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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

स्वतंत्रता और विवेकवाद के नायक स्वामी विरजानंद सरस्वती


          स्वामी विरजानंद सरस्वती का भारत के स्वाधीनता संग्राम में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। खासकर19वीं सदी में हिन्दीभाषी क्षेत्र में जिनलोगों ने आम जनता में विवेकवाद की मशाल जलाए रखी उनमें स्वामीजी प्रमुख हैं। स्वामीजी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे अवतारवाद और मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे। वे दशनामी संन्यासी थे और उनका शंकराचार्य द्वारा स्थापित संन्यासी सम्प्रदाय से संबंध था। उनके गुरु पूर्णानंद भी शंकर के मतावलम्बी थे। वे वेदान्त के प्रगतिशील अग्रदूतों में गिने जाते हैं।

सन्1857 के स्वाधीनता संग्राम में स्वामी विरजानंद सरस्वती की महत्वपूर्ण भूमिका थी,मथुरा –हरिद्वार और आसपास के इलाकों की पंचायतों के जरिए स्थानीय लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबन्द करने में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी। दिलचस्प बात यह है कि स्वामी विरजानंद के गुरु पूर्णानंद,उनके गुरु स्वामी ओमानंद भी 1857 के संग्राम में शरीक हुए। असल में स्वामी ओमानंद और स्वामी पूर्णानंद ने 1857 के संग्राम में भाग लेने का ब्लूप्रिंट तैयार किया और स्वामी विरजानंद ने उसे लागू किया। दिलचस्प बात यह है कि 1857 में स्वामी ओमानंद 160 साल के थे और स्वामी पूर्णानंद 110साल के थे और स्वामी विरजानंद उस समय लगभग 79वर्ष के थे।यह वह दौर था जब मथुरा और उसके आसपास के इलाकों में जबर्दस्त वैचारिक संघर्ष चल रहा था जिसका मथुरा और हिन्दीभाषी क्षेत्र की विवेकवादी परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। मसलन्, सन्1845 के आसपास मौलवी इस्माइल ने “रद्दे हनूद”( हिंदूमत का खंडन) किताब लिखी,चौबे बद्रीदास ने “रद्दे मुसलमान”(मुस्लिम मत का खंडन) लिखी।सन्1856 में अब्दुल्ला ने “तोहद-तुल हिंद” (भारत की सौगात)लिखी।इस किताब में हिंदू देवी-देवताओं की आलोचना की गयी है।इंद्रमणि ने इसके उत्तर में “तोहफुलइस्लाम” (इस्लाम का उपहार) लिखी।इस धारा से भिन्न विरजानंद सरस्वती की परंपरा थी जिसमें हिन्दुओं-मुसलमानों की एकता पर जोर दिया गया था।

स्वामी विरजानंद सरस्वती की बचपन में शीतला के कारण एक ऑख चली गयी,लड़कपन में उनके माता-पिता न रहे। उनकी भौजाई उन्हें बहुत सताती थीं।आखिरकार तंग आकर वे घर (कर्तारपुर,पंजाब)से हरिद्वार की ओर चले गए।उस समय वे मात्र बारह वर्ष के थे। यहीं पर उन्होंने संस्कृत व्याकरण का असाधारण ज्ञान प्राप्त किया। उनके शिष्यों में अन्यतम हैं दयानंद सरस्वती। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने पूना प्रवचन के दौरान अपने गुरु के बारे में कहा था कि “ वे दोनों आँखों से अँधे थे और उन्हें वेदशूल का रोग था।” .. “ उनकी वेद शास्त्रादि ग्रंथों में रुचि थी” , “भागवतादि पुराणों का वे तिरस्कार करते थे”, कल्पना करें मथुरा में रहकर भागवत का तिरस्कार करना कितना बड़ा जोखिम था।

सन् 1856 में मथुरा के पास जंगल में पंचायत हुई। उसमें मीर मुश्ताक मिरासी नाम के सज्जन उपस्थित थे। उन्होंने उर्दू में उस पंचायत का हाल लिखा है और उसमें विरजानंद के भाषण का सारांश दिया है।यह एक तथ्य है कि 1857 के संग्राम की तैयारी में अन्य लोगों के अलावा साधु-संतों-फकीरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। मीर मुश्ताक ने लिखा है, “ जब महात्मा विरजानंद को पालकी में बिठा कर लाया गया उस वक्त हिंदू-मुसलमान फ़कीरों ने उनकी खुशी में शंख,घड़नावल,नागफणी,निकाडा,तुरही,नरसिंघे बजाए थे और खुदापरस्ती और वतनपरस्ती के गीत गाए थे।यह नावीना साधु गैर-इल्म के समझने की ताकत रखता था और खुदा का जलवे-जुलाल इसकी ज़बान से ज़ाहिर होता था।मैंने भी अपनी रुह के तक़ाजे के मुताबिक़ 5फूल इनके सामने पेश किए और उनकी कदमबोसी की और खुदा से दुआ माँगी कि खुदा,ऐसी नेक रुहों को ख़लक़त की भलाई के लिए हमेशा पैदा कीजिए।” यह पंचायत चार दिन चली। एक दिन आदम से लेकर हजरत मोहम्मद तक “सवाने अमरी” सुनाई गई। एक दिन राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर आदि पर भाषण हुए।और एक दिन स्वामी विरजानंद और साईं मियाँ महमूदन शाह के व्याख्यान हुए। इस सभा में नाना साहब,अजीमुल्ला और बहादुर शाह के पुत्र एक पुत्र भी मौजूद थे। स्वामी विरजानंद सरस्वती ने इस सभा में जो कुछ कहा उसका सारांश मीर मुश्ताक़ मिरासी ने पेश किया है। यह भाषण एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

