैं ,उनसे पोर्न के प्रभाव के बारे में नयी जानकारियां सामने आयी हैं।
      इस दौरान प्रतिदिन धड़ाधड़ पोर्न साइट सामने आई हैं और पोर्न साइट पर जाने वालों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। अकेले प्लेबॉय डॉट कॉम पर प्रतिदिन 50 लाख यूजर जाते हैं और प्रतिदिन 278 बेवसाइट खोली जा रही हैं।
     संचार क्रांति के कारण विकास के मामले मे तरक्की कम हुई है लेकिन पोर्न के क्षेत्र में जबर्दस्त तरक्की हुई है। सभी लोग एक ही सवाल करते हैं कि पोर्न देखने से क्या नुकसान होता है। एक ही वाक्य में कहें कि पोर्न देखने से मानसिक क्षति होती है और सेक्सुअल हिंसाचार बढ़ता है।
     यह कहावत है ‘पोर्नोग्राफी सिद्धांत है बलात्कार उसका अभ्यास है।’’अमेरिका में शारीरिक छेड़खानी करने वाले दण्डित लोगों में 77 प्रतिशत लड़के और 87 प्रतिशत लड़कियां हैं ,इन लोगों ने स्वीकार किया कि वे आमतौर पर पोर्नोग्राफी देखते रहे हैं। अमूमन अपने अपराध में पोर्न का इस्तेमाल भी करते रहे हैं। यह भी तथ्य सामने आया है कि कुछ लोग पोर्न देखते हुए सोचते हैं कि औरत को आसानी से कैसे पटाया जाए ? प्रत्येक औरत के अनुरोध को कैसे स्वीकार किया जाए ?  
      पोर्नोग्राफी आज इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है। इसका बच्चों में दुरूपयोग बढ़ रहा है। बच्चे इंटरनेट पर प्रति सप्ताह चैट और ईमेल करते हैं। इसकी तुलना में वे स्कूली काम पर 1.8 घंटा प्रति सप्ताह खर्च करते हैं। एक अनुमान के अनुसार 18 साल से कम उम्र के 18.8 मिलियन बच्चे घर में कम्प्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करते थे। ये आंकड़े 1997 के हैं। तब से यह संख्या कई गुना बढ़ गयी है। उस समय 72 हजार नग्न पोर्न साइट थीं। यह भी पाया गया कि पोर्नोग्राफी का अति उपयोग विभिन्न किस्म के मानसिक कष्टों को जन्म देता है। अमेरिका में आमतौर पर जनता सहमत है कि पोर्न पर पाबंदी लगी रहनी चाहिए,इसके बाबजूद आम जनता में पोर्न की सबसे ज्यादा खपत अमेरिका में ही हो रही है।
   समाज में पोर्न का कितना व्यापक असर पड़ा है इसे देखने का एक और आधार है कामुक या सेक्स संदेश। आज समाज में व्यापक पैमाने पर सेक्स संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। सेक्स संदेशों और कामुक भाषा की बाढ़ आयी हुई है। इससे यह भी पता चल रहा है कि पोर्नोग्राफी से समाज के एटीट्यूट या व्यवहार का निर्माण किया जा रहा है। इससे यूजर और उसके परिवारीजनों की क्षति हो सकती है।
      पोर्नोग्राफी को आमतौर पर छिपाकर देखते हैं। इससे यूजर में छिपाने की आदत बढ़ती है। वह अपनी पत्नी से छिपाता है,प्रियजनों से छिपाने लगता है। इससे वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ जाता है। इससे अवैध संबंध बनाने और वेश्यावृत्ति की आदत पड़ने के चांस हैं। इसके अलावा अवास्तविक सेक्स की मांग पैदा होती है जिससे खतरनाक कामुक अनैतिक व्यवहार पैदा होता है। 
     































