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शनिवार, 23 जुलाई 2016

´तन्मयता´में मथुरा मिलेगा

         लोग पूछते हैं आपने क्या सीखा ,किससे सीखा,कैसे सीखा ॽ उनके लिए मेरे पास कोई जबाव नहीं होता।क्योंकि मैं बड़ा हुआ सामान्य किस्म के लोगों के बीच में।सारी जिन्दगी सामान्य़ किस्म के लोगों में गुजारी,जो कुछ भी सीखा उनसे ही सीखा या फिर लेखकों की किताबों से सीखा।

मैं बहुत कम साहित्यकारों और प्रोफेसरों को जानता हूँ,उससे भी कम संख्या में लेखकों-प्रोफेसरों से निजी परिचय है।आमतौर पर लेखकों –प्रोफेसरों से दूर ही रहा हूँ। यह मेरी सबसे बड़ी कमी कह सकते हैं। हमारे अनेक मित्र साहित्यकार हैं और साहित्यकारों में उनका सम्मानजनक स्थान है।मैंने कभी अपने को न तो साहित्यकार के रूप में महसूस किया और न साहित्यकारों की तरह लिखा,जितनी किताबें लिखीं वे सब पाठक के नाते लिखीं।मैं कईबार इस बात को व्यक्त कर चुका हूँ मुझे नागरिकबोध में जीने में मजा आता है।साहित्यकार,आलोचक,प्रोफेसर या किसी विषय के विशेषज्ञ के रूप में मेरी कभी कोई तैयारी नहीं रही।

मथुरा की निजी चेतना का मूलाधार है ´तन्मयता´,यह मैंने मथुरा से सीखा। मैं जो भी काम करता हूँ,´तन्मयता´और ´एकाग्रता´ के भाव से करता हूँ।यह मथुरा की संस्कृति का सबसे बेहतरीन तत्व है। यह ऐसा तत्व है जो व्यक्ति को भौतिक संसार की ओर ले जाता है। इस तत्व में बांधकर रखने की क्षमता है, दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है ´दिल जीतना´,मथुरा की माटी में ´दिल जीतने´की कला रमी-बसी है।रासलीला ने कई बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया था।तीसरा महत्वपूर्ण तत्व है ´वर्गीकरण´करके न देखना,मथुरा के लोग सभ्यता के प्रचलित सामाजिक वर्गीकरणों में न तो सोचते हैं और न बोलते हैं।जो व्यक्ति ´वर्गीकरण´की केटेगरी में बोलता है उसे औचक भाव से देखते हैं।वहां सामान्य शिक्षित समुदाय में भी वर्गीकरण बहुत कम इस्तेमाल नहीं होते हैं।



मथुरा इसलिए अच्छा लगता है कि वहां के मित्रों ने राजनीति सिखाई,संस्कृत साहित्य की विरासत से जुड़ा,मार्क्सवाद वहीं मिला,तंत्र-मंत्र और ज्यौतिषशास्त्र भी वहीं मिला,इससे भी बड़ी बात यह कि वहां के लोगों से बेइन्तहा प्यार मिला,निःस्वार्थ मित्रता की शिक्षा मिली। यह ज्ञान मिला कि जो दूर है उसे पास लाओ, मित्र बनाओ।स्मृति,कष्ट और प्रतिबद्धता को भूलो मत।

बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा का रस-

        मथुरा से निकले तकरीबन 35साल से ऊपर गुजर गए,इस बीच मथुरा में बहुत कुछ बदला है,जिसका कायदे से अध्ययन करना मेरा लक्ष्य है,मैं इस बीच मथुरा आता-जाता रहा हूँ,लेकिन मात्र पर्यटक की तरह,मथुरा को नए सिरे से पाने,समझने और महसूस करने के लिए वहां कुछ समय गुजारना बेहद जरूरी है,निकट भविष्य में यह काम कर पाऊँ तो बेहतर होगा।

मथुरा के मंदिर,बंदर,घाट,यमुना का किनारा,गलियां,वहां के लोगों की बेबाक भाषा,गालियां, अनौपचारिकता, औरतों का बिंदास भाव मुझे बहुत अच्छा लगता है।चलते -फिरते मथुरा को जितना मैं देखकर समझ पाया हूँ उसमें मुझे एक नए किस्म की मानुषगंध मिलती है।

मथुरा पहले की तुलना में स्मार्ट हो गया है।वहां के लोग पहले की तुलना में ज्यादा आधुनिक बने हैं,बदले हैं,खासकर स्त्रियां तो पहचानने में ही नहीं आतीं।इन दिनों आधुनिकता के परिवर्तनों ने मथुरा की युवा लड़कियों को बहुत ही आकर्षित किया हुआ है।