स्वामी विरजानंद सरस्वती ने कहा, “ आज़ादी जन्नत है और गुलामी दोज़ख है।अपने मुल्क की हुकूमत ग़ैरमुल्क की हुकूमत के मुकाबले में हज़ार दर्जे बेहतर है। दूसरों की गुलामी हमेशा बेइज्जती और बेशरमी का बायस है।हमें किसी कौम से और किसी मुल्क से कोई नफ़रत नहीं है। हम तो ख़लके –खुदा बहबूदे के लिए खुदा से रोज़ दुआ माँगते हैं मगर हुकमराह कौम ख़ासकर फिरंगी जिस मुल्क में हकुमत करते हैं उस मुल्क के बाशिंदों के साथ इन्सानियत का बरताव नहीं करते और कितनी ही अच्छाई की तारीफ करें मगर उस मुल्क के बाशिंदों के साथ मवेशियों से गिरा हुआ बरताव करते हैं। खुदा की खलकत में सब इन्सान भाई-भाई हैं मगर ग़ैर-मुल्की हुकमराह क़ौम इन्हें भाई न समझ कर गुलाम समझती है। किसी भी मज़हब की किताब में ऐसा हुक्म नहीं है कि अश् रफुल्मख़लूकात के साथ दग़ा की जावे और अल्लाह के हुक्म के खिलाफवरजी की जावे। इस वास्ते मातहत लोगों का न कोई ईमान है न कोई शान है। फिरंगियों में बहुत-सी अच्छी बात है मगर सियासी मसले में आकर वह अपने कौल-फेल को न समझकर फौरन बदल जाते हैं और अच्छाई और नेक सलाह को फौरन ठुकरा देते हैं। इस(की) असिल वजूहात यह है कि हमारे मुल्क को वह अपना वतन नहीं समझते हैं। हमारे मुल्क का बच्चा-बच्चा उनकी ख़ैरख़वाही का दम भरे फिर भी अपने वतन के कुत्ते को इन्सानों से अच्छा समझते हैं। यह सब कर्मा (?) का बायस है, इन्हें अपने ही वतन से मोहब्बत है,इसलिए मैं सब बाशिंदगान हिंद से इलतजा करता हूँ कि जितना वह अपने मज़हब से मुहब्बत करते हैं उतना ही इस मुल्क के हर इन्सान का फ़र्ज़ है कि वह वतनपरस्त बने और मुल्क के हर बाशिंदे को भाई-भाई जैसी मोहब्बत करे,तब तुम्हारे दिलों के अंदर वतनपरस्ती आ जाएगी,तो इस मुल्क की गुलामी यहाँ से खुद-ब-खुद जुदा हो जाएगी।हिंद के रहने वाले सब आपस में हिंदी भाई हैं और बहादुरशाह हमारा शाहंशाह है।” यह समूचा प्रसंग विश्लेषित करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि इस “भाषण में कहीं पर भी अँग्रेजों को काफिर या म्लेच्छ कहकर उनके विरुद्ध मज़हबी जोश उभारने का प्रयत्न नहीं है।एशियाइयों और खासकर ‘हिंदुस्तान’ के ‘काले’ आदमियों के प्रति अँग्रेज जब-तब नस्लपंथी घृणा प्रकट करते रहते थे,उसकी प्रतिक्रियास्वरुप गोरों के प्रति घृणा का भाव नहीं है।सारी बातें विदेशियों की दासता से मुक्त करने की भावना से प्रेरित हैं।परोक्ष रुप से वक्ता के मन में विश्वबंधुत्व और सर्वमानवता के हित के भाव विद्यमान हैं।”








मंगलवार, 29 मार्च 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -2-यशपाल


     आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद ने यद्यपि विदेशी शासन से विद्रोह की पुकार नहीं उठाई थी, अपने धर्मग्रंथ 'सत्यार्थप्रकाश' में उन्होंने राजभक्ति का भी उपदेश जरूर दिया है परंतु वे यह लिखे बिना भी नहीं रह सके कि विदेशी शासन चाहे जितना भी सुखदायक और उन्नतिशील क्यों न हो, अपनी जाति के स्वतंत्र शासन से अच्छा नहीं हो सकता। आर्यसमाज के आंदोलन से प्रभावित होने वाले लोगों की भावना पर स्वामीजी के इस वाक्य का प्रभाव न पड़ा हो, यह नहीं हो सकता। यह सामाजिक चेतना का अनिवार्य परिणाम था। एक समय ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति आर्यसमाजी बन जाने से ही सरकार की दृष्टि में राजनैतिक रूप से संदिग्ध हो जाता था। उस समय किसी नवयुवक के आर्यसमाजी बन जाने पर परिवार के लोग ऐसे ही चेहरा लटका लेते थे जैसे कि आजकल घर के लड़के के कम्युनिस्ट बन जाने पर आशंका अनुभव की जाती है।