पोर्नोग्राफी से औरत का सम्मान घटा

     पोर्नोग्राफी के सवाल पर जब भी बहस होती है तो वह नैतिक-अनैतिक ,शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य में वर्गीकृत करके होती है। पोर्नोग्राफी के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को हमें इन सब केटेगरी के पार जाकर पेशेवर व्यक्तियों के द्वारा किए शोधकार्यों के जरिए समझने की कोशिश करनी चाहिए। पोर्नोग्राफी के बारे में वैज्ञानिक समझ बनाने के लिए समाजविज्ञानियों,मनोचिकित्सकों और व्यवहार विज्ञान के विशेषज्ञों की राय को जानना सही होगा।
      सन् 1970 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने अश्लीलता और पोर्नोग्राफी  पर एक आयोग बनाया था इस आयोग ने अमेरिका में पोर्न पर किए 80 शोध कार्यों का मूल्यांकन करके कुछ निष्कर्ष निकाले थे। सन् 1970 में अमेरिका में किए गए राष्ट्रीय सर्वे में पांच में से दो- तीन व्यक्तियों का मानना था कि सेक्स से संबंधित नग्न सामग्री में सेक्स के बारे में सूचनाएं होती हैं। ये सूचनाएं मनोरंजन के रूप में होती हैं। इससे नैतिक पतन होता है। इससे विवाहित युगल के शारीरिक संबंधों में सुधार आता है। लोगों में बलात्कार की भावना पैदा होती है।
      सेक्सुअली नग्न सामग्री बोरियत पैदा करती है। वैवाहिक युगलों में नए तरीके से सेक्स करने का रूझान बढ़ता है। इससे व्यक्ति में औरत के प्रति सम्मानभाव घटता है। इस सर्वे के निष्कर्षों की 1985 के गेलप पोल द्वारा किए सर्वे से पुष्टि  हुई। उसके भी यही निष्कर्ष थे।
   पोर्नोग्राफी के व्यवहारमूलक अनुभवों पर किए सर्वे से पता चला कि सेक्सुअल गतिविधि में पोर्न से थोड़ा बढ़ोतरी होती है। पोर्न की फैंटेसियों से सेक्स में थोड़ा इजाफा होता है। लेकिन कोई बड़ा इजाफा नहीं होता। कमीशन ने यह भी पाया कि पोर्न और अपराध के रिश्ते को पुष्ट करने वाले तथ्य अभी तक नहीं मिले हैं। ऐसे प्रमाण नहीं मिले हैं जिनसे पोर्नोग्राफी और अपराध के अन्तस्संबंध की पुष्टि हो। लेकिन पोर्नोग्राफिक सामग्री पर लगी पाबंदियों को हटा देने से अपराध में बढ़ोतरी हो सकती है इस तरह के आंकड़े डेनमार्क से मिले हैं।
  सन् 1970 के आयोग ने निष्कर्ष में कहा कि हमारे पास ऐसी जानकारियां नहीं हैं जिनसे यह बात पुष्ट हो कि सेक्सुअली नग्न सामग्री देखने से युवाओं और वयस्कों में अपराध करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। कमीशन यह नहीं कह सकता कि इरोटिक सामग्री से अपराध में इजाफा होता है।
     अनेक विद्वानों ने कमीशन के निष्कर्षों को अस्वीकार किया और चुनौती दी। उन्होंने रेखांकित किया कि 1970 वाले कमीशन की पोर्न के प्रभाव के अध्ययन की पद्धति दोषपूर्ण थी। साथ ही यह भी बताया कि हिंसक पोर्नोग्राफी के प्रभाव का तो इस सर्वे में अध्ययन ही नहीं किया गया।
      इस कमीशन के सर्वे करने वालों के पास समय की कमी थी जिससे बेहतर रिसर्च नहीं हो पायी। अधिकांश रिसर्चर को 9 महिने से ज्यादा का समय नहीं मिला। उस समय कोई शोध पद्धति भी नहीं थी,ज्यादातर रिसर्च निजी अनुभव पर आधारित थी। इससे निजी अनुभव और कामुक उत्तेजना के बीच के संबंधों अन्तस्संबंध,उत्तेजक पोर्न सामग्री और निजी अनुभव के अन्तस्संबंध की वैज्ञानिक मीमांसा नहीं हो पायी। कालान्तर में इसके अनेक आयामों को खोला गया।   
          
                     