पुराने शहर के बाहर विशाल नया मथुरा,नयी रिहाइश वाला मथुरा बस गया है। दिलचस्प बात है मथुरा की गंध, पुराने शहर के अंदर ही महसूस कर सकते हैं।पुरानी गलियों में ही पुराने शहर की भाषा ,गंदी नालियों,बंदरों आदि को देखकर महसूस कर सकते हो।

मेरी दिली ख्बाहिश है मथुरा की गलियों और उनकी जीवंतता के वैविध्य पर जमकर लिखूँ।हर गली की अपनी विशेषता है,वहां के रहने वाले लोगों की अपनी निजी विशेषताएं भी हैं।मथुरा के बाहर रहते हुए मथुरा का मर्म धीरे धीरे मन से खिसक गया है।ब्रजभाषा बोल नहीं पाता,वहां जाने पर दो-तीन दिन रहने पर ब्रजभाषा बोल पाता हूँ।

ब्रजभाषा का सुख मथुरा का सबसे बड़ा सुख है।बाहर रहते हुए मुझे रोज एक-दो ब्रजभाषा कविता पढ़ने की आदत पड़ गयी,इस आदत को मैंने सचेत रूप से विकसित किया,जिससे मैं मथुरा से जुड़ा रहूँ।मथुरा में बड़ी संख्या में पुराने मित्र भी हैं जो बार-बार याद आते हैं।लेकिन मथुरा को हमेशा भाषा में ही पाता हूँ,वहां जाता हूँ तो भाषा सुनने में मजा लेता हूँ।

मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि यदि किसी शहर को पाना है तो वहां के लोगों को देखो और आत्मीयता से वहां की भाषा सुनो,शहर आपके मन में उतरता चला जाएगा।



कोलकाता में 27साल से रह रहा हूँ और यहां पर मैंने बोलचाल की बंगला भाषा के जरिए बंगाल को महसूस किया है, घर से जब पढाने जाता हूँ तो रास्ते में बंगला में लोगों की बातें सुनते हुए बंगाल को पाता हूँ,उसी क्रम में बंगला का आस्वाद विकसित हुआ,बंगला समझने की क्षमता पैदा हुई।यहां तक कि नए बंगला शब्दों को भी मैंने बोलचाल की बंगला के जरिए ही अर्जित किया,सीखा।असल में जीवन तो भाषा से ही व्यक्त होता है।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