      आर्यसमाज के प्रभाव से देश की अधोगति के प्रति असंतोष, समाज को पतन से बचाने की इच्छा और विदेशी शासन के प्रति मूक विरोध की भावना दो तरह प्रकट हो रही थी। इसका एक रूप था- भारत की प्राचीन समृध्दि और शक्ति का अत्युक्तिपूर्ण प्रचार। इसका अभिप्राय था अपने देश और समाज को हीन न समझ कर आत्मविश्वास का भाव पैदा करना। अपने समाज की श्रेष्ठता के विश्वास का अर्थ था; अपने समाज में गिरी हुई अवस्था से उन्नति करने का साहस उत्पन्न करना; परंतु जब अपनी श्रेष्ठता के विश्वास के कारण हम ने संसार के दूसरे देशों में हुई प्रगति से आंखें मूंद लीं, तो यह मिथ्या विश्वास हमें उन्नति से रोकने लगा।
      आर्यसमाज द्वारा उत्पन्न की गई सुधार की भावना का दूसरा रूप था- विदेशी सरकार के नियंत्राण से मुक्त अपनी शिक्षण संस्थाएं स्थापित करना। स्वतंत्र देश और समाज की उन्नति की आशा जनता में शिक्षा द्वारा ही जगाई जा सकती थी।
      आर्यसमाज में संगठनात्मक रूप से दो पार्टियां रही हैं, एक कालिज पार्टी और दूसरी गुरुकुल पार्टी। कालिज पार्टी में सरकारी नौकरों, वकीलों और सरकारी विश्वविद्यालयों से संबंधित शिक्षण संस्थाओं के लोगों की अधिकता रही है। यह पार्टी राजभक्ति की दृष्टि से विदेशी सरकार के अधिक समीप थी। दूसरी, गुरुकुल पार्टी का मुख्य आधार प्राचीन शिक्षा प्रणाली और प्राचीन संस्कृत का पुनरुत्थान रहा है। गुरुकुल पार्टी की शिक्षण संस्थाओं का सरकारी यूनिवर्सिटियों से कोई संबंध नहीं रहा इन के सामने सरकार द्वारा अस्वीकृति कर दिए जाने का भय नहीं था। इसलिए इस पार्टी से संबंधित लोगों में विदेशी सरकार के प्रति घृणा और विरोध का भाव भी अपेक्षाकृत उग्र रहा है, परंतु गुरुकुल पार्टी भी राजद्रोही समझ ली जाने के भय से सर्वथा मुक्त न थी और समय-समय पर हर उच्च पदस्थ अंग्रेज हाकिमों को अपनी संस्थाओं में निमंत्रण दे-दे कर यह विश्वास दिलाने की चेष्टा किया करती थी कि वह केवल धार्मिक संस्था मात्रा है। राजनीति से उसका कोई संबंध नहीं है। विदेशी शासन के प्रति इन के मन में घृणा और विरोध था परंतु उसे प्रकट करने का साहस इन में भी न था।
      बचपन में मैं स्वयं लगभग सात वर्ष गुरुकुल में रहा हूं। मुझे याद है कि गुरुकुलकांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक महात्मा मुन्शीराम जी, जो बाद में संन्यास ग्रहण करके स्वामी श्रध्दानंद कहलाने लगे थे, प्रांतीय गवर्नरों और वाइसरायों को गुरुकुल आमंत्रिात करके उनका प्रेमपूर्वक सत्कार करने का पाखंड करते रहते थे। जब दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया और लाट साहब बाल-बाल बच गए तो गुरुकुल में ईश्वर की इस कृपा पर धन्यवाद देने के लिए एक सभा की गई थी। लार्ड और लेडी हार्डिंग के चित्र विद्यार्थियों को बांटे गए। उनके दीर्घ जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई थी। पाखंड शब्द का उपयोग मैंने इसलिए किया है कि गुरुकुल कांगड़ी के वातावरण में अंग्रेज और विदेशी शासन के प्रति उत्कट घृणा थी। विदेशी शासन के प्रति वहां परवशता का भाव था, प्रेम का नहीं।
      गुरुकुल पार्टी में राजनैतिक चेतना अधिक होने का प्रमाण कालिज पार्टी के प्रमुख नेता महात्मा हंसराज और गुरुकुल पार्टी के प्रमुख नेता स्वामी श्रध्दानंद के व्यवहार से ही स्पष्ट हो जाता है। 1921 में जब जलियांवाला बाग की घटना के कारण विदेशी शासन और देश की जनता के आंदोलन की टक्कर ने उग्र रूप धारणा कर लिया तो स्वामी श्रध्दानंद राजभक्ति की अपनी पुरानी घोषणाओं के बावजूद राष्ट्रीय आंदोलन के अगले मोर्चे पर आए बिना न रह सके और उनकी गणना कांग्रेस के उग्र राजनैतिक नेताओं में होने लगी। दूसरी ओर कालिज पार्टी के अधिकारी विद्यार्थियों के राजनैतिक दमन में सरकार का साथ दे रहे थे।
      सरदार अजीत सिंह ने मुख्यत: और सरदार किशन सिंह ने भी विदेशी शासन  विरोधी राजनैतिक आंदोलन में भाग लिया था। उस समय अभी कृष्ण मंदिर (जेल) में तपस्या करके आत्मिक शक्ति द्वारा स्वराज्य प्राप्त कर लेने के गांधीवादी सिध्दांत का विकास नहीं हो पाया था। इसलिए सरदार अजीत सिंह पुलिस के हाथ पड़ कर जेल में सड़ते रहने के बजाय फरार होकर अपना काम करते रहे। गिरफ्तारी से बचने के लिए अम्बाप्रसाद सूफी के साथ वे भारत के अनेक भागों और नैपाल की तराई में फिरते रहे और फिर इस देश में कुछ कर पाने का अवसर न देखकर विदेश चले गए। विदेश में भी वे लाला हरदयाल, राजा महेंद्र प्रताप और बरकतुल्ला आदि दूसरे प्रमुख क्रांतिकारियों के सहयोग से जैसे तैसे भारत में राजनैतिक क्रांति की तैयारी के लिए प्रयत्न करते ही रहे। इटली से लौटे एक मित्र का कहना है कि दूसरे महायुध्द के समय रोम से रेडियो पर जो ब्रिटिश विरोधी प्रचार हिंदुस्तान में होता था और जिस की भाषा में ब्रिटिश साम्राज्यशाही और भारतीय ब्रिटिश सरकार के प्रति अदम्य घृणा और विरोध उबला पड़ता था वह सरदार अजीत सिंह के ब्रिटिश सरकार से आमरण टक्कर लेते रहने की भावना का ही परिणाम था।