शुक्रवार, 25 जून 2010

पोर्न क्रांति के निशाने पर तरूणाई

            अमेरिका के बारे में हमारे समाज में भ्रम फैलाने में मीडिया सबसे आगे है। अमेरिका में औरत और पोर्न का जो रिश्ता सामने आया है उसने औरत को असहाय बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। 10 अप्रैल 2010 को अमेरिकी मीडिया में सबसे बड़ी खबर थी कि अमेरिका में तैराकी के 36 प्रशिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया गया। इनका अपराध यह था कि इन्होंने तैराक अवयस्क लड़कियों के साथ बुरा सुलूक किया।
     एबीसी न्यूज की खोजी रिपार्ट में बताया गया कि बड़े पैंमाने पर तैराकी के कोच अवयस्क तैराक लड़कियों का अपमान,शीलहरण और यौनशोषण कर रहे थे। यह बात लड़कियों से लिए गए इंटरव्यू में सामने आई।
     यह तथ्य भी सामने आया कि लड़कियों की बिना जानकारी के उनकी वीडियो फिल्म बनायी गयीं जिनमें उनके यौनशोषण के भी दृश्य थे। ऐसी वीडियो फिल्में पोर्न बाजार के लिए तैयार की गई थीं। एक प्रशिक्षक ब्रायन हिंडसन ने तो बड़े ही नियोजित ढ़ंग से यह काम किया उसने दो लड़कियों को खास समय पर आने के लिए कहा और विशेष स्नानघर में नहाने के लिए कहा, लड़कियां नहीं जानती थीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
     असल में प्रशिक्षक ने उन लड़कियों के गुप्त कैमरों के जरिए वीडियो फिल्म बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था की थी। बाद में जांच के बाद हिंडसन के कम्प्यूटर से बड़ी मात्रा में बाल पोर्नोग्राफी पाई गयीं। पुलिस ने एबीसी को बताया कि हिंडसन विगत 10 सालों से पोर्न वीडियो बनाकर बेच रहा था। इसकी किसी को जानकारी नहीं थी। सन् 2008 में उसे 33 साल की सजा सुनाई गयी।
     इसी तरह का मामला सन जोश एंडी किंग का है,ये जनाब 62 साल के हैं और इसमें से 30 सालों तक लड़कियों का यौन शोषण का विश्व रिकार्ड बना चुके हैं। किंग साहब को अमेरिका के तैराकी संघ ने श्रेष्ठ तैराक प्रशिक्षक का प्रमाणपत्र 2008 में दिया है। बाद में ये जनाब एक 14 साल की लड़की के गर्भवती हो जाने के बाद पकड़े गए और उन्हें 40 साल की सजा सुनाई गयी है। उसी दौरान जांच से पता चला कि किंग साहब लंबे समय से अपना धंधा कर रहे थे। उनके खिलाफ 15 लड़कियों ने यौन शोषण की शिकायत की और अदालत में गवाही भी दी।
   पोर्न क्रांति का अमेरिकी समाज सीधा असर यह हुआ कि समूचा समाज आज शादी-पूर्व शारीरिक संबंध बनाने में विश्वास करता है और समाज में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसका विवाह पूर्व किसी औरत से शारीरिक संबंध न रहा हो। शादी पूर्व संबंध की परंपरा अमेरिकी समाज में कई दशक पुरानी है।
    पोर्न क्रांति ने समूचे समाज को कामुक तौर पर गतिशील बना दिया है और इसका परिणाम है कि आज अमेरिका में 15-19 साल के बीच की तकरीबन 46 प्रतिशत लड़कियां कम से कम एक बार सेक्स कर चुकी हैं।
    पन्द्रह साल उम्र की अविवाहित लड़कियों में 13 प्रतिशत सेक्स कर चुकी हैं। वे जब तक वे 19 साल की उम्र तक पहुँचती हैं 10 में से 7 अविवाहित लड़कियां संभोग कर चुकी होती हैं। ज्यादातर अमेरिकी युवा 17 साल की उम्र तक आते-आते पहलीबार सेक्स कर चुके होते हैं। लेकिन वे 20 साल की उम्र तक शादी नहीं करते। इसका अर्थ यह है कि अवयस्कों में गर्भधारण और सेक्स संक्रमित बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा है।
      सेक्स के प्रति बड़ते आग्रह ने तरूणों को ही नहीं विभिन्न आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित किया है। लेकिन युवाओं में यह प्रवृत्ति ज्यादा देखने को मिली है। कहने का आशय यह है कि पोर्न का प्रचार-प्रसार सेक्स को तेजगति प्रदान करता है और खासकर तरूणों में सेक्स के प्रति अविवेकपूर्ण अपील पैदा करता है। इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम भी हुए हैं।
    पोर्नोग्राफी में बगैर किसी प्रोटक्शन के सेक्स करते दिखाया जाता है इससे तरूण प्रभावित हो रहे हैं और धडल्ले से बिना किसी एहतियात के अमेरिका में सेक्स कर रहे हैं और इससे अवयस्क लड़कियां गर्भवती हो रही हैं और बड़े पैमाने पर गर्भपात भी कराए जा रहे हैं।
   अमेरिका ऐसा देश है जहां गर्भवती अवयस्क लड़कियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिका में 10 प्रतिशत अवयस्क लड़कियां बच्चों को जन्म देती हैं। 59 प्रतिशत गर्भवती लड़कियों की उम्र 15-19 साल के बीच है। सन् 2006 के आंकड़े बताते हैं कि प्रति 1,000 में 42 बच्चे 15-19 साल की लड़कियों के पैदा हुए हैं। सन् 1991 में प्रति 1,000 में 62 बच्चे पैदा हुए, जबकि सन् 2005 एवं 2006 में इसी उम्र की लड़कियों में  बच्चे पैदा करने की दर में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
    सात प्रतिशत ऐसी तरूणियां हैं जिन्हें प्रजनन के समय परिवार की कोई मदद नहीं मिली और कमजोर बच्चों को जन्म दिया। तरूणियों का एबार्सन कराना अमेरिका में आम बात है। इसके आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। यहां हम आंकड़ों के खेल में न जाकर उस समस्या की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं जिसके कारण अमेरिकी लोग पार्न ज्यादा देखते हैं और सेक्स के प्रति ज्यादा आग्रह रखते हैं।
      इसका प्रधान कारण है अमेरिकी जीवन में चरम अलगाव। अलगाव या अकेलेपन की अवस्था में व्यक्ति पोर्न की ओर खिंचता है,यह अलगाव जितना बढ़ रहा है पोर्न की खपत उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। हम जितने इंटरनेट केन्द्रित होते जाएंगे उतने ही अलगाव के शिकार होंगे। अलगाव,पोर्न और सेक्स में गहरा संबंध है। हमें सोचना चाहिए कि सामाजिक अलगाव को कैसे कम किया जाए। अन्य सर्जनात्मक कामों में कितना समय देते हैं और जो करते हैं उसे कितना दूसरों से शेयर करते हैं।             