ब्रज संस्कृति की चुनौतियाँ



ब्रज संस्कृति का विगत दो सौ सालों में निरंतर ह्रास हुआ है। यह संस्कृति मूलत: साहित्य, भाषा और जीवनशैली से जुड़ी रही है। विगत दो सौ सालों में ब्रज के अंदर साहित्य और संस्कृति का  ह्रास हुआ है । हिन्दी लेखकों द्वारा ब्रज भाषा को सबसे पहले साहित्य से सचेत रुप से खदेड़ा गया । ब्रज भाषा के आधुनिकीकरण के प्रयासों को किसी ने हाथ नहीं लगाया। आधुनिककाल के पहले ब्रज भाषा को कविता का भाषा के रुप में प्रतिष्ठा और स्वीकृति प्राप्त थी लेकिन आधुनिक काल आने के बाद ब्रज पर हमले बाहर से नहीं अंदर से हुए , दिलचस्प बात यह है कि ये हमले और किसी ने नहीं किए बल्कि साहित्य के नामी लेखकों ने किए, ख़ासकर खड़ी बोली हिन्दी को साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए यह काम किया गया और इस क्रम में हिन्दीभाषी क्षेत्र की सभी भाषाएँ पिछड़ गयीं और उनको मुख्यधारा के साहित्य से अलग कर दिया गया । यह काम किया गया खड़ी बोली हिन्दी को जातीय भाषा के रुप में प्रतिष्ठित करने के बहाने, लेकिन हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों के प्रति समान व्यवहार नहीं किया गया। इससे भाषा संहार की प्रक्रिया ने जन्म लिया। यह भाषा संहार उर्दू से लेकर ब्रज तक, अवधी से लेकर भोजपुरी तक फैला हुआ है। 
हमारे साहित्यकार और आलोचक भाषा के क्षेत्र में चल रहे इस भाषा संहार के प्रति सचेत होना तो दूर अपितु इस संहार का उपकरण बन गए। कहा गया कि ब्रज को कविता के पद से जब तक हटाया नहीं जाता तब तक खड़ी बोली हिन्दी की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती । हमने हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता के लिए एक ही भाषा को आधार के रुप में चुना और इसी खड़ी बोली हिन्दी को जनसंपर्क भाषा और राष्ट्रीय भाषा बनाने पर इस क़दर ज़ोर दिया कि ब्रज, अवधी आदि भाषाएँ पिछड़ गयीं। भाषाओं और बोलियों में समानता और भाईचारा पैदा करने की बजाय हमने भाषायी प्रतिस्पर्धा और भाषा संहार को किसी न किसी रुप में महिमामंडित किया, हिन्दी भाषी क्षेत्र की आम जनता को आधुनिकीकरण का जो मॉडल पेश किया वह  भाषायी संहार पर आधारित था।
      हिन्दी भाषी क्षेत्र में जो मध्यवर्ग बना वह अपनी बोली और भाषा के साहित्य से शून्य था , इस मध्यवर्ग ने जब एकबार अपनी भाषा को त्यागा तो फिर उसने खड़ी बोली हिन्दी को अपनाने की बजाय अंग्रेज़ी को अपनी पहचान और प्रतिष्ठा का अंग बना लिया। यह मजेदार फिनोमिना है कि खड़ी बोली हिन्दी के जिन लेखकों ने खड़ी बोली हिन्दी को अपनाने पर ज़ोर दिया वे लेखक कम से कम हिन्दीभाषी क्षेत्र के नागरिकों को खड़ी बोली हिन्दी के प्रति आकर्षित करने में असमर्थ रहे । 
               आज़ादी के बाद ख़ासतौर पर ब्रजभाषा , साहित्य और ब्रज संस्कृति का तेज़ी से ब्रज के मध्यवर्ग से अलगाव बढा है। ब्रज में आज भी मध्यवर्ग का एक तबक़ा ब्रजभाषा बोलता है लेकिन लिखता -पढ़ता नहीं है। उसके लिखने - पढ़ने की भाषा अंग्रेज़ी बनती चली गयी। इसके अलावा ब्रज क्षेत्र में सक्रिय शिक्षा संस्थानों में साहित्य और भाषा का अकादमिक स्तर आरंभ से ही बहुत ख़राब रहा है इसने ब्रज और खड़ी बोली हिन्दी के माहौल को  क्षतिग्रस्त किया । इस क्षेत्र में जो विश्वविद्यालय हैं वे ब्रज के प्रति कोई लगाव नहीं रखते । वरना इन  विश्वविद्यालयों में ब्रजभाषा और साहित्य के उन्नयन और शिक्षण का काम गंभीरता के साथ किया जाता। 
          कोई भी भाषा तब तक आत्मनिर्भर नहीं बनती जब तक उसके शिक्षण के काम को न किया जाय । हमने मान लिया कि ब्रज भाषा को पढाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है। ब्रजभाषा के विगत दो सौ सालों में कितने शब्द मर गए हम नहीं जानते , हमने फ़ील्ड सर्वे करके ब्रजभाषा के विभिन्न जिलों में उतार -चढ़ाव का कोई हिसाब नहीं रखा । हम नहीं जानते कि ब्रज का  प्रत्येक जिले के शहर और गाँव में भाषायी नक़्शा किस तरह बदला है। 
                  दिलचस्प बात यह भी है राज्य सरकार  और नवोदित मध्यवर्ग और नव-धनाढ्यवर्ग ने भी ब्रजभाषा के अंदर मौजूद वैविध्य और अंतरों को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की।  हममें से अधिकतर ब्रजभाषा के शब्दों के खो जाने का दर्द नहीं जानते । शब्द के खो जाने या नष्ट होने का अर्थ है ब्रज संस्कृति का क्षय । त्रासद पक्ष यह है कि परिवारीजन मरता है तो हम रोते हैं, शोक मनाते हैं लेकिन जब शब्द मरते हैं तो नोटिस तक नहीं लेते ! आखिरकार भाषा के प्रति हम इतने बेगाने क्यों हो गए हैं? ब्रजभाषा यहाँ के जीवन में रची- बसी है लेकिन इसके साथ घटित दुर्व्यवहार की हमने कभी ठंडे मन से समीक्षा नहीं की।  राज्य में सरकारें आई और गईं लेकिन भाषाओं के साथ हमने आंतरिक रिश्ता तोड़ दिया । स्थानीय भाषाओं और संस्कृति के साहित्य को हमने उत्सव, इनाम और इवेंट मात्र बना दिया। 
       ब्रज का मतलब मंदिर नहीं है, ब्रज का मतलब गऊ या गोवर्धन पर्वत या राधा-कृष्ण का मंदिर नहीं है। संस्कृति को साहित्य और लोकगीतों ने रचा है, पर्वतों और गऊ ने नहीं रचा है। आज हम गऊ, पर्वत या मंदिर के पुराने युग में नहीं लौट सकते। यह ब्रज- संस्कृति का प्रतिगामी नजरिया है।  ब्रज के साहित्यकारों ने साहित्य को रजवाड़ों और सामंती संस्कृति से मुक्ति दिलाने का काम किया। मध्यकालीन साहित्यकारों ने गऊ, गोवर्धन या भगवान पर कम से कम ध्यान दिया। लेकिन परंपरावादियों ने ब्रज संस्कृति को गाली,गऊ,भगवान और धार्मिकता में संकुचित कर दिया । 
   भगवान और भक्ति ब्रज संस्कृति के कम्युनिकेशन उपकरण हैं, इनको धार्मिकता नहीं समझना चाहिए । यह दुखद है कि ब्रज संस्कृति का आधार ब्रजभाषा का साहित्य था लेकिन हमने साहित्य को धार्मिकता के जरिए अपदस्थ कर दिया, क़ायदे से आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान साहित्य की प्रक्रियाओं को आधुनिक और सघन बनाया जाता लेकिन हमने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया । इस क्रम में ब्रज के लोककला रुपों का सफ़ाया हुआ । 
       