      सरदार अजीत सिंह के लिए 1948 से पहले भारत लौट सकना संभव न हुआ। जिस समय वे लौटे, अत्यंत वृध्द और निरंतर संघर्ष से जीर्ण हो चुके थे। शीघ्र ही उन का देहांत हो गया। सरदार किशन सिंह भी कुछ हद तक अपने भाई का साथ देते रहे
ब्रिटिश विरोधी प्रचार हिंदुस्तान में होता था और जिस की भाषा में ब्रिटिश साम्राज्यशाही और भारतीय ब्रिटिश सरकार के प्रति अदम्य घृणा और विरोध उबला पड़ता था वह सरदार अजीत सिंह के ब्रिटिश सरकार से आमरण टक्कर लेते रहने की भावना का ही परिणाम था।
      सरदार अजीत सिंह के लिए 1948 से पहले भारत लौटना संभव न हुआ। जिस समय वे लौटे, अत्यंत वृध्द और निरंतर संघर्ष से जीर्ण हो चुके थे। शीघ्र ही उनका देहांत हो गया। सरदार किशन सिंह भी कुछ हद तक अपने भाई का साथ देते रहे।रौलेट-कानून विरोधी हड़ताल उसी समय टूटी जब गांधी ने अपनी भूल पर पश्चाताप करके हड़ताल को तुरंत तोड़ देने की आज्ञा दे दी। यह हड़ताल केवल लाहौर में ही नहीं अमृतसर, गुजरावाला आदि कई शहरों में भी इसी रूप में हुई।
      रौलेट कानून के विरुध्द प्रदर्शनों और हड़तालों को रोक कर गांधीजी और कांग्रेस ने सरकार द्वारा किए गए दमन की जांच की जाने की मांग और प्रार्थना अंग्रेज सरकार से आरम्भ की। कांग्रेस की यह मांग सरकार द्वारा स्वीकार न की जाने पर असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कई वर्ष के विदेश वास के बाद उसी समय भारत लौटे थे। देश में राजनैतिक उत्साह देख कर उन्होंने पंजाब में असहयोग आंदोलन का नेतृत्व आरंभ किया। पंजाब में इस आंदोलन ने खूब उग्र रूप ले लिया। कांग्रेस ने सरकारी खिताबों, नौकरियों, अदालतों और स्कूल कालिजों से असहयोग की  पुकार की। खिताब, नौकरियां और अदालतें तो कम ही लोगों ने छोडीं होंगी परंतु विद्यार्थियों ने स्कूल कालिज बड़ी संख्या में छोड़ दिये। इन्हीं असहयोगी विद्यार्थियों को योग्य राष्ट्रीय कार्यकर्त्ता बनाने के लिए लालाजी और पंजाब के कांग्रेसी नेताओं ने लाहौर में पंजाब नेशनल कालिज की स्थापना की थी।
      भगत सिंह असहयोगी विद्यार्थियों में से था। राष्ट्र की पुकार पर उसने शायद नवीं कक्षा से स्कूल छोड़ दिया था और वह कांग्रेस के स्वयं सेवकों में भर्ती होकर राष्ट्रीय  काम करने लगा था। सन् 1922 में गांधीजी के सत्याग्रह स्थगित कर देने के कारण राष्ट्रीय आंदोलन फिर दब गया। जो विद्यार्थी राष्ट्र की पुकार पर स्कूल कालिज छोड़ आए थे, वे ठगे गए से अनुभव करने लगे। उनकी परिस्थिति कठिन हो गई। आंदोलन स्थगित होने का प्रभाव केवल विद्यार्थियों पर ही नहीं बल्कि आंदोलन के लिए उत्साहित हो जाने वाली सम्पूर्ण जनता पर विचित्र ढंग से पड़ा। जनता गांधीजी की सन् 1921 के 31 दिसम्बर तक स्वराज्य प्राप्त कर लेने की प्रतिज्ञा पर विश्वास कर बहुत उत्साहित और
मरने- मारने के लिए तैयार हो चुकी थी। 22 फरवरी, 1922 की घोषणा से स्वराज्य प्राप्त किये बिना ही आंदोलन पूर्णत: स्थगित हो गया।
      आंदोलन के यों स्थगित हो जाने से जनता में जाग उठी संघर्ष की भावना को ऐसा धक्का लगा जैसे तेज चाल से चलती रेलगाड़ी को सहसा रोक देने से रेलगाड़ी के डिब्बे आपस में ही टकराने लगते हैं। जनता में जाग उठी उग्रता और संघर्ष की भावना कई लाभदायक और हानिकारक रूपों में परिणित हो गई। सांप्रदायिक दंगे भी हुए परंतु उसके साथ सांप्रदायिक सुधारवादी आंदोलन, उदाहरणत: सिक्खों में 'गुरुद्वारा-आंदोलन' भी वेग से चल पड़े।