अमेरिका का बलात्कार रिवोल्यूशन



     इन दिनों औरतों को पोर्न के बहाने बलात्कार का शिकार बनाने या सामूहिक सेक्स करने या जबरिया अप्राकृतिक मैथुन करने के लिए दबाब ड़ालने की खबरें भारत में भी आने लगी हैं। अमेरिका में बनाए गए ‘एटोर्नी जनरल कमीशन ऑन पोर्नोग्राफी’ (1986) की कार्रवाई को पढ़कर पोर्न समर्थकों को गहरी निराशा हाथ लगेगी। इस कमीशन की रिपोर्ट पोर्न के खिलाफ शानदार ऐतिहासिक कानूनी -सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है।
     कमीशन के सामने अनेक औरतों ने आकर गवाही दी कि किस तरह उन्हें पोर्नोग्राफी तैयार करने के लिए कामक्रीडा करने के लिए मजबूर किया गया। जो लोग अमेरिका की पोर्न क्रांति में कोई नुकसानदेह बातें नहीं देखते उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि पोर्न के निर्माता छोटे-छोटे प्री-स्कूली बच्चों को अपने पोर्न उद्योग के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं और इस काम में प्री-स्कूल के शिक्षकों की पोर्न उद्योग के दलाल की भूमिका रही है।
      एक औरत ने कमीशन के सामने दिए बयान में बताया कि उसकी 3 साल का बेटी एक प्री-स्कूल में पढ़ती थी उस स्कूल के शिक्षक ने कई मर्तबा उसे सेक्सुअली उत्पीडि़त किया। स्कूल टीचर ने कई बार उसे स्कूल की चीजों की चोरी के इल्जाम के आधार पर सेक्सुअली उत्पीडि़त किया। उसके फोटो खींचे। उसे चुप रहने को कहा और बोलने पर जान से मारने की धमकी दी। उसे बंदूक और छुरा दिखाकर डराया-धमकाया और उसे जानवरों की कैसे हत्या की जाती है, इसकी फिल्में देखने को मजबूर किया।
            इसी कमीशन के सामने एक ऐसे व्यक्ति ने भी गवाही दी जो स्वयं सैंकड़ों पोर्न फिल्मों के निर्माण में ढ़ाई साल तक हिस्सा ले चुका था। उसने कहा -मैंने अपनी आंखों के सामने अनेकों की जिन्दगी बर्बाद होते हुए देखी है। इनमें ज्यादातर लड़कियां थीं। मैंने अनेक प्रोड्यूसर,निर्देशक और फोटोग्राफरों को देखा है जो येन-केन प्रकारेण अपना काम निकालने के चक्कर में लड़कियों के साथ जबर्दस्ती करते थे,उन्हें वह सब करने के लिए बाध्य करते हैं जो वह करना नहीं चाहतीं। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही चीज होती है कि किसी भी तरह अपना माल तैयार किया जाए,चाहे इसके विए लड़की के साथ जबर्दस्ती करनी पड़े।
            मैंने सेट पर ऐसे भी युगलों को देखा है जिनमें औरत गुदामैथुन नहीं करना चाहती लेकिन उसे मजबूर किया गया कि वह करे। इससे उसे बेइंतहा कष्ट हुआ और इससे उसका समूचा व्यक्तित्व ही नष्ट कर हो गया।
            एक अन्य किस्म का बलात्कार यह भी हुआ जिसमें एक महिला अपने किसी काम से बाहर गयी और दो घंटे के लिए पड़ोस में अपनी 10 साल की बेटी छोड़ गयी। उस लड़की को पड़ोसी ने प्लेबॉय चैनल देखने के लिए कहा और मुखमैथुन में शामिल कर लिया।
               एक अन्य महिला ने कमीशन के सामने कहा कि उसके पडोस में एक महिला रहती थी ,उसके पति ने 18 सालों तक उसके साथ बलात्कार किया। वह 18 साल से लगातार बाजार से कामुक सामग्री,पोर्न फिल्म,कामुक पत्रिकाएं,किताबें आदि लाता था और उनमें जितनी गंदी क्रियाएं बतायी रहती थीं इन्हें करने के लिए मजबूर करता था। ऐसा न करने पर बुरी तरह मारता पीटता था। उसके मारने,कराहने की आवाजें मैं 18 सालों से सुनती रही हूँ।
           मैं उस घर में सफाई का काम करती थी और जब भी जाती थी तो पोर्न पत्रिकाएं और किताबें घर में बिखरी हुई मिलती थीं, मैं समझ जाती थी कि इस घर में क्या चल रहा है। इन पत्रिकाओं में पोर्न तस्वीरें हुआ करती थीं जिनमें औरत,बच्चे और मर्द की तस्वीर हुआ करती थी। एक दिन उस औरत ने स्वीकार किया कि उसका भू.पू.पति पोर्नोग्राफिक सामग्री का इस्तेमाल करके उसे आतंकित रखता था और बलात्कार करता था।
               कमीशन के सामने यह भी तथ्य सामने आया कि अमेरिकी की प्लेबॉय नामक मैगजीन का पोर्न के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान है। अनेक औरतों को मैथुन के नाम पर जिस तरह की अप्राकृतिक क्रियाओं और कामुक हरकतों को करना पड़ता था उसका मूल स्रोत यही पत्रिका रही है और इसके अंदर छिपे चित्रों के आधार पर औरतों को चित्रों में दरशायी बर्बर और आत्मघाती सेक्स क्रियाओं को करने के लिए मजबूर किया जाता था। अनेक औरतों ने कमीशन को बताया कि उन्हें पहले जमकर शराब पिलायी जाती थी, अन्य नशे की चीजें खिलायी जाती थीं और उसके बाद आक्रामक और हिंसक सेक्स करने के लिए बाध्य किया जाता था।
           कहने का तात्पर्य यह कि औरत को पोर्न सामग्री दिखाकर तदनुरूप सेक्स करने के लिए बाध्य करना जुर्म है,बलात्कार है। इसे कामुक सुख नहीं कह सकते यह पाशविक वृत्ति है। अपराध है।

रविवार, 20 जून 2010

पोर्नोग्राफी पर महिला संगठनों की चुप्पी क्यों ?