                      हम क्या करें -
(१) भाषिक संरचनाओं और उनमें आ रहे परिवर्तनों का ज़मीनीस्तर पर डाटा एकत्रित किया जाय  । ब्रजभाषा का ज़मीनी स्तर फील्डवर्क करके शब्दकोश बनाया जाय। 
(२)  ब्रजभाषा के उत्थान और प्रचार के लिए यूपी में विभिन्न विश्वविद्यालयों में ब्रजभाषा और अन्य भाषाओं और बोलियों के अध्ययन की व्यापक अकादमिक व्यवस्था की जाय । स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ब्रजभाषा के स्वतंत्र अध्ययन पर ख़ासतौर पर ज़ोर दिया जाय। 
(३) ब्रज के कला रुपों ख़ासकर प्रिफॉर्मिग आर्ट से संबंधित कला रुपों, रासलीला, स्वाँग, नौटंकी, भगतआदि के संरक्षण और विकास के बारे में महत्वाकांक्षी योजना बनाने के लिए पेशेवर लोगों का वर्किंग ग्रुप बनाकर योजना तैयार की जाय। 
(४) ब्रज संस्कृति अकादमी का राज्य सरकार गठन करे , इसके जरिए ब्रज कला रुपों के संरक्षण के विकास की महत्वाकांक्षी योजना बनायी जाय, यह गंभीर क़िस्म की अकादमी हो और सारी दुनिया के लोग इसमें आने के लिए तरसें। 
            