      इसमें संदेह नहीं कि गुरुद्वारा आंदोलन सांप्रदायिक क्षेत्रा में ही सीमित था और इस का उद्देश्य गुरुद्वारों (सिख मंदिरों) से अनाचार दूर करना था परंतु इसकी भावना उग्र   सुधारवादी और अपने सीमित क्षेत्रा में क्रांतिकारी भी अवश्य थी। यह गुरुद्वारे  कुछ महंतों की पैतृक और वैयक्तिक संपत्तिा के रूप में चले आ रहे थे। गुरुद्वारों में भेंट के रूप में आने वाली लाखों की सम्पत्तिा और गुरुद्वारों से जुड़ी हुई जागीरों की आय इन महंतों की व्यक्तिगत या पारिवारिक आमदनी समझी जाती थी। इन महंतों के स्वामित्व में यह  गुरुद्वारे प्राय: तमाशबीनी और व्यभिचार के अव्े बन चुके थे। गुरुद्वारा आंदोलन का उद्देश्य इन मन्दिरों को महन्तों की पैतृक और व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहने  देकर संगत (संप्रदाय) की सामाजिक संपत्ति बना देना और इन गुरुद्वारों का तथा उनकी आमदनी-खर्च का प्रबंध निर्वाचित पंचायतों द्वारा करना था। यह गुरुद्वारों के सामाजीकरण की मांग थी।
      सरकार मंदिरों की संपत्ति के सामाजीकरण करने के विरुध्द और मंदिरों की संपत्ति पर महंतों के पैतृक स्वामित्व के अधिकार की रक्षा करने के पक्ष में थी। सुधार चाहने वाली सिख जनता ने यह आंदोलन सत्याग्रह के रूप में चलाया। सिखों के नि:शस्त्रा जत्थे गुरुओं की वाणी का पाठ करते हुए इन मंदिरों और मठों पर सामाजिक अधिकार कायम करने के लिए जाते थे। महंतों के पालतू गुंडे और पुलिस की बड़ी-बड़ी गारदें इन नि:शस्त्रा स्वयंसेवकों पर लाठियों की अंधाधुंध बौछार करते थे। कई जगह गोली चली। प्राय: मंदिरों की जमीन खून से रंग जाती थी। मूर्छित होकर गिर पडे स्वयंसेवकों को ले जाकर जेलों में बंद कर दिया जाता था। गुरुद्वारा आंदोलन के संघर्ष का अनुमान 'ननकाना साहब गुरुद्वारे' के उदाहरण से ही किया जा सकता है। इस मंदिर पर अधिकार करने के लिए लगभग दो सौ स्वयं सेवकों की जानें गर्इं।
      सन् 1922 में राष्ट्रीय आंदोलन के स्थगित हो जाने पर भगत सिंह गुरुद्वारा आंदोलन में भाग लेने लगा था। इस आंदोलन में भाग लेने वाले क्रांतिकारियों के प्रतिश्रध्दा के कारण और इस आंदोलन में भाग ले सकने का अवसर पाने के लिए उस ने भी सिर पर केश रखा लिए थे। वह अकाली बन कर काली पगड़ी पहनने और कृपाण भी रखने लगा था। इन दिनों और भी अनेक हिंदू युवक सिख और अकाली सज गए थे। काली पगड़ी युवकों में फैशन ही बन गई थी। कृपाण के प्रति भगत सिंह की श्रध्दा इसलिए थी कि कृपाण के आधार पर सरकार द्वारा लगाये हुए प्रतिबंध का विरोध करने के लिए सिखों ने 'कृपाण-आंदोलन' चलाया था और सिख लोग तीन फीट लम्बी तलवारें हाथ में लिए कानून भंग करते थे।
      जब भगत सिंह नेशनल कालिज में पहुंचा, वह नियम से काली पगड़ी ही बांधता था परंतु गुरुद्वारा आंदोलन समाप्त हो चुका था। अब काली पगड़ी सांप्रदायिकता का ही चिह्न बन गई थी। भगत सिंह का काली पगड़ी बांधने का नियम धीरे-धीरे शिथिल हो गया। गुरुद्वारा आंदोलन में सिखों के सफल हो जाने पर उन में सांप्रदायिक संकीर्णता का अहंकार और रूढ़िवाद जोर पकड़ने लगे थे। नवयुवकों और भगत सिंह को अकाली संगठन से विरक्ति होने लगी थी। उन दिनों वह कभी भी गुरुद्वारे में नहीं जाता था।

सोमवार, 28 मार्च 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -1-यशपाल


                 ( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)
 मैं यह कहानी व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख रहा हूं। भगत सिंह, सुखदेव और मैं कालिज के सहपाठी थे। भगवतीचरण हम लोगों से दो बरस आगे थे। सहपाठी ही नहीं, हम लोगों में विशेष आंतरिकता भी थी। इस आंतरिकता का भी कुछ कारण रहा होगा। इस आंतरिकता द्वारा मैं उन लोगों की परिस्थितियों को भी जान सका हूं।
      भगत सिंह का पारिवारिक घर लाहौर से लगभग कुछ मील दूर सांडा गांव में था। सुखदेव लायलपुर का रहने वाला था। भगवतीचरण वोहरा लाहौर के ही रहने वाले थे। मेरे परिवार का आदिम स्थान तो कांगड़े का पहाड़ी जिला है परंतु पंजाब नेशनल कालिज में मैं फिरोजपुर से गया था। लाहौर के पंजाब नेशनल कालिज में, जहां कि एच.एच.आर.ए. की प्रथम धूनी सुलगी, हम लोगों का आकर मिल जाना जैसी परिस्थितियों में संभव हुआ और जिन प्रवृत्तियों के कारण हम लोग एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए या हमने एक दूसरे में कुछ ऐसी बात विश्वास के योग्य पाई जिसके कारण जिंदगी-मौत के खेल में साथी बन गए।
      सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन के जिस काल से मेरा व्यक्तिगत संबंध रहा है उसमें भगत सिंह का स्थान महत्वपूर्ण था। क्रांति की चेष्टा या राजनीतिक बातों के अलावा भी सहपाठी और मित्र के रूप में भगत सिंह की संगति में बहुत बड़ा आकर्षण था। वह स्वयं बहुत विनोदप्रिय होने के साथ-साथ दूसरों के लिए विनोद का अच्छा खासा साधन भी बन सकता था। भगत सिंह के उस समय के रूप और उसके वर्तमान ऐतिहासिक महत्व और स्थान में बहुत अंतर है। भगत सिंह के जो सुघड़ और चुस्त चित्र हैट पहने और मूंछ मुर्री दिए आज जगह-जगह दिखाई देते हैं, उनसे भगत सिंह के उस समय के रूप और व्यवहार की कल्पना नहीं की जा सकती। कद लंबा और चेहरे का रंग साफ होने पर भी हल्की-हल्की दाढी-मूंछ से घिरा चेहरा परंतु हल्की भवें और छोटी-छोटी आंखें। सिर पर ढीले-ढाले बांधे केशों पर दोनों ओर लटकती  छोटी-सी पगड़ी। खद्दर के मैले और प्राय: शरीर से बेनाप कपड़े। कमर में अक्सर पायजामे की जगह लुंगी पहन कर ही वह कालिज आ जाता। हम लोगों का सहपाठी झंडा सिंह उस की आंखों की उपमा लड्डू में चिपके बादामों से और उसके रूप की उपमा जवान अल्हड़ बोते (ऊंट) से दिया करता था।     
दूसरी और समय आने पर उसी भगत सिंह का रूप और करतूत दोनों ही ऐसे निखरे कि उसे फांसी दी जाने के समाचार की पहली चोट जब हल्की पड़ गयी तो उस अनिवार्य चोट को सह्य मजाक बना डालने के लिए पंजाब की एक प्रमुख महिला कह बैठीं- 'आज जाने देश की कितनी महत्वाकांक्षी कुमारियों के हृदय विधवा हो गए होंगे।' भगत सिंह देश के युवक-युवतियों के स्वप्नों का आदर्श बन गया था। लोग उस के रूप को भी उसकी कीर्ति की छाया में ही देखने लगे। कालिज के दिनों में भगत सिंह को बुध्दू बनाने में मजा आता था। मैं स्वयं भी काफी बुध्दू बनता रहा हूं। हम सभी को किसी न किसी समय बुध्दू बनना ही पड़ता था। एक समय खिलवाड़ का साधन भगत सिंह अपनी कर्मशीलता और निष्ठा से आज गौरव का कारण बन गया है। इसके अतिरिक्त कितनी ही रहस्यमय दंतकथाओं ने भी भगतसिंह की स्मृति को लपेट लिया है।
      आखिर भगत सिंह के हृदय में क्रांति की भावना और प्रवृत्ति इतनी उग्र क्यों थी? यहां क्रांति की भावना और शूरवीरता या साहस को अलग-अलग रखकर बात करना चाहता हूं। भगत सिंह क्यों विशेष बेचैन और उग्र जान पड़ता था... ? मैं समझता हूं इसके कारण उस की परिस्थितियों में खोजे जा सकते हैं।
      भगत सिंह के अधिकांश चित्रों में सिर पर केश पगड़ी नहीं हैट दिखायी देता है। नाम में 'सिंह' जुड़ा रहने से पंजाब से बाहर के लोग उसे प्राय: राजपूत ठाकुर समझ लेते हैं। भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में हुआ था। अब तो शायद उसके छोटे भाइयों में से किसी के भी सिर पर केश नहीं हैं। सिख संप्रदाय में भी हिंदुओं की तरह ब्राह्मणों और खत्रियों की कई उपजातियां हैं। भगत सिंह का परिवार साधारण किसान था, जिसे जाट कहा जाता है। भगत सिंह और उनके पिता सरदार किशन सिंह के नाम के साथ सरदार की उपाधि जुड़ी देख कुछ लोग इस शब्द को उनके वंश की उपाधि ही समझ लेते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है। पंजाब में प्रत्येक सिख सरदार पुकारा जाता है ठीक वैसे ही जैसे कि निरक्षर ब्राह्मण भी पंडित पुकारे जाते हैं। भगत सिंह को कभी किसी ऐतिहासिक पुरातन महापुरुष से अपने वंश का संबंध जोड़ने का गर्व करते नहीं सुना।
      भगत सिंह के परिवार का संप्रदाय सिख था परंतु सिख सांप्रदायिकता के प्रति इस परिवार में कोई रूढ़िवादी आस्था नहीं थी। भगत सिंह के पिता से मेरा घनिष्ट परिचय रहा है। उसके दादा को भी जानता हूं। सिर पर केश होने के बावजूद यह लोग सिख की अपेक्षा आर्यसमाजी ही अधिक थे। भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह तो सामाजिक प्रश्नों पर सांप्रदायिकता की उपेक्षा कर उन्हें केवल राजनैतिक दृष्टि से ही देखते थे। कांग्रेस में वे रहे तो सदा ही परंतु रहे असंतुष्ट आलोचक के रूप में वामपक्ष की ओर। सरदार किशन सिंह, आर्यसमाज के समाज-सुधार के कार्यक्रमों में काफी दिलचस्पी रखते थे। लाहौर में आर्यसमाज का वार्षिक उत्सव होन पर वहां अवश्य दिखाई दे जाते। यह शायद इसलिए कि पुराने सहयोग के कारण आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं से उन के व्यक्तिगत संपर्क चले आते थे। किसी सांप्रदायिक अनुष्ठान, पूजापाठ, हवन-  संध्या के प्रति उन में रुचि नहीं देखी। दादा अर्जुन सिंह जी जरूर धार्मिक अनुष्ठान के प्रति निष्ठा रखते थे परंतु किस अनुष्ठान के प्रति?
