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रविवार, 24 मई 2015

अफसरसाहित्यकार के प्रतिवाद में


आजकल अफसरलेखक को हिन्दी साहित्यवाले सम्मान देते हैं। अफसरलेखक की भूमिका को वे गंभीरता से विश्लेषित नहीं करते,जन सरोकारों के संदर्भ में उसकी भूमिका को खोलकर नहीं देखते। इसने साहित्य के जन सरोकारों को प्रदूषित किया है, संघर्षशील कतारों को कमजोर किया है। 
एक जमाना था हिन्दी में जन सरोकारों से जुड़े साहित्यकार महत्वपूर्ण माने गए, बाद में ऐसा दौर आया कि अफसरसाहित्यकार ही साहित्य के सितारे बन गए। अशोक बाजपेयी को इस परंपरा को स्थापित करने का श्रेय जाता है।
आज साहित्यकारों में अफसरसाहित्यकारों के इर्दगिर्द जमघट लगा रहता है, ये अफसरसाहित्यकार साहित्य को कुछ नहीं दे पाए हैं,हां, एक काम जरुर हुआ है कि साहित्य में अफसरों की आदतें आ गयी हैं।
साहित्यकारों में वे सारी तिकड़में आ गयी हैं जो अफसर में होती हैं,तिकड़मी और ऊपर के कनेक्शनवाला मजेदार साहित्यकार पैदा हुआ है जो साहित्य में मजे ले रहा है और साहित्य को मजमे की तरह इस्तेमाल करके विनिमय कर रहा है।
अफसरसाहित्यकारों के पास एक अच्छी खासी जमात सरकारी तंत्र और राजनेताओं की है इसने साहित्य को सत्ता के तंत्र का पुर्जा बनाकर रख दिया है।
सवाल यह है कि साहित्यकार की भूमिका को समग्रता में देखें या अंश में देखें ? कहां से देखें ? साहित्यकार को समग्रता में देखना सही होगा इससे साहित्य में आए अफसरों और प्रशासनिक अधिकारियों ,कुलपति,कुलाधिपति आदि की बीमारियों से साहित्य को बचाने में मदद मिलेगी।
एक जमाना था लेखक हुआ करता था, बाद में कार्यकर्ता -लेखक आया, लेकिन इसके बाद अफसरलेखक ने साहित्य के क्षितिज को अपने कब्जे में ले लिया है। अफसरलेखक आज महान लेखक है! यह वह व्यक्ति है जिसके सामाजिक सरोकार सत्ता से अभिन्न रुप से जुड़े हैं और यह अपनी संगत,शोहरत,संपर्क आदि के जरिए साहित्य जगत को प्रभावित कर रहा है। इसे साहित्य में करप्शन का गोमुख भी कह सकते हैं। साहित्य की प्रतिवादी भूमिका,नागरिक की प्रतिवादी भूमिका आदि को विकृत करने में अफसरसाहित्यकार की विगत 40सालों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

साहित्यकार की बदबू' और "जनवादीसेंट"


रायपुर साहित्य मेला पर हिन्दी के रायपुरिया प्रतिवादी वामलेखकों की तथाकथित प्रतिवादी प्रतिक्रियाएं और जलेसं के रुख को देखकर जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकार पदबंध से घृणा होने लगी है। यह साहित्यिक बदबू पहले भी थी,लेकिन इधर तो इसने विराट रुप धारण कर लिया है । इसे हम सुविधा के लिए 'साहित्यकार की बदबू' या 'साहित्य का कचड़ा' कहेंगे। आप जितना ही लेखक संगठनों के करीब जाएंगे उतना ही इस बदबू का अहसास करेंगे। हिन्दी में हमने साहित्यकार की घिनौनी हरकतों को छिपाने के लिए कुछ तथाकथित वैचारिकसेंट का इस्तेमाल किया है। जनवादीसेंट उसमें से एक है। हम कहना चाहते हैं इससे साहित्यिक बदबू खत्म नहीं होगी! साहित्यिक गंदगी साफ नहीं होगी। जनवादीसेंट तो लेखक का नकली आवरण है।

    उल्लेखनीय है साहित्यिक गंदगी को कभी हिन्दी के तीनों बड़े लेखक संगठनों (जलेसं,प्रलेसं,जसम) ने निशाना नहीं बनाया । रायपुरिया वामप्रतिवादी लेखकों ने भी कभी इसके खिलाफ कुछ नहीं लिखा! लेखक संगठनों के द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएं देखें और खोजें कि 'साहित्यकार की बदबू' और ' साहित्य का कचड़ा' क्या इनके निशाने पर है? स्थिति की भयावहता का चरम यह है कि लखनऊ से प्रकाशित एक जनप्रिय साहित्यिक पत्रिका के संपादक ने हाल ही में एक लेखक से दो टूक कहा नामवर सिंह के खिलाफ वह कोई लेख नहीं छापेगा ! यह संपादक हिन्दी में सबका प्यारा कहानीकार है! सवाल यह है क्या इस तरह की सेंसरशिप की जरुरत है ? क्या इस तरह की सेंसरशिप की नामवर सिंह को जरुरत है ?

हिन्दी साहित्यकार के घिनौने रुप को हमने सुंदर राजनीतिक नारों से ढ़ंक दिया है। मसलन् , आप धर्मनिरपेक्ष हैं ,वामपंथी हैं ,लेखक संगठन के नेता के पसंदीदा लेखक हैं,या भक्त हैं ,तो लेखकनेता आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगा,चाहे आपका लेखन कचड़ा हो। सवाल उठता है जलेसं,प्रलेसंऔर जसम ने लेखकों के गैर-अकादमिक और गैर-पेशेवर कर्मों पर कभी खुली बहस क्यों नहीं की ? लेखक के आचरण और आलोचना का गहरा संबंध है, लेखक के मूल्यबोध और आचरण का उसके नजरिए के साथ गहरा संबंध है, ऐसा क्या घटा है जिसने लेखक को दरबारी बना दिया ? यह कैसे हुआ कि दरबारीपन को हम वैचारिक प्रतिबद्धता कहने लगे ?दरबारी होने पर लेखक न तो लोकतांत्रिक होगा और न जनवादी होगा। वह दरबारी ही रहेगा।

हम जलेसं के पदाधिकारियों से जानना चाहेंगे कि कॉमरेड! क्या लेखक फ्रंट पर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है ? क्या हिन्दी के सभी स्व-नामधन्य वामलेखक दूधके धुले हैं ? क्या वे राजनीतिक दरबारी संस्कृति के शिकार नहीं हैं ? क्या इन लेखकों ने राजनीतिक गुटबाजी को त्याग दिया है ?

लेखकों में राजनीतिक दरबारीपन और गुटबाजी ,साहित्यिक अपराध है। सामाजिक पतनशीलता की निशानी है। लेकिन इन दोनों प्रवृत्तियों को अपने-अपने तरीके से लेखक संगठनों ने बढ़ावा दिया है। वे सामान्य लेखक से इसी तरह के आचरण की मांग भी करते हैं। लेखकों में राजनीतिक-साहित्यिक मसलों पर प्रचार हो, विवाद हो,लेकिन लेखकों में राजनीतिक दरबारीपन और गुटबाजी न हो, इस ओर इन लेखक संगठनों ने कभी ध्यान नहीं दिया।

'साहित्यकार की बदबू' की जड़ है राजनीतिक दरबारीपन। इस दरबारीपन के आधार पर ही अनेक लेखकों ने बड़े-बड़े पुरस्कार पाए, सरकारी खरीद में किताबें बिकवाने में सफलता हासिल की।प्रकाशकों को पाकेट में डाला। मंत्रियों-नेताओं-मुख्यमंत्री-केन्द्रीयमंत्री –पार्टी सचिव को जेब के हवाले किया। केन्द्र सरकार के नेताओं और कम्युनिस्ट पार्टी नेताओं की जी-हुजूरी की, और ऊँचे ओहदे पाए! यही वह प्रवृत्ति है जिसने साहित्य में मिथ्या प्रशंसा को साहित्यिक समीक्षा में रुपान्तरित कर दिया। दिलचस्प बात है जो हिन्दी साहित्य में दरबारी संस्कृति के नायक हैं, वे ही हिन्दी के महान लेखक भी हैं ! उनकी जेब में ही लेखक संगठन भी हैं !

दरबारी भावना के कारण लेखक संघ के पदाधिकारी लेखककीय अहंकार में डूबे रहते हैं, दूसरों को उपदेश देते हैं, सलाह देते हैं, यह करो,यह न करो, यह सही है,वह सही नहीं है। फलां व्यक्ति लेखक नहीं है, फलां व्यक्ति लेखक है, मैं सही हूँ ,वह गलत है। फलां बाजारु है, बिका है, फलां प्रतिबद्ध है। फलां जनवादी है, फलां वाम है,फलां प्रगतिशील है,फलां बड़ा लेखक है, फलां छोटा लेखक है, इसका लिखा पढ़ो, उसका लिखा मत पढो, उसके यहां जाओ,इसके यहां मत जाओ, उसे गोष्ठी में बुलाओ,इसे मत बुलाओ,जो हमारे साथ नहीं है उससे दूर रहो, जिसे संगठन से निकाल दिया है उसका बहिष्कार करो,बार-बारलेखकों से कहो कि वह भ्रष्ट है,पतित है, हम महान हैं, पुण्यात्मा हैं, दूध के धुलेहैं, हमारे साथ पार्टी है, उसके साथ पार्टी नहीं है, जो पार्टी में नहीं उसे लेखक मत मानो, जो पार्टी में नहीं उसे निकृष्ट मानो, जिस पर पार्टी का वरदहस्त है उसे परम पवित्र मानो, वैचारिक रुप से दूध का धुला मानो, हमारी हां में हां मिलाओ,यही वह दरबारीपन है जहां से हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील—जनवादी समूह में चीजें तय की जाती रही हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हर किस्म की साहित्यिक तिकड़म और घोटालों को पुण्यकर्म में रुपान्तरित कर दिया जाता है। इन सब चीजों को मैंने बहुत करीब से देखा है,यही वजह है कि मैंने कभी अपने को प्रगतिशील या जनवादी साहित्यकार के रुप में नहीं देखा,मुझे साहित्यिक दरबारीपन देखकर बार-बार यही महसूस हुआ कि मैं कम से कम साहित्यकार नहीं बन सकता, मैं साहित्यकार नहीं हूँ, मुझे इस तरह की हरकतें नापसंद हैं ।