                हाल ही में दिल्ली में एक महिला ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में जबर्दस्ती ग्रुप सेक्स की शिकायत की और बताया कि उसके साथ यह नारकीय काण्ड 4 साल से चल रहा था। ग्रुप सेक्स का यह पहला सार्वजनिक मामला है। ग्रुप सेक्स की कुसंस्कृति का इंटरनेट पर दिखाए जा रहे ग्रुप सेक्स के चित्रों के साथ गहरा संबंध है। इंटरनेट ऐसी अवांछित आपराधिक क्रीडाओं के लिए प्रेरित कर रहा है। इस घटना ने समाज में आ रहे सेक्स के अस्वाभाविक रूपों के दुष्प्रभाव की ओर ध्यान खींचा है। हमें इस प्रवृत्ति से सावधान होना चाहिए।
     उल्लेखनीय है इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी का धंधा जमकर चल रहा है। लेकिन भारत के महिला और राजनीतिक संगठन सोए हुए हैं। मैं लगातार महिला संगठनों के प्रकाशनों और आंदोलन की खबरों को दैनिक अखबारों में पढ़ता रहता हूँ लेकिन अभी तक कहीं पर भी ऐसी खबर देखने में नहीं आयी है कि महिला संगठनों ने इंटरनेट के जरिए चल रहे पोर्न के धंधे पर कुछ भी बोला हो। इसका यह अर्थ नहीं है कि महिला संगठनों का पोर्नोग्राफी को समर्थन है।
       लेकिन वास्तविकता यह है कि महिला संगठनों को पोर्न के इंटरनेट प्रसारण का विरोध करते सड़कों पर या इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी के दरवाजे पर नहीं देखा गया। पोर्नोग्राफी के मामले पर महिला संगठनों की चुप्पी चिन्ता की चीज है।
           महिला संगठनों को बताना चाहिए कि क्या पोर्न महिलाओं और समाज के लिए घातक है ? क्या पोर्न के प्रसारण से महिलाओं पर हमले बढ़े हैं ? क्या पोर्न से वैवाहिक संबंधों में दरार आती है ? क्या पोर्न के प्रभाववश समाज में अस्वाभाविक सेक्स का रूझान बढ़ा है ? क्या पोर्न का बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है ? क्या पोर्न महज मनोरंजन है ? क्या पोर्न पर भारत में पाबंदी लगाना सही होगा ? क्या भारत सरकार और कारपोरेट घरानों को पोर्न का धंधा करने की इजाजत देनी चाहिए ? महिला और राजनीतिक संगठनों ने पोर्नोग्राफी के खिलाफ चुप्पी क्यों साधी हुई है ? आखिरकार हम क्या करें ? हमें इन सब सवालों पर सोचना चाहिए।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