      सन् 1925 के जाड़ों की बात है। सरदार किशन सिंह जी एक इन्श्योरेंस कंपनी की एजेंसी कर रहे थे। उनका दफ्तर लाहौर में लुहारी दरवाजे के भीतर बाजार में दुमंजिले पर था। जब यह जगह मौजूद थी तो भगत सिंह के मित्रों को कोई दूसरा मकान किराये पर लेने की जरूरत क्या थी? उस समय जोरू-जाता किसी के था ही नहीं। सरदार किशन सिंह जी एजेंसी तो जरूर लिए थे परंतु उन दिनों अधिक धन कमा सकने की आशा में उनकी रुचि खेती और दूध विक्रय की ओर ही अधिक थी। वे प्राय: सांडा गांव में रहते थे। एजेंसी का यह दफ्तर हम लोगों के लिए आराम का डेरा बना हुआ था।
      मैं उन दिनों लाहौर के नेशनल स्कूल में पढ़ा रहा था। नेशनल कालिज समाप्त होकर केवल नेशनल हाईस्कूल ही रह गया था। भगत सिंह अनिच्छा से थोड़ा बहुत समय घर के कारोबार में लगाता, शेष समय पढ़ता और गुप्त संगठन के लिए भूमि तैयार करने में लगा रहता। सुखदेव कभी लायलपुर अपने घर चला जाता। वहां उसके परिवार ने उसे आटे की एक चक्की लगवा दी थी। लाहौर आता तो भगत सिंह के साथ ही बना रहता। हमारे सहपाठी झंडा सिंह और जयदेव गुप्त भी वहीं रहते थे। झंडा सिंह 'गांधी खद्दर भंडार' में काम कर रहा था और उसी में जुटा रहा। जयदेव गुप्त सरदार के बीमे के काम में सहयोग दे रहा था। खाना हम लोग किसी तंदूर पर खा लेते और दफ्तर में बिछी दरी पर बिस्तरा लगा कर रात काट देते। दफ्तर में मेज-कुर्सी मौजूद होने से पढ़ने लिखने की भी सुविधा थी।
      एक दिन स्कूल में छुट्टी थी। दूसरे लोग मकान पर मौजूद नहीं थे। मैं अपनी सनक में मेज पर बैठा कोई लेख या कहानी लिख रहा था। मेज के नीचे टीन की क्या चीज पड़ी है, यह खयाल न कर उस पर जूते जमा कर रख लिए थे। संभव है अचेतन रूप से यही धारणा रही हो कि रद्दी की टोकरी के तौर पर कोई डिब्बा है। लिखते समय विचारों को ठेलने के लिए मेज के नीचे उस टीन की चीज को जूते से एड़ दिए जा रहा था।
      जीने पर भारी कदमों से धम-धम करते हुए एक वृध्द सिख सज्जन अपने ग्रामीण वेश में ऊपर दफ्तर में आ गए। मैंने एक दफे नजर उठा कर उनकी ओर देखा और लिखने में तन्मय रहा। सरदारजी के ऐसे अनेक संबंधी गांवों से आते-जाते रहते थे। इन सज्जन की दाढ़ी खूब प्रशस्त, बर्फ की तरह श्वेत और चेहरा खूब तेजोमय गुलाबी रंग का था। मैंने उन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। आगंतुक भी मुझ से आदर की प्रतीक्षा न कर एक कुर्सी खींच कर चुपचाप दीवार के पास बैठ गए। मैं मालिक बना बैठा लिखता रहा और मेज के नीचे टीन की चीज पर जूते की ठोकरें भी जमाता रहा।
      अचानक वजनी गालियों से भरी एक करारी डांट सुन कर आंख उठा कर देखा कि वयोवृध्द भव्य मूर्ति की आंखें लाल और चेहरा क्रोध से तमतमा उठा है और वे हाथ में थमी लाठी को फर्श पर ठोक रहे हैं।
      ''गधा, उल्लू, नास्तिक, बदमास, सिर तोड़ दूंगा...।'' उन के हाथ की लाठी मेरे सर पर पड़ा ही चाहती थी। वृध्द ने अपने आवेश को कठिनता से वश में कर मेज के नीचे संकेत करते हुए फटकारा ''उल्लू, यही तेरी तमीज है?''
      मेज के नीचे झांक कर देखा तो अपने जूतों के बीच पाया एक औंधा पड़ा हवनकुंड। सब कुछ समझ में आ गया। उपेक्षा के कारण पहचानने में भूल हुई थी। भगत सिंह से सुन रक्खा था कि दादा जी नित्य हवन करते हैं। जहां जाते हैं, पोटली में हवनकुंड और हवन सामग्री साथ बांध ले जाते हैं।
      भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह की सांप्रदायिक आस्था वैदिक कार्य के आर्यसमाजी ढंग की थी। सिख परिवार में पैदा होकर, भगवान द्वारा सिर पर लाद दिए गए संप्रदाय की अवहेलना करके जो व्यक्ति अपनी बुध्दि से किसी दूसरे संप्रदाय को तर्क संगत समझ कर स्वीकार कर लेता है, वह प्रकृति से विचार स्वतंत्राता चाहने वाला और अपने ज्ञान की सीमा तक क्रांतिकारी ही होगा। भगत सिंह की इस पारिवारिक परिस्थिति का प्रभाव उसके मानसिक विकास पर पड़ना अनिवार्य था। सरदार अर्जुन सिंह न केवल व्यक्तिगत रूप से ही अपने धार्मिक विचारों के अनुसार आचरण करते थे बल्कि अपने गांव में भी बिरादरी और बस्ती के विरोध की परवा न कर आर्यसमाज का जलसा और प्रचार करने के लिए लोहा लेते रहते थे।