रायपुर साहित्य मेला पर जलेसं के महासचिव-उपसचिव का बयान लीपापोती और लेखकीय अहंकार की आदर्श अभिव्यक्ति है। दुखद है ये दोनों पदाधिकारी दो-टूक ढ़ंग से प्रतिवादी लेखकों के तथाकथित प्रतिवादी रुख से अपने को अभी तक अलग नहीं कर पाए।इससे भी दुखद है जलेसं के नेतृत्व का अहंकार और निर्देशभरा भावबोध। इसमें लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवहार की न्यूनतम मर्यादा का ख्याल तक नहीं रखा गया। हम जानना चाहते हैं कि जलेसं का पदाधिकारी बन जाने पर क्या लेखकीयअहंकार और लेखककीय ओहदा बढ़ जाता है ? क्या जो लेखक नहीं है ,यानी मेरे जैसे लोग, वे क्या तुच्छ और हेय हो जाते हैं ? मैं निजी तौर पर अपने को हिन्दी का साहित्यकार नहीं मानता, मेरी कोई रुचि साहित्यकार बनने की कभी नहीं रही , क्योंकि हिन्दी के मौजूदा अधिकांश साहित्यकार मुझे प्रेरणाहीन और जुगाड़ में मशगूल लगते हैं। वे अपने को महान और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए दूसरे लेखकों को हेय ठहराते रहे, छोटा दिखाते रहे हैं। वे कभी अपने सांगठनिक दरबारीपन को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखते। इससे लेखकों का व्यापक स्तर पर नुकसान हुआ है। जलेसं की लेखक संगठन के रुप में साख में बट्टा लगा है। जलेसं दरबारीपन और लेखकीय अहंकार के दायरे से बाहर आएं तो समाज में बेहतर हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन रायपुर साहित्य मेला प्रसंग में जिस तरह का निम्नस्तरीय आचरण जलेसं ने किया है उससे यह उम्मीद कम लगती है कि वे दरबापीपन से बाहर निकलेंगे !

रायपुर से आगे देखे जलेसं

    
रायपुर साहित्य मेला पर 'जलेसं' के महासचिव -उपमहासचिव का बयान देखने को मिला, आज के संदर्भ में यह बयान एकदम अप्रासंगिक है। पर जलेसं का मानना है यह "महत्वपूर्ण " बयान है ।यह बयान यदि रायपुर मेले से आगे जाकर छत्तीसगढ़ को देख पाता तो बेहतर होता ! मसलन् छत्तीसगढ़ की अकादमियों के बारे में जलेसं बताता या म.प्र. में अकादमियों का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है ,उन पर कुछ कहता, लेकिन जलेसं का कोई प्रभावी हस्तक्षेप नजर नहीं आया !
फ़िलहाल रायपुर साहित्य मेला पर केन्द्रित करें और देखें तो पाएँगे कि जलेसं का बयान इवेंट केन्द्रित और सरकार केन्द्रित नज़रिए तक सीमित है। इस बयान की अपनी सीमाएँ हैं । क़ायदे से हमें रायपुर से आगे देखना चाहिए, हम इवेंट केन्द्रित रहे तो लेखकों की फ़ज़ीहत और अपमान का सिलसिला थमेगा नहीं ,ख़ासकर जनवादी- प्रगतिशील लेखकों के अपमान करने की आदत बंद नहीं होगी ।

जिस तरह जनवादी लेखक संघ के सम्मानित सदस्य असद ज़ैदी ने गंदी भाषा का मेरे प्रसंग में इस्तेमाल किया वह निंदनीय ही नहीं है बल्कि इस बात का संकेत भी है कि लेखकों में एक समूह किस तरह असभ्य और अशालीन हो गया है । ख़ासकर जनवादी लेखक संघ जैसे संगठन को इस प्रवृत्ति को समझना होगा और लेखकों में सभ्य आचरण करने के लिए कोई क़दम उठाने के बारे में सोचना होगा । मेरे ३५ साल के राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक तौर पर किसी की भी हिम्मत मुझे निजी तौर पर गाली देने की नहीं हुई, मैं कभी सरकारों के कार्यक्रमों में नहीं गया,न जाने का मेरा अपना निजी फ़ैसला था,इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण नहीं था, लेकिन रायपुर साहित्य मेला में जाने का फ़ैसला मैंने भाजपा सरकार के कारण नहीं किया था, मैंने विषय को सुनने के बाद फ़ैसला लियाथा, मुझे वर्चुअल रियलिटी पर बोलने के लिए कहा गया था और मैं इस विषय पर हिन्दी में सबसे पहले किताब लेकर आया था इस कारण मेरा स्वाभाविक आकर्षण था, बुलाने वाले जानते थे कि मैं इंटरनेट पर सबसे तीखा भाजपा के खिलाफ लिखता रहा हूँ, मेरे फेसबुक पर इस प्रसंग में लिखने के बाद ही तथाकथित वामलेखकों की हाय -हाय आरंभ हुई, मेरी पोस्ट पर मंगलेश डबराल आदि ने अपनी राय दी , सारा बवाल वहीं से फेसबुक में तेज़ी से फैला,मेरा मानना है कि जलेसं को फेसबुक पर चलने वाली बहसों में नहीं बोलना चाहिए, यह मसला लेखक समूह ने नहीं उठाया बल्कि रायपुर मेले के प्रतिवादी मूलत: वे लेखक हैं जो वामपंथी बचकानेपन के शिकार हैं और माओवादियों के समर्थक हैं। ये वे लेखक हैं जिनकी सामयिक समाज, संस्कृति और लोकतंत्र के संबंधों को लेकर विकृत समझ है, लोकतंत्र इनके लिए भोग और दुरुपयोग की चीज है । लोकतंत्र का इन बचकानेपन वामपंथियों ने साहित्यिक अवसरवाद और झूठ के प्रचार के लिए जमकर दुरुपयोग किया है। मसलन् मंगलेश डबराल को मैं जब जेएनयू में पढ़ता था तब मेरा कोई परिचय तक नहीं था, लेकिन मेरे जेएनयू कार्यकाल को इस तरह व्यक्त किया गोया वे मुझे क़रीब से जानते हों, मैं वहाँ कई साल एसएफआई का यूनिट अध्यक्ष रहा , जलेस की यूनिट का सचिव रहा, छात्रसंघ का अध्यक्ष रहा, मेरा निष्कलंक जीवन रहा लेकिन मंगलेश डबराल और असद ज़ैदी ने अपनी घटिया मानसिकता का परिचय देते हुए फेसबुक पर मेरे खिलाफ अशालीन और असभ्य भाषा का इस्तेमाल किया। मेरे बारे में इन दोनों लेखकों को असभ्य भाषा लिखने में एकदम शर्म नहीं आई और जनवादी वाम लेखकों ने इनके आचरण की रीयलटाइम में निंदा तक नहीं की, गाली देने वाले इन दोनों लेखकों की जलेसं ने भी निंदा नहीं की , ये दोनों लेखक बाद में भी निर्लज्जता से अपनी असभ्य भाषा की फेसबुक पर नंगी हिमायत करते रहे हैं। दुर्भाग्यजनक है कि जलेसं के महासचिव के बयान में इन दोनों लेखकों के इस असभ्य आचरण की इस तरह अमूर्त भाषा में चर्चा की गयी है कि गोया गूँगे लड़ रहे हों ! जलेसं को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए , यदि हस्तक्षेप किया है तो ठोस रुप में नाम और संदर्भ के साथ गाली देने वाले लेखकों का नाम लेना चाहिए। दुर्भाग्यजनक है कि जो लेखक हमें रायपुर पर उपदेश दे रहे हैं वे पलटकर कभी अपने आचरण-दुराचारण पर ग़ौर नहीं करते,मसलन् मंगलेश डबराल असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल देखो तो पाओगे ये जनाब कितनी ईमानदारी से मोदी सरकार की चुप रहकर सेवा कर रहे हैं !

सवाल यह है रायपुर मेला के आगे जलेसं क्यों नहीं देख पा रहा ? लोकतंत्र में बहुदलीय शासन है तो बहुदलीय शासन के प्रति लोकतांत्रिक और पेशेवर रुख़ अपनाना होगा। जलेसं का परंपरागत रुख़ है । जसम के लेखकों का अवसरवादी और वामबचकानेपन का रुख़ है।सवाल यह है कि क्या लेखक संघ तय करेंगे या इनके लठैत तय करेंगे कि लेखक कहाँ जाय और कहाँ न जाय? हमारा मानना है यह लेखक का निजी फ़ैसला होगा कि वह कहाँ जाय ,लेखक का संबंध राज्य से किस रुप में हो यह भी परिभाषित भी लेखक करेगा , संगठन को तय करने का कोई हक़ नहीं है।

लेखकसंघ का काम है रचनाकारों को अभिव्यक्ति का साझा मंच देना , लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्कारों का प्रचार करना, राज्य की संरचनाओं के कार्यकलापों पर समय -समय पर लेखकों को आगाह करना, जनविरोधी नीतियों का विरोध करना और लेखकों में किसी भी क़िस्म के कठमुल्लेपन के खिलाफ अहर्निश संघर्ष चलाना।

हम जानना चाहते हैं जलेसं ने भाजपा संचालित राज्य सरकारों के द्वारा संचालित अकादमियों के प्रसंग में क्या कभी कोई गंभीर विश्लेषण करके लेखकों में कोई एक्शन प्लान पेश किया ? हालत यह है कि भाजपाशासित राज्यों में चल रही अकादमियों से साहित्य में कचडावर्षा हो रही है लेकिन जलेसं चुप है! क्यों चुप है?