पोर्नोग्राफी के नए तर्कशास्त्र के प्रत्युत्तर में

     कल एक पाठक ने पोर्न की हिमायत में कहा कि पोर्न तो महज मनोरंजन है। मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ। पोर्न सिर्फ मनोरंजन नहीं है। पोर्न औरतों के खिलाफ नियोजित विचारधारात्मक कारपोरेट हमला है। पोर्न की विश्वव्यापी आंधी ऐसे समय में आयी है जब महिला आंदोलन नई ऊँचाईयों का स्पर्श कर रहा था। पोर्न के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि पोर्न को देखने वाले औरतों के प्रति संवेदनहीन होते हैं। खासकर औरतों के खिलाफ जब अपराध होते हैं तो संवेदनहीनता का प्रदर्शन करते हैं। पोर्न के भोक्ता औरतों के खिलाफ आपराधिक कर्मों को लेकर आक्रामक भाव में रहते हैं।
   पोर्न के द्वारा औरत के प्रति प्रच्छन्नतः कामुक नजरिया निर्मित किया जाता है। औरत को पुरुष के बराबर राजनीतिक और सामाजिक दर्जा देने की भावना से दर्शक दूर होता चला जाता है। नेट पर पोर्न सामग्री के प्रदर्शन पर रोक लगायी जानी चाहिए। सेक्स और कामुकता के नग्न प्रदर्शन को हमें अभिव्यक्ति और व्यापार की आजादी ने नाम पर खुली छूट नहीं देनी चाहिए।
  यह सच है कि इंटरनेट अभिव्यक्ति की आजादी का चरमोत्कर्ष है,लेकिन इंटरनेट के भी एथिक्स अथवा आचार-संहिता के बारे में गंभीरता के साथ सोचा जाना चाहिए।
कुछ पोर्न प्रेमी सोचते हैं कि पोर्न कामोत्तेजना का स्रोत है.कामाग्नि बढ़ाने का काम करता है,सच यह है कि पोर्न से कामाग्नि बढ़ती है लेकिन यथार्थ ऱुप में नहीं। पोर्न से उत्तेजित होने वाले स्त्री-पुरूष संबंधों के बाहर जाकर कामोत्तेजित होते हैं। ऐसे लोग अपनी कामाग्नि को अस्वाभाविक ढ़ंग से शांत करते हैं। अस्वाभाविक सेक्स में आनंद लेते हैं।
    पोर्न कामाग्नि भोक्ता के वैवाहिक जीवन को भी नष्ट कर सकती है। पोर्न का भोक्ता ऐसे सेक्स में आनंद लेने लगता है जिसे परवर्टेट सेक्स भी कहते हैं।‘न्यूयार्क टाइम्स’ (20 मई 2001) के अनुसार पिछले साल 11,000 पोर्न वीडियो बाजार में आए,जबकि हॉलीवुड से मात्र 400 फिल्में रिलीज हुईं। पोर्न का चस्का जिसे लग जाता है वह बार-बार पोर्न बेवसाइट पर जाता है। ज्यादा से ज्यादा पोर्न देखता है।
   पोर्न के द्वारा यह विभ्रम पैदा किया जाता है कि सेक्स.प्रेम और आत्मीयता सब एक ही चीज हैं। पोर्न यह भी सिखाता है कि किसी भी अंजान व्यक्ति से सेक्स किया जा सकता है। क्योंकि पोर्न में जिससे कामुक संबंध बनाते हैं वह अपरिचित ही होता है। पोर्न यह भी संदेश देता है कि सेक्स में संतुष्टि मिलना ही महत्वपूर्ण चाहे वह किसी के भी शरीर से मिले। पोर्न यह मिथ बनाता है कि सेक्स किसी से भी और कभी भी किया जा सकता है। सेक्स का कोई परिणाम नहीं होता।
   पोर्न के द्वारा सेक्स की खोखली और कृत्रिम धारणा का निर्माण किया जा रहा है जिसके अनुसार संबंध का अर्थ है सेक्स,प्रेम का अर्थ है सेक्स। जबकि सच यह नहीं है स्त्री-पुरुष संबंधों का आधार है प्रतिबद्धता,आपसी विश्वास और आपसी केयरिंग। प्रत्येक स्तर पर केयरिंग ,शेयरिंग और विश्वास के आधार पर स्त्री-पुरुष संबंध बनता है। सिर्फ सेक्स के आधार पर संबंध नहीं बनता। इसका अर्थ यह नहीं है कि सेक्स बुरी बात है। सेक्स मनुष्य की सबसे सुंदर क्रिया है। आप जिसे प्यार करते हैं,और वह भी आपके प्यार को स्वीकार करे, उससे जब सेक्स करते हैं तो सेक्स का आनंद विलक्षण अनुभूति देता है। सेक्स के लिए समग्र समर्पण जरुरी है,समग्र समर्पण ही सेक्स को परमानंद की अनुभूति में बदलता है।
   पोर्न के समर्थकों का तर्क है कि वे सेक्स के सत्य का ज्ञान कराने के लिए पोर्न बनाते है। यह बात एकदम गलत है। पोर्न से सेक्स के सत्य का ज्ञान नहीं होता। पोर्न का निर्माण शिक्षा के मकसद से नहीं किया जाता। पोर्न के प्रचारक औरत, विवाह, सेक्स,कामुकता आदि के बारे में सफेद झूठ बोलते हैं। उनका एकमात्र मकसद है किसी भी तरह नेट यूजरों की भीड़ को बांधे रखना और आकर्षित करना।
    पोर्न के प्रचारक बार-बार कहते हैं कि औरत का दर्जा मानवी के दर्जे से नीचे है। वे औरत की तुलना पशुओं से करते हैं। शरीर के खास अंगों से करते हैं। वे औरत को हाड़-मांस के रुप में पेश करते हैं। यह ऐसी औरत है जिसकी संवेदना नहीं है,दिल नहीं है,संसार नहीं है, उसकी सामाजिकता नहीं है। उसके विचार नहीं हैं। उसके पास अगर कोई चीज है तो शरीर है,योनि है,स्तन हैं,गुदा है और वह संवेदनारहित सेक्स मशीन है।
      पोर्न के प्रचारक यह भी बताते हैं कि औरत तो खिलौना है। औरत को खिलौना के रुप में पेश करने चक्कर में ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है जिसका औरत के खिलौना और सेक्सरुपी खेलभाव से संबंध है।
      औरत के बारे में पोर्न प्रचारक यह भी कहते हैं कि औरत संपत्ति है,आप खरीद सकते हैं। आप जब किसी औरत पर पैसा खर्च करते हैं तो उससे सेक्स करना अपना अधिकार समझते हैं।
  पोर्न के प्रचारक बताते है कि औरत का मूलाधार है उसका आकर्षक शरीर। आकर्षक औरत को परफेक्ट औरत के रुप में भोक्ता के मन में उतारा जा रहा है। वे औरत के दिमाग और व्यक्तित्व को नोटिस ही नहीं लेते। उनके लिए तो स्त्री का शरीर ही सर्वस्व है। वे यह भी मिथ बनाते हैं कि औरत बलात्कार पसंद करती है। औरत जब नहीं कहती है तो इसका अर्थ है हां। उसकी ना को हां समझो।
     पोर्न में औरत के साथ बलात्कार,शारीरिक उत्पीड़न आदि को जिस तरह दिखाया जाता है उसका अर्थ यह है कि औरत का उत्पीड़न आनंद है। पोर्न में आमतौर पर औरत के बारे में घटिया और गंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है ऐसा करते हुए पोर्न प्रचारक औरत का सामाजिक दर्जा गिराते हैं। वे यह भी प्रचार करते हैं कि छोटे बच्यों को सेक्स करना चाहिए,छोटे बच्चों के साथ सेक्स करना चाहिए। पिता को बेटी के साथ,मां को बेटे के साथ,भाई को बहन के साथ,मनुष्य को पशु के साथ सेक्स करना चाहिए। अवैध सेक्स आनंद है। मजा है। अवैध सेक्स खतरनाक और नुकसानदेह नहीं होता। वेश्याएं ग्लैमरस होती हैं।
    पोर्न वर्चुअल इमेजों का खेल है। इमेजों के माध्यम से भोक्ता को बहलाया-फुसलाया जाता है,उसे पोर्न प्रोडक्ट खरीदने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है,पोर्न के उत्पादों के प्रति आम जनता के अलगाव को कम किया जा रहा है। पोर्न से संघर्ष का अर्थ है इमेजों से संघर्ष। इमेजों के प्रति सतर्कता और सामाजिकता ही एकमात्र पोर्न से बचा सकती है।      






मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

पोर्नोग्राफी , कम्प्यूटर और औरत


       सामान्यत: पोर्न फिल्मों अथवा फिल्म में गैर-परंपरागत सेक्स के दृश्य रहते हैं। गैर-परंपरागत सेक्स की कोटि में मुख मैथुन, गुदा मैथुन,समूह मैथुन, मैथुन के वे रूप जो सामान्य मैथुन से भिन्न हैं और जिसमें शरीर को काफी कसरत करनी पड़े,अथवा जिसमें जटिल आसन आदि को रखा जा सकता है। जबकि गैर-परंपरागत सेक्स के स्थानों में घर ,होटल या बिस्तर के अलावा स्थानों को रखा जा सकता है। मसलन् किसी फर्नीचर पर सेक्स को गैर-परंपरागत सेक्स स्थान की कोटि में रखा जा सकता है। इस तरह के सेक्स को आए दिन फिल्मों और पोर्न फिल्मों में देखा जा सकता है। रोमैण्टिक संबंध में उन्मादी संबंध,पहली मुलाकात,यदाकदा मिलना,सुचिन्तित रूप में मिलना आदि को रखा जा सकता है।         
        विगत पच्चीस वर्षों में जिस तरह कम्प्यूटर नेटवर्क का प्रसार हुआ है  उसके कारण कम्प्यूटर और स्त्री के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों ध्यान गया है।इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि कम्प्यूटर साइंस और नेटवर्किंग में औरतों की हिस्सेदारी का स्वरूप क्या है ? सामाजिक संपर्क में स्त्री की क्या भूमिका है ? पोर्नोग्राफी में स्त्री की क्या भूमिका है ?
     सामान्यत: कम्प्यूटर साइंस के नेटवर्क से औरतों का अच्छा-खासा हिस्सा जुड़ा है। किन्तु शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी कम लड़कियां कम्प्यूटर साइंस पढ़ रही हैं। कम्प्यूटर नेटवर्क के कामकाज में लगी औरतों को आए दिन अनेक किस्म के शारीरिक उत्पीड़न और परेशानियों से गुजरना पड़ता है।खासकर सेक्सुअल उत्पीडन उसमें प्रमुख है। इंटरनेट ने सामाजिक संपर्क और संबंध की एक नई दुनिया का उदघाटन किया है। इससे कम्प्यूटिंग में भी मूलगामी बदलाव पैदा किया है , शिक्षा और सामाजिक संपर्क में मूलगामी परिवर्तनों की शुरूआत की है।
      अमेरिका में जहां सूचना क्रांति का श्रीगणेश हुआ,वहां पर कम्प्यूटर साइंस पढ़ने वालों में लड़कियों की संख्या नगण्य है। जेनेट कॉटरेल के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 97 फीसदी फैकल्टी सदस्य (कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग विभाग) मर्द हैं, दो-तिहाई विभाग ऐसे हैं जहां एक भी औरत काम नहीं करती। अमेरिकी समाज में इस तरह के आंकड़े चौंकाने वाली बात नहीं है।
     बल्कि यह स्वाभाविक लगता है खासकर बच्चों में खिलौनों के प्रयोग के पीछे छिपे लिंगभेद को देखें तो बात समझ में आ जाएगी। अमेरिका में लड़कों में गणित के खिलौने और लड़कियों में बारवी डॉल का चलन है। इसके कारण बच्चों की मानसिकता बनाने में बड़े पैमाने पर मदद मिली है। वीडियोगेम और शिक्षा संबंधी सॉफ्टवेयर में आक्रामक खिलौनों जैसे बंदूक, मशीनगन, सैटेलाइट,मिसाइल,स्पेशशिप आदि को लड़कियां पसंद नहीं करतीं। लड़कियां कम्प्यूटर के एयरकंडिशंन लॉकरनुमा बंद कमरे का माहौल देखकर भी इस पेशे को नहीं अपनातीं। क्योंकि लॉकरनुमा बंद कमरा मूलत: मर्दवादी प्रकृति को व्यक्त करता है। यही वजह है कि कम्प्यूटर साइंस के माहौल को औरतों के स्वागतयोग्य बनाने,अनुकूल बनाने, स्त्री के लिए शारीरिक तौर पर सुरक्षित बनाने, कम्प्यूटर वाले कमरे में या स्क्रीन पर पोर्न के दृश्यों को न लगाने,औरतों के प्रशिक्षण की अलग से व्यवस्था करने पर खास तौर पर ध्यान देने की जरूरत है।
      कम्प्यूटराइज संपर्क खासकर चित्रमय संपर्क बेहद खतरनाक है।इसका कभी भी दुरूपयोग हो सकता है। शिक्षा के मकसद से किया गया संपर्क जिसमें पाठ की भूमिका हो, वह उपयोगी है। किन्तु चित्र के माध्यम से किया गया संपर्क कभी भी खतरा पैदा कर सकता है।
     कम्प्यूटर और इंटरनेट में पोर्न का इस्तेमाल नैतिक रूप से सही है या गलत है,यह सवाल अभी तक हल नहीं हो पाया है। पोर्न का अबाध प्रसारण जारी है। यह जानते हुए भी कि पोर्न सामाजिक तौर पर और खासकर स्त्री के लिए घातक है,सारी दुनिया के देश इसका प्रसारण कर रहे हैं।
     पोर्न क्या है ? क्या पोर्न समाज के लिए घातक है ? पोर्न के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी और सेंसरशिप का अर्थ क्या है ? कम्प्यूटर पोर्नोग्राफी,कामुक उत्पीडन, कामुक हिंसाचार के बीच किस तरह का संबंध होता है ? इत्यादि सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।