शनिवार, 5 नवंबर 2011

ब्रज और चौबों का लोकोत्सव कंस मेला


                     (मथुरा में कंस मेले का दृश्य)          
आज कंस  का मेला है।  चौबों का परंपरागत परिवार और बगीची-अखाड़े इसके प्रमुख आयोजक हैं, इन्हें कंसटीले वाले कहते हैं। इसी नाम से मथुरा में कंस का अखाड़ा हुआ करता था। मैंने बचपन में वहां पर चौबों को खूब कसरत करते और कुश्तियों के मेले आयोजित करते देखा है।पहले चौबों को पहलवानी का खूब शौक होता था। मथुरा की वो शानदार लोक संस्कृति का हिस्सा रहा है। कंस के टीले पर एक जमाने में बड़ा ही शानदार अखाड़ा था ,और उस पर पखवाड़े में एकबार कुश्तियां होती थीं ,जिनमें जीतने वालों को शानदार इनाम भी मिलता था।इस अखाडे के एक तरफ अंतापाड़ा नाम का मोहल्ला है,दूसरी ओर जिला अस्पताल है। यह इलाका शहर के बाहर मुख्यबाजार में पड़ता है। अब मथुरा के चौबों में सालाना जलसे के रूप में कंस मेला ही बचा है।
      एक जमाना था जब कंस के मेले के लिए चौबों में सुंदर से सुंदर लाठी खरीदने और पुरानी लाठियों को तेल पिलाने और साफ करके रखने की परंपरा थी, खासकर कंस मेले के मौके पर सैंकड़ों सुंदर लाठियों का प्रदर्शन देखने लायक होता था।प्रत्येक चौबे के हाथ में लाठी इस दिन शुभ मानी जाती थी। और कंस मेले के दिन बड़े पैमाने पर चौबे लाठियां लेकर निकलते भी थे।कंस वध करके कंस के अखाड़े से लौटते हुए चतुर्वेदी युवाओं के अनेक टोल हुआ करते थे और कई अखाड़े भी रहते थे, जिनमें पटेबाजी करते युवाओं के दल सड़कों पर अपनी कला का प्रदर्शन करते दिखते थे,एक समूह ऐसा भी होता था जिसके हाथ में तकरीबन 20 मीटर से ज्यादा लंबी बल्ली पर कंस का शिर हुआ करता है ,कंस के अखाड़े में कंस के धड़ का वध होता है, शिर बच जाता है ,उसे जुलूस की शक्ल में नाचते-गाते मंडलियों में परिक्रमा करते हुए कंसखार बाजार में लाकर चौबों के द्वारा लाठियों से मारकर चूर चूर किया जाता है।
    यह मान्यता है कि कंस वध करने जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के किले पर धावा बोला तो कंस भागकर कंस अखाडे में चला आया,वहां उसके पालतू 4 पहलवानों से भगवान और चौबों का युद्ध हुआ,ये पहलवान थे, सल,तोसल,चाणडूल,मांडूल इन पहलवानों को माकर जब भगवान ने कंस क खोज की तो पता चलाकि वो भागकर कंसखार इलाके में जाकर छिप गया है।यही वजह है कि कंस के शिर का वध लौटकर कंसखार में जाकर ही होता है और यह कार्य चौबों की मदद से होता है। आम धारणा है कि श्रीकृष्ण ने कंस को मारा था,लेकिन कंस वध में चौबों की महत्वपूर्ण भूमिका थी,इसकी ओर कभी लोगों का ध्यान नहीं जाता।
आज के दिन कंस का भगवान श्रीकृष्ण ने वध किया था। यह धारणा है कि स्थानीयतौर पर मथुरा के चौबों ने इस वध में भगवान की मदद की थी। यही वजह है कि कंस जैसे जल्लाद राजा के मेले और उसके वध के आयोजन की परंपरा सैंकड़ों सालों से मथुरा के चौबों में चली आ रही है।गोपालजी मंदिर के गुरूजी के जिम्मे श्रीकृष्ण-बलराम को सजाकर तैयार करने की जिम्मेदारी हुआ करती थी।बाकी आयोजन को कंस अखाड़े के चौबे मिलकर तैयार करते थे। चौबों में एक जमाने में इस मेले के लिए नए कपड़े आदि खरीदने और नए वस्त्र पहनने की परंपरा थी। कंस के अखाड़े पर प्रति पखवाडे कुश्तियों के दंगल हुआ करते थे। इनमें मथुरा के विभिन्न अखाड़ों के पहलवानों के अलावा आसपास के इलाकों के गांवों से भी पहलवान आकर नियमित भाग लिया करते थे।

आज के दिन कंस का मेला शाम 5 बजे के आसपास आरंभ होता है। कंस का विशाल पुतला लेकर चौबे निकलते हैं। यह चौबों का लोकोत्सव है। मजेदार बात यह है कि मथुरा के चौबे ही सारे देश में कंस मेला का आयोजन करते हैं और यह सिर्फ मथुरा में होता है।यह मान्यता है कि राजा कंस का भगवान श्रीकृष्ण ने चौबों की मदद से वध किया था। यही वजह है कि चौबे ही इस मेले का आयोजन करते हैं। चतुर्वेदी सज-धजकर और हाथों में सुंदर लाठियां लेकर इस मेले में टोल बनाकर निकलते हैं।विश्राम घाट से यह मेला एक जुलूस के रूप में आरंभ होता है जिसमें कंस का विशालकाय पुतला होता है और लट्ठ लेकर चतुर्वेदियों के टोल उसके चारों ओर नाचते-गाते चलते हैं ,अंत में कंस के टीले पर ले जाकर कंस का लाठियों से मार-मारकर चौबे वध करते हैं।बाद में नाचते-गाते लौटते हैं। साथ में हाथी पर श्रीकृष्ण-बल्देव भी सजे हुए विराजमान रहते हैं।अंत में यह जुलूस विश्रामघाट पर कंस के अस्थि विसर्जन और भगवान की आरती के साथ सम्पन्न होता है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...