रायपुर मेले पर बबाल करने वाले वामलेखकों ने भी कभी कोई गंभीर लेख इस विषय पर नहीं लिखा , लिखा है तो बताएँ कि कहाँ छपा है ? महज़ वामपंथी लेखक होने का नक़ली नाटक करके या प्रतिवाद का नाटक करके इन लेखकों में साहित्य जगत में अपने को जोकर साबित किया है। इस तरह के प्रतिवादी लेखकों की बुद्धि को मैं बंदर बुद्धि ही कहना चाहूँगा। ये अभी तक मानव बुद्धि अर्जित नहीं कर पाए हैं।

बेहतर हो जलेसं इस तरह के फेसबुक विवादों से दूर रहे। रायपुर के प्रतिवाद पर जलेसं का बयान मेरे लिए एक अन्य दृष्टि से हैरानी पैदा कर रहा है, वह है लोकतांत्रिक सरकार और कला संस्थाओं की भूमिका को लेकर, मसलन् मोदी सरकार के शासन में या पहले मनमोहन सरकार के शासन में फ़िल्म महोत्सव में शामिल होने वाले फिल्म कलाकार आदि क्या सरकारी हो गए? हमें अपना नजरिया बदलने की ज़रुरत है।फिल्म महोत्सव में शामिल होकर श्याम बेनेगल सरकारी आदमी नहीं बन जाता, केतन मेहता कांग्रेसी नहीं हो जाता, सरकारी कार्यक्रमों में लेखक की शिरकत को भी इसी रुप में देखना चाहिए। जो वामलेखक प्रतिवाद कर रहे हैं वे शुद्ध अवसरवादी नज़रिए से चीजों को देख रहे हैं ,बेहतर यही होता जलेसं बयान न देता, जलेसं के मित्रों को ख़्याल रखना होगा कि वामपंथी बचकानेपन के लेखकों को संतुष्ट करने की नहीं उनकी सीधे बखिया उधेड़ने की ज़रुरत है ।हम जानना चाहते हैं कि मोदी सरकार के रहते हुए साहित्य अकादमी आदि केन्द्र सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थाओं के आयोजनों में जाना चाहिए ? क्या इनाम लेने चाहिए? क्या एनजीओ संगठनों को केन्द्र सरकार से मदद लेनी चाहिए ? क्या पद्मसम्मान लेना चाहिए ? क्या पत्र पत्रिकाओं को केन्द्र सरकार या भाजपा सरकार के विज्ञापन प्रकाशित करने चाहिए ? क्या यूजीसी आदि संस्थाओं से सेमीनार, प्रोजेक्ट आदि के लिए फ़ंड लेना चाहिए ? क्या विदेशी कारपोरेट घरानों से फ़ंड लेना चाहिए ? हम उम्मीद करते हैं जलेसं गंभीरता से इन सवालों पर विचार करेगा और सबसे पहले भाजपा शासित राज्य सरकारों के द्वारा संचालित अकादमियों के बारे में श्वेतपत्र सामने लाएगा ।









जनवादी भोलापन

       
रायपुरसाहित्य मेला पर जनवादी लेखक संघ का बयान अनेक विलक्षण और संकीर्ण बातों की ओरध्यान खींचता है। मसलन्, बयान में लिखा गया है,छत्तीसगढ़ सरकार का यह आयोजन '' लेखकों तथा जनवादी रुझान के बुद्धिजीवियों केबीच विभेद और बिखराव के अपने एजेंडे को पूरा करना चाहता है.'' सवाल यह है यदि आपलोग जानते हीहैं कि वे क्या चाहते हैं तो फिर आपस में लड़ क्यों रहे हैं ? लेखकों में जानबूझकरफूट कौन पैदा कर रहा है ? स्वयं लेखक या भाजपा सरकार ? वस्तुगत स्थिति यह है किवहां जाने वाले किसी लेखक ने न जाने वाले लेखकों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा और न बोला! साहित्यिक मान-मर्यादाओं और लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार की अवहेलना उन लेखकों ने कीजो अपने को ''वामरक्षक'' कहते हैं। फूट के स्रोत ये ''वामरक्षक'' हैं ! फूट डालनेका काम वहीं से आरंभ हुआ।सार्वजनिक निंदा अभियान उन्होंने चलाया। असद जैदी-मंगलेशडबराल आदि ने तो अपमानजनक भाषा तक का इस्तेमाल किया। आश्चर्य की बात है इन ''वामरक्षक''लेखकों के हमलावर और फूट डालने बयानों की जलेसं ने निंदा तक नहीं की ! असभ्य आचरणकरने वाले लेखकों की निंदा न करके जलेसंकिस तरह का संदेश देना चाहता है ?सवाल उठता है कि असभ्य आचरण की रक्षा करना लेखकसंघ की भूमिका में कब से आने लगा ?

जलेसं की एक अन्य महत्वपूर्णखोज की ओर ध्यान दें ,'' कुछ जनवादी और वामपंथी लेखक अपने विवेक से उससाहित्योत्सव में शामिल होकर अपना स्वतंत्र और जनपक्षधर दृष्टिकोण स्पष्ट रूप सेव्यक्त कर पाए, इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि उक्त आयोजनभाजपा-आरएसएस का राजनीतिक प्रपंच और स्वांग नहीं था.'' जलेसं के नेतागण जानते हैं हर सरकारी कार्यक्रम स्वांग ही होता हैउससे ज्यादा यदि वे सोचते हैं तो गलतफहमी होगी! क्या यूपी सरकार के द्वारा 60 से ज्यादा लेखकों को दिया गयापुरस्कार स्वांग नहीं है ?क्या अखिलेश सरकार के शासन में कम दंगे हुए हैं ? क्या जलेसं अपने अध्यक्ष और दूसरे लेखकों को पुरस्कार लेने से रोकपाया ? क्या यूपी मेंकारपोरेट लूट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली लूट नहीं हो रही ? सिर्फसमाजवादी पार्टी की सरकार होने मात्र से क्या यूपी सरकार की समस्त कारगुजारियांपुण्य में बदल जाती हैं ? क्याइफको के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नामवर सिंह का जाना सही है ? क्या इससेमोदी सरकार को अपनी इमेज चमकाने का मौका नहीं मिलेगा ? केन्द्रीय हिन्दी संस्थान केमोदी सरकार आने के बाद दिए गए पुरस्कारों से मोदी सरकार की इमेज चमकेगी या नहीं ? मैं पुनःध्यान खींचना चाहता हूँ कि इस तरहवर्गीकृत करके नहीं देखा जाना चाहिए। जलेसं जिस तरह से पूरी समस्या को देख रहा है वहसाहित्य का संकीर्ण और तदर्थ नजरिया है। जलेसं से सवाल है कि आदिवासियों के खिलाफपुलिस और सैन्यबलों का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किस दल ने किया है ? बस्तर से लेकर उत्तर-पूर्व के राज्यों तक किसनेसबसे ज्यादा हिंसाचार फैलाया है कांग्रेस ने या भाजपा ने ? बस्तर में माओविरोधी ऑपरेशन की जड़ें कहां से पैदा हुई हैं ? मनमोहन सिंह की केन्द्र सरकार का क्या रुख रहापहले ? क्या मनमोहनसरकार का रुख आदिवासी हितैषी था ?सारे तथ्य और आँकड़े जलेसं के बयान के खिलाफ जाते हैं,इसके बावजूद जलेसं सच्चाईदेखने को तैयार नहीं है यह देखकर आश्चर्य होता है । मैं यहां वाम सरकारों का खासकरपश्चिम बंगाल सरकार का आदिवासियों के प्रति जो उपेक्षापूर्ण रुख रहा है उसकी ओरध्यान नहीं खींचना चाहता । जलेसं का नजरिया संकीर्ण ही नहीं गलत आधारों पर टिकाहै। उसमें एकांगिकता है।

कारपोरेटलूट के सभी बड़े मानक तो यूपीए सरकार ने बनाए ,फिर क्या यह मान लिया जाय कि उनदिनों जो लेखक उस सरकार के द्वारा वित्तपोषित संस्थाओं के कार्यक्रमों में जाते थेवे सही काम कर रहे थे ? हरसरकारी संस्था, संस्कृति-साहित्य का स्वांग करती है। यहां तक कि वाम सरकारें भी यहस्वाँग करती रही हैं। फर्ज करो छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार न होती, किसी और दलकी सरकार होती और सारी चीजें वही हो रही होतीं तो क्या सब कुछ जनतांत्रिक हो जाता ? सरकार तो सरकार है और इस मामले मेंसाम्प्रदायिकता,कारपोरेट लूट,शोषण –उत्पीड़न आदि को यदि आधार बनाकर ही देखा जाएगातो मुश्किल होगी। कौन सी ऐसी सरकार है जहां पर ये सब चीजें नहीं घट रहीं। सरकारसाम्प्रदायिक है तो क्या देश छोड़कर चले जाएं लेखक ? नौकरी न करें ? विपक्ष के सांसद ,संसद में न जाएं ? मजदूरवर्ग मिलकर भारतीय मजदूर संघ के साथआंदोलन न करे ?

क्या संघ की फासिस्ट हरकतों को मजदूर संगठनसीटू आदि नहीं जानते ? क्या वेबीएमएस के साथ मिलकर संघर्ष नहीं करते ?वे क्यों साझा संघर्ष करते हैं ?लेखकों से मजदूर संगठनों और संसद से भिन्नआचरण करने की माँग क्यों की जा रही है ? जलेसं का मानना है '' भाजपा लेखकों में यह भ्रान्ति फैलाना चाहती है कि वह असहमतियोंका सम्मान करती है. भाजपाई सरकार के इस छल पर लेखक गंभीरता से विचार करेंगे, ऐसी हम आशा करतेहैं.'' ,यह सच है, लेकिन जलेसं और उससे जुड़े लेखक क्या कर रहे हैं ? फेसबुक जैसेमहान मीडियम पर लेखकों की क्या भूमिका है ? जरा इन लेखकों की फेसबुक वॉल पर जाकरगौर करें तो सच्चाई सामने आ जाएगी !