      औरतों के संदर्भ में इतनी परेशानियों के बावजूद औरतें बड़ी तादाद में कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर रही हैं। क्योंकि यह तकनीक मूलत: औरतों के अनुकूल माहौल बनाती है। आज औरतों के लिए सबसे अच्छे संसाधन नेट पर उपलब्ध हैं।औरतों की समस्याओं पर काम करने वाले संगठनों की सामग्री और संपर्क उपलब्ध हैं। इसके कारण महिला सशक्तिकरण की दिशा में समाज आगे बढ़ा है। जरूरत इस बात की है कि औरतों को ज्यादा से ज्यादा नेट का उपयोग करना सिखाया जाए। यह सच है कि अभी भी नेट का पूरा माहौल मर्दवादी है,किन्तु यह स्थिति बदलनी चाहिए,इसके लिए स्त्रियों को आगे आना होगा, समाज के बाकी हिस्सों को उनमें साहस का संचार करना होगा।
           नेट का वर्चुअल जगत यूटोपिया के लिए आदर्श जगत है। यूटोपिया में जीने वालों के लिए इससे सुंदर जगह कहीं नहीं है। इसीलिए कुछ लोग इसे न्यूटोपिया भी कहते हैं। साइबरस्पेस हमारे पाठ की प्रकृति को बदल रहा है। इलैक्ट्रोनिक टेक्स्ट हमें गैर-टेक्स्ट के युग में ले जा रहा है।इसका अर्थ यह है कि अब हमें लिखने के लिए कागज की जरूरत नहीं होगी।अब लेखन पूरी तरह इलैक्ट्रोनिक अनुभव होकर रह जाएगा। साइबरस्पेस में मुद्रित सामग्री की आवश्यकता नहीं होगी। साइबर स्पेस स्वायत्त व्यक्ति का संसार बनकर रह जाएगा।इसका अर्थ है स्वयं की ईमानदारी ही सामाजिक प्रतिष्ठा का एकमात्र निर्धारक तत्व बन जाएगी।
    मुद्रित शब्द की सत्ता के लोप के बाद और ईमेल के विकेन्द्रीकृत रूप के आने के बाद लेखक और पाठक के नए संबंधों की शुरूआत हुई है। एक जमाना था मुद्रित सामग्री का मालिक संपादक हुआ करता था,यह सिलसिला अभी भी जारी है किन्तु भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
     अब मुद्रित शब्द का मालिक लेखक ही होगा। वही उसका नियन्ता होगा।अब किसी भी बड़े लेखक के साथ कोई भी गुमनाम लेखक / लेखिका यूजनेट के खुले मंच पर अपनी रचना प्रकाशित कर सकता है। इसके कारण उसकी सामाजिक हैसियत भी बदल सकती है। लेखकों में छोटे-बड़े का भेदभाव ,महान् लेखक का बोध,रचना के चौकीदार के रूप में संपादक की भूमिका आदि में भी परिवर्तन आ गया है। लेखकों के बीच में नए किस्म का सामुदायिक भावबोध पैदा हो रहा है। यही स्थिति स्त्रीवाद की भी है।
    आज स्त्रीवाद के बारे में जितनी जानकारियां नेट पर उपलब्ध हैं उतनी जानकारियां पहले कभी नहीं थीं।महिला आन्दोलन और स्त्री के उत्पीडन का जितने व्यापक स्तर पर नेट ने उद्धाटन किया है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। आज महिला आन्दोलन और स्त्री विमर्श सारी दुनिया के साथ संवाद और विमर्श कर रहा है। दूसरी ओर स्त्री विरोधी ताकतों के हमले भी तेज हुए हैं। पितृसत्ता के खिलाफ हमला करने वालों के खिलाफ एक तरह का जेहाद छेड़ दिया गया है।
लड़कियों के साथ खासकर कॉलेज / विश्वविद्यालय मे पढ़ने वाली लड़कियों के साथ उनके सहपाठियों के द्वारा की गई छेड़खानी अथवा गंदे चुटकुले सुनाने की प्रवृत्ति का भी मीडिया में अध्ययन किया गया है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है परिभाषा। लड़की के साथ छेडखानी किसे कहा जाए ? यह छेड़खानी ऐसे सहपाठियों के द्वारा होती है जो साथ ही पढ़ते हैं। इन्हें प्रत्यक्षत: कोई विशेष अधिकार हासिल नहीं हैं। ये अपने साथ पढ़ने वाली लड़की को गंदे-गंदे चुटकुले ,कामुक आक्रामक टिप्पणियां या फब्तियां ,आवाजकशी , चिढ़ाना, कामुक ढ़ंग से निहारना,गंदे हावभाव का प्रदर्शन करना,अवांछित स्पर्श और चुम्बन के जरिए परेशान करते हैं,उत्पीडित करते हैं।
        मीडिया पंडितों में पोर्न के प्रभाव को गंभीर बहस चल रही है। पोर्न का दर्शकों के एटीटयूट्स और व्यवहार पर किस तरह का प्रभाव होता है ? सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि मीडिया में प्रसारित पोर्न सामग्री दर्शक के अन्दर कामुक झगड़ा और बलात्कार को जन्म देती है। हिंसक कामुकता का प्रदर्शन हिंसक प्रभाव पैदा करता है। प्रत्यक्ष नग्न सामग्री का आस्वाद औरतों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है।ऐसी सामग्री के दर्शकों में औरतों के प्रति हिंसाभाव ज्यादा पाया जाता है। हिंसक पोर्न के दर्शकों पर किए एक बड़े अनुसंधान से यह तथ्य सामने आया कि दर्शक यह मानते थे कि कामुक औरत के प्रति जो हिंसा दर्शायी गयी ,वह सही थी, क्योंकि वह औरत इसी के लायक थी। हिंसक वीडियो,फिल्म आदि के दर्शकों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं कि इनका दर्शकों में हिंसाबोध पैदा करने में महत्वपूर्ण अवदान रहा है। कुछ ऐसे भी अनुसंधान हुए हैं जो यह मानते हैं प्रत्यक्ष कामुकता वाली मीडिया सामग्री का दर्शकों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।



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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

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