      भगत सिंह के परिवार का पुराना स्थान पंजाब के होशियारपुर जिले में था। चिनाब नदी की नहर बन जाने पर लायलपुर के रेतीले जिले में नई बस्ती बसने लगी। यह लोग अपने पैतृक स्थान में खेती की भूमि का अभाव अनुभव कर लायलपुर के एक गांव में आ बसे।
      भगत सिंह से इस गांव की एक बड़ी विचित्रा घटना सुनी। दादा अर्जुन सिंह जी के गांव की भूमि तम्बाकू की उपज के लिए बहुत अनुकूल है परंतु गांव में पूरी आबादी सिखों की होने के कारण वहां तम्बाकू की खेती नहीं होती थी। सरदार अर्जुन सिंह इस रूढ़िवाद या कुसंस्कार को कब तक सहते जाते? उन्होंने अपने खेतों में तम्बाकू बो दिया। गांव भर में पंचायतें हुर्इं पर वे डटे रहे। फसल तैयार हो जाने पर तम्बाकू घर में जमा भी कर लिया। खेतों तक तम्बाकू का रखना एक बात थी पर उसका एक सिख के घर में रख लिया जाना सिख बिरादरी किसी तरह न सह सकती थी। सरदारजी को बिरादरी से अलग कर दिया गया। सिख बिरादरी में हुक्के का तो प्रश्न ही नहीं उठता इसलिए सरदारजी का पानी और उनसे व्यवहार बंद  हो गया। सरदारजी अपनी बिरादरी को तर्क द्वारा समझाने की विफल चेष्टा करते रहे।
      एक दिन उस तम्बाकू का ग्राहक भी आ पहुंचा। तम्बाकू बिक गई। मुनाफा घर में आ गया। अब सरदारजी ने बिरादरी से कहा ''मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूं कि मैंने अति अपवित्र वस्तु को छुआ और अपने घर में रखा परंतु अब वह मेरे घर से निकल  चुकी है। घृणित से घृणित वस्तु को छू कर भी सफाई कर लेने से मनुष्य पवित्र हो जाता है। गुरुओं की आज्ञा है कि कोई व्यक्ति, अछूत या मुसलमान भी 'अमृत छक' कर सिख धर्म में दीक्षित हो सकता है। आप जिस तरह कहें, मैं अपने मकान की शुध्दि करने को तैयार हूं।'' सरदारजी फिर बिरादरी में शामिल हो गए। अपने मित्रों को उन्होंने समझाया ''जहां तर्क नहीं चलता वहां उदाहरण काम देता है। मेरी बिरादरी के सामने यह उदाहरण तो है कि तम्बाकू जैसे निषिध्द पदार्थ को छू लेने वाला व्यक्ति भी गुरुओं की आज्ञा द्वारा फिर पवित्र हो सकता है। इतनी सी बात पर मैं आयु भर के लिए बिरादरी से अलग हो जाऊं यही क्या तर्कसंगत है?''
      उपरोक्त घटना से यह स्पष्ट है कि रूढ़िवाद से मुक्त पारिवारिक वातावरण में भगत सिंह ने तर्क, विद्रोह और साहस की दीक्षा स्वाभाविक रूप से पाई थी। भगत सिंह के परिवार की आर्यसमाज के प्रति अनुरक्ति विचार-स्वतंत्रता और क्रांति की ओर प्रवृत्ति के कारण ही थी। आज आर्यसमाज के आंदोलन और संगठन ने मठ और रूढ़िवाद का जैसा रूप धारण कर लिया है, उससे उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल के आर्यसमाजियों की भावना का अनुमान ठीक-ठीक नहीं हो सकता; जैसे कि आज अमरीकन और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की ईसाइयत को देख कर रोमन साम्राज्य के समय ईसाई धर्म द्वारा किए गए परलोक के विश्वास के सहारे नीरु के दमन और अत्याचार के विरुध्द लड़ने वाले ईसाई दासों और गरीब इसाई लोगों की मनोभावना का अनुमान नहीं किया जा सकता।
      उस समय भी आर्यसमाजी आंदोलन का रूप सांप्रदायिक जरूर था। वह वैदिक धर्म पुन: स्थापना की घोषणा करता था। वैदिक धर्म की पुन: स्थापना की पुकार का अर्थ मुख्यत: हिंदू संप्रदाय को असंगत, रूढ़ियों, कुसंस्कारों और मिथ्या विश्वासों से मुक्त करना था। उसका कार्यक्षेत्रो सांप्रदायिक सीमाओं के भीतर प्रगतिवादी और क्रांतिकारी भी था। उस समय आर्यसमाज के आंदोलन का विशेष रुझान सामाजिक समस्याओं की ओर था। शिक्षा-प्रचार, विधवा-विवाह, जन्म से वर्ण-व्यवस्था की धारणा को तोड़ना और अछूत समझी जाने वाली जातियों के लिए मनुष्यता के अधिकारों की मांग इस आंदोलन के प्रमुख भाग थे। इन प्रगतिशील भावनाओं का स्वाभाविक परिणाम विदेशी दासता से असंतोष भी हुआ। सामाजिक प्रगति के पथ पर कदम रखने से व्यक्ति राजनैतिक दृष्टि से सचेत हुए बिना नहीं रह सकता। यही कारण था कि पंजाब में आर्यसमाज द्वारा सामाजिक  सुधार की चेतना फैलने के साथ-साथ ही विदेशी दासता के विरोध की चेतना भी फैलने लगी। उस समय पंजाब के प्राय: सभी राजनैतिक कार्यकर्ता लाला हरदयाल, अम्बाप्रसाद सूफी, लाला लाजपत राय और अजीत सिंह आदि 'आर्यसमाजी विचार स्वतंत्रता' द्वारा प्रभावित थे। 1914-1915 लाहौर षडयंत्र के मामले में भाई परमानंदजी आदि भी आर्यसमाज की प्रगतिशील चेतना की ही उपज थे।(क्रमशः)

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