भाजपा से वैचारिक जंग चंद बयानों और आकांक्षाओंके आधार पर नहीं लड़ी जा सकती।भाजपा के खिलाफ जंग के लिए लेखकों को अहर्निश लिखनाहोगा,कितने जनवादी-प्रगतिशील लेखक हैं जो भाजपा के साइबर हमलों के खिलाफ फेसबुक –ब्लॉग-ट्विटरआदि में लिख रहे हैं ? जो कुछ लिख रहे हैं वह क्या हस्तक्षेप के लिहाज से काफी है ?किसने रोका है जनवादी लेखकों को लिखने से ? वे चुप क्यों रहे जब मोदी के साइबरहमले हो रहे थे ? वे कौन से कारण हैं जो जनवादी लेखकों को मुक्त साइबर प्रतिवाद सेरोक रहे हैं ? साइबर प्रतिवाद में पैसे नहीं खर्च होते, किसी की अनुमति की भीजरुरत नहीं है,सिर्फ लेखक के विवेक और निडर अभिव्यक्ति से ही काम चल सकता है लेकिनजनवादी लेखक तो गूंगे लेखकों की तरह आचरण कर रहे हैं ,इससे अप्रत्यक्षतौर परमजदूरों-किसानों- और आम जनता का नुकसान हुआ है। जनवादियों के साइबर मंचों पर चुप रहनेसे मोदी-संघ को प्रच्छन्न मदद मिली है।

जलेसं का मानना है ''यह समय आयोजन में शिरकत करनेवालों की भर्त्सना का नहीं, बल्किउनके साथ सार्थक संवाद क़ायम करने का,'' जलेसं फिर सारे मसले को गलत ढ़ंग से देख रहा है। संवाद-विवादउनसे कीजिए जो हमले कर रहे हैं,जो लोग वहां गए उन्होंने सही माना इसीलिए वहां गएऔर यह उनका हक है और हम सभी को उनका सम्मान करना चाहिए। कौन किस आयोजन में जाएगा,यह फैसला लेखक का अपना निजी फैसला होगा। इस सम्मेलन में जो लोग गए इनमें अधिकांशलेखकों का साम्प्रदायिकता के खिलाफ लिखने का शानदार रिकॉर्ड रहा है।आदिवासियों-दलितों-स्त्रियों-बच्चों आदि पर लिखने में इन लेखकों की बड़ी भूमिकारही है। बल्कि मुश्किल यह है कि जो लेखक प्रतिवाद कर रहे हैं उनके प्रतिवादीरिकॉर्ड को जरा ध्यान देखें ? मसलन् असद जैदी-मंगलेश डबराल का फेसबुक पर मोदी केखिलाफ क्या रिकॉर्ड है जरा इनकी फेसबुक वॉल पर जाकर देख लें जनवादी लेखक संघ केनेतागण।मजेदार बात है जो लेखक मोदी कीहुंकार के सामने दुम दबाकर बैठे हैं वे मोदी विरोधी होने का दावा कर रहे हैं । मैंनेमोदी की हर नीति और हर बयान की रीयल टाइम में आलोचना लिखी,उसको ये दोनों लेखकगालियां दे रहे हैं और उन गालियों को हमारे मित्रगण अपनी वॉल से लंबे समय तक हटाएतक नहीं ,क्या यही आदर्श लोकतांत्रिक समाज है जिसे जलेसं बनाना चाहता है ? जलेसं के नेताओं के इस बयान में जिस तरह की विचारधाराहीन लीपापोती कीगयी है उसकी कम से कम मुझे उम्मीद नहीं थी। यह लीपापोती जलेसं को कहीं नहीं लेजाएगी, इससे संगठन की साख खराब हुई है।

हाल के वर्षों में हिन्दी लेखकों मेंदादागिरी और भाषायी असभ्य प्रयोग बढ़े हैं,खासकर फेसबुक पर यह चीज आए दिन उनलेखकों के द्वारा हो रही है जिनको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिले हैं या जो इसपुरस्कार की आशा लगाए बैठे हैं, सारी दुनिया में कहीं पर भी लेखक गालियां नहींबकते,लेकिन हिन्दी में यह परंपरा है कि हिन्दी लेखक अपमानजनक भाषा का पानी की तरहप्रयोग करते हैं। लेखकों में अपमानजनक भाषा का बढ़ता प्रयोग इस बात का संकेत है किलेखक लंपट होता जा रहा है, उसमें असभ्यता पैर पसार रही है। समस्या यह है कि नयीपरिस्थितियों में लेखक किस तरह व्यवहार करे ? किसनजरिए से देखे ? जलेसं का सरकार औरलेखक के अन्तस्संबंध को देखने का कोई सुसंगत नजरिया नहीं रहा है, कम से कम अब तोइस पहलू पर दो-टूक ढ़ंग से संगठन सोच ले । समस्या ''इस्तेमाल करने और (खुद) इस्तेमाल हो जाने ''की नहीं है, समस्या लोकतांत्रिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक आचरण की है। ''इस्तेमाल करने '' या इस्तेमाल हो जाने ''का नजरिया पुराने समाजवादी फ्रेमवर्क की देन है,यह नजरिया पूरी तरह अप्रासंगिक होचुका है। लेखक को हमें समाजवादी फ्रेमवर्क में नहीं लोकतांत्रिक-साइबर फ्रेमवर्कमें देखना होगा, लेखक के आचरणों की संविधान प्रदत्त अधिकारों की रोशनी में नईव्याख्या तैयार करनी होगी, लेखक को हाँकने या आदेश देने के मनोभाव से देखना बंदकरना होगा,इस दौर में नए कम्युनिकेशन मीडियम आ गए हैं अतः उन माध्यमों के परिप्रेक्ष्य में लेखक,राज्य और समाज के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करनाहोगा। जलेसं अभी तक पुराने फ्रेमवर्क में सोच रहा है यह उसके बयान में निहित है। पुरानानजरिया जलेसं को कहीं नहीं ले जाएगा,इससे संगठन का लेखकों से अलगाव और बढ़ेगा।लेखक कोई इस्तेमाल होने की चीज नहीं है। लेखक तो कम्युनिकेशन का मीडियम है।ऐसा मीडियम है जिसका मालिक वह स्वयं है।


'अभद्र वामलेखकों'' का कुवाम-खेल


                       मैं रायपुर साहित्यमेला में शामिल क्या हुआ,हिन्दी के ''अभद्र वामलेखक'' बागी हो गए! जो लेखक रायपुर गए उनके बारे में फेसबुक पर ये ''अभद्र वामलेखक'' अतार्किक और असभ्य बातें लिखने लगे,  असद जैदी-मंगलेश डबराल आदि ने तो लेखकीय गरिमा को नरक के हवाले कर दिया !सारी शिष्टता-भद्रता की सीमाएं तोड़ दीं। फेसबुक पर गालियां दीं,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। हम बलिहारी हैं उन महान सभ्य जनवादी लेखकों के जिन्होंने इस तरह की असभ्यता को अपनी फेसबुक वॉल पर प्रश्रय दिया,प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष समर्थन दिया !!
     गालियां देना,अश्लील,अशालीन भाषा में लिखना ''अभद्र वामलेखकों '' की विशेषता है। इस '' अभद्र वामलेखकों '' के सहयोगी हैं ''भद्रवाम लेखक'', जो ''अभद्रलेखकों'' की अभद्रता को मौन समर्थन दे रहे हैं। फेसबुक पर अभद्रता का 'वाम-खेल' असल में वाम के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है । इससे हिन्दी लेखकसमाज कलंकित हुआ है।   ''अभद्र वामलेखक'' ,अपनी 'कु-कलम' से रायपुर साहित्य मेला में शामिल होने वाली मैत्रेयी पुष्पा,रमणिका गुप्ता आदि को सरेआम अपमानित कर रहे हैं । जो लेखक रायपुर गए उनमें से अधिकांश का लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष लेखन में महत्वपूर्ण योगदान है। इनमें से अधिकांश का साम्प्रदायिकता आदि के खिलाफ लेखन के स्तर पर शानदार रिकॉर्ड  है । किसी भी लेखक ने रायपुर साहित्य मेला में आरएसएस और उसकी विचारधारा का पक्ष नहीं लिया,किसी के पैनल में कोई संघी लेखक शामिल नहीं था,तकरीबन सभी बड़े लेखकों ने खुले तौर पर अपनी बातें कहीं,संघ की भी आलोचना की।  इससे भाजपा और संघ को वैधता नहीं मिलती। बल्कि हमारा यह मानना है कि लेखकों को देश में सभी स्थानों पर बोलने-लिखने और प्रतिवाद करने की आजादी होनी चाहिए और जहां पर यह आजादी नहीं है या बाधित होती है वहां पर प्रतिवाद किया जाना चाहिए।
    किसी भी साहित्यिक आयोजन में आना-जाना लेखक का लोकतांत्रिक हक है, इस हक को कुत्सा प्रचार के जरिए छीनने का किसी को हक नहीं है।लेखक की विचारधारा कुछ भी हो ,लेकिन लोकतंत्र में लेखक के हकों को छीनने या उस पर हमला करने का किसी को हक नहीं है, जिस तरह लोकतंत्र में प्रतिवाद करने का हक है ,उसी तरह लोकतंत्र में शिरकत करने और शिरकत करके प्रतिवाद करने का भी हक है।
    शिरकत करके प्रतिवाद करना लोकतंत्र का आदर्श प्रतिवादी रुप है,इसके आदर्श हैं संसद और मजदूर आंदोलन। मसलन् ,संसद में विभिन्न दलों के सांसद शिरकत करके प्रतिवाद करते हैं,मजदूर आंदोलन में आरएसएस के मजदूर संगठन के साथ वाम मजदूर संगठन मिलकर प्रतिवाद करते हैं, वे जब मिलकर प्रतिवाद करते हैं तो यह नहीं सोचते कि संघ फासिस्ट है, उसके संगठन के साथ मिलकर लडाई नहीं लड़ेंगे। हाल ही में कई देशव्यापी हड़तालें वाम मजदूर संगठनों ने संघ संचालित भारतीय मजदूर संघ के साथ मिलकर की हैं।
   सवाल यह है  संघ के मजदूर संगठन के साथ वाम क्यों जाता है ? कम से कम हमारे लेखकों को संसद और मजदूर आंदोलन से सीखना चाहिए कि किस तरह अपने से भिन्न विचारधारा के लोगों के साथ आचरण करें ।वाम मजदूर संगठन कभी संयुक्त लड़ाई में अन्य संगठन के शामिल न होने पर उस पर  हमले नहीं करते। उस संगठन के नेता का चरित्रहनन नहीं करते, गालियां नहीं देते। लेकिन अफसोस है ये ''अभद्र वामलेखक'' गालियां देते हैं, गालियां लिखते हैं,लेखक का अपमान करते हैं। गालियां देना ,अपमान करना लेखक की नहीं, लंपटों की प्रवृत्ति है। मैं कई सालों से फेसबुक पर हूँ और असदजैदी-मंगलेश डबराल की तरह कभी असभ्यभाषा का किसी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया। मैं हमेशा सम्मान के साथ पेश आता हूँ और संवाद करता हूँ। अपने विरोधी का सम्मान करना और उसके साथ शिरकत करना,यह मैंने जेएनयू में राजनीति करते हुए सीखा। लेकिन दुर्भाग्यजनक है कि असदजैदी टाइप "असभ्यलेखक" जेएनयू में रहकर भी सभ्यता नहीं सीख पाया, उसने वहां से गालियां सीखीं ,अहंकार में रहना सीखा, मेल-मिलाप की संस्कृति की बजाय असभ्यभाषा का सार्वजनिक मीडियम में प्रयोग करना सीखा। मैं असद जैदी को उस समय से जानता हूँ वह जब जेएनयू में एमए उर्दू में पढ़ते थे, वे जिस संगठन के सदस्य थे ,मैं उसकाअध्यक्ष हुआ करता था और यह नेतृत्व मैंने अवसरवादी तरीकों से नहीं बल्कि संघर्षों में शिरकत करके हासिल किया था। जनाब मंगलेश डबराल को मैं लेखक के नाते जानता हूँ लेकिन असभ्यलेखक के रुप में मैंने उनको पहलीबार फेसबुक पर रायपुर मेले के प्रसंग में देखा है। मंगलेश डबराल जिस तरह के लेखक हैं,उनका असभ्य आचरण अक्षम्य अपराध है,मैं आसानी से असद जैदी-मंगलेश डबराल टाइप लेखकों को गालियां दे सकता हूँ ,लेकिन मजबूर हूँ कि मैं असभ्य नहीं हूँ। असभ्य होना आसान है,सभ्य होना और आचरण में  सभ्यता को बचाए रखना बेहद मुश्किल काम है।मंगलेश डबराल-असद जैदी टाइप लेखक जब गालियां देने लगें तो समझो कहीं बहुत गहरे तक लंपटसमाज ने हमारे लेखकों को अपनी असभ्यता से प्रभावित कर लिया है। हमें इस समस्या की जड़ों को खोजना चाहिए।
    लेखक के नाते हम ध्यान रखें फेसबुक बेहद ताकतवर माध्यम है,यह कम्युनिकेशन का माध्यम है, यह असामाजिकता और लंपटई का माध्यम नहीं है। जिन असभ्य लेखकों को असभ्यता दिखाने की आदत है वे जरा प्रिटमीडिया में किसी लेखक पर गालियां लिखकर दिखाएं ,मैं फिर कह रहा हूँ मंगलेश डबराल-असद जैदी जैसे लेखक किसी अखबार में किसी लेखक को गालियां लिखकर दें . फिर देखते हैं उस संपादक की क्या गति होती है और इन कलमलंपटों का क्या हश्र होता है ! फेसबुक पर असभ्यभाषा में लिखना सामाजिक अपराध है।
              ''अभद्र वाम लेखक'' की लाक्षणिक विशेषता है  वह न तो मजदूरों से सीखता है और न बुर्जुआजी से सीखता है, उसका प्रेरणा स्रोत तो लंपटसमाज है। लंपटसमाज में गालियां देना अलंकार है,शेखी बघारना ,अहंकार में रहना, अन्य लेखकों को हेय दृष्टि से देखना, असभ्य भाषायी पदबंधों में गरियाना उसकी नेचर है। फतबे जारी करना,कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है,यह तय करना वस्तुतः लंपटसमाज से उधार ली गयी साहित्यिक दादागिरी है। लंपटसमाज में लंपटों के छोटे-छोटे समूह होते हैं और वे तय इलाकों में सक्रिय रहते हैं। ठीक यही दशा''अभद्र वाम लेखकों'' की है। ''अभद्र वाम लेखक'' अपने लघुसमाज को 'साहित्य समाज'कहते हैं, असल में यह साहित्य समाज न होकर ''लंपट साहित्य समाज'' है , दलाली ,अवसरवाद,चमचागिरी इसके सामान्य लक्षण हैं। इन ''अभद्र वामलेखकों'' को सहज ही कांग्रेस -भाजपा के नेताओं के चैम्बरों में राजनीतिक चरण चुम्बन लेते सहज ही देखा जा सकता है। यहां तक प्रमाण है कि इण्डियन एक्सप्रेस की एक जमाने में हड़ताल तुड़वाने में ये ''अभद्रवामलेखक'' अग्रणी भूमिका निभा चुके हैं।
   दुखद बात यह है कि ''वाम अभद्रलेखक'' जब गाली देते हैं तो ''भद्र वामलेखक''चुपचाप रहते हैं, गालियां सुनकर चुप रहना,गाली देने वाले की निंदा न करना भी प्रच्छन्न अभद्रता है। ये वे लोग हैं जो लेखक संघ चला रहे हैं!  हम अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि यह कौन सा जनवाद है जो लेखकों को गाली देने को प्रश्रय देता है। अपमानित करने को महानता समझता है।लेखकों पर निजी हमले की रक्षा में यदि लेखक संघ के नेतागण खड़े रहेंगे तो यह तय है कि इससे जनवादी लेखक संघ-प्रगतिशील लेखक संघ भी कलंकित होंगे। मेरा जनवादी लेखक संघ में काम करने का शानदार रिकार्ड रहा है ,स्थापना के समय मैं जेएनयू शाखा का सचिव था, कोलकाता आने पर कोलकाता जिला सचिव रहा हूँ,इस संगठन को लाखों रुपये चंदा भी एकत्रित करके दिया है,पचासों लेखकों को इस संगठन से जोड़ा है। लेकिन मैंने कभी अपनी आँखों के सामने किसी लेखक को अपमानित नहीं होने दिया। किसी को असभ्यता नहीं करने दी। हमने यह नहीं सीखा कि जो असहमत हो उसे गालियां दो, जो हमारी न माने उसके बारे में मूल्य-निर्णय करो।
   जनवादी लेखक संघ बुनियादी तौर पर लेखकों के हकों के लिए प्रतिबद्ध संगठन है,वह राजनीतिक संगठन नहीं है, वह माकपा की राजनीतिक लाइन के अनुरुप लिखने-पढ़नेवालों का संगठन नहीं है, उसमें विभिन्न विचारधारा के लेखक हैं। रायपुर साहित्यमेला के प्रसंग में '' अभद्र वामलेखकों” के नजरिए की जनवादी लेखक संघ के कुछ लेखकों ने जिस तरह हिमायत की है वह जनवादी लेखक संघ के बुनियादी लक्ष्य का उल्लंघन हैं। यदि हमारी बात कोई लेखक न माने तो उस पर निजी हमले करो। इसे साहित्यिक गुण्डागर्दी कहते हैं।लोकतंत्र में यह संभावना सब समय रहती है कि लेखकों के अलग-अलग नजरिए हों और वे अलग-अलग ढ़ंग से एक ही मसले पर सोचें और आचरण करें,उनके वैचारिक सरोकारों में भी अंतर हो सकता है, लेकिन यह किस तरह का जनवाद है जो जनवादी लेखक संघ ,प्रगति लेखक संघ और जसम के लेखक संगठन के कुछ सदस्य फेसबुक पर व्यक्त कर रहे हैं कि जो रायपुर गया वह भाजपा का हो गया, भाजपा की दलाली करने लगा।
      देखें सच क्या है ? मसलन् मोदी के आगमन को लेकर फेसबुक पर लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद जितनी  पोस्ट मैंने संघपरिवार और मोदी की आलोचना में लिखी हैं,संभवतः किसी और लेखक ने नहीं लिखीं। अब आप जरा इन दोनों लेखकों ( मंगलेश डबराल और असद जैदी) या जनवादी लेखक संघ या प्रगतिशीललेखक संघ के नामी लेखकों की फेसबुक वॉल पर जाएं और देखें कि इनका फेसबुक पर मोदी के प्रति क्या रवैय्या  है ? मोदी एंड कंपनी जब इंटरनेट से बमबारी कर रही थी,मंगलेश डबराल-असदजैदी चुपचाप बैठकर आनंद ले रहे थे। यह सवाल तो उठता ही है कि लेखक के नाते मोदी के हमलों के खिलाफ इन लेखकों ने फेसबुक पर क्यों नहीं लिखा ? जब जनता पर मोदी एंड कंपनी हमला कर रही थी उस समय चुप रहना ,उसके उठाए मुद्दों पर न बोलना लोकतंत्र की मदद करना है या मोदी की मदद करना है ? यह अचानक नहीं है कि जिन इलाकों या राज्यों में माओवादी सक्रिय हैं वहां पर वामपंथी आंदोलन सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त हुआ है और कांग्रेस-भाजपा सबसे ज्यादा लाभान्वित हुए हैं। पश्चिम बंगाल में नक्सलबाडी आंदोलन से सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को मिला ,माकपा नुकसान में रही। छत्तीसगढ़ में भाजपा लाभान्वित हो रही है,आंध्र में कांग्रेस लाभान्वित हुई,यह अचानक नहीं है कि छत्तीसगढ़ में कोई बड़ा भाजपानेता माओवादियों का शिकार नहीं बना,स्थिति यह है कांग्रेसनेता दिग्विजय सिंह ने माओवादियों से कांग्रेस में शामिल होने की अपील की है।
    यह नियम है अराजकता का ,शासकवर्ग हमेशा अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है। माओवादी हिंसा और अराजकता की भी यही मूल परिणति है, इसलिए रमन सरकार को माओवादियों से बुनियादी तौर पर कोई परेशानी नहीं है,क्योंकि समग्रता में माओवादी भाजपा की मदद कर रहे हैं। माओवादी हिंसा और राजनीति की किसी भी तर्क से हिमायत संभव नहीं है। मूलतःऐसे किसी भी संगठन की हिमायत नहीं की जा सकती जिसका हमारे देश के संविधान में विश्वास न हो। हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि माओवादी राजनीति से क्या वामपंथ का विकास होगा या वामपंथ क्षतिग्रस्त होगा ? अब तक का अनुभव बताता है कि माओवादी राजनीति से वामपंथ क्षतिग्रस्त हुआ है। उनके राजनीतिक एक्शन बुर्जुआदलों की मदद करते रहे हैं और लोकतांत्रिक आंदोलन को कमजोर करते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में माओवादी सीधे माकपा को निशाना बनाते रहे हैं।नक्सलबाड़ी से लेकर लालगढ़ का अनुभव इसकीपुष्टि करता है।

कॉमरेड ! कबीलावाद को जनवाद नहीं कहते !



     हिन्दी लेखकों के एक बड़े हिस्से में फेसबुक से लेकर सांगठनिक स्तर तक कबीलावादी मानसिकता बनी हुई है। वे गुट बनाकर काम करते हैं, अपने गुट के सदस्य की प्रशंसा करते हैं, गुट का सदस्य घटिया काम करे,तब भी प्रशंसा करते हैं,उसकी स्तरहीन रचना को भी महान बनाकर पेश करते हैं, हर हालत में उसके पक्ष में खड़े होते हैं, जो उनसे अससहमत हो,उनकी आलोचना लिखे, उसपर निजी हमले करते हैं। फेसबुक पर सक्रिय अधिकांश जनवादी-प्रगतिशील लेखकों की फेसबुक वॉल देखें तो पाएंगे कि ये लोग फेसबुक पर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं करते, केन्द्र-राज्य सरकारों की जनविरोधी हरकतों या फैसलों की कभी तीखी आलोचना नहीं करते। साहित्य-कला के सवालों पर नहीं लिखते। इनकी दुनिया आत्म-प्रशंसकों से घिरी है। ये अपनी प्रशंसा करते हैं, जो उनकी प्रशंसा करता है, उसकी प्रशंसा करते हैं। इनकी फेसबुक वॉल पर किसी भी साहित्यिक मसले पर कोई बहस नहीं मिलेगी। ये फेसबुक में हैं लेकिन फेसबुक से जुड़े किसी भी ज्ञान-विज्ञान को पढ़ने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। ये दुनियाभर की सैर कर रहे हैं लेकिन थोड़ा ठहरकर दुनिया में जो मसले उठ रहे हैं उन पर बातें नहीं करते। देश –विदेश की दुनिया से बेखबर होकर फेसबुक पर ये लोग किसलिए हैं और किस रुप में हैं इसे समझने की जरुरत है । इनसे सवाल किया जाय कि वे फेसबुक पर क्यों हैं ? वे लेखक हैं तो देश-विदेश के सवालों पर गूंगे क्यों रहते हैं ? ये कमाल के वीर हैं,सारी दुनिया के सवालों पर गूंगे रहते हैं लेकिन अपने आलोचकों से पूछते हैं पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ? इनको कभी कांग्रेस-माकपा-भाजपा –सपा-बसपा आदि की जनविरोधी भूमिका पर एक पंक्ति लिखते नहीं देखा गया,इनको भारतीय लेखकों की कोई समस्या नजर नहीं आती और न उस पर कोई बहस चलाते हैं, हम सवाल करना चाहते हैं आखिर वे फेसबुक पर क्यों हैं ? फेसबुक पर इस तरह की गूंगी उपस्थिति तो इनके कबीलावाद को और भी मुखर रुप में व्यंजित कर रही है।

मोदी के आगमन के पहले और बाद में आप इन प्रगतिशील-जनवादियों की फेसबुक वॉल देखें तो चौंक जाएंगे अधिकतर की वॉल पर मोदी के बारे में बमुश्किल कोई पोस्ट मिलेगी,ऊपर से तुर्रा यह कि ये फेसबुक पर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कर रहे हैं। असल में ये फेसबुक को जनसंपर्क के माध्यम के रुप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हमें इस पर आपत्ति नहीं है कि वे जन-संपर्क क्यों करते हैं, हमें आपत्ति है कि ये लोग यदि सच में भाजपा विरोधी हैं,मोदी विरोधी हैं तो जमकर भाजपा सरकारों की जनविरोधी नीतियों और अमानवीयता पर लिखते क्यों नहीं ? पहले मनमोहन सिंह सरकार पर ये चुप क्यों थे ? इनकी फेसबुक वॉल पर छत्तीसगढ़ सरकार से लेकर मोदी सरकार के खिलाफ कोई पोस्ट या निरंतर पोस्ट नजर क्यों नहीं आतीं ?

ये लोग कबीले के सरदार की तरह फेसबुक पर आते हैं ,इधर-उधर लाइक करते हैं,एक-आध टिप्पणी लिखते हैं ,और 56इंट का सीना दिखाकर चले जाते हैं। फेसबुक पर उनका गूंगाभाव और सरकारी नीतियों से लेकर साहित्यिक सवालों तक चुप्पी बनाए रखना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हिन्दी के ये लेखक कबीलावाद से बाहर नहीं निकले हैं। कबीले की तमाम बुराईयां इनके फेसबुक आचरण में साफ दिखाई देती हैं।

हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहेंगे कबीलावाद , जनवाद नहीं है। फेसबुक से लेकर जीवन तक जनवाद का अर्थ है अन्य के व्यक्तित्व,विचार,व्यवहार,आचरण आदि का सम्मान करना.शिरकत,सहयोग और मित्रता को बनाए रखना, राज्य और अन्य संरचनाओं या अधिरचनाओं के वैचारिक सवालों पर वस्तुगत होकर तीखी बहस करना। अन्य के सही तर्क और विवेक को मानना। ''मैं सही और तुम गलत '' के फ्रेमवर्क में न सोचना। वह जनवाद बेमानी है जिसमें अन्य के लिए जगह न हो। तर्कहीन होना,गालिया बकना,गुस्सा करना,घृणा करना,चरित्र हनन करना,निजी जीवन पर हमले करना जनवाद नहीं है, यह तो कबीलावाद है। आधुनिक भाषा में कहूं तो यह मार्क्स-गांधी का नहीं नीत्शे का अनुसरण है।

इंटरनेट के युग में कबीलावाद के पक्षधर सिर्फ संग्रहालय की शोभा बढ़ाएंगे। हमारे हिन्दी लेखक कबीलावाद से निकलकर जनवाद के अनुरुप,भारत के संविधान के अनुरुप आचरण करें और लोकतंत्र को अपनी दैनन्दिन जीवन शैली में ढालें वरना वे अभी तो हाशिए पर हैं भविष्य में हाशिए के बाहर चले जाएंगे।

इंटरनेट युग कबीलावाद के अंत का युग है। इंटरनेट युग में कबीलावाद वस्तुतः एक किस्म का फंटामेंटलिज्म है। यह विलक्षण आयरनी है और सच्चाई है कि कबीलावादी लेखकों के आचरण और फंडामेंटलिस्टों के फेसबुक आचरण में बुनियादी तौर पर अनेक बातें मिलती-जुलती हैं। हम चाहते हैं हिन्दीलेखक (खासकर प्रगतिशील-जनवादी लेखक) कबीलावाद से बाहर निकलें और जनवादी आचरण करें। फेसबुक पर लिखें, विभिन्न विषयों पर बहस चलाएं और अपने नीतिगत नजरिए को पेश करें,नीत्शे के मार्ग से निकलकर मार्क्स-गांधी के मार्ग का अनुसरण करें।नीत्शे का मार्ग फासिज्म की ओर ले जाता है। यह आचरण को दुरुस्त करने वाली बात है, यदि नहीं समझे तो भविष्य में समाज में वही स्थान होगा जो नीत्शे का है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

मनमोहन की 8 कविताएं



                             कविवर मनमोहन
भारतीय संस्कृति- मनमोहन
पहले पहल जब हमने सुना
चमड़े का वॉशर है
तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था
जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए
पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया
अब भी कायनात में पीने योग्य
जितना पानी बचा है
दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले
हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा
ज़मीन की तहों में बस गया है

बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले
हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए
सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं
और नदियों में गिरते हैं
जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि
हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
घाट पर आता है
और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ
रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में
सौ मन दूध गिराता है



हाय सरदार पटेल ! - मनमोहन
 सरदार पटेल होते तो ये सब न होता
कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था
ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता
अब तक मिसाइल दाद चुके होते
साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते
सरदार पटेल होते तो हमारे देश में
हमारा इस तरह अपमान न होता !
ये साले हुसैन वुसैन
और ये सूडो सेकुलरिस्ट
और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट
इतनी हाय तौबा मचाते !
हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे
हमारे सर पर चठ़कर नाचते !
आबादी इस कदर बढ़ती !
मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें
 इस तरह बक बक करतीं !
सच कहें,सरदार पटेल होते
तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



चर्बी महोत्सव- मनमोहन

जिस तरह प्लास्टिक और पॉलीथिन हमारी नई सभ्यता है
जो अजर अमर हो गई है
चर्बी हमारी नई कल्चर है
जो इतनी नई भी नहीं

आप देख सकते
यह हमारी आँखों के आसपास सहज ही जमा हो जाती है
या गालों पर
या गलफड़ों में उतर आती है

दरअसल, हम चर्बी से बेहाल हुए जाते हैं
हमारी हँसी में चर्बी है
हमारे चुटकुलों में भी यह कम नहीं
बातों में बातें कम चर्बी ज्या़दा है
हाँ, बस रोना चाहें तो ढ़ंग से रो नहीं सकते

समझिए कि एक महोत्सव है

ख़ूबसूरत औरतें और क़ामयाब मर्द सब एक जगह
एक झुरमुट में व्यस्त हैं
लुक़मा चबलाते
बार-बार कन्धे उचकाते हैं

हमारा संप्रभु राष्ट्र-राज्य यही है
और इनके दायरे के बाहर सब दुश्मन देश

देखिए हमारे गोलमटोल बच्चे
जो कल को प्रबन्ध हाथ में लेंगे
अभी किस तरह तुतलाकर दिखलाते हैं
किस तरह खेल-खेल में वे कीटाणुओं को खदेड़ कर
भगा देते हैं और उनके दाँत कैसे चमकते हैं !

देववाणी -मनमोहन

अड़ियल चट्टानों को ढहा दिया जाएगा
डाइनामाइट लगा दिया जाएगा
ढेलों पर पाटा चला दिया जाएगा

चौरस बनेगा
चौरस
हमारा या आर्यावर्त

बिना कोनों वाला
बिना नोकों वाला

इसे टिकाएंगे हम

हम आर्यपुत्र
हम अमृतपुत्र
इसे टिकाएँगे इसे टिकाएँगे
तलवार की नोंक पर 


जिन्होंने मरने से इन्कार किया- मनमोहन

जिन्होंने मरने से इन्कार किया
और जिन्हें मार कर गाड़ दिया गया
वे मौका लगते ही चुपके से लौट आते हैं
और ख़ामोशी से हमारे कामों में शरीक हो जाते हैं

कभी-कभी तो हम घंटों बातें करते हैं
या साथ साथ रोते हैं

खा खाकर मर चुके लोगों को यह बात पता चलनी
जरा मुश्किल है
जो बड़ी तल्लीनता से अपने भव्य मकबरे बनाने
और अधमरे लोगों को ललचाने में लगे हैं


फिर भी मेरा क्या भरोसा- मनमोहन

मैं साथ लिया जा चुका हूँ
फ़तह किया जा चुका हूँ


फिर भी मेरा क्या भरोसा !

बहुत मामूली ठहरेंगी मेरी इच्छाएँ

औसत दर्जे़ के विचार
ज्यादातर पिटे हुए

मेरी याददाश्त भी कोई अच्छी नही

लेकिन देखिए ,फिर भी,कुत्ते मुझे सूँघने आते हैं
और मेरी तस्वीरें रखी जाती हैं



ईश वन्दना- मनमोहन

धन्य हो परमपिता ‍!

सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर

वाणी में छिपा है निर्णय

एक हाथ में न्याय की तुला
दूसरे में संस्कृति की चाबुक

दूर -दूर तक फैली है
प्रकृति

साक्षात पाप की तरह।


ग़लती ने राहत की साँस ली
 उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले खुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया















रविवार, 5 दिसंबर 2010

साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में

   
          एक जमाना था हिन्दी साहित्य में य़थार्थ का चित्रण होता था। विचारधारात्मक बहसें होती थीं। नए मानकों पर आलोचना लिखी जाती थी। इन दिनों हिन्दी साहित्य को तमाशबीनों और मेले-ठेले की संस्कृति ने घेर लिया है। पहले साहित्य में उत्सव गौण हुआ करते थे अब प्रधान हो गए हैं। यह साहित्य में तमाशबीन संस्कृति के आने का संकेत है। साहित्य में तमाशेखोरी ,मजमेबाजी को साहित्यकर्म समझना ठीक नहीं होगा। यह साहित्य का बदला हुआ पैराडाइम है। यह परवर्ती पूंजीवाद के गहरे असर का लक्षण है। परवर्ती पूंजीवाद ने हर चीज को तमाशेखोरी और नज़ारे में बदल दिया है।       
भारत तमाशबीनों का देश बनकर रह गया है। इसमें नागरिक नहीं तमाशबीन निवास करते हैं। तमाशबीनों की तरह आज हम सब एक-दूसरे को देख रहे हैं। पूरे समाज को देख रहे हैं।
      अब हम किसी के दोस्त नहीं रहे। रिश्तेदार-नातेदार नहीं रहे। परिचित मात्र हैं। तमाशबीन हैं। तमाशबीन की तरह एक-दूसरे के जीवन में तांक-झांक करते हैं। हम कब तमाशबीन में रूपान्तरित हो गए ? तमाशबीन होने से क्या होता है ? तमाशबीनों की बृहत्तर जमात में आज जो कुछ घटित हो रहा है उसे सामान्य बात कहकर टाला नहीं जा सकता ? तमाशबीन की तरह देखना परवर्ती पूंजीवादी समाज का लक्षण है। यह ऐसा समाज है जहां प्रतीक (साइन) की जगह हम व्यंजित को देखते हैं। मौलिक की नकल करते हैं। यथार्थ के प्रतिनिधि बनने का दावा कर रहे हैं।
       हम जो कुछ देख रहे हैं वह सब कल्पना है,विभ्रम है। कल्पना एक जमाने में आनंद देती थी इन दिनों भय पैदा करती है। सत्य दुर्लभ होता जा रहा है और कल्पना का विस्तार हो रहा है। पूंजीवादी समाज में जितना कल्पना का विस्तार होता है उसी मात्र में भय का विस्तार होता है। भय और कल्पना की इस अन्तर्क्रिया ने समूची सामाजिक चेतना को आच्छादित कर लिया है। फलतः सत्य छोटा हो गया है और कल्पना बड़ी हो गयी है।
      आज भारत में उत्पादन के आधुनिक साधनों का वर्चस्व है। यह सबको तमाशबीन बना रहा है। इसके कारण बड़े पैमाने पर नजारे देखने को मिलते हैं। अब हम जो कुछ देखते हैं वह सब इमेजों में देखते हैं,इमेजों के जरिए समाज को समझते और ग्रहण करते हैं। अब व्यक्ति का नहीं इमेजों का प्रतिनिधित्व सामने आता है। जिन इमेजों को देखते हैं उनका सामान्य जीवन से अब कोई संबंध नहीं होता,फलतःजीवन की एकीकृत धारणा भी नहीं बना पाते। जीवन में चीजों के बीच अन्तस्संबंध नहीं बना पाते। यथार्थ हमेशा अधखुला नजर आता है। यथार्थ अपनी आंतरिक एकता से कटा नजर आता है। जिस दुनिया को देखते हैं वह छद्म होती है। जिन वस्तुओं को देखते हैं वे उलझन पैदा करती हैं। जब इमेजों के संसार में विशिष्टिकृत इमेजों को रच लेते हैं तो इमेजों का स्वायत्त संसार पूर्णता प्राप्त कर लेता है। जिंदगीरहित चीजें स्वायत्त विचरण करने लगती हैं।
     मौजूदा समाज में इमेजों को देखना और उनमें ही जीना सामान्य बात हो गयी हो गयी है। नज़ारों ने प्रमुखता अर्जित कर ली है। इमेज और उनके नजारे ही एकता के सूत्र बन गए हैं। अब हम नज़ारों को देखते हैं,नज़ारे हमें देखते हैं। एक-दूसरे को देखना ही एकीकरण का मंत्र बन गया है। नज़ारे ही समाज को जोड़ने का उपकरण बन गए हैं। समाज में जहां जाओ सब एक-दूसरे को घूर रहे हैं। अब घूरना ही चेतना का निर्धारक तत्व बन गया है। घूरना छद्मचेतना का प्रभावशाली आधार है। वंचित और समर्थ सभी एक-दूसरे को घूर रहे इसके आधार पर ही हमारी चेतना बन रही है।
    हम जब इमेज देखते हैं तो सिर्फ इमेजों को ही नहीं देखते बल्कि इमेजों के जरिए जनता के बीच के सामाजिक संबंधों को भी देखते हैं। जनता के सामाजिक संबंधों के बीच में सेतु का काम इमेज करती हैं। इमेजों को विज़न के दुरूपयोग के जरिए नहीं समझा जा सकता। बल्कि इमेजों का उत्पादन जनोत्पादन की तकनीक के गर्भ से होता है। हम जिन इमेजों को मीडिया के विभिन्न रूपों के माध्यम से देखते हैं वे सभी सामाजिक वर्चस्व वाले मॉडल का प्रतिनिधित्व करती हैं। अब हमारे सामने तयशुदा चीजें पैदा करके रख दी गयी हैं और हमें इनमें से ही चुनना होता है। यह तय है किसमें से चुनना है ? कितना चुनना है ? और क्यों चुनना है ? यह सब निर्धारित है। हम जो चुनते हैं वह अवास्तविक होता है, काल्पनिक होता है। जो चुनते हैं  उससे सामाजिक यथार्थ में नया कुछ भी नहीं जोड़ते। हम उपलब्ध में से चुनते हैं। उपभोग करते हैं। फलतः सामाजिक वर्चस्व का हिस्सा मात्र बनकर रह गए हैं। हम जिन नज़ारों को देखते हैं वे रूप और अन्तर्वस्तु में मौजूदा व्यवस्था की वैधता को ही हमारे ज़ेहन में उतारते हैं। मौजूदा व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों की वैधता को पुष्ट करते हैं। नज़ारे हमारे मन में व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों के प्रति स्थायी वैधता पैदा करते हैं।
    नज़ारे के दर्शकों की भाषा शासकीय भाषा होती है। शासकों की भाषा में नज़ारों का उत्पादन हो रहा है। प्रतिवाद की भाषा का अपहरण कर लिया गया है। इस प्रक्रिया में साहित्य में यथार्थ की जगह निर्मित यथार्थ ने ले ली है और उसकी जय-जयकार में आलोचक व्यस्त हैं। अमेरिका का विरोध करने ,साम्राज्यवाद का विरोध करने वालों की भाषा का लोप हो गया है। पूंजीवाद,अमेरिका,साम्राज्यवाद आदि पदबंधों को लेकर अनुकूल भावबोध और अर्थ संप्रेषित पैदा किया जा रहा है। पूंजीवाद,नव्य-उदारतावाद आदि के प्रति जनता को सक्रिय करने वालों को प्रगतिशील कहा जा रहा है। पूंजीवाद को श्रेष्ठतम समाज के रूप में चित्रित किया जा रहा है। हमें बार-बार यही बताया जा रहा है कि हम पूंजीवाद का समर्थन करें। हमें सहनशील बनने की सीखें  दी जा रही हैं। कहा जा रहा है हम तटस्थ रहें, विवादों, संघर्षों,मांगों के लिए होने वाले सामूहिक संघर्षों से दूर रहें, सामूहिक संघर्ष बुरे होते हैं। आम आदमी को तकलीफ देते हैं। जो लोग समाज में तटस्थता का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं ,वस्तुतः पूंजीवाद से तटस्थता का प्रचार कर रहे  हैं। मीडिया और साहित्य में जनसंघर्षों और मानवाधिकार हनन का विकृत प्रचार मूलतः पूंजीवाद की ही सेवा है। यह पूंजीवादी समाज के अन्यायपूर्ण चेहरे को ढंकने की कोशिश है।
   पूंजीवाद ने हमारे सामाजिक जीवन को किस तरह हजम कर लिया है उसका साक्षात प्रमाण है भीषण गर्मी का प्रकोप। अंधाधुंध ,विषम और अनियोजित पूंजीवादी विकास के कारण पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। इस क्रम में हम गर्मी झेल रहे हैं लेकिन पूंजीवाद के बारे में हम कोई भी चर्चा नहीं कर रहे। बल्कि मीडिया निर्मित नजारे की संस्कृति ने मौसम को पूंजीवाद निरपेक्ष और भगवान की कृपा बना दिया है। गर्मी की भीषण तबाही हमारे अंदर किसी भी किस्म की सामाजिक बेचैनी पैदा नहीं कर रही है। मौसम में आए बदलाव हमें पूंजीवादरहित नजर आ रहे हैं। माओवादियों की खूंखार हरकतें गरीबी की देन नजर आ रही हैं। माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। जब माओवादी हिंसा कर रहे हों ऐसे में जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है।कारपोरेट पूंजी निवेश के विध्वंसात्मक  आयाम पर पर्दादारी की जा रही है। हर चीज का जबाव बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। नव्य उदारतावाद और साम्राज्यवाद के विरोध को अंध अमेरिकी विरोध की बृहत्तर केटेगरी में बांध दिया गया है। जबकि सच यह है कि साम्राज्यवाद के विरोध का अर्थ अंध अमेरिकी विरोध नहीं है।साहित्य और कारपोरेट मीडिया में परवर्ती पूंजीवाद की आलोचना का लोप हो गया है।
     एक जमाना था रंगभेद को सबसे बड़ा भेदभाव का रूप माना जाता था नए किस्म का रंगभेद है झुग्गी-झोंपड़ी ,कच्ची बस्तियां और मुस्लिमों के प्रति घृणा। तमाम किस्म के उदारवादियों में झोंपडी वालों और मुसलमानों के प्रति भेददृष्टि को देख सकते हैं। समूचे देश में विगत तीन दशकों में कच्ची बस्तियों का व्यापक विस्तार हुआ है। महानगरों और शहरों में जितने लोग घरों में रहते हैं उतने ही या उससे ज्यादा लोग झोंपड़ पट्टियों में रह रहे हैं। क्या बस्ती वाले को हम सर्वहारा कह सकते हैं ? क्या यह समुदाय क्रांति कर सकता है? ये वे लोग हैं जिनके पास परंपरागत जाति-धार्मिक पहचान नहीं है, किसी भी किस्म की परंपरागत जीवन शैली नहीं है। स्लावोज जीजेक के शब्दों में इनके पास किसी भी किस्म की पहचान नहीं है। ये सभी किस्म के आधारभूत बंधनों से मुक्त हैं। ये मुक्त स्पेस में यहां से वहां ढ़ुलकते रहते हैं। ये राज्य और पुलिस के नियमन के पूरी तरह बाहर हैं। इन्हें  जबरिया ढ़ंग से समूह में बांध दिया गया है। ये जबरिया एक साथ रहने के लिए अभिशप्त हैं। इनकी परिस्थितियां ऐसी हैं कि अब इनके यहां कोई घटना घटित नहीं होती। आमतौर पर यह कहा जाता है समूचे समाज पर राज्य का नियंत्रण है। लेकिन कच्ची बस्तियों में रहने वालों पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं है।  ये राज्य नियंत्रण के बाहर हैं। इस जनता पर साहित्य में बहस नहीं हो रही। आलोचक नहीं लिख रहे। झोपड़पट्टियों में रहने वाली आबादी में से ही हिंसक गिरोह तैयार हो रहे हैं। हिंसा को जनप्रिय और वैध बनाने में इन वर्गों की बड़ी भूमिका है। हिंसा को झोंपड़पट्टी वालों ने साझा संस्कृति में तब्दील किया है। हिंसा का ज्ञान,राजनीति,मीडिया,साहित्य आदि के स्तर पर महिमामंड़न बढ़ा है। हिंसा का समाजीकरण हो रहा है। फलतःआम बोलचाल की भाषा में हिंसक भाषा आ बैठी है। आम आदमी के पास प्राइवेट वातावरण  का लोप हुआ है। प्राइवेट वातावरण में अहर्निश भय बना हुआ है।प्राइवेसी के सवाल मूलतः संपत्ति संचय के सवाल हैं। संपत्ति संचय के जिन रूपों को हम इन दिनों देख रहे हैं वे हैं बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल अधिकार, इंटरनेट से मुफ्त सामग्री संकलन का अधिकार,नेट से मुफ्त संगीत पाने का अधिकार आदि। ये सभी आधुनिक किस्म के संपदा संचय के स्रोत हैं।
   अब राजनीति में विचारधारा के आधार पर जनता को संगठित नहीं किया जा रहा है बल्कि विशेषज्ञों के द्वारा जनता के प्रबंधन और प्रशासन पर जोर दिया जा रहा है। अराजनीतिक ढ़ंग से समाज की सुरक्षा और विकास की बातें की जा रही हैं। समूचे वातावरण को भय में तब्दील कर दिया गया है। हमेशा भय,आशंका और तबाही के डर में कैद रहते हैं। आम जनता में धर्म का ह्रास हुआ है धर्म की जगह धार्मिक तत्ववाद ने ले ली है। धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म के प्रभुत्व को आज कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। जगह-जगह धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म ने सामाजिक दायरों को संकुचित किया है। समाज में ‘पशु मनुष्य’ और ‘अमानवीय’ ये दो किस्म के लोग ज्यादा दिख रहे हैं। सामान्य जीवन में खाओ-पीओ-मौज करो का नारा देकर जो धारणा बनाई जा रही है उससे ‘पशु मनुष्य’ की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। खाओ-पाओ-मौज करो का सिद्धान्त पशु का सिद्धान्त है। आज आदमी आनंद और मनोरंजन के चक्कर में व्यस्त है और मौत आदि से डरता है। यह पशु की मनोदशा है। इसे मानवीय मनोदशा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। सत्य प्रेम ही मनुष्य को पशुता से मुक्ति दिलाता है।साहित्य और मीडिया में सत्य की बजाय कृत्रिम यथार्थ और भय का उत्पादन हो रहा है। यह सांस्कृतिक क्षय की सूचना है।                     

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- लोकतांत्रिक कविता की संरचनाएं

     कविता का नया अर्थ है लोकतंत्र का संचार। अछूते को स्पर्श करना। उन विषयों पर लिखना जो कविता के क्षेत्र में वर्जित थे। प्रतिवादी लोकतंत्र के पक्ष में कविता का जितना विस्तार होता गया वह उतना ही लोकतांत्रिक होती गयी। कविता में लोकतंत्र का अर्थ है कविता और माध्यमों की पुरानी सीमाओं का अंत। लोकतंत्र का अर्थ है अनंत सीमाओं तक कविता के आकाश का विस्तार। कविता की पुरानी संरचनाओं का अंत।
    कविता के लिए पहले राजनीति बेमानी थी,कविता ने अपना छंद बदला राजनीति को अपना लिया। कविता में पहले प्रकृति,श्रृंगार और शरीर की लय का सौंदर्य था। आज कविता इनके पार समूचे मानवीय कार्य-व्यापार तक अपना दायरा विकसित कर चुकी है।
     कविता में आज भेद खत्म हो चुका है। पहले कविता में विषयों को लेकर भेदभाव था ।आज ऐसा नहीं है। कविता ने अछूते विषयों की विदाई कर दी है। कविता में पहले अर्थ छिपा होता था। अर्थ और संरचनाएं रहस्यात्मक होते थे। उन्हें खोलना होता था। अर्थ खोजने पड़ते थे। आलोचक-शिक्षकरूपी मिडिलमैन की जरूरत होती थी। आज कविता को किसी मिडिलमैन की जरूरत नहीं है।
     कविता की आंतरिक संरचनाओं का वि-रहस्यीकरण हुआ है। कविता और उसके अर्थ आज ज्यादा पारदर्शी हैं। कविता का जीवन संघर्षों के साथ सघन संबंध स्थापित हुआ है। कविता पहले प्रशंसा में लिखी जाती थी आज यथार्थ पर लिखी जाती है। कविता में जीवन की आलोचना का आना कविता के लोकतांत्रिक होने का संकेत है।
     कविता को पहले मिथों की जरूरत थी आज कविता मिथों को तोड़ती है। कविता में मिथों का लोप हो चुका है। मिथों की जगह जीवन का यथार्थ आ गया है। जीवनशैली के प्रश्न आ गए हैं। पहले कविता में अप्रत्यक्ष वर्चस्व हुआ करता था इनदिनों कविता का वर्चस्व के खिलाफ जमकर विस्तार हुआ है।
   पहले कविता मनोरंजन का साधन थी,आज कविता जीवन की प्राणवायु है। कविता ने तरक्की की है वह सहज ही हमारी दैनंदिन सांस्कृतिक आस्वाद प्रक्रिया का हिस्सा बन गयी है।
    पहले कविता लेखक और पाठक तक सीमित थी,आज उसने संस्कृति उद्योग तक अपना विस्तार कर लिया है। पहले कविता मुद्रण तक सीमित थी आज वह ऑडियो-वीडियो ,नेट ,वेब तक फैल गयी है। कविता का इतना फैलाव होगा हमने कभी सोचा नहीं था। यह सच है सभ्यता के विकास के साथ कविता का भी विकास हुआ है। कविता मरी नहीं है बदली है। हमें इसकी बदली हुई धुन और मिजाज को पकड़ना होगा।
      आज पुराने काव्यमानकों के आधार पर कविता नहीं लिख सकते। यदि लिखोगे तो कोई पढ़ेगा नहीं। कविता के इस बदले मिजाज पर व्यंग्य करते हुए बाबा ने लिखा-‘‘ वो रूठ गई है/उसे परेशान मत करो/जाने किस मुहूर्त्त में/उसे अपमानित किया था तुमने /तुम्हारी धुली मुस्कान पे/ उसे घिन आती है.../आपके शब्दालंकार/भुस की बोरियाँ हैं उसके लिए/प्लीज,हट जाओ सामने से/ उसे परेशान मत करो आप/अभिधा-लक्षणा-व्यंजना/सबकी सब सहेलियाँ हैं उसकी/सबकी सब.../उसे खो चुके हो आप,सदा-सदा के लिए !’’
    कविता के बदले पैराडाइम में नया है कविता में अछूते विषयों और नए माध्यमों का आना। इसका एक नमूना देखें- ‘‘जन्म लिया /मेरे काव्य शिशु ने/गहन रात्रि में/क्या किसी ने सुना उसका क्रन्दन/क्या किसी ने सुना उसका आर्त्तनाद/मैं स्वयं ही इस नवजात की धात्री/मैं स्वयं ही इस नवजात की जननी/जन्म लिया है /मेरे शिशु ने /गहन रात्रि में।’’



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...